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Guest
उफ़! ये कैसी मुसीबत! मैं अब पहुंचा शर्मा जी के पास और लग गया उधेड़बुन में, सारा किस्सा बताया उनको! वे भी हतप्रभ!
"बड़ा ही विचित्र मामला है!" वे बोल पड़े!
"हाँ!" "मैंने कहा,
"लेकिन आप रात को सिवाने में बैठे थे तो क्या पता चला था?" उन्होंने पूछा,
"कि यहाँ सोनिला का किया हुआ है सारा प्रपंच" मैंने कहा,
"कारण?" उन्होंने पूछा,
"नहीं पता" मैंने कहा,
"क्या सोनिला बाबा की माया है यहाँ?" उन्होंने पूछा,
"आप स्वयं देख लीजिये, यहाँ जो कुछ भो हो रहा है वो बाबा सोनिला सपेर से ही हो रहा है, वही है सर्वेसर्वा!" मैंने कहा,
"अब कैसे पार पड़ेगी?" उन्होंने संशय से पूछा,
"बाबा को जगाना होगा फिर" मैंने कहा,
"कोई अनहोनी न हो जाए?" वे घबरा के बोले,
"होनी होती तो आज ही कर देते" मैंने कहा,
"अरे हाँ" वे बोले,
"अब कैसे जगाओगे यहाँ?" उन्होंने पूछा,
"मैं यहीं क्रिया करूँगा" मैंने कहा,
"खेत में?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
"कब?" उन्होंने पूछा,
"आज ही" मैंने उत्तर दिया!
अब हम खड़े हुए,
और वापिस हुए बिरजू की कोठरी के लिए!
बिरजू आँखें फाड़े बैठा थे!
"आ गए?" उनसे शर्मा जी से पूछा,
"हाँ बिरजू" वे बोले,
और हम चारपाई पर बैठ गए!
"बिरजू?" मैंने टोका,
"हाँ जी?" वे बोले,
"क्या उम्र है तुम्हारी?" मैंने पूछा,
"जी कोई पचपन" वे बोले,
"कभी ऐसा पहले हुए है तुम्हारी याद में?" मैंने पूछा,
"नहीं जी" वे बोले,
"पिता जी के समय में?" मैंने पूछा,
"हाँ जी" वे बोले,
"हम्म्म" मैंने अंदाजा लगाया,
ये पैंसठया का चक्कर है! मुझे याद आया!
अरे हाँ!
समझ गया!
मोहन बाबा ने ऐसा बताया था! इस वर्ष ये पैंसठया चक्र है! नाग-लोक का चक्र! हमारे पैंसठ वर्ष और उनका एक दिन! समझ गया! मौखिक रूप से ही!
अब चाहिए थीं मुझे कुछ आवश्यक सामग्रियां! और वो शहर से ही मिल सकती थीं!
"चलो, कुछ सामान लाना है, गुड की भेलियां आदि, कुछ और भी, चलो शहर चलें" मैंने उठते हुए कहा,
"चलिए गुरु जी" बिरजू उठे और कहा,
"गुरु जी, गुड की भेलियां एक बाबा ने भी डलवाईं थे वहाँ" बिरजू ने कहा,
"हाँ, बाबा ने सही किया था" मैंने कहा,
अब हम वहाँ से निकले शहर की तरफ!
"बड़ा ही विचित्र मामला है!" वे बोल पड़े!
"हाँ!" "मैंने कहा,
"लेकिन आप रात को सिवाने में बैठे थे तो क्या पता चला था?" उन्होंने पूछा,
"कि यहाँ सोनिला का किया हुआ है सारा प्रपंच" मैंने कहा,
"कारण?" उन्होंने पूछा,
"नहीं पता" मैंने कहा,
"क्या सोनिला बाबा की माया है यहाँ?" उन्होंने पूछा,
"आप स्वयं देख लीजिये, यहाँ जो कुछ भो हो रहा है वो बाबा सोनिला सपेर से ही हो रहा है, वही है सर्वेसर्वा!" मैंने कहा,
"अब कैसे पार पड़ेगी?" उन्होंने संशय से पूछा,
"बाबा को जगाना होगा फिर" मैंने कहा,
"कोई अनहोनी न हो जाए?" वे घबरा के बोले,
"होनी होती तो आज ही कर देते" मैंने कहा,
"अरे हाँ" वे बोले,
"अब कैसे जगाओगे यहाँ?" उन्होंने पूछा,
"मैं यहीं क्रिया करूँगा" मैंने कहा,
"खेत में?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
"कब?" उन्होंने पूछा,
"आज ही" मैंने उत्तर दिया!
अब हम खड़े हुए,
और वापिस हुए बिरजू की कोठरी के लिए!
बिरजू आँखें फाड़े बैठा थे!
"आ गए?" उनसे शर्मा जी से पूछा,
"हाँ बिरजू" वे बोले,
और हम चारपाई पर बैठ गए!
"बिरजू?" मैंने टोका,
"हाँ जी?" वे बोले,
"क्या उम्र है तुम्हारी?" मैंने पूछा,
"जी कोई पचपन" वे बोले,
"कभी ऐसा पहले हुए है तुम्हारी याद में?" मैंने पूछा,
"नहीं जी" वे बोले,
"पिता जी के समय में?" मैंने पूछा,
"हाँ जी" वे बोले,
"हम्म्म" मैंने अंदाजा लगाया,
ये पैंसठया का चक्कर है! मुझे याद आया!
अरे हाँ!
समझ गया!
मोहन बाबा ने ऐसा बताया था! इस वर्ष ये पैंसठया चक्र है! नाग-लोक का चक्र! हमारे पैंसठ वर्ष और उनका एक दिन! समझ गया! मौखिक रूप से ही!
अब चाहिए थीं मुझे कुछ आवश्यक सामग्रियां! और वो शहर से ही मिल सकती थीं!
"चलो, कुछ सामान लाना है, गुड की भेलियां आदि, कुछ और भी, चलो शहर चलें" मैंने उठते हुए कहा,
"चलिए गुरु जी" बिरजू उठे और कहा,
"गुरु जी, गुड की भेलियां एक बाबा ने भी डलवाईं थे वहाँ" बिरजू ने कहा,
"हाँ, बाबा ने सही किया था" मैंने कहा,
अब हम वहाँ से निकले शहर की तरफ!