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जिला बिजनौर की एक घटना वर्ष २०१२

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जिला बिजनौर की एक घटना वर्ष २०१२



चौमासे के दिन थे, उस दिन दो बजे मध्यान्ह का समय रहा होगा, लेकिन बाहर छाये बादलों ने पृथ्वी की सत्ता छीन रखी थी, नृप सूर्य अपदस्थ कर दिए गए थे! बाहर चारों ओर बस मेह की बूँदें और बून्दें और उन बूंदों से गार होती हुई पृथ्वी की नरम त्वचा! कई पक्षी वहाँ पेड़ों की, बल्लियों से बंधी तारों पर बैठे बौछार का लुत्फ़ ले रहे थे! मेरी नज़र ऐसे ही एक कठफोड़वे के जोड़े पर थी, जो समय समय पर चोंच मिलाते और फिर से लुत्फ़ लेने लगते बौछार का! फिर एकदम से वो उड़ गए! स्थान परिवर्तन का लिया, पीछे बंधे मवेशी भी मस्त थे! भैंसें रम्भा रही थीं, बकरियां भी अपनी आवाज़ से अपने होने का प्रमाण दे रही थीं! हवा में मिट्टी की खुश्बू फैली थी! मैं खेस में ढका हुआ, उस पटिया से बने एक कमरे में बैठा था, शर्मा जी एक दूसरी चारपाई पर बैठे थे! बीड़ी चल रही थी दबा कर, वहाँ दो और लोग बैठे थे, बिरजू और केवल सिंह, दोनों रिश्तेदार थे आपस में, घर बिरजू का था, बिरजू एक सरकारी महकमे में मुलाज़िम थे और केवल दिल्ली में अध्यापक थे, उन्ही के कहने पर हम यहाँ आये थे कोई दस बजे करीब, जब चले थे तब भी बारिश थी और बारिश ने यहाँ तक साथ निभाया था, आगे का पता नहीं!

"चाय नहीं आयी, जाने क्या बात हुई?" कहते उठे बिरजू,

छतरी ले बाहर गए और फिर कुछ देर बाद उनका लड़का चाय ले आया, साथ में कुछ बर्फी और नमकीन!

हमारे कप हमे पकड़ाये गए, हमने ले लिए!

चाय पीनी आरम्भ की,

बर्फी भी खायी!

"कितनी दूर होंगे खेत यहाँ से?" शर्मा जी ने पूछा,

"आधा किलोमीटर से अधिक नहीं" केवल बोले,

'अच्छा" वे बोले,

"आखिरी बार कब देखे थे आपने सांप?" मैंने पूछा,

लड़का बता रहा है कि कल तो खेत में घुसने ही नहीं दिया किसी को" बिरजू ने चुस्की भरते हुए कहा चाय की!

"अच्छा!" मैं रोमांचित सा हुआ!

लड़का वहीँ खड़ा था!

"क्या नाम है?" मैंने पूछा,

"नकुल" वो बोला,

"अच्छा" मैंने कहा,

अब फिर से बर्फी खायी मैंने!

लड़का मुझे ही देख रहा था!

"कैसा सांप था वो?" मैंने पूछा,

"हरे-पीले रंग का" वो बोला,

"कितना बड़ा?" मैंने पूछा,

"जी मेरे बराबर होगा" वो बोला,

अर्थात साढ़े पांच फीट!

"और भी थे वहाँ सांप?" मैंने पूछा,

"और नहीं देखे" उसने कहा,

"अच्छा" मैंने कहा,

तभी बिजली कड़की! जैसे मैंने गलत प्रश्न किया हो!

और बारिश तेज हो गयी!

चाय ख़तम हुई तो कप हमने वहाँ नीचे रख दिए!

"किसी को दिखाया नहीं?" मैंने केवल से पूछा,

"दिखाया था जी" वो गला साफ़ करते हुए बोले,

"किसको?" मैंने पूछा,

"एक सपेरा आया था, उसको" वे बोले,

"क्या बोला वो?" मैंने पूछा,

वो गया, सांप देखे, एक एक सांप पकड़ने के पांच सौ रुपये मांगे, बात दो सौ में तय हो गई" वे बोलकर चुप हुए,

"फिर?" मैंने पूछा,

"वो वापिस भाग आया, बोला यहाँ हज़ारों सांप हैं, उसके बसकी बात नहीं" वो बोले,

"फिर?" मैंने हैरान हो कर पूछा,

"फिर की गुरु जी, अब भाग गया वो" उन्होंने बात ख़तम की,

मैं हज़ारो साँपों की कल्पना करने लगा!

"फिर जी एक ओझा बुलाया हमने" अब बिरजू ने बात आगे बढ़ाई,

"अच्छा! फिर?" मैंने पूछा,

"वो खेत में गया और बोला कोई धन का चक्कर है, फिर बोला नहीं कोई चुड़ैल है यहाँ, फिर बोला कि कोई समाधि है यहाँ, फिर वो भी भाग गया!" वे बोले,

"कमाल है" मैंने कहा,

"हम डर गए जी" बिरजू ने कहा,

"अच्छा, स्वाभाविक ही है डरना" मैंने कहा,

"जी फिर एक साधू बाबा आये, बोले, तीन मरेंगे इस कुनबे में" बिरजू ने कहा,

"तीन?" मुझे आश्चर्य हुआ!

"हाँ जी" वे बोले,

"साधू बाबा ने कुछ बताया नहीं बचने का उपाय?" मैंने पूछा,

"नहीं जी" वे बोले,

विचित्र और अद्भुत मामला था ये!
 
अब जिज्ञासा रुपी सांप मन में कुंडली खोलने को आमादा था, लग रहा था कोई बहुत बड़ा रहस्य है वहाँ, लेकिन यहाँ तो वर्षा ऐसी थी कि बाहर जाते आदमी को ज़मीन में ही चिपका दे! मेघ और साथ दें उसका! ऐसा कि जैसे दैविक-मंडल से निष्कासित कर दिया गया हो वर्षा देवी को! और भेज दिया गया हो मृत्युलोक में! और अब न तो भूमि ही शरण दे और न ही आकाश! फंस के रह गयी थी! यहाँ के मानस और लपेट लिए थे उसने अपनी खीझ मिटाने के लिए!

फिर से बिजली कौंधी!

कान में घुसी तो पता चला कि बादल हलके नहीं है! बहुत दमखम बाकी है उनमे अभी!

"और किसने देखा उनको?" मैंने पूछा,

"हमारे पडोसी है बृज लाल, उन्होंने" केवल ने कहा,

"क्या देखा?" मैंने पूछा,

"उन्होंने अजीब सी बात बताई" वे बोले,

"क्या?" मैंने उत्सुकता से पूछा,

"उन्होंने बताया कि सांप खेत में एक गड्ढे से निकल रहे थे और फिर वहीँ घूम घूम कर फिर से गड्ढे में जा रहे थे" वे बोले,

चौंक पड़ा मैं!

अब मन में लगी लग गयी!

लेकिन ये बारिश! बारिश तो थमने का नाम ही न ले!

"कोई फसल लगाईं है अभी?" मैंने पूछा,

"नहीं जी" वे बोले,

"कोई आहत तो नहीं हुआ आज तक?" मैंने पूछा,

"नहीं जी" वे बोले,

और कोई बात?" मैंने पूछा,

"हाँ जी" वे बोले,

"क्या?" मैंने पूछा,

"किसी महिला और बालक-बालिकाओं को नहीं दिखा वहाँ कुछ भी, आज तक" वे बोले,

एक और रहस्य! एक और रहस्य की माला मैंने धारण की!

अब ये अछूते क्यों?

हैरत है न?

क्यों मित्रगण!

खैर!

मैं उठा, बाहर देखा, बारिश ने तो परदे बिछाए थे!

"आज नहीं रुकने वाली ये" मैंने कहा,

"लम्बा ही कार्यक्रम है इसका" शर्मा जी बोले,

"हाँ" मैंने कहा,

मैं फिर वापिस आ बैठा चारपाई पर!

"आज तो लग्गी लगी है जी मेह की" बिरजू ने कहा,

"हाँ, आ तो ज़िद पर अड़ी है!" मैंने कहा,

तभी एक व्यक्ति अंदर आया, बिरजू ने उसको चाचा कह कर अंदर बिठाया, उम्र होगी कोई सत्तर बरस! उसने नमस्कार की हमसे तो हमने भी की!

"मैं कुछ बताऊँ?" उसने कहा,

"बताओ चाचा" मैंने कहा,

"मैं उस बख़त होउंगा कोई पन्द्र बरस का, तब ऐसा ही हुआ था, सांप ही सांप घिर आये थे यहाँ, तब एक बाबा जी आये थे उन्होंने सांत किया था उनको, अब फिर से जाग गए हैं" चाचा ने कहा,

काम की बात!

"कुछ बताया था बाबा जी ने?" मैंने पूछा,

"नहीं जी, खेत में गुड़ की इक्कीस भेलियां गड़वायीं थीं उन्होंने" चाचा बोले,

भेलियां? गुड़ की?

सांप की हत्या??

कोई श्राप?

रहस्य की माला अब फंदा बनी!
 
झड़ी लगी थी बाहर, अंदर झड़ी रहस्य की तैयार थी!

"तो बाबा ने कुछ नहीं बताया?" मैंने बुज़ुर्ग से पूछा,

"नाह!" वे बोले,

"सांप फिर नहीं दिखाई दिए?" मैंने पूछा,

"नाह जी" वे बोले,

"चाचा? आपको क्या लगता है, ऐसा क्यों होता है?" मैंने पूछा,

"सुनी सुनाई बातें हैं जी" वे बोले,

"बताओ, हमे भी सुनाओ?" मैंने कहा,

"कहते है कई सौ साल पहले यहाँ एक औरत नाग देवता की पूजा करती थी, उसका पति बीमार रहता था, नाग देवता से उसने संतान मांगी, अब संतान भाग्य में थी नहीं, सो नाग देवता ने ऐसा काम किया कि......" कहते कहते खांसने लगे,

रोमांच! रोम रोम खड़ा हो गया!

"हाँ चाचा फिर?" मैंने पूछा,

"नाग देवता ने ऐसा किया कि एक नाग वहाँ छोड़ दिया उनकी संतान बना कर, रात में नाग होता और दिन में बालक" वे बोले और गला साफ़ करने लगे,

मेरा तो एक एक रोंगटा खड़ा हो गया बाबा की सुनी सुनाई बात सुनकर!

"फिर?" मैंने पूछा,

"समय गुजरा, लड़का बड़ा हुआ, एक नाग कन्या रीझि उस पर, अपने साथ चलने को कहा, लड़के ने मना कर दिया, वो अपने बूढ़े माँ-बाप को छोड़ने को तैयार नहीं था" वे बोले,

"वाह" मैंने उस अनजान नाग-पुरुष को नमन किया!

"वो कन्या रोज आती रात को और सुबह चली जाती, ये भनक लगी सोनिला सपेरे बाबा को" वे बोले और रुके,

"फिर?" दिल धड़का और मैंने कहा,

"फिर क्या, सपेरे बाबा ने जाल बुना, लड़का फंस गया, पकड़ा गया बाबा द्वारा, बूढ़े माँ-बाप रो रो कर मर गए, वो कन्या पूछते पूछते हार गयी" वे बोले,

"ओह"

मैंने तो जैसे कल्पना कर ली थी सारे दृश्य कि, लेकिन इस सपेरे बाबा सोनिला ने धुंए के मानिंद सारा घरौंदा उड़ा दिया!

"फिर?" मैंने पूछा,

"कहते हैं यहाँ वही कन्या अपने साथियों के साथ उसी लड़के को ढूंढने आती है, और अब आ गयी है" वे बोले,

अगर ये किवदंती भी है, तो भी इसमें सच्चाई होगी! क्योंकि आधार हमेशा होता है! दस प्रतिशत भी सच्चाई थी तो भी ये घटनाक्रम भयानक था! तथ्य जुटाने थे! ताकि सच्चाई सामने आ सके!

"ये बारिश!" मैंने मन में कहा,

बारिश ने बाँध रखा था मुझे!

हिलोरें! हिलोरें! ऊंची ऊंची! हिलोरे सर उठा रही थीं!

पर क्या करता!

क्या होता!

बारिश! ये बारिश!

चाचा ने और पेंच घुसा जोड़ और कड़े कर दिए थे!

चाचा उठे!

सनसनी फैलायी!

और चले गए!

"शर्मा जी?" मैंने कहा,

वो अवाक!

शायद उनकी कल्पना का घरौंदा अभी सुरक्षित था!

"शर्मा जी?" मैंने फिर से कहा,

"अ...हाँ?" वे आये कल्पना से बाहर!

"कहाँ खोये हुए हो?" मैंने पूछा,

"वहीँ, नाग पुरुष में" वे बोले,

"अच्छा?" मैंने कहा,

"हाँ, चाचा ने तो रोम रोम पुलकित कर दिया और रहस्य का घड़ा भर दिया!" वे बोले,

सच ही कहा था उन्होंने!

इसमें झूठ क्या!

"सही कहा आपने" मैंने कहा,

"क्या लगता है आपको?" उन्होंने पूछा,

"राज! कोई राज है दफ़न!" मैंने कहा,

"यक़ीनन" वे बोले,

राज तो था ही!

एक अनजान राज!
 
और जैसा शुबहा था वही हुआ, बारिश आखिर नहीं बंद हुई! मन मसोसते हुए बस प्रार्थना करते रहे कि बारिश बंद हो तो हम आगे बढ़ें!

उस दिन अनवरत बारिश हुई, रात को खाना खा कर बस सो लिए, अब जागने से कोई फायदा नहीं था!

सो गए!

अगली सुबह उठे!

हर्षोउल्लास!

बारिश बंद और सूर्य को वापिस सत्ता मिली! नभ पर चल पड़े!

हाथ जोड़ लिए उनके तभी!

नहाये-धोये, जल्दी जल्दी चाय-नाश्ता किया और केवल और बिरजू के साथ चल दिए खेतों की ओर! कुलांचे भरते जैसे हिरन का बच्चा कुलांचे भरता है!

खेत में पहुंचे!

मिटटी अभी गीली थी, लेकिन सही था, चला जा सकता था घास वाली पगडण्डी पर! चल पड़े, और फिर बिरजू के खेत आ गए!

"या हैं खेत हमारे गुरु जी" बिरजू ने कहा,

"अच्छा!" मैंने कहा,

खेतों का क्षेत्रफल बहुत था!

"यही होता है, मेरा मतलब यहीं दिखायी देते हैं वे?" मैंने पूछा,

"जी वहाँ पेड़ों के पास" वे बोले,

"तो वहीँ चलो" मैंने कहा,

अब वो ठिठके!

मैं समझ गया! उनको वही रहने दिया खड़े!

"शर्मा जी आइये आप मेरे साथ" मैंने कहा,

वे आ गए,

"चलो" मैंने कहा,

"चलिए" वे बोले और चले मेरे पीछे,

हमने एक पगडण्डी पकड़ी, और बचते बचाते चल पड़े, वहाँ कुछ नीम के पेड़ खड़े थे, एक आद शीशम भी था, कुछ श्वेतार्क भी लगे थे!

"गुरु जी, वो देखिये!" शर्मा जी ने रुकते हुए कहा और एक ओर इशारा किया,

मैंने वहीँ देखा,

वहाँ करीब पंद्रह सांप बैठे थे फ़न फैलाये, एक वृत्त सा बना कर!

"हाँ, दिख गए" मैंने कहा,

नीचे भूमि देखी तो वहाँ सांपो के निशान, रेंगने के!

"तो ये सच कहते हैं!" मैंने कहा,

"हाँ" शर्मा जी भी बोले,

"चलिए, इनके पास चलते हैं" मैंने कहा,

"चलिए" मैंने कहा,

हम वहाँ से एक दूसरी पगडण्डी पर चल दिया, सांप वहाँ से करीब छह फीट दूर ही रहे होंगे,

अब मैंने सर्प-मोहिनी विद्या को जागृत किया!

कस्तूरी की सुगंध फ़ैल गयी!

मिट्टी गीली थी वहाँ, लेकिन वहाँ एक बिजली का ट्रांसफार्मर लगा था, वहाँ स्थान पक्का था, वहीँ चले हम!

वहाँ पहुंचे!

सभी सांप हमारी तरफ घूमे!

ये सभी फ़नधर थे! विषैले! काटे तो पानी न मांगे आदमी!

"आइये शर्मा जी" मैंने कहा,

"चलिए" वे बोले.

अब हम आ गए एक पक्की ज़मीन पर!

अब मैंने यहाँ कलुष-मंत्र चलाया! अपने एवं शर्मा जी के नेत्र पोषित किये मैंने! और jab आँखें खोलीं तो दृश्य बड़ा ही भयावह था सामने!

एक छोटा सा मंदिर!

उसमे प्रज्ज्वलित एक अष्टमुखी दिया!

ऊपर नाग कढ़े हुए!

और हर तरफ रक्त ही रक्त!

जैसे नरसंहार हुआ हो वहाँ!

बड़ा ही दुर्गन्धमय स्थान था वो!

लेकिन कोई कटा-फटा शव नहीं था वहाँ, कोई भी नहीं! एक पशु भी नहीं!

"ये क्या है?"

"पता नहीं" मैंने कहा,

कुछ पल हम भी भटके रहे वहाँ!
 
बड़ी अजब गजब सी जगह थी! मंदिर भी ज़यादा बड़ा नहीं होगा, बस यही कोई सवा हाथ का, ज़यादा ऊंचा भी नहीं, बस कोई तीन-चार फीट, ये किसी सर्प को समर्पित था ये निश्चित था, लेकिन कौन? ये पता नहीं था! और यही पता लगाने हम यहीं थे! अब मुसीबत ये थी कि कलुष-मंत्र की एक हद है और अपनी हद वो दिखा चुका था, वहाँ जो भी था वो दिख रहा था, अब मुझे और अधिक जानने के लिए वहाँ तक जाना ज़रूरी था, वहाँ सर्प थे, कोई मायावी नहीं बल्कि असली!

"क्या करें?" मैंने शर्मा जी से पूछा,

"पता तो लगाना ही होगा" वे बोले,

"ठीक है, चलें अंदर?" मैंने कहा,

"चलिए" वे बोले,

अब साहब, हमने अपने जूते उतार,

जुराब उतार उनमे खोंसे,

पैंट ऊपर तक मोडीं, और तैयार हुए,

नीचे जाने को.

मैंने कलुष मंत्र वापिस किया और फिर,

फिर पूर्वाक्ष-मंत्र का जाप किया, ये कलुष से अधिक शक्तिशाली होता है! इस मंत्र से अपने व शर्मा जी के नेत्र पोषित किये नेत्र खोले, भयानक मिर्चों जैसी पीड़ा के साथ नेत्र खुले, और दृश्य स्पष्ट हुआ!

वहाँ कोई शक्ति मौजूद थी! कोई बड़ी शक्ति! मुझे गंध आयी, तीक्ष्ण सर्पगंध!

"कौन है यहाँ?" मैंने पूछा,

एक भयानक फुफकार!

सच कहता हूँ, कोई और हो तो प्राण एड़ी में आ जाएँ उसको सुनकर!

"कौन है, सामने आओ?" मैंने कहा,

फिर से गरज भरी फुफकार!

और इस बार कुछ विष-बूँद हम पर भी गिरी, महीन फुहार के रूप में!

लेकिन आया कोई नहीं!

अब हम उतर गए नीचे, नीचे उतारते ही टखनों तक कीचड़ में डूब गए, आराम आराम से उस मंदिर की ओर गए,

तभी एक और ज़बरदस्त फुफकार! जैसे कोई रोकना चाहता हो हमको!

अब मैंने सर्प-मोचिनी विद्या का जाप किया और महाताम-विद्या जागृत कर ली! आगे बढे!

मई मंदिर तक आगे आया, मंदिर जहां बना था वहाँ उस स्थान से पहले एक बड़ी सी नाली दिखायी दे रही थी, जो दूर से नहीं दिखती थी, मैंने और शर्मा जी ने उसमे नीचे देखा, देखते ही रोंगटे खड़े हो गए!

वहाँ कटे हुए नरमुंड पड़े थे! असंख्य नरमुंड! कटे हाथ-पाँव! भयानक दृश्य! और वहाँ उस नाली में भयंकर सांप! काले, मटमैले, भूरे, दुरंगे आदि! सब के सब मृत्यु के परकाले! सभी यमराज से अधिकृत! प्राण लेने को अधिकृत!

"ये क्या है?" शर्मा जी ने पूछा,

"सम्भवतः कोई बलि-स्थान लगता है" मैंने कहा,

"है तो कुछ ऐसा ही" वे बोले,

"आइए, पीछे चलते हैं इसके" मैंने कहा,

"ठीक" वे बोले,

हम उस नाली के साथ चलते चलते मंदिर के पीछे जाने लगे,

तभी!

फिर से फुफकार!

भयानक भुजंग फुफकार!

मैं आज़िज़ आ गया था! ये तो मेरे लिए चुनौती थी!

मैंने तभी यूपभंग-मंत्र पढ़ा और थूक दिया!

और थूकते ही!

थूकते ही, एक काला सा बादल हमारे ऊपर आया, जैसे बदली कोई! ये एक दीर्घाकार महासर्प था, वो सामने गिरा हमारे!

एक बार को तो मैं भी घबरा गया!

यूपभंग-अधिष्ठात्री ने उठा के उसको फेंक मारा था हमारे समक्ष!

इस से पहले मुझे कुछ समझ आता वो महासर्प लोप हो गया!

सिहरन!

सिहरन सर से लेकर पाँव तक!

जैसे खड़े खड़े ही ज्वर चढ़ गया हो!

मैं आगे बढ़ा, शर्मा जी के साथ!

फिर अचानक से रुका!

सामने कोई अस्सी फीट पर कुछ कन्याएं खड़ी दिखीं! चेहरे किसी के नहीं दिख रहे थे, बस काले वस्त्र! उनके आसपास सर्प ही सर्प!

भयानक दृश्य!

"ये कोई महामाया है गुरु जी!" शर्मा जी थूक निगलते हुए बोले,

"निःसंदेह!" मैंने कहा,

हम ठिठक के वहीँ ठहर गए!

तभी कन्याएं पीछे हट पड़ीं! जैसे हमारे पीछे कोई आ रहा हो! मैंने पीछे देखा, वहाँ कोई नहीं! कोई भी नहीं!

सामने देखा!

सारी कन्याएं लोप!

रेंगते सर्प भी लोप!

"शर्मा जी, ऐसे ही खड़े रहिये" मैंने चेताया उनको,

वे खड़े हो गए, स्थिर!

और मैं भी!
 
वे और मैं ठिठक के खड़े थे, जस के तस! यहाँ कोई महाशक्ति थी ये तय था, वो दीर्घाकार सर्प इसका प्रमाण था! वहाँ जैसे शून्य का ही राज हो, कोई ध्वनि नहीं, किसी भी प्रकार की, बस जो कुछ हमें सुनायी पड़ रहा था वो थी हमारी श्वास-ध्वनि और ह्रदय-स्पंदन!

"गुरु जी?" शर्मा जी ने पूछा,

"हाँ?" मैंने उत्तर दिया,

"ये माया है?" उन्होंने पूछा,

"नहीं" मैंने उत्तर दिया,

"तो ये सब?" उन्होंने कहा,

"वास्तविक" मैंने कहा,

"कैसे सम्भव है?'' उन्होंने पूछा,

"कोई कुछ कहना चाहता है" मैंने कहा,

और तभी जैसे धरती हिली, मैं और शर्मा जी धम्म से नीचे गिर पड़े!

हम गिरे नहीं थे!

नहीं!

हमे गिराया गया था!

लेकिन किसने?

ये था प्रश्न!

अब ये तो साबित था, वहाँ कुछ ऐसा था जो मेरे बस में नहीं था!

कोई दैविक?

अथवा

कोई आसुरिक?

था तो अवश्य ही!

हम बड़ी मुश्किल से कहे दे, कीचड़ में लथपथ हो गए, सर तक कीचड़-काचड़ में सन गए!

मैंने मंत्र वापिस लिए और अब चले वापिस!

हौदी तक पहुंचे, साफ़ सफाई की, और किसी तरह से वापिस आये, रुमाल से साफ़ किया और फिर जूते-ज़ुराब पहन वापिस आये!

मौसम साफ़ था!

हम आये तो केवल और बिरजू बड़ी बेचैनी से हमारा इंतज़ार करते मिले,

"कुछ हाथ आया गुरु जी?" केवल ने पूछा,

"नहीं" मैंने कहा,

"ओह" बिरजू ने कहा,

अब हम वापिस हुआ, बातें करते करते!

घर पहुंचे तो नहाये धोये, बारिश थमी हुई थी, कोई बादल भी नहीं थे आकाश में, सो उस से निश्चिन्त थे हम!

अब कमरे में रह गए मैं और शर्मा जी!

"क्या माया है वो गुरु जी?" उन्होंने पूछा,

"मुझे भी नहीं मालूम, लगता है जैसे किसी किताब को बीच में से शुरू कर दिया है हमने" मैंने कहा,

और बात भी तो यही थी!

न जाने कितना समय बीता था, कौन से खंड में हम जा पहुंचे थे!

और वो!

वी दीर्घ सर्प!

वो क्या कहना चाहता था?

ऐसे बहुत से सवाल थे और देखिये, उत्तर किसी का न था मेरे पास!

अब क्या हो?

अब को रेख लगानी थी!

आपने देख-रेख शब्द तो सुना होगा, अवश्य ही, देख तो आप जानते ही हैं, रेख जानते हैं? यदि हाँ तो अवश्य ही बताएं! मैं फिर बता दूंगा!

मैंने अब रेख का उपाय निकाला!

क्या हो सकता है?

बहुत सोचा!

कर्ण-पिशाचिनी?

नहीं!

वाचाल?

नहीं!

केतकी?

नहीं!

खबीस?

नहीं नहीं!

फिर?

बहुत सोचा!

हल निकला उसका फिर! हल था एक क्रिया, क्रिया जिस से क्या हुआ था पता चल जाएगा! वो नहीं जैसा आप सोच रहे हैं, ऐसा जो मैंने जानना चाहा!

आखिर ये मसला है क्या?

नाग पुरुष?

नाग-कन्या?

वे वृद्ध दंपत्ति?

अथवा

वो बाबा सोनिला सपेरा?

एक सपेरे का बाहुत्रास?

हम्म्म!

स्थिति विकट है! दिमाग फट रहा है! दिख रहा है लेकिन समझ नहीं आ रहा!

तभी अंदर प्रवेश किया बिरजू ने, दूध लाये थे वे, साथ में परांठे!

"अरे बिरजू जी?" मैंने टोका,

"हाँ जी?" वे चौंके,

"आपके यहाँ सिवाने कहाँ हैं?" मैंने पूछा,

"कोई किलोमीटर पर होंगे" वे बोले,

"आज जाना है वहाँ" मैंने कहा,

"मैं ले चलूँगा जी" वे बोले,

और बात तय हो गयी! हम दूध के साथ परांठे खाने लगे, आलू के परांठे, विशेष रूप से बनते थे और वाक़ई में बड़े ही अच्छे बने थे!
 
दोपहर बीती,

शाम हुई!

मैंने कुछ वस्तुएं टटोलीं और एक छोटे बैग में भर लीं! और फिर हुई रात, गहन हुई थोड़ी और हम चले अब सिवानों की ओर! मार्ग में अँधेरा, हाँ बारिश नहीं हो रही थी, ये एक अच्छी खरा थी हमारे लिए, अजी खबर क्या यूँ कहो कि सोने पर सुहागा! मार्ग में अँधेरा और उजारे की तलाश में भटकते कीट-पतंगे! कभी मुंह से टकराते, कभी सर से टकराते, कभी कभार चेहरे पर पनाह ले लेते थे! ये टॉर्च की रौशनी के कारण था! रास्ते के पेड़ गवाह बने खड़े थे कि अब रात है और हम तीन अकेले हैं इस मार्ग पर! शर्मा जी, मैं और बिरजू!

बचते बचाते हम पहुंचे किसी तरह सिवाने, वहाँ दो चिताएं जल रही थीं, अब अँधा कहा चाहे! दो आँखें!

मैंने शर्मा जी और बिरजू को पास के ही एक मंदिर में बिठवा दिया, जूते उतारे और खुद नंगे पाँव चल पड़ा चिताओं की ओर, दोनों चिताओं का मुआयना किया, एक स्त्री की थी, उसको छोड़ दिया, दोस्री किसी पुरुष की थी, उसके गर्दन की हड्डी टूट कर बाहर आयी हुई थी, यही उचित था, मैंने आसन लगाया और एक दिया जलाया उस चिता की अग्नि से!

और अब शुरू कुआ क्रिया-कलाप!

आधे घंटे में ही मेरी नेत्राम-देख चालू हो गयी और सारी तस्वीर दिमाग में घूमती चली गयी!

बड़ी ही ह्रदय-विदारक कहानी थी वहाँ की!

ओह!

ऐसा क्यों होता है?

क्यों?

और?

क्यों किया?

क्यों किया उसने?

क्या मिला उसको?

बतायेगा!

बतायेगा! अवश्य ही बतायेगा! क्यों किया उसने ऐसा!

कौन बतायेगा?

बाबा सोनिला!

हाँ!

वो सपेरा तो नहीं था लेकिन था बेहद कुशल तांत्रिक! सर्प-विद्या में निपुण! सिद्धहस्त! बाबा सोनिला!

आयु अधिक नहीं थी उसकी, यही कोई चालीस बरस रही होगी, अपने गुरु के आशीर्वाद से बहुत उच्च शिखर पर पहुँच गया था!

वही था इस कहानी का असली नायक और खलनायक!

अब मैं उठा वहाँ से! सामान-सट्टा उठाया और बैग में डाला! और चल पड़ा वापिस उसी मंदिर की ओर, जहां शर्मा जी और बिरजू बैठे थे, वहाँ एक बर्मा(हैंडपंप) लगा था, हाथ-मुंह और सर-पाँव धोये मैंने पानी भी पिया और फिर शर्मा जी के पास आ गया!

"कुछ हाथ आया?" शर्मा जी ने पूछा,

"हाँ" मैंने ख़ुशी से कहा,

उनका उत्साह भी बढ़ गया!

"क्या?'' उन्होंने पूछा,

"बाद में बताऊंगा" मैंने कहा,

"ठीक है" वे बोले,

अब हम उठे और चले वापिस,

"बिरजू?" मैंने कहा,

"क्या आपके खेत में कोई बीजक वगैरह है?" मैंने पूछा,

"पता नहीं, हाँ कुछ पत्थर तो हैं वहाँ, वो हमने आजतक नहीं हटाये" बोले बिरजू,

"अच्छा!" मैंने कहा,

"हाँ जी, आप चाहें तो कल देख लें" वे बोले,

"ठीक है" मैंने कहा,

और इस तरह बातचीत करते हुए हम लौट आये, बिरजू के घर!

अब कल सुबह ही करना था सब!
 
और फिर हुई सुबह!

नहाये-धोये! चाय नाश्ता किया! और थोडा सा घूमने के लिए अहाते में बाहर आये, काफी लम्बा-चौड़ा स्थान था वो, गाय-भैंस रम्भा रही थीं, कुछ कटरे आव-ताव में भाग रहे थे इधर-उधर!

"शर्मा जी, आज चलते हैं वहाँ, अभी" मैंने कहा,

"हाँ जी" वे बोले,

"ज़रा सामान ले चलना, वो पीली सरसों तो ज़रूर" मैंने कहा,

"जी" वे बोले,

और तभी बिरजू आ गए,

"चलें क्या गुरु जी?" उन्होंने पूछा,

"हाँ चलिए" मैंने कहा,

शर्मा जी ने बड़े बैग से एक छोटा झोला निकाल लिया! इसमें पीली अभिमन्त्रिति सरसों थी, इस से अभिमन्त्रण और कीलन लगाया और उठाया जाता है, मैंने ही कहा था क्योंकि इसकी आवश्यकता थी आज!

हम चल पड़े वहीँ खेतों की तरफ!

और पहुँच गए,

बिरजू अपनी कोटरी में ही रुक गए, उनको हमारे साथ चलने से डर लग रहा था, सो वहीँ बाहर चारपाई बिछा कर बैठ गए! उन्होंने जहां वो पुराने पत्थर गढ़े थे वो जगह बता दी, वहाँ से थोड़ी दूर थी, लेकिन थी पहुँच में ही,

"आइये शर्मा जी" मैंने कहा,

"चलिए" वे बोले,

और हम चल पड़े,

उन पत्थरों तक पहुंचे,

आड़े-तिरछे पुराने पत्थर, आधे भूमि में गढ़े हुए, लेकिन कोई भी बीजक नहीं था उनमे से!

"ये तो बड़े पुराने लगते हैं" शर्मा जी ने कहा,

"हाँ, लग तो रहा है" मैंने कहा,

मैंने मुआयना किया, कुछ ख़ास नहीं वहाँ!

"लाइए, सरसों दीजिये" मैंने कहा,

उन्होंने सरसों का झोला पकड़ाया,

मैंने खोला और एक मुट्ठी सरसों मैंने वहाँ जैसे ही डाली, लगा कोई रीछ सा वहाँ छुपा था जो भाग के निकला, हम दोनों एक दूसरे के ऊपर गिर पड़े!

कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ!

"कौन है यहाँ?" मैंने कहा,

"भाग जा" तभी एक फुसफुसाहट सी आयी!

मेरे और शर्मा जी के हुआ अब कान खड़े, हम थोडा पीछे हटे!

"मेरे सामने आओ?" मैंने कहा,

कोई नहीं आया, बस हवा का एक झोंका उठा और हमारे गिरेबान हमारा ही गला दबाने लगे!

"सामने आओ, सम्मुख बात करो?" मैंने कहा,

मैंने कहा और हमे किसी ने धक्का दिया पीछे से! हम आगे झुक गए!

मामला गम्भीर है! यही सोचा मैंने!

अब मैंने औंधी-खोपड़ी का प्राण-रक्षण मंत्र पढ़ा और शर्मा जी को भी मैंने उस से पोषित कर दिया!

"आ मेरे सामने?" मैंने कहा,

कोई नहीं आया!

मैंने फिर से सरसों अभिमंत्रित कर वहाँ फेंकी!

और फेंकते ही पत्थरों में आग भड़क उठी! इतनी तेज कि हमे पीछे हटना पड़ा!

मैंने काकूश-मंत्र पढ़ कर अग्नि बुझाई!

ये तो युद्ध सा हो रहा था!

"खेल मत खिला, सामने आ, नहीं तो ज़मीन में से ही खींच लूँगातुझे!" अब दी मैंने धमकी!

धमकी क्या दी मैंने, मुसीबत मोल ले ली!

वहाँ गड्ढा हुआ एक! गहरा गड्ढा और उसमे से निकले सर्प! सफ़ेद सर्प! मैंने तुरंत ही सर्प-विनाशिनी विद्या का जाप कर लिए! अब कोई अहित नहीं हो सकता था!

तभी!

तभी मेरे दिमाग में एक बात कौंधी!

श्वेत सर्प??

ये क्या??

ये तो दैविक सर्प है अथवा कोई यक्षाभूषण??

मैं चकराया!

सच कहता हूँ, दिमाग शिथिल हो गया!
 
और जब दिमाग शिथिल होता है तो पास, दूर और दूर पास दिखायी देता है, अर्थात जो दीखता है वो होता नहीं और जो नहीं होता वो दीखता है! यही हो रहा था वहाँ! मैंने फिर भी हिम्मत बटोरी और, और एक मुट्ठी सरसों फेंक के दे मारी!

अचम्भा!

सभी सर्प गायब!

रह गया केवल एक!

सफ़ेद रंग का फनधर!

मैंने गौर किया! ग्रीवा-चिन्ह छोटा था, अर्थात ये मादा थी!

अब तो हथौड़ा सा बजा मेरे सर पर!

एक से एक!

उसने फुफकार मारी! हम पीछे हटे! वो गुस्से में थी! भयानक गुस्से में! हालांकि हमने सर्प-विनाशिनी विद्या पोषित कर राखी थी, लेकिन सर्प-दन्त भी बहुत पीड़ा देते हैं!

उसने गुस्से से आगे आकर फिर फुफकार मारी!

"शांत!" मैंने कहा,

उसने कुंडली संकेरी!

"शांत! मैं आपका अहित करने नहीं आया, न ही पकड़ने!" मैंने कहा,

उसने फिर से आगे आकर फुफकार मारी!

"शांत!" मैंने अब हाथ जोड़ कर कहा!

मैं आगे बढ़ा!

वो पीछे हटी!

कुंडली खोलते हुए!

अब मैंने नेत्राम-देख चालू की!

नेत्र खोले तो मैं घबराया!

ये तो एक नाग-कन्या है!

लेकिन यहाँ कैसे??

अब फिर से वज्रपात हुआ!

अब कैसे वार्तालाप करूँ?

ये तो क्रोधित है, फिर?

क़ैद कर लूँ?

हाँ!

यही ठीक है!

दिमाग उलझ गया!

नहीं!

नहीं!

ये तो शायद वैसे ही क़ैद है!

मैं हट गया वहाँ से, शर्मा जी को समझ नहीं आया कुछ भी! मेरे साथ ही चल दिए!

मैं ठहरा, शर्मा जी को वहीँ रोका!

वापिस गया!

मुझे आया देख फिर से क्रोधित हो गयी वो!

फुफकार पर फुफकार!

"शांत!" मैंने कहा,

"चले जाओ!" एक मर्दाना आवाज़ गूंजी!

शर्तिया ये इस नाग-कन्या की तो नहीं है?

कौन है जो नेत्राम-पाश में भी नहीं है?

ऐसा कौन?

भय हुआ!

सिहरन हुई एकदम!

बदन पर चींटियाँ रेंग गयीं!

"कौन है?" मैंने कहा,

कोई नहीं वहाँ!

मैंने आकाश, आयें-दाए,बाएं देखा कोई नहीं!

"मेरे समक्ष आइये" मैंने कहा,

कोई नहीं आया!

और तब! तब! मुझ पर बारिश हो गयी कौड़ियों की! काली और पीली कौड़ियों की! मैं हटा वहाँ से! और बारिश बंद!

अब तो प्रश्नों का टोकरा बहुत भारी हो चला! एक भी जवाब नहीं मिला! बस इतना यहाँ कोई भूत-प्रेत नहीं है! है कोई परम सिद्ध!

कौन?

लेकिन कौन?
 
"कौन है यहाँ? मैं जानना चाहता हूँ" मैंने कहा,

सर्प की फुफकार!

हालांकि वो सर्प रूप में ही थी, लेकिन थी एक नाग-कन्या! मैं पहचान गया था नेत्राम विद्या की जांच से!

"कौन है?" मैंने विनम्रता से पूछा,

कोई नहीं आया, और वो वहाँ क्रोध के मारे बस फटने ही वाली थी!

अब मैंने महातमस विद्या जागृत की और प्रत्यक्ष-शूल भिड़ा दिया!

धड़ाम!

आवाज़ हुई!

लेकिन कोई नहीं गिरा!

मैंने सामने देखा!

मुझसे करीब पंद्रह फीट दूर, भूमि में एक गड्ढा था और उसमे कमर तक कोई बाहर निकला हुआ था, अर्थात उसकी कमर से नीचे का भाग भूमि में था, गड्ढे में!

बड़ा ही भयावह दृश्य था!

और हाँ,

उस धड़ाम की आवाज़ के साथ ही वो सर्प-कन्या भी लोप हो गयी थी! अब कोई गड्ढा भी नहीं था वहाँ!

दिमाग चलाया!

ये कौन है?

हाँ!

समझ गया!

मैं वहीँ उसकी तरफ चला!

"रुक जा" उसने मुझे मना किया, अपने सर्प-दंड से मना किया आगे आने को!

मैं रुक गया! यूँ कहो चिपक गया वहीँ!

"कौन हो आप?" मैंने पूछा,

उसका शरीर किसी वज्र की भांति था! गले में पत्थरों की सी माला पहने, कौन सा पत्थर, ये नहीं मालूम पड़ा! नीचे उसके लुंगी पहनी थी या धोती, ये भी पता नहीं चला, उसका जी हिस्सा मुझे दिखायी दे रहा था, वही छह फीट का रहा होगा, कम तो क़तई नहीं!

कोई उत्तर नहीं!

वो चुप था!

"कौन हैं आप?" मैंने फिर पूछा,

कोई उत्तर नहीं!

वो मुझे देख रहा था एकटक! गुस्से में! लाल रंग के नेत्र किये हुए! हाथ में एक बड़ा सा सर्प-दंड लिए!

"बताइये?" मैंने फिर कहा,

उसने जैसे अनसुनी की!

मैं आगे बढ़ा कोई दो फीट!

"रुक जा वहीँ" उसने फिर से कहा,

मैं फिर से रुक गया!

"कौन है आप?" मैंने पूछा,

"मैं सोनिला हूँ, सपेर बाबा" उसने उत्तर दिया अब!

"यहाँ क्या हो रहा है बाबा?" मैंने पूछा,

"वापिस चला जा" उसने धमका के कहा,

"मैं नहीं जाऊँगा" मैंने कहा,

"जा???" उसने फिर से गुस्से से कहा,

"नहीं" मैंने कहा

शान्ति!

कुछ पल की शान्ति,

एक दूसरे को तोलते हुए हम!

और!

मेरी शान्ति भंग हुई!

भंग हुई शान्ति!

मेरे होठों पर पड़ती और नाक से बहती रक्त-धारा से!

टप! टप!

ऐसे बहे रक्त!

मैंने तुरंत ही जंभाल-मंत्र पढ़ा और रक्त बंद!

फिर मुझे छींक आयीं!

और मेरे सामने ही वो भूमि में समा गया!

गड्ढा फिर से बंद!
 
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