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जीवन का सुख

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जीवन का सुख

माला सुबह उठने ही वाली थी, की उसको अपने बेटी और दामाद के कमरे से दबी हुई आवाजें सुनाई दी। हल्की सिसकियों, हंसी, चुम्बन लेने और लयबद्ध तरह से बिस्तर के चरमराने की आवाजें। माला समझ गयी की अन्दर क्या चल रहा है। लेकिन उसको यह सोच के अचरज हुआ की दोनों इस रात कम से कम तीसरी बार काम-क्रीडा कर रहे थे।

उसने अपने पूरे जीवन में एक पूरे दिन में दो बार से ज्यादा कभी सम्भोग नहीं किया था, और वह था उसके हनीमून के दौरान। उसके बालपन के दिनों में सम्भोग को लेकर इतनी वर्जनाये थी की विवाह के बहुत दिनों बाद भी माला यौन-क्रिया को सिर्फ संतानोत्पत्ति हेतु एक आवश्यक कार्य समझती रही। लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी विचारधारा में थोडा थोडा अंतर आने लग गया था। सम्भवतः नए शहर में नए दोस्तों के साथ ने कुछ उपकार कर दिया था। लेकिन बढ़ती उम्र और पति की व्यस्तता के चलते यौन-क्रिया के संभावित "मजे" की वो सिर्फ कल्पना ही कर सकती थी।

शिष्टता और संकोच के मारे वो अपने बिस्तर पर ही लेटी रही की जब तक वो दोनों शान्त न हो जाएँ। लेकिन उसको अपनी बेटी के लिए ख़ुशी हुई की उसको ऐसा पति मिला, जो उसको इतना आनन्द दे सकता था। लेकिन ऐसा सोचते हुए उसको थोड़ी लज्जा भी आई। फिर उसका ध्यान उस दिन को चला गया जब उसकी बेटी पल्लवी ने बताया की वो रूद्र से शादी करना चाहती है। शादी? अभी 20 की भी तो नहीं हुई थी वो! इतनी जल्दी! और पढाई लिखाई का क्या?

पल्लवी आई आई टी में पढ़ रही थी - तीसरे वर्ष में। रूद्र और पल्लवी दोनों साथ पढ़ते थे और एक दुसरे से बहुत प्रेम करते थे। और रूद्र चाहता था की उसकी विवाहयोग्य 21 की उम्र होते ही वो पल्लवी को अपना बना ले। रूद्र का आई आई टी में चौथा वर्ष चल रहा था और स्नातक होने के बाद वो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बटाना चाहता था। ऐसे रिश्ते को मन करना लगभग असंभव था। "चट मंगनी चट ब्याह" का एक उम्दा उदाहरण थी पल्लवी और रूद्र की शादी।

20-21 की उम्र - शायद तभी इतनी उर्जा है.... ऐसा सोचते ही माला मुस्कुरा उठी। माला ने 24 की उम्र में शादी की थी। उसके पति विराट 27 के थे तब। जैसा की ज्यादातर नव-विवाहितों के साथ होता है, माला विवाह के एक वर्ष में ही माँ बन गयी। उसके बाद बच्चे को पालने और घर सम्हालने की व्यस्तता में यौन क्रिया क्रमशः कम होती गयी।

लेकिन चार महीने पहले बेटी की विदाई के बाद न जाने क्यूँ विराट का मूड बन गया और उन्होंने देर तक रति क्रिया की। बेटी की विदाई का वियोग भूल गयी माला उस दिन। वैसा आनन्द कभी नहीं मिला था उसको। विराट की बाँहों में झूलते हुए उनके कड़े लिंग का अपने अन्दर आने जाने का एहसास... यह सब अभी भी याद था माला को।

बगल के कमरे में चलते सम्भोग, उससे होने वाली आवाजें और "उस" दिन की याद माला के मन पे असर करने लगीं। लिप्सा ने उसको धर दबोचा... काश विराट यहाँ होते! "उस" दिन की याद ने एक सिहरन सी फैला दी। वो बिस्तर से उठ के अपने श्रृंगार-दान के सामने आ कर कड़ी हो गयी और फिर उसने वो किया जो काम उसने कम से कम एक वर्ष में नहीं किया।

उसने अपनी नाइटी उतार दी और चड्ढी भी - और खुद को आदमकद आईने के सामने पूर्ण-नग्न देखा। 45 की उम्र के लिए वो अभी भी अच्छी दिखती थी। उसने अपने स्तनों को हलके से दबाया - वो अभी भी पुष्ट थे। विराट उसके स्तनों का उपभोग नहीं करते थे - बस स्तानाग्रों का हल्का सा मसलना और कभी कभी थोडा सा चूस लेना। इतना ही ध्यान मिलता था माला के स्तनों को। पल्लवी ने भी सिर्फ दो महीने ही उसका दूध पिया था, इसलिए उनके आकार में जो भी परिवर्तन आया था वो सिर्फ उम्र के ढलने से आया था। नए दोस्तों के साथ जिम जाकर व्यायाम करने से शरीर की स्थूलता कम हो गयी थी।

अचानक ही उसको यह अहसास हुआ की उसका हाथ उसकी योनि पर जाकर ठहर गया है और उसकी उंगलियाँ वहां से निकलती हुई योनि-रस पर फिसलने लगी। "हे भगवन! ये क्या कर रही हूँ मैं?" उसने अपना हाथ झटके से हटा लिया और जल्दी से जाकर बिस्तर पे लेट गयी। ....नंगी।

मन अशांत हो गया... नहीं, कामातुर।

उसने चुपचाप लेते रहने की कोशिश करी, लेकिन जैसे ही उसका ध्यान अपने काम-रत बेटी और दामाद पर गया, उसका हाथ पुनः उसकी योनि पर जा पंहुचा। इस बार उसने हार मान ली। अपनी आँखें बंद कर उसने अपने भगनासे को सहलाना प्रारंभ कर दिया - मन ही मन में अपने पति का कामोत्तेजित लिंग सोचते हुए। उंगली की गति अनियंत्रित होती जा रही थी और माला के गले से दबी घुटी सिस्कारियां निकल रही थी - साथ ही पूरा शरीर उत्तेजना से कांपने लग गया था।

उसका कामोन्माद जल्दी ही समाप्त हो गया। "ऐसा आनंद तो पहले कभी नहीं आया", उसने सोचा।

"ओह भगवान! यह सब क्या है? सुबह सुबह तो मन साफ रहना चाहिए। और मैं अपने बुढापे में ऐसे काम कर रही हूँ जो कोई औरत नहीं करती।"

उसने अपनी सांसो को संयत किया। बगल के कमरे से आवाजें आनी बंद हो गयी थी। उसने घडी पर नज़र डाली - "हे भगवान! एक घंटा हो गया! समय का पता ही नहीं चला।"

"अब बाहर निकलना चाहिए - शायद बच्चे सो गए होंगे।"

माला ने जल्दी से अपनी नाइटी पहनी और बहुत धीरे से अपना दरवाज़ा खोलकर दबे पाँव बाहर निकल आई।

पल्लवी का कमरा माला के कमरे से बाहर निकलने के साथ ही था। "अरे! इनके कमरे का तो दरवाज़ा खुला हुआ है!" माला दरवाज़ा बंद करने को आगे बढ़ी, लेकिन अन्दर का नज़ारा देख के उसकी आँखे फटी की फटी रह गयीं।

पल्लवी और रूद्र पूर्णतः नग्न अवस्था में आलिंगनबद्ध होकर सो रहे थे - उस मुद्रा में जिसमे वो शायद रति-क्रिया के बाद आराम करते हुए सो गए होंगे। रूद्र थोडा नीचे था और पल्लवी की तरफ करवट करके लेता हुआ था। उसका बायाँ पाँव पल्लवी के ऊपर था, और इस कारण उसका लिंग स्पष्ट दिख रहा था।

शिश्नग्रछ्छद के पीछे खिसक जाने के कारण लिंग के आगे का गुलाबी हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था। लिंग अभी मुरझाया हुआ था, किन्तु फिर भी उसकी लम्बाई सामान्य से अधिक ही प्रतीत हो रही थी। उसके वृषण हलके भूरे रंग के थे - थोड़ी सी लालिमा लिए हुए, और आकर में वो भी बड़े लग रहे थे।

"कितना सुन्दर है..." इस ख्याल से माला थोडा शरमा गयी और शर्म के मारे उसने नज़र हटा ली, लेकिन अब सामने पल्लवी थी।

पल्लवी पीठ के बल लेती हुई थी और उसकी सारी सुन्दरता प्रदर्शित हो रही थी। पल्लवी देखने में माला का ही प्रतिरूप दिखती थी - ठीक वैसे ही जब वो जवान थी। सुन्दर भोला चेहरा, भरे होंट और मादक आँखें। उसका शरीर एकदम फिट था, इसलिए कपडे के ऊपर से देखने पर भी बहुत आकर्षक लगती थी।

स्तन अभी भी छोटे थे और उन पर गहरे लाल-भूरे रंग के आकर्षक स्तनाग्र थे। सुन्दर, स्वस्थ और पतली बाहें... उसका पेट बिलकुल सपाट था। योनि के हिस्से में कोई बाल नहीं थे। "ऐसा कैसे हो सकता है? इस उम्र में मेरे तो काफी बाल हो गए थे।", माला ने सोचा।

पल्लवी के पाँव थोडा खुले हुए थे, जिस कारण उसकी योनि का द्वार थोडा खुल गया था और वहां से अभी अभी संपन्न हुई रति-क्रीडा का रस निकल रहा था। मादक दृश्य!

अब माला उन दोनों को एक साथ देख रही थी - "सुन्दर और आकर्षक जोड़ा। दोनों ही कितना हँसते हैं। जब ये दोनों घर में होते हैं तो आनंद आ जाता है। बच्चों के जैसे झगड़ते हैं - लेकिन उस झगडे में निहित प्रेम मैं खूब जानती हूँ।"

"नंगे होने पर तो ये दोनों और भी सुन्दर लगते हैं - जैसे की ग्रीक सभ्यता वाली मूर्तियाँ! रूद्र भी तो कितना अच्छा है... उतना ही सुन्दर दिखता भी है... कसरती देह... इसका लिंग पूरा उत्तेजित होने पर कैसा दिखता होगा!?" ये ख्याल आते ही माला ने अपना सर झटका, "अपनी ही बेटी के पति के लिए ऐसी सोच?"और धीरे से दरवाज़ा बंद करके बाहर आ गयी।

माला सीधा ड्राइंग रूम में पहुची, और अपने आप को संयत करने के लिए "संस्कार" चैनल लगा कर भजन सुनने लगी। कुछ देर भजन सुनने के बाद उसका मन थोडा शान्त हुआ तो चाय बनाने के लिए रसोई में आ गई। अभी उसने चाय का बर्तन गैस पर रखा ही था की पल्लवी अपने कमरे से अंगड़ाई लेती हुई बहार आई।

उसने एक छोटा और झीना सा हलके सफ़ेद रंग का टी-शर्ट पहना हुआ था और हलके गुलाबी रंग का छोटा सा निकर। दोनों ही कपड़े उसपर बहुत भा रहे थे, जैसे की वो कोई गुडिया हो। सफ़ेद रंग का झीना कपडा होने से, पल्लवी के शरीर की आकर्षकता थोडा छन छन के आ रही थी - लेकिन फिर भी कोई भी उसके स्तनाग्र आसानी से देख सकता था।

पास आते ही पल्लवी उससे लिपट गई। "माँ, आई लव यू।"

माला मन ही मन मुस्कुराई, "सम्भोग क्रिया के बाद लड़कियां कितना निखर जाती हैं!"

"आई लव यू टू बेटा... चाय पियोगी?"

"हां"...

"माँ, आपसे एक बात पूछूं?"

"बोलो बेटा"

"हमारे रूम का दरवाज़ा आपने बंद किया था न?"

"..."

"बोलिए ना"

"हाँ.. फिर?"

"इसका मतलब आपने हम दोनों को नंगा देखा?" पल्लवी ने बनावटी अवमानना के साथ बोला।

माला हिचकते हुए "हाँ...", फिर संयत होते हुए, "लेकिन तुम लोग तो मेरे बच्चे हो। मेरे सामने नंगे हुए तो क्या हो गया?"

"वैसे एक बात बताऊँ?"

"हाँ माँ"

"तुम दोनों खूब सुन्दर दिखते हो। मेरा मन हुआ की तुम दोनों को बस देखती ही रहूँ। हे भगवान! मेरे दोनों बच्चो को लगता है मेरी ही नज़र लग जाएगी।"

पल्लवी यह सुन कर ख़ुशी में माँ से लिपटते हुए बोली, "माँ, यू आर द बेस्ट" और उसने जोर से माला के होंठों पर चुम्बन दिया।
 
माँ बेटी दोनों में मित्रता वाला रिश्ता भी था। दोनों एक दुसरे से बहुत ही कम बाते छुपाती थीं। माला पल्लवी को शादी होने के बाद अपने बराबरी का समझने लग गयी थी और वैसे ही व्यवहार भी करती थी। लिपटे हुए पल्लवी ने अपनी माँ के पेट और कमर को टटोलते हुए कहा, "माँ, अब आप ये ढीले ढाले कपडे मत पहना करिए। कुछ सेक्सी सा पहना करिए - पापा एकदम हैप्पी हो जायेंगे।"

"चल हट्ट पागल" माला ने प्यार भरी झिडकी दी।

"सच में माँ। मेन वांट दिअर वीमेन टू बी सेक्सी।"

"रूद्र ने तो मुझे सैटिन और लेस वाली कई नाईटीस ला के दी हैं। ट्रांसपेरेंट! मुझे ऐसे कपड़े में देख के वो एकदम एक्साईट हो जाता है।"

"ये टी-शर्ट भी उसी की पसंद है। माँ आप अब वो टेस्ट-लेस सफ़ेद सूती ब्रा भी मत पहना करिए। कुछ सेक्सी सा, जैसे लाल रंग की, नेटेड वाली पहना करिए। अभी तो आप जवान हैं - क्या पता मुझे एक छोटा सा बेबी ब्रदर मिल जाये इस कारण।" पल्लवी ने आँख मारते हुए कहा।

"छी बेशरम। कुछ भी कहती रहती है। इस उम्र में माँ बनूंगी? न बाबा न। मुझको तो तुम एक ही काफी हो।"

"तुम्हारे पापा और मैंने सोचा की हमारी एक ही गुड़िया रहेगी" फिर कुछ सोचते हुए माला ने पूछा, "तुम लोग कंडोम नहीं लगाते?"

पल्लवी ने हँसते हुए बोला, "लगाते हैं माँ। आज था नहीं। लेकिन रूद्र पूरे मूड में था। इसलिए हम लोग रुके नहीं। वैसे बिना कंडोम के पूरा एक्सपीरियंस अलग ही हो जाता है।"

"हाँ और बच्चा भी हो जाता है।"

इस बात पर दोनों खूब हँसे। इसी बीच चाय बन गई और माला ने दोनों के लिए चाय कप में दाल दी। दोनों बाते करती हुई चाय पीने लगी और अपने अपने जीवन की बाते बाँटने लगी।

चाय पीने के बाद पल्लवी अपनी माँ की गोद में सर रख के लेट गयी, और दोनों ही पल्लवी के बचपन की बाते करने लगी। माला ने उसको बताया की जब वो गर्भवती हुई, तो उसका मन था की उसे लड़की हो, जिसे पाल पोस कर वो एक अच्छा इंसान बनाएगी।

माला अपनी बेटी के पालन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती थी, और उसने जहाँ तक संभव था ये कर भी दिखाया था। लेकिन उसको इस बात का मलाल था की पल्लवी सिर्फ 2 महीने ही उसका दूध पी सकी थी। इस बात ने माला की ममता को बहुत ठेस पहुचाई हुई थी, जिसका असर अभी तक नहीं ख़तम हुआ था।

"पल्लवी, तुम जानती हो की तुमने सिर्फ 2 महीने मेरा दूध पिया था? मेरा मन था की मेरी बेटी कम से कम एक साल तक मेरा दूध पिए। लेकिन न जाने कैसे 2 महीने में ही मेरा दूध सूख गया।" बोलते बोलते माला का गला भर आया और आँखें भर आई।

"माँ... आप प्लीज मत रोइये। वो तो पुरानी बात हो गयी और मैंने कोई शिकायत भी नहीं की। और देखिए न, आपके की पालने से तो मई एकदम फिट एंड फाइन हूँ"

लेकिन माला की आँखों से बरसात शुरू हो ही गयी।

पल्लवी थोडा सोच कर बोली, "माँ,मैं तो अभी भी आपकी बच्ची हूँ। उस समय नहीं तो क्या हुआ... मैं अब भी तो आपका दूध पी सकती हूँ.. है न?"

"..... अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है - क्या तुम सच में.....!"

"श्ह्ह्ह्ह्ह..." कहते हुए पल्लवी ने माँ की नाइटी के ऊपर के कुछ बटन खोलने शुरू कर दिए - माला के कुछ कहने से पूर्व ही चार बटन खुल चुके थे, जिससे माला के दोनों सुन्दर स्तन पूर्णतः खुल कर सामने आ गए। उनको देख के पल्लवी का मुंह खुला सा रह गया।

"माँ... आप बहुत बहुत सुन्दर हो। आपने कभी मुझको ये दिखाए ही नहीं। गन्दी मम्मी - मुझे भी आपके जैसे ही ब्रेस्ट्स चाहिए।"

इस अचानक घटे घटनाक्रम से माला थोडा अवाक् रह गयी। लेकिन उसने देखा की पल्लवी किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साहित हो गयी थी। भाव-आह्लादित माला ने बहुत प्यार से पल्लवी का सर अपने बाएँ स्तन की तरफ खीचा - पल्लवी ने भी अपनी माँ के सुन्दर और मुलायम स्तन को अपने मुँह में रख लिया।

पल्लवी का मुँह चाय पीने से गरम हो गया था, और इस गर्मी का एहसास माला के स्तनाग्र पर बहुत अच्छा लगा। कुछ देर पल्लवी ने अपनी जीभ से उस पर दुलार किया, फिर उसको चूसना शुरू किया। पल्लवी को माँ के स्तन को पीने की कोई याददाश्त नहीं थी। ये नया अनुभव - उसके माँ के गरम, मुलायम और कोमल स्तनाग्र, जो उसके दुलार और स्तनपान के कारण थोड़े लम्बवत हो गए थे - पल्लवी को बहुत अच्छा लगा।

उसका हाथ अनायास ही माला के दाहिने स्तन पर चला गया और धीरे धीरे उसको दबाने, सहलाने लगा।

"तुमको यह पसंद है?" पल्लवी ने बिना स्तन मुह से निकाले, सहमति में सर हिलाया। "जब तक मन करे तब तक पियो" माला ने ममता भरे स्वर में कहा। स्तनपान करती हुई पल्लवी ठीक वैसी ही लग रही थी जब वो एकदम छोटी सी गुडिया थी। माला का मन भर आया। उसका मन हुआ की यह कभी समाप्त न हो।

कुछ देर और चूसने के बाद,पल्लवी ने दाहिने स्तन पर भी यही क्रिया प्रारंभ कर दी। लेकिन जाने अनजाने पल्लवी के स्तनपान करने का तरीका कुछ इस प्रकार था की माला के स्तनाग्रों से अब दुसरे प्रकार की अनुभूति होने लग गयी थी - कुछ वैसी ही जैसे की कामुक होने पर होती है।

भजन का शांति प्रदान करने वाला प्रभाव ख़तम होने लगा और माला का वात्सल्य भाव अब धीरे धीरे कामुकता की ओर चल पड़ा।

विराट ने कभी उसके स्तनों को इतना आदर नहीं दिया - लेकिन माला जानती थी की ये उसके शरीर के सबसे संवेदनशील अंग हैं। माला तो सिर्फ उनके उपभोग से ही चरम आनंद प्राप्त कर सकती थी। अभी कुछ वैसी ही दशा चल रही थी। हर्षोन्माद के मारे उसकी आँखें बंद हो गयी।

इस दौरान दोनों ही इस बात से अनजान थे की रूद्र पिछले कुछ समय से इस पूरे क्रिया कलाप का सीधा प्रसारण देख रहा था। उसके चेहरे पर कौतूहल, और मनोरंजन का मिला जुला भाव था।

"अरे रूद्र, तुम कब उठ आए?" ये पल्लवी की आवाज़ थी, जिसे सुन कर माला जैसे धरातल पे आ गयी। आँखे खुली तो देखा की रूद्र मुस्कुराते हुए माला के चेहरे और स्तनों को बारी बारी से देख रहा है। हड़बड़ी में वो अपने कपड़े भी ठीक से समेट नहीं पाई, जिसके कारण उसके स्तन अधखुले रह गए और पूरी स्थिति और भी हास्यास्पद हो गयी।

माला लेकिन पूरी तरह हतोत्साहित हो गई - उसका मन सोच रहा था की अपनी मूर्खता में दामाद के सामने नंगा होना पड़ गया। लेकिन भागने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था, क्योंकि पल्लवी का सर अभी भी उसकी गोद में था, और वो बेवक़ूफ़ हटने का नाम ही नहीं ले रही थी।

पल्लवी ने देखा की रूद्र क्या देख रहा है। उसको यह भी मालूम था की रूद्र नारी शरीर में स्तनों को सबसे अधिक पसंद करता है, और उसकी माँ के स्तन तो बहुत ही मनोहर थे। "अब तुमको समझ आया की मैं इतनी सुन्दर कैसे हूँ? मेरी प्यारी माँ की सारी सुन्दरता आई है मुझमे।" रूद्र ने मुस्कुराते और समझते हुए हामी में सर हिलाया।

"तुमको पता है, माँ इस बात से दुखी थी की वो मुझको बचपन में ब्रेस्ट-फीड नहीं करा सकीं, इसलिए मैंने सोचा की उनको ये बताऊँ की दुखी होने वाली बात कुछ भी नहीं है, क्योंकि मैं तो आज भी उनकी वो ही छोटी सी गुडिया हूँ। अब तो मैं जब तक यहाँ हूँ, तब तक माँ के ब्रेस्ट्स एन्जॉय करूंगी। लेकिन तुम इनको देख कर ललचाना मत, क्योंकि मेरी माँ के ब्रेस्ट्स को सिर्फ मैं पी सकती हूँ।"

"है न माँ?" कहते हुए पल्लवी ने बहुत ही भोलेपन से माला को देखा।

"कुछ भी कहती रहती है यह पागल। बेटा तुम चाय लोगे?" अपनी शर्मिंदगी को छुपाने के लिए माला ने बात बदल दी।

"हाँ मम्मी - चाय लूँगा। और आप प्लीज शर्मिंदा न हों। हम लोग तो आपके बच्चे है।"

"कितना अच्छा लड़का है। जितना आकर्षक व्यक्तित्व, उतना ही आकर्षक विचार।" माला ने मन में सोचा और संयत हो के उठ गयी और रसोई में नाश्ते और चाय का प्रबंध करने लगी।

चाय लेकर वापिस आई तो रूद्र ने माफ़ी मांगी और कहा की अब वो दरवाज़ा ठीक से बंद कर लेगा। पल्लवी हँसते हुए बोली, "माँ ने हम दोनों को नंगू पंगू देखा है।" बेचारे रूद्र का चेहरा शर्म से लाल हो गया।

"चल हट्ट बेशरम। कभी तो सोच के बोला कर! बेटे, मैंने पहले भी बोला है, की तुम दोनों ही मेरे बच्चे हो। तुम जैसा बेटा तो कोई भी औरत चाहेगी।"

"यानि की ये भी आपका दूध पी सकता है?" पल्लवी चौंकते हुए बोली।

"हाँ पी सकता है। अब खुश?" माला ने बनावटी गुस्से से कहा। लेकिन बोलने के साथ ही सोचा की कैसा लगेगा अगर रूद्र उसके स्तनों तो छूए, उनको दबाये और उनको चूसे।

"ओह भगवान्! ये कैसे कैसे विचार दे रहे हो तुम मुझको? ये तो मेरे बेटे जैसा है।" "विराट, आप प्लीज जल्दी से आ जाओ और इस अनायास ही भड़की हुई आग को बुझाओ...."

नाश्ते और चाय का समय आराम से बीता। बच्चों के साथ हंसने बोलने से माला का मन हल्का हो गया और सवेरे की अप्रत्याशित घटनाए मष्तिष्क के कोने में चली गयी। नाश्ते के बाद माला नहाने चली गयीं।

उसके जाते ही पल्लवी ने रूद्र के सीने पे प्यार से घूँसा मारते हुए कहा, "क्यों मिस्टर! टुकुर टुकुर क्या देख रहे थे?" रूद्र थोडा शर्मिंदगी से मुस्कुराया, "यार, ऐसा सीन चल रहा हो तो मैं आँखें तो बंद नहीं कर लूँगा न?"

"माँ के ब्रेस्ट्स एकदम अमेजिंग हैं न? तुमको पसंद आये?" पल्लवी की बात पर रूद्र ने सर हिलाया।

"सच बताना, तुम मम्मी को खुश करने के लिए उनके ब्रेस्ट्स पी रही थी, या कुछ और प्लान था?"

"उनको खुश करने के लिए। पता है, माँ के निप्पल्स से स्ट्राबेरी जैसा फ्लेवर आता है। कितने सॉफ्ट हैं!"

"पल्लो, मैं यह सब देख के कस के एक्साइट हो गया हूँ - एक राउंड और हो जाए? क्विकी?"

"कल रात चार बार किया है। तुम थके नहीं अभी तक?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा।

"ऐसी बीवी हो तो कौन गधा थकेगा भला?"

"ह्म्म्म... तो जनाब से कुछ ऐसा करवाते है जिससे ये थक जाएँ!" पल्लवी मुस्कुराते हुए बोली।

रूद्र ने पल्लवी तो चूमने के लिए उसकी कमर को पकड़ के अपनी तरफ खीचा, ऐसा करने के पल्लवी के स्तनाग्र उसके सीने से रगड़ खाने लगे। पल्लवी ने प्यार से उसके गले में बाहें डाल दी और रूद्र के मुह में मुह दाल के उसको चूमने लगी। कुछ देर चूमने के बाद रूद्र ने पल्लवी का टी-शर्ट उसके शरीर से खीच लिया, और बिना समय गवांए अपना भी शर्ट उतार दिया।

रूद्र को पल्लवी के स्तन बहुत प्यारे लगते थे - खास तौर पे उसके स्तनाग्र। उनकी उपमा वो अक्सर डार्क-चॉकलेट से करता था, जिसको पूरा उम्र चूसा, चुभलाया और चूमा जा सकता था।

अब वही कार्यक्रम प्रारंभ हो चला था। उसने पल्लवी के दाहिने स्तनाग्र को अपनी जीभ से कुछ देर पोंछा, और फिर उसको मुह में भर लिया। पल्लवी के मुह से हलकी सिसकारी निकल पड़ी। रूद्र बारी बारी से उसके स्तनों को चूसता जा रहा था। जब वो एक स्तन को अपने होंठो और जीभ से दुलारता, तो दुसरे को अपनी उँगलियों से। इसी बीच उसने अपने खाली हाथ को पल्लवी की निकर के अन्दर दाल दिया। योनि पर हाथ जाते ही उसको कुछ गीलेपन का एहसास हुआ। कुछ देर वहां सहलाने के बाद उसने अपनी उंगली पल्लवी की योनि में डाल कर अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया।

पल्लवी कुछ देर आँखें बंद करके आनंद लेती रही, फिर उसने रूद्र का पजामा नीचे खिसका दिया। रूद्र पूरी तरह उत्तेजित था -उसकी बनावट की सराहना करते हुए पल्लवी ने रूद्र के लिंग को पकड़ लिया और झुक कर उसको अपने मुह में भर लिया।

लिंग चूसे जाने का एहसास आंदोलित करने वाला था। उन्माद में रूद्र सोफे पर ही लेट गया। कुछ देर के बाद पल्लवी रुक गई और अपनी निकर उतार फेंकी। रूद्र के दोनों ओर अपनी टांगे करके वो उसके लिंग को अपनी नम योनि में दाल कर धीरे धीरे नीचे बैठ गयी।

"आअह्ह्ह्ह.... मस्त लग रहा है" पल्लवी की साँसे उन्माद के कारण उखड गयी। "अब देखती हूँ, मेरे राजकुमार थकते हैं या नहीं?"
 
पल्लवी ने उत्साह के साथ मैथुन करना प्रारंभ कर दिया। सवेरे पल्लवी और माला का रोमांचक प्रसंग देख कर रूद्र वैसे भी बहुत कामोत्तेजित हो गया था। लिहाजा, उसका लिंग एकदम कड़क हो गया था और पल्लवी की चुनौती से और भी दमदार हो गया। वो उसके स्तनों को या फिर उसके नितम्बो को बारी बारी से दबा रहा था।

कुछ 5 मिनटों में ही पल्लवी का शरीर चरमोत्कर्ष पे आकर थरथराने लगा, उसने अपनी कामुक चीख को दबाने के लिए अपने मुह पर हाथ रख लिया। लेकिन अभी रूद्र पूरे उन्माद में था, इसलिए पल्लवी ने कुछ पल रुक कर पुनः धक्के लगाना शुरू कर दिया। 3-4 और मिनट बीत जाने के बाद रूद्र स्खलित हुआ। पल्लवी जैसी सौंदर्य की देवी की योनि में वीर्य की धाराएँ छोड़ने का एहसास बहुत ही सुखद था।

पल्लवी थक के रूद्र के ऊपर ही गिर गयी। उसी अवस्था में दोनों अपनी सांसो पर काबू पाने के लिए आराम करने लगे। रूद्र ने उसको आलिंगनबद्ध कर लिया था और उसके बालों में धीरे धीरे उंगलियाँ चला रहा था साथ ही अपने प्यार का इज़हार भी उसके कानों में कर रहा था।

कुछ देर में पल्लवी उठी और उसने रूद्र के मुलायम होते लिंग को फिर से अपने मुह में लिया और जल्दी से उसमे बचे हुए वीर्य को चूस लिया। "आई लव यू सो मच, रूद्र माई डार्लिंग!" "मैं तुमको पागलो की तरह प्यार करती हूँ।"

"तुम आराम से लेट जाओ।" रूद्र ने अपना पजामा ऊपर चढ़ा लिया और बिना टी-शर्ट के ही लेट गया।

पल्लवी भी बिना कपड़ो के उठ कर जाने लगी तो रूद्र ने पूछा, "कपडे नहीं पहनोगी?"

"अरे, माँ ने देखा ही है मुझको ऐसे। वैसे भी उनसे क्या शर्म?" पल्लवी में मन में एक विचार कौंधा - "क्यूँ न हम लोग आज न्यूडिस्ट हो जाएँ?"

"मम्मी नाराज़ हो जाएँगी"

"नहीं होंगी। मैं तो कहती हूँ की तुम भी नंगे होकर लेटो। माँ नहा के निकलेगी तो उनको भी नंगा होने के लिए राज़ी करती हूँ"

"तुम पागल हो एकदम। वैसे सच में, नंगी हो के एकदम मस्त लगती हो। आज तुम प्लीज कुछ मत पहनो - खूब मज़ा आएगा।" ये बोलते बोलते रूद्र का लिंग फिर से खड़ा होने लगा।

पल्लवी ने माँ को मनाने वाली बात तो बस यूं ही कह दी थी। असल में उसकी हिम्मत इतनी नहीं थी, की अपनी माँ से वो ऐसी बाते करे। रिश्तो की कोई मर्यादाएँ होती है, सीमायें होती है। लेकिन न्यूडिस्ट होने का अनुभव एकदम नया होगा - खास तौर पे तब, जब की घर में उसके पति के अलावा कोई और हो। असल में आई आई टी छात्रावास में भी वो कभी पूर्ण नग्न अवस्था में नहीं रही थी।

"एकदम नया होगा ये..!" उसने सोचा।

अभी अभी सम्पन्न हुए यौन क्रिया के कारण निकले हार्मोनों और साथ ही साथ रूद्र की इच्छा, की वो आज नंगी ही रह जाये, के सम्मिलित प्रभाव ने उसके मन की वर्जनाओं को थोडा दबा दिया और एक नए अनुभव के लिए हिम्मत बांध दी। उसने ठान लिया की आज तो कपडे नहीं पहनेगी और अपने कमरे की तरफ चल दी।

.....

माला नहाने के बाद कपडे पहन कर बार निकल ही रही थी की उसने देखा की पल्लवी तो पूर्णतः नग्न है। माला ने सोचा की लगता है इन दोनों ने फिर से समागम कर लिया है - "बाप रे बाप! कभी थकते ही नहीं ये दोनों।"

उसने सोचा की वो 2 मिनट बाद बाहर निकलेगी, तब तक पल्लवी भी कपड़े पहन लेगी। लेकिन पल्लवी बड़ी देर तक यूँ ही अन्दर बाहर चक्कर लगाती रही। माला समझ नहीं सकी की उसको क्या बोले।

"कितनी सुन्दर लड़की है यह - लेकिन अभी भी ऐसे व्यवहार करती है की जैसे एकदम छोटी सी बच्ची हो। भला 20 साल की लड़की घर में ऐसे नंगे घूमती है कहीं?" 20 साल... कुछ दिनों पहले वो एक बच्ची थी, लेकिन अब देखो!"

सवेरे तो माला ने पल्लवी का सिर्फ आगे का हिस्सा देखा था, लेकिन अभी उसके घूमते टहलते रहने से उसका पीछे का हिस्सा भी दिखा। चिकनी पीठ और मादक नितम्ब, साथ ही सुन्दर जांघें। "कितने गोल पुट्ठे हैं इसके! तराशी हुई जांघे.. इकहरी टाँगे! एफ टीवी पे दिखने वाली न जाने कितनी ही मॉडल्स को ये मात दे सकती है।"

माला ने अंततः सोचा की इसको कुछ पहनने को बोलेगी और जाकर पल्लवी के सामने आकर खड़ी हो गयी।

"अरे तू ऐसी ही रहेगी क्या? कुछ तो शर्म कर! चल कपडे पहन"

"अरे माँ! आप! मैं आपके पास ही आने वाली थी।" पल्लवी मुस्कुराते हुए बोली।

"ऐसे? नंगी? अब तू जवान हो गयी है, कुछ शर्म लिहाज कर" माला दबे स्वर में बोल रही थी, जिससे रूद्र को आवाज न जाये।

"अरे आपने तो सवेरे मुझे ऐसे देखा ही था, और रही रूद्र की बात, तो उसने ही बोला की आज तुम ऐसे ही रहो, ... नंगी, खूब मज़ा आएगा।"

"तुम दोनों न! क्या मेरे जाते ही फिर से शुरू हो गए थे?" जवाब में पल्लवी ने खीसे निपोर दी।

"सच में?! हे भगवान्, कितना स्टैमिना है तुम लोगो में?!"

"हा हा... माँ कल रात से पाँचवी बार है।" पल्लवी ने हँसते हुए, आँख मारते हुए कहा।

"तुझे बिलकुल भी शर्म नहीं है"

"आपसे तो बिलकुल भी नहीं - आप मेरी माँ कम और दोस्त ज्यादा हैं"

"बस बस, मस्का मत लगा, और जा कर कपडे पहन ले।"

"आज तो मा-बदौलत ऐसे ही रहेंगी - पति का आदेश जो है।" पल्लवी ने आँख मटकाते हुए कहा।

"एक तुम और तुम्हारा पति, दोनों ही एक नंबर के बेशरम हो"

"अरे हाँ, मैं ये बताने आई थी की आज मैं और रूद्र दोनों ही न्यूडिस्ट बनने वाले हैं। मतलब, आज हम दोनों ही कपडे नहीं पहनेंगे। सोचा की आपको बता दे, नहीं तो आप शाक्ड हो जाएँगी।"

पल्लवी ने थोडा सोचते हुए आगे कहा "वैसे माँ, कितना मज़ा आएगा अगर आप भी मत पहनिए। फिर हम में से कोई भी संकोच नहीं करेगा" आखिर उसने कह ही दिया - लेकिन उसका दिल धक् से हो गया की उसने ये क्यों बोला!

"मैं नहीं बनती कोई न्यूडिस्ट व्यूडिस्ट। न जाने कहाँ कहाँ से आइडियाज लाते हैं ये दोनों।" माला बुदबुदाई। "कोई छोटा बच्चा हो तो समझ में भी आये! तुम दोनों जवान हो गए हो। मुझे नहीं पसंद है ये सब।"

पल्लवी ने देखा की माँ का प्रतिवाद और गुस्सा ठीक उतना ही है जितना की बिना पूछे, चोरी से रसगुल्ला खाने पर होता है।

फिर भी उसने थोड़ी सतर्कता से बोला, "माँ, प्लीज आप नाराज़ मत होइए। ठीक है आप कपडे पहने रहिएगा, लेकिन मैं अकेले ही ऐसे रहूंगी तो मुझे अजीब सा लगेगा। रूद्र बेचारे को भी अलाऊ कर दीजिये न?" पल्लवी ने किसी छोटे बच्चे की तरह चिरौरी करते हुए कहा।

"मैं कौन होती हूँ अलाऊ करने वाली! अपने कमरे के अन्दर जैसे रहना हो रहो, और जो करना है करो। लेकिन बाहर तो ठीक से रहो"

माला की न नुकुर और पल्लवी की हठ भरे निवेदनो के बीच माला के मन में विचार अवश्य आया की ऐसे सुन्दर नौजवान नग्न देखने को मिलेगा। "ऐसी कोई बुरी बात भी नहीं है, अगर दोनों नग्न रहते हैं। बच्चे ही हैं दोनों। क्या फर्क पड़ता है?" इस तर्क से माला का प्रतिरोध ढीला हो गया।

प्रत्यक्ष में उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन ना ना कहना बंद कर दिया।

"तो हम लोग आज बिना कपडे के रह सकते हैं?"

माला ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी आँखें कह रही थी की वो कोई विवाद नहीं करेगी।

"थैंक यु माँ!" पल्लवी ने ख़ुशी के मारे जोर से कहा और माँ से कस के चिपक गयी।

माला ने भी उसको प्यार से गले लगा लिया और उसकी पीठ सहलाने लगी। उसके मन में हुआ की पल्लवी के नितम्ब छू कर देखे की कैसे लगते हैं। बचपन में छुआ था, तब से अब तक कितना समय हो गया।

"पल्लवी..." माला उसको उसके नाम से तब बुलाती थी जब वो उसके अपने बराबर का समझती थी।

"हाँ माँ"

"मे आई टच योर बटक्स?" किसी बात को बोलने में जब माला को लज्जा आती थी, तो अंग्रेजी में बोलने लगती थी।

"माँ, यु कैन टच नॉट ओन्ली माई बटक्स, बट आल्सो माय ब्रेस्ट्स एंड देअर। आई विल नेवर माइंड योर टचिंग" बोलते हुए पल्लवी आलिंगन तोड़ के अलग हट गई और माँ की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई।

माला ने बहुत हिचकते हुए पल्लवी के उन्नत नितम्बों को छुआ। "वाकई कितने चिकने हैं... और ठोस भी! गुरुत्व का कोई प्रभाव नहीं। रंग भी कितना साफ है!" उसने अपना हाथ हटाया, तो पल्लवी मुस्कुराते हुए पलट गयी।

माला की दृष्टि में पल्लवी के स्तन सबसे सुन्दर थे। उसको अपने खुद के स्तन बहुत प्यारे लगते थे, लेकिन पल्लवी के स्तनों में जो यौवन की ताजगी थी, उसके कारण वो और भी सुन्दर लगते थे।

"तुम बहुत सुन्दर हो, पल्लवी" माला ने उसके स्तनों को देखते हुए कहा।

"मैं, या मेरे ब्रेस्ट्स?"

"तुम भी और तुम्हारे ब्रेस्ट्स भी" माला की हिचक कम हो रही थी।

पल्लवी गर्व से मुस्कुराई। अगर माँ को मेरे ब्रेस्ट्स पसंद हैं, तो ये ज़रूर ही बेस्ट होंगे!

"माँ, अगर आप मेरे ब्रेस्ट्स को लाइक करती है तो प्लीस, इनको चूम लीजिये...... जैसे आज मैंने आपके चूमे थे"

माला ठिठक गयी, "चूमे कहाँ थे - चूसे थे!" "मैं अपनी बेटी के स्तन चूसूंगी? अपनी माँ के बाद ये पहला स्तन होगा जो माला चखेगी।" ये एक रोंगटे खड़े करने वाला रोमांच था। क्या उसने सही सुना था, निश्चित करने के लिए माला ने पल्लवी की तरफ देखा।

पल्लवी ने प्यार से मुस्कुराते हुए हामी दिखाने के लिए सर हिलाया।

माला ने अनिश्चय भरे तरीके से पल्लवी के छोटे, गहरे लाल-भूरे रंग के आकर्षक बाएं स्तनाग्र को अपने अपने खुले हुए होंठो में भर लिया और जीभ को थोडा पीछे करके हलके से चूसा।

इतने कम अन्तराल में पहले रूद्र और अब माला द्वारा अपने स्तनों पर होने वाली क्रिया से पल्लवी रोमांचित हो गयी। प्रेम-हर्मोनो के प्रभाव और संवेदनशील अंग की छेड़खानी से वो फिर से मदमस्त होने लगी।

थोड़ी थोड़ी देर तक दोनों स्तनों को हल्का हल्का चूसने के बाद माला संयत हो कर अलग खड़ी हो गयी। "अद्भुत है, स्तनपान करना और कराना - दोनों ही! आज सवेरे ही पल्लवी ने इनको पीकर मुझे इतना सुख दिया, और अब अपने स्तन पिला कर फिर से!

"थैंक्स माँ" पल्लवी की आँखों में वो वासना के हलके लाल रंग के डोरे साफ देख सकती थी, और जानती थी की उसकी खुद की आंखे भी यही कहानी कह रही है।

"थैंक्स मुझे कहना चाहिए पगली। तुमको नहीं मालूम, की तुमने मुझे कितनी ख़ुशी दी है।"

दोनों कुछ पल ऐसे ही प्यार से एक दुसरे को देखती रही। अचानक पल्लवी की आँखों में शरारत का भाव आ गया।

वो बोली, "माँ, आपने अभी अभी रूद्र को फ्रेंच-किस किया है"

"क्या..!? मैंने कब....!?" फिर उसको समझ आया - रूद्र ने भी बस कुछ ही देर पहले इन्ही स्तनों को चूमा चूसा होगा, जिसको वो चूस रही थी।

"रूद्र को फ्रेंच-किस! पागल!" इस भावना से उसे खुद ही शर्म आ गयी। "तुम आज सचमुच कुछ नहीं पहनोगी?" माला का स्वर अब एकदम शांत था।
 
"अगर आपको वाकई पसंद नहीं तो तो पहन लूंगी।" पल्लवी का स्वर भी शांत था - कोई मनुहार नहीं। जैसे उसको मालूम था की माला अब मन नहीं करेगी।

"नहीं। मुझे पसंद नहीं है, ऐसा नहीं है।" माला सावधानी से शब्द चुनते हुए बोली, "तुमको जैसा अच्छा लगे, वैसे रहो। तुम लोगो का घर है।" फिर थोडा सोचकर, "लेकिन, मुझसे नहीं हो पायेगा यह नंगा वंगा होना। तुम लोग जवान हो, जो मन चाहे करो। ....... रूद्र भी चाहे तो 'वैसे' रह सकता है।"

"थैंक यू माँ। मैं वाकई आज पूरी न्यूड रहना चाहती हूँ, चाहे जो हो। देखें तो कैसा लगता है।"

माला ने स्वीकृति में सर हिलाया। फिर पल्लवी से पूछा, "तुम्हारे 'यहाँ' पर बाल नहीं आते?" फिर थोडा ठहर कर, "अच्छा है नहीं आते - कितना झंझट होता है।"

"आते हैं माँ। लेकिन रूद्र को पसंद नहीं हैं। ही लाइक्स टू यूस हिज माउथ देअर, एंड डस नाट लाइक द फील ऑफ़ हेयर। वो मुझे उस फेमस स्किन क्लिनिक में ले गया था। वहां लेज़र से बाल साफ कर देते हैं। दिस एरिया इस नाऊ एस क्लीन एस अ बेबीस।" और कह कर हलके हलके हंसने लगी।

"मैं जा कर रूद्र को ये गुड न्यूज़ सुनाती हूँ और उसको बोलती हूँ की चलो बेटा, कपडे उतारो। आज बर्थ-डे ड्रेस वाला दिन है।"

रूद्र आराम से लेट कर सपने देख रहा था। उस सपने में उसको अपनी सासू-माँ के स्तनों की साफ छवि दिख रही थी। पल्लवी और माला की मज़ेदार करतूत ने उसको इतना उत्तेजित कर दिया था, की पल्लवी के साथ वह पुनः सम्भोग करना चाहता था। न जाने कहाँ से इतनी स्फूर्ति और उर्जा भर गयी थी उसके अन्दर की आधे घंटे के अन्दर ही वो फिर से तैयार हो गया था। ऊपर से यह सपना। उसने सिर्फ पजामा पहना हुआ था, उसके अन्दर कुछ नहीं। ऊपर का शरीर वैसे ही नंगा था। कामोद्दीपन सपने और वासना भरी इच्छाओं के कारण उसके भी हर्मोन अति-सक्रियता से काम कर रहे थे। रूद्र का लिंग पूर्ण उत्तेजित होकर पूरा उर्ध्व हो जाता था क्योंकि उसके जघन क्षेत्र की मांस-पेशियाँ बहुत मजबूत थी। लिंग इस समय पहले से भी अधिक कड़ा हो गया था और पूरी तरह से उर्ध्व होकर मनो पजामे को फाड़ कर बाहर आने को आतुर था। रूद्र लेकिन सपने के सागर में गोते लगा रहा था।

पल्लवी भी रूद्र के इस उपकरण की दीवानी थी। वो जब भी मौका पाते, कम-क्रीडा में लीन हो जाते। लेकिन आनंद देने वाला उपकरण तो रूद्र का लिंग ही था। यदि कभी वो थकी भी होती और यदि कभी मूड न भी होता तो भी इस लिंग में न जाने ऐसी क्या बात थी की जैसे ही उसकी योनि के अन्दर जाता, वैसे ही मानो कोई स्विच 'ऑन' कर देता और पल्लवी मदमस्त हो जाती। उसको मालूम था की रूद्र की वो पूरी तरह गुलाम है। अगर वो चाहे तो दिन के 24 घंटे उसके साथ सम्भोग कर सकता है और वो मन नहीं कर सकती। पुरुष शरीर में लिंग उसका सबसे पसंदीदा अंग था, और लिंगों में रूद्र का लिंग उसके लिए सबसे अच्छा था।

रूद्र - शिव का एक नाम भी है, और शिव का लिंग ही तो पूजा जाता है। पल्लवी वास्तव में रूद्र का लिंग पूजती थी - हाथ से, मुह से और योनि से। पाश्चात्य देशो में इसको ब्लो-जॉब कहते हैं! क्या वाहियात बात है। इसको 'लिंग का मुख-पूजन' कहना चाहिए।

रूद्र को इस प्रकार लेटा देख कर पल्लवी में प्यार उमड़ आया, साथ ही उसकी दृष्टि कस के तने हुए लिंग पर भी पड़ी। मन ही मन खुश हो गयी। पति को जगाने का मस्त तरीका दिमाग में कौंध गया। उसने बहुत धीरे से रूद्र का पजामा नीचे सरकाया और पूरी सराहना के साथ अपने प्यारे खिलौने को देखा। रूद्र का शरीर इकहरा था और कसरती भी। उसमे से इतने गर्व से ऊपर खड़ा हुआ लिंग, हलके भूरे-लाल रंग का एक मोटा स्तंभ, जिसकी लम्बाई कम से कम छह इंच अवश्य थी, और मोटाई तो पल्लवी की कलाई से भी ज्यादा, बहुत ही रोमांचक लग रहा था।

पल्लवी ने धीरे से उसको अपने हाथ के घेरे में लिया और बहुत धीरे से नीचे की और खीचा। इस क्रिया से शिश्नग्रछ्छद पीछे खिसक गया और लिंग के आगे का गुलाबी चमकदार हिस्सा साफ दिखाई देने लगा।

"ऐसा इरेक्शन! किसके सपने देख रहे हैं, जनाब?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए सोचा। कामाग्नि से पल्लवी का शरीर पहले से ही दहकने लग गया - ठीक वैसे ही जैसे की 102 बुखार आने पर तपने लगता है। वो इस प्रभाव को अच्छे से जानती थी! उसके हाथ का तापमान वैसे ही अधिक था, लेकिन फिर भी वो रूद्र के लिंग की तपन महसूस कर पा रही थी।

उसने ऐसे ही लिंग को घेरे हुए अपने हाथ को 3-4 बार ऊपर नीचे किया, और कुछ छड़ो के लिए रुक गयी, "कहीं रूद्र जाग तो नहीं गया?" "नहीं... अभी भी सो रहा है" उसने पुनः लिंग की ओर देखा - "उसमे लगता है और तनाव आ गया है.. इसकी नसें एकदम बाहर आ गयी है। इसको तो जल्दी ही रिलीव करना चाहिए।" पल्लवी से अब रहा नहीं जा रहा था।

उसने अपना मुह खोला और उस सुन्दर से लिंग को अन्दर समाहित कर लिया।

रूद्र को अपने लिंग पर हलचल सी महसूस हो रही थी, साथ ही गरमागरम नमी भी। उसकी चेतना, सपने से वापस आने लगी। "क्या पल्लवी मेरे सोते सोते ही सेक्स कर रही है? ... नहीं नहीं.. वैसा तो नहीं लग रहा है। उसकी योनि तो बहुत ही सँकरी और तंग है। कहीं मम्मी तो नहीं...!?" ये विचार आते ही उसकी आँखे एक झटके से खुल गयी। लेकिन सामने पल्लवी को देख के उसको थोड़ी राहत आई। राहत आई, लेकिन बस एक दो पल के लिए ही।

पल्लवी आज उसके लिंग का पान कुछ ऐसे ढंग से कर रही थी की जैसे उसने पहले कभी नहीं किया था। पहले वो इसको हलके से चूसती, और शिश्नाग्र को चुभलाती थी - जिससे लिंग का कड़ापन और बढ़ जाता था। लेकिन अभी की क्रिया तो एकदम भिन्न थी। आज वो अपने दांतों से लिंग को हलके हलके काट रही थी और जोर से चूस रही थी।

इस चूसने का असर वैसा ही था जब वह अपनी योनि की मांस-पेशियों को उसके लिंग पर सिकोड़ती थी। इस क्रिया में बीच बीच में वो रूद्र के शिश्नाग्र के छेद के अन्दर अपनी जीब भी घुसाने का प्रयास कर रही थी। इसके कारण रूद्र को रह रह के बिजली के झटके जैसे लग रहे थे। रूद्र के गले से उन्माद की तेज़ आवाज़ छूट पड़ी, और पूरा शरीर थरथराने लगा।

आवाज़ माला को भी सुनाई दी। "ये दोनों तो क्या हैं? फिर से चालू!" पहले तो उसने सोचा की इसको अनसुना कर दे और अपना काम करती रहे, लेकिन जिज्ञासा ने उसको अभिभूत कर दिया और वो दबे पाओं बैठक की ओर चल दी।

रूद्र तो जैसे स्वर्ग में था - पल्लवी के मुह की गर्मी, कोमल होंठों का उसके लिंग पर स्पर्श, दांतों की हलकी चुभन, यह सब उसको मतवाला करती जा रही थी। वो देख रहा था की पल्लवी का चेहरा उन्माद के मारे लाल होता जा रहा था, और उसकी आँखे बंद होती जा रही थी - मानो की वो किसी और ही दुनिया में चली गयी हो। उसके गले से हलकी 'गूं गूं' की आवाज़ आ रही थी।

रूद्र का मन हो रहा था की पल्लवी को यहीं पटक कर कस के उसका योनि-मर्दन कर दे, लेकिन पल्लवी आज उसको छोड़ने के मूड में नहीं लग रही थी। इसलिए रूद्र ने लेटे हुए ही मज़े लेने का मन बना लिया।

माला ने देखा की पल्लवी का मुह रूद्र के पेट..., नहीं... नहीं, लिंग के ऊपर नीचे हो रहा है। माला ने मुख-मैथुन के बारे में अपनी सहेलियों से ही सुना था, कभी किया नहीं था। उसको थोड़ी घिन आती थी इस ख्याल से - पुनः, बालपन की वर्जनाओं ने उसकी कामुकता पर थोड़े प्रतिबन्ध लगा रखे थे। विराट भी सिर्फ बिजनेस-लाइक तरीके से सेक्स करते थे। इसलिए उसको मालूम नहीं था की आखिर मुख-मैथुन होता क्या है - बस कुछ अधकचरा सा ज्ञान था, जो सहेलियों से मिला था।

यह दृश्य उसके लिए एकदम नया था - जिस दृश्य की कल्पना कर के वो यहाँ आई थी, उससे बहुत भिन्न दृश्य चल रहा था।

माला की आँखें रति-क्रिया के मुख्य स्थल पर जम गयी। पल्लवी के मुह के ऊपर नीचे होने से रह रह कर, लार से सना हुआ चमकदार लिंग दिख रहा था। अत्यधिक रुधिर प्रवाह के कारण वो पूरा फूल गया था, साथ ही उसका रंग भी काफी गहरा हो गया था। "ये तो बहुत मोटा है! ये पतली सी लड़की ऐसे लिंग को झेलती कैसे है, और वो भी दिन में इतनी बार!!"

रूद्र का शरीर रह रह के झटके खा रहा था, और उसके मुह से हलकी हलकी सिस्कारियां निकल रही थी - "इसको दर्द हो रहा है क्या?" "नहीं, ऐसा होना तो नहीं चाहिए, सुना है पुरुषों को ये क्रिया अच्छी लगती है"। माला को दृश्य थोडा खतरनाक, लेकिन रुचिपूर्ण लगने लगा। उसके पेट में एक अपरिचित हलचल और योनि में गीलापन होना शुरू हो गया। उसका हाथ अनायास ही अपनी ब्लाउज के ऊपर आ गया और उसके स्तन से छेड़खानी करने लग गया।

रूद्र से अब सब्र नहीं हो पा रहा था, लेकिन वो पल्लवी को सावधान करना चाहता था। किन्तु उन्माद इतनी पराकाष्ठा पर था की उससे कुछ भी कहते या करते बना नहीं। उसने एक गहरी आह के साथ वीर्य की पहली धार पल्लवी के मुख में छोड़ दी। पल्लवी ने अपने कंठ में गरम वीर्य की धारा महसूस की - मिशन कामयाब। लेकिन वो उसको पूरी तरह से शांत करना चाहती थी। उधर रूद्र का शरीर ऐसे ज़ोरदार स्खलन से ऐंठा जा रहा था। लेकिन पल्लवी ने उसको कमर से पकड़ लिया और लिंग को अपने मुह से छूटने नहीं दिया। रूद्र ने 7-8 बार फुहारे छोड़ी, लेकिन पल्लवी सब पी गयी।

अंततः उसने एक आखिरी बार जोर से चूसा और फिर उसका लिंग छोड़ा। पल्लवी की आँखें अभी भी बंद थी। एक आखिरी घूँट पीने के बाद उसके मुह से आवाज़ आई, "म्म्म्म्म्म ...."

माला ने कामोत्तेजना भरा ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था - ब्लू फिल्म्स में भी नहीं। ये सब कुछ उसको बहुत ही अवास्तविक सा लग रहा था। लेकिन वो जानती थी की यह सब सत्य है। सामने वाले दृश्य के प्रभाव से उसकी सांसे भर आई। उसने महसूस किया की उसके स्तनाग्र बहुत ही व्यग्र होकर बहार निकल आये है और साफ दिखाई दे रहे हैं। योनि के भीतर एक ज्वालामुखी सा फूट पड़ा था, और उसमे एक कामुक मुलायम गुदगुदी हो रही थी।"
 
काम भावना की अति हो चली थी, जो किसी भजन या स्वहस्त सेवा से कम नहीं होने वाली थी अब। इस समय विराट की बहुत आवश्यकता थी उसको। वो चाहती थी की विराट आकर उसको देर तक भोगे, तब तक जब तक उसकी योनि थक न जाये। उसका कंठ सूख गया था, घुटनों में एक कम्पन और कमजोरी सी लग रही थी। हाथ भी काँप रहे थे।

पल्लवी और रूद्र दोनों ही इस बात से बेखबर थे की माला भी वही पास में खड़ी है। पल्लवी ने आखिर आँखें खोली, "गुड मोर्निंग, हस्बैंड!" उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "मज़ा आया तुमको, मेरे जानू?"

"बहुत! ये तो एकदम नया था! कहाँ से सीखा तुमने?"

"बस ऐसे ही मन हुआ की कुछ नया ट्राई करते हैं। तुम सोते समय इतने एक्साईट थे की मुझसे रहा नहीं गया। किसकी याद में थे मेरे जान!?"

रूद्र कुछ बोलता, उससे पहले उसकी नज़र माला पर पड़ी। उसने चौंक कर जल्दी से अपने लिंग को हाथ से ढक लिया.... उसकी इस प्रतिक्रिया से पल्लवी भी पीछे मुड़ी और माँ को देखा।

"माँ, मैं रूद्र को जगा रही थी। इतनी देर तक सोता रहता है।"

'कैसे जगा रही थी यह तो मैंने भी देखा' माला ने सोचा।

"रूद्र, इट इस ओके। डोंट बी शाई। आज मैं और तुम दिन भर नेकेड रह सकते हैं। माँ ने एक्सेप्ट कर लिया है।"

"चलो हाथ हटाओ" बोलते हुए पल्लवी ने रूद्र का हाथ खीच कर उसके लिंग से हटा दिया। कुछ ही देर पहले जो लिंग एक कठोर स्तंभ जैसा खड़ा था, अभी वो एक छोटे मुलायम भिन्डी जैसा हो गया था।

माला बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोक पायी, "बेचारा! इसके मज़े का सत्यानाश हो गया मेरे आने से।"

माला के मन के अन्दर की सच्चाई कुछ और ही थी - माला के सामने एक युवा जोड़ा रतिक्रिया से अभी अभी निवृत हुआ था, और माला का मन उसी क्रिया के लिए व्याकुल हो रहा था।

"तुम लोग थोडा आराम कर लो - थक गए होगे" उसने एक अर्थपूर्ण दृष्टि दोनों पे डाली। "मैं भी थोड़ी देर सो लेती हूँ।" माला ने शुष्क गले से इतना कहा और जल्दी से अपने कमरे में चली आई।

सोना माला के मन से कोसो दूर था। उसने विराट को फ़ोन लगाया।

"हेल्लो माला, कैसी हो? अच्छा सुनो मैं आज रात की फ्लाइट से घर आ रहा हूँ। खाना बना के रखना। ओके?"

'इसको खाने की पड़ी है' माला ने गुस्से से सोचा। "विराट...."

"बोलो माला?"

"विराट... मुझे सेक्स करना है"

"क्या??"

"अभी।"

"क्या हो गया तुमको माला? कैसी बाते कर रही हो?"

"आज बच्चो को देखा - सेक्स करते हुए - दो दो बार! मुझसे रहा नहीं जा रहा है"

"माला कहीं घूम आओ। मैं रात में आऊंगा। कल सवेरे कर लेंगे सेक्स।"

"कल सवेरे तक मैं मर जाऊंगी विराट। मेरे शरीर में आग लगी हुई है"

"...."

"विराट! कुछ करो न! प्लीज।"

"तुम तो बिलकुल ही बदल गयी हो माला! ऐसा क्या देख लिया तुमने बच्चो को करते?" विराट ने थोडा मनोविनोद से कहा।

"तुम देखोगे तो तुम्हारा दिमाग भी ख़राब हो जायेगा - दोनों आज नंगे रहने की बात कर रहे थे। पल्लवी ने तो बिना कुछ पहने ही घूमना फिरना शुरू कर दिया है घर में।"

"क्या? तुमने मना नहीं किया?"

"उन दोनों को सेक्स करते देख लिया दो दो बार, मेरा खुद का भी मन हो रहा है अब... तुम जल्दी से कुछ करो और मुझे शांति दो....."

विराट के लिए ये सब जानकारी बहुत ही उलझा देने वाली थी। "दोनों नंगे हैं? पल्लवी सवेरे से ही ऐसी है? दोनों खुले में सेक्स कर रहे हैं?" ये सब बाते तो उसने कभी सोची तक नहीं थी। पूरा नंगा? ऐसा तो वह तब हुआ था जब माला के साथ हनीमून पे गया था। दोनों ने खूब सेक्स किया था (विराट के लिए दिन में 2 बार करना, 'खूब' करना था) उन दिनों।

"विराट, कुछ बोलो भी"

"क्या बोलूँ माला?! मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है।"

"तुम बेकार हो।" ये कह कर माला ने गुस्से में फ़ोन का रिसीवर पटक दिया।

विराट माला के इस व्यवहार से भौचक हो गया था। माला ऐसी तो न थी कभी! या शायद उसको माला के बारे में नहीं मालूम ठीक से अभी तक।

ऐसा कभी कभी ही होता है की औरत पुरुष से सेक्स की भीख मांगे - अभी ठीक वैसे ही हो रहा था। माला उससे सेक्स के लिए गिड़गिड़ा रही थी, और वो कुछ भी नहीं कर पा रहा था। माला का गुस्सा जायज़ था।

क्या कर सकता है वो भला - हताशा में उसने अपने मोबाइल फ़ोन की तरफ देखा। उसको कॉल कर के समझाए? कितना प्यार करता है वो माला को - ऐसे नाराज़ हो जाएगी तो उसका तो दिल ही टूट जायेगा।

विराट उन लोगो में था जो स्त्री को अपना प्रेम दिखाने में संकोच कर जाते है - भले ही वो स्त्री उसकी पत्नी ही क्यों न हो। प्रेम तो माला को वो खूब करता था।

उसने वापस कॉल लगाया।

"हेलो" माला का बुझा हुआ सा स्वर सुनाई दिया।

"माला - डार्लिंग, आई ऍम सॉरी। पहले तो तुम मुझे माफ़ कर दो।"

"नहीं विराट, माफ़ी मत मांगो।"

"नहीं पहले बोलो की माफ़ कर दिया, फिर आगे बोलूँगा"

"माफ़ कर दिया विराट, मुझे भी माफ़ कर दो"

विराट को अचानक ही एक नया प्रयोग करने का ख्याल आया। "माला..... तुम बहुत चुदासी हो आज?"

"विराट??!!!!??" माला ने उसके मुह से ये शब्द पहली बार सुना था।

"बोलो न? चुदाई का बहुत मन हो रहा है?"

"हाँ"

"अगर मैं फ़ोन से ही तुमको चोद दूं, तो?"

"कैसे?"

"सबसे पहले अपने कपड़े उतारो"

"अरे मैं उतार भी दूं, तो भी क्या होगा?"

"अच्छा तुम एक काम करो, तुम लैपटॉप ऑन करो और विडियो चैट पे आ जाओ। फिर बताता हूँ की तुमको इतनी दूर से भी मैं कस के चोद सकता हूँ।"
 
माला के लिए आज सब कुछ नया नया हो रहा था। पहले तो काम क्रीडा का इतना खुला प्रदर्शन, उस पर उसके खुद का विस्मयकारी ढंग से प्रतिक्रिया करना और अब विराट की भाषा और उसका इन्टरनेट सेक्स करने का प्रस्ताव। पिछले कुछ घन्टो में काफी कुछ बदल गया सा लगता है।

एक अपरिचित सा डर उसके मन में आ गे और उसका ह्रदय धम्म धम्म करके धड़कने लगा। लैपटॉप ओन करते हुए उसके हाथों में कम्पन हो रहा था। खैर जैसे तैसे उसने विडियो चैट शुरू करी। विराट पहले से वहां पर मौजूद था।

"जानेमन, आई लव यू सो मच। ट्रस्ट मी, इट विल वर्क एंड आई कैन फ़क यू एंड इवन सैटिस्फाई यू फ्राम हियर।"

"चलो, अब धीरे धीरे अपने कपडे उतार दो।"

"लेकिन, दरवाज़ा बंद नहीं है - कहीं बच्चे आ गए तो?" माला इस विचार मात्र से रोमांचित हो गयी।

"आ गए तो क्या? तुमने उनको नंगा देखा ही है - इट इस ओनली फेयर दैट दे आल्सो सी यू नेकेड।" कहते हुए विराट ने आँख मारी - शायद पल्लवी को यह आदत अपने बाप से ही मिली थी।

"नाऊ डू इट।"

माला के कांपते हाथों ने धीरे से अपना पल्लू ढलका दिया। ब्लाउस के बटन खोलते हुए उसका ह्रदय धाड़ धाड़ करके धड़क रहा था। लेकिन जैसे तैसे उसने अपना ब्लाउस खोल ही दिया। विराट को यह दृश्य बहुत ही दिलचस्प लग रहा था। अपनी बीवी को इस कदर "चुदासी" उसने पहले कभी नहीं देखा था - और उसके इन्टरनेट पे नंगा होने के लिए राज़ी होते देख कर वो समझ गया की अगर माला की काम पिपासा ठंडी नहीं की गयी तो कुछ न कुछ गड़बड़ हो जायेगा। विराट खुद भी अभूतपूर्व उत्तेजना महसूस कर रहा था।

माला के स्तन उसको उतना कामुक नहीं बनाते थे, जितना की उसकी योनि। इसलिए विराट बहुत अधिक ध्यान नहीं देता था उन पर। लेकिन आज! लैपटॉप के पट पर अपनी बीवी के सफ़ेद रंग की ब्रा में कैद स्तनों का उसकी भारी भारी सांसो के साथ उतरने चढ़ने का दृश्य देख कर विराट पहली बार उत्तेजित हुआ था। शायद उसे कुछ ज्यादा ध्यान देना चाहिए इन पर।

"अपना ब्लाउस उतारो, जानेमन। मुझे तुम्हारे ब्रेस्ट्स देखने है।"

"एक और नया डेवलपमेंट।" माला ने सोचा। उसने अपनी ब्लाउस और ब्रा उतार फेंकी, और एक गहरी साँस भरी।

विराट ने देखा की माला के निप्पल्स गहरे लाल रंग के हो गए हैं। उनकी लम्बाई भी काफी बढ़ गयी है।

"अपने निप्पल्स आगे की ओर खीचो।" माला ने ठीक वैसा ही किया - अब वो खुद कुछ सोचने समझने की सीमा के परे जा चुकी थी। उसके मन में सिर्फ एक विचार था, वो था अपनी कामुकता की शान्ति।

पल्लवी और रूद्र अब तक सम्हल चुके थे। आज बहुत गड़बड़ हो गयी - 'माँ क्या सोच रही होंगी? उनको कैसा लगा होगा जब उन्होंने मुझको रूद्र का पीनस अपने मुह में लिए देखा? सेक्स करते समय सावधान रहना पड़ेगा। लेकिन, कैसा लगेगा अगर माँ हम लोगो को सेक्स करते देखे?' पल्लवी अन्यमनस्क हो कर अपनी टी-शर्ट और निकर पहन रही थी। उसे यह भी याद नहीं रहा की आज उसने पूरे दिन भर नंगा रहने की सोच रखी थी। आखिर उसको इस प्रकार के कई विचारों ने घेर रखा था।

दूसरी तरफ रूद्र, बेहद शर्मशार हो चुका था। पत्नी के साथ अबाधित और असीमित रति क्रिया में जो आनंद था, वह इस तरह उसकी सास के आने, जाने और देखने से, कम हो गया। फिर भी, सुबह सुबह उनके स्तनों को देखने से उसके मन में यह लालसा जग गयी थी की उनके स्तन उसके खुद में मुह में कैसे लगेंगे।

उधर, लैपटॉप के सामने आधी नंगी बैठी माला, विराट के कहे अनुसार, अपने स्तन दबा दबा के आहें भरने लगी थी। उसकी आँखें पूरी तरह बंद हो चुकी थी, और अब वो लैपटॉप के स्पीकर से आने वाली आवाज़ पर अगले आदेशों का इंतज़ार कर रही थी। उसके दिमाग में विराट का नग्न चित्र बन गया था। विराट खुद भी ऐसे रोमांचक प्रकरण से उन्माद में आ गया था - उसका लिंग इस समय उसके हाथ में था, जो की उसको धीरे धीरे सहला रहा था।

विराट अति-कामुकता में अधिक देर नहीं ठहर पाता था। इसलिए वो चाहता था की पहले माला शांत हो जाये। "माला, अब सारे कपडे उतार दो" विराट की आवाज़ अब भारी हो चली थी। माला ने जल्दी जल्दी खीच खीच कर अपनी साड़ी और पेटीकोट उतार दिया। अब वह पूर्णतः नग्न थी।

विराट कुछ कहता, उसके पहले ही माला का एक हाथ उसकी योनि पर आ टिका। योनि के द्वार रुधिर प्रवाह के कारण फूल गए थे और योनिमार्ग को थोडा संकरा कर रहे थे। उसकी उंगली, विराट के काल्पनिक लिंग - जो की देखने में रूद्र के लिंग के समान था - का रूप ले कर उसकी योनि में प्रवेश कर चुकी थी। विराट का पूरा शरीर कमोन्द्दिप हो गया।

"कैसा लग रहा है जानेमन....." विराट ने पूछा, ".... मेरा लंड?"

"बहुत बढ़िया" माला ने धीरे से सरसराती आवाज़ में कहा - विराट कुछ सुन न सका। उसकी उंगली उसी की योनि-रस से पूरी तरह भीग चुकी थी।

"माला! मेरे लंड को अपने मुंह में लो और थोड़ी देर चूसो।"

माला को लगा की बहुत दूर से आवाज़ आ रही है। बड़े प्रयत्न से उसने अपनी योनि से उंगली निकाली और अपने मुह में डाल लिया। विराट का लिंग अब उसके मुंह में समा गया था। थोड़ी देर पहले पल्लवी ने जो कुछ भी रूद्र के लिंग के साथ किया था, माला वह सब कुछ करना चाहती थी। उसने अपनी उंगली को अपनी जीभ से लपेट लिया और उस पर लगे रस को आनंद के साथ चाटने लगी। नमकीन और हलके खट्टे से स्वाद ने उसके मुह को भर दिया - लेकिन जैसे जैसे वो और चूसती गयी, स्वाद में थोड़ी कडवाहट सी आने लगी। इसी बीच उसने दूसरे हाथ से अपनी योनि सहलानी शुरू कर दी। लिंग को मुंह और योनि दोनों से चूसने का मज़ा आने लग गया।

माला के कमरे का दरवाज़ा, जैसा की उसने विराट को बताया था, पूरी तरह बंद नहीं था - बस थोडा भेडा हुआ था। उसमे से माला की कामुक आहों की आवाज़ आ रही थी। बाहर के कमरे में बैठे पल्लवी और रूद्र को वो आवाज़े आ रही थी। हाँलाकि दोनों अब काफी शांत हो गए थे, लेकिन उत्सुकता की चमक दोनों की आँखों में आ गयी थी।

"क्या तुम भी वही सोच रही हो जो मैं सोच रहा हूँ?"

पल्लवी ने हामी भरी। "देखना है क्या?"

"देख सकते हैं, लेकिन बहुत सावधानी से। मैं नहीं चाहता की मम्मी को मालूम पड़े और वो शर्मिंदा हो जाएँ"

"ठीक है - बिना आवाज़। ओके?"

दोनों चुपके से दरवाज़े के अन्दर झाँकने लग गए। अन्दर का ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा था - बस लैपटॉप और कभी कभार माला की नंगी जांघें, जो उन्माद से उचकने से उठ जाती थी, ही दिख रही थी। लेकिन उसकी आवाज़ की कामुकता ने दोनों को दरवाज़े से चिपका के रख दिया।

"ओह विराट... तुम्हारा लिंग बहुत मज़ेदार है।" माला अपनी ही दुनिया में थी। उंगली तेजी से आगे पीछे हो रही थी और लज़ीज़ मीठा आनंद पंहुचा रही थी।

विराट ने यह कार्यक्रम माला को शांत करने के लिए शुरू किया था, लेकिन अब परिस्थिति बदल गयी थी। वह इस समय मानो कोई ब्लू-फिल्म देख रहा था और उत्तेजना के चरम पर पहुच गया था। उसका हाथ अब उसके लिंग पर कस गया था और थोडा जोर से झटके लगाने लग गया था। ऐसे 5-6 झटको में ही उसके लिंग से वीर्य की धार छूट पड़ी। "आआह्ह्ह्ह!" एक गहरी और संतोषजनक आह उसके गले से निकली।

माला को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी योनि की अंदरूनी दीवारें विराट के लिंग (उसकी उंगली) को कस के पीस रही थी। उसकी उंगली की गति अब बहुत तेज़ हो गयी थी - योनि क्षेत्र का तापमान काफी बढ़ गया था। "आह विराट!" एक घुटी घुटी सी आवाज़ निकली। पूरा शरीर उत्तेजना से कांपने लग गया। उसको लगा की शायद उसके अन्दर से कुछ हलकी सी फुहार, जो की सामान्य गीलेपन से अलग है, निकल रही है। माला के आनंद की कोई सीमा ही नहीं रही। अभी अभी जो उसने महसूस किया वो सबसे भिन्न था। पूर्ण संतुष्ट हो कर वो निढाल हो कर अपने बिस्तर पर ही गिर गयी।
 
माला को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी योनि की अंदरूनी दीवारें विराट के लिंग (उसकी उंगली) को कस के पीस रही थी। उसकी उंगली की गति अब बहुत तेज़ हो गयी थी - योनि क्षेत्र का तापमान काफी बढ़ गया था। "आह विराट!" एक घुटी घुटी सी आवाज़ निकली। पूरा शरीर उत्तेजना से कांपने लग गया। उसको लगा की शायद उसके अन्दर से कुछ हलकी सी फुहार, जो की सामान्य गीलेपन से अलग है, निकल रही है। माला के आनंद की कोई सीमा ही नहीं रही। अभी अभी जो उसने महसूस किया वो सबसे भिन्न था। पूर्ण संतुष्ट हो कर वो निढाल हो कर अपने बिस्तर पर ही गिर गयी।

अब आगे:

पल्लवी और रूद्र ने अन्दर जो भी कुछ देखा, वह आशा के विपरीत बिलकुल नहीं था, लेकिन उस दृश्य ने मानसिक स्तर पर उन दोनों को अचंभित कर दिया था, अतः उसको स्वीकारना उन दोनों लिए थोडा कठिन हो रहा था। माला को इतने उन्मुक्त रूप से हस्त-मैथुन करते देख कर वो दोनों आश्चर्यचकित हो गए थे। और यह कहना गलत न होगा की इस दृश्य ने उनको पुनः कामोत्तेजित कर दिया था। पल्लवी की त्वचा का रंग उत्तेजना और शर्म के मिले-जुले प्रभाव से गुलाबी हो गया, और उसके मस्तक पर पसीने की छोटी छोटी बूंदे बनने लगी। रूद्र युवावस्था के उस पड़ाव पर था जहाँ अबाधित यौन क्रिया की कल्पना मात्र से लिंग स्तंभित हो जाता है।यद्यपि उसने पिछले 10-12 घंटो में कई बार रति-क्रिया की थी, तदापि अपनी सास को ऐसे कामुक क्रिया करते देख कर वह पुनः तैयार हो गया था। रूद्र को लगा की आज शायद उसको सेक्स-मैराथन करना पड़ेगा।

पल्लवी ने रूद्र की तरफ देखा और बोला, "लगता है माँ सो गयी हैं?"

सामने पड़ी हुई नग्न स्त्री उसके लिए इस समय 'सास' कम और 'सम्भोग योग्य स्त्री' ज्यादा थी। रूद्र के मन में अनेक विचार आ-जा रहे थे और उनमे से सबसे प्रभावी विचार यह था की माला के साथ सम्भोग कैसा रहेगा?

इसलिए जब पल्लवी ने माला को 'माँ' कह कर संबोधित किया तो रूद्र थोडा अचकचा गया और थोडा हकलाते हुए बोला, "ह्ह्ह्हाँ। शायद सो गयी हैं।" अप्रत्यक्ष में उसके मन में चल रहा था, की माला के साथ सेक्स किया जाये। लेकिन पल्लवी उसके साथ थी, और उसके रहते ऐसा कैसे संभव हो सकता है? खैर, क्या यह संभव है की माला के आकर्षक स्तनों का स्वाद चखा जा सके? उसने सोचा की चलो, थोड़ी देर देख लिया जाये की पल्लवी क्या करती है।

पल्लवी बहुत देर से कुछ सोच रही थी। 'माँ का ऐसा रूप!' उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सबसे मजेदार बात जो उसने देखी थी वो यह की रूद्र भी माला को ललचाई दृष्टि से देख रहा था। पल्लवी और रूद्र उन आधुनिक जोड़ों में से थे जो काम-क्रिया का पूर्णतः अबाधित और रोमांचक तौर पर रसास्वादन करते थे और हर प्रकार के प्रयोग के लिए प्रस्तुत रहते थे। रति को लेकर दोनों ही बहुत उन्मुक्त थे। अपने विवाहित जीवन के कुछ ही महीनों में दोनों ने अनेकों प्रयोग किये थे, जिसके कारण उनका प्रेम और भी प्रगाढ़ हो गया था। पल्लवी ने एक बार रूद्र को बिना बताये रति-क्रिया का "एम एम एस" बना लिया था और अपनी सबसे करीबी कुछ सहेलियों को दिखाया भी था। रूद्र के नग्न पुष्टकाय शरीर, सुन्दर लिंग और देर तक काम-क्रिया करने की क्षमता ने उन सहेलियों की योनि में आग लगा दी थी। कुछ ने पल्लवी को बोला भी था की मौका मिल जाये तो वो सभी रूद्र के सामने अपनी टाँगे खोल के लेट जाएँगी। इस बात को याद कर कर के पल्लवी न जाने कितनी बार चरमोत्कर्ष प्राप्त कर चुकी थी।

आज रूद्र की आँखों में माँ के लिए कामुक भाव देख कर पल्लवी सोचे बिना नहीं रह सकी की उसको कैसा लगेगा अगर रूद्र माँ के साथ सेक्स करे? वह अभी कुछ साफ़ सोच नहीं पा रही थी।

खैर, कुछ देर सोचने के बाद, पल्लवी ने बहुत धीरे से दरवाज़ा खोला और दबे पाँव कमरे के अन्दर आ गयी। माला बिस्तर पर अभी भी वैसे ही लेती हुई थी, ऐसे लग रहा था की जैसे सो रही हो। पल्लवी ने देखा की माँ का सीना गहरी साँसों के कारण धीरे धीरे ऊपर नीचे हो रहा था। उसकी नज़र सामने टेबल पर रखे लैपटॉप पर गयी, विराट पहले ही लाग-ऑफ हो चुका था, लेकिन वेब-कैम 'ऑन' था - पल्लवी समझ गयी की माला के हस्त-मैथुन का सीधा प्रसारण किसी ने तो देखा है - उसकी उम्मीद थी की देखने वाला पापा ही हों (दरवाज़े पर खड़े होने से पल्लवी और रूद्र को लैपटॉप से आती आवाजें नहीं सुने दे रही थी)।

उसने जल्दी से लैपटॉप की स्क्रीन नीचे कर दी, और सामने बिस्तर पर लेटी माँ के बगल धीरे से आकर बैठ गई। सामने लेती हुई स्त्री उसकी माँ और सबसे खास दोस्त थी, और, इस समय वो दुनिया की सबसे खूबसूरत स्त्री भी थी। पल्लवी की दृष्टि माला की योनि की तरफ गयी - सुन्दर, गुलाब की पंखुड़ी जैसी, रंग थोडा गहरा हो गया था, शायद अभी अभी सम्पन्न हुई काम-क्रिया के कारण। हाँलाकि भगोष्ठ पर बालों की अच्छी तादात थी - लम्बाई में मुश्किल से आधा इंच, लेकिन घने। माँ का शरीर एकदम मस्त है, पल्लवी ने सोचा। उसकी दृष्टि अब माला के स्तनों पर थी। उसको आज सुबह ही किया गया स्तन-पान याद आ गया, और माँ को ऐसी हालत में देख कर उसका मन पुनः स्तन-पान करने का हो गया।

उधर, पल्लवी ने धीरे से माँ के दाहिने तरफ का निप्पल अपने मुँह में ले लिया और अपने होंठो से हल्का सा दबाव डाला। वो नहीं चाहती थी की माँ जाग जाए, इसलिए अगर वो थोड़ी देर उनके स्तनों को दुलार कर पाती, तो उतना ही उसके लिए काफी था। अब रूद्र से रहा नहीं जा रहा था - पल्लवी को माला का स्तनपान करते देख कर उसने सोच लिया की आज वो भी माला के स्तन पिएगा। वो भी माला के बगल आकर लेट गया, और माला के बाएँ स्तन को अपने हाथ में ले लिया। माला का स्तन उसके हाथ में पूरी तरह समां गया - माला के स्तन पल्लवी के मुकाबले काफी कोमल और मुलायम थे। उत्सुकतावश उसने अपना अंगूठा माला के स्तनाग्र पर फिराया। स्तनाग्र तुरंत जग कर उठ गया। ये रूद्र के लिए बहुत ही कामुक दृश्य था। उसने तुरंत अपना मुह खोल कर माला के स्तन को समाहित कर लिया। पल्लवी रूद्र को रोक कर कहना चाहती थी की रूद्र ऐसा कुछ न करे जिससे माँ जाग जाए, लेकिन उसका खुद का आनंद आड़े आ गया।

उधर रूद्र माला के स्तन को ठीक उसी तरह से प्यार कर रहा था जैसे वो पल्लवी के स्तनों को करता था। माला के स्तनाग्र के चारो तरफ वो अपनी गर्म जीभ फिरा रहा था। माला की चेतना वापस आ रही थी और उसको अपने स्तनों पर होती हुई हरकते महसूस हो रही थी। रूद्र अब जोश में आ गया था, और वो जोर से माला के स्तन चूसने लगा। पल्लवी की शुरुआत हाँलाकि सावधानीपूर्ण था, लेकिन अब वो भी पूरे मनोयोग से माला के स्तन चूस रही थी। माला ने अधखुली आँखों से देखा की दोनों बच्चे उसके दोनों स्तनों पर टूट पड़े थे।

स्तन माला के शरीर में शीर्ष कामोद्दीपक अंगो में से थे। उसके मन में सदैव यह इच्छा रहती थी की विराट पहले उसके स्तनों का मर्दन करे और फिर काम-क्रिया करे। लेकिन विराट ने कभी ऐसे नहीं किया। आज सवेरे ही पल्लवी द्वारा उसका स्तन-पान करने की संवेदना माला के मन पर एकदम ताज़ी ताज़ी बसी हुई थी। लेकिन, अब उस संवेदना मे रूद्र की छुवन का मिश्रण हो गया था।

एक मर्द का स्पर्श, जो उसके स्तनों में आकृष्ट था........।

जैसे जैसे स्तन-पान का समय बढ़ता जा रहा था, माला की साँसे और गहरी होती जा रही थी, साथ ही साथ उसकी योनि से एक परिचित संवेदना आने लगी थी। माला की वापस आती चेतना पर कामुकता का बुखार चढ़ने लगा और उसकी आँखें वापस बंद हो गयी। पल्लवी और रूद्र, दोनों के ही स्तन चूसने का तरीका इतना अलग था की माला को दोनों स्तनों से भिन्न प्रकार की अनुभूति हो रही थी। लेकिन दोनों ही प्रकार की अनुभूति का सम्मिलित प्रभाव बहुत ही मादक था।
 
माला उन्माद में यह भूल गयी थी की वह उन दोनों के सामने पूर्णतः नंगी पड़ी हुई है। उसका हाथ उसकी नंगी योनि पर आ जमा और उसकी उंगलियाँ भगनासे की मालिश करने लगी। माला का शरीर उत्तेजना से पहले ही कांपने लग गया। इस बार स्तन-मर्दन और योनि-मर्दन दोनों के ही सम्मिलित प्रभाव से माला का चरमोत्कर्ष और भी बढ़ गया था।

माला की साँसे उखड गयी और उसके गले से घुटी घुटी गहरी साँसों की आवाज़ आने लगी। पल्लवी और रूद्र दोनों ने ही देखा की माला का शरीर ऐंठने लग गया था - वो लोग समझ गए की माला इस समय उन्माद के सबसे शीर्ष पर है। आधे घंटे के भीतर ही माला को दूसरा चरम आनंद मिल गया। बिना कहे सुने वो पुनः निढाल हो कर अपने बिस्तर पर गिर गयी।

रूद्र ने ऐसा दृश्य पहले भी देखा था - जब पल्लवी स्खलित होकर निढाल हो जाती थी - लेकिन, माला को ऐसे करते हुए देखना बहुत ही मादक था। सामाजिक वर्जनाओं के कारण उसको यह समझ आ रहा था की अभी अभी यह जो भी कुछ हुआ था वह सही नहीं था, लेकिन फिर भी उसको बहुत मज़ा आया। रूद्र का शरीर माला के खूबसूरत शरीर की उत्तेजक गर्मी के जवाब में समुचित प्रतिक्रिया करने लगा। पल्लवी और रूद्र की आँखें छण भर को मिली, फिर पल्लवी की नज़र रूद्र के पजामे पर चली गयी। वहां पर फिर से एक तम्बू बन चुका था।

पल्लवी ने माला को देखा - वो गहरी नींद में लग रही थी। "जनाब के क्या इरादे हैं?" पल्लवी ने धीमी आवाज़ में पूछा। जवाब में रूद्र सिर्फ मुस्कुरा कर रह गया।

"आई एम अ लिटिल सोर देअर। बट आई गेस आई कैन डू इट वन्स मोर।"

अब रूद्र पल्लवी को कैसे बताए की वो माला की योनि की नाप लेना चाहता है। लेकिन पल्लवी के साथ रति-क्रिया में उसको हमेशा रोमांच और मज़ा आता था - इसलिए उसको कोई आपत्ति नहीं थी।

"क्यों न हम लोग यही पर सेक्स करें?" रूद्र ने सुझाव दिया। "यहाँ? अगर माँ जाग गयी तो?"

"अरे! जाग गयी तो शी कैन ज्वाइन अस इन थे एक्ट!" रूद्र ने मुस्कुराते हुए कहा।

"हाँ हाँ..... तुम तो चाहते ही यही हो। अच्छा, अब बाते कम, और काम ज्यादा....... उतारो न!" पल्लवी ने उसको एक इशारे से पजामा उतारने को कहा।

"यू डू द होनर्स!"

यह सुन कर पल्लवी का हाथ तुरंत रूद्र के जघन पर पहुच गया। पजामे के ऊपर से ही उसने रूद्र के लिंग को अपनी मुट्ठी में लेकर दबाया। लिंग इतना ज्यादा कड़ा था की दब ही नहीं सका। पल्लवी ने बिस्तर से उठ कर, रूद्र के पास जाकर उसके पजामे को नीचे सरका दिया। रूद्र का लिंग पूरे गौरव के साथ स्तंभित था।

पल्लवी अभी अपना निकर उतार ही रही थी की रूद्र ने कुछ नया करने का सोचा। सामने माला की योनि खुली पड़ी थी। उसने शिश्नाग्रच्छाद को पीछे सरकाया और अपने गुलाबी शिश्नाग्र को माला की योनि से हल्का सा स्पर्श कराया। पल्लवी ने उसको यह करते हुए देखा। उसके मन के एक हिस्से ने तुरंत विरोध करने की सोची, लेकिन दूसरे हिस्से को यह बहुत ही उत्सुकतापूर्ण लगा। रूद्र ने पल्लवी को देखा, और फिर उसकी योनि को।

दो-दो योनियाँ! इससे अधिक सौभाग्य क्या हो सकता है एक आदमी के लिए? लेकिन रूद्र थोडा ठिठक गया। माला के साथ ऐसा कुछ भी करना गलत होगा - रूद्र अभी भी शील-सिद्धांत को तोड़ नहीं पाया था। लेकिन उसका मन बहुत हो रहा था की एक बार माला के अन्दर जा कर देखा जाये की कैसा महसूस होता है। उसने पल्लवी को एक प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। पल्लवी पूरी तरह समझ रही थी की रूद्र क्या सोच रहा था और क्या चाहता था।

'रूद्र का लिंग उसकी माँ की योनि के अन्दर कैसा लगेगा?' पल्लवी ने अन्दर ये विचार लहरों के सामान आ-जा रहा था। उधर रूद्र ने अपना लिंग-मुंड माला की योनि के ऊपर कुछ इस तरह टिकाया की उसकी योनि के दोनों होंठों ने रूद्र के गुलाबी शिश्नाग्र को घेरे में ले लिया। सामने जो कुछ भी हो रहा था वह रोचक और डरावना दोनों था। लेकिन पल्लवी कुछ भी रोकने में अपने को असमर्थ पा रही थी। बस बेबस होकर देख रही थी। उसकी खुद की योनि में एक आग सी लग गयी थी।

रूद्र ने अब माला की दोनों जांघो को थोडा सा फैला दिया था, इस कारण उसकी योनि के होंठ खुल गए थे। अब उसका लिंग कोई एक सेंटीमीटर माला की योनि में जाने लग गया था। माला अभी तक सोई पड़ी थी। रूद्र ने बहुत सावधानीपूर्वक माला की जांघो को और फैला दिया, इससे उसकी योनि का मुह और खुल गया। उसका लिंग किसी योनि के अन्दर जाने के लिए बुरी तरह से तड़प रहा था। रूद्र ने अपने दोनों अंगूठों की सहायता से माला की योनि का मुख इतना खोल दिया की उसका लिंग अन्दर जा सके। उसने एक बार फिर से पल्लवी की ओर देखा। पल्लवी मंत्रमुग्ध होकर यह दृश्य देखे डाल रही थी। उसको लगा की रूद्र उसकी माँ के अन्दर जाने के लिए उसकी अनुमति मांग रहा था। पल्लवी ने बहुत धीरे से 'हाँ' में सर हिलाया।

अब रूद्र की झिझक थोड़ी कम हो गयी थी। उसने धीरे धीरे से जोर लगाना शुरू किया - माला की योनि पल्लवी के मुकाबले ढीली थी, इसलिए उसका लिंग आसानी से अन्दर जाने लगा। पल्लवी का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया - रूद्र के लिंग की कम से कम एक तिहाई लम्बाई इस समय उसकी माँ की योनि में घुस चुका था। पल्लवी ने महसूस किया की उसकी योनि में से एक प्रकार का रिसाव होने लगा था, जो योनि से बाहर भी आने लग गया था। ऐसा उसने कभी नहीं महसूस किया था - कामोत्तेजना की एक इन्तहा थी। आज उसको अपनी कामुकता के बारे में न जाने क्या क्या मालूम पड़ने वाला था!

बिना प्रतिरोध के आगे बढ़ते हुए लिंग ने आधा सफ़र पूरा कर लिया था। रूद्र को ज्यादा मज़ा नहीं आया। उसको पल्लवी की योनि की पकड़ और जकड अच्छी लगती थी। रति के समय जिस प्रकार पल्लवी की योनि की दीवारें उसके लिंग की मालिश करती थी, वह एहसास यहाँ नहीं था। ऐसा संज्ञान होते ही रूद्र को माला के साथ ऐसा करना पाप लगने लगा। बुद्धि-विवेक ने तेज़ी से कामुकता पर विजय प्राप्त कर ली। रूद्र ने तुरंत ही अपना लिंग माला की योनि से बहार निकाल लिया।

पल्लवी ने देखा की रूद्र का लिंग माला की योनि से बाहर आ गया है। जितना लिंग माला की योनि में गया था, वह उसके योनि-रस से भीग गया था, और एक चमक आ गयी थी लिंग पर। वह कुछ समझ पाती, उससे पहले ही रूद्र की मज़बूत बाँहों ने पल्लवी के कन्धों को पकड़ लिया और उसको बिस्तर पर हलके से धकेल दिया। पल्लवी का रक्त-चाप बढ़ गया था। उसकी योनि का मुह होने वाली घटनाओं के पूर्वानुमान से खुलने और बंद होने लग गया था। रूद्र के सामने अब वो स्त्री लेती हुई थी जिसको वह अपने जीवन में सबसे अधिक प्रेम करता था। अभी जो कुछ भी हुआ वह एक गलती थी और वह इस गलती को सुधारना चाहता था - पल्लवी को खूब प्यार करके।

"आई लव यू" पल्लवी को रूद्र की प्रेम-रस में डूबी आवाज़ आई।

"ओह गॉड! आई लव यु द मोस्ट, रूद्र" ऐसा बोलते हुए उसने कामनापूर्ण होकर अपनी टाँगे खोल दी।

रूद्र पल्लवी के ऊपर आकर झुक गया, उसके हाथ उसके बोझ को सम्हाल रहे थे। उसने अपना लिंग-मुंड ठीक उसी प्रकार पल्लवी की योनि-मुख पर रखा जैसे उसने अभी अभी माला की योनि पर रखा था। पल्लवी के गले से पूर्वानुमान के कारण एक हलकी सी आह निकल गयी।

"आज मैं तुमको खूब प्यार करूंगा" रूद्र की वचन भरी आवाज़ आई।

रूद्र ने अपना लिंग पल्लवी की योनि में थोडा सा डाला, फिर निकाल लिया... पुनः थोडा सा डाला और पुनः निकाल लिया। ऐसा दो-तीन बार करने के बाद उसने अपने लिंग-मुंड को उसकी योनि की दरार पर कुछ देर फिराया, और फिर से अपना लिंग अन्दर डाल दिया। पल्लवी इस तरह की हरकतों से एकदम पागल हो गयी थी। रूद्र की हर हरकत से पल्लवी के गले से आनंद की कराह निकल जा रही थी। रूद्र ने अपना लिंग पल्लवी के अन्दर और घुस दिया और एक धीमी लय से काम-क्रिया आरम्भ कर दी। बीच बीच में वो रुक कर अपना लिंग बाहर निकाल लेता और अपने लिंग-मुंड को योनि की दरार पर कुछ देर फिराता और पुनः सम्भोग करना शुरू कर देता। ऐसा जब उसने तीसरी बार किया तो पल्लवी के शरीर में एक कंपकपी सी छूट गयी। रूद्र समझ गया की पल्लवी को चरम-आनंद आ गया। लेकिन, उसने पल्लवी को छोड़ा नहीं।

उसने पुनः पल्लवी को भोगना शुरू कर दिया, इस बार गति थोड़ी तेज़ थी। पल्लवी उत्तेजना की अवस्था में जल्दी ही आ गयी। उसने रूद्र का चेहरा अपनी ओर खीचा और उसको भावावेश में उसको बेतहाशा चूमने लगी। चूमते हुए उसने रूद्र के गले, और कान की लोलकी को हलके हलके काट भी लिया। पल्लवी के उन्माद ने रूद्र की कामुकता और प्रेम दोनों को बढ़ा दिया - उसने अपने शरीर को थोडा समायोजित करके पल्लवी की टी-शर्ट के ऊपर से ही उसके स्तनाग्र को मुह में लेकर चूसना और चाटना शुरू कर दिया। उसको मालूम था की पल्लवी को अपना स्तन चूसे जाने से बहुत मज़ा आता है। पल्लवी का दूसरा चरम-आनंद तेज़ी से निकट आता जा रहा था - रूद्र को भी महसूस हुआ की उसका खुद का चरम-आनंद भी पास में है। सम्भोग की गति और तेज़ हो गई - पल्लवी की रस से भीगी योनि में रूद्र के लिंग के अन्दर बाहर जाने से 'पच-पच' की आवाज़ आने लग गई थी। कमरे में एक कामुक माहौल बन चला था।

लगातार चूसे और चूमे जाने से पल्लवी की टी-शर्ट के उस हिस्से पर, जहाँ पर स्तानाग्र होते हैं, रूद्र की लार से गीला निशान पड़ गया था और वहां से पल्लवी के सुन्दर निप्पल दिखाई देने लग गए थे। उन्माद के कारण पल्लवी की योनि और कस गयी थी और रूद्र के लिंग को बुरी तरह से दुह रही थी। आखिरकार दोनों का चरम-आनंद आ ही गया। पल्लवी के गले से से एक चीख निकल गयी, और रूद्र के लिंग से वीर्य की एक मोटी धार छूट पड़ी। लेकिन रूद्र का लिंग पल्लवी के अन्दर बाहर तब तक होता रहा, जब तक उसके लिंग से वीर्य की आखिरी बूँद तक पल्लवी के अन्दर नहीं समां गयी।
 
संतुष्ट होकर रूद्र ने पल्लवी के बगल लेटकर उसको अपनी बाहों में समां लिया। रूद्र ने पल्लवी की टी-शर्ट के अन्दर हाथ डाल कर उसके स्तन को चंचलता से छेड़ना शुरू कर दिया - चंचलता से, कामुकता से नहीं। पल्लवी प्रेम रस से सराबोर हो गयी।

उसने मीठी आवाज़ में पूछा, "व्हाई डिड यु स्टॉप?"

"बिकॉज़ आई लव यु द मोस्ट! आई कैन नॉट लिव बींग अनफैथ्फुल टू यु।"

"रूद्र, आई ऍम योर स्लेव। यु कैन डू व्हाटएवर यु वांट, एंड आई विल नॉट माइंड।"

"ह्म्म्म! देन इट इस इवन मोर रीज़न टू बी ऑनेस्ट विद यु।" रूद्र ने मुस्कुराते हुए बोला।

यह सुन कर पल्लवी जोर से रूद्र के शरीर से चिपक गयी।

माला की आँख अंततः खुली और उसकी चेतना धीरे धीरे वापस आने लगी। 'कैसा सपना था यह! पल्लवी और रूद्र मेरे स्तन पी रहे थे सपने में। यह दिमाग भी न! न जाने क्या क्या ख़याल आते रहते हैं?!'

माला को अपनी त्वचा पर हवा की ठंडक का आभास हुआ - 'ओह! मैंने तो कपडे ही नहीं पहने हैं!'

लेटे लेटे ही उसका हाथ अनायास ही अपने स्तन पर गया - अपने स्तनाग्र को छूते ही उसको एहसास हो गया की उनको अभी अभी पिया गया है।

'यानी की वो सब सच में हुआ था? हे भगवान्! मुझे तो वह सब सपना लग रहा था! और यह सब करते हुए इन लोगो ने मुझे नंगा भी देखा!'

माला ने महसूस किया की वह इन सभी बातो से बिलकुल भी नाराज़ नहीं हो रही थी। कोई और समय होता तो शायद वो नाराज़ होती - लेकिन आज नहीं। उसने अपने दाहिने ओर देखा - पल्लवी लेटी हुई थी - 'एक मिनट.... यहाँ तो रूद्र भी लेटा हुआ है।' अब तक माला की चेतना पूरी तरह वापस आ गयी थी।

वो जल्दी से अपने बिस्तर से उठ गयी। उसने देखा की दोनो बेखबर होकर लेटे हुए सो रहे थे - रूद्र का हाथ पल्लवी की टी-शर्ट के अन्दर जाकर उसके स्तन पर था। दोनों ही कमर से नीचे नंगे थे। पल्लवी की योनि से ठीक उसी तरह से वीर्य निकल रहा था जैसे की माला ने सवेरे देखा था।

'मेरे बगल लेटे हुए इन दोनों ने सेक्स कर लिया! न कोई शर्म न कोई लिहाज़। कितने बदमाश हैं दोनों!' माला यह सब सोचते हुए हंसी भी आ रही थी। माला के सारे कपडे बिस्तर के नीचे ज़मीन पर ही पड़े हुए थे, और अब फिर से पहनने योग्य नहीं रह गए थे।

'मैं आज शलवार-कुर्ता पहनूंगी।'

.........

रूद्र पहले उठा - वो पल्लवी की तरफ करवट में लेटा हुआ था। पल्लवी भी करवट में ही लेटी हुई थी - रूद्र की तरफ चेहरा करके। रूद्र ने देखा की उसका हाथ अभी भी पल्लवी के स्तन पर था। पल्लवी का स्तन उसके हाथ में पूरी तरह 'फिट' हो गया था।

रूद्र के होंठो पर संतोषजनक मुस्कान आ गयी। अभी थोड़ी ही देर पहले संपन्न हुआ कामुक अनुभव बहुत ही बढ़िया था। रूद्र ने अपना हाथ उसके स्तन से हटा कर, लेटे लेटे ही पल्लवी को आलिंगनबद्ध कर, उसके गले को चूम लिया।

फिर उसकी दृष्टि बचे हुए बिस्तर पर चली गयी। माला वहां नहीं थी।

रूद्र ने निश्चय किया की आज वाली बात माला को कभी नहीं पता चलने देगा। जो भी कुछ हुआ था वह गलत था। पल्लवी की माँ, उसकी खुद की माँ सामान थी, और ऐसा काम करना पूरी तरह गलत था। वैसे भी वह पल्लवी को बहुत प्यार करता है।

उसने ऐसे सोचते हुए पल्लवी का गला पुनः चूमा और अपना हाथ अब पल्लवी के नग्न नितम्बों पर धीरे धीरे फिराने लगा। कुछ देर ऐसे ही सहलाने के बाद उसकी उंगलियाँ पल्लवी की जांघों पर चलने लगी।

पल्लवी आखिरकार जाग गयी। उसने लेटे हुए ही अंगड़ाई ली। "हे!...... कितना टाइम हो गया?"

"दोपहर"

"शिट! अभी तक नहाया भी नहीं हम लोगो ने! माँ उठ गयी?"

"हाँ। और हम लोगो को ऐसे देख भी ली हैं।"

"क्या नयी बात है भला? शी मस्ट बी यूस्ड टू नाऊ!" फिर थोडा सोच कर, "चलो, साथ में नहाते हैं। पानी भी बचेगा और टाइम भी।"

रूद्र ने हँसते हुए हामी भरी।

दोपहर के खाने का समय बिना किसी विशेष घटना के बीत गया। तीनो लोगो ने इधर उधर की बातें करते हुए खाना खा लिया। माला ने खाते हुए पल्लवी को बताया की प्रियंका का फ़ोन आया था और वह एक-दो घंटे में उससे मिलने आएगी। पल्लवी और प्रियंका बचपन से ही खास सहेलियां थी और दोनों एक दूसरे की राजदार भी (पल्लवी ने रूद्र के साथ वाला एम एम एस प्रियंका को भी भेजा था)। खाने के बाद माला किसी काम से, और रूद्र घूमने के बहाने से बाहर चले गए। उनके जाने के कुछ ही देर में प्रियंका भी आ गयी।

प्रियंका पल्लवी से सिर्फ साल भर छोटी थी, लेकिन उसको देख कर ऐसा लगता था की मानो उसने जवानी की चौखट पर अभी अभी पग रखे हों। उसकी बनावट हलकी थी, कद सामान्य से अधिक, स्तनों और नितम्बो में भराव कम था। लेकिन उसके चेहरे पर एक अलग तरह का लुभावनापन था, रंग साफ़, चेहरा गोल, बड़ी आँखें और बड़ा मस्तक। यह सब कुछ मिलकर उसको बहुत ही मनभावक बनाते थे। जैसा मैंने पहले भी बताया, पल्लवी और प्रियंका बचपन से ही खास सहेलियां थी और एक दूसरे की राजदार भी। दोनों इतनी करीब थी, की कई बार लोग उनको दोस्त नहीं, बहनें मानने की भूल कर बैठते थे। लेकिन इस बात में बहुत सच्चाई थी - पल्लवी और प्रियंका में सगी बहनों से अधिक स्नेह और प्रेम था।

एक दुसरे को इतने दिनों बाद देखते ही दोनों जोर से गले लग गयी। एक दुसरे के पास बैठे हुए दोनों देर तक इधर उधर की बाते करती रही, की अचानक प्रियंका ने पूछ ही लिया, "दीदी, तुम खुश हो न?"

"मैं खूब खुश हूँ प्रिया! पूरी ज़िन्दगी में इतना खुश कभी नहीं रही।"

"जीजू तुमको खूब प्यार करते हैं न? कोई भी सिर्फ तुमको देख के यह बोल सकता है! काश! कोई मुझे भी ऐसे ही प्यार करता!"

"अरे! ऐसे क्यों बोलती है? हम सब लोग तुमको इतना प्यार करते हैं।"

"हाँ वह तो है। दीदी, जब तुमने शादी करी थी तो मुझे खूब जलन हुई थी, और दुःख भी।"

"जलन? वह क्यूँ?"

"तुमको मैं इतना प्यार करती हूँ - इसलिए यह सोच कर जल गयी की तुम मुझसे ज्यादा भी किसी को प्यार करती हो। दुःख इसलिए की तुम अब हमारी नहीं रही।" प्रियंका ने बोला। "लेकिन मैं बहुत खुश हूँ की तुमको इतना प्यार करने वाला हस्बैंड मिला है। सच ही है, अच्छे लोगो को अच्छे लोग ही मिलते हैं।"

"अरे प्रिया! तुम तो पूरी फिलोसोफ़र हो गयी हो! तू चिंता न कर, तुमको भी बहुत प्यार करने वाला हस्बैंड मिलेगा - मैं ढूंढ ले लाऊंगी!"

"जीजू मेरे बारे में क्या सोचते हैं?" प्रियंका ने अचानक ही पूछ लिया।

"तुमको मेरी छोटी बहन जैसा मानता है।" पल्लवी ने अचानक ही शैतानी मुस्कराहट के साथ कहा, "लेकिन मुझे लगता है की कुछ चल रहा है उसके दिमाग में....."

"हैं? वह क्या?" प्रियंका ने उत्सुकतावश पूछा।

"वह तुम्हारी तरफ आकर्षित है। आखिर तुम ही तो उसकी एकलौती साली हो, और साली आधी घरवाली होती है" पल्लवी ने आँख मारते हुए बोला।

"क्या??? सच में?" प्रियंका के चेहरे पर चौंकाने वाला भाव था।

"सच में। और तुम, मेरी छोटी बहन, तुम भी रूद्र को मन ही मन चाहती हो।"

प्रियंका अब और भी ज्यादा चौंक गयी, "न्न्न्नहीं .... ऐसा नहीं है दीदी।"

"हाँ! ऐसा ही है। मैंने देखा है, जिस तरह से तुम रूद्र को देखती हो - सब पता चलता है। बट डोन्ट वर्री, आई ऍम नॉट एंग्री। यह तो एकदम नेचुरल है - आखिरकार रूद्र तुमसे कितने प्यार और इज्ज़त से पेश आता है। और सबसे बड़ी बात यह, की तुमने रूद्र को नेकेड देखा है!"

"हाँ ... तो?"

"तुमने अभी अभी जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा है - और तुम्हारे हर्मोन एकदम पीक पर हैं। इट इस नेचुरल की तुम उस आदमी के लिए ललायित होगी जिसको तुमने नंगा और वह भी एक सेक्सुअल एक्ट में देखा।"

"फाइन फाइन!" प्रियंका ने गहरी सांस ली। "इस बात को इतना खीचने की ज़रुरत नहीं।" थोडा रुक कर प्रियंका ने कहा, "दीदी, आपसे एक बात पूछूं?"

"हाँ, पूछ न?"

"आपने किसी लड़की को किस किया है?"

"नहीं यार! कभी सोचा नहीं। तुमने किया है? और ये लड़कियों के किस करने वाली बात कहाँ से आ गयी?"

"बात यहाँ से आ गयी की मैंने लड़कियों के साथ किसिंग से ज्यादा किया है, पल्लो रानी!" प्रियंका ने हँसते हुए कहा।

"तू मज़ाक कर रही है न? शिट! यू आर सीरियस! कब?"

"कालेज में! अबे! मुझे ऐसे मत देखो जैसे की मेरे सर पर सींग आ गए हैं।"

"आई कांट अंडरस्टैंड! व्हाई? जस्ट गिव मी अ मिनट!" पल्लवी समझ नहीं पा रही थी की क्या बोले! उसको थोड़ी जुगुप्सा सी हो रही थी। "ओके! सो, यु हैव किस्ड गर्ल्स। व्हाट एल्स?"

"एवरीथिंग! एक लड़की के साथ जितना कर सकते हैं उतना सब किया है।"

"शिट प्रिया! आई कांट बिलीव इट!" पल्लवी एकदम से उत्सुक हो गयी, "हाउ वास दैट?"

"उम्म्म.... सेन्सुअल। स्वीट। सॉफ्ट! अमेजिंग!"

"रियली!? वास दैट नॉट वीयर्ड?"

"नो वे! दिस इस व्हाट आई एम!

".... ए लेस्बियन?"

"नहीं! मुझे लड़को में भी इन्टरेस्ट है। मोर टू चूज़ फ्रॉम!" प्रियंका ने मुस्कुराते हुए कहा।

"दीदी, वुड यु लाइक मी टू किस यू?" प्रियंका ने थोडा सोच कर बोला।

"वेल!" पल्लवी को समझ नहीं आया की क्या जवाब दे। 'लड़की को किस करना? इंटरेस्टिंग!' "इफ यु वांट टू किस मी, देन आई थिंक आई कैन आल्सो।"

"विल यू? ह्म्म्म्म! वेल, आई वांट टू ट्राई! ओके! हिअर इट गोस ..."

 
प्रियंका ने अपना चेहरा पल्लवी के चेहरे के पास लाया। पल्लवी की आँखें प्रियंका के होंठो पर लगी हुई थीं। पल्लवी ने कभी कही सोचा था की उसके साथ ऐसा भी कुछ होगा। आज का दिन बहुत रोचक साबित हो रहा था। प्रियंका ने झुक कर अपने होंठ पल्लवी के होंठो से सटा दिए ..... "ओह! कितने सॉफ्ट हैं!"

प्रियंका नहीं चाहती थी की पल्लवी इस नए अनुभव से डर या घबरा जाए, इसलिए उसने पल्लवी के होंठों पर हलके जोर के साथ चुम्बन जड़ दिए। जब उसने देखा की पल्लवी बुरा नहीं मान रही है और सचमुच इस चुम्बन में साथ दे रही है, तो उसने थोडा नया करने का सोचा। अब उसके चुम्बन में थोड़ी तेज़ी और जोश आ गया था। उसने अब पल्लवी को एक हलके आलिंगन में बांध लिया था और पूरी तन्मयता के साथ उसको चूमना शुरू कर दिया था। प्रियंका ने पल्लवी के दोनों गाल अपने हाथो से थोडा दबा दिए, जिसके कारण पल्लवी के होंठ खुल गए। इसी क्षण प्रियंका ने अपनी जीभ पल्लवी के मुह के अन्दर डाल डाल कर चूसना शुरू कर दिया।

पल्लवी का दिमाग चकरा गया। 'प्रियंका की किस में तो आदमियों जैसी किस जैसा एहसास है! लेकिन फिर भी कितना अलग! 'अरे! ये तो मेरे ब्रेस्ट्स छू रही है!'

प्रियंका का हाथ पल्लवी की टी-शर्ट के ऊपर से उसके स्तनों पर आ टिका था, लेकिन वह उसके स्तन को सिर्फ छू रही थी। पल्लवी आश्चर्यचकित हो गई, उसने तुरंत आँख खोल कर देखा - प्रियंका अपनी आँखें बंद किये इस काम में पूरी तरह मगन लग रही थी। उसने महसूस किया की प्रियंका थोडा ठिठक रही है, शायद वह उसकी रेस्पेक्ट करती है इसलिए बहुत आगे बढ़ना नहीं चाहती। लेकिन पल्लवी, जो आज हर्मोन की अति-सक्रियता के प्रभाव में थी, इस नए अनुभव का आनंद उठा ही लेना चाहती थी। उसने अपने स्तन को आगे की ओर ठेल दिया, जिसके कारण उसका स्तन प्रियंका के हाथ में आ गया।

प्रियंका को यह इशारा समझ आ गया और उसने खुश होकर उसके स्तन को मसलना चालू कर दिया। चुम्बन की प्रबलता अब तीव्र हो चली थी और दोनों लड़कियों की साँसे भी। प्रियंका के दोनों हाथ अब पल्लवी के टी-शर्ट के अन्दर जा कर उसकी ब्रा के झीने वस्त्र में गिरफ्त स्तनों का मर्दन कर रहे थे। पल्लवी के स्तनाग्र अब तक किये गए चुम्बन, चूषण, इत्यादि के कारण काफी संवेदनशील हो गए थे, और यह नया नया प्रहार उसको असहज कर रहा था।

"उतार दो ....." हाँफते हुए पल्लवी के मुख से बस यही दो शब्द निकले।

प्रियंका पल्लवी से बस इतनी ही अलग हुई जिसमे वह उसकी टी-शर्ट को उतार कर अलग कर सके। ऊपरी वस्त्र को उतारने के बाद वह पुनः पल्लवी को चूमने लग गयी। साथ ही साथ उसकी ब्रा का हुक भी खोलने लग गयी। 'हियर इट गोस! प्रियंका इस द थर्ड पर्सन तो सी माई ब्रेस्ट्स नेकेड!' पल्लवी को ऐसे मदमत्त अनुभव में भी यह विचार आया। पल्लवी के स्तन अब स्वतंत्र हो चले थे। प्रियंका ने इस दृश्य से अपनी आँखे थोड़ी देर तक सिंचाई करी, और फिर उसके स्तनाग्र को अपने मुह में भर कर चूसना आरम्भ कर दिया। मर्दन के कारण वो पहले ही उर्ध्व हो गए थे, लेकिन इस चूषण से अब वो कड़े भी हो गए।

"ओह पल्लो! मेरा कितना मन था इनको देखने का! मुझे मालूम था की ये बहुत सुन्दर होंगे! थैंक यू फॉर शोइंग थेम टू मी।" इतना कह कर वह पुनः चूसने में लग गयी।

पल्लवी का दिल धाड़ धाड़ करके धड़क रहा था। 'ऐसा एक्साईटमेन्ट!' पल्लवी की जांघ अनायास ही प्रियंका की योनि-क्षेत्र से लग कर आगे-पीछे हो रही थी। प्रियंका के चेहरे पर स्पष्ट भाव थे की उसको यह पसंद आ रहा था। "

ओह! वाऊ! प्लीज़ डोंट स्टॉप!" प्रियंका ने भारी सांस भरते हुए बोला। पल्लवी ने अब तेज़ी से घर्षण प्रारंभ कर दिया। लड़कियों की चुम्बन-क्रीड़ा पुनः आरम्भ हो गयी थी। प्रियंका के हाथ पल्लवी के सारे शरीर पर फिरने लगे थे। कभी वो उसके स्तन दबाते, तो कभी उसके नितम्ब पीसते तो कभी उसकी पीठ। और ऐसे करते हुए प्रियंका पल्लवी की जांघ पर मस्त होकर झूलती और सिसकती जा रही थी। जो आग प्रियंका ने लगाई थी, उसी आग में वह तेज़ी से जलने लगी और कुछ ही देर में राख हो गयी।

पल्लवी ने अपनी जांघ का घर्षण तब तक नहीं रोक जब तक प्रियंका खुद ही निढाल होकर पल्लवी के बगल ही न गिर गयी। उसका शरीर चरमोत्कर्ष के आनंद के विस्फोट से अभी भी थरथरा रहा था।

"ओह गॉड! डिड दैट सीरिअसली जस्ट हैपन?" प्रियंका ने कांपती आवाज़ में कहा।

"यस! इट डिड! यू केम?"

"ऑफ़ कोर्स! डिड यू? हियर! लेट मी गिव यू सम प्लेज़र" ऐसा कहते हुए प्रियंका संयत होकर उठी और पल्लवी की स्कर्ट के बटन खोलने लगी।

"आज तुम मुझे पूरा नंगा देखने के मूड में हो क्या?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए पूछा।

"हाँ! मुझसे दूर जाने की सज़ा है यह! मैं आपको पूरा नंगा भी देखूँगी और आपके साथ वह सब करूंगी जो जीजू करते हैं।" इस समय प्रियंका पल्लवी की स्कर्ट और चड्ढी दोनों एक साथ ही नीचे सरका रही थी।

.............

पल्लवी प्रियंका के सामने नग्न पड़ी हुई थी, और अपने शरीर का कोई हिस्सा छुपाने का यत्न नहीं कर रही थी। कदाचित, वह यह चाहती थी की प्रियंका उसकी सुन्दरता के रसभरे दृश्य से सराबोर हो जाए। प्रियंका ने बहुत सावधानीपूर्वक अपनी तर्जनी को पल्लवी की योनि की दरार पर फिराया और फिर उसको अपने हाथ से ढक लिया।

पल्लवी की योनि से रस निकल रहा था - उसकी चिकनाई में डूबी प्रियंका की पतली तर्जनी आसानी से पल्लवी की योनि में प्रविष्ट हो गयी। पल्लवी के गले से हल्की हुंकार निकलने लगी थी और उसके पाँव और खुल गए थे। प्रियंका की तर्जनी पल्लवी की योनि की गहराई खोजने में व्यस्त थी। उसने अब अपनी मध्यमा उंगली भी पल्लवी की योनि में डाल दी। अब वह अपने अंगूठे से पल्लवी के भाग-नासे को मसलना और तर्जनी और मध्यमा से योनि मर्दन करना आरम्भ कर दिया था। करीब 2 मिनट चलने वाले खेल के बाद पल्लवी भी गहरी गहरी साँसे लेकर आहें भरने लगी।

दोनों लड़कियां एक दुसरे की बाहों में थोड़ी देर यूँ ही चुपचाप लेती रहीं। प्रियंका पल्लवी को प्यार से सहला रही थी, "दीदी, आई लव यू सो मच! आई ऍम सो हैप्पी टू बी एबल तो गिव यू सम हैप्पीनेस! एंड आई आल्सो वांट टू थैंक यू फॉर शोइंग योरसेल्फ! यू आर सो ब्यूटीफुल! जीजू इस सो लकी दैट ही फाउंड एन अमेजिंग पर्सन लाइक यू!"

पल्लवी अपनी बढाई सुन कर प्रसन्न हो गयी। तभी उसको याद आया की इस पूरे प्रकरण में प्रियंका के शरीर का एक धागा भी नहीं उतरा और वो तो खुद पूरी नंगी हो गयी।

"प्रिया, ये ठीक बात नहीं है। मैं तो पूरी नेकेड हूँ, लेकिन तुम तो पूरे कपडे पहने हो?"

"आपके जैसा तो कुछ भी नहीं है मेरे पास। लेकिन आप सही बोल रही हैं - इट इस ओन्ली फेयर दैट आई आल्सो स्ट्रिप!" कहते हुए उसने अपनी शर्ट का बटन खोलना शुरू कर दिया। उधर पल्लवी उसकी जीन्स को ढीला करने लगी। कुछ ही क्षणों में प्रियंका सिर्फ शमीज़ और चड्ढी में रह गयी। पल्लवी ने उसकी शमीज़ के दामन को पकड़ कर उसके सर से होते हुए उतार फेंका।

सामने जो कुछ था उसने पल्लवी को अपने 3-4 साल पहले के शरीर की याद दिला दी। पल्लवी का शरीर की बनावट हल्की काठी की थी - इसलिए काफी लोग उसको "पतली" की श्रेणी में रखने की भूल करते थे। उसका शरीर इतना माँसल था की जिसके कारण पसलियों का अनावश्यक प्रदर्शन नहीं होता था। शरीर का रंग गोरा था। उसके स्तन छोटे थे, लेकिन बहुत छोटे नहीं। वस्तुतः सम्मुख से देखने पर उसके स्तन गोल दीखते थे और उनके मध्य में ही गहरे भूरे रंग के वृत्ताकार क्षेत्रिकाएं, जिनका व्यास करीब 2 इंच होगा, उसी रंग के स्तानाग्रो को घेरे हुए थीं। किन्तु उसके स्तनों में वैसा उभार नहीं था जिसके लिए पुरुष-वर्ग लार टपकाता रहता है। उसकी नितम्ब, कमर के व्यास से बहुत अधिक नहीं थी, जिस कारण से वह "पतली" लगती थी।

पल्लवी ने उसके स्तन को छुआ। प्रियंका के वक्षाग्र मानो इसी पल की प्रतीक्षा में थे - और झट से 'सावधान' मुद्रा में खड़े हो गए। "तूने किसी लड़के के साथ सेक्स किया है क्या?"

"नहीं दीदी! लेकिन ऐसा नहीं है की मुझे लडको में कोई रूचि ही नहीं है। बस, ये समझ लो की मुझे वैसा भाव नहीं मिल पाता, जितना 'भरी' हुई लड़कियों को मिलता है।"

"ह्म्म्म ... इसीलिए तूने यह तरीका निकाल लिया?"

"नहीं नहीं दीदी, मुझे तो लडकियाँ भी तो पसंद आती हैं। शायद मैं बाई-सेक्सुअल हूँ।"

ये सब बाते करते हुए पल्लवी के दिमाग में एक पागलपन भरा ख़याल आया - 'क्यों न प्रियंका का रूद्र के साथ समागम करवा दिया जाए?' पल्लवी जितना भी इस विषय पर विचार करती, उसको यह और भी पसंद आता गया।

उसने प्रियंका के वक्ष से खिलवाड़ करते हुए कहा, "तू रूद्र के साथ सेक्स करेगी?"

"व्हाट! यू डोन्ट मीन?" प्रियंका अवाक् रह गयी।

"दैट्स एक्सैक्ट्ली व्हाट आई मीन।" पल्लवी ने एक शैतानी भरी मुस्कान के साथ कहा।

"जीजू कभी नहीं मानेंगे"

"तुम सही कह रही हो" पल्लवी के विचारों में आज सुबह की बाते आ गयी, "कभी कभी मैं सोचती हूँ की काश, वह इतना मोनोगैमस न होता।"

"हाँ! अच्छा है। और तुम यह बात अपने दिमाग से निकाल दो। ये बात सच है की मुझे जीजू बहुत पसंद हैं - अपने लिए मुझे शायद उनके जैसा ही कोई चाहिए। और आपकी यह बात भी सही है की मुझको उनकी चाह भी है, लेकिन अगर हम दोनों के बीच ऐसा कुछ हुआ तो मुझे डर है की आप दोनों के बीच में दरार आ जाएगी। और मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी"

"दरार! बिलकुल भी नहीं। और वह इसलिए क्योंकि यह सिर्फ एक बार होगा, जिससे तुमको असली सेक्स का मज़ा मिल सके। और मुझे तो इस बात पर कोई परेशानी नहीं है।"

"हो सकता है की यह न हो। लेकिन फिर भी, जीजू यह काम नहीं करेंगे।"

"ह्म्म्म ... इसीलिए यह काम अचानक से करना पड़ेगा। वह कुछ बोल भी पाए उससे पहले ही।"

............
 
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