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जीवन का सुख
माला सुबह उठने ही वाली थी, की उसको अपने बेटी और दामाद के कमरे से दबी हुई आवाजें सुनाई दी। हल्की सिसकियों, हंसी, चुम्बन लेने और लयबद्ध तरह से बिस्तर के चरमराने की आवाजें। माला समझ गयी की अन्दर क्या चल रहा है। लेकिन उसको यह सोच के अचरज हुआ की दोनों इस रात कम से कम तीसरी बार काम-क्रीडा कर रहे थे।
उसने अपने पूरे जीवन में एक पूरे दिन में दो बार से ज्यादा कभी सम्भोग नहीं किया था, और वह था उसके हनीमून के दौरान। उसके बालपन के दिनों में सम्भोग को लेकर इतनी वर्जनाये थी की विवाह के बहुत दिनों बाद भी माला यौन-क्रिया को सिर्फ संतानोत्पत्ति हेतु एक आवश्यक कार्य समझती रही। लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी विचारधारा में थोडा थोडा अंतर आने लग गया था। सम्भवतः नए शहर में नए दोस्तों के साथ ने कुछ उपकार कर दिया था। लेकिन बढ़ती उम्र और पति की व्यस्तता के चलते यौन-क्रिया के संभावित "मजे" की वो सिर्फ कल्पना ही कर सकती थी।
शिष्टता और संकोच के मारे वो अपने बिस्तर पर ही लेटी रही की जब तक वो दोनों शान्त न हो जाएँ। लेकिन उसको अपनी बेटी के लिए ख़ुशी हुई की उसको ऐसा पति मिला, जो उसको इतना आनन्द दे सकता था। लेकिन ऐसा सोचते हुए उसको थोड़ी लज्जा भी आई। फिर उसका ध्यान उस दिन को चला गया जब उसकी बेटी पल्लवी ने बताया की वो रूद्र से शादी करना चाहती है। शादी? अभी 20 की भी तो नहीं हुई थी वो! इतनी जल्दी! और पढाई लिखाई का क्या?
पल्लवी आई आई टी में पढ़ रही थी - तीसरे वर्ष में। रूद्र और पल्लवी दोनों साथ पढ़ते थे और एक दुसरे से बहुत प्रेम करते थे। और रूद्र चाहता था की उसकी विवाहयोग्य 21 की उम्र होते ही वो पल्लवी को अपना बना ले। रूद्र का आई आई टी में चौथा वर्ष चल रहा था और स्नातक होने के बाद वो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बटाना चाहता था। ऐसे रिश्ते को मन करना लगभग असंभव था। "चट मंगनी चट ब्याह" का एक उम्दा उदाहरण थी पल्लवी और रूद्र की शादी।
20-21 की उम्र - शायद तभी इतनी उर्जा है.... ऐसा सोचते ही माला मुस्कुरा उठी। माला ने 24 की उम्र में शादी की थी। उसके पति विराट 27 के थे तब। जैसा की ज्यादातर नव-विवाहितों के साथ होता है, माला विवाह के एक वर्ष में ही माँ बन गयी। उसके बाद बच्चे को पालने और घर सम्हालने की व्यस्तता में यौन क्रिया क्रमशः कम होती गयी।
लेकिन चार महीने पहले बेटी की विदाई के बाद न जाने क्यूँ विराट का मूड बन गया और उन्होंने देर तक रति क्रिया की। बेटी की विदाई का वियोग भूल गयी माला उस दिन। वैसा आनन्द कभी नहीं मिला था उसको। विराट की बाँहों में झूलते हुए उनके कड़े लिंग का अपने अन्दर आने जाने का एहसास... यह सब अभी भी याद था माला को।
बगल के कमरे में चलते सम्भोग, उससे होने वाली आवाजें और "उस" दिन की याद माला के मन पे असर करने लगीं। लिप्सा ने उसको धर दबोचा... काश विराट यहाँ होते! "उस" दिन की याद ने एक सिहरन सी फैला दी। वो बिस्तर से उठ के अपने श्रृंगार-दान के सामने आ कर कड़ी हो गयी और फिर उसने वो किया जो काम उसने कम से कम एक वर्ष में नहीं किया।
उसने अपनी नाइटी उतार दी और चड्ढी भी - और खुद को आदमकद आईने के सामने पूर्ण-नग्न देखा। 45 की उम्र के लिए वो अभी भी अच्छी दिखती थी। उसने अपने स्तनों को हलके से दबाया - वो अभी भी पुष्ट थे। विराट उसके स्तनों का उपभोग नहीं करते थे - बस स्तानाग्रों का हल्का सा मसलना और कभी कभी थोडा सा चूस लेना। इतना ही ध्यान मिलता था माला के स्तनों को। पल्लवी ने भी सिर्फ दो महीने ही उसका दूध पिया था, इसलिए उनके आकार में जो भी परिवर्तन आया था वो सिर्फ उम्र के ढलने से आया था। नए दोस्तों के साथ जिम जाकर व्यायाम करने से शरीर की स्थूलता कम हो गयी थी।
अचानक ही उसको यह अहसास हुआ की उसका हाथ उसकी योनि पर जाकर ठहर गया है और उसकी उंगलियाँ वहां से निकलती हुई योनि-रस पर फिसलने लगी। "हे भगवन! ये क्या कर रही हूँ मैं?" उसने अपना हाथ झटके से हटा लिया और जल्दी से जाकर बिस्तर पे लेट गयी। ....नंगी।
मन अशांत हो गया... नहीं, कामातुर।
उसने चुपचाप लेते रहने की कोशिश करी, लेकिन जैसे ही उसका ध्यान अपने काम-रत बेटी और दामाद पर गया, उसका हाथ पुनः उसकी योनि पर जा पंहुचा। इस बार उसने हार मान ली। अपनी आँखें बंद कर उसने अपने भगनासे को सहलाना प्रारंभ कर दिया - मन ही मन में अपने पति का कामोत्तेजित लिंग सोचते हुए। उंगली की गति अनियंत्रित होती जा रही थी और माला के गले से दबी घुटी सिस्कारियां निकल रही थी - साथ ही पूरा शरीर उत्तेजना से कांपने लग गया था।
उसका कामोन्माद जल्दी ही समाप्त हो गया। "ऐसा आनंद तो पहले कभी नहीं आया", उसने सोचा।
"ओह भगवान! यह सब क्या है? सुबह सुबह तो मन साफ रहना चाहिए। और मैं अपने बुढापे में ऐसे काम कर रही हूँ जो कोई औरत नहीं करती।"
उसने अपनी सांसो को संयत किया। बगल के कमरे से आवाजें आनी बंद हो गयी थी। उसने घडी पर नज़र डाली - "हे भगवान! एक घंटा हो गया! समय का पता ही नहीं चला।"
"अब बाहर निकलना चाहिए - शायद बच्चे सो गए होंगे।"
माला ने जल्दी से अपनी नाइटी पहनी और बहुत धीरे से अपना दरवाज़ा खोलकर दबे पाँव बाहर निकल आई।
पल्लवी का कमरा माला के कमरे से बाहर निकलने के साथ ही था। "अरे! इनके कमरे का तो दरवाज़ा खुला हुआ है!" माला दरवाज़ा बंद करने को आगे बढ़ी, लेकिन अन्दर का नज़ारा देख के उसकी आँखे फटी की फटी रह गयीं।
पल्लवी और रूद्र पूर्णतः नग्न अवस्था में आलिंगनबद्ध होकर सो रहे थे - उस मुद्रा में जिसमे वो शायद रति-क्रिया के बाद आराम करते हुए सो गए होंगे। रूद्र थोडा नीचे था और पल्लवी की तरफ करवट करके लेता हुआ था। उसका बायाँ पाँव पल्लवी के ऊपर था, और इस कारण उसका लिंग स्पष्ट दिख रहा था।
शिश्नग्रछ्छद के पीछे खिसक जाने के कारण लिंग के आगे का गुलाबी हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था। लिंग अभी मुरझाया हुआ था, किन्तु फिर भी उसकी लम्बाई सामान्य से अधिक ही प्रतीत हो रही थी। उसके वृषण हलके भूरे रंग के थे - थोड़ी सी लालिमा लिए हुए, और आकर में वो भी बड़े लग रहे थे।
"कितना सुन्दर है..." इस ख्याल से माला थोडा शरमा गयी और शर्म के मारे उसने नज़र हटा ली, लेकिन अब सामने पल्लवी थी।
पल्लवी पीठ के बल लेती हुई थी और उसकी सारी सुन्दरता प्रदर्शित हो रही थी। पल्लवी देखने में माला का ही प्रतिरूप दिखती थी - ठीक वैसे ही जब वो जवान थी। सुन्दर भोला चेहरा, भरे होंट और मादक आँखें। उसका शरीर एकदम फिट था, इसलिए कपडे के ऊपर से देखने पर भी बहुत आकर्षक लगती थी।
स्तन अभी भी छोटे थे और उन पर गहरे लाल-भूरे रंग के आकर्षक स्तनाग्र थे। सुन्दर, स्वस्थ और पतली बाहें... उसका पेट बिलकुल सपाट था। योनि के हिस्से में कोई बाल नहीं थे। "ऐसा कैसे हो सकता है? इस उम्र में मेरे तो काफी बाल हो गए थे।", माला ने सोचा।
पल्लवी के पाँव थोडा खुले हुए थे, जिस कारण उसकी योनि का द्वार थोडा खुल गया था और वहां से अभी अभी संपन्न हुई रति-क्रीडा का रस निकल रहा था। मादक दृश्य!
अब माला उन दोनों को एक साथ देख रही थी - "सुन्दर और आकर्षक जोड़ा। दोनों ही कितना हँसते हैं। जब ये दोनों घर में होते हैं तो आनंद आ जाता है। बच्चों के जैसे झगड़ते हैं - लेकिन उस झगडे में निहित प्रेम मैं खूब जानती हूँ।"
"नंगे होने पर तो ये दोनों और भी सुन्दर लगते हैं - जैसे की ग्रीक सभ्यता वाली मूर्तियाँ! रूद्र भी तो कितना अच्छा है... उतना ही सुन्दर दिखता भी है... कसरती देह... इसका लिंग पूरा उत्तेजित होने पर कैसा दिखता होगा!?" ये ख्याल आते ही माला ने अपना सर झटका, "अपनी ही बेटी के पति के लिए ऐसी सोच?"और धीरे से दरवाज़ा बंद करके बाहर आ गयी।
माला सीधा ड्राइंग रूम में पहुची, और अपने आप को संयत करने के लिए "संस्कार" चैनल लगा कर भजन सुनने लगी। कुछ देर भजन सुनने के बाद उसका मन थोडा शान्त हुआ तो चाय बनाने के लिए रसोई में आ गई। अभी उसने चाय का बर्तन गैस पर रखा ही था की पल्लवी अपने कमरे से अंगड़ाई लेती हुई बहार आई।
उसने एक छोटा और झीना सा हलके सफ़ेद रंग का टी-शर्ट पहना हुआ था और हलके गुलाबी रंग का छोटा सा निकर। दोनों ही कपड़े उसपर बहुत भा रहे थे, जैसे की वो कोई गुडिया हो। सफ़ेद रंग का झीना कपडा होने से, पल्लवी के शरीर की आकर्षकता थोडा छन छन के आ रही थी - लेकिन फिर भी कोई भी उसके स्तनाग्र आसानी से देख सकता था।
पास आते ही पल्लवी उससे लिपट गई। "माँ, आई लव यू।"
माला मन ही मन मुस्कुराई, "सम्भोग क्रिया के बाद लड़कियां कितना निखर जाती हैं!"
"आई लव यू टू बेटा... चाय पियोगी?"
"हां"...
"माँ, आपसे एक बात पूछूं?"
"बोलो बेटा"
"हमारे रूम का दरवाज़ा आपने बंद किया था न?"
"..."
"बोलिए ना"
"हाँ.. फिर?"
"इसका मतलब आपने हम दोनों को नंगा देखा?" पल्लवी ने बनावटी अवमानना के साथ बोला।
माला हिचकते हुए "हाँ...", फिर संयत होते हुए, "लेकिन तुम लोग तो मेरे बच्चे हो। मेरे सामने नंगे हुए तो क्या हो गया?"
"वैसे एक बात बताऊँ?"
"हाँ माँ"
"तुम दोनों खूब सुन्दर दिखते हो। मेरा मन हुआ की तुम दोनों को बस देखती ही रहूँ। हे भगवान! मेरे दोनों बच्चो को लगता है मेरी ही नज़र लग जाएगी।"
पल्लवी यह सुन कर ख़ुशी में माँ से लिपटते हुए बोली, "माँ, यू आर द बेस्ट" और उसने जोर से माला के होंठों पर चुम्बन दिया।
माला सुबह उठने ही वाली थी, की उसको अपने बेटी और दामाद के कमरे से दबी हुई आवाजें सुनाई दी। हल्की सिसकियों, हंसी, चुम्बन लेने और लयबद्ध तरह से बिस्तर के चरमराने की आवाजें। माला समझ गयी की अन्दर क्या चल रहा है। लेकिन उसको यह सोच के अचरज हुआ की दोनों इस रात कम से कम तीसरी बार काम-क्रीडा कर रहे थे।
उसने अपने पूरे जीवन में एक पूरे दिन में दो बार से ज्यादा कभी सम्भोग नहीं किया था, और वह था उसके हनीमून के दौरान। उसके बालपन के दिनों में सम्भोग को लेकर इतनी वर्जनाये थी की विवाह के बहुत दिनों बाद भी माला यौन-क्रिया को सिर्फ संतानोत्पत्ति हेतु एक आवश्यक कार्य समझती रही। लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी विचारधारा में थोडा थोडा अंतर आने लग गया था। सम्भवतः नए शहर में नए दोस्तों के साथ ने कुछ उपकार कर दिया था। लेकिन बढ़ती उम्र और पति की व्यस्तता के चलते यौन-क्रिया के संभावित "मजे" की वो सिर्फ कल्पना ही कर सकती थी।
शिष्टता और संकोच के मारे वो अपने बिस्तर पर ही लेटी रही की जब तक वो दोनों शान्त न हो जाएँ। लेकिन उसको अपनी बेटी के लिए ख़ुशी हुई की उसको ऐसा पति मिला, जो उसको इतना आनन्द दे सकता था। लेकिन ऐसा सोचते हुए उसको थोड़ी लज्जा भी आई। फिर उसका ध्यान उस दिन को चला गया जब उसकी बेटी पल्लवी ने बताया की वो रूद्र से शादी करना चाहती है। शादी? अभी 20 की भी तो नहीं हुई थी वो! इतनी जल्दी! और पढाई लिखाई का क्या?
पल्लवी आई आई टी में पढ़ रही थी - तीसरे वर्ष में। रूद्र और पल्लवी दोनों साथ पढ़ते थे और एक दुसरे से बहुत प्रेम करते थे। और रूद्र चाहता था की उसकी विवाहयोग्य 21 की उम्र होते ही वो पल्लवी को अपना बना ले। रूद्र का आई आई टी में चौथा वर्ष चल रहा था और स्नातक होने के बाद वो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बटाना चाहता था। ऐसे रिश्ते को मन करना लगभग असंभव था। "चट मंगनी चट ब्याह" का एक उम्दा उदाहरण थी पल्लवी और रूद्र की शादी।
20-21 की उम्र - शायद तभी इतनी उर्जा है.... ऐसा सोचते ही माला मुस्कुरा उठी। माला ने 24 की उम्र में शादी की थी। उसके पति विराट 27 के थे तब। जैसा की ज्यादातर नव-विवाहितों के साथ होता है, माला विवाह के एक वर्ष में ही माँ बन गयी। उसके बाद बच्चे को पालने और घर सम्हालने की व्यस्तता में यौन क्रिया क्रमशः कम होती गयी।
लेकिन चार महीने पहले बेटी की विदाई के बाद न जाने क्यूँ विराट का मूड बन गया और उन्होंने देर तक रति क्रिया की। बेटी की विदाई का वियोग भूल गयी माला उस दिन। वैसा आनन्द कभी नहीं मिला था उसको। विराट की बाँहों में झूलते हुए उनके कड़े लिंग का अपने अन्दर आने जाने का एहसास... यह सब अभी भी याद था माला को।
बगल के कमरे में चलते सम्भोग, उससे होने वाली आवाजें और "उस" दिन की याद माला के मन पे असर करने लगीं। लिप्सा ने उसको धर दबोचा... काश विराट यहाँ होते! "उस" दिन की याद ने एक सिहरन सी फैला दी। वो बिस्तर से उठ के अपने श्रृंगार-दान के सामने आ कर कड़ी हो गयी और फिर उसने वो किया जो काम उसने कम से कम एक वर्ष में नहीं किया।
उसने अपनी नाइटी उतार दी और चड्ढी भी - और खुद को आदमकद आईने के सामने पूर्ण-नग्न देखा। 45 की उम्र के लिए वो अभी भी अच्छी दिखती थी। उसने अपने स्तनों को हलके से दबाया - वो अभी भी पुष्ट थे। विराट उसके स्तनों का उपभोग नहीं करते थे - बस स्तानाग्रों का हल्का सा मसलना और कभी कभी थोडा सा चूस लेना। इतना ही ध्यान मिलता था माला के स्तनों को। पल्लवी ने भी सिर्फ दो महीने ही उसका दूध पिया था, इसलिए उनके आकार में जो भी परिवर्तन आया था वो सिर्फ उम्र के ढलने से आया था। नए दोस्तों के साथ जिम जाकर व्यायाम करने से शरीर की स्थूलता कम हो गयी थी।
अचानक ही उसको यह अहसास हुआ की उसका हाथ उसकी योनि पर जाकर ठहर गया है और उसकी उंगलियाँ वहां से निकलती हुई योनि-रस पर फिसलने लगी। "हे भगवन! ये क्या कर रही हूँ मैं?" उसने अपना हाथ झटके से हटा लिया और जल्दी से जाकर बिस्तर पे लेट गयी। ....नंगी।
मन अशांत हो गया... नहीं, कामातुर।
उसने चुपचाप लेते रहने की कोशिश करी, लेकिन जैसे ही उसका ध्यान अपने काम-रत बेटी और दामाद पर गया, उसका हाथ पुनः उसकी योनि पर जा पंहुचा। इस बार उसने हार मान ली। अपनी आँखें बंद कर उसने अपने भगनासे को सहलाना प्रारंभ कर दिया - मन ही मन में अपने पति का कामोत्तेजित लिंग सोचते हुए। उंगली की गति अनियंत्रित होती जा रही थी और माला के गले से दबी घुटी सिस्कारियां निकल रही थी - साथ ही पूरा शरीर उत्तेजना से कांपने लग गया था।
उसका कामोन्माद जल्दी ही समाप्त हो गया। "ऐसा आनंद तो पहले कभी नहीं आया", उसने सोचा।
"ओह भगवान! यह सब क्या है? सुबह सुबह तो मन साफ रहना चाहिए। और मैं अपने बुढापे में ऐसे काम कर रही हूँ जो कोई औरत नहीं करती।"
उसने अपनी सांसो को संयत किया। बगल के कमरे से आवाजें आनी बंद हो गयी थी। उसने घडी पर नज़र डाली - "हे भगवान! एक घंटा हो गया! समय का पता ही नहीं चला।"
"अब बाहर निकलना चाहिए - शायद बच्चे सो गए होंगे।"
माला ने जल्दी से अपनी नाइटी पहनी और बहुत धीरे से अपना दरवाज़ा खोलकर दबे पाँव बाहर निकल आई।
पल्लवी का कमरा माला के कमरे से बाहर निकलने के साथ ही था। "अरे! इनके कमरे का तो दरवाज़ा खुला हुआ है!" माला दरवाज़ा बंद करने को आगे बढ़ी, लेकिन अन्दर का नज़ारा देख के उसकी आँखे फटी की फटी रह गयीं।
पल्लवी और रूद्र पूर्णतः नग्न अवस्था में आलिंगनबद्ध होकर सो रहे थे - उस मुद्रा में जिसमे वो शायद रति-क्रिया के बाद आराम करते हुए सो गए होंगे। रूद्र थोडा नीचे था और पल्लवी की तरफ करवट करके लेता हुआ था। उसका बायाँ पाँव पल्लवी के ऊपर था, और इस कारण उसका लिंग स्पष्ट दिख रहा था।
शिश्नग्रछ्छद के पीछे खिसक जाने के कारण लिंग के आगे का गुलाबी हिस्सा साफ दिखाई दे रहा था। लिंग अभी मुरझाया हुआ था, किन्तु फिर भी उसकी लम्बाई सामान्य से अधिक ही प्रतीत हो रही थी। उसके वृषण हलके भूरे रंग के थे - थोड़ी सी लालिमा लिए हुए, और आकर में वो भी बड़े लग रहे थे।
"कितना सुन्दर है..." इस ख्याल से माला थोडा शरमा गयी और शर्म के मारे उसने नज़र हटा ली, लेकिन अब सामने पल्लवी थी।
पल्लवी पीठ के बल लेती हुई थी और उसकी सारी सुन्दरता प्रदर्शित हो रही थी। पल्लवी देखने में माला का ही प्रतिरूप दिखती थी - ठीक वैसे ही जब वो जवान थी। सुन्दर भोला चेहरा, भरे होंट और मादक आँखें। उसका शरीर एकदम फिट था, इसलिए कपडे के ऊपर से देखने पर भी बहुत आकर्षक लगती थी।
स्तन अभी भी छोटे थे और उन पर गहरे लाल-भूरे रंग के आकर्षक स्तनाग्र थे। सुन्दर, स्वस्थ और पतली बाहें... उसका पेट बिलकुल सपाट था। योनि के हिस्से में कोई बाल नहीं थे। "ऐसा कैसे हो सकता है? इस उम्र में मेरे तो काफी बाल हो गए थे।", माला ने सोचा।
पल्लवी के पाँव थोडा खुले हुए थे, जिस कारण उसकी योनि का द्वार थोडा खुल गया था और वहां से अभी अभी संपन्न हुई रति-क्रीडा का रस निकल रहा था। मादक दृश्य!
अब माला उन दोनों को एक साथ देख रही थी - "सुन्दर और आकर्षक जोड़ा। दोनों ही कितना हँसते हैं। जब ये दोनों घर में होते हैं तो आनंद आ जाता है। बच्चों के जैसे झगड़ते हैं - लेकिन उस झगडे में निहित प्रेम मैं खूब जानती हूँ।"
"नंगे होने पर तो ये दोनों और भी सुन्दर लगते हैं - जैसे की ग्रीक सभ्यता वाली मूर्तियाँ! रूद्र भी तो कितना अच्छा है... उतना ही सुन्दर दिखता भी है... कसरती देह... इसका लिंग पूरा उत्तेजित होने पर कैसा दिखता होगा!?" ये ख्याल आते ही माला ने अपना सर झटका, "अपनी ही बेटी के पति के लिए ऐसी सोच?"और धीरे से दरवाज़ा बंद करके बाहर आ गयी।
माला सीधा ड्राइंग रूम में पहुची, और अपने आप को संयत करने के लिए "संस्कार" चैनल लगा कर भजन सुनने लगी। कुछ देर भजन सुनने के बाद उसका मन थोडा शान्त हुआ तो चाय बनाने के लिए रसोई में आ गई। अभी उसने चाय का बर्तन गैस पर रखा ही था की पल्लवी अपने कमरे से अंगड़ाई लेती हुई बहार आई।
उसने एक छोटा और झीना सा हलके सफ़ेद रंग का टी-शर्ट पहना हुआ था और हलके गुलाबी रंग का छोटा सा निकर। दोनों ही कपड़े उसपर बहुत भा रहे थे, जैसे की वो कोई गुडिया हो। सफ़ेद रंग का झीना कपडा होने से, पल्लवी के शरीर की आकर्षकता थोडा छन छन के आ रही थी - लेकिन फिर भी कोई भी उसके स्तनाग्र आसानी से देख सकता था।
पास आते ही पल्लवी उससे लिपट गई। "माँ, आई लव यू।"
माला मन ही मन मुस्कुराई, "सम्भोग क्रिया के बाद लड़कियां कितना निखर जाती हैं!"
"आई लव यू टू बेटा... चाय पियोगी?"
"हां"...
"माँ, आपसे एक बात पूछूं?"
"बोलो बेटा"
"हमारे रूम का दरवाज़ा आपने बंद किया था न?"
"..."
"बोलिए ना"
"हाँ.. फिर?"
"इसका मतलब आपने हम दोनों को नंगा देखा?" पल्लवी ने बनावटी अवमानना के साथ बोला।
माला हिचकते हुए "हाँ...", फिर संयत होते हुए, "लेकिन तुम लोग तो मेरे बच्चे हो। मेरे सामने नंगे हुए तो क्या हो गया?"
"वैसे एक बात बताऊँ?"
"हाँ माँ"
"तुम दोनों खूब सुन्दर दिखते हो। मेरा मन हुआ की तुम दोनों को बस देखती ही रहूँ। हे भगवान! मेरे दोनों बच्चो को लगता है मेरी ही नज़र लग जाएगी।"
पल्लवी यह सुन कर ख़ुशी में माँ से लिपटते हुए बोली, "माँ, यू आर द बेस्ट" और उसने जोर से माला के होंठों पर चुम्बन दिया।