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जीवन का सुख

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कुछ देर की चुप्पी के बाद प्रियंका ने कहा, "आप वहां होंगी?"

"यु बेट! मैं अपनी प्यारी बहना के चेहरे पर मस्ती और मज़ा देखने ज़रूर रहूंगी"

"जीजू बहुत नाराज़ होंगे - उनको धोखे से मेरे साथ सेक्स करवाना सिरियस काम है"

"सिरियस काम तो है" पल्लवी के दिमाग में वह दृश्य घूम गया जब रूद्र का लिंग माला की योनि में जा रहा था "लेकिन इससे एक हिसाब चुकता हो जायेगा"

"ठीक है ... तो हम लोग क्या करेंगे?" प्रियंका ने आस भरी आवाज़ में कहा।

"बड़ी जल्दी हो रही है मेरी लाडो को" पल्लवी ने मज़े लेते हुए कहा। "चलो, पहले अपनी चड्ढी उतारो, देखूं तो कितनी जगह है वहां। पहले ही बता देती हूँ की रूद्र का लिंग बहुत बड़ा है।"

दोनो सहेलियां ऐसी कामुक बाते और कामुक क्रीड़ा करते पुनः लीन हो गयी।

रूद्र के चेहरे का हाव भाव देखने वाला था - वो जैसे ही घर में प्रविष्ट हुआ, पल्लवी उस पर मानो कूद ही गयी। रूद्र को अपनी बाहों में लपेट कर पल्लवी उसको कामुक आवेश में बेतहाशा चूमने लगी।

"जल्दी से रूम में चलो। माँ के आने से पहले हम लोग एक राउंड ख़तम कर सकते हैं" पल्लवी ने कामुक भारी आवाज़ में कहा।

प्रियंका को रूद्र से रतिसंयोग करवाने की योजना बनाते हुए पल्लवी की कल्पना शक्ति इतनी फ़ैल गयी थी की आज इतनी बार प्रचंड और भावुक रति संयोग करने के पश्चात भी पल्लवी पुनः पहले की ही भांति बहकने लगी थी। लेकिन उसको रूद्र की उत्तेजना प्रियंका के लिए बचा कर रखनी थी। चूमते और एक दुसरे के अंगो को सहलाते हुए दोनों प्रेमी बड़ी मुश्किल से अपने कमरे में आ पाए। कुछ ही देर में दोनों की निर्वस्त्र हो गए - पल्लवी ने तुरंत ही रूद्र का लिंग अपने मुह में लेकर चूसना शुरू कर दिया।

"आज तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है"

"अच्छा? क्या?"

"अगर बता दिया तो कैसा सरप्राइज?"

"बात तो ठीक है"

"हाँ ... चलो, अब अपनी आँखें बंद कर लो, और तब तक नहीं खोलो जब तक मैं न कहूं। ओके?"

"ओके"

"पक्का जानू! प्लीज़ आँख मत खोलना।"

"ठीक है, प्रोमिस।"

जब पल्लवी तो पक्का विश्वास हो गया की रूद्र आँख नहीं खोलेगा, तो उसने हाथ हिला कर प्रियंका को कमरे के अन्दर बुला लिया। प्रियंका कमरे में आकर अपने कपडे उतारने लगी और पल्लवी रूद्र के लिंग को अच्छी तरह से चूस कर स्तंभित करने लगी। प्रियंका अब पूर्णतया नग्न थी। उसकी आँखें रूद्र के खड़े होते लिंग पर जम गयी - वह लगभग पूर्ण स्तंभित हो चुका था और प्रियंका को उसका आकर काफी विशालकाय लगा।

प्रियंका को समझ आ गया की यह तो उसकी योनि के अन्दर आसानी से नहीं जाने वाला।

पल्लवी ने इशारे से प्रियंका को पास बुलाया। योजना के अनुरूप प्रियंका को भी रूद्र का लिंग चूसना था, जिससे उसको कोई संदेह न हो सके। किन्तु प्रियंका ऐन मौके पर असहज हो गयी। लेकिन पल्लवी की अभिवाचक आँखों और उग्र संकेतों से विवश होकर आखिरकार उसने रूद्र के लिंग को अपने मुँह में भर लिया। रूद्र का शिश्नाग्र ने उसके मुँह को ठीक वैसे ही भर लिया जैसे की एक बड़ा सा लड्डू बच्चो के मुँह को भर लेता है और वो ठीक से साँस नहीं ले पाते और बात नहीं कर पाते।

खैर, जैसे तैसे प्रियंका सहज हो गयी और ठीक से चूसने लगी। पल्लवी बस यही मन रही थी की रूद्र को कोई संदेह न हो। उधर रूद्र आनंद के सागर में गोते लगा रहा था और उसको अपने लिंग पर जो भी भिन्न भिन्न अनुभव हो रहे थे, उनको वह पल्लवी के 'सरप्राइज' का ही हिस्सा मान कर मज़े ले रहा था।

अन्ततः प्रियंका उठी, और रूद्र के जघन क्षेत्र पर जाकर, घुटने के बल बैठ गयी। उसकी योनि इस पूरे क्रिया कलाप से रस-सिंचित हो गयी थी और वस्तुतः चू रही थी। पल्लवी ने रूद्र के लिंग को पकड़ कर उसकी योनि पर स्थापित कर दिया। प्रियंका अब बहुत घबरा रही थी - लेकिन पल्लवी ने उसके स्तनों को थोडा दबा कर एक मुस्कुराते हुए उसका साहस बढाया, और सर हिला कर उसको रूद्र के लिंग को अन्दर जाने देने के लिए बोला।

एक गहरी सांस लेकर प्रियंका धीरे धीरे रूद्र के लिंग पर बैठने लगी। घबराहट और तनाव के कारण प्रियंका का संकरा योनि-मार्ग थोडा और संकुचित हो गया। अतः, लिंग उसकी योनि के अन्दर ठीक से नहीं जा पा रहा था। वैसे पल्लवी और प्रियंका की योनि का आकार और परिधि एक जैसी ही थी, लेकिन तनाव के कारण उसकी योनि की अवरोधिनी पेशी अत्यधिक संकुचित हो गयी थी। वस्तुतः, रूद्र का शिश्नाग्र बस वहीँ पर फँस कर रह गया। प्रियंका के जघन क्षेत्र में पीड़ा होने लगी। इस अधीरता में उसका संतुलन बिगड़ गया और वह रूद्र के लिंग पर उर्ध्वाकार ही गिर गई। इससे तीन बाते हुईं - पहला यह की लिंग बहुत ही बेदर्दी से उसकी योनि को चीरता अन्दर चला गया; जिसके कारण प्रियंका को प्राण-संतार्जक पीड़ा का अनुभव हुआ, और तीसरा यह की ऐसे अटपटे ढंग से बैठने के कारण रूद्र को भी लिंग-क्षेत्र में पीड़ा हुई। लिहाजा, रूद्र और प्रियंका दोनों के ही कंठ से चीख निकल गयी। रूद्र की आँखे खुल ही गयी! सामने पल्लवी नहीं थी - 'ये कौन? अरे! यह तो प्रियंका है!!'

"व्हाट द हेल!" रूद्र चिल्लाया, और उसने प्रियंका को अपने लिंग से उठा कर लगभग पटक ही दिया। प्रियंका के चेहरे पर भय और पीड़ा का मिला जुला भाव व्याप्त हो गया।

"प्रियंका?" रूद्र अविश्वास के स्वर में बोला।

"जी..जू!" प्रियंका बस इतना की उत्तर दे सकी।

रूद्र गुस्से से पल्लवी की तरफ मुड़ा, "ये तुम्हारा ही पागलपन भरा आईडिया था?" उधर प्रियंका ने रोना शुरू कर दिया।

रूद्र किसी को भी रोते हुए नहीं देख सकता था। और प्रियंका तो व्यवहारिक तौर पर उसकी एकलौती साली थी। "ओह नो!" कह कर उसने प्रियंका को अपने आलिंगन में सिमटा लिया और उसके सर और पीठ को सहला कर दिलासा देने लगा। यह दृश्य देख कर पल्लवी भी रोये बिना न रह सकी। बेचारे रूद्र की आफत ही आ गई!

"कम हियर!" रूद्र ने मृदुलता से कहा और उसने पल्लवी को भी अपने से सिमटा लिया। उसने कुछ देर तक दोनों लड़कियों को ऐसे ही दुलारता रहा।

"फील बेटर?"

"यस! आई थिंक आई ऍम नाउ" प्रियंका ने सुबकते हुए कहा।

"तुम अभी भी हम पर गुस्सा हो?" पल्लवी ने पूछा।

"नहीं नहीं ... लेकिन ऐसा क्यों किया तुम लोगो ने?"

"मुझे लगा की यह सेक्सी और एक्साइटिंग रहेगा। मुझे मालूम है की तुमको प्रियंका पसंद है, और यह भी की उसको तुम पसंद हो। तो मैंने सोचा की तुम दोनों को ही सैटिस्फाई कर दिया जाए!"

"तुम लोग एकदम बदमाश हो। ये तुम लोगो ने मुझे किस समस्या में फंसा दिया?"

प्रियंका ने आखिरकार हिम्मत कर के पूछ ही लिया, "आप मेरे साथ करेंगे? ......... प्लीज़?"

"लेकिन मैं ही क्यों?"

"जीजू, मैंने कभी भी किसी लड़के से सेक्स नहीं किया। और मुझे मालूम है की दीदी आपके साथ कितना खुश हैं। मुझे लगा की अगर मुझे अगर सेक्स करना ही है तो मैं उसके साथ करूंगी जो मुझे पसंद है, और जो मेरा केयर और रेस्पेक्ट करता है।"

पल्लवी ने जोड़ा, "रूद्र, अगर तुम प्रियंका के साथ सेक्स करोगे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा। तुम दोनों अगर कुछ खुशी पा सको तो मुझे बहुत अच्चा लगेगा।"

"लेकिन ... आई कैन हर्ट हर! इट कैन हर्ट आवर मैरिज!"

"तुमने प्रियंका को अभी अभी जितना हर्ट किया है, उससे ज्यादा हर्ट नहीं कर सकोगे। और जहाँ तक हमारे रिश्ते की बात है, तो मैं और तुम एक दुसरे को बहुत बहुत प्यार करते हैं। और, इस बात को समझो की की मैंने खुद ने तुम लोगो के लिए यह अरेंज किया है। अगर तुम अगर प्रिया के साथ सेक्स करोगे तो मैं तुमको और भी प्यार करूंगी।"

"लेकिन ये अभी छोटी है! इसको क्या ज़रुरत है?"

"तुमको चाहती है ये! और तुम इसकी सबसे ज्यादा केयर करते हो - यह बात हम सब जानते हैं।"
 
रूद्र चुप होकर सोच में डूब गया। उसके अंतर्मन में एक रस्साकशी हो रही थी। सभी प्रकार के तर्क, वितर्क और कुतर्क उसके मष्तिष्क में चल रहे थे। "आल राइट!" उसने कुछ देर बाद कहा, "बट ओनली दिस वन टाइम! अगर हम लोग यह सब बार-बार करेंगे तो यह पल्लवी के लिए गलत होगा - भले ही इस समय कुछ भी कहे।"

"हाँ ठीक है - मुझे भी तुमको प्रिया के साथ रोज़ रोज़ नहीं शेयर करना है। दिस विल बी अ गिफ्ट फॉर हर!"

दोनों ने प्रियंका को देखा, उसने हामी भरते हुए सर हिलाया।

"ठीक है फिर ..... प्रिया, तुम यहाँ बेड पर आराम से लेट जाओ। अगर नर्वस हो तो आँखे बंद कर लो।"

प्रियंका अब बिस्तर पर लेट गयी - रूद्र ने पहली बार उसके नग्न रूप का आलोकन किया। प्रियंका की आँखें बंद थी, लेकिन घबराहट में उसके शरीर की विभिन्न माँस-पेशियाँ कसी हुई थी। रूद्र ने उसको शिथिल करने का सोचा।

उसने प्रियंका के कान को चूमना आरम्भ किया - यह क्रिया पल्लवी को लगभग तुरंत ही शांत और मादक बना देती थी। वह उसकी कान की लोलकी को कभी चूमता, कभी काटता या कभी चूसता। ऐसे करते करते, धीरे धीरे उसकी ठोढ़ी की तरफ बढ़ते हुए अभी वह उसके होंठो को चूम रहा था। यह दृश्य देख कर पल्लवी के मन में एक अनपेक्षित इर्ष्याभाव जाग गया - 'अच्छा है की रूद्र सिर्फ एक बार करने को राज़ी हुआ।' रूद्र ने प्रियंका के होंठो पर अधिक समय नहीं बिताया और गले से होते हुए शरीर के अन्य भागो को चूमना जारी रखा।

पल्लवी ने देखा की रूद्र इस समय प्रियंका के स्तानाग्रों को चूम रहा है। उसके होंठो पर एक मुस्कान आ गई, क्योंकि वह जानती थी की रूद्र को स्त्रियों के शरीर में स्तन कितने पसंद हैं। हालाकि प्रियंका के स्तन अभी छोटे थे, लेकिन उसके स्तनाग्र आकर्षक और स्वादिष्ट थे। शायद रूद्र ने वहां पर दांत से हल्का सा काट लिया था, क्योंकि प्रियंका की सिसकी निकल गयी। पल्लवी समझ गयी की प्रियंका अब कामोत्तेजित हो गयी थी - उसकी साँसे भारी हो गयी थी, बढ़ते रक्त-संचालन के कारण उसके गोर शरीर में लालिमा आ गयी थी। लेकिन रूद्र उसको अभी छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा था। वह प्रियंका के शरीर के साथ लगातार छेड़-छाड़ करता जा रहा था।

जब वह उसके योनि क्षेत्र पर पहुंचा तो उसने योनि द्वार को 2-3 बार चाटा और फिर उसकी जांघो के अंदरूनी हिस्से को चूमने और चाटने लगा। प्रियंका अब अपनी उत्तेजना के चरम बिंदु पर पहुच चुकी थी। वह भले ही ऐसा अनुभव लड़कियों के साथ पहले भी कर चुकी थी, लेकिन रूद्र के संरक्षण में हो रहे इस काम से उसका अनुभव बहुत ही भिन्न हो गया था - मन ही मन वह उसकी दासी बन चुकी थी।

रूद्र अब और नीचे नहीं जा रहा था - वह कभी उसकी जांघों, तो कभी उसकी योनि को चूमता-काटता जा रहा था। प्रियंका का शरीर अब थर थर कांप रहा था और साँसे इतनी भारी हो गयी की उसको लगा की शायद उसका दम घुट जायेगा। वह कुछ बोलने की अवस्था में अब नहीं थी, लेकिन फिर भी न जाने कैसे उसके गले से आवाज़ आई, "प्लीईईज़ ...."

"नहींईई ..." रूद्र ने उसको चिढ़ाते हुए कहा, "आई ऍम गेटिंग इवन!"

"दीदी, प्लीज़ जीजू को बोलो की अब मेरे अन्दर आ जाए।"

"सॉरी प्रिया! लेकिन रूद्र इस काम में मेरी भी नहीं सुनता है .. इसलिए तुम बस बर्दाश्त करो" पल्लवी समझ रही थी प्रियंका की क्या दशा है। काम-क्रिया के हर अंक में पल्लवी की यही दशा होती थी। रूद्र में यौन क्रिया को लेकर न जाने कैसी दक्षता थी की अपने यौन-साथी को वह अति-आनंद में लगभग पागल बना देता था और यौन-साथी यौन क्रिया के लिए भीख मांगने लगती।

"यू गाट दैट राईट! वैसे अगला नंबर तुम्हारा ही है पल्लवी!" यह कह कर उसने पुनः प्रियंका की योनि पर अक्रमण कर दिया।

"ओह नो!" पल्लवी ने बनावटी डर से कहा, हालाकि उसका मन बहुत देर से यही सोच रहा था की 'काश! प्रिया की जगह पर वह खुद होती!'

रूद्र अगले 2-3 मिनट तक उसकी योनि के साथ खिलवाड़ करता रहा, और उतनी देर में प्रियंका लगभग रोने को हो आई। पल्लवी ने इस क्षण पर रूद्र के कान में कुछ कहा।

"दी...दी! तुम....ने जीजू से क्या क....हा?" प्रियंका ने टूटी फूटी बोली में पूछा।

"आगे आगे देखो मेरी लाडो" पल्लवी ने ठिठोली ली।

रूद्र ने अपनी तर्जनी प्रियंका की योनि में पहली बार डाली - अन्दर से निकलते यौन रस में वह सराबोर हो गयी। उसने वही उंगली प्रियंका की गुदा में धीरे धीरे प्रविष्ट करा दी।

"ओह गॉड!" प्रियंका की चीख निकल गयी। रूद्र ने उसके मुह को हाथ से बंद किया।

"श्ह्ह्ह! लोग दौड़े चले आयेंगे!"

प्रियंका रिरिया कर रह गयी। रूद्र ने अपनी उंगली को कुछ देर तक उसकी गुदा में ही आगे पीछे चलाया और उसी तर्ज पर प्रियंका के नितम्ब भी आगे पीछे होने लगे।

कुछ ही क्षणों में प्रियंका किसी भी तरह की बातचीत करने में सक्षम नहीं रह गयी। उसकी आँखें अब बंद थी और शरीर बुरी तरह थरथरा रहा था। रूद्र जैसे ही उसकी योनि को छूता, वह उछल पड़ती। इधार पल्लवी से खुद ही नहीं रहा जा रहा था। उसने रूद्र के कंधे को छू कर इशारे से कहा की 'अब ख़तम करो'।

रूद्र ने सर हिलाया और प्रियंका के स्तनों को मसलते हुए पूछा, "प्रिया, अगर मैं ऊपर रहूँ तो तुमको ठीक रहेगा? यह तुम्हारा पहला टाइम है और हर काम तुम्हारे पसंद का होना चाहिए।"

प्रियंका बहुत ही मुश्किल से बोल पाई, "जीजू, मेरे अन्दर कोई ताकत नहीं बची है। आप की करिए"

"ओके!" कह कर रूद्र ने उसकी टांगो को फैला दिया। उसकी योनि का खुला हुआ मुख काम-रस से भीगने के कारण चमक रहा था।

"प्रिया! जस्ट रिलैक्स!" कह कर रूद्र ने एक हाथ से उसकी योनि को थोडा और फैलाया और अपने लिंग को उसकी योनि मुख से सटा दिया। उसने धीरे धीरे आगे की तरफ जोर लगाया, जिससे लिंग अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रूद्र तब तक नहीं रुका जब तक की उसके लिंग का जड़ प्रियंका की योनि से पूरी तरह नहीं सट गया।

पल्लवी के लिए यह एक मजेदार दृश्य था। प्रियंका का शरीर इकहरा, और पेट और कमर एकदम थे। ऐसे में रूद्र के पुष्ट मांसल लिंग के अन्दर जाने से उसके पेट और योनि का हिस्सा ऊपर की तरफ उभर आया।

"प्रिया! तुम ठीक हो?" रूद्र ने पूछा।

प्रियंका ने हाँ में सर हिलाया। इसके बाद रूद्र ने उसके साथ मैथुन करना शुरू कर दिया - पहले धीरे और फिर थोडा तेज़ गति से। इस पूरे काम में इतना समय लग चुका था की पल्लवी को लगा की यह दोनों अधिक देर तक टिक नहीं पाएंगे। और हुआ भी वही। रूद्र पहले स्खलित हुआ - हर स्खलन में वह अपना लिंग प्रियंका के और अन्दर ठेलने का प्रयत्न कर रहा था। उसके कुछ ही क्षणों के बाद प्रियंका भी अपने सुख के चरम पर पहुच गयी। इस उन्माद में उसकी पीठ एक चाप में मुड़ गयी, जिससे उसके स्तन और ऊपर उठ गए। रूद्र ने एक स्तनाग्र को सहर्ष अपने मुह में ले लिया और प्रियंका के ऊपर ही निढाल होकर गिर गया।

पल्लवी कहने पर रूद्र ने अपने लिंग को प्रियंका की योनि के बाहर नहीं निकाला। उसकी योनि के अन्दर ही रूद्र का पुरुषांग शिथिल पड़ गया और रूद्र प्रियंका पर ही लेटा रहा। अंततः दोनों एक दुसरे से अलग हुए। प्रियंका इस समय किसी नयी नवेली दुल्हन के जैसी शर्मा रही थी। खैर, उसकी मनःस्थिति ठीक किसी दुल्हन के जैसी ही थी, जिसके साथ अभी अभी सम्भोग संपन्न हुआ हो। वह न तो रूद्र से और न ही पल्लवी से आँखे मिला पा रही थी। उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फैली हुई थी।

रूद्र ने पूछा, "प्रिया! तुम ठीक हो?" प्रियंका ने आँख बंद करके हाँ में सर हिलाया।

"मज़ा आया?" प्रियंका के चेहरा इस प्रश्न पर और लाल पड़ गया - वह सिर्फ मुस्कुरा सकी।

तीनो ने रात का खाना साथ ही में खा लिया। पल्लवी और रूद्र दोनों को नींद आ रही थी, इसलिए खाने के तुरंत बाद ही दोनों सोने चले गए। माला को तो खैर विराट का इंतज़ार करना था। वो रात के लगभग 12 बजे घर आने वाला था। इसलिए माला एक मैगजीन लेकर पढने बैठ गयी और विराट के आने की राह देखने लगी।

हवाई जहाज में बैठे बैठे विराट का मन माला को 'चोदने' का हो रहा था - वैसे ऐसी इच्छा उसकी आज पूरे दिन भर रही, जब से उसने माला को वेब-कैम अति-मादक हरकतें करते हुए देखा था। उसके जीवन के सबसे हसीं सपनो में भी ऐसी बात कभी नहीं आई थी। माला का एक नया रूप, जिससे वह आज तक अनजान था। वह इस समय अपने यौन जीवन के बारे में बहुत खिन्नता से सोच रहा था, की कैसे उसने यह सब खर्च हो जाने दिया। जब से पल्लवी उसने जीवन में आई थी, तब से मानो कामक्रिया की तिलांजलि दे दी गयी थी। कभी आत्म-संयम, कभी समय न होना, कभी बच्चा रो रहा है, कभी सर दर्द या कभी काम - यह सब बहाने सदा आते रहे, और माला और विराट की कामेक्षा मानो समाप्त हो गयी थी।

जब पल्लवी की विदाई हो रही थी, उस समय विराट के अन्दर का एक रोष बाहर निकल रहा था। वह था उसके वैवाहिक जीवन नीरस और यंत्रवत हो जाना। उस दिन माला के साथ विराट नें मानो बलात्कार किया हो। प्रेम वह कहीं से नहीं था और उस दिन का उसको बहुत पश्चाताप भी हुआ। लेकिन माला को सच बता नहीं पाया, क्योंकि कुछ भी हुआ हो, माला उसके जीवन की सच्ची साथी रही थी और उसने विराट का हमेशा साथ दिया था। प्रेम-विहीन और रोष-लिप्त काम-क्रिया संभवतः बलात्कार की ही श्रेणी में आती है।

लेकिन, आज उसके मन में प्रेम था। कामुक ही सही, लेकिन प्रेम था।

'माला रूप की देवी है। आह! कितने ही बरस बीत गए, उसको अच्छे से बिना वस्त्रों के देखे हुए।'

विराट ने हवाई-अड्डे पर एक दुकान से माला के लिए ब्राइडल अधोवस्त्र (Bridal Lingerie) खरीद लिया था। कहने के लिए यह सिर्फ ब्रा और चड्ढी का सेट था, लेकिन असल में क़यामत था। इसका रंग बेहद फ़ीका गुलाबी था - इतना फीका की मानो सफ़ेद, लेकिन ब्रा और चड्ढी दोनों ही पर सलेटी रंग के धागों से फूलों की कढ़ाई की गयी थी। विराट का दिल यह सोच कर ही फुदक रहा था की इसमें माला कैसी दिखेगी!

घर आते आते विराट को रात के लगभग 12 बजे तक लग जाता, इसलिए उसने माला को खाना खा लेने के लिए बोला था। पल्लवी और रूद्र से वह कल सवेरे मिल लेगा। लेकिन इन सबसे ज्यादा ज़रूरी बात थी माला की 'चुदाई'! आज विराट को यह करना ही है, और उसने यह पक्का ठान ली थी।

घर का दरवाज़ा माला ने ही खोला - दोनों अटपटे ढंग से आलिंगनबद्ध हुए - शायद माला आज सवेरे की गयी हरकत से लज्जित थी। फिर विराट ने माला के गाल चूमे और उसके नितम्ब ज़रा से दबा कर एक अर्थपूर्ण मुस्कान दी। माला ने ध्यान दिया की पल्लवी के कमरे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी - 'चलो' उसने सोचा, 'कम से कम अब जाकर शांत हो ही गए दोनों!'

कमरे में जाकर विराट संलग्न गुसलखाने में हाथ मुंह धोने लगा और दोनों ही इधर उधर की बात करने लगे। अचानक ही विराट ने कहा, "माला, सूटकेस में तुम्हारे लिए कुछ है। ऊपर ही रखा है।"

"अच्छा!" अब चाहे औरत कम-उम्र हो या प्रौढ़, उपहार को लेकर ललायित हमेशा ही रहती हैं। माला ने जल्दी से विराट का सूटकेस खोला और सबसे ऊपर अधोवस्त्र का पैकेट देख कर थोडा हतप्रभ रह गयी।

"ये क्या लाये हो! इस उम्र में मैं यह पहनूंगी?"

"हाँ! फिर कभी पहनो या न पहनो, आज तुम सिर्फ यही पहनोगी" विराट ने प्रेम-पूर्ण लेकिन दृढ़ आवाज़ में, गुसलखाने से बाहर आते कहा।

"चलो, मुझे यह पहन कर दिखाओ। मैं तुम्हारा वेट कर रहा हूँ।"

माला अनमने ढंग से, संकोच और निर्बल विरोध करते हुए, अधोवस्त्र को लेकर गुसलखाने में चली गयी और उसका दरवाज़ा बंद कर लिया। विराट ने इस बीच अपने सब कपडे उतार कर सिर्फ अपना ड्रेसिंग-गाउन, जो आगे से खुलता है और जिसके कमर पर बाँधने के लिए एक पट्टी होती है, पहन लिया। उधर माला अपने को ऐसे कामुक वस्त्र में देख कर पहले से ही उत्तेजित हो गयी और समझ गयी की आज उसके साथ क्या होने वाला है।
 
करीब दस मिनट बाद माला बाहर आई - उसकी दशा वैसी ही थी जैसे शादी के बाद दोनों की पहली रात को थी। उसकी आँखों में लज्जा और संकोच के साथ साथ कामुकता के भाव भी थे। विराट की मानो बोलती ही बंद हो गयी - माला निश्चित रूप से स्वयं कामदेव की पत्नी 'रति' लग रही थी। माला के पुष्ट स्तन उसके ब्रा के गद्दीदार कपों में भर गए थे, किन्तु ब्रा की बनावट कुछ ऐसी थी की माला के स्तनों पर से गुरुत्व का प्रभाव मानो समाप्त हो गया था। साथ ही साथ ऊपर की तरफ दबाव के कारण स्तन पूर्णतया गोल प्रतीत हो रहे थे। माला का वक्ष-विदरण (cleavage) बहुत ही सुहाना दिख रहा था। विराट का मन हुआ की उसमे अपना मुह घुस कर ज़ोरदार चुम्बन ले ले। ब्रा की सीधी उर्ध्व पट्टियाँ, माला की जत्रुक हड्डियों (collar-bones) के ऊपर से होते हुए कहीं खो गयी लगती थी। वक्षों का उभार, कमर का संकीर्ण होना और फिर नितम्बो का चौड़ाव - जिसको अंग्रेजी में "आवर-ग्लास फिगर" कहते हैं, की उत्कृष्ट परिभाषा लग रहा था। माला की नाभि उसके पेट के अन्दर थी और पेट कस़ा हुआ, समतल था। सामने से देखने पर उसकी चड्ढी अंग्रेजी के "V" जैसी, लेकिन कमर की तरफ फैलाव लिए और वहां जहाँ पर माला की योनि थी, एक सौम्य उभार लिए हुए थी। माला का शरीर, प्रौढ़ता की तरफ जाते हुए थोड़ा स्थूल हो गया था, लेकिन उसने अपने शरीर का अच्छा ध्यान रखा था। पड़ोस की कई "आंटियों" से कमउम्र लगती थी।

विराट का लिंग आज रात होने वाले कार्यक्रम के पूर्वानुमान से पहले ही खड़ा हो गया था, लेकिन इस दृश्य ने उसके लिंग-स्तम्भन को लगभग स्थाई कर दिया। माला वाकई बहुत खूबसूरत और आकर्षक थी। विराट ने माला के पास जाकर उसको कमर से पकड़ लिया और उसके होंठो पर हलके से चुम्बन लिया। माला की आँखें बंद हो गयीं, और उसके हाथ विराट के गर्दन पर लिपट गए। हलके हलके 3-4 चुम्बनों के बाद अब चुम्बनों की गहराई और तीव्रता दोनों ही बढ़ने लगीं। विराट ने इसी बीच माला को नितम्बो से पकड़ कर उठा लिया और लाकर बिस्तर पर बैठा दिया। चुम्बन अभी भी बा-दस्तूर जारी था, लेकिन इस समय विराट के होंठ माला के गले और कन्धों पर व्यस्त थे।

इस सभी क्रियाकलाप के बीच माला बिस्तर पर लेट गयी और उसकी जांघें, रति के समय स्त्रियों के सामान्य ग्राही वाली अवस्था में, खुल गईं थीं। विराट इस समय उन्ही के बीच में था और अपनी श्रोणि माला की श्रोनि पर रगड़ रहा था - जैसा मैथुन के समय करते हैं। माला स्वयं विराट के लिंग का कडापन महसूस कर पा रही थी। अचानक माला ने महसूस किया की विराट का मुंह उसकी छाती पर चुम्बन ले रहा है। चुम्बन की बौछार धीरे धीरे माला के स्तनों पर, ब्रा के ऊपर से ही, होने लगी। माला ने देखा की विराट आज काफी रचनात्मक था - वह इस समय ब्रा के कपड़े की सीमा के बराबर चुम्बन ले रहा था और उसके हाथ उसकी ब्रा के हुक को खोलने की कोशिश कर रहे थे।

ब्रा हटते ही विराट को अत्यंत सुन्दर स्तनों के दर्शन हुए - वे भरे हुए और गोल थे और उनके बीच में केन्द्रित दो सुहाने, रसीले खड़े हुए स्तनाग्र थे! विराट ने मुह खोल कर माला के एक स्तनाग्र हो अन्दर भर लिया। जहाँ उसकी जीभ इस स्तन के स्तनाग्र के साथ दुलार और खिलवाड़ कर रही थी, वहीँ दूसरे स्तनाग्र से उसकी उंगलियाँ। माला अब मस्ती में आ गयी थी। विराट उसके सुन्दर स्तनों के साथ खेल रहा था - कभी उनको दबाता, कभी उनको थोडा खीचता, बारी-बारी से स्तानाग्रों को मुह में रख कर चूसता और फक्क की ध्वनि से मुंह से बाहर निकाल देता। उसकी हरकतें इस समय किसी शैतान बच्चे जैसी ही थीं। स्तनों का इस प्रकार भक्षण करते हुए विराट ने माला की तरफ देखा। माला इस समय आसमान की ऊँचाइयों में गोते लगा रही थी। उसके मन में दबी हुई इच्छाएं आज पूरी हो रही थी। उसका सर पीछे की तरफ ढलका हुआ था, आँखें बंद थी, मुंह खुला हुआ था और वह हाँफते हुए गहरी साँसे ले रही थी।

विराट अब माला के पेट की ओर बढ़ चला, लेकिन उसके हाथ माला के स्तनों का प्रेम-पूर्वक मर्दन करते रहे। विराट माला के पेट के चुम्बन लेता रहा - गुदगुदी और कामुक स्पर्श के मिले जुले प्रभाव से माला के पेट की पेशियाँ संकुचित हो जाती और वह जैसे चौंक जाती। अंततः विराट का हाथ माला की योनि पर आ ही गया। योनि के ऊपर वाला चड्ढी का हिस्सा बुरी तरह से गीला हो चुका था। विराट समझ गया की अब न तो वह और न ही माला देर तक रुक सकते हैं। उसने अपना ड्रेसिंग-गाउन उतार फेंका और अपना पूरा ध्यान माला की योनि पर केन्द्रित कर दिया।

विराट ने माला की चड्ढी को नीचे की तरफ सरकाया, लेकिन पूरी तरह से उतार नहीं और अपना चेहरा माला की बाल से ढंकी योनि में समाहित कर दिया। माला के हाथ विराट के सर को योनि में और दबा रहे थे। और विराट की जीभ उसकी योनि की गहराई, स्वाद, बनावट इत्यादि का अनुसंधान करने लगी।

कुछ देर ऐसे ही करने के बाद विराट ने कहा, "माला! अब असली एक्ट करें?"

माला कुछ कहने की हालत में नहीं थी - उसने बस सर हिलाया। ऐसी कामुक अवस्था में माला और भी प्यारी लग रही थी। विराट ने उसके होंठो पर कुछ और चुम्बन दिया और फिर वापस अपनी कर्म-स्थली पर आकर खड़ा हो गया। उसने अपने लिंग को माला की योनि-द्वार पर टिकाया - माला के योनि रस ने द्वार को इतना चिकना कर दिया था की अब अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी। हलके दबाव से विराट माला में प्रविष्ट हो गया। विराट से रहा नहीं गया और पूरा जोर लगा कर पूरी तरह से माला की गरम गहराइयों में चला गया। अपने लिंग पर माला की योनि की दीवारों का संकुचन विराट के स्तम्भन को और बलवान बना रहा था। उसने अब अन्दर-बाहर का ताल शुरू कर दिया - पहले धीरे धीरे और फिर तेज़।

"आह! विराट! आई लव यू! आई लव यू!"

लगभग 2 मिनट के सम्भोग क्रिया के बाद ही, कामोत्तेजना से भरे दोनों प्रेमी एक ही समय पर चरमोत्कर्ष पर पहुँच गए। विराट ने आहें भरते हुए वीर्य का भार माला की कोख को सौंप दिया। पूरी तरह से खाली हो जाने पर भी विराट ने धक्के लगाना बंद नहीं किया और तब तक करता रहा जब तक उसका लिंग सिकुड़ कर छोटा सा नहीं रह गया।

पूर्ण संतुष्टि मिलने के बाद विराट माला के ऊपर से उतर गया, लेकिन उसने माला को एक हाथ से आलिंगनबद्ध कर रखा था। यह उन दोनों के बीच एक नयी चीज़ का आरंभ था और इस समय मिल रहा सुखद आनंद, उसका ही प्रमाण था। विराट ने अपने पास की माला की नग्न बांह को सहलाया और चुम्बन दिया और कहा, "थैंक यू सो मच, माला! मुझे आज एहसास हुआ है की मैंने तुम्हारे साथ कितना गलत किया है। मैं प्यार तुमको खूब करता हूँ, मेरी जान, लेकिन न जाने क्यों कभी कहा नहीं। और इस मूर्खता में मैंने हम दोनों का ही न जाने कितना समय बर्बाद किया।"

"नहीं विराट! ऐसे मत बोलो। तुम मेरे जीवन के एकलौते प्यार हो और मुझे मालूम है की तुमने भी सिर्फ मुझे ही प्यार किया है। मेरे लिए सिर्फ इतना मालूम होना बहुत है। हमारे बीच में थैंक यू और सॉरी जैसे शब्दों का कोई काम नहीं है। बस तुम मुझे खूब प्यार करो - मुझे बस इतना ही चाहिए।"

"मैं तुमको खूब प्यार करूंगा, मेरी जान! हम लोग 'मच्योर वाइन' के जैसे हैं - अब ज्यादा नशा है हम में! हा हा हा!" विराट के साथ साथ माला भी हंसने लगी। कुछ देर के बाद विराट ने सोच कर पूछा, "तुम कह रही थी की बच्चे आज दिन भर बिना कपडे के थे?"

माला ने हँसते हुए बोला, "नहीं! ये पल्लवी है न, अभी तक बड़ी नहीं हुई है। आज कुछ देर तक ऐसे ही नंगी घूम रही थी घर में।" फिर थोडा ठहर कर, "ये दोनों न जाने कितनी बार सेक्स करते हैं दिन में।" फिर माला ने पल्लवी और रूद्र की काम-क्रिया का निरीक्षित प्रारूप विराट को सुना दिया। जाहिर सी बात है की उसने पल्लवी को स्तनपान कराने, पल्लवी का स्तनपान करने, रूद्र को नग्न देखने और पल्लवी और रूद्र का उसका सम्मिलित स्तनपान और तत्पश्चात मैथुन करने की घटना का वर्णन काट दिया। वस्तुतः, माला ने विराट को ऐसा एहसास दिलाया की उसने उन दोनों की काम-क्रीड़ा की आवाज़ ही सुनी थी - बस, दृश्य नहीं देख पायी।

खैर, एक जवान और जोशपूर्ण जोड़े की कामुकता के वर्णन मात्र से विराट पुनः गरमाने लगा। उसकी आँखों में वासना के डोरे साफ़ दिखाई देने लगे। "माला, तुम बहुत हॉट हो। एंड आई नीड यू नाऊ!"

माला ने कुछ क्षण ठहर कर सोचा, और फिर विराट को आराम से लेटने को कहा। विराट के लेट जाने के बाद माला उठी और उसके कमर वाले स्थान के दोनों तरफ पाँव फैला कर बैठ गई। उसने अपने दोनों हाथेलियों से पहले विराट की छाती सहलाई और फिर उसको चूमने लगी। विराट के सीने को चूमना - यह काम उसने आज अपने जीवन में पहली बार किया था। माला विराट के छोटे छोटे वक्षाग्र को कभी चूमती, कभी चूसती तो कभी अपने दांतों से पकड़ कर खींचती। उसकी हर एक हरकत से विराट उन्माद के सागर के थोडा और अन्दर डूबता जाता। माला कुछ इस प्रकार बैठी थी की उसकी योनि ठीक उसके अर्ध-स्तंभित लिंग पर जमी हुई थी। माला की गर्म और गीली योनि का अपने लिंग पर स्पर्श और उसके मुलायम जीभ के एहसास से, विराट शीघ्र ही तैयार होता जा रहा था।

लेकिन माला के दिमाग में इस समय कोई दूसरी योजना थी। वह भी विराट के शरीर को ठीक उसी प्रकार से चूम रही थी, जैसे अभी कुछ ही देर पहले उसका खुद का शरीर चूमा गया था। अंततः माला का चुम्बन विराट के लिंग के पास तक आ गया। लेकिन माला ने वहां चूमा नहीं - उसने उसके वृषण को हाथ में लेकर उसका हलके हलके मालिश करना शुरू कर दिया। इस प्रकार छुए जाने से विराट के लिंग में तुरंत ही स्तम्भन उत्पन्न हो गया और उसका लिंग उछल पड़ा। माला यह देख कर खुश हो गई - लेकिन उसने विराट के वृषण को मलना जारी रखा। कुछ देर के बाद उसने वृषण को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। विराट के लिए यह आनंद की अति थी - उसने कभी सोचा भी न था की काम-क्रिया (जिसको वह 'चुदाई' कहता था) का क्षेत्र इतना विस्तृत हो सकता था!

कामुकता के पूर्णतया अधीन होकर विराट से रहा नहीं जा रहा था - उसने उठ कर माला के स्तन पकड़ लिए और उनको दबाना, मसलना शुरू कर दिया। वह कभी उनको दबाता तो कभी उसके स्तानाग्रों को अपनी उँगलियों से मसलता या खीचता। उधर माला धीरे धीरे विराट के लिंग को चूमने लगी। माला उसके लिंग की चमड़ी को पीछे करके आगे का गुलाबी-भूरा हिस्सा अपनी जीभ के छोर से गुदगुदाने लगी। मन ही मन वह विराट और रूद्र के लिंग की तुलना किये बिना न रह सकी। 'विराट का लिंग रूद्र के लिंग से थोड़ा छोटा है, और मोटाई सामान ही लग रही है। लेकिन विराट के वृषण थोडा बड़े है। रूद्र के लिंग का स्वाद कैसा होगा?' ऐसे अनेक अनायास ख़याल उसके मन में आ-जा रहे थे, और उसको और कामोत्तेजित कर रहे थे।

अंततः माला ने अधीर होकर विराट का लिंग अपने मुँह में भर लिया - जल्दबाजी में उसने लिंग का काफी हिस्सा अन्दर डाल लिया। इस कारण से उसकी सांस बंद हो गयी और खांसी आ गयी। लेकिन माला ने जल्दी ही अपने आपको संयत करके उसके लिंग को चूसना और साथ ही साथ उसके वृषण को भी हल्का मालिश करना शुरू कर दिया। चूसते समय माला का सर विराट के लिंग पर वैसे ही आजे-पीछे चल रहा था जैसे मैथुन क्रिया के समय गति होती है। कामोन्माद के में गोते लगाते हुए विराट ने अनजाने में ही माला के चूसने से ताल में ताल मिलाते हुए अपनी कमर चलाना शुरू कर दिया। उसके पाँव कांप रहे थे और गले से गहरी गहरी आहें निकल रही थी। माला ने महसूस किया की विराट की पिचकारी छूटने ही वाली है, लेकिन फिर भी उसने लिंग नहीं छोड़ा। उसके बजाय माला ने लिंग चूषण की गति और प्रबलता दोनों ही बढ़ा दी। आज उसके कितने ही सारे दबे कुचले अरमान निकल रहे थे - इसलिए माला यह मौका गंवाना नहीं चाहती थी। अंततः विराट ने एक गहरे धक्के से अपने शरीर में बचे हुए वीर्य को माला के मुँह निकाल दिया। थोड़ी देर पहले किये गए सम्भोग के बाद, विराट के पास अधिक वीर्य नहीं बचा था, इसलिए माला के मुंह में करीब एक चम्मच वीर्य ही छूट पाया। लेकिन माला कोई शिकायत नहीं कर रही थी। उसने मानो लालच के साथ विराट का सारा वीर्य गटक लिया। साथ ही साथ उसने अब तेज़ी से मुरझाते लिंग को जोर जोर से चूस कर यह सुनिश्चित कर लिया की उसके वीर्य की एक बूँद भी बर्बाद न हो।
 
विराट के लिए यह अनुभव बिलकुल अपरिचित था - उसने ऐसा तो सिर्फ ब्लू-फ़िल्मों में ही होते देखा था। वह सोचता था की ऐसा करना किसी भी स्त्री के लिए अवास्तविक होगा, और इस विचार से भी उसको जुगुप्सा हो जाती थी। लेकिन आज ...... आज का दिन तो कुछ और ही है। वह माला को बताना चाहता था की उसने ऐसा करके उसको कितना सुख दिया है। माला उसके लिए सुख की देवी 'रति' बन चुकी थी। उसने उठ कर लिप्सा, प्रेम, आभार इत्यादि भावों के साथ माला को कुछ देर देखा, और फिर कुछ तय करके अपने होंठों से माला के होंठों पर हमला कर दिया। माला निश्चय नहीं कर पायी की वह अपना मुंह खोले या नहीं - क्योंकि निश्चित तौर पर उसके मुंह के स्वाद में विराट के वीर्य का स्वाद भी मिला हुआ था। लेकिन विराट के होंठों के सशक्त हमले से उसका मुंह खुल ही गया।

विराट की जीभ इस समय माला के मुंह के अंदरूनी हिस्से का मुआयना कर रही थी की उसके अपने ही वीर्य का स्वाद और महक महसूस हुई। वह बस क्षण मात्र को ही ठिठका और फिर पुनः माला को चूमना शुरू कर दिया। इस समय माला, विराट की गोद में बैठी हुई थी - अपने दोनों पैर उसके दोनों तरफ करके। ऐसे में उसकी योनि, जो कामुकता और थोड़ी देर हुए मर्दन के कारण रिस रही थी, विराट के अब मुरझाये हुए लिंग को छू रही थी। खैर, विराट ने माला को आलिंगनबद्ध किये, माला को बेतहाशा चूम रहा था। बीच बीच में वह कभी उसके स्तनों, तो कभी नितम्बो को दबा भी रहा था। ऐसे ही चूमते, सहलाते और दबाते हुए उसने माला को बिस्तर पर फिर से लिटा दिया। और चूमते हुए उसकी योनि पर आ गया। उसने ठहर के पहले उसकी योनि को सूंघा, और फिर उसे चूमना शुरू कर दिया - इसके साथ ही माला की सिसकियाँ और कराहें छूट पड़ी। माला ने विराट को बेहतर पहुँच देने के लिए अपनी टंगे पूरी तरह से खोल दी, जिसके कारण उसका योनि द्वार भी खुल गया। जैसा उसने उम्मीद करी थी, माला ने तुरंत ही विराट की जीभ अपनी योनि के होंठों पर महसूस किया। ऐसे में बीच बीच में विराट की जीभ उसके स्पन्दनशील भगनासे छू और चाट लेती। इस उन्माद में माला का पूरा शरीर ऐंठने लगा। विराट की जीभ अब पूरी निर्लज्जता के साथ माला की योनि के अन्दर तक आ-जा रही थी, साथ ही साथ उसके भगनास को भी चाट रही थी।

मुख-मैथुन का एक लय जम गया था - माला उन्माद के झटके खा रही थी और उसी उन्माद में कभी बिस्तर गद्दा पकड़ती तो कभी विराट का सर।

"ऒऒऒओह्ह्ह!" माला अब कामुक रूप से कराह रही थी। उसके कराहने की ध्वनि अब किसी चीख जैसी हो चली थी। लेकिन, विराट सब बातो को अनदेखा और अनसुना करके माला की योनि का भक्षण करने में आतुर था, और उसकी योनि की नयी नयी गहराइयों में समाता जा रहा था। माला को कामुक उन्माद से अब चक्कर आने लग गए थे। वह आनंद में विह्वल हो चली थी - उसको लग रहा था की मानो वह भारहीन हो गयी थी और आसमान में तैर रही थी। आनंद के झटके उसके पूरे वजूद पर फैल रहे थे।

भावातिरेक माला अंततः अपने आनंद के चरम बिंदु पर पहुच ही गयी। उसकी योनि उसके उन्माद के साथ साथ ही कम्पायमान हो गयी और उसमे से कोई द्रव निकल पड़ा। सिसकी भरी हिचकियों और आहों से कमरे का वातावरण गुंजायमान हो गया। कामुक आनंद के आसमान पर तैरती माला धीरे धीरे सुख के धरातल पर वापस आने लगी। अंततः उसने अपनी आखें खोली - सामने विराट का मुस्कुराता चेहरा देख कर वह स्वयं भी मुस्कुराने लगी। उसने विराट को अपने ऊपर खीचकर आलिंगनबद्ध कर लिया और प्यार की मीठी मीठी बाते करते हुए दोनों धीरे धीरे निद्रा के आगोश में समा गए।

सुबह का समय - सूर्य की किरणें खिड़की पर लगे परदों से छन छन कर कमरे में आने लगीं - लेकिन आलस्य और मीठी निद्रा के कारण पल्लवी अपनी आँखें नहीं खोलना चाहती थी। अतः वह ऐसे ही आँखे बंद किए, करवट लिए लेटी हुई थी। ठीक उसी की तरह रूद्र भी करवट लेकर लेटा हुआ था - और पल्लवी के ऊपर से होते हुए उसके एक स्तन को पकडे हुए था। पल्लवी को अपने स्तन पर रूद्र के हाथ की पकड़ बहुत ही सुखद लगती थी - विशेषतः उसके हाथ की गरमी का एहसास! उसी आनंद में अलसाई हुई पल्लवी लेटी हुई थी। लेकिन उसको यह एहसास भी हो रहा था की अब रूद्र जाग रहा था - क्योंकि वह उसके लिंग में आते कड़ेपन को अपने नितम्ब पर महसूस कर रही थी। इस एहसास के आते ही पल्लवी ने स्वतः ही अपने नितम्ब से रूद्र के जघन क्षेत्र का घर्षण शुरू कर दिया। युवा शरीरों की कामेच्छा वर्णनातीत होती है - कल संध्याकाल ही हुए रूद्र और प्रियंका के समागम ने पल्लवी के मन में काम-क्रिया की तीव्र इच्छा जागृत कर दी थी, किन्तु रूद्र तब तक थक चुका था और पल्लवी बस मन मसोस के रह गयी। लेकिन इस समय एक और रति सम्भोग करने की संभावना बढ़ रही थी। इस सम्भावना के पूर्वानुमान से पल्लवी के स्तनाग्र भी अब कड़े हो रहे थे।

धीरे धीरे रूद्र निद्रा से चेतना की तरफ आ रहा था, और ऐसे में उसको सबसे पहला एहसास पल्लवी के कोमल शरीर का हुआ - अपने स्तंभित लिंग पर पल्लवी के कोमल नितम्ब, हाथ में पल्लवी के कोमल स्तन और कठोर होते हुए स्तनाग्र और नथुनों ने पल्लवी की भीनी भीनी महक का एहसास। उसके लिए पल्लवी के साथ सम्भोग सिर्फ सम्भोग नहीं था - बल्कि एक प्रेम संवाद था। भला कोई अपनी प्रेमिका से संवाद करते हुए थकता है? रूद्र अपना हाथ पल्लवी से स्तन से हटा कर उसकी कोमल और चिकनी योनि तक ले गया और उसके जांघो को थोडा सा खोल कर उसके भगनासे से छेड़-छाड़ करने लगा। थोड़ी देर ऐसे ही खिलवाड़ करते हुए अपनी तर्जनी पल्लवी की योनि में प्रविष्ट कर दी। पल्लवी की योनि काम-रस से पहले ही भीग चुकी थी - लिहाजा रूद्र ने अब अपनी उंगली को ही शस्त्र बना कर पल्लवी की योनि के अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया। बीच बीच में वह उसके भगनासे को रगड़ता और छेड़ता रहता।

कुछ देर ऐसे ही खेलने के बाद रूद्र अचानक ही पीठ के बल लेट गया, साथ ही साथ उसने पल्लवी को भी अपने ऊपर ही खीच लिया। दोनों इस समय भी करवट वाली स्थिति में ही थे, बस अंतर यह था की पल्लवी अब रूद्र के ऊपर ही लेटी हुई थी। उसने पल्लवी की गर्दन के पीछे वाले भाग को चूम चूम कर पल्लवी के शरीर के रोंगटे खड़े कर दिए साथ ही साथ उसकी काम भावना के आखिरी तार भी स्पंदित कर दिए। यह सब करते हुए भी उसकी उंगली ने पल्लवी की योनि का साथ नहीं छोड़ा और उसके साथ बराबर मैथुन करती रही।

कुछ देर ऐसे ही करने के बाद उसने पल्लवी को सहारा देकर अपने ऊपर ऐसे बैठा लिया, जिससे दोनों एक दुसरे को देख सकें और जिससे पल्लवी के दोनों पैर रूद्र के शरीर के दोनों ओर हो जाएँ। पल्लवी यह इशारा समझ गयी - उसने बिना कोई देर किये हुए रूद्र के पूर्ण स्तंभित लिंग को पकड़ लिया और उसके शिश्नग्रच्छद को पीछे सरका दिया। उसके बाद उसने रूद्र के नग्न लिंग-मुंड को अपनी योनिमुख पर कुछ देर फिराया जिससे उसका भी उपस्नेहन (lubrication) हो जाए। फिर उसने लिंग को अपनी योनि के मुख पर टिका कर नीचे की ओर जोर लगाया। उसकी योनि कल की अत्यधिक काम-क्रिया के कारण थोड़ी सूज गयी थी और हलकी कष्टदायी हो चली थी - लिहाजा उसके कंठ से आनंद और कष्ट की मिली जुली आह निकल पड़ी। रूद्र भी यह बात जानता था, अतः उसने पल्लवी के नितम्बो को इस तरह सम्हाल रखा था जिससे उसकी गति अधिक तीव्र न हो पाए। कुछ देर पल्लवी ही उसके लिंग पर ऊपर नीचे होती रही, फिर रूद्र ने भी नीचे से धीरे धीरे धक्का लगाना शुरू कर दिया। पल्लवी को हाँलाकि कष्ट हो रहा था, लेकिन रूद्र के लिंग ने उसकी योनि का वह "स्विच" पुनः "ओन" कर दिया था, जो उसको वासना से सराबोर कर देता था। लिहाजा अब वह काम उन्माद के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोच पा रही थी और इसका प्रभाव उसके धक्को की गति और ऊर्जा दोनों पर ही साफ़ दिखाई देने लगा। रूद्र भी नीचे से उसकी गति में गति मिलाए हुए था - उसके हाथ इस समय उसके स्तनों को थामे हुए उनका मर्दन कर रहे थे।

दोनों के शरीरों के टकराने से उत्पन्न होने वाली 'फट फट' की ध्वनि से पूरा कमरा गुंजायमान हो गया। लेकिन इन सब बातो से बेखबर दोनों प्रेमी सम्भोग करते रहे - बस सम्भोग की गति कभी तेज़ तो कभी धीरे होती रहती। यौन क्रिया का ऐसा मादक दृश्य मानो कभी ख़तम ही नहीं होता। रूद्र के हाथ पल्लवी के सारे शरीर पर घूम रहे थे, और जब उसका एक हाथ पल्लवी की गुदा के पास आया तो रूद्र को एक शैतानी सूझी।

उसने अपने दायें हाथ की तर्जनी को अपनी लार से तर करके उसकी गुदा में अचानक ही डाल दिया। इस अप्रत्याशित हमले से पल्लवी चिहुक गयी और लड़खड़ा कर रूद्र के ऊपर गिर गयी। किन्तु रूद्र के लिंग की लम्बाई के कारण योनि पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकी। लेकिन अब दोनों को काम-क्रिया का एक नया आसन मिल गया। रूद्र ने पल्लवी को आलिंगनबद्ध कर लिया और उसके होंठो को चूमने लगा। उसके लिंग के धक्के चलते ही रहे, लेकिन साथ ही साथ उसकी तर्जनी भी पल्लवी की गुदा की गहराइयों को टटोलने लगी।

पल्लवी के लिए यह नया अनुभव था - नया और कामुक! हाँलाकि, सम्भोग की गति अब धीरे हो गयी थी, लेकिन इस नए यौन क्रिया, जिसमे उसके तीनो नैसर्गिक छिद्रों का चोदन हो रहा हो, के कारण पल्लवी की रति-निष्पत्ति मानो एक विस्फोट सामान हुई। उन्माद के अतिरेक से शरीर की थरथराहट के साथ साथ उसकी चीख भी निकल गयी, लेकिन रूद्र के मुंह में घुट कर रह गयी। लेकिन इसके बाद भी उसका क्रंदन जारी रहा - पल्लवी की आहें रूद्र के हर धक्के के साथ उन्मुक्त होकर निकल रही थी। पल्लवी का चरम-आनंद सामान्य से थोडा अधिक देर तक चला, लेकिन अंततः वह निढाल होकर रूद्र के ऊपर ही गिर गयी। रूद्र भी आज सामान्य से ज्यादा ही देर तक धक्के लगता रहा, लेकिन अब वह भी नहीं रुक पाया। उसके वीर्य का पहला गर्म गोला पल्लवी ने अपने अन्दर की दीवारों पर साफ़ महसूस किया, फिर अगले 2 सेकंड तक रूद्र ने कम से कम 4-5 बार वीर्य छोड़ा। रूद्र के लिङ्ग का कड़ापन धीरे धीर कम होने लगा, लेकिन पल्लवी ने थोड़ा बहुत कसमसाकर यह सुनिश्चित कर लिया की रूद्र उसकी योनि से बाहर न निकल सके। आनद की लहरें इस समय दोनों ही प्रेमियों को भिगो रही थी। दोनों ही आँख बंद किये एक दूसरे से लिपटे हुए तब तक पड़े रहे जब तक रूद्र का लिंग सिकुड़ कर स्वयं ही बाहर निकल गया।
 
पल्लवी ने अतिशय संतुष्टि से निःश्वास भरी और साथ ही एक बड़ी सी मुकान उसके होंठो पर फ़ैल गयी।

"पल्लो ..... हैप्पी?"

"ब्लिस्फुली"

रूद्र भी यह सुन कर मुकुराया और पल्लवी को दुलारता और चूमता रहा। दोनों ही देर तक चुपचाप इस उत्कृष्ट अनुभव का स्वाद लेते रहे।

दोनों इस बात से बेखबर थे की उनकी दबी घुटी चीख पुकारें अनसुनी नहीं जा रही थी। विराट और माला दोनों ही जाग चुके थे, और ड्राइंग रूम में बैठे हुए उनको यह सब सुनाई दे रहा था। दोनों ने एक दुसरे की तरफ देखते हुए मुस्कान फेंकी।

"दोनों बच्चों में ना जाने कितनी एनर्जी है! कल तो इन दोनों ने दिन में कम से कम चार पांच बार किया था।" माला ने एक रहस्य खोलते हुए बोला।

"हा हा! अच्छा है। दोनों अभी छोटे हैं, कम जिम्मेदारियां हैं, इसलिए यह खेल खूब खेल लेना चाहिए। आगे काम और बच्चों का बोझ रहेगा। अभी तो इनके मज़े के दिन हैं।" विराट अस्वाभाविक रूप से सेक्स के विषय पर बहुत ही नरम दिख रहा था। संभवतः कल की घटनाओं का यह सकारात्मक प्रभाव था।

"हा हा ...! यह बात तो हम पर भी लागू होती है। न बच्चों का, और न की काम का बोझ। तो हम लोग क्या करें?" माला ने उसको छेड़ते हुए पूछा।

"मेरी जान! अब तो रोज़ तुम्हारा बाजा बजाऊँगा।" दोनों के ही ठहाके छूट पड़े। कुछ देर तक दोनों यूँ ही हँसते बोलते रहे।

"अच्छा सुनो!" माला ने अचानक ही कुछ सोचा और बोल दिया, "तुमसे एक बात पूछूं?"

"हाँ, बोलो न"

"मेरा कल से बहुत मन हो रहा है की हम लोग कोई फिल्म देखने चलेंगे? अभी तो पल्लवी और रूद्र भी घर पर हैं, तो फिर हम लोग आज पूरा दिन मस्ती कर सकते हैं" माला ने रुकते हुए विराट की तरफ देखा - उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया था, "तुमको तो मालूम है न की हम लोगो ने साथ में कोई आउटिंग नहीं की है। तुम तो पूरा समय काम में फंसे रहते हो ....!"

"अच्छा हाँ बाबा! तुमको इतनी सी बात के लिए इतना बड़ा केस बनाने की क्या ज़रुरत है? ऐसा करते हैं की, सवेरे सवेरे का शो देखते हैं, और फिर दिन भर मस्ती करते हैं आज ...." बोलते बोलते वह रुक कर मुस्कुराने लगा। फिर बोला, "मस्ती करने की बात सुन कर मा बदौलत का फिर से खड़ा हो रहा है" फिर थोड़ा रुक कर उसने कुछ सोचा, "अच्छा मेरी जान! एक और बच्चे को लेकर तुम्हारा क्या ख़याल है?" उसने आँख मारते हुए कहा।

"इस उम्र में? न बाबा न। यह तो पल्लवी के बच्चे खिलाने की उम्र है हमारी।" माला ने मुस्कुराते हुए कहा। "हाँ! यह बात तुम पांच साल पहले कहते तो शायद सोचा भी जाता।"

"हा हा हा ..." दोनों ही इस बात पर हंसने लगे। इतने में ही पल्लवी ड्राइंग रूम में आ गयी। माला ने देखा की उसने कल के ही जैसा एक छोटा, लेकिन अपारदर्शी फीके नारंगी रंग का टी-शर्ट पहना हुआ था और सफ़ेद रंग का निकर। इन कपड़ों ने उसके शरीर की आकर्षकता और भी अधिक बढ़ा दी थी।

'हे भगवान! ये तो किसी भी तरह के कपड़ों में कितनी प्यारी सी लगती है! जैसे की कोई प्यारी प्यारी गुडिया हो।' माला ने सोचा।

"पा...पा..." कहते हुए वह विराट से पहले तो लिपट गयी, और फिर उसकी ही गोदी में आकर सिमट कर बैठ गयी और अपनी बाहें विराट के गले में डाल दी। विराट ने भी सावधानी और बेढंगे तरीके से उसको पकड़ा हुआ था। गोदी में सिमटने से पल्लवी थोड़ा इस प्रकार झुक गयी की विराट को उसके नारंगी टी-शर्ट से उसका वक्ष-विदरण दिखाई देने लगा। उसने ध्यान दिया की पल्लवी के स्तन छोटे किन्तु पूर्ण रूप से गोलाकार थे। स्पष्टतः पल्लवी ने ब्रा नहीं पहना हुआ था, अतः उसके हिलने डुलने से उसके स्तनों के हिचकोलों से विराट को अपने स्वयं का कामोत्तेजन ध्यान में आ गया और उसके जघन क्षेत्र में उत्तेजना जागृत होने लगी। वह सोफे पर बैठे बैठे ही कसमसाया, जिससे इस अचानक ही उत्पन्न हुई असुविधा से आराम मिल सके।

"कैसा है मेरा बच्चा?" विराट ने जैसे तैसे संयत आवाज़ में कहा।

"मैं एकदम ठीक हूँ पापा। आप कैसे हैं और कब आये?"

दोनों एक दुसरे का कुशलक्षेम पूछते हुए इधर उधर की बाते करने लगे। कुछ ही पलों में रूद्र ने भी उन तीनो की संगोष्ठी में शामिल हो गया। इससे विराट के मन में उठने वाला तनाव कम हो गया। आपस में ऐसे ही बाते करते हुए माला और पल्लवी ने नाश्ता बनाया और सभी ने साथ में मिलकर नाश्ता किया। विराट ने आज बाहर जा कर फिल्म देखने और मस्ती करने की बात कही तो पल्लवी और रूद्र भी खुश हो गए की, चलो आज मस्ती करेंगे।

पल्लवी ने सुझाव दिया की प्रियंका को भी साथ ले चलते हैं, जिसको सभी ने मान लिया। नाश्ते के बाद लोग बारी बारी नहाने का उपक्रम करने लगे, और इसी बीच पल्लवी ने प्रियंका को फ़ोन करके सिनेमा हॉल समय पर पहुचने को बोल दिया।

यह एक सुखद गर्मी वाला दिन था - गर्मी थी, लेकिन हवा चलने के कारण उसकी तीव्रता कम महसूस हो रही थी। ऐसे मौसम में लोग हलके कपड़े पहनना पसंद करते हैं। लिहाजा, पल्लवी ने एक स्कर्ट और टी-शर्ट पहनी हुई थी, और माला ने सूती शलवार-कुरता। विराट ने जीन्स और टी-शर्ट, और रूद्र ने भी जीन्स और टी-शर्ट पहना हुआ था। वहां उन्होंने ने देखा की प्रियंका पहले से ही सिनेमा हॉल पहुच गयी थी और उसने सबके लिए टिकेट भी खरीद लिए थे। प्रियंका ने एक कुर्ती और स्कर्ट पहना हुआ था।

पिक्चर हाल के अन्दर जाने के लिए काफी जतन करना पड़ा - तथाकथिक सुरक्षा जाँच, फिर फिल्म के दौरान खाने पीने की सामग्री का इंतजाम इत्यादि। इस पूरे समूह में सबसे जवान और बलवान होने के कारण रूद्र को ही यह काम करना पड़ा। खैर, वापस आकर उसने देखा की प्रियंका की सीट दिवार से एकदम लगी हुई थी, उसके बगल में सीट खाली थी, उसके बगल पल्लवी, उसके बगल माला और उसके बगल विराट। मतलब, रूद्र की सीट पल्लवी और प्रियंका के बीच में थी।

"जीजू .... आप मेरे साथ बैठिये .." प्रियंका ने चहकती हुई आवाज़ में कहा।

"हाँ हाँ ... ज़रूर बैठिये। साली साहिबा आज बहुत मेहरबान हैं।" पल्लवी ने बनावटी चिढ़न में प्रत्युत्तर दिया।

इसके जवाब में प्रियंका ने जीभ निकाल कर पल्लवी को चिढाया। इस पूरे छेड़खानी में रूद्र को थोड़ी सी झिझक हुई - कल की बात याद करके - लेकिन, अभी कोई चारा नहीं था। अपनी झिझक को दबाते हुए, रूद्र पल्लवी और प्रियंका के बीच में आकर बैठ गया।

रूद्र के बैठते ही पल्लवी उसके कान में फुसफुसाई, "जानेमन, आज तो हम दोनों ने ही स्कर्ट पहनी है ..... किसके ऊपर मेहरबानी करोगे?"

रूद्र से कुछ बोलते न गया, "क्या मतलब?"

"मतलब यह, की मैंने तो पैंटी पहनी है, लेकिन आपकी साली ने नहीं.... शी इस आल योर्स... लेकिन थोड़ी बहुत मेहरबानी मुझ पर भी कर देना..."

"तुम लोगों को और कुछ नहीं सूझता?"

"अरे! इसमें क्यूँ नाराज़ होते हो? तुमको तो खुश होना चाहिए की मेरे जैसी बीवी मिली है तुम्हे! वैसे भी ये बेचारी तुम्हारे प्यार में पागल हुई जा रही है।" पल्लवी ने आँख मारते हुए कहा।

"ह्म्म्म ... लेकिन मैं तुमको किसी के साथ शेयर नहीं कर सकता .. और ऐसा सोचना भी मत!"

"मेरी जान! तुमको छोड़ कर मुझे कोई चाहिए भी नहीं। तुम्हारे साथ मैं इतनी खुश हूँ की बता ही नहीं सकती। खैर, वह एक अलग बात है। फिल्म शुरू होते ही तुम भी शुरू हो जाना ... ओके?"

रूद्र ने उदासीनता दिखाई और कुछ कहा नहीं। उसका जीवन पिछले एक दो दिन में ही काफी बदल गया था। ऐसा नहीं था की उसको विभिन्न प्रकार की लड़कियों के साथ संसर्ग करने में कोई आपत्ति थी। लेकिन, चालाकी और छल के साथ जिस प्रकार इन दोनों लड़कियों ने उसके साथ खिलवाड़ किया था, उससे उसकी मर्दानगी को हल्का आघात लगा। किसी भी मानव के लिए नियंत्रण और प्रभुत्व, सबसे महत्वपूर्ण वस्तुएँ होती हैं। इनके छीन जाने से किसी को भी प्रसन्नता नहीं होती - वह चाहे कितनी भी मादक वस्तु ही क्यों न हो। रूद्र को लगा की एक प्रकार से उसका अपमान हो रहा हो।

खैर, वह इस समय खीज कर बैठा रहा। थोड़ी ही देर में सिनेमा हॉल की बत्तियां बुझा दी गयीं, और सामने के चित्रपट पर कलाकार अपनी अपनी अदाएं दिखाने लगे। इतने में उसने अपने जींस के ऊपर से ही लिंग पर किसी का स्पर्श महसूस किया। यह पल्लवी थी। उसका हाथ रूद्र के जींस की ज़िप को नीचे उतारने, और तत्पश्चात उसमे से रूद्र के लिंग को बाहर निकालने में व्यस्त था। रूद्र ने एक दृष्टि पल्लवी पर डाली - वह सामने के चित्रपट को देखे डाल रही थी - जिससे मम्मी पापा को कोई भी संदेह न हो।

अंततः, रूद्र को अपने लिंग पर पल्लवी की उँगलियों और हॉल के वातानुकूलन का स्पर्श महसूस हुआ - मतलब उसका लिंग अब बाहर निकल चुका था। पल्लवी उसको धीरे धीरे सहला रही थी। इतने में उसने अपने कान में प्रियंका की आवाज़ सुनी।

"जीजू ... दीदी ने आपको कुछ बताया?"

रूद्र ने कुछ कहा नहीं, बस प्रियंका का हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर रख दिया। दोनों लड़कियों के हाथ आपस में छू गए - और उसी क्षण मानो दोनों में होड़ लग गई, की कौन रूद्र के लिंग को हस्तमैथुन देगा। पल्लवी शायद इस समय अधिक मूड में नहीं थी, इसलिए उसने हार मान ली। लेकिन, प्रियंका अपना मोर्चा सम्हाले रही। इस छेड़खानी के कारण रूद्र का लिंग तेजी से लम्बा होने लगा, और इस बदलाव को प्रियंका की उँगलियों ने महसूस किया। उसके गले से एक इच्छा भरी आह निकल गयी।
 
"ओह! आई सो मच विश टू हैव इट इनसाइड मी!"

"डोंट वरी! मेरी बीवी अगर ऐसे ही तुमको बढ़ावा देती रही, तो शायद तुम मेरी दूसरी बीवी ही बन जाओगी।" रूद्र ने कहा। अब तक उसने भी अपनी मर्यादा छोड़ दी थी। इस समय उसका हाथ प्रियंका की पीठ से होते हुए उसके छोटे छोटे स्तन पर चल फिर रहा था। बीच बीच में वह उसके प्राप्य स्तन को मसल भी दे रहा था।

"राईट नाऊ, आई ऍम इंटरेस्टेड इन दिस हॉट लिटिल पुसी ऑफ़ योर्स!" रूद्र ने बेपरवाही से कहा।

"मैं भी तो कब से सोच रही हूँ ... आप मेरे बूब्स से हाथ हटा कर वह पर रखिये न ..." प्रियंका फुसफुसाई, और उसने अपनी जांघें खोल दी। साथ ही साथ उसने रूद्र के हाथ को अपनी योनि में दाखिला दे दिया।

"मैं भी तो कब से सोच रही हूँ ... आप मेरे बूब्स से हाथ हटा कर वह पर रखिये न ..." प्रियंका फुसफुसाई, और उसने अपनी जांघें खोल दी। साथ ही साथ उसने रूद्र के हाथ को अपनी योनि में दाखिला दे दिया। रूद्र बदला लेना चाहता था - उसने प्रियंका के भगोष्ठ को कस के मसल दिया।

प्रियंका चिहुँक उठी।

"जीजू ..." उसने शिकायती लहजे में पूछा, " ... आपने ऐसा क्यों किया?"

"इसलिए क्योंकि तुम दोनों ने मुझे धोखा दिया ... अब इसकी सजा तो ज़रूर मिलेगी .." कहते हुए रूद्र ने प्रियंका की जांघें और खोल दी, जिससे उसके हाथ को उसकी योनि में सहज दाखिल मिलता रहे। रूद्र भी उसकी योनि की रसीली और कसाव भरी दरार में अपनी उंगली अन्दर बाहर करने लगा।

"म्म्म्म्म ... यस! दैत फील्स सो गुड!" प्रियंका मंद, आनंदित स्वर में बड़बड़ाई, और साथ ही साथ अपनी चिकनी योनि हिला हिला कर रूद्र की उँगलियों को और अन्दर लेने का प्रयत्न करने लगी।

प्रियंका इस मादक क्रिया से पूर्णतः मदमस्त हो चली थी - इस बात का साक्ष्य उसकी योनि में बढ़ता हुआ गीलापन था। रूद्र की उंगलियाँ इस समय प्रियंका की योनि रस से पूरी तरह गीली हो चुकी थीं; उसकी योनि की मांस पेशियाँ लगातार संकुचित होते हुए, रूद्र की उँगलियों की अच्छी मालिश कर रही थीं।

माला का दिमाग झनझना उठा - 'क्या वह सही देख रही है?'

दरअसल हुआ यह था की फिल्म देखते हुए अचानक ही माला की नज़र अपने दाहिने तरफ उठ गयी थी, और हाल के मंद प्रकाश (जो चित्रपट से ही आ रहा था) में उसने जो कुछ देखा उस पर यकीन करना उसके लिए संभव नहीं हो पा रहा था।

'रूद्र का लिंग प्रियंका के हाथ में?' रूद्र का लिंग सिर्फ प्रियंका के हाथ में ही नहीं था, बल्कि वह पूरी तरह से उत्तेजित भी था और प्रियंका अपने हाथ को उस पर तेज़ी से आगे पीछे कर रही थी। माला ने और ध्यान से देखा - रूद्र का हाथ भी लगता है प्रियंका की योनि में व्यस्त था। कुछ ठीक से दिखा नहीं। लेकिन इस विचार मात्र से ही उसके दिमाग में विस्फोट सा हो गया। क्रोध और असहायता में वह कांपने लग गयी।

'पल्लवी! मेरी बच्ची!' माला अपनी बेटी के लिए दुखी हो गयी की उसको ऐसा निर्लज्ज और धोखेबाज पति मिला, जो अपनी पत्नी ले बगल बैठ कर उसकी ही सहेली के साथ ऐसे गुलछर्रे उड़ा रहा था।

'उसके बगल ... क्या पल्लवी को नहीं दिख रहा है यह सब?' माला ने ध्यान दिया की रह रह कर पल्लवी रूद्र के लिंग को देख रही है .....

'हे राम! तो क्या यह इन तीनो की मिली-भगत है? पल्लवी भी? निर्लज्ज कहीं की! हमने तो ऐसी शिक्षा नहीं दी इसको! कैसे कर सकते हैं ये लोग बेशर्मी का ऐसा नंगा नाच! और वह भी तब जब की हम लोग - पल्लवी के माँ बाप - इनके बगल में ही बैठे हैं!'

इन विचारों से माला को उबकाई सी आ गयी ... उससे अब हाल में रुका नहीं जा पा रहा था।

"माँ! फॉर हेवेन्स सेक! दीस टू हैव आलरेडी मेड लव!" पल्लवी ने अपनी चिल्लाती हुई माँ पर एक और वज्रपात किया।

"क्या? बेहया लड़की! ये कहते हुए तुझे शर्म नहीं आती?"

"कैसी शर्म माँ? दिस इस जस्ट एक्सपेरिमेंट! प्रियंका इस नोट ओनली माय फ्रेंड, बट आल्सो लाइक माय सिस्टर! एंड आई वांटेड टू गिव हर द बेस्ट गिफ्ट एवर!" माला अवाक रह गयी, और पल्लवी ने कहना जारी रखा, ".... एंड, आई ऍम सो हैप्पी टू हैव अ हसबैंड लाइक रूद्र ..... हू अंडरस्टैंड्स मी एंड सपोर्ट्स मी ..."

माला समझ नहीं पा रही थी की वह क्या करे। ऐसी परिस्थितियों से उसका आमना सामना कभी भी नहीं हुआ था। विराट बगल में यूँ ही चुपचाप खड़ा हुआ था और इस पूरे वार्तालाप में कोई मदद नहीं कर रहा था। माला की खीझ बढती ही जा रही थी। और यह बेशरम रूद्र सर लटकाए कुर्सी पर बैठा था। प्रियंका ने इन लोगो के साथ न आने में ही अपनी भलाई समझी, और पिक्चर हाल से सीधे अपने घर चली गयी।

"आप ऐसे चुपचाप क्या खड़े हैं? कुछ कहते क्यों नहीं?" माला रूआंसी आवाज़ में गिड़गिड़ाई।

"बेटा! आई नो, की यह तुम्हारा पर्सनल मामला है .. लेकिन फिर भी ... आई मस्ट से! आई ऍम शाक्ड ...!" यह विराट ने बोला।

"पापा, दिस इस ओनली सेक्स! इसमें क्या बड़ी बात है? शादी में सेक्स एक बहुत छोटी सी बात है .. असल बात तो पति पत्नी का आपस में विश्वास, प्यार और सपोर्ट होना है ... है न पापा? रूद्र ने वही किया जो मैंने उनको करने को कहा। एंड आई ऍम प्राउड टू से दैत ही इस द मोस्ट फैथफुल पर्सन आई नो .... इसलिए उनको तो आप लोग कुछ मत बोलिए ..."

पल्लवी की इस बात के बाद कमरे में मरघट जैसा सन्नाटा छा गया। विराट ने परिस्थिति को समझते हुए बिना कुछ कहे ब्रांडी के चार गिलास बनाये और चुपचाप ही सभी तो थमा दिया।

"आल ऑफ़ यू ... प्लीज, जस्ट ट्राई टू रिलैक्स! हैव योर ड्रिंक्स एंड देन व्ही टॉक ... ओके?" विराट ने माहौल को हल्का करने के लिए कहा।

"नहीं पीना मुझे कुछ ..." माला का पारा शायद और बढ़ गया, और वह पाँव पटकते हुए अपने कमरे में चली गयी।

विराट ने उसको जाने दिया, और फिर बच्चों से मुखातिब होकर कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था की मैं अपने बच्चों से यह कहूँगा .. लेकिन, यार! तुम लोगो को अपने आस पास का ध्यान तो रखना चाहिए न, यह सब करते हुए? तुम लोग बड़े हो गए हो, और शादी-शुदा हो .. इसलिए सेक्स तुम लोगो के लिए नयी बात नहीं है। और मुझे मालूम है की इस तरह के प्रयोग से शादी का स्पाइस बढ़ता है। लेकिन फिर भी .... हर काम के लिए सही समय और जगह होती है ..."

"पापा, आई ऍम सॉरी दैट आई अपसेट यू ..." यह रूद्र था ... तब से अब तक उसने यह पहले शब्द बोले।

"बट नॉट सॉरी फॉर व्हाट यू डिड?"

"नो", रूद्र ने कहा, "... नॉट रियली!"

"गुड टू नो दैत ... एंड आई मीन एवेरी वर्ड ऑफ़ इट! यू नो? माला के लिए ..... और काफी हद तक मेरे लिए भी .... सेक्स .... एक अपरिचित सब्जेक्ट रहा है। हमने कभी इसको कभी बहुत ही बेसिक लेवल से अधिक एक्सप्लोर नहीं किया। लेकिन, सच कहूँगा, तुम लोगो के आने से हमको इसके बारे में एक नया ज्ञान हुआ है। कल का दिन हमारी सेक्स लाइफ के लिए बहुत ही इंटरेस्टिंग था .... सो, थैंक यू माय चिल्ड्रेन ... फॉर ब्रिंगिंग सम स्पाइस टू आवर लाइफ आल्सो!"
 
पल्लवी और रूद्र के होंठो पर एक फीकी मुस्कान आ गयी। दोनों को मालूम था की विराट क्या कह रहा था - आखिरकार, उन दोनों ने माला को एक पूर्व अपरिचित, व्यभिचारी रूप में देखा था। वैसे उन दोनों के लिए सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी की विराट अत्यंत ही शांत होकर यह सब बाते कर रहा था।

विराट ने थोड़ा रुक कर कहना जारी रखा, "आई थिंक आई कैन रेक्टिफाई दिस सिचुएशन!"

पल्लवी और रूद्र ने विराट को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

"कम हियर ..." कह कर विराट ने उन दोनों को अपना प्लान समझाना शुरू कर दिया।

माला अपने बिस्तर पर नैराश्य और विषाद की भावना से ढीली बैठी हुई थी - अपने चारो तरफ से गाफिल, सामने की दिवार को एक टकटकी बांधे देखती हुई। उसका दिमाग भिन्ना रहा था - या यूँ कहिये की दिमाग में चक्रवात चल रहा था। इतने में वहां विराट आया - हाथ में ब्रांडी का गिलास और बोतल लिए। उसने माला को वह गिलास थमा दिया और पीने को कहा। माला ने शुरू में विरोध किया, लेकिन विराट के आग्रह पर उसने पीना शुरू कर दिया। उसका ध्यान कहीं और था, इसलिए बहुत ही तेज़ी से उसने ब्रांडी गटक ली। विराट ने उसका गिलास एक और बार भर दिया। माला मदिरा का सेवन कभी कभी ही करती थी - वस्तुतः उसको इसका व्यसन नहीं था। लेकिन मदिरा की आदत न होने से, पहले ही गिलास के प्रभाव से उसका सर चकराने लगा। फिर भी उसके अन्दर चल रही हलचल कम नहीं हुई। लेकिन अगले गिलास ने उसका सर हल्का कर दिया। साथ ही साथ विराट की स्वान्त्ना भरी बातो और स्पर्श ने उसके मन से नैतिकता के अवसाद को हटा दिया था।

माला ने जब से पल्लवी और रूद्र को रति-गमन करते देखा, उन दृश्यों ने उस पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था। वह यह बात सबके सामने स्वीकार नहीं कर सकती, लेकिन उन दोनों के नग्न शरीरों को देख कर उसके मन की पहली प्रतिक्रिया कामुक लिप्सा की हुई थी। और, रूद्र और प्रियंका के बीच चल रहे कामुक कृत्य के दृश्य से दरअसल उसको इर्ष्या भी हुई थी। उसने एक दो बार यह सोचा भी था, की अगर पल्लवी या प्रियंका की जगह पर वह खुद होती तो उसे कैसा लगता! मदिरा के प्रभाव से यह भावना पूरी तरह अनावृत हो गयी थी, और अब वह इस बारे में सोचे बगैर नहीं रह पा रही थी।

अभी उसके हाथ में ब्रांडी से भरा तीसरा गिलास था ... उसको पीते हुए माला ने देखा की विराट उसकी शलवार को उतार चुका है और इस समय उसके कुर्ते का बटन खोल रहा था। कुछ ही क्षणों में माला सिर्फ ब्रा और पैंटीज में बिस्तर पर बैठी हुई थी। उसका सर इस समय हवा में उड़ रहा था। उसके अपने साथ होने वाली बातो का संज्ञान था, लेकिन उसकी किसी तरह के प्रतिरोध करने की क्षमता काफी कम हो गयी थी। माला ने देखा की विराट इस समय अपना अंडरवियर उतार चुका था, और पूर्णतः नग्न हो गया था।

रूद्र, विराट के बताये हुए प्लान से थोड़ा अनिश्चित लग रहा था।

"पल्लवी, यार .. वहां पर मैं ऐसे नंगा कैसे जाऊँगा? वहां पर पापा और माँ भी तो हैं?"

"माँ के सामने तो वैसे भी नंगे जा चुके हो न? और यह न भूलो की जब हम वहां पर होंगे तो हम चारों लोग ही नंगे रहेंगे। तुम अकेले ही क्यों शर्मा रहे हो?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा। साथ ही साथ पल्लवी ने उसके अंडरवियर को नीचे भी सरका दिया। रूद्र का लिंग अर्ध-उत्थान की अवस्था में आ गया था।

"जनाब रेडी हैं?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा। वह खुद भी इस समय पूर्ण रूप से नंगी थी। "चलें अन्दर?" रूद्र ने स्वीकृति में सर हिलाया।

"जनाब रेडी हैं?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा। वह खुद भी इस समय पूर्ण रूप से नंगी थी। "चलें अन्दर?" रूद्र ने स्वीकृति में सर हिलाया।

माला को समझ नहीं आ रहा था की विराट को अचानक यह क्या सूझी!

'हमारा दामाद और बेटी दोनों ही ऐसे बर्ताव कर रहे हैं, और यह मेरे कपडे उतार रहे हैं! और इतनी बेताबी की कमरे का दरवाज़ा भी नहीं बंद किया'

ऐसे ही सोचते हुए माला के स्तन अब आज़ाद हो गए थे।

'... हाय राम!' माला की सिसकी नक़ल गयी - विराट ने उसके स्तन को काट लिया था।

"कक्क्या क..क..कर रहे हो, य्य्यह?" माला ने नशे में धुत्त आवाज़ में प्रतिरोध किया, लेकिन उसमें कोई दम नहीं था। ऐसी बात से भला विराट कहाँ मानने वाला था! माला की दृष्टि सामने दरवाज़े पर ही लगी हुई थी की कोई आ ना जाए..... ऐसी मत्त अवस्था में भी माला को शर्मिंदगी, घबराहट और उलझन का मिला-जुला एहसास हो रहा था। लेकिन, यही सोचते हुए उसके मन में एक नयी बात कौंध गयी, और वह यह की यदि कोई आ जाए और हम दोनों को नंगेपन की ऐसी अवस्था में देख ले तो?

आगे माला ने जो देखा उसको देख कर उसके दिमाग में मानो कई सारे ज्वालामुखी एक साथ धधक उठे! पल्लवी और रूद्र, दोनों एक दूसरे को चूमते, चाटते, कराहते, सिसकते उसके कमरे में प्रविष्ट हुए। और कोई सामान्य तरीके से नहीं - यौन क्रिया करने की, उन दोनों में न जाने कहाँ की अत्यावश्यकता आ गयी की एक पैसे का धीरज ही नहीं! अपने माँ बाप के कमरे में चले आये - और वह भी नंगे! पूरे नंगे!!

'हे ईश्वर! यह क्या दिखा रहे हो मुझको? इन दोनों को अपने आस पास का क्या कोई भी होश नहीं है!' माला के लिए यह तो अति हो चली थी। रूद्र, बिलकुल बेपरवाह सा, पल्ले के स्तनों का मर्दन करते और उसको बुरी तरह से चूमता-चाटता हुआ उन्ही दोनों की तरफ आ रहा था।

'हमारी तरफ! हाय राम!' उसी समय माला को अपने नितांत नंगेपन का एहसास हुआ। वह दोहरी हो कर अपने बिस्तर पर सिमट गयी। लेकिन विराट की क्रिया तो ज्यों-की-त्यों चल रही थी। ऐसा हो ही नहीं सकता था की विराट ने उन दोनो को देखा न हो, लेकिन वह कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था। वस्तुतः, उसकी स्वयं की काम-क्रिया इस युवा जोड़े के आ जाने से थोड़ी और सघन हो चली थी।

इस समय रूद्र पल्लवी को चूमते हुए उसके पीछे खड़ा हुआ था, लिहाजा पल्लवी का सम्पूर्ण सम्मुख शरीर माला और विराट के दर्शन के लिए प्रस्तुत था। पल्लवी उसकी बेटी थी - लेकिन उसको ऐसी अवस्था में देख कर विराट के शरीर में रुधिर का मानो एक भयंकर गोला छूट गया हो। वयस्क मैगज़ीनों के रंगीन पृष्ठों में उसने बहुत सी कंटीली कन्याएँ देखी थी, लेकिन ऐसा शरीर उनमें से किसी का भी न था। और उसी शरीर का भोग रूद्र को करते देख कर विराट की कामेक्षा वाली आग बुरी तरह से धधक उठी। उसका लिंग अपने पूर्ण उत्तेजन पर उठा गया।

पल्लवी और रूद्र की प्रत्येक रति-क्रीड़ा में संभोग की पूर्व क्रीड़ा, जिसको सामान्य भाषा में 'फोरप्ले' भी कहते हैं, सदा ही उपस्थित रहती थी। इस क्रिया के वह दोनों अब मझे हुए खिलाड़ी बन गए थे। आज भी कोई अलग बात नहीं थी। किन्तु उन दोनों ने कभी भी अपनी यौन क्रिया की नुमाइश नहीं की थी। इसलिए, उन दोनों का चाहे जितना भी अनुभव रहा हो, आज की क्रीडा एकदम नया ही अनुभव दे रही थी। पल्लवी ने देखा की उसके पिता ने उसको किस तरह की वासनात्मक और अभीष्ट दृष्टि से देखा, और उसके फलस्वरूप उनके लिंग के आकार में आया परिवर्तन भी उससे छुपा नहीं था।

रूद्र का हाथ पल्लवी के पीछे से आकर, उसके स्तनों को कुछ इस तरह मींज रहा था, की उसके स्तनाग्र सामने की तरफ पूरी तरह से निकल आ रहे थे। पल्लवी ने महसूस किया की रूद्र बहुत ही उत्तेजित हो गया था। पीछे खड़े होकर उसने अपने लिंग को पल्लवी की जांघों के बीच के हिस्से में कुछ इस तरह से बैठाया था की उसका लिंग, पल्लवी की योनि के नीचे से होते हुए सामने की तरफ दृष्टिगोचर हो रहा था।

विराट देख रहा था की पल्लवी के स्तन शर्तिया तौर पर माला के स्तनों से छोटे थे, लेकिन जिस तरह से वह निर्बाध होकर रूद्र के हाथो द्वारा दिए जा रहे आवभगत का मज़ा ले रही थी, वैसा मज़ा तो वह माला को कभी नहीं दे पाया था। विराट ने निश्चय किया की वह उन हर चीज़ की नक़ल करेगा जो उसके बेटी और दामाद कर रहे हैं। उसने भी माला के स्तनों का ठीक उसी समान मर्दन करना शुरू कर दिया - माला की कामुक कराह निकल पड़ी।

रूद्र ने पल्लवी को उसी बिस्तर पर बैठाया और उसके स्तनों को एक-एक करके, छोटे छोटे कौरों में खाने और चूमने लगा। रूद्र की इस स्थिति में, विराट को उसके लिंग का आकार दिखाई दिया। उसका लिंग इतना कड़ा हो गया था, की विराट को लगा उसमें से अभी किसी ही क्षण वीर्य छूट पड़ेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। रूद्र किसी पेशेवर खिलाड़ी के समान अपना मोर्चा सम्हाले हुए था। पल्लवी का हाथ प्रेम-पूर्वक अपने प्रिय डंडे पर लिपटा हुआ था, और बहुत धीरे-धीरे आगे-पीछे हो रहा था। उसकी देखा-देखी माला ने भी विराट के लिंग को अपनी मुट्ठी में बाँध लिया।

विराट का बुरा हाल था। ऐसे सेक्स तो उसने कभी करना तो दूर, सोचा भी नहीं था।

'ये दोनों हैं क्या! माला सही कर रही थी। कितनी एनर्जी है दोनों में ... मेरा तो कुछ ही देर में छूट जाएगा।' विराट के दिमाग में उधेड़बुन चल रही थी, 'यह आग मैंने लगा तो दी है, लेकिन बुझाने का बूता इस समय मुझ में नहीं है ... क्या किया जाए!?'

सोचते हुए ही उसने मन ही मन में एक निर्णय लिया, और माला की मुट्ठी में ही सम्भोग करने लगा। माला, जो की सामने चलने वाले सीन को देखने में लीन थी .. जब तक उसके नशे में धुत्त दिमाग को समझ आया की क्या हो रहा है, तब तक विराट के लिंग में उबाल आ गया था। वह कुछ कह या कर पाती, उसके हाथ में विराट का सफ़ेद वीर्य भर गया था और काफी कुछ बिस्तर पर भी गिर गया था। विराट ने निवृत्त होकर संतुष्टि की डकार भरी। पल्लवी और रूद्र इस आवाज़ को सुन कर अपनी मोहावस्था से बाहर आ गए और माला और विराट की तरफ देखने लग गए।

माला अपने बेहोशी की अवस्था में भी समझ पा रही थी की उसका कचरा हो गया है .. उसके शरीर में कामाग्नि जल रही थी, और विराट की नासमझी ने गड़बड़ कर दिया था। उसको उस समय तक अपनी योनि पर अजीब सी चिकोटियां काटने जैसा अनुभव होने लग गया था, और तभी ही विराट का पानी निकल गया। उसका दिमाग इस परिस्थिति का विश्लेषण कर पाने में सक्षम था,

'एक तो मैंने यह सब शुरू नहीं किया ... ;यकीन फिर भी यह तमाशा किया। अरे! जब रुक नहीं सकते हो तो करते ही क्यों हो!' माला नें मन हिमं विराट को धिक्कारा।

विराट मानो उसके मनोभावों को समझते हुए उसी समय बोला, "माला, आई नो। बट प्लीज डोंट हेट मी। यह आग मैंने लगाई थी, और उसको बुझाने का इंतजाम भी मैं ही करूंगा ...." कहते हुए उसने रूद्र की तरफ देखा।

"रूद्र बेटा, अपना कुछ हुनर इधर भी दिखाओ ..." कहते हुए उसने माला की तरफ इशारा किया।

माला का दिमाग ऐसी अवस्था में भी भिन्ना गया। रूद्र का भी। लेकिन इस बात ने पल्लवी को उन दोनों के जितना प्रभावित नहीं किया। संभवतः इसलिए क्योंकि उसने पहले भी रूद्र के लिंग को माला की योनि में जाते हुए देखा था, और उसको वह दृश्य बहुत ही रोचक लगा था। जो थोडा बहुत आश्चर्य उसको हुआ, वह इस बात पर की विराट यह बात करेगा। दरअसल, बैठक में विराट ने उनको यह बोला था की उन दोनों को माला और विराट के सामने आकर सेक्स करना होगा, बस ... लेकिन अभी तो बात बहुत आगे बढ़ गयी थी।
 
कोई कुछ कह पाता की माला ने अपनी टूटी फूटी आवाज़ में अपना विरोध जताया, "विराट मैं कोई रंडी नहीं हूँ, जो किसी से भी यह करते फिरे ... और ये तो मेरी बेटी का पति है, मेरे बेटे जैसा! तुम सोच भी कैसे सकते हो .. छिः!"

"डार्लिंग, मैंने कब तुमको रंडी कहा? यह एक नया एडवेंचर मान लो। ज़रा रूद्र के लिंग को देखो तो .... कितना बढ़िया है! तुमको जन्नत दिखा देगा यह लड़का। और इसके साथ करना सेफ भी है आखिर, ये हमारी बेटी का पति है .... बेटे जैसा!" विराट ने अपनी बात दोहरा दी।

"नहीं नहीं ... ये सब मेरे साथ न करो। कुछ तो सोचो!" माला एक कमज़ोर विनती कर रही थी, "पल्लवी, तू कुछ कह न ..."

"माँ, सच कहूं?" पल्लवी ने कुछ देर तक माला को देखा। उसके मन में बस एक ख़याल आया, 'माँ को एक अन्प्रेसिडेन्टिड (अभूतपूर्व) सेक्सुअल मज़ा मिलना ही चाहिए ....' और फिर आगे कहा, "इसमें मुझे कोई ऑब्जेक्शन नहीं है ... रूद्र आपको एकदम से हैप्पी कर देगा।

"यह क्या कह रही हो पल्लो?" यह रूद्र था, "... मैं माँ के साथ यह क्यों करूंगा?"

पल्लवी को मानो इसी प्रश्न का इंतज़ार था, "वह इसलिए की जनाब पहले भी मेरी माँ के अन्दर जा चुके हैं ... अब बंद करो और शुरू हो जाओ"

"क्या?" विराट और माला लगभग एक साथ ही बोल पड़े।

"हाँ माँ .." कहते हुए पल्लवी ने माला के बगल लेते हुए सेक्स करने वाली घटना उन दोनों को सुना दी। उसने यह भी बताया की रूद्र ने जो शुरू किया, उसने वह ख़तम नहीं किया - मोरालिटी के चक्कर में। सो, अभी सही समय है उस काम को सुधारने की। पल्लवी की बात ख़तम होते होते विराट भी खुश हो गया की ऐसा दामाद है, जो मौका मिलने पर भी गलत काम नहीं करता। लिहाज़ा, रूद्र को अब माला के साथ सेक्स करना ही होगा।

चारो तरफ से विभिन्न प्रकार की आवाज़े आ रही थी - माला इस समय पूरी तरह आसहाय पड़ी हुई थी। उसका शील कहता था की यह सब तुरंत बंद हो जाए, लेकिन उसकी योनि में लगी हुई आग कह रही थी की इसको बुझाने के लिए आहुति चाहिए - वीर्य की आहुति।

'आह! रूद्र का लिंग वाकई कितना प्यारा है!! मेरे अन्दर जाने से कैसा लगेगा!' माला के मन में बसने वाली व्यभिचारिणी चिल्लाई।

"आल द बेस्ट, डार्लिंग!" कह कर विराट ने माला के होंठों पर एक चुम्बन दिया और अलग हट गया - कमरे से बाहर नहीं, बस एक तरफ, किसी दर्शक के समान। अब मोर्चा पल्लवी और रूद्र को सम्हालना था।

रूद्र भी अब तक समझ चुका था की आज बिना माला से सेक्स किये वह इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं आ सकता। 'ये पल्लवी भी मजे लेने के लिए उसको कैसे कैसे फंसाती है! खैर ...'

रूद्र माला के सामने आ कर खड़ा हो गया। उसकी दृष्टि माला की योनि की तरफ गयी - सुन्दर, गुलाब की पंखुड़ी जैसी, कामुकता के कारण वहां रक्त-संचार बढ़ जाने से, वहां का रंग थोडा गहरा हो गया था। माला के भगोष्ठ पर बालों की अच्छी तादात थी - लम्बाई में मुश्किल से आधा इंच, लेकिन घने।

'माला का शरीर एकदम मस्त था, खास तौर पर ऐसी कामुक अवस्था में!' रूद्र ने सोचा।

उसकी दृष्टि अब माला के स्तनों पर गयी - उसको उस दिन किया गया स्तन-पान याद आ गया। रूद्र कभी सोच भी नहीं सकता था की इतनी जल्दी ही उसको माला के स्तन फिर से पीने को मिल सकेंगे। इस लोभ को वह त्याग नहीं पाया - हालाकि वह मैथुन के लिए पूरी तरह तैयार था, और माला भी।

खैर, उसने माला के एक निप्पल को अपने मुँह में भर लिया और अपनी जीभ से दबाव डाला। साथ ही साथ उसने माला के दुसरे स्तन को अपने हाथ में लेकर मसलना शुरू कर दिया। माला का स्तन उसके हाथ में पूरी तरह समां गया था - उसकी कोमलता रूद्र को और कामुक बना रहे थे। माला के दोनों ही स्तनाग्र तुरंत जाग कर खड़े हो गए। ये रूद्र के लिए बहुत ही कामुक दृश्य और अनुभव था। उसने तुरंत माला के मीठे स्तनों को चूसने की गति तीव्र कर दी - रूद्र माला के स्तन को ठीक उसी तरह से प्यार कर रहा था जैसे पल्लवी के स्तनों को करता था। वह माला के स्तनाग्र के चारो तरफ अपनी गर्म जीभ फिरा फिर कर चूस रहा था।

जैसे जैसे स्तन-पान का समय बढ़ता जा रहा था, माला की साँसे और गहरी होती जा रही थी, साथ ही साथ उसकी योनि की कामुक संवेदना चिल्ला चिल्ला कर एक लिंग की पुकार करने लगी। माला पर कामुकता का बुखार चढ़ता ही जा रहा था - फलस्वरूप उसकी जांघे खुलती गयी। अब रूद्र के सामने माला की योनि पूरी तरह से खुली पड़ी थी। उसने अपने पूर्ण स्तंभित लिंग के शिश्नाग्रच्छाद को पीछे सरकाया और उसको माला की योनि के द्वार से टिकाया।

यह सब विराट और पल्लवी के लिए बहुत ही उत्तेजना भरा दृश्य था। विराट अभी अभी हुए स्खलन से विवश था, इसलिए वह इस घटना को बस देख कर ही आनंद लेना चाहता था। पल्लवी भी अब चुप चाप बैठ कर यह रोमांचक दृश्य देखने लग गयी।

'पहले जनाब माँ से कर लें, फिर मैं भी करूंगी ....' वह यही सोच कर खुश थी की माँ को आज एक नया अनुभव होने वाला है, और शायद उसके कारण वो रूद्र और प्रियंका के मिलन कराने की उसकी मंशा भी समझ सकेगी।

रूद्र पहले की भांति ही फिर से ठिठक गया। माला के साथ ऐसा कुछ भी करना उसके शील-सिद्धांत के विपरीत होगा। उसने पहले पल्लवी, और फिर विराट की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि डाली। दोनों ने ही सहमती में सर हिलाया।

यह देख कर रूद्र ने रति क्रिया जारी रखी। माला के गले से इस समय कामुक आवाजें आ रही थी। व्यभिचारिणी माला ने अब तक उसके पूरे अस्तित्व पर कब्ज़ा कर लिया था। रूद्र ने अपना लिंग-मुंड माला की योनि के ऊपर टिका कर उसकी योनि के दोनों होंठों के बीच फंसा लिया, और आगे जोर लगाया।

उत्तेजना के कारण माला की योनि पूरी तरह से चिकनी हो गयी थी, और वैसी ही उत्तेजना के कारण रूद्र को भी अपने द्वारा लगाए जोर का ठीक अनुमान नहीं लगा। पहले ही झटके में रूद्र का लिंग कम से कम आधा माला की योनि में घुस चुका था। हालाकि माला की योनि की पकड़ पल्लवी की योनि की पकड़ के मुकाबले ढीली थी, लेकिन अब यह कार्य करना ही था।

रूद्र ने पहले धीरे धीरे माला की योनि पर प्रहार करना शुरू किया। माला को ऐसे लिंग की आदत नहीं थी - इसलिये उसको आनंद के साथ ही हलके दर्द का भी एहसास हुआ। माला के लिए यह सोचना थोडा असंगत लगा की रूद्र वाकई उसके अन्दर है। हर धक्के के साथ माला को अपनी योनि के अन्दर और योनि के ऊपर अपने भगनासे पर उसके लिंग का दबाव और घर्षण महसूस होने लगा - उसको आनंद आने लगा। रूद्र के लय में लय मिलाने के लिए माला भी अपने नितम्बो से उचक उचक कर धक्का देने लगी। धीरे धीरे उसके जननांग में एक प्रकार का दबाव बढ़ने लगा, जिससे वह पूरी तरह परिचित थी।

रूद्र भी समझ गया की माला बस चरम सुख पाने ही वाली है। उसने अपने धक्को की गति तेज़ कर दी।

माला का आनन्दातिरेक उसके पूरे अस्तित्व को चीरते हुए निकला। उसी समय उसने रूद्र के लिंग को अपनी अन्दर ही स्पंदन करते हुए महसूस किया, और समझ गयी की रूद्र का बीज उसकी कोख में आ चुका है। आनंद के छोटे छोटे लहर माला के अन्दर बनते ही गए, और जब आना बंद हुए, तब तक माला पूरी तरह से थक कर चूर हो गयी थी।

माला की मनःस्थिति इस समय अवर्णनीय थी - मदिरा, निद्रा, परिश्रम, और संभोग - इन चार विषयों के प्रभाव में वह अचानक ही शिथिल और निर्बल हो कर बिस्तर पर ढेर हो गयी। उसका शरीर किस स्थिति में था, उसको इस समय ऐसी लज्जा और मर्यादा का कोई ध्यान नहीं था। रूद्र खुद भी थोडा खिन्न था - उसने ऐसा कुछ भी करने की सपने में भी नहीं सोची थी, किन्तु आज कुछ परिस्थितियां ही ऐसी थीं, की उसको यह सब करना पड़ा। वह भी अन्यमनस्क सा होकर माला के ऊपर से हट गया। माला लेकिन अपनी दोनों जांघें खोले हुए अपनी अभी अभी भोगी हुई योनि का प्रदर्शन कर रही थी और उसको इसका कोई अभिज्ञान भी नहीं था। उसकी योनि की गुलाब जैसी पंखुडियां सम्भोग के घर्षण से गहरे रंग की हो गयी थीं, और घने बालों के बीच से कुछ अजीब सी दिख रही थी। उन दोनों की मनःस्थिति चाहे कैसी भी रही हो, पल्लवी को एक अबूझ आनंद मिल रहा था और उसकी कामुकता भी अब पूरे शिखर पर थी। ऐसा तो कभी नहीं हुआ - वो चारों एक ही कमरे में पूर्ण नग्न उपस्थित थे।

पल्लवी को अपने पापा के लिए थोडा सा दुःख हो रहा था - योजना के अनुसार रूद्र और पल्लवी के रति-संयोग के दृश्य से प्रेरित होकर पापा और माँ दोनों भी सम्भोग करने वाले थे, किन्तु हो कुछ और गया। पापा को क्या मज़ा आएगा ऐसे? उनको भी चांस मिलना चाहिए - आखिर माँ की योनि पर हक़ तो उन्ही का है! पापा को तैयार करना पड़ेगा। और इसमें कोई दो राय नहीं थी। संभवतः पापा अपनी ही पैदा की हुई इस विचित्र परिस्थिति में अपने आपको असहाय (उनकी पत्नी को कोई और भोग गया) और अपर्याप्त (उनका लिंग रूद्र के लिंग से कमतर था) महसूस कर रहे हैं।

"पा…पा…?"

विराट ने पल्लवी को चौंक कर देखा - पिछले कोई पांच मिनट में कहे गए यह पहले संसक्त शब्द थे। विराट के साथ साथ रूद्र ने भी चौंक कर देखा। माला ने भी अवश्य ही यह शब्द सुने होंगे, लेकिन अभी वह आनंद के सागर में गोते लगा रही थी।

"यू आल्सो हैव टू मेक लव टू माँ …."

मेक लव? कहाँ तो उसने माला की चुदाई का एक मसालेदार प्रोग्राम बनाया था और कहाँ कोई और उसको चोद कर चला गया। रूद्र एक तो जवान था और दूसरा उसका लिंग उसके लिंग के मुकाबले अधिल बलशाली था - इसलिए विराट को बहुत अधिक बुरा नहीं लगा। लेकिन, इस समय उसकी वही हालत थी की हाथ आया और मुँह को न लगा।

'मेक लव तो कर लूँ … लेकिन यह मरा छुन्नू तो खड़ा हो!' विराट ने मन ही मन कोसते हुए सोचा और उसकी सोच के साथ उसकी दृष्टि अपने लिंग पर चली गयी।

पल्लवी अब तक विराट के पास आ गयी थी और उसके लिंग का मानो निरिक्षण कर रही थी। उसका लिंग हाँलाकि स्तंभित नहीं था, लेकिन पूरी तरह से शिथिल अवस्था में भी नहीं था। अगले ही पल उसने देखा की उसका लिंग पल्लवी की उँगलियों के आवरण में ढक गया।

"प्ले विद दीस …." पल्लवी के दूसरे खाली हाथ ने विराट के एक हाथ को पकड़ कर अपने एक स्तन पर रख लिया। उसने कहना जारी रखा, "…. आई कैन नॉट अलाऊ यू टू फ़क मी - दैट वुड बी रॉंग! बट आई मस्ट डू दिस फॉर यू राईट नॉव …"
 
जैसा की पहले भी चुका है की विराट ने वयस्क मैगज़ीनों के रंगीन पृष्ठों में उसने बहुत सी कंटीली कन्याएँ देखी थी, लेकिन पल्लवी जैसा शरीर उनमें से किसी का भी न था। और उस शरीर के इतने हसीं अंग के इतने अन्तरंग संपर्क से विराट की कामेक्षा पुनः जागने लगी। किन्तु कुछ देर पहले ही संपन्न हुए स्खलन के कारण उसका लिंग अपने उत्तेजन की ए - बी - सी से ऊपर नहीं उठ पा रहा था।

रूद्र आश्चर्यचकित था - पल्लवी के चरित्र में व्यभिचार और प्रेम-निष्ठा का कुछ ऐसा मोहक सम्मिश्रण था की वह किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। पल्लवी के प्रयोग जहाँ उसके यौन जीवन में सुख की उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी करते, वही उसमें कहीं न कहीं इर्ष्या अथवा संशय-भाव भी जागृत करते। लेकिन एक बात का उसको पूरा विश्वास था और वह यह की पल्लवी की योनि में सिर्फ उसी का लिंग जा सकता है। और यह बात पल्लवी के हर प्रयोग को रोचक और रोमांचक बना देता। उसने देखा की पल्लवी विराट के लिंग की त्वचा को बड़ी नरमी से पीछे की तरफ सरका रही थी।

शिश्नग्रच्छद पूरी तरह से पीछे सरक जाने के बाद उसने विराट के अंडकोष पर काम करना शुरू किया - कभी वह उसको सहलाती, तो कभी चिकोटी काटती। एक तरफ अच्छे से अन्वेषण करने के बाद, पल्लवी ने दूसरी तरफ भी यही काम करना शुरू कर दिया। विराट के वृषण मर्दन के साथ साथ पल्लवी उसके लिंग को अपने हाथ से पकड़ कर आगे पीछे करना जारी रखा।

विराट को चिर परिचित कामुक बेचैनी होने लगी। एक अति-सुन्दर स्त्री, भले ही उसकी बेटी ही हो, उसके लिंग तो दुलार रही थी, जिससे की उसमें उत्थान हो और वह रति-क्रिया कर सके। रूद्र ने देखा की पल्लवी की परिचर्या का अभी भी कोई ख़ास प्रभाव विराट पर नहीं आ पाया। विराट के स्थान पर वह होता तो अब तक पूरी तरह 'तैयार' हो चुका होता। बुढ़ापा वाकई डरावना होता है - उसने सोचा।

पल्लवी को भी यह देख कर थोड़ा झटका लगा। रूद्र को तैयार होने में कुछ ही पल लगते थे, लेकिन पापा तो अभी तक नहीं हो पाए। ऐसे तो वो तैयार भी नहीं हो पायेंगे लगता है। कुछ और सोचना पड़ेगा। पल्लवी ने अपनी मैथुनीय खोज में कहीं यह पढ़ा था की पुरुषों में पुरःस्थ ग्रंथि के उत्तेजन से उन पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है, जैसे स्त्रियों में उनकी भगनासे के उत्तेजन से होता है। पल्लवी को रूद्र पर इस प्रयोग की आवश्यकता आज तक कभी नहीं पड़ी - उसका लिंग, यौन संग्राम के लिया सदा ही उद्धत रहता था। किन्तु अभी इस ज्ञान का उपयोग करने का समय आ गया था।

उसने पास ही रखी हुई क्रीम की बोतल उठाई और उसकी प्रचुर मात्रा अपनी हथेली पर उड़ेल ली। अपने दूसरे हाथ की उँगलियों से उसने कुछ क्रीम उठाई और विराट के लिंग पर अच्छे से चुपड़ दिया। कुछ ही समय में उसका लिंग पल्लवी की हथेली पर फिसलने लगा। पल्लवी को यह अनुभव अच्छा लगा - अतः उसने विराट के लिंग को अपने क्रीम में चुपड़े हुए हाथ से सहलाना शुरू कर दिया। उसने कुछ देर लिंग को सहलाया लेकिन अभी तक विराट की उत्तेजना पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।

पल्लवी ने रुक कर अपनी तर्जनी उंगली पर ढेर सारा क्रीम लगाया, और विराट के दोनों पाँव कुछ इस तरह फैला दिए जिससे उसका गुदा द्वार खुल जाए। विराट पूरी तरह चकराया हुआ था - 'आखिर करना क्या चाहती है ये? ये तो उसकी गुप्तता पर अतिक्रमण है!'

इसके पहले विराट कुछ कह पाता, पल्लवी ने उसके गुदा-छिद्र में अपनी तर्जनी घुसेड़ दी। यह तो एकदम अप्रत्याशित था! तनाव के कारण विराट के गुदा की संवरनी (रन्ध्र-संकोचक पेशी) सिकुड़ गयी और पल्लवी तर्जनी को पीसने लगी।

"पापा … प्लीज्! रिलैक्स! ट्रस्ट मी!" पल्लवी इतना ही कह पायी। इस कार्य में उसको कोई अनुभव नहीं था, और अगर कुछ भी गलत हो गया तो अन्दर चोट लग सकती थी। विराट ने जैसे तैसे अपने शरीर को ढीला किया। अब पल्लवी ने अपनी उंगली को छिद्र में अन्दर बाहर करना शुरू किया, जिससे क्रीम अच्छी तरह से अन्दर लग जाए।

"पापा, आप लेट जाइये?"

विराट, अपने चेहरे पर अनिश्चित सा भाव लिए बिस्तर पर माला के बगल ही लेट गया। पल्लवी ने उसकी पीठ के पीछे दो तकिया कुछ इस प्रकार लगा दी जिससे विराट की पीठ, बिस्तर से कोई साथ अंश पर उठी रहे। फिर उसने विराट को अपने दोनों घुटने पकड़ने को बोला, ऐसे जिससे गुदा की पहुँच अवरोधित न हो। पल्लवी उसके सामने बिस्तर के नीचे घुटने के बल बैठ गयी।

पल्लवी ने दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली पर पुनः ढेर सार क्रीम लगा लिया और अब बाएँ हाथ से विराट के लिंग को पुनः पकड़ कर उसको धीरे धीरे आगे पीछे करने लगी। विराट को अपने लिंग की अंदरूनी त्वचा पर जानी पहचानी गुदगुदी होने लगी। उसकी आँखे बंद होने लगीं और उसका शरीर शिथिल होने लगा। पल्लवी ने यह सब होते हुए देखा और यह भी की अब समय आ गया है। उसने अपनी मध्यमा उंगली को विराट की गुदा से कुछ इस तरह सटाया की उसकी उंगली विराट के उत्सर्गांतराल और गुदा-छिद्र को एक साथ छूने लगे। उस स्थान के चिकने हो जाने पर पल्लवी ने उसको रगड़ना, मालिश करना और दबाना जारी रखा, और साथ ही साथ उसके लिंग को भी।

पल्लवी ने कोई तीन मिनट तक क्रीम लगा कर विराट की गुदा को सहलाना जारी रखा। अब तक क्रीम का कोई दसवाँ भाग विराट की गुदा में समां गया होगा। और स्पष्ट दिखने लग गया की अबी अगर विराट चाहे भी तो पल्लवी की उंगली को अन्दर जाने से रोक नहीं सकता। वस्तुतः, पल्लवी को भी यह महसूस होने लगा की उसकी उंगली विराट की गुदा के अन्दर स्वतः ही जाने लग गयी थी।

पल्लवी ने बहुत ही ध्यान से धीरे धीरे अपनी मध्यमा उंगली को विराट की गुदा में सरकाना आरम्भ किया, और कुछ ही क्षणों में उसकी उंगली पूरी तरह से अन्दर चली गयी। अब वह विराट की पुरःस्थ ग्रंथि को ढूँढने के लिए तैयार थी। उसने अपनी उंगली को थोड़ा ऊपर की तरफ मोड़ा और ऐसा करते ही उसको अन्दर एक अंडाकार उभार महसूस हुआ। उसने इस उभार को अपनी उंगली से हलके से दबाया। विराट पर इस हरकत का असर बेहद रोमांचक था - उसने तुरंत ही अपने लिंग में उत्थान होता हुआ महसूस किया और साथ ही साथ उसको ऐसा लगा की उसका स्खलन होने वाला है। पल्लवी ने कुछ देर पुरःस्थ ग्रंथि को धीरे धीरे दबाया और सहलाया, और फिर लयबद्ध तरीके से अपनी उंगली को गुदा के अन्दर बाहर करना शुरू किया। और साथ ही साथ उसके लिंग को धीरे धीरे से दबाना भी जारी रखा। कोई 2 मिनट में ही विराट पूरी तरह से तैयार हो गया।

पल्लवी ने देखा की उसके पापा का लिंग अब अपने पूर्ण उत्तेजन पर है, अतः उसने अपनी उंगली बाहर निकाल ली और विराट से बोला,

"पापा, फ़क हर नॉव! एंड फ़क हर हार्ड!"

विराट बिस्तर से उठा और असंतुलित डग भरता हुआ माला के सामने पहुँच गया। माला वैसे ही मदिरा, और निद्रा के प्रभाव से शिथिल और निर्बल हो कर बिस्तर पर पसरी हुई थी। माला बेपरवाह सी अपनी दोनों जांघें खोले हुए अपनी ताज़ी ताज़ी भोगी हुई योनि का प्रदर्शन कर रही थी।

"सिली थिंग!" विराट बुदबुदाया और उसके नंगी जांघ पर अपना हाथ फिराया। इतनी देर हो जाने के बाद भी माला की त्वचा काफी गर्म थी। विराट की दृष्टि माला की जाँघों के बीच के बालों से ढके त्रिकोणीय हिस्से पर पड़ी, जिसमे माला की योनि की गुलाब जैसी पंखुडियां दिख रही थीं।

विराट का लिंग, उसकी हाल की स्मृति में सबसे अधिक उत्तेजना पर था। वस्तुतः, उसको इस स्तम्भन की अत्यंत आवश्यकता थी। मैथुन के मैदान में किसी अन्य पुरुष के सामने ऐसे दब्बूपन से हथियार डालना बेहद लज्जास्पद था। लेकिन पल्लवी की परिचर्या से वह समस्या समाप्त हो गयी - न जाने क्या जादू किया उसने! विराट का सामान्य लिंग भी कुछ ऐसी प्रचंडता से स्तंभित था की वह भी माला की योनि के मुकाबले काफी बड़ा लग रहा था। अब कुछ भी सोचने समझने की आवश्यकता नहीं थी - माला की योनि पहले के मैथुन से काफी चिकनी हो गयी थी। विराट ने माला के योनि पटल को अपनी तर्जनी और अंगूठे की सहायता से फैलाया और अपने लिंग-मुंड को वहां पर टिका दिया। उसको वहां की चिकनी आर्द्रता महसूस हुई तो उसने आगे की तरफ जोर लगाया। हाँलाकि माला की योनि, पल्लवी की योनि के मुकाबले ढीली थी, लेकिन विराट के लिए इस तथ्य का कोई प्रभाव नहीं था। उसके लिए वह पर्याप्त कसावट लिए हुई थी। उसने थोडा और जोर लगाया और अपने लिंग को अदृश्य होते देखने लगा।

करीब दो इंच अन्दर गए होंगे की माला की सिसकारी सुनाई दी। उसकी आँखें अभी भी बंद थीं, लेकिन उसका शरीर विराट की क्रिया की पर्तिक्रिया दिखा रहा था। वह अपने नितम्ब उठा रही थी - उसके लिंग का और हिस्सा अन्दर लेने के लिए! उसका सर इधर उधर हिल-दुल रहा था और वह अपने होंठ काट रही थी। विराट ने लिंग को बाहर निकाला और फिर अन्दर ठेल दिया। ऐसा उसने पहले भी कई बार किया था, लेकिन आज बात कुछ और ही थी। इस धक्के से उसका पूरा लिंग माला के अन्दर समां गया। उसके हाथ माला की कमर पर जम गए।

माला कराहने लगी - उसकी आँखें फड़फड़ाने लगी, लेकिन अभी भी खुल नहीं पाईं। विराट ने उसको भली भांति 'चोदना' आरम्भ कर दिया था। माला की कामुक कराहें बढ़ने लगीं - हर धक्के के साथ उसका पूरा वजूद हिल जाता। विराट माला की योनि की जम कर धुनाई करने लगा।

माला की आँखें थोड़ी सी खुलीं और एक अस्फुट सा शब्द निकला,

"व् … व् …. विराट?"

"हाँ जानेमन! तुम आराम से लेती रहो, और मज़े लो!" विराट ने बड़े गर्व से कहा।

विराट के हर एक धक्के से माला की योनि भर जा रही थी - वह कितनी ही मदहोश क्यों न हो, उसकी निजता की इस प्रकार से लूट-मार को वह महसूस कर रही थी। वह कभी हांफती तो कभी कराहती। अंततः उसकी चेतना कुछ कुछ वापस आई। उसने विराट को अपने अन्दर खींचा और साथ ही साथ रिरियाते, और भारी सांसे भरते हुए अपने नितम्ब विराट के हर धक्के के साथ धकेलने लगी। उसकी वासना उसको ऐसी बेसुध हालत में भी निर्लज्ज बना रही थी। हर धक्के के साथ उसके दोनों स्तन उसकी छाती पर लोट रहे थे।

उसी आनंद में वो कुछ कुछ बड़बड़ा भी रही थी,

"यस! ओह यस डार्लिंग! सो गुड इनसाइड मी! फिल मी!"

उसके बेसुध प्रोत्साहन से विराट की ऊर्जा और भी बढ़ गयी। उसके धक्के और बलशाली होने लगे और हर धक्के से उसके वृषण माला के नितम्बों पर जोर जोर से टकराने लगे। माला की कामुक गुर्राहट बढ़ती जा रही थी और अब वह कामोन्माद के चीत्कार में तब्दील होती जा रही थी।

चरमोत्कर्ष के द्वार पर ले जाने वाले धक्के के साथ ही विराट का शरीर अकड़ गया - उसका लिंग माला की योनि के भीतर पूरी तरह समाया हुआ था और उसने माला को पूरे बलपूर्वक जकड़ रखा था। अगले ही पल विराट के लिंग ने वीर्य का एक भारी माल माला के भीतर छोड़ दिया।

माला ने विराट के स्खलन को अपने भीतर महसूस करके एक दीर्घश्वास छोड़ा। उसके बाद उसने विराट के लिंग के कई सारे संकुचन और महसूस किये, और हर संकुचन के साथ विराट का कुछ भाग उसके भीतर समां गया। मुख्य क्रिया समाप्त होने के बाद विराट ने गहरी गहरी साँसे भरीं और माला के स्तनों को चूमा, और उसके स्तानाग्रों को चूसा, जिससे माला को और भी आनंद आया।
 
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