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झरना- “अरे जाओ जाओ भैया.. आप क्या मेरी फुद्दी फाड़ोगे? भाभी की फुद्दी समझा है क्या? उनकी फुद्दी तो बस मेरे भैया से और आज पहली बार आपके लण्ड से चुदी है। मैं पक्की लण्डखोर हूँ। ससुराल में किसी को नहीं छोड़ा है मैंने.....”
कहती-कहती रुक गई झरना दीदी, और मेरी छाती पे मुक्के मारने लगी।
झरना- “बदमाश कहीं के... मेरे मुँह से उगलवा ही लिया की मैं खेली खाई हुई हैं। हाँ मैं मानती हूँ की मैंने बहुत लण्ड खाए हैं पर सच कहती हैं कि उनमें से कोई भी लण्ड आपके लण्ड की बराबरी का नहीं है। आपका लण्ड तो लण्डों का सरदार है सरदार...”
अब मेरी बारी थी। मैं उसकी फुद्दी में अपना मुँह फिर से लगा बैठा।
झरना दीदी ने मुझे प्यार से झिड़का- “यूँ ही फुद्दी को चाटते रहोगे क्या? भैया, लण्ड का इश्तेमाल कब करोगे? देखो भैया, इससे पहले की भाभी आ जाएं और हमें इस अवस्था में देख लें। प्लीज आ जाओ... और ना तड़पाओ..."
मैं झरना की दोनों जांघों के बीच घुटनों के बल बैठ गया। झरना दीदी ने पहले से ही अपने चूतड़ों के नीचे एक मोटा सा तकिया लगा लिया था। मेरा लण्ड घुसने के लिए पूरी तरह तैयार था। मैंने लण्ड के सुपाड़े को फुद्दी के मुहाने पे सटाया। एक हल्का सा धक्का लगाया। जोश में आकर झरना दीदी ने नीचे से अपना चूतड़ उछाला औरं... मेरे लण्ड का सुपाड़ा बड़ी ही तेजी के साथ सरसराते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ा और फुद्दी में दस्तक देते हुए, दोनों दीवारों को चीरते हुए अंदर घुस गया।
झरना- “हे राम रे.. क्या है ये? भैया, लण्ड घुसाओ, अपना हाथ नहीं? पर आपके दोनों हाथ तो मेरी दोनों चूचियों को दबा रहे हैं...”
मैंने दूसरा धक्का लगा दिया था। मेरे प्यारे लण्ड ने चूत की दीवारों को चीरते हुए अंदर घुसने की कोशिश में कामयाबी हासिल कर ली।
झरना- “हे भैया, निकालो... ऐसे थोड़े ही घुसाते हैं लण्ड?”
मैं- “ना ना... मेरी झरना दीदी। मेरे लण्ड से आपका क्या होगा? आप तो पक्की लण्डखोर हैं ना...”
झरना- “भैया, मुझे माफ करो। पर ये लण्ड को निकालो...”
मेरा तीसरा और दमदार धक्का लग चुका था।
झरना- “हे राम रे, मरी मैं... मम्मी बचाओ... प्लीज भैया, निकल लो वरना मैं तो गई काम से...”
मैंने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकाला।
झरना- “हाँ हाँ भैया, निकाल लो अपना लण्ड। मैं तो बस अपने भैया से, अपने सैंया से, कभी अपने ससुर से, कभी जेठ से, कभी अपने नौकर से, कभी अपने नंदोई से चुदवाकर अपनी फुद्दी की प्यास मिटा लूंगी। अरे राम रे, ए क्या भैया? लण्ड निकलते हुए ही धक्का मारके फिर घुसा दिया रे... हाय मेरी फुद्दी आज फट के रहेगी। हाँ निकालो, बस चोदो मुझे... हाय फिर से घुसा दिया, निकालो... अरे मत घुसाओ, निकालो... अरे मत निकालो, घुसाओ। हाँ हाँ घुसाओ मेरे सैंया... हाँ मेरे भैया, हाँ अब मजा आने लगा है...” झरना दीदी अब मजे से चूतड़ उछालने लगी थी।
मैंने भी अपने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी। कमरे में फछ-फछ की आवाजें गूंजने लगी।
कहती-कहती रुक गई झरना दीदी, और मेरी छाती पे मुक्के मारने लगी।
झरना- “बदमाश कहीं के... मेरे मुँह से उगलवा ही लिया की मैं खेली खाई हुई हैं। हाँ मैं मानती हूँ की मैंने बहुत लण्ड खाए हैं पर सच कहती हैं कि उनमें से कोई भी लण्ड आपके लण्ड की बराबरी का नहीं है। आपका लण्ड तो लण्डों का सरदार है सरदार...”
अब मेरी बारी थी। मैं उसकी फुद्दी में अपना मुँह फिर से लगा बैठा।
झरना दीदी ने मुझे प्यार से झिड़का- “यूँ ही फुद्दी को चाटते रहोगे क्या? भैया, लण्ड का इश्तेमाल कब करोगे? देखो भैया, इससे पहले की भाभी आ जाएं और हमें इस अवस्था में देख लें। प्लीज आ जाओ... और ना तड़पाओ..."
मैं झरना की दोनों जांघों के बीच घुटनों के बल बैठ गया। झरना दीदी ने पहले से ही अपने चूतड़ों के नीचे एक मोटा सा तकिया लगा लिया था। मेरा लण्ड घुसने के लिए पूरी तरह तैयार था। मैंने लण्ड के सुपाड़े को फुद्दी के मुहाने पे सटाया। एक हल्का सा धक्का लगाया। जोश में आकर झरना दीदी ने नीचे से अपना चूतड़ उछाला औरं... मेरे लण्ड का सुपाड़ा बड़ी ही तेजी के साथ सरसराते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ा और फुद्दी में दस्तक देते हुए, दोनों दीवारों को चीरते हुए अंदर घुस गया।
झरना- “हे राम रे.. क्या है ये? भैया, लण्ड घुसाओ, अपना हाथ नहीं? पर आपके दोनों हाथ तो मेरी दोनों चूचियों को दबा रहे हैं...”
मैंने दूसरा धक्का लगा दिया था। मेरे प्यारे लण्ड ने चूत की दीवारों को चीरते हुए अंदर घुसने की कोशिश में कामयाबी हासिल कर ली।
झरना- “हे भैया, निकालो... ऐसे थोड़े ही घुसाते हैं लण्ड?”
मैं- “ना ना... मेरी झरना दीदी। मेरे लण्ड से आपका क्या होगा? आप तो पक्की लण्डखोर हैं ना...”
झरना- “भैया, मुझे माफ करो। पर ये लण्ड को निकालो...”
मेरा तीसरा और दमदार धक्का लग चुका था।
झरना- “हे राम रे, मरी मैं... मम्मी बचाओ... प्लीज भैया, निकल लो वरना मैं तो गई काम से...”
मैंने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकाला।
झरना- “हाँ हाँ भैया, निकाल लो अपना लण्ड। मैं तो बस अपने भैया से, अपने सैंया से, कभी अपने ससुर से, कभी जेठ से, कभी अपने नौकर से, कभी अपने नंदोई से चुदवाकर अपनी फुद्दी की प्यास मिटा लूंगी। अरे राम रे, ए क्या भैया? लण्ड निकलते हुए ही धक्का मारके फिर घुसा दिया रे... हाय मेरी फुद्दी आज फट के रहेगी। हाँ निकालो, बस चोदो मुझे... हाय फिर से घुसा दिया, निकालो... अरे मत घुसाओ, निकालो... अरे मत निकालो, घुसाओ। हाँ हाँ घुसाओ मेरे सैंया... हाँ मेरे भैया, हाँ अब मजा आने लगा है...” झरना दीदी अब मजे से चूतड़ उछालने लगी थी।
मैंने भी अपने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी। कमरे में फछ-फछ की आवाजें गूंजने लगी।