सासूमाँ- हाँ ऐसे ही लगी रह... और बेटी तू अपना मुँह चालू रख, और सुना की कैसे तूने अंधेरे का फायदा उठाते हुए अपने रामू बेटे से चुदवाया।
दीदी- हाँ... तो मैंने जैसे ही पायजामे का नाड़ा खोला। रामू भाई का लण्ड फड़फड़ा करके बाहर आ गया। मैंने तुरंत ही उसे अपने मुँह में ले लिया, और चपर-चपर चूसने लगी। हाय... क्या बताऊँ सासूमाँ... ऐसा मजा मुझे कभी ना मिला था।
सासूमाँ- हाँ... पहली बार जो रामू बेटे का लण्ड अपने मुँह में ले रही थी।
दीदी- हाँ अम्माजी, मुझे जो मजा मिल रहा था। पर रामू भाई को भी मजा मिल रहा था। पर एकाएक वो उठ बैठा।
रामू- कौन है? कौन है जो मेरा लण्ड चूस रहा है?
दीदी- मैं पूरी तरह डर गई। हे राम... अब क्या होगा? मैंने उससे कहा- श... श... रामू भैया चुप... एकदम चुप... ये मैं हूँ अमृता।
रामू- अरे अमृता दीदी, आप... पर ये आप क्या कर रही हैं?
दीदी- रामू भाई प्लीज... भगवान के लिए चुप रहिए और धीरे-धीरे बोलिये। बगल के कमरे में दमऊ भैया सो रहे हैं। अगर वो आ गये तो मैं जीते जी मर ही जाऊँगी, मारे शर्म के।
रामू- और अभी जो आप कर रही हैं वो?
दीदी- भैया, दोपहर को जब से आपका लण्ड देखा है... क्या बताऊँ? मैंने अभी तक बड़ी कुश्किल से सहन किया है। अब और सहन नहीं हो रहा है। भैया प्लीज... वैसे भी देखो ना भैया कि सावन का महीना है। शादी के सिर्फ दो महीने हुए हैं। तेरे जीजाजी ने दिन-रात, सुबह-शाम चोद-चोदकर मेरी फुद्दी को लण्ड का ऐसा चस्का लगाया है की बिना चुदाई के नींद ही नहीं आती।
रामू- “पर मैं? नहीं...”
दीदी- बस अब कोई बात नहीं भैया। मैं जानती हूँ कि आप भी मुझे अपने सगी बहन जैसा प्यार करते हैं। पर आज भैया प्लीज...”
सासूमाँ- फिर तूने क्या कहा बेटी?
दीदी- बता रही हूँ अम्माजी... इतनी बेताब क्यों हो रही हैं आप? चम्पा, तू उंगली चलाती रह। हाँ... तो अम्माजी सुनिए कमरे के अंदर की कहानी।
मैं रामू भैया के लण्ड को चूस रही थी।
रामू- पर दीदी, ये ठीक नहीं है। घर में और एक दोस्त है।
दीदी- “ओहह... रामू भैया, अब चुप हो जाओ, उसे पता भी नहीं चलेगा और हम दोनों का काम भी हो जाएगा। जब से आपका विशाल लण्ड देखा है तब से बुर में खुजली हो रही है। भैया, दिन में बाथरूम जाकर तीन बार उंगली कर चुकी हैं फिर भी खुजली मिटने की जगह बढ़ती ही जा रही है, इस खुजली को आपका लण्ड ही मिटा सकता है भैया...”
रामू- पर दीदी, आपने कब मेरा लण्ड देखा?
दीदी- दोपहर को... आप और दमऊ भैया, किताब पढ़करके मूठ मार रहे थे ना... उस समय मैंने देखा था। आप बात कम कीजिए रामू भैया। दमऊ भैया की नींद एकदम कच्ची है। कहीं वो उठ गये तो लेने के देने पड़ जाएंगे। आपका क्या होगा पता नहीं? पर मैं शर्म से मर जाऊँगी।
रामू- अच्छा दीदी, एक बात बताइये? आपने मेरा... मतलब दमऊ का लण्ड भी देखा होगा?
दीदी- हाँ... पर क्यों? मुझे तो आपके लण्ड से ही चुदवाना है। वो तो मेरा सगा भाई है। उससे कैसे?
रामू- मैं भी तो आपका सगा भाई हूँ?
दीदी- आप कैसे? वैसे तो आप मेरे लिए दमऊ भैया से बढ़के हो। पर सगे तो नहीं हो ना। और आप ये सब बात करके मुझे शर्मिंदगी दे रहे हैं भैया। इसकी जगह आप अगर मेरी चूचियां दबाते तो मुझे अच्छा लगता।
रामू- पर दीदी... मैं आपको कैसे चोद सकता हूँ?
दीदी- “कैसे चोद सकता हूँ? दोस्त की बहन ही तो हूँ। लोग अपनी सगी बहन को चोद देते हैं और मैं अपने भाई के दोस्त से भी नहीं चुदवा सकती? चलिए मेरी चूचियां दबाइए.. हाँ साबाश... ऐसे ही हाँ..."
रामू- मेरे लण्ड से कुछ निकलने वाला है दीदी। अपना मुँह हटा लो।
दीदी- नहीं, मेरे मुँह में ही छोड़ दे। और सासूमाँ.. मैंने लण्ड चूसना जारी रखा, और थोड़ी ही देर में रामू भैया ने मेरे मुँह में पहली पिचकारी छोड़ी, फिर दूसरी, फिर तीसरी... लेकिन मैं भी पूरी लण्डखोर थी। मैंने एक बूंद भी जाया नहीं किया।
रामू- हाँ हाँ... दीदी चूस लो मेरे लण्ड... चूस लो... आखिरी बूंद तक पी लो... निचोड़ लो सारा का सारा रस... हाँ आप बहुत ही अच्छी तरह से चूस रही हो मेरा लण्ड... मजा आ गया आज तो... इतना मजा तो मूठ मारने में कभी नहीं आया।
दीदी- पगले, ये मजा तो कुछ भी नहीं है। आगे-आगे देख होता है क्या? चल मेरी जांघों के बीच मुंडी घुसा लो और मेरी चूत चाटना शुरू कर लो भैया।
रामू- अच्छा... बुर चाटने में भी मजा आता है क्या दीदी?
दीदी- जैसे तुझे पता ही नहीं है? कीताब पढ़कर मूठ तो अच्छी मार लेता है।
रामू- “वो तो दीदी...” तभी रामू ने जीभ लगाकर जो मेरी फुद्दी को चाटना शुरू किया तो मैं जल बिन मछली की तरह तड़फने लगी।
दीदी- हे... है भैया... बड़ी अच्छे तरह से चूस रहे हो मेरी फुद्दी को। तुम तो अपने जीजाजी से भी बेहतर चूस रहे हो। बस तेरा लण्ड दिखा, अब तड़फ सहन नहीं हो रही है। आ तेरा लण्ड चूसकरके खड़ा कर देती हूँ, ताकी तुमको स्वर्गीय आनंद दिला सकें।
रामू- और आपको भी तो मजा आएगा... है ना दीदी?