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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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कामरू- डाक्टर के पास? डाक्टर के पास क्यों भाभी?

रश्मि- अरे एक छोटा सा आपरेशन करना है।

कामरू- एक छोटा सा आपरेशन करना है? मुझे नहीं कटवाना है, अपना लण्ड। मुझे छोटा नहीं करवाना अपने लण्ड को। भले ही आप मत चुदवाना दुबारा मुझसे। पर मैंने अपने लण्ड को कटवा के छोटा नहीं करवाना।

रश्मि- अरे, बुद्धू... तेरे लण्ड को छोटा नहीं करवाना है। मेरी बच्चेदानी को थोड़ा सा ऊपर करवाना है। फिर आएगा पूरा मजा जब मिल बैठेगे चार यार। आप, मैं, मेरी मखमली फुद्दी और आपका ये बिशाल लण्ड। जो कर रहा है मेरी फुद्दी को खंड बिखंड। आपरेशन से बच्चेदानी थोड़ी ऊपर हो जाएगी तो फिर आनंद ही आनंद...

अखंड आनंद... परमानंद। बस अब बातें ना बनाओ, अपने लण्ड का कमाल दिखाओ। कुछ तो ऐसा करो सजना की मेरी फुद्दी हमेशा के लिये तुम्हें अपना बना ले।

सासूमाँ- तो मेरी प्यारी चम्पा रानी। फिर कैसे चुदाई की तेरे भाई कामरू ने उस साली रश्मि की। चोद के उसे संतुष्ट किया की पहले ही पिचकारी मार दी?

चम्पा- अरे नहीं ना अम्माजी। मेरे भाई का लण्ड दस इंची है। साला ऐसा चोदता है की दिन में तारे नजर आ जाएं। मेरी तो पहली बार में हालत ऐसी हो गई थी की दो दिन तक ठीक से चल ही नहीं पाई थी।

दीदी- अच्छा... ऐसी बात है तो बुला ना तेरे उस मस्ताने भाई को जिसका इतना मस्ताना लण्ड है की चुदवाने पर दिन में तारे नजर आएं और दो दिन तक ठीक से चला भी ना जाए। सासूमाँ, मैं ठीक कह रही हूँ ना?

सासूमाँ- हाँ बेटी... जरा हम भी चखें उस मस्ताने लण्ड के रस को... कैसा स्वाद लगता है? चम्पा रानी हमारे बेटे से, हमारे पति से तो चुदवा रही हैं पर अपने भाई के मस्ताने लण्ड को हमें नहीं चखवा रही हैं।

चम्पा- अरे। आप क्यों चिंता करती हैं। मैं कल ही खबर करवा देती हूँ भाई को बुलवा दें।

सासूमाँ- अरे, अभी नहीं... अभी रामू बेटा है ना, यहाँ पे हमारी चूतों की खातिरदारी करने को। जब वो अपने गाँव चले जाएगा तब बुलाना। ऐसे में हम बोर नहीं होंगे और हमारी चूत की खुजली भी आसानी से मिट जाएगी। क्यों

बहू?

दीदी- अरे चम्पा रानी, तू कहानी आगे बढ़ा। और उंगली चलाते रह बुर में।

चम्पा- हाँ... भाभीजी। आप भी उंगली अंदर-बाहर करते रहिए ना। जैसे मैं सासूमाँ की कर रही हूँ। और सासूमाँ आपकी कर रही हैं।

दीदी- अरे बाबा, कर रही हूँ... तेरी चूत चूत है या गाँव का पुराना कुआँ। जितना भी उंगली करो खुजली मिटती ही नहीं।

चम्पा- अरे भाभीजी, वो चूत ही क्या जिसकी खुजली उंगली के आगे-पीछे अंदर-बाहर करने से मिट जाए। मेरी चूत की कुजली तो लण्ड की चुदाई से ही मिटती है। और आप लोगों की?

दीदी- अरी चम्पा, मेरी चूत क्या दुनिया की सबकी चूत की खुजली लण्ड की चुदाई से मिटती है। जिसे मिलता है। वो लण्ड से खुजली मिटाती है। जिसे नहीं मिलता वो मजबूरी में गाजर, मूली, बैगन, डिल्डो, या उंगली से मिटाने की नाकाम कोशिश करती हैं। जिससे खुजली मिटने की जगह और भी बढ़ती ही जाती है... बढ़ती ही जाती है।

सासूमाँ- तू ने बहुत ही सच बात कही बहूरानी। हाँ री... चुदक्कड़ चूत तेरी यही कहानी, कभी गाजर से, कभी मूली से, कभी उंगली से, मजबूरी में निकालती है अपना पानी।

चम्पा- तो मेरा भाई रश्मि भाभी की दमदार चुदाई कर रहा था। रश्मि के गले से चीख निकल रही थी।

रश्मि- “अरे देवर राजा, ऐसे धक्के मत लगाओ। मेरी चूत चुनचुना उठी है। है देवरजी बस करो मेरा पानी निकल चुका है। बस देवरजी हो गया है, बस करो..."

कामरू- पर भाभी। मेरा लण्ड तो अभी आपकी चूत में आधा भी नहीं घुसा है।

रश्मि- क्क-क्याऽऽ? अभी आधा भी नहीं घुसा है? अभी तो मेरी बच्चेदानी से टकरा रहा था।

कामरू- अरे भाभी, वो तो आपको दर्द हो रहा था तो मैंने तनिक बाहर निकल लिया था।

रश्मि- अरे तो क्या रात भर यूँ ही पेलते रहोगे? मेरी फुद्दी सूज गई है देवरजी। अब तो बस करो। अरे... रे... रे.. तुमने तो फिर से पेल दिया इसे गहराई तक। हे भगवान्... प्लीज निकालो... निकालो इसे... प्लीज मुझे दर्द हो रहा है.. अरे धक्के तो धीरे-धीरे मारो। हाँ... ऐसे धक्का... अरे, अब धक्का तो लगाओ... जोर से पेलो... रात को खाना । तो भरपूर खिलाई थी। साले जमकर पेलो... पेलो... मेरे राजा पेलो... हाँ हाँ बस ऐसे ही धक्के लगाते रहो। देखो, मैं भी चूतड़ उछाल-उछाल के तुम्हारे हर धक्के का जवाब दे रही हूँ। अरे पेलो मेरे राजा... पेलो... बस पेलो... हाँ हाँ। मेरे राजा... बस मेरा फिर से निकलने वाला है... अरे मेरा निकला रे अम्मा... निकला मेरा पानी... अरे देवरजी... तुम और तुम्हारा लण्ड दोनों ही लाजवाब हैं। पर अब बस करो। देखो, अब बस करो मेरे राजा... थोड़ी देर बाद फिर से चोद लेना।

 
कामरू- पर भाभी, फिर से चुदाई के बदले देने के लिए मेरे पास और चार हजार नहीं हैं। चुम्मे के बदले देने के लिए एक हजार भी नहीं हैं।

रश्मि- अरे देवरजी, पैसा किस कम्बख़्त ने माँगा है। मैं तो अभी तुम्हें तुम्हारे दिए हुए पैसे पूरे के पूरे पाँच हजार वापस कर देंगी। पर पहले मेरे फुद्दी के अंदर से इस लोहे के सरि को तो निकालो।

कामरू- अरे नहीं भाभी... मुझे नहीं चाहिए, वो पाँच हजार। वो तो आपके रूपए ही हैं, आपको दे दिए। बस तेरा तुझको अर्पण, क्या लगे मेरा? जै... जै... मखमली चूत हरे... कि चूत चोदने को लड़का लड़की के आगे-पीछे फिरे... जै जै मखमली चूत हरे।

रश्मि- वाह देवरजी, क्या बात कही तुमने... तेरा तुझको अर्पण क्या लगे मेरा। पर अब तो लण्ड का पानी निकालो।

कामरू- बस भाभी, थोड़ी देर और बर्दास्त कर लो। मेरा भी पानी निकल ही जाएगा। पांचेक मिनट में।

रश्मि रोते हुये- “क्या? क्या मतलब है कि पांचेक मिनट में निकल ही जाएगा। अरे मैं और एक पल भी बर्दास्त नहीं कर सकती हैं। बाहर निकालो... निकालो बाहर... वरना...”

कामरू- वरना... वरना क्या भाभीजी?

रश्मि- वरना... वरना और क्या साले, चूतड़ उछालते हुए चुदवाऊँगी और क्या? साले फिर से गर्म कर दिया तूने मुझे। पल भर तो आराम दे देते मेरे देवरजी... पर मजा बहुत आ रहा है।

कामरू- मजा तो मुझे भी बहुत आ रहा है भाभी। सच कहता हूँ कि मैंने आज तक अनगिनत चूत में लण्ड पेला है। कई तो पहले धक्के में ही बेहोश हो गई, और कई एक बार चुदवाने के बाद दुबारा चुदवाने की हिम्मत ना दिखा पाईं। पर सच कहता हूँ भाभी, आपकी बुर उनमें से सबसे प्यारी, सबसे न्यारी है।

रश्मि- हाँ हाँ पर अब बस करो, और निकालो अपना लण्ड... मेरी मखमली फुद्दी में से।

कामरू- बस भाभी... पांचेक मिनट में निकल ही जाएगा इसका पानी।

रश्मि- क्क-क्या? पांचेक मिनट में निकल ही जाएगा इसका पानी? पागल हो रखे हो क्या? साले चोद-चोदकर सुजा दिया मेरी फुद्दी को। निकालो लण्ड को। लगता है आज बुर की दोनों दीवारें छिल गई हैं, डाक्टर के पास जाना पड़ेगा। साले, तूने एक हजार चुम्मी के दिए और चार हजार चुदाई के दिए। अब लगता है कि चालीस हजार देकर चूत की फटी दीवारें सिलवानी पड़ेगी, डाक्टर से। और साला वो डाक्टर चोदूमल तो सच में महा-चोदू है। साले के पास सिर दर्द की शिकायत लेकर जाओ तो भी कपड़े खुलवा करके चूत के अंदर उंगली डालकर देखता है। कहीं सिर में दर्द चूत के रास्ते से होकर तो नहीं जा रहा है। चूत सिलाई से पहले एक चुदाई करेगा वो साला डाक्टर और सिलाई के बाद फिर से चोदेगा मुफ़्त में। जब तक घाव सूख नहीं जाते रोज गाण्ड अलग से मारेगा हरामी।

कामरू- अरे नहीं भाभी, जैसा आप सोचती हैं वैसा कुछ भी नहीं होगा। बस मेरा अभी निकलने ही वाला है। आप तनिक चूतड़ उछालो ना... मेरी पीठ भी सहलाओ।

रश्मि- साले, पाँच हजार रूपए क्या दे दिये। मेरी चूत का तो कचूमर ही निकाल दिया तूने। अरे मुझे नहीं चाहिए ये रूपए। निकाल दे लण्ड और ले ले वापस अपने पाँच हजार रूपए। अभी अलमारी से निकाल देती हैं। पर लण्ड तो निकाल ले मेरे देवर राजा। पर ये क्या? अब तो मजा आ रहा है रे... ले अब रुक क्यों गये? अबे हरामखोर, पेल... पेल... जोर से धक्का लगा.. हाँ... अब तो मेरा फिर से निकलने वाला है मेरे राजा।

कामरू- अरे मेरी रानी भाभी, मेरा निकालने ही वाला है। कहाँ निकालूं अपने लण्ड का पानी?

रश्मि- “अरे, मैं कौन सी कुंवारी लड़की हूँ की प्रेगनेन्ट होने से डर जाऊँ.. मेरे राजाजी, निकाल दे मेरी फुद्दी में अपने लण्ड का रस्स, भर दे मेरी फुद्दी को अपने लण्ड के रस्स से। हाँ हाँ... भर दे... पूरा भर दे.. हाय... कितना गरम-गरम पानी है...”

और दोनों ही पशीने-पशीने हो गये। एक-दूसरे से लिपट गये। दस मिनट के बाद।

रश्मि- हे देवरजी, जरा सोचो... कल जब मेरे पति घर आएंगे तो मैं उनसे कैसे आँख मिला पाऊँगी। मैंने उन्हें धोखा दिया है... सिर्फ पाँच हजार के लिए मैंने उन्हें धोखा दिया है। मुझे नहीं चाहिए ये पाँच हजार। आप अपना पैसा वापस ले लो।

कामरू- अरे नहीं भाभी, ये मैं नहीं ले सकता... ये तो आपका ही है। तेरा तुझको अर्पण क्या लगे मेरा... जै... जै... मखमली चूत हरे। चूत चोदने को लड़के क्या-क्या लफड़े करे। जै... जै... मखमली चूत हरे।

रश्मि- फिर भी देवरजी, मैं उनसे कैसे आँख मिलाऊँगी की मैं उनके दोस्त से उनके गैर हाजिर में दो-दो बार चुदवा ली।

कामरू- क्या कहा भाभी? दो-दो बार? पर मैंने तो एक ही बार चोदा है।

रश्मि- तो क्या फिर से चोदना नहीं चाहोगे मेरे बुद्धू देवरजी? भले ही मेरी चूत फूल के पावरोटी बन गई हो। पर आपके इस गधे जैसे लण्ड से दुबारा चुदने के लिए मैं इससे और भी ज्यादा दर्द बर्दास्त कर सकती हूँ। पर आपका लण्ड खड़ा हो तब ना... ये तो पूरा ही मुरझा गया है। अरे ये तो फिर से खड़ा होने लगा। अरे... रे देखो तो साले, लण्ड को फिर से फुद्दी मिलने की खुशी में कैसे उछलने लगा है। हाँ अब आएगा असली मजा जब । मिल बैठेंगे चार यार... आप, मैं, मेरी मखमली बुर और आपका ये मस्ताना लण्ड... और इसी तरह उस रात रश्मि तीन बार चुद गई।

सुबह सवेरे ही कामरू कमरे से निकला।

रश्मि उससे लिपटते हुए- मेरे देवरजी, फिर कब आओगे?

कामरू- पर भाभी... मेरे पास सचमुच पैसे नहीं हैं, देने के लिए।

रश्मि- अरे.. पैसा कौन माँग रहा है? मैं तो कहती हैं कि ये पाँच हजार भी वापस ले लो।

कामरू- नहीं भाभी, वो तो आपके ही हैं।

राशि- चलो, तू कहते हो तो रख लेती हूँ। पर जो मजा तुमने मुझे दिया है। मैं बिना पैसे के तुमसे रोज चुदवाने के लिए तैयार हैं। हाँ पर आपके दोस्त को पता नहीं चलना चाहिए। वरना लेने के देने पड़ जाएंगे।

कामरू- अरे भाभी, मैं तो उसे बोलूंगा नहीं। हाँ आप ही उन्हें बता दो तो दूसरी बात है।

रश्मि- मैं पागल थोड़े ही हैं, जो उसे बता दें की पहली बार मैंने एक हजार में एक चुम्मी दी और चार हजार में चुदवा ली तुमसे। बस तुम समय निकाल के आते रहना... ठीक है? अब उनकी दिन का ड्यूटी है। तुम अपनी रात ड्यूटी करवा लो। जब उनकी रात ड्यूटी होगी तो अपनी दिन ड्यूटी करवा लेना। फिर अपनी मौज ही मौज होंगी। अबकी राखी पे तुम्हें राखी भी बाँध देंगी तो इन्हें कोई शक भी नहीं होगा। और तू दिन में भैया और रात में सैंया बन जाना।

कामरू- अरे भाभी, मेरा फिर से खड़ा होने लगा। प्लीज... एक बार।

 
रश्मि- खबरदार... साले, मेरी फुद्दी सूजकर पावरोटी से भी दुगनी फूल गई। है। मैं ये सोच रही हूँ कि अब मेरे पति अगर चोदना चाहेंगे तो उनको कैसे मना करूंगी? मैं चल नहीं पा रही हूँ, और तुम्हें एक राउंड की और पड़ी है। चलो, चुपचाप निकलो।

कामरू- पर आज शाम को?

रश्मि- नहीं, आज नहीं कल। आज तो मैं अपने पति से भी ना चुदवाऊँ।

कामरू- ठीक है भाभीजी, नमस्ते।

रश्मि- नमस्ते... नमस्ते... हम आपको कुछ नहीं समझते। चले जाओ रस्ते-रस्ते। आ जाना कम शाम ढलते-ढलते।

और ठीक आधे घंटा बाद। रश्मि गरम पानी से अपनी चूत को धो रही थी की दरवाजे की घंटी बजी।

रश्मि- अरे, आ रही हैं बाबा.. आ रही हैं। दरवाजे की घंटी है कोई मंदिर का घंटा नहीं की बजाते ही जा रहे हो। अरे बाबा कौन है? साला बजाते ही जा रहा है। अरे... रे... आप?

रमेश- अरे डार्लिंग, कहाँ थी? मैं कितनी देर से घंटी बजा रहा था।

रश्मि - वो... वो मैं बाथरूम में थी।

रमेश- अरे, ये ऐसे कैसे चल रही है?

रश्मि- अरे बाबा, पाइल्स की शिकायत हो गई है।

रमेश- पाइल्स की शिकायत हो गई है? पर डार्लिंग, मैंने तो तेरी गाण्ड में आजतक लण्ड पेला ही नहीं है तो पाइल्स कैसे?

रश्मि- “छीः छीः कैसी बात करते हैं आप? गाण्ड मारने से थोड़े ही पाइल्स होता है। वो तो रात को...”

रमेश- वो रात को? रात को क्या डार्लिंग? मेरी याद में कहीं चूत की जगह गाण्ड में ही तो गाजर मूली नहीं घुसेड़ लिया तूने?

रश्मि- अरे नहीं बाबा, वो रात को सब्जी में थोड़ी सी ज्यादा मिर्च डल गई, इसीलिए सुबह तक... रात को मुँह जल गया और सुबह गाण्ड जल रही है।

रमेश- अच्छा... अच्छा, हाँ... अरे मैं रात को नहीं आऊँगा कहके अपने दोस्त के हाथों खबर किया था, उसने बता दिया था ना?

रश्मि- हाँ हाँ... कामरू भैया आए थे। उन्होंने बता दिया था की तुम रात को नहीं आने वाले हो।।

रमेश और मेरी तनखाह के पाँच हजार रूपए उसके हाथ दे दिए थे, संभाल कर रख दिया था ना तूने?

रश्मि- क्या? क्या?

रश्मि- क्या? क्या-क्या लगा रखी है। मैं कहता हूँ कि पैसा संभाल के गिन के रख दिया था ना तूने?

रश्मि- क्या? वो तनखाह के पाँच हजार रूपए थे? हे राम... मैं ये क्या कर बैठी? पैसे के लालच में पति के दोस्त से चुदवा बैठी?

* * * * *

* * * * *

सासूमाँ- अरी चम्पारानी, खुश कर दिया यार तूने तो... कमाल कर दिया, यारा बिना चुदाई के ही चूत की खुजली मिटा दी तूने तो।।

चम्पा- बैंक यू अम्मा जी।

दीदी- अरे अम्मा जी, अभी रामू भैया क्या कर रहे होंगे?

सासूमाँ- क्या कर रहा होगा? तेरा रामू भाई, जरूर उस साली चू-दाने वाली सुमनलता की चुदाने का मजा ले रहा होगा।

दीदी- क्या बात कर रही हो अम्मा जी? मेरा भाई, मैं मानती हूँ की कल रात भर बस के अंदर मेरी फुद्दी में लण्ड पेलते रहा। सुबह मेरी ननद की चूत में पेल दिया। दोपहर को आप चुदवा बैठी। रात भर हम तीनों को पेल दिया। फिर किचेन में चम्पा रानी की बुर में भी लण्ड पेल दिया। उसके बाद आपके बेटे यानी मेरे पातिदेव ने उनसे गाण्ड भी मरवा ली। पर मेरा भाई इतना भी महा-चुदक्कड़ नहीं है की ऐसी कोई ऐरी गैरी नत्थू खैरी... किसी बूढ़ी सुमनलता के चुदाने का मजा ले।

सासूमाँ- अरे बहूरानी, मैं चू-दाने की बात कर रही हूँ। चुदाने की नहीं।

दीदी- अरी अम्मा, चुदाने की बात कर रही हूँ चुदाने की नहीं का मतलब क्या है आपका? जरा खुलकर समझाइये ताकी मैं ठीक से समझ सकें।

सासूमाँ- अरे साड़ी को कमर तक तो खोल रखा है और कितना खोलू? दिन में भी पूरी की पूरी खोल दें.. नंगी हो जाऊँ पूरी की पूरी... अरे मैं चू-दाने। चू-दाने याने चूनमून दाने की बात कर रही हूँ। पक्की वो सुमनलता को उस चू-दाने में मजा आता है कंपनी की मालेकिन है। उसे चू-दाने खिला रही होंगी। और मेरे रामू बेटे को उसके चुदने में मजा आता होगा।

दीदी- हाँ... अम्माजी। उसे तो हमारे साथ चुदाने में मजा भरपूर आया था। और इस सुमनलता के चू-दाने में भी मजा आता होगा। क्या पता... चू-दाने में मजा लेते-लेते कहीं चुदाने का मजा भी ना लेने लगा हो। मैं फोन लगाती हूँ भैया को।

सासूमाँ- हाँ.. बेटी लगा फोन रामू बेटे को कहीं वो सुमनलता सचमुच में ही कही चुदाने में मजा ना लेने लगे।

दीदी- ये लो, घंटी बजी... हेलो हेलो... अरे चम्पा तू क्यों अपनी उंगली मेरी फुद्दी में हिला रही है। मेरा पानी निकल चुका है। पगली अब हिलाना बंद कर।

चम्पा- वो भाभी, आपने तो हिलाओ... हिलाओ कहा था।

दीदी- अरे मैंने हेलो-हेलो... कहा है, हिलाओ-हिलाओ नहीं। हाँ... अरे रामू भैया कहाँ हो आप?

रामू उधर सुमनलता के घर पे- “अरे दीदी... मैं इधर मेडम के घर आ रखा हूँ। और मेडम के साथ चू-दाने का मजा ले रहा हूँ।

दीदी- अरे, आप वहाँ भी चुदाने में मशगूल हो गये। शर्म नहीं आई आपको। यहाँ हम सबकी चूत में जबरदस्त खुजली मची हुई है। हम सब एक-दूसरे को पहले की चुदाई की कहानी बता-बताकरके चूत में उंगली हिलाहिलाकर टाइम पास कर रहे हैं, और आप... आप भैया, वहां उस सुमनलता मेडम के साथ.. साली बुढ़िया के साथ चुदाने का मजा ले रहे हो?

रामू- “अरे दीदी, क्या गजब कर दिया आपने? हाँ... मैं क्योंकी चुदाने में मजा ले रहा था मोबाइल का लाउडस्पीकर ओन था। हे भगवान्... दीदी, आपने सब कहानी आधे मिनट में ही सुना के खतम कर दिया। दीदी मैं मेडम के साथ उनके कंपनी का बनाया हुआ चू-दाने का मजा ले रहा था। मेडम की चूत में लण्ड घुसाके चुदाने का मजा नहीं ले रहा था। और मेडम बुढ़िया नहीं हैं.. एकदम जवान और खूबसूरत हैं... एकदम मस्त सासूमाँ की तरह, की लण्ड... ओह.. सारी सारी... मेडम...”

दीदी- सारी भैया, मैंने आपका दिल दुखाया। सारी।

रामू- कोई बात नहीं दीदी। पर अब न जाने मेडम क्या सोचेंगी मेरे बारे में। ठीक है रखता हूँ।

दीदी- ठीक है भैया, हम सब खाने पे आपका इंतेजार करेंगे।

रामू- ओके... बाइ बाइ, सी यू देन।

* * * * * * * * * *

 


उधर सुमनलता मेडम के घर में

सुमनलता- क्या बोल रही थी तुम्हारी बहन?

रामू- वो... वो... आई आम सारी मेडम। स्पीकर ओन था। आई आम रियली वेरी वेरी सारी।

सुमनलता- कोई बात नहीं, पर क्या सचमुच तुमने उन सबको चोदा है?

रामू- आपने सुना तो था मेडम।

सुमनलता- पर बेटा ये गलत है, अपनी बहन को चोदना गलत है।

रामू- वो मेरी सगी दीदी नहीं है मेडम, मेरे दोस्त की बहन है।

सुमनलता- फिर भी बेटा। देखो, ये फिर भी गलत है।

रामू- सारी मेडम, आगे से ध्यान रचूँगा।

सुमनलता- आगे से ध्यान रखेंगा... मतलब? अब तुम अपनी दोस्त की बहन, उनकी ननद, उनकी सासूमाँ, उनकी नौकरानी को नहीं चोदोगे? उनके पति के गाण्ड में लण्ड नहीं पेलोगे?

रामू- नहीं मेडम... मैं तो कह रहा हूँ कि आगे से ध्यान रखेंगा। दीदी से बात करते वक्त मोबाइल का स्पीकर आफ करके ही बात करूँगा। वो... वो तो मैंने आपके साथ चुदने में मजा लेने से पहले आपके साथ चुदाने का मजा आते ही ले चुका था वरना आप तो बड़ी नाराज होती।

सुमनलता- वो तो है बेटा... जब से तुम्हारी सासूमाँ से टेलिफोन पे चू-दाना और चुदाना के कन्फ्यूजन की बात हुई थी। मेरी चूत बुरी तरह पनिया गई थी। मैंने अपनी तीनों बेटियों को आफिस भेज दिया, और तुमसे चुदवाने की पूरी की पूरी तैयारी कर ली थी। और तुम्हारे आते ही रसोई में गिरने का नाटक किया।

रामू- और पैर में मोच आने का बहाना करके मेरी बाहों में बेडरूम पहुँच गई और वहाँ पे... अरे मेडम... मैंने पहली बार जब आपको देखा था तभी समझ गया था की आप... आप महा-चुदक्कड़ टाइप की औरत हैं। कोई सीधा सादा बंदा आपको संतुष्ट कर ही नहीं सकता। आप मुझसे बात करते हुए साड़ी के ऊपर से ही अपनी ललमुनिया को जिस तरह से खुजला रही थी। मैं समझ गया था कि आज इसकी खुजली मेरे लण्ड से ही मिटने वाली है। और जब आप किचेन में से आवाज लगाई तो मैं समझ गया था की आप नाटक कर रही हैं।

सुमनलता रामू की जांघों पर हाथ फेरते हुए- अरे रामू, तुमने कैसे समझ लिया की मैं नाटक कर रही हैं।

रामू- मेडम, आपने कहा था कि आप चाय लेकर आ रही थी तब फिसल गई। पर चाय की दोनों प्यालियां तो ट्रे में रखी हुई थी और आप जहाँ फिसल रखी थी वहाँ से कम से कम दस कदम दूर में। तो मुझे ये यकीन हो गया था की आप गिरी नहीं हैं बल्की गिरने का नाटक कर रहीं हैं। और फिर मैंने भी नाटक करते हुए तुरंत आपको दोनों बाहों में उठाकर बेडरूम में ले गया। और मेरी आशंका तब यकीन में बदल गई जब आपको बाम लगवाने से पहले चाय के ठंडी हो जाने की चिंता सताने लगी। हमने चाय पी। तब तक आपने साड़ी को घुटने तक उठाते हुए अपनी गोरी-गोरी पिंडलियों के दर्शन कराना चालू कर दिया था। मैंने भी बहती हुई गंगा में हाथ धो लेना उचित समझा और फिर बाम लगाने के बहाने जब आप थोड़ा और ऊपर करने लगी तो मैंने अपने हाथ को सीधे ही आपकी गीली हो चुकी पैंटी के ऊपर ही फिराना चालू कर दिया। आपने अपनी आँखें बंद कर लिया और सोने का नाटक करना शुरू कर दिया और मैं शुरू हो गया। आपके पैंटी उतारने के बाद मैं आपकी दोनों जांघों को फैलते हुए आपकी मूड़ी दोनों जांघों के बीच में ले गया और जैसे कोई भालू शहद चाटता हो, जैसे कोई कुत्ता किसी कुतिया की फुद्दी को चाटता हो, वैसे ही मैं शुरू हो गया। आपने भी मेरे सिर पे हाथ फिराना शुरू कर दिया। और बस ऐसे ही लगे रहो बेटा... लगे रहो... और चूसो... करने लगी।

सुमनलता- और क्या करती रामू बेटे? तू चूसता ही है इतने शानदार तरीके से की मुँह से ना चाहते हुए भी सिसकियां निकल आती हैं। फिर मेरे कहने पर तुम मेरी जांघों के बीच में बैठ गये, और फुद्दी के मुहाने पर लण्ड सटाते हुए एक शानदार धक्के के साथ ही लौड़े का सुपाड़ा मेरी फुद्दी में पेल दिए। मेरे मुँह से एक चीख निकल गई। क्योंकी बहुत दिनों से मेरी चूत चुदी जो नहीं थी। और मेरे पति के जाने के बाद इसका पहली बार उद्घाटन होने वाला था।

रामू- फिर मैंने आपके चीखने की परवाह ना करते हुए दूसरे और फिर तीसरे धक्के के साथ ही अपना पूरा का पूरा लण्ड घुसेड़ डाला, आपकी चूत के अंदर।

सुमनलता- मैं काफी रोई, काफी चिल्लाई, पर बेटे तुमको दया ना आई। मेरी बुर में अभी तक दर्द हो रहा है। और तुझे मजाक सूझ रहा है बेटे।

रामू- अच्छा... आपको दर्द हो रहा था, मैं ये मानता हूँ। पर उसके बाद तो मजा भी आपने खूब लूटा था मेडम। चूतड़ उछालते हुए- और जोर से पेलो... फाड़ दो मेरी फुद्दी... अगर मेरे छूटने से पहले छूटा तो लण्ड को उखाड़ दूंगी... कौन कह रहा था?

सुमनलता- वो... वो तो... मेरी चूत बाद में पनिया भी तो गई थी। चूत माँगे चुदाई, मोटे तगड़े लण्ड से। जो छुड़ा दे पानी उसका अपनी मस्त चुदाई से।

 
रामू- मैंने भी तो मेडम, अपने चुदाई धर्म को खूब निभाया, और आपके छूटने के बाद ही छूटा था।

सुमनलता- चुदाई धर्म खूब निभाया था और मेरे छूटने के बाद ही छूटा था। साले, मेरी फुद्दी के सारे कस-बल ढीले कर दिए तूने। मेरी फुद्दी त्राहिमाम-त्राहिमाम करने लगी थी। तीन बार पानी छोड़ चुकी थी मेरी चूत, तब कहीं जाकर पूरे एक घंटे के बाद अपना पानी निकाला था तूने। पानी क्या निकाला था... पूरा का पूरा टब भर गया होता। वो तो मेरी खेली खाई चूत थी, वरना... कोई मेरी बेटियों जैसी कमसिन चूत होती तो तीन दिन तक बेहोश ही रहती।

रामू- क्या बात करती हैं मेडम? ऐसे भी कहीं होता है?

सुमनलता- मैं जानती हूँ रामू बेटे कि मैं बात में थोड़ी सी नमक मिर्च लगाकर बोल रहीं हैं। ताकी हमारे प्रिय गाशिप के पाठकों को मजा भी तो आना चाहिए ना, इस कहानी को पढ़ने में।

रामू- वो तो है मेडम। फिर हमने ऐसी पारी खेली की पलंग चरमरा उठा। चुन-चुन-चुन करने लगा।

सुमनलता- और नहीं तो क्या? उसके ऊपर आज तक ऐसी दमदार चुदाई हुई भी कहाँ थी। बेचारा पलंग तुम्हारा धक्का बर्दास्त कर लिया यही गनीमत है।

रामू- और आपकी इस फुद्दी का भी मैं तहेदिल से धन्यबाद अर्पित करना चाहता हूँ। जिसने मुझे मेरे इस मस्ताने लण्ड को काफी मजा दिया है।

सुमनलता- अरे रामू बेटे, धन्यबाद तो मुझे तुम्हारा कहना चाहिए। जितने मजा मेरी फुद्दी ने तुम्हें दिया है, उससे कहीं ज्यादा ही मेरी फुदी ने मजा लूटा भी है। आज तक ऐसा मस्ताना लण्ड ना देखा, ना सुना, ना पढ़ा, ना कभी अनुभव किया था। आज मेरी फुदी धान्य-धान्य हो गई तुम्हारे मस्ताने लण्ड से चुद करके। तो रामू बेटे, कैसे रहा अपना पहला इंटरव्यू?

रामू- मेरे लिए तो बड़ा ही जबरदस्त रहा। और आपको मेरा इंटरव्यू देना कैसा लगा मेडम?

सुमनलता- रामू बेटे, मुझे भी बड़ा ही मजा आया। पर ये क्या तुम्हारे पैंट में तंबू जैसे क्या है? कहीं, यहाँ से कुछ छुपाकरके तो नहीं ले जा रहे हो? दिखाओ अपना पैंट? अरे बाप रे... ये तो तुम्हारा लण्ड है रामू बेटे। ये तो फिर से खड़ा हो गया है। कहीं मेरी बातों से तो नहीं खड़ा हो गया है तुम्हारा लण्ड?

रामू- हाँ मेडमजी... वैसे मेरा लण्ड नारी जाति की बहुत ही इज्ज़त करता है। किसी भी खूबसूरत लड़की को देखते ही इज्ज़त देने को फट से खड़ा हो जाता है। लड़की की फुद्दी का मुहाना देखा नहीं की घुसने के लिए तुरंत तैयार हो जाता है। अंदर-बाहर, अंदर-बाहर होकर फुद्दी की सही तरह मालिश करके उसकी खुजली मिटाने की हर कोशिश करता है। अपना जूस उसके अंदर डालकर उसे सही मजा भी देता है। फिर उस महान फुद्दी के सम्मान में अपनी गर्दन झुका देता है।

सुमनलता- अरे वाह.. रामू बेटे, क्या बात कही तूने। मेरी फुद्दी में खुजली होने लगी है। इसे मिटाएगा कौन?

रामू- जांघों के बीच में... झांटों की राहों में... फुद्दी की सुरंग में.. खुजली मिटाने को... एक लौड़ा निकलता है.. जिसे आप चोदू कहते हैं।

सुमनलता- तो मेरे चोदू राजा, आ जा। मेरे जांघों के बीच में आ जा। बजा दे चूत का बाजा।

रामू- मेडम... फिर से चुदाई से पहले कुछ चूत चाटी भी हो जाये।

सुमनलता- हाँ हाँ... क्यों नहीं? मैं भी तेरे लण्ड को चूस लेती हैं। बड़ा मजा देता है, तेरा लण्ड।

रामू- कहीं कोई आ ना जाए?

सुमनलता- कौन आएगा? मेरे पातिदेव तो स्वर्ग सिधर चुके हैं। स्वर्गलोक से कोई राकेट में बैठ के यहाँ वापस आने से रहे। मेरी तीनों बेटियां आफिस जा चुकी हैं। रही नौकरानी की बात... तो उसे मैंने सुबह से ही 100 का नोट देके छुट्टी दे रखी है की दोपहर से पहले नहीं आना।

रामू- जीयो मेडम... आपके दिमाग का कोई जवाब नहीं।

सुमनलता- और मेरे इस खूबसूरत बदन का... मेरी इन मस्तानी चूचियों का... गुलाबी होंठों का... कजरारे नयनों का... मखमली फुद्दी का कोई जवाब नहीं है क्या?

रामू- “तो शुरू करें चूत चाटी। संग में होगी लण्ड चुसाई..” और दोनों ही 69 पोजीशन में आ गये और जैसे कोई प्रतियोगिता शुरू हो गई। रामू फुद्दी के दानों को सहलाते हुए अंदर तक जीभ घुसेड़ते हुए चूत चाटने लगा। सिसकियां भरती हुई सुमनलता भी लण्ड को आइसक्रीम की तरह चूसने लगी। कोई भी हार मानने के लिए तैयार नहीं था।

पर थोड़े ही देर सुमनलता मेमसाहेब- “अरे बेटे अब बर्दास्त नहीं हो रहा है। चल मैं हारी तू जीता। अब तो घुसेड़ दे मेरे सैंया। क्यों तड़पा रहा है?”

रामू- जो आज्ञा मेडम जी।

सुमनलता- जब हम दोनों के बीच में कोई पर्दा नहीं रहा तो फिर मुझे मेडम-मेडम क्यों कहता है। सुमनलता या सुमन कहकर पुकार।

रामू अपना लण्ड चूत के मुहाने पर रगड़ते हुए- नहीं मेडम जी, ये नहीं हो सकता है? मैं अपने दोस्त की बहन । को चोदते समय भी दीदी ही कहता हूँ। इससे एक खतरा नहीं होता। मैं अगर आपको सुमनलता या सुमन कहूँगा तो कभी भी आपकी लड़कियों के सामने भी मेरी जवान फिसल सकती है। और मेरा तो खैर कुछ नहीं... पर मैं आपकी इज्ज़त का जनाजा आपकी बेटियों के सामने उठ जाए, ये खतरा मोल नहीं ले सकता।

 
सुमनलता- अरे, जियो बेटे... कितना सोचता है मेरे बारे में। तो अब क्यों नहीं सोच रहा है?

रामू- क्या हुआ? बोलिए?

सुमनलता- अरे मेरी फुद्दी तड़फ रही है। तुझे जरा भी खयाल नहीं है इसका की मेडम की चूत की खुजली मिटाऊँ और अपना इनक्रीमेंट बढ़ाऊँ।

रामू- पर मेडम, अभी तो मेरी नौकरी लगी भी नहीं है और आप इनक्रीमेंट बढ़ाने की बात करने लग गई।

सुमनलता- बस पहले लण्ड घुसा दे बेटे। हाँ हाँ... अरे एक साथ मत घुसा बेटे... अरे मार डाला रे... बेटे तूने तो मेरी फुद्दी फाड़ डाली रे.. तेरी नौकरी कैंसिल साले... मरवा दिया रे.. अरे रुक क्यों गया... नौकरी कैंसिल तो मजाक में बोल रही हूँ। नौकरी पक्की मेरे बेटे... नौकरी पक्की। बस मत रुक हाँ... लगा धक्का।

रामू- मैं जानता हूँ मेडम कि अब मेरे सितारे बुलंदी पे हैं।

सुमनलता- हाँ बेटे, और तेरे साथ चुदाई करवा के मेरे भी भाग खुल गये। बस धक्का मारते रह मेरे बेटे।

रामू- “ले साली ले... महा-चुदक्कड़ हो गई है तू... ओहह... सारी सारी... मेडम...”

सुमनलता- कोई बात नहीं बेटे। गालियां देने से चुदाई में मजा दोगुना बढ़ जाता है। बस धक्का लगाते रह।

रामू- आप मेरे हर धक्के का जवाब चूतड़ उछालते हुए जो दे रही हैं तो मजा आ रहा है मेडम।

सुमनलता- हाँ बेटे, बहुत दिनों की खुजली आज मिट रही है। मेरा तो निकलने ही वाला है बेटे.. अपना धक्का बंद नहीं करना... मार धक्का... देख चुदाने में कितने मजा आ रहा है।

रामू- मान गये मेडम। आपके चू-दाने खाने में और आपकी चूत चुदाने में दोनों में ही आज तो मजा आ गया। मेरा भी निकलने ही वाला मेडम। कहाँ निकालें अपना पानी। पहली बार की तरह अपने मुँह में लेना चाहोगी या?

सुमनलता- अरे बेटे क्यों घबराता है, मेरी माहवारी बंद हो चुकी है। पेट फूलने का कोई डर भी नहीं है। चूत की असली खुजली वीर्य से ही मिटती है बेटे। निकाल दे अपना सारा पानी... भर दे मेरी बुर को... निक... ल दे... मेरा भी निकलने वाला है। अरे मैं तो गई रे... बेटे, आज तो वर्षों की प्यास बुझ गई बेटे।

रामू- मेरा भी निकल रहा है मेडम। लो मैंने भर दिया आपकी बुर को अपने पानी से। देखो, कैसी फकच-फकच की आवाजें निकाल रही है आपकी फुद्दी, रस से भरकर।

सुमनलता- हाय... मैं तो आज पूरी खुश हो गई बेटे।

दोनों एक-दूसरे से लिपट गये। दस मिनट तक लिपटे रहे। दोनों एक-दूसरे को चूमने लगे। कोई भी अलग नहीं होना चाहता था, और एकाएक फोन की घंटी बज उठी। दोनों हड़बड़कर एक-दूसरे से अलग हो गये।

सुमनलता- हेलो, कौन? हाँ बेटी, क्या बात है? हाँ, मैं भी आ रही हूँ। वो रामू का इंटरव्यू ले रही थी। हाँ हाँ कल से जान करेगा। अरे, उसको गये आधे घंटा हो चुके हैं। मैं आफिस अभी नहीं आऊँगी। थोड़ा बदन दर्द दे रहा है। एक घंटे के बाद आऊँगी। हाँ हाँ... बाइ बाइ।

रामू कपड़े पहनते हुए- तो मेडम, तो मेरी नौकरी?

सुमनलता- “तेरी नौकरी पक्की बेटे... पक्की। कल से ड्यूटी जान कर लेना। मेरी बेटियां आपको काम समझा देंगी। लेकिन खबरदार उनके ऊपर डोरे नहीं डालना। वो पहल करें तब भी नहीं। हर शाम आफिस बंद करने के बाद मेरे साथ मेरे फार्महाउस पर जाएंगे और ऐश करेंगे। ठीक है...”

रामू- ठीक है मेडम। तो मैं चलूं, कल आफिस में मिलेंगे। बाइ बाइ।

सुमनलता- बाइ बाइ बेटे... कल मिलेंगे।

* * * * *

* * * * *

उधर दीदी के घर में दीदी, सासूमाँ, और चम्पारानी तीनों लगे हुए हैं।

दीदी- हाँ तो चम्पारानी, कोई ऐसा वाकया सुना की सुनकर मजा आ जाए। चड्ढी गीली हो जाए।

चम्पा- सुनते ही चड्ढी गीली हो जाए... पर भाभीजी, आपने तो चड्ढी पहनी ही नहीं है तो कहाँ से गीली हो जाए? पहले पैंटी पहन लीजिए, फिर गीली करने की कोशिश पक्का करूंगी।

सासूमाँ- रहने दे, रहने दे... पहले पैंटी पहनवायेगी, फिर गीली करेगी, फिर उंगली घुसाएगी, फिर चाटेगी। क्या फायदा? तू तो बस शुरू हो जा, मैं उंलगी कर रही हूँ तेरी चूत में।

* * * * *

* * * * *

चम्पा- अरे नहीं अम्मा, अब तो भाभी को करने दीजिए। आप भाभी की चूत में उंगले करिए और मुझे भाभी की फुद्दी में उंगली करने दीजिए।

तो बात उन दिनों की है। मेरे भाई कामरू की नई-नई शादी हुई थी। कामरू का एक बचपन के दोस्त थे जिनका नाम था भादरू बचपन में दोनों साथ-साथ पढ़े थे। कामरू की पढ़ाई तो बस पाँचवी तक ही हुई पर भादरू... पाँचवी के बाद शहर में पढ़ने लगा पर दोनों की दोस्ती बनी रही। दोस्ती समय के साथ गहरी होती गई। गाँव में भादरू का मुहल्ला अलग था पर दोनों साथ-साथ ही गाँव के तालाब में नहाने जाते थे और कमाल की बात ये हुई की दोनों की शादी एक ही गाँव में हो गई। ये मैं पहले ही कह चुकी हूँ की भादरू पढ़ा-लिखा था जब की मेरा भाई कामरू कम पढ़ा-लिखा था।

सासूमाँ- कम पढ़ा-लिखा था। तू तो ऐसे बोल रही है जैसे उसे चोदना भी नहीं आता हो। कामरू ने अपनी बीवी को चोदा तो था ना... की तेरी भाभी उंगली ही पेलती रही। जैसे अभी बहूरानी मेरी बुर में उंगली में पेल रही है।

चम्पा- अरे नहीं अम्मा जी, आप भी क्या बात करती है। चुदाई का पढ़ाई से क्या संबंध है भला। मेरा भाई तो ऐसी मस्त चुदाई करता है की क्या बोलँ। जान गले में अटक जाती है, दिल हथेली पर आ जाता है, आज भी उनके साथ हुई अपनी पहली चुदाई को याद करती हूँ तो... हाँ... ह... ... भाभी, मेरा तो पानी ही निकल गया।

 
सासूमाँ पर हमारा तो नहीं निकला है। तू बहूरानी पेलना शुरू करने से पहले मेरी फुद्दी को सहला। थोड़ा चूची भी दबा दे।

दीदी- हाँ हाँ.. अम्माजी, थोड़ा सा चुम्मा भी दे देती हैं। चूचियां सहलाते हुए, नाभि को पप्पी भी दे देती हैं। जांघों को सहलाते हुए, फुद्दी चाट भी लेती हूँ। जीभ से चूत के दाने को कुरेदते हुए उंगली पेलती हूँ। जीभ को चूत के अंदर घुसेड़ते हुए दोनों पुत्तियों को चाटने लग जाती हूँ।

सासूमाँ- क्यों मजाक कर रही है बहू?

दीदी- अच्छा, पर शुरू किसने किया था?

सासूमाँ- “अरे नाराज क्यों होती है बहू। आज रात रामू बेटे के साथ तू ही करेगी। बस्स... खुश...”

दीदी- पर रात को क्यों अम्मा? अभी दोपहर को आने वाला है मेरा भाई, उस समय क्यों नहीं?

सासूमाँ- पर बहूरानी उसे दोपहर को खाना तो खा लेने देना। उसके बाद थोड़ा आराम कर लेगा तो रात को सभी उसके साथ मस्ती।

दीदी- अच्छा-अच्छा... अब समझी। रात को उसके साथ सभी मस्ती करेंगे। याने आपकी चूत की खुजली मिटी नहीं है अब तक। रामू भैया से चुदवाकर ही आपके खुजली मिटेगी।

सासूमाँ- हाँ... बहू, जब से उससे चुदवाया है। खुजली मिटने की जगह बढ़ती ही जा रही है... बढ़ती ही जा रही है।

चम्पा- वो तो है अम्मा जी। मेरी तो अभी से शुरू हो गई।

और मेरी चूत की खुजली? मेरी चूत की खुजली का क्या होगा? सभी चुदवायेंगे तो क्या मैं अकेली अपनी चूत में क्या लोहे का सरिया घुसेड़ेंगी। साली किचेन में भी एक गाजर, मूली या बैगन तक नहीं चोदे हो की चूत में घुसेड़

तीनों ही सासूमाँ, दीदी, और चम्पारानी ये चौथी आवाज सुनकर सिर से पाँव तक कॉप गई। हे राम... हम सब नंगी हैं और ये कहाँ से टपक पड़ी।

दीदी- अरे झरना दीदी, आप कालेज से कब आई? एग्जाम कैसे रहा? घंटी तो बजा दी होती?

झरना- अरे भाभी, कालेज से अभी-अभी... तभी आई जभी आप एक-दूसरे की फुददियों में उंगली करने में मशगूल थे। रही एग्जाम की बात तो एग्जाम एकदम मस्त रहा। रामू भैया से चुदवाने के बाद शरीर एकदम हल्का फ्ल्का था। मन एकदम प्रसन्न था। पेपर एकदम बढ़िया गया। रही बात घंटी बजाने की तो अगर मैं घंटी बजाती तो ऐसा सुंदर नजारा कहाँ देख पाती। मेरे पास डुप्लीकेट चाभी थी सो खोलकर नजारा देखने लगी।

सासूमाँ- वो तो ठीक है बेटी, पर तेरे कपड़े कहाँ गये। तू तो पूरी की पूरी ही नंगी है। हे राम... रे... कालेज में नंगी ही गई थी क्या? हे भगवान्... तू भी ना बेटी, ये क्या गजब कर दिया?

झरना- अरे नहीं अम्मी, कपड़े तो पूरे ही पहनकर गई थी। अभी खोली हूँ जब आप एक-दूसरे की चूत में उंगली घुसेड़ रही थीं।

दीदी- तो चले आओ आप भी पलंग पे और शामिल हो जाओ। पर दरवाजा तो बंद करके आए हो ना... आप आकर हमें इस अवस्था में देख लिए वो तो ठीक है पर... कहीं किसी बहरवाले ने देख लिया तो गजब हो जाएगा।

झरना- क्या गजब हो जाएगा? ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? साला खड़ा लण्ड लेकर फुद्दी में ही तो घुसेड़ेगा... और क्या करेगा? आ जाने दो। पर मैं तो दरवाजा बंद करके आई हूँ। हाँ चम्पारानी, तेरी चूचियां तो बड़ी मस्त हैं यार। और फुद्दी भी एकदम सफाचट... कहाँ से सीखा तूने झाँटें साफ करना?

चम्पा- मुझे कहाँ आता है, वो तो अम्माजी कर देती हैं। उन्हें झाँटदार बुर चाटना पसंद नहीं है ना।

झरना- “ओहो.. मम्मीजी, आप तो बड़ी छूपी रुस्तम निकली। वाह...”

दीदी- हाँ तो चम्पारानी, सुना की तेरे कामरू भैया और उनके दोस्त भादरू में क्या हुआ?

चम्पारानी- अरे होना क्या था? पहला सावन, दोनों की बीवियां अपने-अपने मैके जा रखी थी। दोनों मूठ मारकर काम चला रहे थे।

सासूमाँ- “क्यों भाई चम्पारानी... भादरू की कोई बहन नहीं होगी। पर तू तो थी अपने भाई कामरू का खयाल रखने को। तू...”

चम्पा- अरे अम्माजी, तब तक मैंने चुदवाना शुरू नहीं ना किया था।

दीदी- अच्छा-अच्छा... फिर क्या हुआ?”

चम्पा- बस सावन खतम होने ही वाला था की एक दिन सुबह सबेरे तालाब पर।

तालाब परकामरू- अरे यार भादरू, चल ससुराल में... यार सावन भी खतम होने वाला है। बहुत दिन हो गये यार मूठ मारते हुए, एक माह हो गया है। अब और सहन नहीं होता। मैं तो कल ही जा रहा हूँ।

भादरू- हाँ.. यार कामरू... मेरा भी वही हाल है। पर यार कल से ही तो हमारी ट्रेनिंग शुरू हो रही है।

कामरू जो की अँग्रेजी नहीं जानता- “क्या? क्या ट्रेनिंग मतलब?”

भादरू- मतलब यारा... प्रशिक्षण, हमें आगे चुनाव आ रहे हैं ना... तो हमें सिखाया जाएगा की चुनाव अच्छे तरीके से कैसे हो।

कामरू- ठीक है यार.. फिर तेरे ससुराल घूमने तो जाऊँगा ही। एक ही गाँव में हैं। फिर मेरी बीवी और तेरी बीवी सहेली भी तो हैं। कोई खबर हो तो बता देना।

 


भादरू- तू जा तो रहा है, अपनी बीवी को लाने को तो मेरी परिवार को भी लेते आना।

कामरू- ठीक है यार।

और कामरू और भादरू अपने-अपने घर चले गये।

दूसरे दिन शाम को कामरू याने चम्पारानी का भाई अपने ससुराल पहुँच गया।

कामरू की बीवी, कमलावती देखकर बहुत खुश हुई। शादी से पहले वो चुदाई का मजा क्या होता है इससे अंजान थी। पर शादी के बाद कामरू ने दमदार चुदाई करके उसकी चूत को चुदाई का ऐसा चस्का लगाया की सावन का महीना उसे मजा देने की जगह तड़पा ही रहा था। उसने अपने प्रीतम को चिट्ठी भी लिखी थी की अब तो आ जाओ सनम.. अब तो आ जाओ सनम।

आम पकने लगे। चूची मेरी सहलाने पर चूत फड़कने है लगी। अब तो आ जाओ सनम तेरे लण्ड की प्यासी हूँ। मैं। प्यास मेरी बुझा दे... चूत एक माह से प्यासी ही जल्दी से लौड़ा इसमें घुसा दे। और कामरू इसे पढ़ने के बाद तुरंत ही ससुराल पहुँच गया था।

शाम को खाना खाने के समय... कामरू खाना खा रहा था। सासूमाँ उसकी बगल में बैठी पंखा झल रही थी।

कामरू की सास- और बेटा, सब ठीक ठाक तो है?

कामरू गुस्से में- “ठीक ठाक तो बाद में बताऊँगा... पहले तू बता कि मैं तेरा बेटा कैसे लगा? यहाँ पर तेरी शादी हो रखी है। यहाँ पे मेरी भी शादी हो रखी है। तो फिर हो गई ना साढू साढ़... हमें बेटा ना कहा कर।

सब सुनकर हँसने लगे।

कामरू की सास अपनी फुद्दी खुजलते हुए- “ठीक है बेटा। ओहो फिर से गलती हो गई। ठीक है साढ़..”

और बहुत दिनों के बाद जब मिले तो रात को कामरू और कमलावती दोनों कमरे में एक-दूसरे से लिपटे हुए थे। कमलावती बोली- अजी छोड़िए हमें। इतने दिन आपको हमारी याद नहीं आई?

कामरू- याद तो बहुत आई कमलावती, पर क्या करूं? हालत से मजबूर था।

कमलावती- “हालत से मजबूर थे... और इधर हम तड़प-तड़प के चूत में उंगली घुसाते थे...” कहते-कहते कमलावती जीभ को दांतों तले दबा ली।

कामरू- अच्छा, चूत में उंगली घुसाती थी, और हम मूठ मार के काम चलाते थे।

कमलावती- चलो, याने दोनों तरफ ही आग थी बराबर लगी हुई।

कामरू- हाँ मेरी जान, अब तो तन से तन मिले तो चैन आ जावे। आ गले लग जा।

कमलावती- पर मेरी सहेली का क्या होगा?

कामरू- भाभीजी का? अरे पर मैं अकेले दोनों की प्यास कैसे बुझा सकता हूँ? और भाभीजी तो यहाँ हैं भी नहीं। क्या वो राजी हो जाएगी मुझसे चुदवाने को?

कमलावती गुस्से में- अरे... आप भी ना... भला मेरी सहेली आपसे क्यों चुदवाएगी? मैं तो जीजाजी के लिए पूछ रही थी।

कामरू- क्यों मेरा पसंद नहीं है? जो जीजाजी को ढूँढ़ रही है।

कमलावती- मैं क्यों चुदवाऊँ जीजाजी से? आपका अब खड़ा नहीं हो रहा है क्या?

कामरू- खड़ा क्यों नहीं होगा मेरी जान। देख ले खुद ही हाथ लगाकर।

कमलावती- हे राम... रे... आपका तो सचमुच में खड़ा हो रखा है। हाय कितना कड़ा हो रखा है। एकदम ककड़ी की तरह।

कामरू- अच्छा मेरी कमलावती, चल फिर दिखा दे अपना कमाल... चूसना याद है या भूल गई?

कमलावती- कैसे भूल सकती हूँ मेरे राजाजी। यही तो वो मजा है, जो मुझे इतने दिन के बाद भी आपकी याद दिलाते रहा है। और आपसे मेरी दूद्दी भी चटवानी है। चाटोगे ना मेरे राजा, या आप भूल गये हो।

कामरू- मैं कैसे भूल सकता हूँ मेरी जान। पर तूने अपनी झांटें तो साफ कर रखी हैं ना... या वैसे ही एक-एक अंगुल की झांट बढ़ा रही है।

कमलावती- अरे नहीं सैंया, मेरी सहेली ने पूरी तरह साफ करा दिया है।

कामरू- भाभीजी ने? अच्छा, कितना पैसा लेती हैं झाँटें साफ करने के।

कमलावती- मुझसे कोई पैसे वैसे नहीं लिए उसने। बदले में मुझे उसकी फुद्दी जरूर से चाटनी पड़ी थी।

कामरू- अच्छा... भाभीजी, मेरी भी झाँटें साफ कर देंगी क्या? मैं भी चाट दूंगा उनकी फुद्दी।

कमलावती- उसकी तो बाद में चाटना, और उसकी चाटने के लिए जीजाजी हैं। आप उनकी चिंता चोदो और मेरी चिंता करो। एक महीने की प्यासी चूत है मेरी इसी शांत करो। पर रुको... पहले मैं आपका लण्ड चूस लेती हूँ।

कामरू- ऐसा करते हैं कि तुम मेरा लण्ड चूसो और मैं तुम्हारी चूत चुसाई एक साथ करता हूँ।

कमलावती- ऐसा कैसे होगा जी?

कामरू- अरे, तुम पहले लेट जाओ। अब देखो, मैं तुम्हारे मुँह के पास अपना लण्ड सटाता हूँ, और तुम्हारी फुद्दी के पास अपना मुँह लगाता हूँ। इधर तुम लण्ड चूसो और इधर से मैं फुद्दी में जीभ घुसाता हूँ।

 
कमलावती- अरे वाह सैंया जी... ये तो बहुत ही मजेदार रहा। आप कहाँ से सीखे जी ये सब?

कामरू- अरे... मेरी कमलावती, तू आम खा मेरी जान, पेड़ मत गिन।

कमलावती- ठीक है जी। बहुत हो गया लण्ड चूसना, चूत चूसना। अब और तड़प बढ़ गई है। अब तो आ जाओ और घुसा दो।

कामरू- क्या घुसा दूं। कहाँ घुसा दें।

कमलावती- अरे आपका ये... मेरे इसमें घुसा दो।

कामरू- अरे नाम भी तो कुछ होगा?

कमलावती- मुझे बड़ी शर्म आती है।

कामरू- पर मुझे समझ भी तो आए की क्या घुसाना है और कहाँ घुसाना है। कुछ तो बता।

कमलावती- अरे अपना मुस्टंडा लण्ड मेरी तड़पती हुई फुद्दी में डालो और जोरदार चुदाई करो। अब तो हो गया ना बस।

कामरू- “हाँ... समझ गया मेरी कमलावती। अभी लो मेरी जान...” और कामरू कमलावती की जांघों को फैला के बीच में बैठ गया। बिना झांटों की बुर एकदम चमक रही थी। उसने चूत के मुहाने पर लण्ड रगड़ना शुरू किया तो कमलावती एकदम तड़प गई।

कमलावती- बस घुसा दो सैंया.. घुसा दो। क्यों तड़पा रहे हो?

कामरू- ये लो मेरी जान।

कमलावती- हाय... मर गई रे अम्मा... निकाला निकाला मेरी जान मेरी जान कहते हो। और जान निकालने के लिए एकदम से धक्का लगाते हुए एक ही बार में पूरा का पूरा लण्ड घुसेड़ डालते हो।

कामरू- पर मेरी प्यारी कमलावती। मैंने तो अभी आधा ही घुसेड़ा है।

कमलावती- क्या? क्या? आधा ही घुसेड़ा है। हे भगवान् आधे में ही मेरी ये हालत हो गई तो पूरे में क्या होगा?

कामरू- अरे मेरी जान। आराम से पूरा चले जाएगा, और तुम्हें मजा भी आएगा।

कमलावती- पर अभी तो मेरी जान निकली जा रही है। और आपको मजे की पड़ी है। अरे... हाय मरी रे... एक और धक्का दे दिया। अब बस रुक जाओ। ना ही हिलना, ना घुसेड़ना, ना निकलना।

कामरू- बस हो गया मेरी जान, और थोड़ा सा ही बाकी है।

कमलावती- उसे कल घुसेड़ लेना मेरे सैंया। आज इतने से काम चलाओ। अरे... राम रे... निकालो... हाय मेरी फट गई रे... हाय निकालो मेरे राजा।

कामरू- बस घुस तो गया पूरा... अब क्यों नखरे कर रही हो?

कमलावती- अच्छा... मैं नखरे कर रही हूँ। तुम लड़की होते और मैं लड़का होती तो बताती। तुम ऐसे ही तड़पते रहते पर मैं आपकी एक ना सुनती और जोरदार चुदाई कर देती।

कामरू- मैं भी तो वही कर रहा हूँ मेरी जान।

कमलावती- कहाँ कर रहे हो? दमदार चुदाई। तुम तो मेरे नखरे से ही डर रहे हो। अरे हम औरतें नखरे इसीलिए करती हैं ताकी आपको और ज्यादा मजा आवे।

कामरू- अच्छा, ऐसी बात है क्या? तो ये ले मेरी जान।

कमलावती- “हाँ... मेरे सैंया... लगाओ धक्का... मारो धक्का... जोर से... फाड़ दो मेरी फुद्दी... पेलते रहो... पेलते ही रहो... रुको मत... हाँ... पेलते रहो... हाँ हाँ..” ।

कामरू- ये ले साली... ये ले... नीचे से चूतड़ भी तो उछाल... हाँ ऐसे ही... देख अब मजा दोगुना हो गया ना।

कमलावती- “हाँ... मेरे राजा हाँ.. मजा आ रहा है। आप मेरी चूचियां भी तो दबाओ... हाँ ऐसे ही मारो धक्का। बस मेरा निकलने ही वाला है। निकला रे अम्मा... हाय... मैं तो गई रे...”

कामरू- “हाँ... मेरी कमलावती रानी मैं आया तेरे संग में। हाँ निकला... निकला रे...”

और दोनों एक-दूसरे से लिपट गये। और दोनों इस बात से बेखबर थे की दो आँखें खिड़की से ये सब नजारा देख रही हैं। और ये दोनों आँखें और किसी की नहीं कमलावती की माँ की थी।

* * * * *

* * * * * ।

 
* * * * * * * * * * दूसरे दिन सुबह

कामरू- अच्छा बाबूजी, अम्माजी... हम तो कमलावती को लेने आए थे।

कमलावती के बाबूजी- अरे बेटा, अभी कमलावती की भाभी को बच्चा होने वाला है तो दस पंद्रह दिन और छोड़ देते तो मेहरवानी होती।

कामरू- जैसा आप ठीक समझे बाबूजी। पर पंद्रह दिन बाद तो मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी।

सासूमाँ- कोई बात नहीं बेटे। कमलावती मेरे साथ चाली आएगी और इसी बहाने मैं भी थोड़े दिन तुम लोगों के साथ रह नँगी। पर हाँ फिर हमें यहाँ छोड़ने भी आना पड़ेगा।

कामरू- ठीक है अम्मा जी। अच्छा मैं अपने दोस्त भादरू के ससुराल जाता हूँ कुछ सामान लाने जाना है।

सास- अरे बगल में ही तो है। जा, कमलावती को भी संग ले जा।

आधे घंटे बाद। भादरू के ससुराल में।

कमलावती की सहेली- अरे, जीजाजी नमस्ते।

कामरू- नमस्ते भाभीजी।

सहेली- अरे जीजाजी, आप हमें भाभी क्यों कहते हो। हम तो आपकी साली लगती हैं।

कामरू- अरे, आपकी शादी मेरे दोस्त के साथ हुई है ना।

सहेली- पर हम आपकी बीवी की सहेली भी तो हैं। तो हो गई ना साली। हम तो आपको जीजाजी ही कहेंगे।

कामरू- सोच लो भाभी? ओहो... हाँ साली... साली आधी घरवाली होती है।

सहेली- तो क्या हुआ? हम तो तैयार हैं। अगर मेरी सहेली को कौनो ऐतराज ना हो तो।

कमलावती- अरी... साली तू भी ना पता नहीं क्या-क्या अंट शंट बोले जा रही है।

सहेली- अरे, जीजाजी जो कह रहे हैं, उसपर मैं बोल रही थी। वैसे तुम कब जा रही हो?

कमलावती- मैं तो दस पंद्रह दिन तक और नहीं जाऊँगी।

सहेली- फिर मेरे जीजाजी का क्या होगा? इतने दिन तो मूठ मार लिए। कल रात कुछ हुआ की नहीं?

कमलावती- साली तूने जो झाँटें साफ कर दिया था। रात भर पेलते रहे। अभी तक दर्द हो रहा है। फूलकर गुलाबजामुन बन गई है फुद्दी मेरी।

सहेली- पर अब ये दस पंद्रह दिन कैसे रहेंगे तुमरे बगैर?

कामरू- इसीलिये तो कह रहा हूँ भाभी। ओह्ह... साली संग में चलो, मजा आ जाएगा।

सहेली- मैं, ना जाने वाली अभी से। फिर तो आप दोनों दोस्त मिलकर मेरी अच्छे तरह से बजा दोगे।

कमलावती- क्या? दोनों दोस्त? इसका मतलब ये तुमको पेल चुके हैं?

सहेली- अरे नहीं रे... क्या मैं इतनी गिरी हुई हूँ की अपनी प्यारी सहेली के भाग्य को ही खा जाऊँ... मैं तो अपने जीजाजी से मजाक कर रही थी।

कमलावती- फिर ठीक है, वरना मैं तो सोच रही थी की कहीं तुम दो-दो लण्ड से मजा लूट रही हो और मुझे एक से काम चलाना पड़ रहा है।

कामरू- अच्छा भाभी।

सहेली- अरे जीजाजी, फिर भाभी... मैं साली हैं आपकी साली।

कामरू- अच्छा ठीक है साली... वो भादरू, आते समय आपसे कुछ फेमली वेमली बोलकर कुछ कह रहा था। दे देना मैं आज शाम को ही निकलने वाला हूँ।

सहेली- फेमली वेमली... वो क्या होता है?

कामरू- मुझे क्या मालूम की फेमली वेमली क्या होता है। आपके पति ने कहा है सो कह दिया। मुझे दे दीजिए ताकी मैं लेजाके उसे दे दें। वरना साला वो मेरा दोस्त कहेगा की ससुराल गया तो वहीं का होकर रह गया। एक फेमली लाने को कहा था वो भी नहीं किया।

सहेली- अरे, वो जाते समय तो कुछ भूले भी नहीं थे। हाँ... बुरुस और जीभी भूल गए थे। हम तो जीजा दातुअन करते हैं। वो करते है बुरुस।

कामरू- अरे नहीं, वो तो तालाब में रोज बुरुस जीभी लेकर करता है।

सहेली- फिर उन्होंने नया खरीद लिया होगा।

कामरू- पर फेमली फेमली तो दे दो। ले जाऊँ उसकी फेमली।

तभी सहेली के भाई ने कमरे में प्रवेश किया। वो भादरू के जैसे ही कामरू को भी जीजा ही कहता था और कमलावती को जीजी।

जुगनू- अरे जीजी.. जीजाजी... नमस्ते, आप कब आए?

सहेली- अरे भैया जुगनू, कल आए थे। आज ही शाम को जा रहे हैं। पर एक समस्या आ गई है। तुमरे जीजा ने कुछ फेमली वेमली करके कुछ चीज मंगाई है। तुझे पता है क्या? क्या होता है फेमली?

जुगनू- फेमली वेमली मुझे तो नहीं पता।

सहेली- अरे तुमरे जीजाजी ने मंगाया है। फेमली इनके हाथ भेजनी है, वरना वो नाराज हो जाएंगे।

जुगनू- रुको... रुको, मुझे याद आया। जीजाजी जब यहां आए थे तो मेले से मैंने उनके लिए सुंदर सा तबला खरीदा था, और वो जाने के समय भूल गये। शायद उसी को अँग्रेजी में फेमली कहते होंगे।

सहेली- चलो, भगवान का लाख-लाख शुक्र है की फेमली मिल गई। जीजाजी, आप ले जाना फेमली को संभाल करके और उन्हें दे देना, उनकी फेमली।

कामरू- अरे साली तुम चिंता ना करो। अपने दोस्त की फेमली है, सो मेरी फेमली। है। इसे अपनी फेमली सोचकर मैं इसे सीने से लगाए हुए गाँव तक ले जाऊँगा और बड़ी हिफाजत के साथ मेरे दोस्त की फेमली को दोस्त के शुपुर्द करूंगा। ठीक है साली... फिर गाँव में ही मिलते हैं। पंद्रह दिन बाद तुमरी सहेली अपनी अम्मा के साथ आएगी तो तुम भी आ जाना।

सहेली- ठीक है जीजाजी... तो नमस्ते, मिलेंगे आपसे फिर गाँव में।

जुगनू- अच्छा जीजाजी, ये लीजिए मेरे जीजाजी की अमानत, उनकी फेमली। उन्हें कह देना की मैंने आठ दस दिन उनकी फेमली को अच्छी तरह बजा दिया है।

कामरू- “अच्छा, ला भाई... मेरे बस का टाइम हो गया..” और इस तरह से कामरू अपने दोस्त की फेमली को लेकर अपने गाँव लौट आया।

अब पाँच दिन बाद तालाब पर।

कामरू- अरे भादरू... कब आया शहर से?

भादरू- मैं तो रात को ही आया हूँ। तू कब वापस आया ससुराल से?

कामरू- मैं तो दूसरे ही दिन आ गया था। तेरी भाभी तो आई नहीं। सलहज को बच्चा होने वाला है। 15 दिन बाद मेरी सास उसे यहाँ छोड़ देगी।

भादरू- अरे यार, तुझे कहा था कि मेरी परिवार लेते आना। क्यों नहीं लाया। देख नहीं रहा उसके बगैर सूख के काँटा हो गया हूँ। हाथ से काम चलना पड़ता है।

कामरू- अरे, तू बोले और तेरा काम ना करूं, ऐसा कभी हुआ है?

भादरू- क्या मतलब? तू मेरी परिवार?

कामरू- हाँ... दोस्त, मेरी बीवी तो आई नहीं। तेरी फेमली को ले आया हूँ।

भादरू- क्या तू मेरी परिवार को ले आया है ससुराल से।

कामरू- हाँ मेरे दोस्त, मैं तेरी फेमली को तेरी ससुराल से ले आया हूँ।

भादरू- पर मेरे घर में तूने मेरी परिवार को नहीं छोड़ा।

कामरू- हाँ... यार... जिस दिन यहाँ पहुँचा, रात काफी हो गई थी। तो मैंने तेरी परिवार को अपने घर में ही रखना मुनासिब समझा। तेरी भाभी तो थी नहीं सो मैंने तेरी फेमली को अपने सीने से चिपका के अपने साथ पलंग पर सुलाया।

भादरू- क्या? सारी रात, अपने सीने से चिपका करके पलंग पे सुलाया।

 
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