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दोस्त की शादीशुदा बहन complete

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सहेली- कितनी बार कहना पड़ेगा जीजाजी। की मैं आपकी भाभी नहीं साली हूँ... जब तक आप हमें साली नहीं कहोगे, मैं आपसे बात नहीं करूंगी... और साली कमला की बच्ची, इधर आ कोने में... तूने ये बात हमसे क्यों छुपाई की जीजाजी का?

कमलावती- क्या हुआ? सहेली।

सहेली- इधर आ कोने में... आ तेरा कान खींचती हूँ, चूचियां बाद में दबाऊँगी... साली तूने आज तक मुझे ये बात क्यों नहीं बताई की जीजाजी का लण्ड एकदम बड़ा है।

कमलावती- छीः छीः छीः अरे यार ये सब बातें यहाँ सबके सामने?

सहेली- नहीं... वो सब नहीं सुन पा रहे हैं... पर तूने मुझसे ये बात क्यों छुपाई?

कमलावती- “अरे... मैंने कौन सा आठ दस लण्ड देख रखा है जो मुझे पता होगा की मर्द के लण्ड का साइज कितना बड़ा होने से बड़ा कहलाता है और कितना होने से छोटा कहलाता है। मैंने तो आज तक सिर्फ और सिर्फ इनका लण्ड ही देखा है...” ।

सहेली- “और मैंने कौन सा आठ दस लण्ड को अपनी फुद्दी में घुसवा रखा है जो मुझे पता चलेगा। वो तो आज बाथरूम में चुदवाई करवाते वक्त...”

कमलावती- क्या? आज बाथरूम में तुम दोनों भी चुदाई कर रहे थे?

सहेली- तुम दोनों भी... इसका मतलब है बाथरूम में तुम भी चुदा चुकी हो।

कमलावती- हाँ... बड़े चुदक्कड़ है तुमरे जीजाजी... रात को बस में हम दोनों को मौका नहीं मिला ना इसलिए आते ही बाथरुमवा में ही शुरू हो गये। पर लण्ड का साइज के बारे में तू का कह रही थी?

सहेली- अरे वो... तुमरे जीजाजी बता रहे थे की कामरू जीजाजी के लण्ड का साइज इनके लण्ड के साइज से दोगुना है और मोटाई भी ज्यादा ही है।

कमलावती- अच्छा... ऐसा है क्या?

सहेली- हाँ री... ऐसा ही है... पर तुझे बहुत मजा आता होगा ना?

कमलावती- मजा तो आता है। और संग में तकलीफ भी होती है... खास करके उस दिन जिस दिन ये मुझे दिन में एक बार चोद लेते हैं।

सहेली- क्यों भला? उसी दिन क्यों?

कमलावती- “अरे, उस दिन... दिन में इनका पानी निकल चुका होता है। रात को जल्दी निकलता नहीं है। मैं दोतीन बार झड़ जाती हैं। उसके बाद भी उनका नहीं निकलता है। मैं हाथ पैर जोड़ती हूँ, मुँह में चूसने को स्वीकार करती हूँ, मुँह में लेकर चूस के झड़ाना पड़ता है... उस रात को बहुत तकलीफ होती है। इसीलिए मैं इन्हें दिन में कभी देती ही नहीं... पर आज इन्होंने मौका देखकर चौका मार दिया है... हे भगवान्... आज रात को मेरी खैर नहीं... हे भगवान्, आज तो ये मेरी फुद्दी का कचूमर निकाल के ही मानेंगे... मेरी सहेली, क्या करूं? तू ही बता... मुझे बचा ले...”

सहेली- अरे... पर मैं कैसे?

कमलावती- तू बड़ी चालक है कोई ना कोई उपाय सोच ही लेगी तू।

सहेली- अच्छा खैर, सोचते हैं।

कमलावती- सोचते नहीं... साच, अभी का अभी सोच।

सहेली- देख, एक उपाय है... रात को अंधेरे में तू मेरे कमरे में... और मैं तेरे कमरे में।

कमलावती- छीः छीः छीः मैं जीजाजी से... नहीं.. पर हाँ रे... बहुत तकलीफ होती है दूसरी बार इनसे चुदवाने पर.. जीजाजी तो जोर से नहीं ना चोदते हैं?

सहेली- अरे नहीं रे... वैसे भी अभी-अभी चोद चुके हैं। रात को खड़ा होगा तभी ना चोदेंगे।

कमलावती- ठीक है फिर... पर तुम इनसे कैसे बचोगी... कमरे में तो लाइट होगी, पकड़ी जाएगी तो बड़ी बदनामी होगी... तुमरी भी और हमरी भी।

सहेली- अरे कोई ना कोई उपाय तो निकालना ही पड़ेगा... खैर वो सब रात को देखते हैं।

कमलावती- “देखते है नहीं, करते हैं। ऐसा ही करते हैं। आज मुझे बचा ले मेरी सहेली। वादा करती हूँ कि फिर कभी इनसे दिन में नहीं चुदवाऊँगी। ऐसा एक ही बार...”

सहेली- एक बार क्या? क्या हुआ?

कमलावती- कुछ नहीं... हमें तो उस रात का वाकया याद आते ही, उस रात के दर्द को याद करते ही मेरी फुद्दी अभी तक सिहर उठती है, और दुबारा इनसे ना चुदवाने की खाई कशम को याद दिलाती है। मैंने इनको कशम दिलाई थी उस रात की दिन में कभी नहीं चोदोगे। पर आज मुझे इनपर दया आ गई और मैं इनसे चुदवा बैठी।

सहेली- इनपे दया आ गई या तेरी फुद्दी खुद जीजाजी के मस्ताने लण्ड से चुदवाने को फड़फड़ा रही थी?

कमलावती- अरे काहे का फड़फड़ा रही थी... मेरा जी जानता है कि मैं इनसे कैसे चुदवाती हूँ।

सहेली- अच्छा तुम्हें खाली दर्द ही होता है, मजा बिल्कुल भी नहीं आता?

कमलावती- सच-सच बताऊँ?

सहेली- हाँ.. अपनी फुद्दी के ऊपर उगी उन झांटों की कशम खाकर बोल की तू जो कहेगी सच कहेगी और सच के अलावा कुछ भी नहीं कहेगी।

कमलावती- “अच्छा... अच्छा मैं कमलावती... अपनी फुद्दी के ऊपर उगी हुई घंघराली झांटों की कशम खाकर ये कहती हूँ की... की.."

सहेली- की. की... क्या लगा रखा है री... बोल?

कमलावती- अरे, क्या बताऊँ री सहेली... हमरी नई-नई शादी हुई थी।

सहेली- अच्छा... नई-नई शादी हुई थी... पर हमारी तो यार पुरानी-पुरानी शादी हुई थी।

कमलावती- बाल की खाल मत उखाड़ सुन।

सहलेई- सुना।

कमलावती- तो वाकया ये हुआ की दिन में हमरी सास पड़ोस के यहाँ गई थीं और ये किसी काम से घर आए। मौका अच्छा देखकर इन्होंने चौका लगाने की सोची। और मैंने भी मौके की नजाकत को देखते हुए अपनी झांटों से ढकी हुई फुद्दी के द्वार इनके लण्ड के लिए खोल ही दिए। और फिर जो होता है तू तो जानती ही है... इनका लण्ड और मेरी फुद्दी, और हमारा प्यारा सा पलंग... बस दे दनादन... दे दनादन लग गये। आधे घंटे के बाद ही जब अपना माल मेरी फुद्दी के अंदर छोड़ा तभी इन्होंने मुझे अपनी बाहों से आजाद किया।

 
सहेली- अच्छा... तूने तो खूब मजे लूटे यार जीजाजी से।

कमलावती- अब असल वाकया सुन।

सहेली- सुना दे... उसको भी क्यों बाकी रखती है... सुना दे कि रात में कैसे चुदवाई?

कमलावती- दिन में हुई चुदाई से मैं कुछ पाँव को फैलाकर चल रही थी।

जब मेरी सास आई तो उनहोंने हँस के पूछा- बेटी क्या अभी कामरू आया था?

मैंने चौंक के उनको पूछा- हाँ सासूमाँ... पर आपको कैसे मालूम?

मेरी सास ने हँसकर बोला- “टाँगें फैलाकर चल रही है ना इसीलिए मैंने जाना... अपनी जवानी में तेरे ससुरजी से मिलने के बाद सुबह-सुबह मैं भी ऐसे ही चलती थी... पर तू तो दिन में ही...”

तब मैंने शर्माके कहा- “मैं क्या करती अम्मा जी, उन्होंने तो आते ही आपके लिए पूछा और जब उन्हें ये पता चला की आप घर पे नहीं हो तो अपनी बाहों में भरके पलंग के ऊपर पटक दिया और मुझे अपनी बाहों से तभी आजाद किया जब अपनी पूरी मनमानी कर ली...”

सहेली- अच्छा... तब तेरी सास ने क्या कहा?

कमलावती- “और क्या कहती... बोली की बड़ा ही बांका जवान है मेर कामरू... बिल्कुल अपने बाप के जैसा ही है। उसका... मस्त कड़क...”

सहेली- अच्छा, फिर तुने पूछा नहीं की उसने कब देख लिया, अपने बेटे का मस्त कड़क लण्ड।

कमलावती- अरे मैं कैसे पूछती भला... पर उन्होंने खुद ही कह दिया की एक दिन वो पेशाब कर रहा था तब देखा था उन्होंने।

सहेली- अच्छा... अच्छा मैं सोची की कहीं।

कमलावती- तूने क्या सोचा?

सहेली- नहीं... तू नाराज हो जाएगी?

कमलावती- बता तो सही।

सहेली- मैंने सोचा की कहीं उसने अपने बेटे के मस्ताने तगड़े लण्ड को कहीं अपनी फुद्दी में घुसवाके महसूस ना किया हो।

कमलावती- छीः छिनाल कहीं की।

सहेली- अच्छा फिर क्या हुआ? ये भी तो बता।

कमलावती- अरे यार क्या बताऊँ... रात हुई तो उन्होंने फिर से अपनी बाहों में भर लिया। और मैंने भी सुबह के मजे को सोचकर फिर से अपनी टाँगें फैला दीं... अब मुझे क्या मालूम था की दिन में उनका पानी निकल चुका था... और रात को उन्होंने जो चुदाई की की क्या बताऊँ? मेरा तीन बार पानी निकल चुका था। और वो मेरी । फुद्दी में दनदन-दनादन अपने लौड़े को पेले जा रहे थे... पेले जा रहे थे। मैंने उन्हें रुकने को कहा पर उन्होंने नहीं माना और पेलते ही गए... पेलते ही गये। मैं रोने लगी। छटपटाने लगी। पर उन्हें कोई रहम नहीं आया। मेरा दर्द बढ़ने लगा।

मैं जब जोर-जोर रोने लगी और उनके नीचे से निकलने को सोचने लगी तो उन्होंने मुझे जोर से जकड़ लिया और अपने लण्ड को घुसाने लगे। उनके होंठ मेरे होंठों पे थे, तो मेरी चीख नहीं निकल पा रही थी। पर मेरी आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। फिर दर्द मजे में बदला और मैंने उनकी पीठ पर हाथ फिराना चालू कर दिया। नीचे से चूतड़ को भी उछालने लगी और फिर मैं चौथी बार झड़ गई, और शांत हो गई। पर ये... ये बिना रुके मेरी फुद्दी में लण्ड पेलते रहे। अब मजा दर्द में तब्दील हो गया। मेरी चीखें फिर से निकल गई। और जब इनका पानी निकला तो जैसे कोई बाढ़ सी आ गई हो। और हम दोनों ही उसमें बहने लगे। एक-दूसरे की बाहों में बाहें डाले पड़े रहे।

दस मिनट के बाद ये उठे और मेरी तरफ देखा और चौंक गये। मैंने इनकी नजर का पीछा किया और नीचे अपनी फुद्दी की तरफ देखा तो उसमें से खून बह रहा था... ऐसी चुदाई कर दी थी की मेरी चूत फूलकर पावरोटी बन गई थी... मेरी फुद्दी का रंग एकदम लाल हो चुका था। दर्द के मारे छुआ भी नहीं जा रहा था। मैं उठ ही नहीं पा रही थी.. और फिर मैं बेहोश हो गई। और जब होश आया तब।

सहेली- क्या? ऐसे बेरहम हैं मेरे जीजाजी... उन्होंने तनिक भी रहम नहीं किया तुम पे। फिर क्या हुआ?

कमलावती- जब होश आया तो मेरी सास एक बर्तन में गरम पानी करके उसमें कपड़े भिगोकर मेरी फुद्दी को सेंक रही थी। मैंने शर्म से आँखें बंद कर ली और उठना चाहा।

तो मेरी सास ने कहा- अरे बहू लेटी रह... मेरे से क्या शर्म.. बेटी, लेटी रह। मैंने गरम पानी में हल्दी डाल के तेरी फुद्दी को सेंक दिया है। कल तक आराम आ जाएगा। कामरू को खूब डांटा है मैंने।

फिर मैंने कहा- अभी कुछ आराम मिला है।

तब उन्होंने मेरी साड़ी नीची करके अपने बेटे को आवाज लगाई और अपने सामने बैठकरके बड़े प्यार से समझाई की एक दिन में सिर्फ एक बार ही चोदना है.. और उन्होंने मन लिया।

पर मेरी सहेली आज तो इन्होंने दिन में मुझे पेल ही दिया है। उस बार तो मेरी सास ने गरम पानी का सेंक देकर मेरी फुद्दी को ठीक कर दिया... पर आज... हे भगवान्, मैं किस मुसीबत में फंस गई.. आज मेरा क्या होगा? मेरी फुद्दी का क्या होगा? मैं तो मर ही जाऊँगी। और मेरी फुद्दी फट के वो क्या बोलते हैं भोसड़ा बन जाएगी... हाँ नहीं तो।

सहेली- अरे कमलावती, तेरी सहेली के रहते तू क्यों चिंता करती है... मैं हूँ ना।

कमलावती- हाँ एक काम करते हैं... आज रात दोनों दोस्तों को साथ-साथ सोने देते हैं। और अपन दोनों सहेलियां एक साथ सो जाते हैं। भले ही रात को तुम मेरा चूस लेना और मैं तुम्हारा चूस लूंगी... प्लीज मेरी सहेली मुझे बचा ले।

सहेली- अरे... अभी से क्यों चिंता करती है... रात तो होने दे।

कमलावती- “फिर कहेगी कि अभी रात बाकी... अभी बात बाकी। फिर कहेगी पहले चुदवा ले, फिर देखते हैं। अरे एक बार ये शुरू हो गये ना फिर रुकने वाले नहीं हैं हाँ..."

सहेली- अरे, मैं कुछ करूंगी ना बाबा।

कमलावती- क्या करेगी बोल?

सहेली- होटेल का मैनेजर बोल रहा था की रात ठीक दस बजे यहाँ पावर कट होता है... रात ग्याराह बजे तक। तो मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है। अगर तुझे पसंद आए तो?

कमलावती- अरी बोल तो सही... पर मुझे इनसे बचा ले।

सहेली- देख, हम चारों खा पीकर ठीक नौ पचास पर ऊपर सीढ़ी चढ़ेंगे। दोनों को आगे-आगे चलने देंगे और हम पीछे-पीछे ठीक है?

कमलावती- फिर... फिर क्या होगा?

सहेली- वो दोनों अपने-अपने कमरे का दरवाजा खोल चुके होंगे। और जब हम सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुँचेंगे तभी ठीक दस बजेगा और अंधेरा हो जायगा। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देगा।

कमलावती- तब क्या होगा?

सहेली- तब हम कमरे में प्रवेश करेंगे और दरवाजा बंद कर लेंगे और पलंग पे जाकर सो जाएंगे। बस खतम।

कमलावती- अरे मेरे सैया मुझे सोने देंगे तब ना... बिना चोदे उन्हें नींद नहीं आती और अगर चोदे तो जानती है। ना क्या होगा? दिन में अपना पानी निकाल चुके हैं... और सहेली, अगर मैं उनके पास सोई तो... मेरी खैर नहीं... मेरी फुद्दी की खैर नहीं।

 
सहेली- फिर तू ही बता की क्या करना है? मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है की क्या करें?

कमलावती- अरे, कैसे समझ में नहीं आ रहा है। एक कमरे में अपन दोनों सहेलियां सोएंगी और दूसरे में दोनों मर्द... बस फाइनल।

सहेली- क्या फाइनल? यहां हनीमून मानने आए हैं कोई भजन समारोह हो रहा है या की तीर्थ यात्रा पर आए हैं। जो मर्द औरत एक साथ नहीं सो सकते। अरे तुम्हें नहीं घुसवाना है लण्ड तो ठीक है... तुम्हारे पति को फुद्दी नहीं चाहिए वो भी ठीक है... तेरे खातिर मैं भी अपनी फुद्दी में अपने पति का नहीं घूसवाऊँगी वो भी ठीक है... वैसे मैं बिना चुदाई के रात को सो नहीं पाती हूँ वो भी ठीक है... चल तेरे लिए वो भी सह लँगी। पर इसमें मेरे पति का क्या दोष है? बता... उनको तो फुद्दी चाहिये ही चाहिए।

कमलावती- मैं वो सब नहीं जानती... मुझे बचा ले मेरी सहेली बचा ले... अगर मैं रात को अपने पति के पास सोई तो सच कहती हूँ कल का सूरज मैं देख नहीं पाऊँगी... फिर रोते रहना अपनी सहेली की फटी फटाई फुद्दी को देखकर।

सहेली- अरे ऐसी बात क्यों करती है। चल मैं सोचती हूँ।

कमलावती- कुछ सोचा?

सहेली- अरे बाबा, एक मिनट हुए नहीं की कुछ सोचा... कुछ सोचा... की रट लगाके बैठ गई।

कमलावती- मेरी जगह तू रहती ना तो जानती।

सहेली- तेरी जगह मैं रहती ना... तो चूतड़ उछाल-उछाल के चुदवाती रात दिन।

कमलावती- तो चुदवा ले ना इनके संग में आज रात।

सहेली- पागल हो गई है क्या? मैं? नहीं.. कहने की बात अलग है... तू तो जानती है कि अपन दोनों ने एक दूसरे की चूत भले ही चाटी हो पर शादी की रात तक दोनों ही कुँवारी थीं।

कमलावती- हाँ, पर सहेली ही तो सहेली के काम आती है। आज रात चुदवा ले ना मेरी बहन... भगवान तेरा भला

करेगा।

सहेली- अच्छा... मैं अगर जीजाजी से चुदवाऊँगी तो मेरे पति क्या मूठ मारेंगे? बोल... रात को तू कहाँ रहेगी? बोल, मेरे पति को मालूम पड़ा तो मुझे अपने दिल के साथ-साथ अपने घर से भी निकाल देंगे... और तेरे पति?

कमलावती- हे राम... रे... ये तो मैंने सोचा भी नहीं था। राम रे... अब क्या होगा? मेरी सहेली मुझे बचा ले।

सहेली- मुझे एक आइडिया आया है... अपन एक काम करते हैं कि तेरे पति के खाने में नींद की गोली मिला देंगे तो उन्हें रात को बड़ी अच्छी नींद आएगी और तू बच भी जाएगी।

कमलावती- पर नींद की गोली है कहाँ और कैसे मिलाएगी?

सहेली- वो सब तू मुझ पर छोड़ दे और चल मन प्रसन्न कर ले और शिमला का मजा ले।

कमला- कहीं ये मजा सजा में ना तब्दील हो जाए?

सहेली- अरे कुछ नहीं होगा। निश्चिंत रह।

कमलावती- “ठीक है फिर...”

सहेली- “चल चल... घूमते हैं...”

*****

*****

रात के ठीक नौ बजे... चारों ही होटेल के रिस्टोरेंट में बैठे थे। सहेली ने जब कमलावती को आँख मारी तो कमलावती उह्ह... आह... करी तो।

कामरू- क्या हुआ कमला?

भादरू- अरे भाभी क्या हुआ?

दोनों ही कमलावती की तरफ देखने लगे और इतने में ही सहेली ने पूड़िया निकालके कामरू की खीर की कटोरी में मिला दी।

कमलावती ने कहा- कुछ नहीं... कुछ चींटी काटने जैसे लगा।

कामरू- कहाँ पे चींटी ने काटा कमला?

कमलावती- है जी... जाँघ के ऊपर।

भादरू- “हाय रे... चींटी तेरी किश्मत। जहाँ तक हमें अभी तक दर्शन नहीं हुए हैं। साली के वहाँ पर तूने पप्पी दे डाली...”

और सभी हँसने लगे।

भादरू- तुम्हें पता है सहेली... मेरे दोस्त कामरू को बढ़िया जादू भी आता है। देखो सभी खीर की कटोरियों को एक जगह करो। मैं ये काजू एक कटोरी में डालता हूँ.. पहचानना की कौन सी कटोरी में काजू है?

खीर की चोरों कटोरियां टेबल के बीच में आ गई।

सहेली- “लाओ काजू मैं डालती हूँ..." और सहेली ने काजू उस कटोरी में डाली जिसमें उसने दवाई मिलाई थी। अब कामरू के हाथ का कमाल देखने लगे। कटोरियां इधर से उधर होने लगी और सहेली ये भूल गई की काजू वाली कटोरी कौन सी है।

कामरू- अब सब लोग के पास एक-एक कटोरी है। जिसके हिस्से में काजू आएगा वो जीता। उसको मेरे दोस्त भादरू की तरफ से एक पप्पी... इनाम।

कमलावती- अरे... ये आप क्या बक रहे हो? अगर काजू मेरे हिस्से में आया तो?

कामरू- तो क्या? तुम्हारे गोरे-गोरे गाल होंगे और मेरे दोस्त भादरू के होंठ होंगे... पप्पी तो लेना ही पड़ेगा।

कमलावती- हाय... मैं कैसे?

कामरू- अरे मैं कैसे क्या? अरे तुम अपनी दोनों आँखें बंद कर लेना। पप्पी तुमको थोड़े ही देना है। तुमको तो पप्पी लेनी है। पप्पी तो मेरे दोस्त भादरू को देनी है।

सब लोग हँसके खीर खाने लगे और काजू आ गया... हाँ... सब लोग चौंक गये। काजू आया सहेली के खीरे की कटोरी में। सहेली आधी खीर खा चुकी थी।

 
सहेली चौंकी- हे भगवान्... इसमें तो मैंने दवाई मिलाई थी। अब क्या होगा? अपना जूठन कामरू जीजाजी को तो दे नहीं सकती.. उसके शातिर दिमाग ने सोचा- है अब क्या होगा? दवाई देने तो आई थी कामरू जीजाजी को लेकिन खुद खा बैठी। अब मेरी सहेली का क्या होगा? बेचारी जीते जी मर जाएगी... उसकी चूत का कचूमर बन जाएगा। मुझे कुछ ना कुछ तो करना ही होगा। उसने सबकी नजर बचा करके अपना पर्स खोला और एक गोली अपनी सहेली कमलावती के पनीर की सब्जी की कटोरी में मिला दी। उसने जो दबाई मिलाई थी वो यौन उत्तेजना बढ़ाने वाली दवाई नहीं थी... नींद की गोली थी। उसने सोचा अब जो होगा देखा जाएगा।

कमलावती- मुझे पनीर की सब्जी अच्छी नहीं लगती है? ओ जी आप खलो ना।

कामरू- अरे ये तो मुझे भी अच्छी नहीं लगती है।

भादरू- “फिर.. कौन खाएगा? अरे साली जी खाके तो देखो? अच्छा, आधा मैं ले लेता हूँ। आधा तुम..” और पनीर की सब्जी दोनों ने आधा आधा खा लिया।

सहेली ने सोचा कि ये तो गड़बड़ हो गई। और उसने आनन फानन में एक नींद की गोली कामरू के खाने में। मिला दी। पर जब रैपर को देखा को तो वो सिर से पाँव तक हिल गई। हाय राम... हड़बड़ी में नींद की गोली की जगह यौन उत्तेजान बढ़ाने वाली दवाई ही खिला दी उसने कामरू जीजाजी को... हाय आज मेरी सहेली कमलावती की फुद्दी फट के ही रहेगी। इतने में ही उसकी खुद की फुद्दी खुजलाने लगी... क्या हो रहा है उसे? उसे कुछ शक हुआ तो उसने एकदम पहले वाले रैपर को देखा तो वो सिर से पाँव तक काँप गई। उसके खुद के खाने में भी नींद की गोली नहीं... यौन उत्तेजना बढ़ाने वाली दवाई ही थी। हे भगवान्... ये आज क्या हो गया? और न जाने आगे क्या होगा?

उसने हिसाब लगाया। कमलावती और उसके पति ने नींद की गोली खा ली हैं.. कामरू जीजाजी ने यौन उत्तेजना बढ़ाने वाली दवाई खाली है... उसकी अपनी चोदो... पर उसकी सहेली का क्या होगा? नींद में चीख भी नहीं पाएगी बेचारी... और नींद में विरोध ना होता देखकर कामरू जीजाजी दवाई के असार से दोगुने स्पीड से चोदेंगे... वैसे ही कामरू जीजाजी का जल्दी नहीं निकलता है। और ऊपर से उसने दवाई और मिला दी. अब क्या होगा? उसे अपनी सहेली को बचाना ही होगा। और उसने एक फैसला ले ही लिया।

उसने घड़ी की तरफ देखा तो नौ चालिस हुये थे। सहेली बोली- अरे भाई जल्दी-जल्दी खाओ। लाइट जाने में बीस मिनट बचे हैं।

और सब लोग ने खाना खतम किया। सहेली ने घड़ी देखा नौ पैंतालिस।

सहेली- ओ जी... ये लो चाभी, और चलो कमरे का दरवाजा खोलो। और जीजाजी आप भी।

कामरू- “हाँ हाँ मेरे पास ही है चाभी। मैं भी खोलकर तैयार रहता हूँ, आप दोनों सहेलियां आओ तो सही...” दोनों आगे-आगे और दोनों औरतें पीछे-पीछे।

कमलावती- यार सहेली... तूने काम तो कर दिया ना?

सहेली- हाँ, मैंने कर दिया है। तू घबरा मत।

कमलावती- “यार मुझे कुछ नींद-नींद सी लग रही है... पर मैं तो...”

सहेली- कुछ नहीं, थकावट के कारण। चल सीधी चलना जारी रख। उसने घड़ी में समय देखा तो नौ पचपन... दोनों सीढ़ी चढ़ने लगे और ऊपर पहुँच गये। उसने फिर से घड़ी देखी तो नौ उनसठ। सिर्फ एक मिनट बाकी है..

और इतने में ही कमलावती गिरने के जैसे हुई। उसने उसे बाहों में भरा और कमरे की ओर बढ़ने लगी। उसने । मन ही मन कुछ सोचा और कमलावती को अपने कमरे में ले गई। कमरे में पलंग के ऊपर भादरू कपड़े पहने ही सो चुका था। नींद की गोलियां असर दिखा चुकी थीं। उसने उसके बगल में सहेली को लिटाया और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया। पर चाभी ले जाना भूली नहीं।

वो बाहर निकली और डरते-डरते अपनी सहेली कमलावती के कमरे में प्रवेश किया। वो भगवान से मना रही थी की कामरू जीजाजी सोए रहें तो सब ठीक हो जाए। इतने में ही लाइट चली गई... और उसने भगवान का शुक्रिया अदा किया... और कमरे में प्रवेश किया। उसकी खुद की चूत चुनचुना रही थी। दवाई अपना असर दिखा रही थी।

उसने अपने मन को समझाया की सब ठीक हो जायेगा। उसने आमीर खान की तरह अपना एक हाथ सीने पे रखकर कहा- आल इज वेल... आल इज वेल... सब ठीक होगा... उसने कमरे का दरवाजा बंद किया। हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। वो पलंग के ऊपर बैठी ही थी की उसने अपने आपको जीजाजी की बाहों में पाया। वो थोड़ा सा कसमासाई... पर उसने चुप रहना ही ठीक समझा।

कामरू ने सहेली को अपने गले से लगाया। और पप्पी देने लगा तो उसने अपना चेहरा हटा लिया। कामरू बोलाअरे रानी कमलावती, अपना चेहरा क्यों हटा रही हो? पप्पी तो देने दो?

सहेली- अजी मुझे नींद आ रही है।

कामरू- अरे कमलावती तेरी आवाज को क्या हुआ?

सहेली- वो थोड़ा गला बैठ गया है। अब हमें सोने दीजिए।

कामरू- ऐसे कैसे सोने दें? तू तो जानती ही है की मुझे तेरी फुद्दी में एक बार लण्ड डाले बिना नींद ही नहीं आती। महीने में वो तीन दिन बड़ी मुश्किल से गुजारता हूँ।

सहेली- तो अभी भी ये सोच लो की मेरा वो दिन चल रहा है। मेरी फुद्दी लाल पानी फेंक रही है। तुम्हारे मस्ताने लण्ड के लायक नहीं है... फुद्दी की पत्तियां कमजोर हैं।

कामरू- अरे वाह रानी... आज तो मस्त-मस्त बातें कर रही हो... मेरा तो लण्ड टनटना रहा है... अब तो ये बिना घुसे मानेगा ही नहीं।

 
सहेली- अरे, दिन में चोदे तो थे ही।

कामरू- अरी मेरी छम्मकछल्लो... वो तो ब्याज था। असल तो अब वसूल करूंगा।

सहेली- याद है ना शादी के बाद वो पहला दिन जिस दिन आपने हमें दिन में चोदा था। फिर रात को दुबारा चोदा था तो मुझे कितनी तकलीफ हुई थी। आपने कशम खाई थी की कभी दुबारा दो बार नहीं चोदोगे। भूल गये?

कामरू- नहीं भूला हूँ मेरी प्यारी रानी, और उस कशम पे अभी तक मैं कायम हूँ।

सहेली- चलो भगवान का लाख-लाख शुक्र है की आपको वो कशम याद आ गई, और आप उसपे कायम भी रहेंगे।

कामरू- हाँ हाँ...

सहेली- ठीक है फिर, चलो सो जाते हैं।

कामरू- सो जाते हैं? मैं कहाँ सोने दूंगा बिना चुदाई के।

सहेली- अभी आप कशम तोड़ रहे हो।

कामरू- नहीं... मैं कोई कशम नहीं तोड़ रहा हूँ। आज रात को सिर्फ एक बार ही चोदूंगा। दो बार चोदकर कशम नहीं तोडूंगा।

सहेली- अच्छा जी... और दिन में बाथरूम के अंदर जो चोदे थे... वो?

कामरू- अच्छा... अच्छा वो?

सहेली- हाँ जी वो... दिन में मिल गया ना आपको। अभी नहीं... बिल्कुल नहीं।

कामरू- पर... वो तो दिन में हुआ था... अब तो रात है।

सहेली- कोई दिन रात नहीं... कोई चुदाई नहीं।

कामरू- पर.. रानी मुझे नींद नहीं आएगी, कैसे करूँ?

सहेली- गाण्ड मारो, भुजिया खाओ।

कामरू- क्या? क्या कहा तुमने?

सहेली- कुछ नहीं जी... मैं ये कह रही थी की मूठ ही मार लेते।

कामरू- अच्छा... मेरी इतनी सुंदर बीवी, उसकी प्यारी सी चूत, मेरा खड़ा हुआ लण्ड... और मैं मूठ मारूं? कभी नहीं।

सहेली- “अच्छा... भले ही मेरी फुद्दी का कचूमर निकल जाए, चूत से खून की दरिया बह जाये, तुम्हारा मस्ताना लण्ड बिना पानी छोड़े मेरी दनादन चुदाई करते रहे... मैं थोड़ी देर अपना पानी निकलने तक अपना चूतड़ उछालती रहूं। फिर दर्द के मारे रोटी रहूं...”

कामरू- पर मेरी प्यारी कमलावती।

सहेली- क्या पर... पर?

कामरू- आज तू तो यार चूत लण्ड का नाम ऐसे ले रही है जैसे खाने में चावल डाल का नाम ले रही हो।

सहेली- “क्यों? चूत चुदाई करोगे और चूत, गाण्ड, चूचियां, लण्ड, सुपाड़ा, झाँट, पेल दे लण्ड चूत के अंदर... मार धक्के कस के... ये सब नहीं कहोगे तो मजा कहाँ आता है चुदाई में जीजाजी..."

कामरू- वही तो मैं तुम्हें हर रोज समझाता था। पर तू है की चुदाई के टाइम भी भजन ही करती रहती थी। और... अरे, तुमने मुझे जीजाजी क्यों कहा?

सहेली- जी... जी... वो... मेरी सहेली है ना... उसने कहा था कि चुदाई के समय कभी-कभी अपने सैंया को जीजाजी कहो ना तो उन्हें दोगुना जोश आता है और वो दोगुने जोश के साथ-साथ चुदाई करते हैं।

कामरू- पर मेरी कमलावती... तू हाँ कहाँ बोल रही है, उस समय तुझे दर्द हुआ था... अब तो तेरी फुद्दी भी मस्तानी हो गई है, मेरे लण्ड के लायक हो गई है। अभी दर्द नहीं देगा।

सहेली को दवाई का असर होने लगा था। चूत में चींटियां रेंगने लगी थीं। उसने सोचा- आज एक बार हो जाने दो, जो हो रहा है। उसके बाद वो अपने कमरे में जाकर अपनी सहेली कमलावती को उसके कमरे में भेज देगी। किसी को कुछ भी पता ही नहीं चलेगा।

इधर कामरू पर भी दवाई अपना असर दिखा रही थी। उसका लण्ड कठोर हो चुका था।

कामरू- मेरी रानी, जरा हाथ से ही कर दे।

सहेली- “ठीक है, केवल हाथ से ही...” और सहेली ने जैसे ही अंधेरे में कामरू के बदन पर हाथ फिराते हुए नीचे उसकी लुंगी के ऊपर फिराने लगी। और लुंगी के भीतर हाथ घुसाकरके लण्ड के ऊपर हाथ लगाते ही जैसे कोई करेंट लग गया हो। उसने डर के मारे अपना हाथ खींच लिया।

कामरू- क्या हुआ? कमला... हाथ को पीछे क्यों खींच लिया?

सहेली- ये तो.. ये... आपका लण्ड तो काफी बड़ा है, और मोटा भी है।

कामरू- अरे कमला... तू तो ऐसे हाथ को झटक ली जैसे आज पहली बार मेरे लण्ड को पकड़ी हो। आज से पहले भी तो मेरा लण्ड इतना ही बड़ा और इतना ही मोटा था। आज कोई नया थोड़े ही खरीद करके फिट करवा लिया

 
सहेली हड़बड़ा गई। वो संभलकर बोली- “नहीं जी, ऐसी बात नहीं है। आज आपका कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा लग रहा है.”

कामरू- तो घबराती क्यों है? जरा पकड़ ना।

सहेली ने फिर से कामरू के लण्ड को पकड़ लिया। अब उसकी खुद की फुद्दी में चींटियां रेंगने लगी। उसकी भी खुद की इच्छा होने लगी। पर ये लण्ड... बाप रे... बेचारी कमलावती ठीक ही कहती थी... बहुत ही तगड़ा और मोटा लण्ड है ये तो... कमलावती धन्य हो तुम और धन्य है तुम्हारी फुद्दी जो इतने बिशाल लण्ड को भी निगल लेती है, तुम्हारी जगह मैं होती तो मेरी तो सचमुच में फट गई होती।

सहेली कामरू के लण्ड को सहला रही थी। और इधर कामरू सहेली की चूचियों को दबाने लगा तो सहेली बोलीक्या कर रहे जी? मेरी चूचियों को चोदो।

कामरू- अरे ऐसे कैसे बिदक रही है? जैसे मेरी बीवी ना होकर मेरी साली लगती हो। और अपने जीजा से पहली बार चूचियां दबवाते हुए नई घोड़ी की तरह बिदक रही हो। अरे तुम मेरे लण्ड को सहलाओ। मैं तुम्हारी इन चूचियों को दबाता हूँ। तो मेरा जल्दी निकल जाएगा... क्या बोलती है?

सहेली ने सोचा- चलो ये भी ठीक है। उसने लण्ड के साइज को अंधेरे में ही टटोला। सचमुच बिशाल था लण्ड। जैसे कोई गधे का उखाड़ करके फिट करवा लिया हो।

सहेली- अच्छा, एक बात पूंछू जी?

कामरू- पूछो रानी।

सहेली- क्या आपके दोस्त... भादरू भैया का भी इतना ही बड़ा है क्या जितना बड़ा आपका है?

कामरू- क्यों? उस साले भादरू के लण्ड से चुदवाना है क्या? उसपे मन आ गया क्या? चल फिर उसके कमरे में चल.. पर फिर मैं क्या करूँगा? हाँ हाँ मैं उसकी बीवी की चूत में घुसाऊँगा। बोल मजोर है?

सहेली- छीः छीः छीः कैसी गंदी बातें करते हो जी आप भी। मैं तो इसीलिए पूछ रही थी की सबका इतना ही बड़ा होता है क्या? आज तक मैंने आपके अलावा और किसी का नहीं देखा है ना इसीलिए। ज्ञान वर्धन... वो क्या कहते हैं आप... जनरल नालेज के लिए पूछ रही थी।

कामरू- अच्छा... मैं समझा भादरू से चुदवाने का इरादा है, पर उसका लण्ड मेरे जितना बड़ा नहीं है।

सहेली- आपके जितना बड़ा तो हाथी का भी नहीं है।

कामरू- क्या मतलब? हाथी का बड़ा होता है?

सहेली- पर आपके जितना बड़ा नहीं। आप तो छः फूट के हैं जी। और हाथी का भी मेरे खयाल से छः फूट का तो होगा नहीं?

कामरू- अरे वाह रानी। आज तो बड़ी मस्त-मस्त बोल रही है... मेरा लण्ड और टाइट होने लगा है। आज लण्ड को मस्त-मस्त ढंग से सहलाते हुए मूठ भी नये तरीके से मार रही है। बहुत मजा आ रहा है, मेरी रानी।

सहेली- पर.. ये... ये आप क्या कर रहें हैं? मेरे ब्लाउज़ क्यों खोल रहे हैं?

कामरू- वो क्या है कि तुम्हारी चूचियों को सहलाते हुए मूठ मरूंगा तो जल्दी निकल जाएगा और तुम्हारे इन कोमल-कोमल हाथों को ज्यादा तकलीफ नहीं होगी... इसीलिए।

सहेली- “ठीक है जी, दबा लो चूचियां..." और मन में कहा- “मुझे माफ करना कमलावती। मैंने तुम्हें धोखा दिया। और जीजाजी के लण्ड से खेल रही हूँ...”

कामरू- तुम्हारी चूचियां तो रानी, आज कुछ अलग-अलग सी लग रही हैं। एकदम कठोर, बेल के फल जैसी।

सहेली घबरा गई। वो सोची- आज तो पकड़ी ही जाएगी। अगर पकड़ी गई तो क्या होगा? उसकी और उसकी सहेली दोनों की ही इज़्ज़त चली जाएगी। हे भगवान् बचाना। फिर उसने बात को संभाला- “अजी, मेरी तो वही चूचियां हैं सब दिन वाली। क्या इसमें नट बोल्ट लगा रखा है जो बाजार से नया खरीद के फिटिग करवा लूंगी। वैसे तो मैं भी कह सकती हूँ की आज आपका लण्ड सचमुच में थोड़ा और मोटा और बड़ा भी लग रहा है.” सहेली ने लण्ड को सहलाते हुए कहा।

कामरू- वो तो है। पर तुमरी चूचियां आज कुछ अलग सी लग रही हैं।

सहेली- यहाँ पर ठंड बहुत ज्यादा है ना जी इसीलिए मेरी चूचियां ठंड से पथरा गई हैं।

कामरू- हाँ.. ये हो सकता है... तुमरे आने से पहले मेरा लण्ड भी सिकुड़ गया था।

सहेली- पर सैंया जी। अभी तो ये आपकी लुंगी फाड़ने के ऊपर उतारू है।

कामरू- नहीं रानी। ये अभी तुमरी फुद्दी के अंदर घुसने पर उतारू है।

सहेली का मन बेकाबू होने लगा। चूत में चींटियां सी रेंगने लगी। चूत किसी लण्ड को अपने अंदर लेने को कसमसाने लगी, उसकी चूत पनियाने लगी। उसने अपने मन को बहुत समझाया पर मन उसके काबू में ना था। उसे तो बहुत कुछ चाहिए था। पर ये मस्ताना लण्ड... ये मस्ताना लण्ड तो उसकी सहेली कमलावती के पति कामरू जीजाजी का था। उसके ऊपर उसका अधिकार ना था। अगर वो चुदवाती है तो ये उसकी सहेली के साथ धोखा होगा।

पर उसके मन ने कहा- वाह री सहेली... जीजाजी के साथ एक अंधेरे कमरे में उससे लिपट रखी है, उनसे अपनी नंगी चूचियां दबवा रही है, उनके लण्ड को सहला रही है, मूठ भी मार रही है और अभी भाषण देने लगी। ये उचित नहीं हैसहेली, ये अच्छी बात नहीं है। मौका भी है, नजाकत भी है, मस्ताना लण्ड भी है, तेरी तड़फती फुद्दी भी है, कमरे में अंधेरा भी है। ऐसा मौका बार-बार नहीं आएगा सहेली। बार-बार ऐसा मौका नहीं आएगा। शुरू हो जा। पर... ये तो मेरे जीजाजी हैं। अगर उनको पता चल गया तो? तो क्या? तो क्या होगा? थोड़ा सा शर्माने का नाटक करना। इधर तेरी सहेली कमलावती भी तो तेरे कमरे में तेरे पति के साथ एक ही पलंग पे लेट रखी है।

 
सहेली- तो क्या हुआ लेट ही तो रखी है। और सो भी रखी है।

उसका मन- कौन जानता है की वो दोनों सो रखे हैं या चुदाई कर रहे हैं?

सहेली- नहीं नहीं... मेरी सहेली ऐसी नहीं हैं।

उसका मन- अरे तू भी उसकी सहेली है। जब तू अपने जीजाजी के लण्ड को सहला सकती है। तो वो क्यों नहीं?

सहेली- पर मेरी बात अलग है... उसकी बात अलग है।

उसका मन- अरे वाह... सहेली वाह। तू करे तो रासलीला, और तेरी सहेली करे तो कैरेक्टर ढीला?

सहेली- नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है।

उसका मन- फिर कैसी बात है? चल मौके का फायदा उठा और बहती गंगा में हाथ धोले।

सहेली ये सब सोच ही रही थी की कामरू ने उसके साये के नाड़ा को खोल दिया।

सहेली- अरे... रे... ये क्या कार रहे हो आप?

कामरू- कुछ नहीं... मैं थोड़ी सी तुमरी फुद्दी सहलाना चाहता हूँ। इससे मैं जल्दी ही खलास हो जाऊँगा और तुमको तंग नहीं करूंगा।

सहेली- अच्छा, ठीक है फिर।

और कामरू ने अगले ही पल उसकी साड़ी और साया को उतार बाहर किया। उसने जांघों के बीच सहलाया तो चौंक गया- “अरे कमलावती, तुमरी फुद्दी कहाँ गायब हो गई? नहीं मिल रही है."

सहेली- आप भी ना सैया जी। अरे मेरी पैंटी निकालिए ना.. तभी मेरी फुद्दी के दर्शन होंगे।

कामरू- अरे इस अंधेरे में कहाँ से दर्शन होंगे। और ये पैंटी तुझे कहाँ से मिल गई? तू तो पैंटी कभी पहनती ही नहीं है। सहेली का दिमाग तेज चलने लगा- हे भगवान्... साली कमलावती ने कभी बताया नहीं की वो साली चड्ढी नहीं पहनती।

सहेली- वो क्या है जी कि मेरी सहेली ने दिया है। हम दोनों की साइज एक जैसी है ना... आपको कैसे लगी?

कामरू- एकदम मस्त... कल ही तुमको दो पैंटी ला दूंगा।

सहेली- “ठीक है जी। पर अभी तो इसको उतारो..” सहेली ने जोश में कह दिया और खुद ही चौंक गई- अरे... ये मैंने क्या कह दिया?

कामरू ने उसकी पैंटी निकल दिया। और जब उसके फुद्दी के ऊपर हाथ फेरा तो फिर से चौंक गया, पूछा- अरे कमला... ये क्या हो गया?

सहेली चौंक गई- क्या? क्या हो गया?

कामरू- तेरी फुद्दी के बाहर उगी हुई झांटों के जंगल कहाँ गये? ये तो सफाचट मैदान है।

सहेली ये सुनकर जैसे आसमान से गिरी, अभी पकड़ी गई। हे भगवान्... साली कमलावती ने कभी बताया नहीं की वो फुदी के बाहर झांटों का जंगल उगा रखी है। साली ने मरवा दिया आज तो। उसका शातिर दिमाग तेजी से चलने लगा और उसने फटाक से जवाब दिया- “अरे... मेरी सहेली है ना... उसने मुझे एक क्रीम लाके दी है। उसे लगाते ही मेरी फुद्दी के बाल सफाचट हो गये। क्यों आपको पसंद नहीं आए?

कामरू- नहीं रानी, बहुत पसंद आए। आज तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा। लण्ड फुद्दी के अंदर डालकर ही मानूंगा।

सहेली- “तो रोका किसने है? घुसा दीजिए ना..” सहेली के मुँह से फटाक से निकला और फिर खुद हड़बड़ा गई। बात सभालने के लिये कहा- “अरे नहीं नहीं... अपने वादा किया था...”

कामरू- “पर रानी, आज की बात अलग है। चूचियां कठोर बेल के फल जैसी, दबाने में डबल मजा आ रहा है। फुद्दी को चड्ढी के खोल से ढकी हुई, तिगुना मजा... बिना झाँट की बुर चौगुना मजा...”

सहेली- इतना मस्ताना लण्ड, पंचगुना मजा... ऊपर से अंधेरा, छः गुना मजा... यही आप कहोगे ना?

कामरू- अरे, वाह मेरी रानी... आज तो बहुत ही बढ़िया-बढ़िया बातें कर रही है तू... कहाँ से सीखी?

सहेली- मेरी सहेली ने सिखाया है। अच्छा एक काम करते हैं। मैं आपका लण्ड चूस लेती हूँ?

कामरू- क्या? क्या कहा तुमने रानी?

सहेली- अजी मैंने कहा कि मैं आपका लण्ड चूस लेती हैं। ताकी ये थोड़ा सा और मस्त हो जाए। गीला हो जाये तो फुद्दी में घुसने में आसानी हो।

कामरू- क्या? तुम मेरा लण्ड चूसोगी?

सहेली- क्या हुआ? मैं आपका लण्ड नहीं चूस सकती?

कामरू- चूस क्यों नहीं सकती रानी? कमला, पर आज से पहले कभी तुमने चूसा नहीं है ना मेरा लण्ड। जब-जब मैं तुमको लण्ड चूसने के लिए बोलता तुम नकार देती हो। एक बार जबरदस्ती घुसाने की कोशिश की तो तुमने उल्टी कर दी। तब से मैंने लण्ड चूसने के लिए कभी नहीं कहा।

हे भगवान... ये साली कमला भी ना... मुझे आज मरवाएगी। साली को देखो तो लण्ड नहीं चूसती अपने पति का। और एक मैं हूँ कि लण्ड चूसे बिना मुझे चुदाई में मजा ही नहीं आता। सहेली बोलि- वो... क्या है जी कि मेरी सहेली ने कहा है कि अपने पति का लण्ड चूसना चाहिए। इससे लण्ड और फुद्दी में और पति पत्नी में प्रेम बढ़ता है।

 
कामरू- सही कहा है मेरी साली ने। अरे गजब... तुमने तो गजब कर दिया कमलावती... मेरे सुपाड़े के ऊपर पप्पी दे दी। अरे तुमने तो सुपाड़े को अपने मुँह में ले लिया।

सहेली- अरे, आपका लण्ड बहुत बड़ा है जी... पर मजा आ रहा है।

कामरू- देखा, मैं कहता था ना की लण्ड चूसने में मजा आएगा।

सहेली- हाँ सैंया जी, मैं ही गलत थी। खूब मजा आ रहा है।

कामरू- तो चूसे जा... अरे तुमने तो अपने गले तक ले लिया है, और बहुत ही मजेदार तरीके से चूस रही हो। आज तक किसी ने ऐसा नहीं चूसा।

सहेली- अच्छा... इसका मतलब और भी किसी ने चूसा है आपका। आपको मेरी कशम है, बताइए कौन है वो जो आपका लण्ड चूसी है।

कामरू- मुझे माफ करना कमलावती। पर तुमने कशम दे दी है तो बताना ही पड़ेगा। मेरे दोस्त भादरू ने मेरा लण्ड चूसा है।

सहेली- क्या भादरू ने? भादरू भाई साहब ने आपका लण्ड चूसा है। पर उनका लण्ड तो बिशाल है?

कामरू- अरे कहाँ का बिशाल है। मेरे से आधा है। और थोड़ा सा पतला भी।

सहेली- अच्छा... तो आपने उनकी गाण्ड भी मारी होगी?

कामरू- नहीं, साले ने मेरा लण्ड घुसवाने से मना कर दिया। पर साले ने मुझे धोखा दिया। पहले मेरी गाण्ड मार ली और जब मेरी गाण्ड मारने की बारी आई तो बिदक गया।

और भादरू बोला- मेरी गाण्ड फट जाएगी, मुझे नहीं मरवानी गाण्ड। हाँ... लण्ड चूस के पानी निकाल देता हूँ।

सहेली- अच्छा... ऐसा किया उन्होंने? आप एक काम करेंगे?

कामरू- बोल मेरी रानी?

सहेली- मेरी फुद्दी चूसेंगे?

काम- क्या? मैं तुमरी फुद्दी चुहूं?

सहेली- हाँ.. पर आपको पसंद ना हो तो रहने दीजिए। वो तो मेरी सहेली बोल रही थी कि पत्नी लण्ड चूसे और पति उसी समय पत्नी की फुद्दी चाटे तो मजा दोगुना हो जाता है।

कामरू- अच्छा... तुम्हारी सहेली ऐसे बोल रही थी। बड़ी ही रंगीली, रसीली साली है हमारी। जरा कभी हमसे भी तो मिलवाओ।

सहेली- चलिए उठिए।

कामरू- क्या हुआ? नाराज क्यों होती हो? मैंने तो मजाक किया था।

सहेली- पर मैं मजाक नहीं कर रही हूँ। एकदम सीरियस हूँ मैं। चलिए उठिए।

कामरू- मुझे माफ कर दे कमलावती। आइन्दा ऐसे नहीं बोलूंगा वादा।

सहेली- नहीं आप उठिए और चलिए।

कामरू- लेकिन कहाँ चलें?

सहेली- बगल के कमरे में जहाँ मेरी सहेली आपके दोस्त के बाहों में लिपटी हुई है, उनसे मिलवाने को। चलिए।

कामरू- अरे मरवाएगी क्या?

सहेली- क्यों? अभी आप ही ने तो कहा था कि कभी अपनी सहेली से हमें भी मिलवाइए। तो चलिए अभी मिला देती हूँ।

कामरू- अरे यार, तूने तो मेरी जान ही निकाल दी थी।

सहेली- हाँ... मेरी सहेली की चूचियां बिल्कुल मेरी जैसी हैं। फुद्दी भी एकदम सफाचट रखती है। मेरी सहेली रोज लण्ड चूसती है अपने पति का।

कामरू- क्या बोलती हो कमलावती। क्या तुम्हारी सहेली रोज अपने पति का लण्ड चूसती है?

सहेली- हाँ हाँ सैंया जी। मैं झूठ थोड़े ही बोल रही हैं।

कामरू- पर ऐसा यकीन के साथ कैसे कह सकती हो तुम। कभी देखा है क्या अपनी सहेली को भादरू का लण्ड चूसते हुए?

सहेली मन में- “साले, जब मैं खुद ही बोल रही हूँ की मैं रोज अपने पति का लण्ड चूसती हूँ। तब भी यकीन नहीं करता है..."

सहेली ने कहा- मेरी सहेली ने मुझे खुद बताया है।

कामरू- अच्छा, और क्या-क्या करती है वो अपने पति के साथ?

सहेली- आप चलिए ना... अच्छा जरा रुकिये मैं उसे बुलाकर ले आती हूँ यहाँ पर। उससे खुद ही पूछ लीजिएगा कि अपने पति का लण्ड कैसे करके चूसती है? अपनी फूद्दी अपने पति से कैसे करके चुसवाती है? बुला के ले

आऊँ?

कामरू- अरे नहीं कमलावती... क्यों मजाक करती है?

सहेली- अच्छा, मैं मजाक कर रही हूँ। पर शुरुवात तो आपने की है मेरे राजा।

कामरू- कमलावती, आज अपनी सहेली से मिलकर क्या आ गई तू तो की पूरी की पूरी बदल गई है।

सहेली- क्यों? मेरा ये बदलाव आपको अच्छा नहीं लगा? फिर बन जाऊँ मैं वही पहले वाली, वही छुई मुई सी कमलावती...

कामरू- अरे नहीं मेरी छम्मकछल्लो, नहीं... मुझे अभी की कमलावती बहुत पसंद है। लण्ड चूत, चुसाई चुदाई का नाम कभी अपनी जुबान पर ना लेने वाली आज खुद पहल करके मेरा लण्ड चूस रही है। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है।

सहेली- अच्छा एक काम करती हूँ। लण्ड को दाँत से थोड़ा सा काट लेती हूँ। दर्द होगा ना तब यकीन आएगा।

कामरू- काट ले, मैं तो कहता हूँ पूरा ही खा ले... फिर घुसाती रहियो अपनी चूत में गाजर... बैगन... मूली।

सहेली- “क्यों घुसाऊँ अपनी चूत में ये सब चीजें। मेरे पास है ना आपका ये मस्ताना गधा जैसा लण्ड, फिर मैं क्यों घुसाऊँ ये सब चीजें? वैसे भी मंहगाई इतनी बढ़ गई है। सब्जी बनाने के लिए तो मिलती नहीं है। और आप फुद्दी में घुसाने की बात करते हैं। इससे तो अच्छा है किसी और को पटा के...”

 
कामरू- किसी और को पटा के क्यों? हम नहीं हैं क्या? अरे अभी तो मेरा लण्ड खड़ा होता है। जब खड़ा होना बंद हो जाएगा ना तब पटाना किसी और को।

सहेली- अच्छा, लग गई ना मिर्ची गाण्ड पे? और गाजर बैगन घुसाने के लिए कैसे बोले।

कामरू- तेरी माँ की चूत में लौड़ा घुसाऊँ... साली।

सहेली- “देखो जी, हम दोनों के बीच में हमरी माँ को ना लाओ... और रही हमरी अम्मा को चोदने की... तो मैं मानती हूँ की आपका लण्ड बड़ा है, मोटा है, तगड़ा है। पर सैंया जी, आप यहाँ और हमरी अम्मा अपने गाँव में.. आपका लण्ड इतना बड़ा तो है नहीं की यहीं से हमरी अम्मा की चूत में लण्ड घुसेड़ सको। उन्हें चोदने के लिए तो आपको हमरे मायके जाना पड़ेगा। और रही बात साली को चोदने की... तो मैं तो कहती हूँ अभी वो बगल के कमरे में ही है। कहो तो बुलाए देती हूँ, हुमच-हुमच कर चोद लेना कुछ भी ना बोलूंगी... हाँ नहीं तो... और तुम हमरी अम्मा को चोदने जाओगे तो क्या हमरी चूतवा तुमरे बाबूजी आकर चोदेंगे?

कामरू- अरे, कमलावती फिर से मुझे माफ कर दे। गलती से माँ की गाली निकल गई।

सहेली- कोई बात नहीं सैंया जी, चुदाई के समय ये गाली देने से चुदाई की इच्छा प्रवाल हो जाती है। इच्छा ना होते हुए भी चूत पनियाने लगती है। और लण्ड को अपने अंदर समेटने के लिए फड़फड़ाने लगती है।

कामरू- इसका मतलब है कि तुम चुदाने के लिए तैयार हो।

सहेली- और नहीं तो क्या आपके हाथ में राखी बाँधने के लिए तैयार हूँ। अरे सैंया जी... मैं बिल्कुल नंगी आपसे चूचियां दबवा रही हूँ, चुसवा रही हूँ, चूत को सहलवा रही हैं, और आप तो अभी चाटने भी लगे हो। इधर मैं आपके लण्ड को चूसने लगी हूँ फिर भी आप पूछ रहे हो की मैं चुदवाने के लिए तैयार हैं।

कामरू- पर... मेरा पानी जल्दी नहीं निकलेगा?

सहेली- कोई बात नहीं सैंया जी... मजा भी तो उतना ही आएगा। बस अब बर्दास्त नहीं हो रहा है सैंया जी, अपने लण्ड को घुसेड़ ही दो।

कामरू- मुझसे भी अभी बर्दास्त नहीं हो रहा है कमलावती। अब मैं अपना लण्ड तेरी फुद्दी में घुसाने ही वाला हूँ।

सहेली- घुसा दो और किस बात की राह देख रहे हो?

कामरू- ले संभाल फिर।

सहेली- अरे.. राम रे... ये क्या घुसा दिया मेरी फुद्दी में?

कामरू- अरे, ये मेरे लण्ड का सुपाड़ा है।

सहेली- पर ये तो मेरी फुददी की दीवारों को चीरता हुआ घुसे ही जा रहा है। अब बस करो जी।

कामरू- क्या बस करो। अभी तो सुपाड़ा ही घुसा है। ये ले मेरा दूसरा धक्का।

सहेली- उइई.. माँ... मरी रे... बचाओ।

कामरू- धीरे-धीरे रानी। ये अपना घर नहीं, होटेल है। सब इकट्ठे हो जाएंगे।

सहेली- पर आपने तो पूरा एक साथ ही घुसेड़ दिया है सैंया जी। एक साथ घुसेड़ोगे तो दर्द तो होगा ही ना।

कामरू- सारा एक साथ कहाँ घुसेड़ा है मेरी जान। अभी आधा ही घुसेड़ा है... आधा लण्ड मेरा बाहर ही है।

सहेली- क्या? आधा ही घुसेड़ा है... आधा और बाकी है? मैं तो मर जाऊँगी सैंया जी। इतना बड़ा मेरी फुद्दी में घुस नहीं सकता? फुद्दी मेरी फट जाएगी, मैं मर जाऊँगी।

कामरू- अरे कुछ नहीं होगा कमलावती, कुछ नहीं होगा। सब दिन घुसता है मेरा लौड़ा तेरी फुद्दी में। आज कोई नया थोड़े ही घुस रहा है। पर आज कुछ-कुछ तेरी फुद्दी टाइट लग रही है कमलावती। बाकी दिन तो लण्ड आसानी से घुस जाता है। आज तेरी फुद्दी बहुत टाइट है... क्या बात है?

सहेली क्या बोलती की ये लौड़ा इस फुद्दी में तो पहली बार ही घुस रहा है।

पर बोले भी तो क्या बोले?

और तभी सहेली चिल्लाई- अरे... रे... रुक जाओ। है माँ... पूरा ही घुसा दिया इसने तो... मैं मर गई अम्मा... मुझे बचाओ... मेरी फुद्दी फट गई... राम रे... इस हैवान ने मुझे पूरा ही मार दिया। हे भगवान् बचाओ... मुझसे गलती हो गई की इनसे चुदवाने आ गई.. आज बचा लो भगवान.. फिर से ऐसी गलती नहीं होगी।

कामरू- बस रानी कमला, पूरा घुस चुका है। बस अब दर्द नहीं होगा।

सहेली- पक्के बहनचोद हो तुम।... ऐसे भी कहीं लड़की चोदी जाती है।

कामरू- तुम्हें कैसे मालूम पड़ा रानी की मैं पक्का बहनचोद हूँ।

सहेली- अच्छा... आप बहनचोद हो ये मेरे मुँह से निकल गया और अपने स्वीकार कर लिया। साबाश... दोस्त भादरू से गाण्ड मरवा चुके हो, उससे अपना लण्ड चुसवा चुके हो, बहनचोद हो याने मेरी ननद चम्पारानी को भी चोद चुके हो। वाह... वाह... क्या बात है?

कामरू- मुझे माफ कर दे कमला।

सहेली- माफी बाद में मिलेगी। पहले चोदना तो शुरू करो।

कामरू- क्या? क्या चोदना शुरू करूं?

सहेली- हाँ हाँ सैंया जी। हाँ... ऐसे ही धक्के लगाओ। बस चोदते रहो। आज पहली बार इतना बड़ा लण्ड मेरी फुददी में घुसा है। दर्द के साथ-साथ मजा भी खूब आ रहा है। बस रुको मत पेलते रहो।।

कामरू- आज तो खूब मजा आ रहा है। कमलावती, तेरी चूचियां मजेदार लग रही हैं। एक को दबाते हुए दूसरे को चूसता हूँ। कुछ नया-नया सा लग रहा है, ऊपर से सफाचट बुर, ऊपर से तुम्हारी ये चूत लण्ड वाले शब्द, ऊपर से मुझे धक्के लगाने पर उसकाना।

 
सहेली- ऊपर से तुम्हारा हुमच-हुमच कर धक्के लगाना। ऊपर से... सारी ऊपर से नहीं नीचे मेरा आपके हर धक्के के जवाब में चूतड़ उछालना, ऊपर से आपकी पीठ पर हाथ फिराना, ऊपर से आपके गालों पर पप्पियां देना। वाह... आपके साथ-साथ मुझे भी खूब मजा आ रहा है।

कामरू- वो सब तो ठीक है कमलावती... पर आज पहली बार मेरा ये बिशाल लण्ड अपनी फुद्दी में घुसवा रही है... ऐसा क्यों कह रही हो? रोज रात को तो घुसाता हूँ।

फैंसी रे... रामजी, ये क्या निकल गया मेरे मुँह से?

सहेली- वो क्या है कि रोज तो आप अपना लण्ड घुसते ही हो। पर आज कुछ और भी मोटा, और भी लंबा लग रहा है ना इसीलिए बोल रही थी। मेरा निकला सैंया जी... बस धक्का लगते रहो। बंद मत करो।

कामरू- ले साली... ले... ये ले और धक्का ।

सहेली- वाह... सैंया जी। आप मस्त चोदते हो। मेरी ऐसी चुदाई आज तक नहीं हुई। ऐसा मजा मुझे आज तक नहीं आया।

कामरू- हाँ... कमला। मुझे भी खूब मजा आया। कहाँ तो मैं सोच रहा था की मूठ मार के ही काम चलाना पड़ेगा। और कहाँ मुझे ऐसी दमदार चुदाई नसीब हो गई। हाँ मेरा भी निकलने वाला है।

सहेली- निकाल दो सैंया जी... निकाल दो... पर सुनो, मेरे मुँह में निकालना।

कामरू- क्या? मुँह में?

सहेली- हाँ... इसका स्वाद बहुत बढ़िया लगता है।

कामरू- क्या कहा? इसका स्वाद बढ़िया लगता है। पर तुमने कहाँ से चखा?

साली सहेली तू तो फिर से हँसी- अरे... ऐसा मेरी सहेली ने कहा था... तो मैंने सोचा- चख करके देखती हूँ। पर आपको पसंद ना हो तो ना चखाओ?

कामरू- अरी कमला, ऐसी बात नहीं है। मेरा तो बड़े दिनों का सपना आज पूरा होगा।

और सहेली कामरू के लण्ड को चूसने लगी।

कामरू- हाय... कमला, ऐसा लण्ड चूसना तूने कहाँ से सीखा?

सहेली- अपनी सहेली से।

कामरू- पर उसके पास थोड़े ही लण्ड है। लण्ड तो मर्द के पास होते हैं, और तूने सीखा है अपनी सहेली के पास से। इसका मतलब कि तूने भादरू का लण्ड चूस लिया।

सहेली- ठंड रखो... सैंया जी ठंड रखो। मैंने आपके अलावा अपने पति का ही लण्ड चूसा है। हाँ नहीं तो। मैं तो ये कह रही थी की मेरी सहेली ने मुझे ये सिखाया की लण्ड कैसे चूसा जाता है।

कामरू- अच्छा... अच्छा... ऐसा क्या?

सहेली- हाँ नहीं तो... आपने सभी को अपने जैसा सोच लिया क्या?

कामरू- क्या मतलब?

सहेली- नहीं नहीं... कुछ नहीं चूस रही हूँ।

कामरू- कुछ भी हो आज तुममें बहुत बदलाव आ गया है।

सहेली- तो पहले वाली कमलावती बन जाऊँ?

कामरू- नहीं नहीं... अब वाली सही है। बस चूसती रहो, मेरा निकलने वाला है.. अरे निकलने वाला ही है... अरे । अपने मुँह से निकाल लो.. निकल जाएगा... अरे मुँह गंदा हो जाएगा... अरे निकला... जा साली, चूस ले... अरे तूने तो सचमुच चूस ही लिया। अरे गजब... आज तो मुझे पूरा ही हिला दिया। हाँ... बस हो गया। सारा रस तो निचोड़ लिया तूने... बस और नहीं... और नहीं। अरे बाप रे क्या लण्ड चूस रही हो जानम... तेरी सहेली ने बढ़िया ट्रेनिंग दी है। गजब की चुदक्कड़ होगी वो तो।

सहेली- अच्छा... बीवी बगल में है और साली याद आ रही है। बुला दू साली को। सच कहती हूँ कि मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा।

कामरू- “अरे.. रे..."

सहेली- अच्छा, चलो एक काम करते हैं। अभी अंधेरा है... आज अभी तुम हमरे जीजाजी और हम तुमरी साली... कहो क्या बोलते हो?

कामरू- हाँ... साली को चोदने में मजा आएगा।

सहेली- ठीक है फिर... अभी आप हमको साली कहना और हम आपको जीजाजी कहेंगे, चुदाई में मजा आएगा। अरे आपका लण्ड तो फिर से खड़ा हो गया है। साली को चोदने को... क्यों जीजाजी?

कामरू- हाँ हाँ साली जी। आज पहली पहली बार मैं अपनी साली को चोदूंगा ना?

 
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