• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

दो रसीले आम

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
दो रसीले आम

मैं आपका दोस्त राज आज फिर से अपनी जिन्दगी के कुछ हसीन पल आपके साथ बांटने आया हूँ। मुझे भगवान ने, खासतौर पर कामदेव ने भरपूर आशीर्वाद दिया है तभी तो मेरी जिन्दगी में कभी भी मस्ती की कमी नहीं आई। जब चाहा, जिसको चाहा उसको अपना बना लिया और चुदाई के भरपूर मजे लिए।

आज की कहानी उन हसीन पलों की है जब एक कमसिन कुंवारी चूत मेरे लंड को नसीब हुई।

हुआ कुछ यूँ….

आज से करीब बारह साल पहले की बात है। मैं काम के सिलसिले में चंडीगढ़ गया हुआ था। काम तो एक दिन का ही था पर चंडीगढ़ एक बहुत ही खूबसूरत जगह है, घूमने का मन हुआ तो मैंने रात को रुकने का फैसला किया।

चंडीगढ़ में मेरे एक दोस्त अमन का परिवार रहता था। अमन के पिता जी, जिन्हें मैं ताऊ जी कहता था, वो अब नहीं रहे थे, पर ताई जी, उनका बड़ा बेटा रोहतास अपने परिवार के साथ रहता था। रोहतास के परिवार में रोहतास की पत्नी कोमल, उनकी बेटी मीनाक्षी जो लगभग तब अठारह या उन्नीस साल की होगी और रोहतास का बेटा मयंक जो बारह साल का था।

अमन भी रोहतास के साथ ही रहता था। मेरी अमन के साथ बहुत अच्छी पटती थी क्यूंकि अमन बचपन में कुछ साल हमारे पास ही रहा था।

जब मैंने अमन को बताया कि मैं चंडीगढ़ आ रहा हूँ तो वो ही मुझे जिद करके अपने साथ रोहतास भाई के घर ले गया।

मैं सुबह ही चंडीगढ़ पहुँच गया था। अमन का पूरा परिवार मुझे देख कर बहुत खुश हुआ। लगभग दो साल के बाद मैं उन सब से मिला था।

तब घर पर सिर्फ ताई जी और कोमल भाभी ही थे। कुछ घर परिवार की बातें हुई और फिर मैं अमन के साथ वो काम करने चला गया जिसके लिए मैं चंडीगढ़ आया था। दोपहर तक मेरा काम हो गया तो अमन मुझे फिल्म दिखाने ले गया और फिर शाम को हम दोनों भाई के घर पहुंचे।

रोहतास भाई अभी तक नहीं आये थे।

जब अमन ने बेल बजाई तो मीनाक्षी ने दरवाजा खोला। मैं तो मीनाक्षी को देखता ही रह गया। दो साल पहले देखा था मैंने मीनाक्षी को। तब वो बिल्कुल बच्ची सी लगती थी। पर आज देखा तो मीनाक्षी को देखता ही रह गया। मीनाक्षी ने एक टी-शर्ट और एक खुला सा पजामा पहना हुआ था।

कहते हैं ना कमीने लोगों की नजर हमेशा आती लड़की के चूचों पर और जाती लड़की के चूतड़ों पर ही पड़ती है। वैसा ही मेरे साथ भी हुआ, मेरी पहली नजर मीनाक्षी की उठी हुई छातियों पर पड़ी। बदन पर कसी टी-शर्ट में उसकी चूचियाँ अपनी बनावट को भरपूर बयाँ कर रही थी, एकदम किसी कश्मीरी सेब के आकार की खूबसूरत चूचियाँ देख कर मेरा तो दिल मचल गया।

तभी दिल के किसी कोने से एक दबी हुई सी आवाज आई ‘राज यह तू क्या कर रहा है, वो तेरे दोस्त की भतीजी है।’

ऐसा ख्याल आते ही मैं कुछ देर के लिए संभला और अमन के साथ उसके कमरे में जाकर लेट गया।

कुछ देर बाद मीनाक्षी ट्रे में दो गिलास पानी के लेकर अमन के कमरे में आई, उस समय अमन बाथरूम में था।

जब वो मुझे पानी देने लगी तो एक बार फिर से मेरी नजर उसकी चूचियों पर अटक गई, मैंने पानी ले लिया और पीने लगा।

पानी पीने के बाद मैंने खाली गिलास मीनाक्षी की तरफ बढ़ा दिया।

जब मीनाक्षी गिलास लेकर वापिस जाने लगी तो ना जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया- मीनाक्षी, तुम तो यार क़यामत हो गई हो… बहुत खूबसूरत लग रही हो!

मीनाक्षी ने पलट कर मेरी तरफ अजीब सी नजरों से देखा। एक बार तो मेरी फटी पर जब मीनाक्षी ने मुझे थोड़ा मुस्कुरा कर थैंक यु कहा तो मेरी तो जैसे बांछें खिल गई, मुझे लगा कि काम बन सकता है पर याद आ जाता कि ‘नहीं यार, कुछ भी हो, है तो मेरे खास दोस्त की भतीजी।’

रात को करीब नौ बजे रोहतास भाई भी आ गए, फिर ड्राइंग रूम में बैठ कर सब बातें करने लगे। कोमल भाभी और मीनाक्षी रसोई में खाना बना रहे थे।

जहाँ मैं बैठा था, वहाँ से रसोई के अन्दर का पूरा हिस्सा दिखता था। मैं अपनी जगह पर बैठा बैठा मीनाक्षी को ही ताड़ रहा था।

मैंने गौर किया की मीनाक्षी भी काम करते करते मुझे देख रही है। एक दो बार हम दोनों की नजरें भी मिली पर वो हर बार ऐसा दिखा रही थी कि जैसे वो अपने काम में व्यस्त है।

एक दो बार मैंने कोमल भाभी के बदन का भी निरीक्षण किया तो वो भी कुछ कम नहीं थी। चंडीगढ़ की आधुनिकता का असर साफ़ नजर आता था कोमल भाभी पर भी।

रसोई में काम करते हुए उन्होंने भी एक टी-शर्ट और पजामा ही पहना हुआ था जिसमें उनके खरबूजे के साइज़ की मस्त चूचियाँ और बाहर को निकले हुए मस्त भारी भारी कूल्हे नुमाया हो रहे थे।

एक बार तो मन में आया कि कोमल भाभी ही मिल जाए क्यूंकि देवर भाभी का रिश्ता में तो ये सब चलता है। पर मीनाक्षी के होते भाभी का भरापूरा बदन भी मुझे फीका लग रहा था, बस बार बार नजर मीनाक्षी के खूबसूरत जवान बदन पर अटक जाती थी।

रात को लगभग साढ़े दस बजे सबने खाना खाया। खाना खाते समय मीनाक्षी मेरे बिल्कुल सामने बैठी थी। मैं तो उस समय भी उसकी खूबसूरती में ही खोया रहा।

मीनाक्षी भी बार बार मुझे ‘चाचू.. चावल लो… चाचू सब्जी लो… चाचू ये लो… चाचू वो लो…’ कह कह कर खाना खिला रही थी। जब भी वो ऐसा कहती तो मेरे अन्दर एक आवाज आती ‘ये सब छोड़ो, जो दो रसीले आम टी-शर्ट में छुपा रखे है उनको चखाओ तो बात बने।’

खाना खाया और फिर सोने की तैयारी शुरू हो गई।

तभी मीनाक्षी ने अमन को आइसक्रीम खाने चलने को बोला पर अमन ने थका होने का बोल कर मना कर दिया।

मयंक और मीनाक्षी दोनों आइसक्रीम खाने जाना चाहते थे। जब अमन नहीं माना तो रोहतास भाई बोल पड़े- राज, तुम चले जाओ बच्चों के साथ। तुम भी आइसक्रीम खा आना और साथ ही घूमना भी हो जाएगा।

मैं तो पहले से ही इस मौके की तलाश में था, मैंने हाँ कर दी। मैं और मयंक घर से बाहर निकल गये और थोड़ी ही देर में मीनाक्षी भी अपनी स्कूटी लेकर बाहर आ गई। मैं तो पैदल जाना चाहता था पर वो बोली- आइसक्रीम वाला थोड़ा दूर है तो स्कूटी पर जल्दी पहुँच जायेंगे।

पर अब समस्या यह थी कि छोटी सी स्कूटी पर तीनों कैसे बैठें।

मीनाक्षी बोली- मयंक को आगे बैठा लो और तुम स्कूटी चलाओ, मैं पीछे बैठती हूँ।

मयंक भी इसके लिए राजी हो गया।

मैंने मयंक को आगे बैठाया और तभी मीनाक्षी भी अपने पाँव दोनों तरफ करके मेरे पीछे बैठ गई।

छोटी सी स्कूटी पर तीन लोग…

मीनाक्षी मेरे पीछे बैठी तो अचानक मुझे उसकी मस्त चूचियों का एहसास अपनी कमर पर हुआ।

मेरे लंड महाराज तो एहसास मात्र से हरकत में आ गये। थोड़ी दिक्कत तो हो रही थी पर फिर भी मैंने स्कूटी आगे बढ़ा दी।

जैसे ही स्कूटी चली मीनाक्षी मुझ से चिपक कर बैठ गई, उसकी चूचियाँ मेरी कमर पर दब रही थी जिनका एहसास लिख कर बताना मुश्किल था।
 
तभी एक कार वाला हमारे बराबर से गुजरा तो मुझसे स्कूटी की ब्रेक दब गई। यही वो क्षण था जब मीनाक्षी ने मेरी कमर को अपनी बाहों के घेरे में लेकर जकड़ लिया।

मेरा तो तन-बदन मस्त हो गया था… मीनाक्षी के स्पर्श से पहले ही चिंगारियाँ फ़ूट रही थी पर जब मीनाक्षी ने मुझे ऐसे पकड़ा तो आग एकदम से भड़क गई।

अब मीनाक्षी की दोनों चूचियाँ मेरी कमर पर गड़ी जा रही थी। मैंने अचानक मेरा एक हाथ पीछे करके अपनी पीठ पर खुजाने का बहाना किया और यही वो समय था जब मेरा हाथ मीनाक्षी की चूची को छू गया।

‘क्या हुआ चाचू…’ कह कर मीनाक्षी थोड़ा पीछे हुई।

‘कुछ नहीं, पीठ पर कुछ चुभ रहा है… और थोड़ी खारिश सी हो रही है।’ कहकर मैं फिर से अपनी पीठ खुजाने लगा।

वैसे तो जब मैंने अपना हाथ दुबारा पीछे किया तो मीनाक्षी भी पीछे को हो गई थी पर स्कूटी पर ज्यादा जगह नहीं थी तो मेरा हाथ फिर से एक बार उसकी चूची पर पड़ा।

तभी सड़क पर एक छोटा सा खड्डा आ गया और मैंने ब्रेक दबा दी जिससे मीनाक्षी भी आगे की तरफ आई और मेरा हाथ मीनाक्षी की चूची और मेरी पीठ के बीच में दब गया।

मैंने भी मौका देखा और मीनाक्षी की चूची को अपने हाथ में पकड़ कर हल्के से दबा दिया।

‘क्या करते हो चाचू…’ मीनाक्षी थोड़ा कसमसा कर पीछे को हुई, अब मैंने अपना हाथ आगे कर लिया।

मैंने थोड़ा मुड़ कर पीछे मीनाक्षी की तरफ देखा तो उसके चेहरे पर शर्म भरी मुस्कान नजर आई।

तभी आगे मार्किट शुरू हो गई और हम एक आइसक्रीम पार्लर पर पहुँच गए और आइसक्रीम आर्डर कर दी।

मयंक अपनी पसंद की आइसक्रीम देखने में व्यस्त था, मैं और मीनाक्षी अपनी स्कूटी के पास ही खड़े हो गए।

‘आप बड़े ख़राब है चाचू…’ मीनाक्षी ने थोड़ा शर्माते हुए कहा।

‘क्यों मैंने क्या किया?’

‘आपको सब पता है कि आपने क्या किया!’

‘अरे कुछ बताओ भी.. मैंने ऐसा क्या किया?’

‘आपने मेरी वो दबा दी…’ वो थोड़ा शर्माते हुए बोली।

उसके चेहरे की मुस्कान बयाँ कर रही थी कि आग ना सही पर चिंगारी तो उधर भी है।

‘अरे… वो क्या… कुछ बताओगी मुझे?’

‘छोड़ो… मुझे शर्म आती है।’

‘अब बता भी दो जल्दी.. नहीं तो मयंक आ जाएगा!’

‘ये…’ जब मीनाक्षी ने अपनी चुचियों की तरफ इशारा करके कहा तो मेरे तो लंड की हालत ही ख़राब हो गई।

‘तुम्हें अच्छा नहीं लगा…’ मैंने मीनाक्षी की आँखों में झांकते हुए पूछा तो वो बोली कुछ नहीं पर उसने जिस अदा से अपनी आँखें झुकाई, मैं तो बस जैसे उसी में खो गया।

तभी मयंक आइसक्रीम लेकर आ गया और हम तीनों आइसक्रीम खाने लगे।

आइसक्रीम खा कर मैंने काउंटर पर पैसे दिए और बचे हुए पैसे से एक चॉकलेट ले ली।

जब मैं पैसे देकर वापिस आया तो मयंक वहाँ नहीं था, मीनाक्षी ने बताया कि वो कैंडी लेने गया है।

मैंने भी मौका देखते हुए चॉकलेट मीनाक्षी की तरफ बढ़ा दी, उसने चॉकलेट ले ली और थैंक यू बोला।

‘बस थैंक यू…’ मैंने मुँह बनाते हुए कहा।

‘तो और क्या चाहिए आपको…?’ उसके इस जवाब से मैं मन ही मन सोचने लगा की कह दूँ कि मुझे तो तेरी जवानी का रस चाहिए पर कुछ झिझक सी थी।

उसने जब दुबारा यही सवाल किया तो मैंने पूछ लिया- जो मांगूंगा, दोगी?

उसने जब हाँ में सर हिलाया तो मेरे मुँह से ना जाने कैसे निकल गया- अगर मैं तुम्हें किस करना चाहूँ तो…?

पहले तो वो चौंक कर मेरी तरफ देखने लगी और फिर लापरवाह से अंदाज में बोली- कर लेना… किस लेने से क्या होता है..

‘पक्का… मुकर तो नहीं जाओगी?’

मीनाक्षी ने बड़ी अदा के साथ कहा- वो तो वक्त बताएगा।

मैं अभी कुछ बोलने ही वाला था कि मयंक आ गया, फिर हम घर की तरफ चल दिए।

मीनाक्षी अब भी मुझ से अपनी चूचियाँ चिपका के ही बैठी थी। मीनाक्षी के साथ हुई बातचीत और मीनाक्षी के गुदाज मम्मो के स्पर्श ने मेरी पैंट के अन्दर हलचल मचा दी थी।

कुछ दूर चलने के बाद मैंने जानबूझ कर फिर से अपना एक हाथ अपनी पीठ की तरफ किया तो मेरा हाथ मीनाक्षी ने पकड़ लिया और खुद ही मेरी पीठ खुजाने लगी।

मेरी हँसी छुट गई तो मीनाक्षी ने मेरी पीठ पर चुंटी काट ली।

मैंने अपना हाथ छुड़वाया और कुछ दूर चलने के बाद फिर से अपना हाथ पीठ की तरफ किया तो हाथ सीधा मीनाक्षी की चुचियों को स्पर्श करने लगा।

मीनाक्षी के मन में भी शायद कुछ हलचल थी तभी तो उसने मेरा हाथ अपने चूचियों और मेरी पीठ के बीच में दबा दिया।

मैं कुछ देर तो एक हाथ से स्कूटी चलाता रहा। तभी मयंक बोला- चाचू, आप हैंडल छोड़ो.. मैं स्कूटी चलाता हूँ।

‘क्या तुम चला लेते हो?’

‘चला तो लेता हूँ पर दीदी मुझे चलाने ही नहीं देती।’ मयंक ने मीनाक्षी की शिकायत की।

मैंने अब स्कूटी का हैंडल मयंक के हाथ में दिया और फिर दोनों हाथ साइड में कर लिए। मयंक थोड़ा धीरे धीरे डर डर कर चला रहा था। अब मेरे दोनों हाथ फ्री थे।

मैंने फिर से अपना बायाँ हाथ पीछे किया तो हाथ फिर से मीनाक्षी की चूची को छूने लगा।

इस बार मीनाक्षी ने मेरे हाथ से अपना शरीर दूर नहीं किया था। मैं अब धीरे धीरे मीनाक्षी की चूची को सहलाने लगा था। बीच बीच में कभी कभी हल्का हल्का दबा भी देता था। मीनाक्षी कुछ नहीं बोल रही थी बस उसने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया।

मैं समझ चुका था कि मीनाक्षी को अपनी चूचियों पर मेरे हाथ का स्पर्श अच्छा लग रहा है।

जब मयंक ने अचानक ब्रेक मारी तो मेरी तन्द्रा भंग हुई, घर आ चुका था।

हम स्कूटी से उतर गये, मयंक भाग कर घर के अन्दर चला गया और मीनाक्षी स्कूटी को उसकी जगह पर खड़ी करने लगी। मैं तब मीनाक्षी के साथ ही था, वो बार बार मेरी तरफ ही देख रही थी, उसकी आँखों में एक अजीब सा नशा साफ़ नजर आ रहा था।

जब वो स्कूटी को खड़ा करके मुड़ी तो मैं अपने आप पर कण्ट्रोल नहीं कर पाया और मैंने मीनाक्षी को अपनी बाहों में भर कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

मीनाक्षी थोड़ा कसमसाई और मुझे अपने से दूर करने लगी।

मैं एक रसीले चुम्बन के बाद मीनाक्षी से अलग हुआ।

मीनाक्षी शर्मा कर एकदम से घर के अन्दर भाग गई, मैं मीनाक्षी के रसीले होंठों की मिठास को महसूस करता हुआ कुछ देर वहीं खड़ा रहा और फिर मैं भी घर के अन्दर चला गया।

वक़्त लगभग साढ़े ग्यारह का हो रहा था, मैं अमन के कमरे में गया तो वो सो चुका था, मैंने भी बैग में से लोअर निकाला और कपडे बदल लिए।

बाथरूम में जाकर कुछ देर लंड को सहलाया और समझाया कि जल्द ही तुझे एक कुंवारी चूत का रस पीने को मिलेगा। जब लंड नहीं समझा तो उसको जोर जोर से मसलने लगा।

पांच मिनट बाद ही लंड के आँसू निकलने लगे और फिर वो शांत होकर अंडरवियर के अन्दर जाकर आराम करने लगा।
 
बाथरूम से बाहर आकर जब मैं कमरे का दरवाजा बंद करने लगा तो मुझे टीवी चलने की आवाज सुनाई दी। जब मैं कमरे से बाहर आया तो देखा की मयंक और मीनाक्षी बैठे टीवी देख रहे थे, टीवी पर को मूवी चल रही थी, दोनों उसको देखने में व्यस्त थे।

‘अरे सोना नहीं है क्या तुम दोनों को?’ रोहतास भाई की आवाज सुन कर मैं वापिस जाने लगा पर तभी मुझे मीनाक्षी की आवाज सुनाई दी-

‘पापा.. कल छुट्टी है हम दोनों की और मेरी मनपसंद मूवी आ रही है… प्लीज देखने दो ना..’

‘ठीक है पर ध्यान से टीवी बंद करके सो जाना… कभी पिछली बार की तरह टीवी खुला ही छोड़ कर सो जाओ!’

‘आप चिंता ना करो.. मैं बंद कर दूंगी.. पक्का!’

‘ओके गुड नाईट बेटा’ कह कर रोहतास भाई अपने कमरे में चले गये और उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया।

रोहतास भाई के जाते ही मेरा मन मीनाक्षी के पास बैठने का हुआ तो मैं भी कमरे से निकल कर मीनाक्षी के पास बैठ गया। मेरे और मीनाक्षी के बीच में मयंक बैठा था। मीनाक्षी ने मेरी तरफ देखा और फिर शर्मा कर अपनी आँखें झुका ली। उसकी आँखे झुकाने की अदा ने सीधा मेरे दिल पर असर किया।

मीनाक्षी और मयंक सोफे पर बैठे थे, ‘कहो ना प्यार है’ मूवी चल रही थी।

मेरे आने के बाद से मीनाक्षी मूवी कम और मुझे ज्यादा देख रही थी।

कुछ कुछ यही हालत मेरी भी थी, हम दोनों के दिलो की धड़कन बढ़ चुकी थी पर मयंक के वहाँ रहते चुपचाप बैठे थे।

‘यार ये लाइट बंद कर दो ना… ऐसे टीवी देखने में मज़ा नहीं आ रहा है।’ मैंने जानबूझ कर मयंक से कहा तो वो उठ कर लाइट बंद करने चला गया।

जैसे ही वो लाइट बंद करके वापिस आकर बैठने को हुआ तो मैंने उसको पानी लाने के लिए बोल दिया।

‘क्या चाचू… मूवी देखने दो ना… आप पानी दीदी से ले लो!’

मीनाक्षी ने थोड़ा गुस्से से उसको पानी लाने के लिए बोला तो वो झुँझलाता हुआ रसोई में गया और पानी की बोतल निकाल कर ले आया।

इस दौरान मैं मीनाक्षी की तरफ खिसक गया, मयंक आया और आकर साइड में मेरी सीट पर बैठ गया। मीनाक्षी मेरी इस हरकत पर मुस्कुराई और फिर शर्मा कर नजरें टीवी की तरफ घुमा ली।

मयंक अब टीवी में ध्यान लगाए मूवी देख रहा था, मैंने मौका देखते हुए अपना एक हाथ मीनाक्षी के हाथ पर रख दिया। उसने अपना हाथ छुड़वाना चाहा पर मैंने पकड़े रखा।

कुछ देर ऐसे ही उसके हाथ को सहलाता रहा और फिर थोड़ी सी हिम्मत करके मैंने वो हाथ मीनाक्षी की जांघों पर रख दिया।

मीनाक्षी ने मेरा हाथ वहाँ से हटाने की कोशिश की पर जितना वो हटाने की कोशिश करती मैं और जोर से उसकी जांघों को दबा देता। वो ज्यादा जोर भी नहीं लगा सकती थी क्यूंकि ऐसा करने से मयंक को शक हो जाता।

जब वो मेरा हाथ नहीं हटा पाई तो उसने अपना हाथ हटा लिया, मेरे लिए मैदान साफ़ था, मैंने धीरे धीरे मीनाक्षी की जांघों को सहलाना शुरू किया और हाथ को धीरे धीरे उसकी चूत की तरफ ले जाने लगा।

अपनी जांघों पर मेरे हाथ के स्पर्श से मीनाक्षी मदहोश होने लगी थी। जब मैं उसकी जांघों को सहला रहा था, तभी मुझे अंदाजा हो गया की मीनाक्षी ने नीचे पेंटी नहीं पहनी हुई है।

यह सोचते ही मेरे लंड ने फुंकारना शुरू कर दिया।

जांघो को सहलाते सहलाते जब मैंने मीनाक्षी की चूत को छूने की कोशिश की तो मीनाक्षी ने अपनी जांघे भींच ली और मेरे हाथ को चूत पर जाने से रोक दिया। मैंने बहुत कोशिश की पर कामयाब नहीं हो पाया। जबरदस्ती कर नहीं सकता था क्यूंकि मयंक वहाँ था।

जब मैं चूत को नहीं छू पाया तो मैंने अपना हाथ मीनाक्षी की पेट की तरफ कर दिया और टी-शर्ट के नीचे से हाथ डाल कर उसके पेट पर घुमाने लगा। मीनाक्षी ने रोकने की कोशिश की पर बेकार…

अब मेरा हाथ मीनाक्षी के नंगे पेट पर आवारगी कर रहा था, मज़ा मीनाक्षी को भी आ रहा था।

धीरे धीरे पेट को सहलाते हुए मेरा हाथ ऊपर मीनाक्षी की चूचियों की तरफ बढ़ रहा था और फिर मीनाक्षी की नंगी चूचियों का पहला स्पर्श मेरे हाथों को हुआ। मीनाक्षी की चूचियों पर भी छ पहले मर्द का हाथ था।

मीनाक्षी रोकने की कोशिश कर रही थी पर मुझ पर तो मीनाक्षी की जवानी का नशा चढ़ चुका था, मैं खुद पर कण्ट्रोल नहीं कर पा रहा था।

अचानक मीनाक्षी ने मयंक को आवाज दी।

मयंक का नाम सुनकर जैसे मैं नींद से जागा। मीनाक्षी के गर्म कोमल शरीर से खेलते हुए मैं तो मयंक को बिल्कुल भूल ही गया था। मीनाक्षी की आवाज के साथ ही मेरी नजर भी मयंक की तरफ घूम गई। देखा तो मयंक सोफे की बाजू पर सर टिका कर सो रहा था। मीनाक्षी की आवाज सुनकर वो उठ गया।

‘अगर नींद आ रही है तो अन्दर दादी के पास जाकर सो जाओ…’ मीनाक्षी ने मयंक को कहा।

‘नहीं मुझे मूवी देखनी है!’

‘अरे जब नींद आ रही है तो जाके सो जाओ… मूवी तो फिर भी आ जायेगी।’ मैंने भी मयंक को भेजने के इरादे से कहा पर वो नहीं माना।

कुछ ही देर में मयंक फिर से सो गया तो मैंने मयंक को उठाया और उसको कमरे में भेज दिया।

अब शायद मयंक को ज्यादा नींद आ रही थी, तभी तो वो बिना कुछ बोले ही उठ कर कमरे में चला गया।

मयंक के जाते ही सारी रुकावट ख़त्म हो गई, मैंने तुरन्त मीनाक्षी का हाथ पकड़ा और उसको अपनी तरफ खिंच कर बाहों में भर लिया। मीनाक्षी थोड़ा कसमसाई और उसने छूटने की कोशिश की पर मैं अब कण्ट्रोल नहीं कर सकता था, मैंने तुरन्त अपने होंठ मीनाक्षी के होंठो पर रख दिए।
 
लगभग पांच मिनट तक मैं मीनाक्षी के होंठो को चूसता रहा, मीनाक्षी भी पूरा सहयोग कर रही थी, अब तो वो मेरी बाहों में सिमटती जा रही थी। मेरा एक हाथ उसकी टी-शर्ट के अन्दर जा चुका था और मीनाक्षी की तनी हुई चूचियों को सहला रहा था।

‘चाचू… यहाँ ये सब ठीक नहीं है… कोई अगर बाहर आ गया तो मुश्किल हो जायेगी!’

‘तो फिर कहाँ…???’

‘कोई कमरा तो खाली नहीं है…’ मीनाक्षी ने थोड़ी परेशान सी आवाज में कहा।

फिर थोड़ा सोच कर बोली- चाचू… छत पर चले… वहाँ कोई नहीं आएगा।

मैं तो उसकी जवानी का रसपान करने के लिए मरा जा रहा था तो मेरे मना करने का तो कोई मतलब ही नहीं था। मैंने उसको अपनी गोद में उठा लिया और छत की तरफ चल दिया। करीब साठ किलो की मीनाक्षी मुझे फूल जैसी हल्की लग रही थी। सीढ़ियों के पास जाकर मीनाक्षी ने मुझे नीचे उतारने के लिए कहा।

गोद से उतर कर वो पहले रोहतास के कमरे के पास गई और देखा कि रोहतास और कोमल भाभी सो चुके थे, फिर दादी के कमरे में देखा तो वो भी सो रहे थे।

तब तक मैंने भी अमन के कमरे में देखा तो अमन भी खराटे मार रहा था।

मीनाक्षी वापिस सीढ़ियों के पास आ गई तो मैंने उसको वहीं सीढ़ियों पर ही पकड़ कर किस करना शुरू कर दिया और ऐसे ही किस करते करते हम दोनों छत पर पहुँच गए।

छत पर खुले आसमान के नीचे हम दोनों आपस में प्यार करने में मग्न थे। मैंने मीनाक्षी को अपने से अलग करके चारों तरफ देखा तो सब तरफ सुनसान था। रात के करीब एक बजे का समय था तब। वैसे तो सब घरों की छतें आपस में मिली हुई थी पर किसी भी छत पर कोई नजर नहीं आ रहा था। शहरों में वैसे भी लोग खुली छतों पर सोना कम ही पसंद करते है।

मीनाक्षी ने छत पर पड़ी एक चटाई को बिछाया और उस पर बैठ गई। क्यूंकि छत पर और कुछ था भी नहीं तो मैं भी चटाई पर ही मीनाक्षी के पास बैठ गया।

‘चाचू… वैसे जो हम कर रहे है वो ठीक नहीं है… आप मेरे चाचू है और…’ इस से ज्यादा वो कुछ बोल ही नहीं पाई क्यूंकि मैंने अपने होंठो से उसके होंठ बंद कर दिए थे।

कुछ देर उसके होंठ चूसने के बाद मैंने अपने होंठ हटाये और उसको बोला- मीनाक्षी… मुझे तुमसे प्यार हो गया है… और प्यार में सब जायज़ है… और फिर तुम भी तो मुझ से प्यार करने लगी हो…

‘हाँ चाचू… मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ… आप बहुत अच्छे है… मैं तो आपको अपने बचपन से ही बहुत पसंद करती हूँ।’

‘तो सब कुछ भूल कर सिर्फ प्यार करो…’ कहकर मैंने फिर से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और एक हाथ से उसकी टी-शर्ट को ऊपर उठा कर उसकी एक चूची को बाहर निकाल लिया।

चाँद की चांदनी में मीनाक्षी की गोरी गोरी चूची किसी मक्खन के गोले जैसी लग रही थी।

मैंने चुम्बन करते करते मीनाक्षी को लेटा दिया और खुद उसके बराबर में लेट कर उसकी चूची को मसलता रहा, होंठ और चेहरे को चूमते चूमते मैंने मीनाक्षी की कानों की लटकन को और उसके गले को चूमना शुरू कर दिया।

मीनाक्षी आँखें बंद किये आनन्द के सागर में गोते लगा रही थी, उसके बदन में मस्ती भरती जा रही थी, उसके हाथ मेरे सर पर मेरे बालों में घूम रहे थे और बीच बीच में मादक सिसकारी सी फ़ूट पड़ती थी मीनाक्षी के मुँह से।

कुछ देर बाद मैंने नीचे का रुख किया और अपने होंठ मीनाक्षी के दूध जैसे गोरे पेट पर रख दिए और मीनाक्षी के नाभि स्थल और आसपास के क्षेत्र को चूमने लगा।

मेरे ऐसा करने से मीनाक्षी को गुदगुदी सी हो रही थी, तभी तो वो बीच बीच में मचल जाती थी।

मैंने अपने होंठों को ऊपर की तरफ सरकाया और उसकी चूची को चाटने लगा। अब मैंने उसकी दोनों तन कर खड़ी चूचियों को नंगी कर दिया, चूचियों को चाटते चाटते मैंने जब अपनी जीभ उसकी चूची के तन कर खड़े चूचुक पर घुमाई तो मीनाक्षी के पूरे शरीर में एक झुरझरी सी उठी और उसका बदन अकड़ गया।

मैं समझ गया था की मेरी जीभ का असर मीनाक्षी की चूत तक पहुँच गया है और उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया है। और सच में था भी ऐसा ही।

जब मैंने अपना एक हाथ उसके पजामे के ऊपर से ही उसकी चूत पर रखा तो पजामा चूत के पानी से इतना गीला हो चुका था कि लगता था जैसे मीनाक्षी ने पजामे में पेशाब कर दिया हो।

मैंने अपना हाथ मीनाक्षी के पजामे में घुसा दिया और ऊँगली से उसकी चूत के दाने को सहलाने लगा।

मीनाक्षी मस्ती से बेहाल हो गई थी और मेरे सर को जोर से अपनी चूचियों पर दबा रही थी।

मेरा लंड भी पजामे को फाड़ कर बाहर आने को मचल रहा था।

मैंने मीनाक्षी को बैठाया और पहले उसकी टी-शर्ट को उतारा और फिर सीधा लेटा कर उसके पजामे को भी उसके गोरे-गोरे बदन से अलग कर दिया।

यही समय था जब पहली बार मैं उसकी कमसिन कुंवारी चूत को अपनी आँखों के सामने नंगी देखा था। नर्म नर्म रोयेदार भूरी भूरी झांटों के बीच छोटी सी गुलाबी चूत… चूत देखते ही मेरे लंड ने तो जैसे बगावत कर दी।

मैंने भी बिना देर किये अपने कपड़े उतार कर एक तरफ रख दिए और झुक कर मीनाक्षी की चूत को सूंघने लगा। एक मादक खुशबू से मेरे बदन में वासना की ज्वाला बुरी तरह से भड़क उठी थी।

मैंने बिना देर किये मीनाक्षी की गोरी गोरी जाँघों को चूमना और चाटना शुरू कर दिया। मीनाक्षी के मुँह से मादक सिसकारियाँ फूट रही थी।

जाँघों को चूमते चूमते मैंने अपने होंठ मीनाक्षी की कुंवारी चूत पर रख दिए। मेरे होंठों के स्पर्श से एक बार फिर उत्तेजना के मारे मीनाक्षी की चूत ने पानी छोड़ दिया।

मैं ठहरा चूत का रसिया… मेरे लिए तो कुंवारी चूत का ये पानी अमृत समान था, मैं जीभ से सारा पानी चाट गया।

चूत चाटते हुए मैंने मीनाक्षी का एक हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रख दिया।
 
मेरे लंड की लम्बाई और मोटाई का अंदाजा लगते ही मीनाक्षी उठ कर बैठ गई। शायद अब से पहले उसको मेरे लंड की लम्बाई और मोटाई का एहसास ही नहीं था।

‘चाचू… ये तो बहुत बड़ा और मोटा है…’ मीनाक्षी ने हैरान होते हुए कहा।

‘तो तुम क्यों घबराती हो मेरी जान… ये तो तुम्हें प्यार करने की ख़ुशी में ऐसा हो गया है।’

‘प्लीज इसे मेरे अन्दर मत डालना… मैं नहीं सह पाऊँगी आपका ये!’

‘घबराओ मत… कुछ नहीं होगा…’ मैंने उसको समझाते हुए दुबारा लेटा दिया और लंड को उसके मुँह के पास करके फिर से उसकी चूत चाटने लगा।

मैंने मीनाक्षी को लंड सहलाने और चूमने को कहा तो उसने डरते डरते मेरे लंड को अपने कोमल कोमल हाथों में पकड़ लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी।

मेरे कहने पर ही वो बीच बीच में अपनी जीभ से मेरे लंड के टमाटर जैसे सुपारे चाट लेती थी पर मुँह में लेने से घबरा रही थी।

मैं भी कोई जोर-जबरदस्ती करके उसका और अपना मज़ा खराब नहीं करना चाहता था। मैं उसकी चूत के दाने को उंगली से सहलाते हुए जीभ को उसकी चूत में घुसा घुसा कर चूस और चाट रहा था।

लगभग दस मिनट ऐसे ही चूसा चुसाई का प्रोग्राम चला और फिर मीनाक्षी भी तड़प उठी थी मेरा लंड अपनी कुंवारी चूत में लेने के लिए… मेरे लिए भी अब कण्ट्रोल करना मुश्किल हो रहा था।

मैंने मीनाक्षी को लेटा कर उसकी दोनों टांगों को चौड़ा किया और खुद उसकी टांगों के बीच में आकर मैंने अपने लंड का सुपारा उसकी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया।

अपनी चूत पर मेरे मोटे लंड का एहसास करके मीनाक्षी घबरा रही थी, उसकी घबराहट को दूर करने के लिए मैं मीनाक्षी के ऊपर लेट गया और कभी उसके होंठ तो कभी उसकी चूची को चूसने लगा, नीचे से लंड भी मीनाक्षी की चूत पर रगड़ रहा था।

रगड़ते रगड़ते ही मैंने लंड को चूत पर सही से सेट करके थोड़ा दबाव बनाया तो मीनाक्षी की रस से भीग कर चिकनी हुई चूत के मुहाने पर मेरा सुपारा अटक गया।

मुझे अपने आप पर गुस्सा आया कि जब पता था की एक कमसिन कुंवारी चूत का उद्घाटन करना है तो क्यों नहीं मैं तेल या कोई क्रीम साथ लेकर आया।

पर अब क्या हो सकता था, सोचा चलो थूक से ही काम चला लेते है। इतना तो मैं समझ चुका था कि चुदाई में मीनाक्षी बहुत शोर मचाएगी क्यूंकि आज उसकी चूत फटने वाली थी।

मैं दुबारा से नीचे उसकी चूत पर आया और फिर से उसकी चूत चाटने लगा। चाटते हुए ही मैंने ढेर सारा थूक मीनाक्षी की चूत के ऊपर और अन्दर भर दिया।

मैंने पास में पड़े अपने और मीनाक्षी के कपड़े उठा कर एक तकिया सा बनाया और उसकी गांड के नीचे दे दिया जिससे उसकी चूत थोड़ा ऊपर की ओर होकर सामने आ गई।

मैंने लंड दुबारा मीनाक्षी की चूत पर लगाया और एक हल्का सा धक्का लगाया तो मीनाक्षी दर्द के मारे उछल पड़ी।

रात का समय था और अगर मीनाक्षी चीख पड़ती तो पूरी कॉलोनी उठ जाती।

मैंने रिस्क लेना ठीक नहीं समझा और अपनी जेब से रुमाल निकाल कर उसको गोल करके मीनाक्षी के मुँह में ठूस दिया। मीनाक्षी मेरी इस हरकत पर हैरान हुई पर मैंने उसको बोला कि ऐसा करने से तुम्हारी आवाज बाहर नहीं आएगी।

वो मुँह में कपड़े के कारण कुछ बोल नहीं पा रही थी।

मैंने अब बिना देर किये किला फतह करने की सोची और दुबारा से लंड को चूत पर रख कर एक जोरदार धक्के के साथ अपने लंड का सुपाड़ा मीनाक्षी की कमसिन कुंवारी चूत में घुसा दिया।

मीनाक्षी दर्द के मारे छटपटाने लगी पर रुमाल मुँह में होने के कारण उसकी आवाज अन्दर ही घुट कर रह गई।

मैंने उचक कर फिर से एक जोरदार धक्का लगा कर लगभग दो इंच लंड उसकी चूत में घुसा दिया। सच में मीनाक्षी की चूत बहुत टाइट थी, दो तीन इंच लंड घुसाने में ही मुझे पसीने आ गए थे।

मुझे पता था कि अब अगले ही धक्के में मीनाक्षी का शील भंग हो जाएगा तो मैंने लंड को वापिस खींचा और अपनी गांड का पूरा जोर लगा कर धक्का मारा और लंड शील को तोड़ता हुआ लगभग पाँच इंच चूत में घुस गया।
 
धक्का जोरदार था सो मीनाक्षी सह नहीं पाई और थोड़ा छटपटा कर लगभग बेहोशी की हालत में चली गई। मैंने नीचे देखा तो मीनाक्षी की चूत से खून की एक धारा सी फूट पड़ी थी जो मेरे लंड के पास से निकाल कर नीचे पड़े कपड़ों पर गिर रही थी। मैंने जल्दी से उसकी गांड के नीचे से कपड़े निकाल कर साइड में किये और जितना लंड अन्दर गया था उसको ही आराम आराम से अन्दर बाहर करने लगा।

लंड तो जैसे किसी शिकंजे में फंस गया था, बड़ी मुश्किल से लंड अन्दर बाहर हो रहा था।

कुछ देर मैं ऐसे ही करता रहा और फिर करीब पांच मिनट के बाद मीनाक्षी को कुछ होश सा आया। उसकी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी, उसने कपड़ा मुँह से निकालने की विनती की तो मैंने रुमाल उसके मुँह से निकाल दिया।

‘चाचू… प्लीज बाहर निकालो इसको… बहुत दर्द हो रहा है, मैं नहीं सह पाऊँगी।’ मीनाक्षी ने रोते रोते कहा।

‘अरे तुम तो वैसे ही घबरा रही थी… देखो तो ज़रा पूरा घुस गया है और अब मेरी स्वीटी जान को दर्द नहीं होगा क्योंकि जो दर्द होना था वो तो हो चुका, अब तो सिर्फ मजे ही मजे हैं।’

‘नहीं चाचू… मुझे अभी भी दर्द हो रहा है।’

मैंने उसको लंड अन्दर बाहर करके दिखाया कि देखो अब लंड ने अपनी जगह बना ली है और अब दर्द नहीं होगा। इन पांच मिनट में लंड ने सच में इतनी जगह तो बना ही ली थी कि सटासट तो नहीं पर आराम से लंड जितना चूत में घुस चुका था वो अन्दर बाहर हो रहा था।

जो दर्द मीनाक्षी को महसूस हो रहा था वो चूत फटने का दर्द था। चूत मेरे लंड के करारे धक्के के कारण किनारे से थोड़ा सा फट गई थी जिसमें धक्के लगने से दर्द होता था।

मैंने फिर से लंड एक सधी हुई स्पीड में चूत के अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया, हर धक्के के साथ मीनाक्षी कराह उठती थी।

चार-पांच मिनट तो मीनाक्षी हर धक्के पर कराह रही थी पर उसके बाद उसकी दर्द भरी कहराहट के साथ साथ मादक आहें भी निकलने लगी थी।

वैसे तो अभी भी मेरा लगभग दो इंच लंड बाहर था पर मुझे पता था कि जितना भी लंड उसकी चूत में गया है वो भी उस कमसिन हसीना के लिए ज्यादा था।

मैंने अब धक्कों की स्पीड तेज करनी शुरू कर दी थी। मीनाक्षी की चूत ने भी कुछ पानी छोड़ दिया था जिससे चूत अब चिकनी हो गई थी। अब तो मीनाक्षी भी अपनी गांड को कभी कभी उठा कर लंड का स्वागत करने लगी थी। अब दर्द के बाद मीनाक्षी को भी मज़ा आने लगा था।

मेरे धक्कों की स्पीड बढ़ती जा रही थी और हर धक्के के साथ मैं थोड़ा सा लंड और मीनाक्षी की चूत में सरका देता जिससे कुछ ही धक्कों के बाद मेरा पूरा लंड मीनाक्षी की चूत में समा गया और मीनाक्षी की भूरी भूरी रेशमी झांटों से मेरी काली घनी झांटों का मिलन हो गया।

चुदाई एक्सप्रेस अब अपनी अधिकतम स्पीड पर चल रही थी, तभी मीनाक्षी का बदन अकड़ने लगा, वो झड़ने वाली थी और कुछ ही धक्कों के बाद मीनाक्षी की चूत से पानी की धार निकल कर मेरे आंड गीले करने लगे थे।

झरने के बाद मीनाक्षी थोड़ा सा सुस्त हुई पर उसके झड़ने से मुझे फायदा यह हुआ कि चूत अब पहले से ज्यादा चिकनी हो गई और लंड अब सटासट चूत में अन्दर बाहर हो रहा था।

करीब दो मिनट सुस्त रहने के बाद मीनाक्षी की चूत में फिर से हलचल होने लगी और वो हर धक्के के साथ अपनी गांड उठा उठा कर चुदवाने लगी ‘आह्ह्ह… उम्म्म्म… चाचू… बहुत मज़ा आ रहा है अब तो… जोर जोर से करो… ओह्ह्ह्ह… आह्ह्ह्ह… आईईई… उम्म्म… चोदो… जोर से चोदो मुझे… मेरे प्यारे चाचू… फाड़ दो… बहुत मज़ा…. आ रहा है चाचू..’ मीनाक्षी मस्ती के मारे बड़बड़ा रही थी और मैं तो पहले ही मस्त हुआ शताब्दी एक्सप्रेस की स्पीड पर चुदाई कर रहा था।

चुदाई लगभग पंद्रह मिनट तक चली और फिर मीनाक्षी जैसे ही दुबारा झड़ने को हुई तो मेरा लंड भी मीनाक्षी की चूत में अपने गर्म गर्म पानी से ठंडक पहुँचाने को तैयार हो गया।

बीस पच्चीस धक्के और लगे और फिर मीनाक्षी और मैं दोनों ही एक साथ झड़ गये। जैसे ही मीनाक्षी को अपनी चूत में मेरे वीर्य का अहसास हुआ वो मस्ती के मारे हवा में उड़ने लगी और उसने मुझे कसकर अपनी बाहों में भर लिया और टांगों को भी मेरे कूल्हों पर लपेट कर अपने से ऐसे जकड़ लिया जैसे वो मेरे लंड को अपनी चूत से अलग ही ना करना चाहती हो।

हम दोनों ही जोरदार ढंग से झड़े थे। मीनाक्षी अपनी पहली चुदाई के जोश में और मैं अपने लंड को मिली कमसिन चूत को फाड़ने के जोश में!

हम दोनों आधा घंटा भर ऐसे ही लिपटे रहे, दोनों को जैसे पूर्ण संतुष्टि के कारण नींद सी आने लगी थी।

तभी अचानक बाहर से कोई कार गुजरी और उसके हॉर्न ने जैसे हमें नींद से उठाया, हम दोनों एक दूसरे से अलग हुए।

मीनाक्षी तो अभी भी टांगें चौड़ी किये सीधी लेटी हुई थी और चूत से मेरा वीर्य उसकी चूत के पानी से मिलकर बह रहा था। देख कर लगता था कि जैसे मेरे लंड से बहुत पानी निकला था।

मैंने मीनाक्षी को उठाया, उसने उठकर अपनी चूत और मेरे लंड को साफ़ किया। घड़ी देखी तो उसमें रात के तीन बज रहे थे।

लगभग दो घंटे से हम दोनों छत पर चुदाई एक्सप्रेस पर सवार थे।

समय का पता ही नहीं लगा कि कब बीत गया।

मीनाक्षी उठ कर कपड़े पहनने लगी तो मेरा ध्यान गया कि उसकी टी-शर्ट पर चूत से निकले खून के निशान थे। मैंने उसको वो दिखाए और समझाया की नीचे जाकर इन कपड़ों को धो कर डाल दे।

खून देख कर वो थोड़ा घबराई पर फिर उसने खून वाले हिस्से को चूम लिया।

तब तक मैंने भी अपना पजामा पहन लिया था। मीनाक्षी ने भी पजामा तो पहन लिया पर टी-शर्ट नहीं पहनी। अब हम दोनों का ऊपर का बदन नंगा था। वो एकदम से आई और मुझसे लिपट गई, मैंने भी उसके होंठो पर होंठ रख दिए।

कुछ देर ऐसे ही रह कर मैंने मीनाक्षी को टी-शर्ट पहनने को बोला तो उसने मना कर दिया।

मैंने बहुत समझाया की ऐसे ठीक नहीं है पर वो नहीं मानी।

फिर हम नीचे की तरफ चल दिए।

अन्दर बिलकुल शांति थी, नाईट बल्ब की लाइट में हम सीढ़ियाँ उतरने लगे। मूसल जैसे लंड से चुदाई के कारण मीनाक्षी चल नहीं पा रही थी। सीढ़ियाँ उतरते हुए तो मीनाक्षी की आह्ह निकल गई।

मैंने बिना देर किये उसको गोद में उठाया और नीचे लेकर आया। नीचे आकर मीनाक्षी बाथरूम में घुस गई और मैं भी बिना देर किये अमन के कमरे में चला गया।

अँधेरे के कारण मैं मीनाक्षी की चूत की हालत तो नहीं देख पाया पर जब मैंने अपना लंड देखा तो हल्का सा दर्द महसूस हुआ। लंड कई जगह से छिल सा गया था। पर खुश था एक कमसिन कुंवारी चूत की शील तोड़ कर।
 
सुबह हम दोनों ही देर से उठे, दस बज चुके थे, रोहतास भाई ऑफिस जा चुके थे, कोमल भाभी रसोई में थी, अमन भी दिखाई नहीं दे रहा था, ताई जी ड्राइंग रूम में बैठी थी।

भाभी से मीनाक्षी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसको बुखार और सर दर्द है।

मैं उसके कमरे में गया तो उसने दूसरी टी-शर्ट पहनी हुई थी और वो बेड पर लेटी हुई थी।

‘देखो ना चाचू… क्या हाल कर दिया तुमने मेरा… अभी तक दर्द हो रहा है।’

मैं उसके पास बेड पर बैठ गया और एक हाथ उसकी चूची पर रख दिया और धीरे धीरे सहलाने लगा। मीनाक्षी ने भी मेरे हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया।

‘कहाँ दर्द हो रहा है मेरी जान को?’

‘क्या चाचू आप भी ना… और कहाँ दर्द होगा… वहीं हो रहा है जहाँ आपने रात को…’ कहते हुए मीनाक्षी शर्मा गई।

मैंने बिना देर किये दूसरा हाथ उसकी चूत पर रख दिया।

हाथ लगते ही मीनाक्षी की दर्द के मारे आह्ह्ह निकल गई। मैंने हाथ लगा कर देखा तो चूत वाला हिस्सा सूज कर डबल रोटी जैसा हो गया था।

मैंने उसके पजामे को उतार कर देखना चाहा तो मीनाक्षी में मुझे रोकने की कोशिश की पर मैंने फिर भी उसके पजामे को थोड़ा सा नीचे किया और उसकी चूत देखने लगा।

रात को मस्ती में मैंने शायद ज्यादा ही जोर से चोद दिया था, चूत बुरी तरह से सूजी हुई थी और चूत का मुँह बिल्कुल लाल हो रहा था।

मैंने बिना देर किये उसकी चूत पर एक प्यार भरा चुम्मा लिया और फिर पजामा दुबारा ऊपर कर दिया।

‘मीनाक्षी… मन तो नहीं है पर मुझे वापिस जाना है!’

मेरी बात सुनते ही मीनाक्षी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली- मुझे छोड़ कर चले जाओगे?

‘नहीं मेरी जान… पर वापिस तो जाना ही पड़ेगा ना.. मैं ज्यादा दिन तो यहाँ नहीं रह सकता ना!’

मेरी बात सुनते ही मीनाक्षी की आँखों में आँसू आ गये।

मैंने उसको जल्दी ही वापिस आने का वादा भी किया पर वह मुझे अपने से दूर नहीं करना चाहती थी। उसकी आँखें ही बता रही थी कि वो मुझ से कितना प्यार करने लगी थी।

तभी बाहर अमन की आवाज सुनाई दी, मैं जल्दी से कमरे से बाहर निकल गया।

अमन को जब मैंने वापिस जाने की बात कही तो वो भी मुझे रुकने के लिए बोलने लगा और फिर तो ताई जी और कोमल भाभी भी मुझे रुकने के लिए कहने लगी।

जाना तो मैं भी नहीं चाहता था, मीनाक्षी का प्यार मुझे रुकने के लिए बाध्य कर रहा था।

मैंने अपने घर पर फ़ोन करके दो दिन बाद आने का बोल दिया। जिसे सुनकर सभी खुश हो गये और जब मीनाक्षी को पता लगा कि मैं दो दिन रुकने वाला हूँ तो उसकी ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा।

फिर मैं अमन के साथ घूमने निकल गया और रास्ते में मैंने अमन की नजर बचा कर एक मेडिकल स्टोर से दर्द और सूजन कम करने वाली गोली ली।

करीब दो घंटे बाद हम घर पहुंचे और मैंने सबकी नजर बचा कर वो गोलियाँ मीनाक्षी को दे दी। फिर एक तो घंटे अमन और मैं रूम में बैठ कर डीवीडी प्लेयर पर मूवी देखते रहे।

शाम को पांच बजे जब हम कमरे से बाहर आये तो मीनाक्षी भी ड्राइंग रूम में अपनी दादी के साथ बैठी थी। गोलियाँ लेने से उसको आराम मिल गया था और सूजन भी कम हो गई थी।

सभी बैठे थे कि मयंक ने पार्क चलने की जिद की और फिर अमन, मैं, मीनाक्षी और मयंक चारों घूमने निकल पड़े और रॉक गार्डन और सुखना झील पर घूम कर रात को करीब साढ़े नौ बजे घर वापिस आये।

मीनाक्षी अब बिल्कुल ठीक थी।

सारा समय मीनाक्षी मेरे साथ साथ ही रही। जब मैंने उसको रात के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो उसने शर्मा कर गर्दन नीचे कर ली और जब मैंने दोबारा पूछा तो उसने शरमा कर हाँ में गर्दन हिला दी।

घर आये तो रोहतास भाई आ चुके थे और भाभी ने भी खाना बना लिया था।
 
सबने खाना खाया और ग्यारह बजे तक सभी साथ में बैठ कर बातें करते रहे। मैं और मीनाक्षी ही थे जिन्हें उन सब पर गुस्सा आ रहा था कि ये लोग सो क्यों नहीं जाते ताकि हम अपना प्यार का प्रोग्राम शुरू कर सकें।

फिर सबसे पहले अमन अपने कमरे में गया और फिर मयंक भी… दोनों घूम घूम कर थक गए थे।

फिर ताई जी भी अपने कमरे में चली गई।

जब मैं भी उठ कर कमरे की तरफ चला तो मीनाक्षी ने आँखों आँखों में पूछा कि ‘कहाँ जा रहे हो?’ तो मैंने उसको थोड़ी देर बाद आने का इशारा किया।

कमरे में गया तो अमन सो चुका था और उसके खराटे चालू थे।

दस पंद्रह मिनट के बाद मैंने कमरे का दरवाजा खोल कर देखा तो रोहतास और भाभी भी अपने कमरे में जा चुके थे और मीनाक्षी अकेली बैठी टीवी देख रही थी।

मैं जाकर मीनाक्षी के पास बैठ गया। हम दोनों ने एक दूसरे को किस किया और फिर मीनाक्षी उठ कर गई और पहले अपने पापा के कमरे में देखा कि वो सो गये है या नहीं… फिर दादी के कमरे में देखा और अमन को तो मैं देख कर ही आया था।

सबके सब सो चुके थे।

आते ही मीनाक्षी मेरे गले से लग गई और मुझे ‘आई लव यू’ बोला। मैंने भी उसको ‘आई लव यू’ बोला और उसको अपनी बाहों में भर कर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

मीनाक्षी ने मुझे रोका और ऊपर चलने का इशारा किया। मीनाक्षी भी चुदने को बेताब थी।

मैंने उसको अपनी गोद में उठाया और ऐसे ही उसको लेकर छत पर चला गया। आज छत का नजारा कुछ बदला हुआ था। आज छत पर चटाई की जगह एक पुराना गद्दा पड़ा हुआ था।

मीनाक्षी आज पूरी तैयारी के करके आई थी।

जब मैं गद्दे पर बैठने लगा तो मीनाक्षी ने मुझे रोका और एक कोने में रखे हुए एक लिफ़ाफ़े से उसने गुलाब की पंखुड़ियाँ निकाल कर गद्दे पर बिखेर दी।

मैं हैरान हुआ उसको देख रहा था।

ये सब करने के बाद मीनाक्षी मेरे पास आई और मेरे गले से लग गई, मुझे रुकने के लिए थैंक यू बोला।

मैंने भी उसको अपनी बाहों में भर लिया और एक बार फिर से हम दोनों के होंठ आपस में मिल गए। दोनों ही बहुत देर तक एक दुसरे को चूमते चाटते रहे और इसी बीच दोनों ने ही एक दूसरे के कपड़े उतार कर साइड में डाल दिए।

अब हम दोनों जन्मजात नंगे थे।

मैंने मीनाक्षी के नंगे बदन को गद्दे पर गुलाब की पंखुड़ियों पर लेटाया और उसके अंग अंग को चूमने लगा और उसकी चूचियों को मसलने लगा। बहुत देर तक मैंने उसकी चूचियों को मसला और चूसा, फिर मैंने उसकी चूत की तरफ का रुख किया।

दवाई असरदार थी, चूत की सुजन बिल्कुल ख़त्म हो चुकी थी और चूत अब अपने सामान्य रूप में थी।

मैंने बिना देर किये अपनी जीभ से उसकी चूत को चाटना शुरू किया, मीनाक्षी मस्ती से लहरा उठी थी। जब मैं उसकी चूत चाट रहा था तो मीनाक्षी ने भी हाथ बढ़ा कर मेरा लंड पकड़ लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी।

‘राज… मेरी जान… अब देर ना करो… आज मुझ से सब्र नहीं होगा!’ आज मीनाक्षी ने पहली बार मुझे मेरे नाम से पुकारा था।

कण्ट्रोल तो मुझ से भी नहीं हो रहा था, मैं उठा और उसकी टाँगें चौड़ी करके बीच में बैठ कर जब मैंने मेरे लंड का लाल लाल सुपाड़ा उसकी चूत पर टिकाया तो उसने मुझे रोका।

जब मैंने कारण पूछा तो उसने शरमाते हुए गद्दे के नीचे से वैसलीन की डब्बी निकाल कर मुझे पकड़ा दी।

एक दिन में ही यह लड़की कितनी सयानी हो गई थी।

मैंने मेरे लंड पर और उसकी चूत पर अच्छे से वैसलीन लगाईं और दुबारा से लंड उसकी चूत पर टिकाया तो उसने मुझे फिर रोका। मैं पूछा तो उसने गद्दे के नीचे से कोहिनूर कंडोम का पैकेट निकाल कर मेरे हाथ में थमा दिया।

‘यह तुम्हें कहाँ मिल गया?’

‘मम्मी के कमरे से निकाला है… मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती… अगर मैं प्रेगनेंट हो गई तो..’

लड़की कुछ ज्यादा ही समझदार हो गई थी।

मैंने उसको लंड पर कंडोम लगाने का कहा तो उसे लगाना नहीं आया। मैंने खुद कंडोम अपने लंड पर चढ़ाया और फिर तनतनाया हुआ लंड मीनाक्षी की चूत पर रख दिया। मैंने उसकी आँखों में देखते हुए चुदाई स्टार्ट करने की परमिशन मांगी तो उसने आँखों के इशारे से हामी भरी।

अब देर नहीं कर सकता था, मैंने लंड को धीरे से चूत पर दबाया तो मीनाक्षी को दर्द महसूस हुआ, दर्द की लकीरें उसके चेहरे पर नजर आ रही थी।

मैंने एक जोरदार धक्का लगाया तो वैसलीन की चिकनाई के कारण लगभग दो तीन इंच लंड चूत में समा गया।

मीनाक्षी ने खुद अपने हाथ से अपने मुँह को बंद करके अपनी चीख को रोका, उसकी आँखों में आँसू आ गए थे।

मैंने अपनी गलती को समझते हुए उसको सॉरी बोला और फिर उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और फिर धीरे धीरे लंड को उसकी चूत में सरकाने लगा।

दो तीन मिनट की जद्दोजहद बाद मैंने किसी तरह आराम आराम से अपना पूरा लंड मीनाक्षी की चूत की गहराइयों में उतार दिया। मीनाक्षी को दर्द तो हुआ था पर ज्यादा नहीं।

पूरा लंड अन्दर जाने के बाद मैं कुछ देर के लिए रुका और मीनाक्षी की चूचियों को चूसने लगा। बीच बीच में मैं उसके चूचुक पर दांतों से काट भी लेता था। ऐसा करने से उसकी सिसकारी निकल जाती, मेरे ऐसा करने से वो चूत का दर्द भूल गई।

मैंने धीरे धीरे चुदाई शुरू की और कुछ ही देर में मीनाक्षी भी अपने चूतड़ उठा उठा कर लंड लेने लगी। पहले धीरे धीरे करते हुए मैंने अपनी स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी और कुछ ही देर में धुँआधार चुदाई शुरू हो गई।

फिर तो बीस मिनट तक मैंने मीनाक्षी की जबरदस्त चुदाई की। मीनाक्षी कम से कम दो बार झड चुकी थी और फिर मैंने भी ढेर सारा वीर्य कंडोम में इकट्ठा कर दिया।

उस रात तीन बार मैंने मीनाक्षी को चोदा और सुबह चार बजे हम दोनों नीचे आये।

उसके अगली रात को भी तीन बार मैंने मीनाक्षी की चुदाई की।

फिर उससे अगले दिन मेरे घर से फ़ोन आ गया और फिर मैं वापिस अपने घर के लिए निकल पड़ा।

जब मैं वापिस जाने के लिए चला तो मीनाक्षी मुझसे लिपट कर बहुत रोई थी।

उसके बाद भी एक दो बार मैं चंडीगढ़ गया और मीनाक्षी की जमकर चुदाई की। मीनाक्षी मुझसे शादी के सपने देखने लगी थी जो हमारे रिश्ते में संभव नहीं था।

बस यही कारण था की मैंने मीनाक्षी से थोड़ी दूरी बना ली, उसने भी कुछ दिन मेरा इंतज़ार किया और फिर मुझे बेवफा समझकर भुला दिया।

end
 
Back
Top