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नक़ली नाक

वहाँ पहुँच कर फ़रीदी की हिदायत पर पुलिस ने लाइब्रेरी को अच्छी तरह से घेर लिया और ख़ुद फ़रीदी, माथुर और दो इन्स्पेक्टर लाइब्रेरी के दरवाज़े के सामने कुछ फ़ासले पर छिप कर बैठ गये।

‘‘आपकी घड़ी में क्या टाइम हुआ है?’’ फ़रीदी ने माथुर से पूछा।

‘‘ग्यारह बज कर पंद्रह मिनट...!’’

‘‘बस, वह आता ही होगा, क्योंकि बारह बजे तक उसको यहाँ ज़रूर पहुँच जाना चाहिए।’’

इतने में कोई शख़्स तेज़ी से लाइब्रेरी की तरफ़ आता हुआ दिखायी दिया।

‘‘वह देखिए, कोई आ रहा है।’’ एक इन्स्पेक्टर ने इशारा किया।

‘‘माथुर ने पिस्तौल सँभाला।

‘‘ठहरिए।’’ फ़रीदी ने धीरे से कहा। ‘‘यह हमीद है।’’

हमीद फ़रीदी के क़रीब आ कर बोला। ‘‘अभी तक दोनों जगहों पर कोई वारदात नहीं हुई।’’

‘‘आयँ...!’’ फ़रीदी ने हैरत से कहा।

‘‘जी हाँ... बहरहाल, पुलिस वहाँ मौजूद है।’’

‘‘अच्छा... ख़ैर, तुम बैठ जाओ।’’ और फ़रीदी कुछ सोचने लगा।

बैठे-बैठे जब काफ़ी देर हो गयी तो फ़रीदी ने फिर वक़्त पूछा। ‘‘अब ठीक बारह बजे हैं...!’’ माथुर ने जवाब दिया।

फ़रीदी अफ़सोस करते हुए बोला। ‘‘अब कैदख़ाने के अन्दर चलना चाहिए।’’

‘‘लेकिन वहाँ फिर कोई नयी मुसीबत न पेश आ जाये।’’ हमीद बोला।

‘‘जो कुछ भी हो, लेकिन अब हम लोगों को अन्दर चलना ही पड़ेगा, क्योंकि मुझे य़कीन हो रहा है कि वह कुछ भाँप गया है।’’

‘‘चलिए, मालूम होता है कि आपको ‘कबूतरख़ाना’ बहुत पसन्द आ गया है।’’ हमीद उठते हुए बोला।

फ़रीदी, हमीद, माथुर और वे दोनों सब-इन्स्पेक्टर लाइब्रेरी की तरफ़ गये। लाइब्रेरी में पहुँच कर फ़रीदी ने कालीन हटाया और एक छोटा बटन जो ज़मीन में लगा हुआ था। उसको दबाया। तख़्ता हट गया जिससे अन्दर का कमरा साफ़ दिखायी देने लगा। फ़रीदी पिस्तौल लिये हुए धीरे से उसमें कूदा, फिर हमीद, माथुर और इन्स्पेक्टर भी कमरे में कूद पड़े। अन्दर बिलकुल अँधेरा था। फ़रीदी ने टॉर्च जलाया। कमरे में कोई नहीं था। अलबत्ता बहुत-सी चीज़ें बिखरी पड़ी थीं और कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था।

‘‘कमरे का दरवाज़ा कैसे खुला, यह तो बाहर से बन्द था?’’ फ़रीदी बोला।

‘‘अच्छा हमीद, तुम पिछले दरवाज़े से कुछ सिपाहियों को ले कर आओ जिधर से मैं तुम्हारे पास आया था। ज़रा होशियार रहना।’’

हमीद छत पकड़ कर ऊपर चढ़ गया और फ़रीदी उस कमरे से बाहर निकला। टॉर्च की रोशनी में उसने देखा कि चार आदमी ज़मीन पर मुर्दा पड़े हुए हैं।

‘‘देखा आपने... मुझे पहले ही से य़कीन था कि वह भाग गया।’’ फ़रीदी माथुर से बोला।

‘‘लेकिन इसमें भी उसकी कोई चाल न हो।’’ माथुर बोला।

इतने में हमीद भी सिपाहियों को ले कर दूसरे दरवाजे से अन्दर आया। तहख़ाने का कोना-कोना देखा गया, लेकिन वहाँ कोई न था सिवा इसके कि कबूतरख़ाने पर उन लोगों को दो लाशें और मिलीं।

फ़रीदी अचानक कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘माथुर साहब जल्दी से एक गाड़ी का इन्तज़ाम कीजिए। वह यहाँ से बच कर निकल गया। लेकिन अभी ज़्यादा देर नहीं हुई। जाते हुए वह अपने उन साथियों को मार गया है।’’

सब लोग जल्दी से तहख़ाने के बाहर निकल आये और फ़ौरन एक सिपाही को गाड़ी लाने के लिए भेजा गया। फ़रीदी बेचैनी से टहलने लगा। उसकी आँखों में एक ख़ास क़िस्म की चमक पैदा हो गयी थी।

‘‘हमीद, ज़रा मेरे साथ आओ।’’ फ़रीदी, हमीद को लिये हुए फिर तहख़ाने में दाख़िल हुआ और बाहर के कमरे का अच्छी तरह से जायज़ा लेने लगा। वह मेज़ की दराज़ को खोल कर कुछ ढूँढने लगा जिसमें कुछ बेकार काग़ज़ात के अलावा और कुछ नहीं था। फिर उसने इधर-उधर कुछ तलाश किया, लेकिन कोई ऐसी चीज़ न मिली जो उसके लिए काम आती... अलबत्ता उसने अलमारी में से कुछ ख़त और कुछ काग़ज़ात निकाल कर अपनी जेब में रखे और हमीद से बोला। ‘‘जल्दी चलो।’’

दोनों जैसे ही बाहर निकले वैसे ही गाड़ी आ गयी। माथुर ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि वे सारी लाशों को उठा कर कोतवाली ले जायें और कुछ सिपाही यहाँ रह जायें।

गाड़ी पर माथुर और दोनों इन्स्पेक्टर और कुछ सिपाही बैठ गये।

‘‘हमीद, तुम भी बैठ जाओ।’’ फ़रीदी कहता हुआ ड्राइवर की बग़ल में बैठ गया। ‘‘अख़्तर लॉज जल्दी चलो।’’ फ़रीदी ने ड्राइवर से कहा।

थोड़ी देर बाद गाड़ी अख़्तर लॉज के सामने खड़ी थी। फ़रीदी कूद कर उतरा और सीधा सईदा के कमरे की तरफ़ बढ़ा। सईदा के कमरे में रोशनी हो रही थी। फ़रीदी ने दरवाज़ा खटखटाया।

‘‘कौन...?’’ सईदा ने पूछा।

‘‘मैं हूँ फ़रीदी।’’

सईदा ने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा। ‘‘कहिए, ख़ैरियत तो है?’’

‘‘हाँ, सब ठीक है। पहले यह बताओ कि लेफ़्टिनेंट बाक़िर की तुमसे कब मुलाक़ात हुई थी?’’

‘‘तीन दिन पहले... मगर आप इस क़दर घबरा कर भैया को क्यों पूछ रहे हैं।’’ सईदा ने सवाल किया।

‘‘कुछ नहीं, तुम परेशान न हो... यह मैं बाद में बता दूँगा।

उन्होंने तुमसे कुछ बताया था...?’’ फ़रीदी ने सवाल किया।

‘‘हाँ... वे कह रहे थे कि मैं एक काम से कलकत्ता जाने वाला हूँ।’’ सईदा ने जवाब दिया।

‘‘हूँ... और कुछ कह रहे थे।’’

‘‘नहीं।’’

‘‘अच्छा, अब मैं जा रहा हूँ, वक़्त बिलकुल नहीं, फिर सारी कहानी बताऊँगा। नवाब साहब वग़ैरह से कह देना कि जाबिर बच कर निकल गया। हम लोग उसका पीछा करने जा रहे हैं।’’ फ़रीदी यह कहता हुआ तेज़ी से निकला और गाड़ी में आ कर बैठ गया।

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समुद्री लड़ाई

रात के दो बजे थे, मोटर कार तेज़ी से सड़क को पीछे छोड़ते हुए भागी जा रही थी। फ़रीदी ड्राइवर से और तेज़ चलने को कह रहा था।

‘‘लेकिन मुझे तो डर लगा रहा है।’’ हमीद ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘क्यों...!’’ फ़रीदी ने पूछा।

‘‘इसलिए कि अभी यमराज उस आदमी की रूह पर क़ब्ज़ा करने के लिए यहाँ आयेंगे और कहीं वे भूले से हम लोगों की तरफ़ घूम पड़े तब...?’’ हमीद ने इस तरह कहा कि सबको हँसी आ गयी।

‘‘तुम अपनी हरकत से बाज़ नहीं आओगे हमीद...!’’ फ़रीदी बोला।

‘‘और यही शिकायत मुझे आपसे है, बैठे-बिठाये एक मुसीबत मोल ली है। न मालूम बेचारी शहनाज़ का क्या हाल है।’’ हमीद ने एक ठण्डी साँस ले कर कहा।

‘‘अच्छा, तुम अपनी बकवास बन्द करो।’’

‘‘लेकिन मैं फिर आपसे कहता हूँ जैसा कि मैंने उसकी बात सुनी है, उससे यही अन्दाज़ा होता है कि वे हुण्डियाँ जो उसने हासिल की हैं, बीस तारीख़ के बाद बेकार हो जायेंगी। आज पंद्रह तारीख़ है, इसलिए मेरा ख़याल है कि वह कलकत्ता में बिलकुल नहीं ठहरेगा, बल्कि सीधा जिनीवा जायेगा, इसलिए हम लोगों को कलकत्ता पहुँचने के बाद हवाई अड्डे पर पहुँचना चाहिए।’’ हमीद ने कहा।

‘‘तुम बिलकुल ठीक कहते हो... हम लोगों को सीधा हवाई और समुद्री अड्डे पर पहुँचना चाहिए।’’ फ़रीदी बोला।

रास्ते भर फ़रीदी ड्राइवर से कार की रफ़्तार तेज़ करने को कह रहा था। सुनसान सड़क पर कार अपनी पूरी रफ़्तार से दौड़ रही था, लेकिन फ़रीदी चाहता था कि किसी तरह उड़ कर जल्दी से कलकत्ता पहुँच जाये।

‘‘ड्राइवर... और तेज़...!’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘हुज़ूर, कार अपनी पूरी रफ़्तार में है...’’ उसने जवाब दिया।

फ़रीदी ‘‘अच्छा’’ कह कर चुप हो गया और कलकत्ता पहुँचने के बाद के प्रोग्राम सोचने लगा।

दिन काफ़ी चढ़ चुका था। भूख के मारे हमीद का बुरा हाल था, क्योंकि आज कई रोज़ से उसे ठीक से खाना नहीं मिला था, लेकिन फ़रीदी के डर से वह बिलकुल ख़ामोश था।

कलकत्ता क़रीब आ गया था क्योंकि आबादी का सिलसिला शुरू हो गया था। थोड़ी देर बाद कार शहर में दाख़िल हुई।

हवाई अड्डे पर पहुँच कर फ़रीदी को मालूम हुआ कि कल रात से इस वक़्त तक कोई जहाज जिनीवा नहीं गया। अब फ़रीदी ने ड्राइवर से समुद्री अड्डे पर चलने को कहा।

वहाँ जा कर वह नौसेना के अफ़सर से मिला और अपना ‘आई कार्ड’ दिखाते हुए बोला। ‘‘हम लोग रामगढ़ से एक बहुत बड़े मुजरिम का पीछा करते हुए आ रहे हैं। वह भेस बदलने में माहिर है। उसका पकड़ा जाना बहुत ज़रूरी है। क्या कोई ऐसी सूरत है कि वह जिनीवा उतरने से पहले ही गिरफ़्तार कर लिया जाये।’’

‘‘यहाँ से वायरलेस किया जा सकता है, लेकिन जब वह भेस बदलने में माहिर है तो वह कैसे पहचाना जा सकता है।’’ नौसेना के अफ़सर ने जवाब दिया।

‘‘नहीं, वायरलेस से काम नहीं चल सकता क्या यू-बोट से हम लोग जहाज़ का पीछा नहीं कर सकते?’’

‘‘लेकिन यू-बोट के लिए आपको इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस और कमाण्डेंट चीफ़ अफ़सर ऑफ़ ईस्टर्न कमाण्ड से इजाज़त लाना होगी।’’ ऑफ़िसर ने कहा।

‘‘अच्छी बात है।’’ फ़रीदी यह कहता हुआ सब लोगों को ले कर इन्स्पेक्टर जनरल के बँगले की तरफ़ चला गया।

जैसे ही माथुर ने अपना कार्ड भेजा आई.जी. ने फ़ौरन उन लोगों को बुलवाया, वह माथुर को देखते हुए बोला। ‘‘मैं तो ख़ुद कल आपके यहाँ आ रहा था... वह इण्टरनेशनल डाकू है और उसने सरकार के कुछ ज़रूरी काग़ज़ात भी हासिल कर लिये हैं। उसका गिरफ़्तार होना बहुत ज़रूरी है।’’

फ़रीदी और माथुर ने सारे हालात बताये, जिसे सुन कर आई.जी. ने फ़रीदी से कहा।

‘‘मिस्टर फ़रीदी, हम आपके बेहद शुक्रगुज़ार हैं कि आपने अपनी जान की परवाह न करते हुए उसका पीछा नहीं छोड़ा। लेकिन क्या आपको इसका य़कीन है कि वह उसी जहाज़ से जिनीवा गया होगा और उसने अपना हुलिया बदल दिया होगा। आप उसे कैसे पहचान सकते हैं?’’ आई.जी. ने पूछा।

‘‘यह सब आप मेरे ऊपर छोड़ दीजिए, लेकिन अगर ज़रा भी देर की गयी और जहाज जिनीवा पहुँच गया तो फिर वह हाथ नहीं लग सकता।’’ फ़रीदी बोला।

‘‘अच्छा, तो मैं अभी कमाण्डेंट इन चीफ़ साहब से मिल कर आता हूँ, आप लोग मेरा यहीं इन्तज़ार कीजिए।’’ वह बोले।

‘‘मैं थोड़ी देर के लिए बाज़ार जाऊँगा, क्योंकि अगर जहाज़ पर उसने हम लोगों को असली हालत में देख लिया तो मुश्किल हो जायेगी।’’ फ़रीदी ने कहा।

आई.जी. साहब तो कमाण्डेंट इन चीफ़ के यहाँ चले गये और फ़रीदी हमीद को ले कर बाज़ार चला गया। माथुर और इन्स्पेक्टर वहीं उन लोगों के इन्तज़ार में बैठ गये।

फ़रीदी बाज़ार से कुछ सामान ख़रीद कर जब लौटा तो मालूम हुआ कि अभी आई.जी. साहब नहीं आये हैं। वह उन सब लोगों को चपरासी के साथ बाथरूम में ले गया।

थोड़ी देर बाद फ़रीदी मारवाड़ी, माथुर साहब प्रोफ़ेसर और इन्स्पेक्टर सेठ और हमीद जहाज़ के ख़लासी बने हुए बाथरूम से बाहर निकले।

आई.जी. ने कार से उतरते हुए जब उन लोगों को देखा फिर मुस्कुरा कर बोले। ‘‘आप लोगों ने ख़ूब भेस बदला है। अच्छा यह ऑर्डर लीजिए। आप लोगों को और किसी चीज़ की ज़रूरत है?’’ आई.जी. ने सवाल किया।

‘‘जी नहीं... अब बाक़ी काम हम लोग अंजाम दे लेंगे।’’ फ़रीदी ने कहा और सब लोगों को ले कर कार से समुद्री अड्डे की तरफ़ रवाना हो गया।

आई.जी. ने नौसेना के अफ़सर को फ़ोन कर दिया था, यू-बोट यानी पनडुब्बी बिलकुल तैयार खड़ी थी।

फ़रीदी ने नौसेना के अफ़सर को हुक्म नामा देते हुए कहा, ‘‘शायद आपने जहाज़ के कप्तान को वायरलेस कर दिया होगा।

‘‘हाँ, मैंने उसको ज़रूरी हिदायतें दे दी हैं और जहाज़ की रफ़्तार कम कर देने को भी कह दिया है।’’ अफ़सर ने जवाब दिया।

‘‘बस, ठीक है... हमीद जल्दी से बैठो।’’ फ़रीदी पनडुब्बी के पास आ कर बोला और सब लोग जल्दी-जल्दी उसमें सवार हो गये और यू-बोट तेज़ी से पानी के अन्दर चल पड़ी।

‘‘बाप-रे-बाप... कितना ख़तरनाक सफ़र है।’’ हमीद डर कर बोला।

फ़रीदी ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और वक़्त देखते हुए बोला। ‘‘इस वक़्त ग्यारह बजे हैं। हम लोग उससे सिर्फ़ पाँच घण्टे पीछे हैं।’’

फ़रीदी के चेहरे पर अजीब तरह के रंग पैदा हो गये थे जिसे सिर्फ़ हमीद ही समझ सकता था। इसलिए उसने उस वक़्त फ़रीदी को छेड़ना मुनासिब नहीं समझा। यू-बोट तेज़ी से समन्दर की गहराइयों में भाग रही थी।

शाम हो चुकी थी, फ़रीदी की परेशानी बढ़ती जा रही थी। उसने कप्तान से पूछा तो मालूम हुआ कि सिर्फ़ एक घण्टे का फ़ासला और रह गया है। फ़रीदी हमीद वग़ैरह को ज़रूरी हिदायतें देने लगा।

एक घण्टे के बाद जहाज़ का सिगनल मिलना शुरू हुआ और थोड़ी देर बाद यू-बोट जहाज़ के बिलकुल क़रीब थी।

जहाज़ दो मिनट के लिए रुका और ये लोग जल्दी-जल्दी जहाज़ के बिलकुल निचले हिस्से में घुस गये, जहाज़ फिर चल पड़ा।

कप्तान ने उन लोगों को गुप्त रूप से सेकेण्ड क्लास के एक कैबिन में पहुँचा दिया और वे लोग मुसाफ़िरों की हैसियत से सफ़र करने लगे।

खाना खाने का वक़्त हो गया था। ये लोग खाने की मेज़ पर आ कर बैठ गये, जहाँ दूसरे मुसाफ़िर पहले से बैठे हुए थे। हमीद ने ख़लासी के भेस में आ कर मेज़ साफ़ की, जिस पर खाना लगा दिया गया। ये लोग खाने में लग गये। फ़रीदी खाना खाता जाता था और मुसाफिरों को ग़ौर से देखता भी जाता था। लेकिन किसी ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया।

खाना खाने के बाद सब लोग अपने कैबिन में लौट आये। थोड़ी देर बाद हमीद भी आ गया।

‘‘कुछ पता चला...!’’ फ़रीदी ने पूछा।

‘‘नहीं... मैं क़रीब-क़रीब पूरा जहाज़ घूम आया।’’ हमीद ने जवाब दिया।

‘‘अच्छा, अब तुम जा कर सो रहो... सुबह देखा जायेगा। इस वक़्त हो सकता है किसी को हम लोगों पर शक हो जाये।’’ फ़रीदी ने कहा।

हमीद चला गया। फ़रीदी, माथुर और दोनों इन्स्पेक्टर अपने-अपने बिस्तरों पर लेट गये। दिन भर की दौड़-धूप और रात भर जागने की वजह से यह लोग फ़ौरन सो गये।

सुबह-सवेरे ही फ़रीदी की आँख खुली। वह अपने कपड़े वग़ैरह ठीक करके कैबिन से बाहर निकला। क़रीब-क़रीब सभी मुसाफ़िर जाग चुके थे। ऊपर डेक पर कुछ लोग खड़े हुए सुबह के सुहावने मंज़र और समन्दर की ठण्डी हवाओं का आनन्द ले रहे थे। फ़रीदी भी डेक पर चढ़ गया और समन्दर की तरफ़ देखने लगा कि अचानक उसकी निगाह एक अंग्रेज़ पर पड़ी जो चमड़े के एक बटुए से तम्बाकू निकाल कर सिगरेट बना रहा था। फ़रीदी ने ग़ौर से बटुए की तरफ़ देखा और उसकी आँखें ख़ुशी से चमक उठीं और वह धीरे-धीरे डेक से उतरने लगा।

डेक से उतरते ही वह फ़ौरन अपने कैबिन में आ गया। माथुर और दोनों इन्स्पेक्टर भी जाग चुके थे।

‘‘आप लोग जल्दी से तैयार हो जाइए। दुश्मन मिल गया।’’ फ़रीदी ने माथुर से कहा।

‘‘कहाँ!’’ माथुर ने हैरत से पूछा।

‘‘अंग्रेज़ का भेस बदले हुए डेक पर खड़ा है। आप लोग अभी अपने-अपने पिस्तौल जेब में रख कर डेक पर फ़ौरन पहुँच जायें। लेकिन उसको ज़रा भी शक न होने पाये। मैं कप्तान के पास जा रहा हूँ, ताकि हमीद को आगाह कर दूँ।’’

फ़रीदी यह कहता हुआ जल्दी से कप्तान के कैबिन की तरफ़ चला गया और हमीद को हिदायतें दे कर वह फ़ौरन डेक पर पहुँच गया।

वह अंग्रेज़ इत्मीनान से सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश ले रहा था।
 
‘‘जाबिर, अगर तुम अपनी जगह से ज़रा भी हिले तो गोली तुम्हारे सीने के पार होगी।’’

उसने पलट कर देखा तो एक मारवाड़ी सामने पिस्तौल ताने खड़ा था।

अंग्रेज़ के चेहरे पर परेशानी फैल गयी... लेकिन फ़ौरन ही मुस्कुराहट पैदा करता हुआ बोला। ‘‘मिस्टर, आपको कुछ ग़लतफ़हमी हुई है... मैं वह...!’’

इतने में एक फ़ायर की आवाज़ सुनाई दी... और अंग्रेज़ चकरा कर ज़मीन पर गिर पड़ा... माथुर और वे दोनों इन्स्पेक्टर उस पर झपटे।

फ़रीदी चिल्लाया... लेकिन वे लोग बिलकुल क़रीब पहुँच चुके थे और अब माथुर का पिस्तौल उस अंग्रेज़ के हाथ में था।

हवा में दो फ़ायरों की आवाज़ें गूँजीं... अंग्रेज़ के हाथ से ख़ून बह रहा था और पिस्तौल ज़मीन पर पड़ा था... अब अंग्रेज़ माथुर और इन्स्पेक्टर की पकड़ में था।

‘‘आप लोगों ने तो कमाल ही कर दिया था।’’ फ़रीदी ने माथुर से कहा।

‘‘लेकिन भई, अभी तक मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि पहला फ़ायर कैसा था।’’ माथुर बोला।

‘‘वह देखिए...!’’ फ़रीदी ने डेक के किनारे इशारा किया... जहाँ एक आदमी ख़ून में लथपथ पड़ा था...‘‘यह जाबिर का आदमी है, जो पीछे से मेरे ऊपर हमला करना चाहता था... और हमीद ने उस पर फ़ायर कर दिया। फ़ायर की आवाज़ से उसने यह फ़ायदा उठाया जिसे आप लोग न समझ सके और यह दूसरा फ़ायर आप पर करना ही चाहता था कि मैंने गोली चला दी।’’

जाबिर को गिरफ़्तार करके फ़रीदी ने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस कर बँधवा दिया था और अब ये लोग उसी ‘यू-बोट’ से जाबिर को ले कर वापस हो रहे थे।

रास्ते में हमीद और माथुर ने फ़रीदी से बहुत सारे सवाल किये, लेकिन उसने यह कह कर टाल दिया कि ‘अब अदालत ही में मेरा बयान सुनना।’

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ख़ुलासा

नवाबज़ादा शाकिर के क़त्ल, शहर में आग़जनी, ख़ून, सरकारी काग़ज़ात की चोरी और दूसरे इल्ज़ामों के सिलसिले में जाबिर का मुक़दमा आज अदालत में पेश होने वाला था। नवाबज़ादा शाकिर के क़त्ल के सिलसिले में कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ पर दो मुक़दमे थे। अदालत में मुलज़िम के कटघरे में उन्हें भी देखा जा सकता था। कुँवर ज़फ़र की आँखें आज पहली बार छलक रही थीं। उन्होंने फ़रीदी की तरफ़ कई बार देखा और इशारों-ही-इशारों में रहम की दरख़्वास्त की।

जाबिर अकेला खड़ा था। तमाशाइयों का ताँता ऐसे भयानक आदमी को देखने के लिए बेताब था। उनकी समझ में नहीं आता था कि एक आदमी ऐसी बातें किस तरह कह सकता है जो उनकी समझ से ऊपर है। ख़ुद हमीद भी जाबिर के हालात को ज़्यादा नहीं जानता था। सिर्फ़ यही एक मामला ऐसा रूखा साबित हुआ था जिसमें उसे कोई औरत न मिल सकी थी और अगर मिली भी तो ज़बर्दस्ती बीवी बन कर धोखा दे गयी।

आख़िर, वह औरत कौन थी?

ग़ज़ाला और नवाब रशीदुज़्ज़माँ बहुत ख़ुश थे... उनका महबूब फ़रीदी जाबिर को पकड़ लाया था। कैसी-कैसी ग़लतफ़हमियों को उन्होंने अपने दिल में जगह दी थी।

बेचारा तारिक़ अपने नेवले शाकी के अफ़सोस में था, मगर फिर भी नाख़ुश नहीं था।

उदास सिर्फ़ सईदा थी। उसका दिल दुआएँ माँग रहा था कि कुँवर साहब बेगुनाह साबित हों।

इस अदालत में लेफ़्टिनेंट बाक़िर की ग़ैरमौजूदगी बुरी तरह खटक रही थी। लोगों का ख़याल था कि शायद वे ऐन वक़्त पर आयें।

हालाँकि हर शख़्स इन्स्पेक्टर फ़रीदी का बयान सुनने के लिए बेताब था... क़िस्सा कुछ इस तरह पेश आया था कि केस बहुत मज़ेदार बन गया था।

ठीक दस बजे मुक़दमे की कार्रवाई शुरू हुई। पुलिस के स्थानीय अफ़सरों के बयान के बाद इन्स्पेक्टर फ़रीदी का बयान शुरू हुआ।

‘‘मेरे बयान के सारे सबूत फ़ाइल में मौजूद हैं।’’ फ़रीदी ने अपना बयान देते हुए कहा।

‘‘मैं सबसे पहले यह ग़लतफ़हमी दूर कर देना चाहता हूँ कि लेफ़्टिनेंट बाक़िर और जाबिर दो अलग-अलग शख़्सियतें नहीं... दरअसल... बाक़िर और जाबिर एक ही शख़्सियत के दो नाम हैं... जाबिर कौन है? इस पर थोड़ी-सी रोशनी डालना ज़रूरी है। पढ़ाई का ग़लत इस्तेमाल और इन्सानी ख़्वाहिशों से आगे बढ़ना किस हद तक इन्सान को गुमराह कर सकता है, इसकी ज़िन्दा मिसाल जाबिर की पिछली ज़िन्दगी के वाक़यात हैं। मुजरिमों के कटघरे में खड़ा हुआ यह भयानक शख़्स ऑक्सफ़ोर्ड यूनीवर्सिटी लन्दन से फ़िलॉसफ़ी में डिग्री ले चुका है और जर्मनी के ज़्यूरिच कालेज से साइन्स में एम.ए. कर चुका है। कई दिनों तक यह प्रोफ़ेसर भी रहा है। इसकी माँ जर्मन औरत थी, बाप हिन्दुस्तानी। इसकी पैदाइश हिन्दुस्तान में हुई। हालात की बदक़िस्मती कि इसने बचपन में अपने हिन्दुस्तानी साथियों के हाथों काफ़ी बेइज़्ज़ती बर्दाश्त की और उस वक़्त से इसके दिल में हिन्दुस्तानियों के ख़िलाफ़ नफ़रत का जज़्बा पैदा हुआ। जवानी में यह लन्दन पहुँचा। वहाँ से फ़िलॉसफ़ी में ऊँची तालीम लेने के बाद यह जर्मनी गया। वहीं साइन्स के तजरुबों और नाज़ीवाद की बढ़ती हुई ताक़त ने इसका दिमाग़ दूसरे रास्तों पर डाल दिया। डॉक्टर गोएबल्ज़ के जासूसी डिपार्टमेंट में रह कर इसने अपना भेस बदलने, आवाज़ बदलने का तरीक़ा सीखा और इस सिलसिले में ख़ुद भी इसने कई तजरुबे किये।

‘‘लड़ाई के वक़्त एक तबाही वाला गैस बनाते वक़्त इसकी नाक पर कुछ भाप आ गयी और वह गल गयी। यह इसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हादसा था।

‘‘जर्मनी की हार के बाद इसकी माली हालत गिरने लगी। इसे क़ीमिया बनाने का शौक़ हुआ और उसी शौक़ की बिना पर इसकी मुलाक़ात रंजीत नगर के राजकुमार संग्राम सिंह से हुई और उसी शौक़ ने राजकुमार की जान ले ली। राजकुमार की जिन्सी बीमारियाँ सिर्फ़ एक अफ़साना हैं। जाबिर के ज़हर ने उन्हें मारा। उनसे वह नुस्ख़ा तो इसे न मिल सका, लेकिन रंजीत नगर के राजकुमार बनने का शौक़ इसे हिन्दुस्तान खींच लाया। इसके पहचानने वालों में से दो इसका शिकार हो गये और एक इस वक़्त साजिद के रूप में गवाह है।

‘‘बम्बई ही में इसे पता लगा कि रामगढ़ का मशहूर नवाब नवाबज़ादा शाकिर सोना बनाने का नुस्ख़ा रखता है। उसके पास कुछ ऐसी किताबें है जिनके बताये हुए उसूलों पर अमल करके इन्सान हज़ारों साल तक ज़िन्दा रह सकता है। जाबिर ने शाकिर से ख़तों के ज़रिये दोस्ती बढ़ानी चाही। मगर इसमें इसे कामयाबी नहीं मिली।

‘‘वह रामगढ़ आया।

‘‘नवाबज़ादा शाकिर के काम में शामिल कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ भी थे। सोना तैयार हो जाने के बाद नवाबज़ादा शाकिर ने कुँवर साहब को हिस्सा देने से इनकार किया। अपनी एक किताब पर कुँवर साहब ने नवाबज़ादा को धमकी दी कि अगर उन्होंने इनका हिस्सा न दिया तो ये उसे जान से मार डालेंगे और उसके बाद रात में ये फिर नवाबज़ादा से मिले। इन्होंने अपना हिस्सा भी माँगा और अपनी तहरीर भी वापस माँगी। जाबिर की जानकारी में ये बातें थीं। उसने जज सिद्दीक़ अहमद के बेहतरीन ख़ूबसूरत शीराज़ी पामोज़ कबूतर के जोड़े में से एक कबूतर चुरा कर और उसे ज़हरीला छल्ला पहना कर नवाबज़ादा के बरामदे में छोड़ दिया। नवाबज़ादा कबूतरों के रसिया थे, मगर वह कबूतर उठाते ही छल्ला लगा और ज़हर फैल गया। ठीक उसी वक़्त कुँवर ज़फ़र अली उनके पास आये। नवाबज़ादा को मुर्दा देख कर उनके रोंगटे खड़े हो गये। उन्होंने अपनी तहरीर फाड़ी और भाग गये। जाबिर का आदमी उनकी उस हालत की तस्वीर हासिल कर चुका था। शायद लेफ़्टिनेंट बाक़िर की तरफ़ से दायर किये गये मुक़दमे में उनके ख़िलाफ़ यही सबूत पेश किया जाता।

कुँवर ज़फ़र अली बेगुनाह हैं। ग़ुस्से और झुँझलाहट की उस तहरीर पर उन्हें पछतावा था और उन्होंने नवाबज़ादा के नाम एक माफ़ीनामा भी लिखा था जो रिकॉर्ड में शामिल है।’’

इतना कहने के बाद फ़रीदी रुका... सुनने वालों पर बिलकुल ख़ामोशी थी। सईदा का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था। थोड़ी देर ठहरने के बाद फ़रीदी ने अपना बयान फिर शुरू किया।

‘‘जाबिर ने ज़फ़र और नवाब रशीदुज़्ज़माँ वग़ैरह को मेरे ख़िलाफ़ करने और मेरे रास्ते में रोड़ा अटकाने के लिए मेरा भेस बदल कर उनके घर पर डाका डाला और उनके घर से उनकी किताब जो दरअसल नवाबज़ादा शाकिर की जायदाद थी, ले उड़ा। उधर नवाबज़ादा शाकिर की लाइब्रेरी में इत्तफ़ाक़ से मेरे हाथ वे किताबें लगीं जिनकी जाबिर को तलाश थी। लेफ़्टिनेंट बाक़िर का क़िस्सा सुनने के बाद ही मेरा माथा ठनका था। बम्बई के मशहूर सेठों के यहाँ जवाहरात की चोरी की ख़बर भी मेरे पास थी। लाइब्रेरी ही में मुझे वह पर्चा मिला जिसमें नवाबज़ादा शाकिर के सौतेले भाई के कुछ हालात थे, लेफ़्टिनेंट बाक़िर और जाबिर का एक ही दिन बम्बई जाना मुझे और खटका। जाबिर को यह य़कीन हो गया था कि मैं उसका पीछा ज़रूर करूँगा। उसने मेरे रोकने के तमाम इन्तज़ाम भी किये, मगर वह नाकाम रहा। अलबत्ता, हालात ने हमारा साथ न दिया। मैं इत्तफ़ाक़ से डिब्बा कट जाने की वजह से उसका पीछा न कर सका और हमीद को जाबिर ही की एक पिट्ठू ने धोखा दे दिया।

‘‘बम्बई से वापसी पर वह शाकिर के सौतेले भाई के पूरे मालूमात हासिल कर चुका था। उनकी एक तस्वीर और पुराने ख़ानदानी हालात हासिल करके वह यहाँ आया। फ़र्ज़ी सबूत और दलीलें... ख़ानदान में सईदा के अलावा और किसी रिश्तेदार का वजूद न होने से उसको कामयाबी मिल गयी।

‘‘उसने अपने आपको सचमुच बाक़िर साबित करने के लिए बड़े पापड़ बेले। अफ़सरों की दावतें करके उसने उन्हें यह भी मौक़ा नहीं दिया कि वह उसके बारे में कुछ सोच सकें। सईदा के नाम जायदाद हवाले करके उसने उसका भी मुँह बन्द कर दिया।

‘‘अपने साथ लाये हुए एक बेकार नौजवान को अपना लड़का मशहूर करके और फिर ख़ुद ही उसे सिगरेट में ज़हर दे कर और उसकी मौत पर फ़र्ज़ी आँसू बहा कर इसने सबका दिमाग़ बेकार कर दिया। किसी शख़्स का ख़याल भी इस तरफ़ न जा सका। लेकिन कुँवर ज़फ़र अली मुझसे और उससे, दोनों से शक करते थे। आग लगने से पहले वे नवाबज़ादा शाकिर के मकान के पिछले हिस्से की तरफ़ गये। कई दिन पहले उन्होंने कुछ लोगों को शक की हालत में इधर घूमते देखा था। यही कुरेद उन्हें इस तरफ़ ले गयी। उसी वक़्त आग लगी... वे भागे जाबिर के आदमी ने गोली चलायी और वे ज़ख़्मी हो गये। यह ग़लत है कि वे पुलिस की गोली से ज़ख़्मी हुए। हस्पताल में ऑपरेशन के बाद निकाली गयी गोली इस बात का सबूत है।

‘‘मुझे उसी वक़्त शक हुआ था और इसीलिए मैंने नवाब रशीदुज़्ज़माँ वग़ैरह को माथुर साहब के घर जाने की हिदायत की थी। ये लोग गये, मगर लौट आये।

‘‘मुझे अपने होटल के कमरे में पिछले दिनों की आग और क़त्ल के वाक़यात से यह अन्दाज़ा हो गया था कि मेरे ऊपर भी हमला होगा। इस बीच में तारिक़ से मुझे ख़बर मिली कि लेफ़्टिनेंट बाक़िर मुझसे अकेले में बातें करने का इरादा रखते हैं। मैंने होशियारी से वे दोनों किताबें जिनकी जाबिर को तलाश थी, छुपा दीं और ख़ुद बाक़िर के घर की तरफ़ चला गया। उनके जाने के बाद ही मुझे लाइब्रेरी में जाबिर और नवाबज़ादा शाकिर के ख़त मिले। मुझे ऐसे काग़ज़ात भी मिले जिनकी बिना पर जाबिर बाक़िर बना फिरता था। मैंने उसकी वह किताब भी देखी थी जो वह इन्सानी अंगों की बनावट पर लिख रहा था। उसकी लिखावट की ताज़गी यह बता रही थी कि यह अभी लिखी गयी है।
 
‘‘दूसरी तरफ़ मेरे ज़ेहन में जाबिर की तहरीर भी थी, हालाँकि मुझे य़कीन हो गया कि जाबिर और बाक़िर एक ही शख़्सियत के दो नाम हैं, जाबिर का उसी वक़्त आना और मुझे तहखाने में क़ैद करना मेरे लिए और य़कीनी हो गया।

‘‘मुझे क़ैद करने के बाद उसने मेरा भेस बदल कर एक तरफ़ मुझे मजबूर कर के किताबें हासिल करना चाहीं, दूसरी तरफ़ हमीद को क़ैद करके एक काँटा रास्ते से हटाया। तीसरी तरफ़ नवाब साहब वग़ैरह से ज़बर्दस्ती तहरीर लिखवा कर उनसे रुपये भी ऐंठे और उन्हें मेरा दुश्मन भी बना दिया।’’

बयान लम्बा होने के बावजूद वह शख़्स ग़ौर से सुन रहा था। फ़रीदी फिर रुका और हमीद की तरफ़ मुस्कुराते हुए उसने अपना बयान शुरू किया।

‘‘मैं किस तरह छूटा... यह सिर्फ़ इत्तफ़ाक़ था। जाबिर ने मुझे चौबीस घण्टे का टाइम दिया था। अट्ठारह घण्टे बीतने के बाद शाम को जाबिर का नौकर जब तहख़ाने में लैम्प रखने आया तो बिजली की तरह मेरे ज़ेहन में एक ख़याल गूँजा। मैंने नौकर के जाते ही अपने बँधे हुए हाथों से लैम्प तोड़ डाला और बत्ती की आग से अपने हाथ में बँधी हुई रस्सी को जलाता रहा। हाथ खुलने के बाद मैं आज़ाद हो गया। दूसरे ही कमरे में हमीद बन्द था और उसे छुड़ाने के बाद मैं निकला। हमीद ने जाबिर की बातचीत सुनी थी और उसका ख़याल था कि वह कलकत्ता जायेगा; इसलिए कि कुछ अहम सरकारी रिकॉर्ड की कापियाँ उसके हाथ लग गयी थीं जिन्हें वह जिनीवा में बेचना चाहता था। सईदा के बयान ने यह बात पक्की कर दी और हमें कलकत्ता से समुद्री सफ़र से जाबिर को गिरफ़्तार करना पड़ा। मेरा बयान ख़त्म हो रहा है, लेकिन अब एक बात रह जाती है और वह है क़ीमिया का नुस्ख़ा... जाबिर उसकी तलाश में था। मैं नहीं जानता कि वह उसे हासिल कर सका या नहीं। बहरहाल, मुझे वह न मिल सका।’’

फ़रीदी बैठ गया। अदालत के कमरे में सन्नाटा था। ऐसा मालूम होता था जैसे तूफ़ान अपनी भयानक आवाज़ के बाद ठहर गया हो कि अचानक ज़ंजीरें खड़खड़ायीं और जाबिर ने इशारा किया। जज साहब के हुक्म पर उसका मुँह खोल दिया गया। उसने कहा।

‘‘मेरे बारे में फ़रीदी साहब ने जो बयान दिया है, वह बिलकुल सही है। मेरे बारे में जानकारी जिस मुश्किल से जर्मन ज़बान में लिखे हुए ख़तों से उन्होंने इकट्ठा की है, उसके लिए वे तारीफ़ के क़ाबिल हैं। मुझे अपने जुर्म का इक़बाल है, लेकिन मेरी कहानी अभी अधूरी है। मेरी एक आऱजू है कि मेरे हाथ खोल दिये जायें, मैं वादा करता हूँ कि किसी को कोई नुक़सान न पहुँचेगा... बल्कि एक छिपे हुए राज़ का ख़ुलासा भी हो जायेगा। फ़रीदी साहब जानते हैं कि मैं झूठ नहीं बोलता।’’

लोगों में खुसर-फ़ुसर और तरह-तरह की बातें शुरू हो गयीं कि इतने में जज साहब के हुक्म से चार सिपाहियों के अलावा दो और सिपाही संगीनें ले कर उसके पास खड़े हो गये। हमीद का हाथ अपनी पिस्तौल पर आया और जाबिर की हथकड़ियाँ खोल दी गयीं।

उसने सुकून से कहा।

‘‘फ़रीदी साहब! क़ीमिया का नुस्ख़ा और आपकी जानकारी में गुप्त जगह पर रखी हुई किताबें मैंने हासिल कर ली थीं। किताबें समन्दर में डूब गयीं, लेकिन नुस्ख़ा मेरे पास है। मैं जो चाहता हूँ, उसे हासिल कर लेता हूँ।’’ कहते हुए उसने अपने चेहरे से बनावटी नाक उठायी।

दहशत और ख़ौफ़ से ग़ज़ाला और सईदा की चीख़ें निकल गयीं। भयानक चेहरा और भयानक हो गया था।

जाबिर ने क़हक़हा लगाया। अपनी नाक के अन्दर से उसने काग़ज़ की पुड़िया निकाली। ‘‘यह है वह नुस्ख़ा फ़रीदी साहब... मैं जिस्मानी अंगों की बनावट का माहिर हूँ। यह नाक बड़ी कारआमद है।’’ फ़रीदी नुस्ख़ा लेने के लिए आगे बढ़ा।

‘‘मगर ठहरिए... इसमें ज़हर है... सोना हासिल करने की कोशिश का नतीजा ज़हर ही हुआ है।’’ कहते हुए उसने वह पुड़िया मुँह के अन्दर रख ली... आधा सेकेण्ड भी न हुआ था कि वह चकरा कर गिरा और नाक उसके हाथ से फ़ौरन छूट गयी।

थोड़ी देर का हंगामा ख़ामोशी में बदल गया। जाबिर की लाश से बड़ी बदबू आ रही थी और अजीब तरह का नीला पानी उसके मुँह से निकल रहा था।

कमरे में गहरा सन्नाटा हिचकोले ले रहा था।

end
 
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