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वहाँ पहुँच कर फ़रीदी की हिदायत पर पुलिस ने लाइब्रेरी को अच्छी तरह से घेर लिया और ख़ुद फ़रीदी, माथुर और दो इन्स्पेक्टर लाइब्रेरी के दरवाज़े के सामने कुछ फ़ासले पर छिप कर बैठ गये।
‘‘आपकी घड़ी में क्या टाइम हुआ है?’’ फ़रीदी ने माथुर से पूछा।
‘‘ग्यारह बज कर पंद्रह मिनट...!’’
‘‘बस, वह आता ही होगा, क्योंकि बारह बजे तक उसको यहाँ ज़रूर पहुँच जाना चाहिए।’’
इतने में कोई शख़्स तेज़ी से लाइब्रेरी की तरफ़ आता हुआ दिखायी दिया।
‘‘वह देखिए, कोई आ रहा है।’’ एक इन्स्पेक्टर ने इशारा किया।
‘‘माथुर ने पिस्तौल सँभाला।
‘‘ठहरिए।’’ फ़रीदी ने धीरे से कहा। ‘‘यह हमीद है।’’
हमीद फ़रीदी के क़रीब आ कर बोला। ‘‘अभी तक दोनों जगहों पर कोई वारदात नहीं हुई।’’
‘‘आयँ...!’’ फ़रीदी ने हैरत से कहा।
‘‘जी हाँ... बहरहाल, पुलिस वहाँ मौजूद है।’’
‘‘अच्छा... ख़ैर, तुम बैठ जाओ।’’ और फ़रीदी कुछ सोचने लगा।
बैठे-बैठे जब काफ़ी देर हो गयी तो फ़रीदी ने फिर वक़्त पूछा। ‘‘अब ठीक बारह बजे हैं...!’’ माथुर ने जवाब दिया।
फ़रीदी अफ़सोस करते हुए बोला। ‘‘अब कैदख़ाने के अन्दर चलना चाहिए।’’
‘‘लेकिन वहाँ फिर कोई नयी मुसीबत न पेश आ जाये।’’ हमीद बोला।
‘‘जो कुछ भी हो, लेकिन अब हम लोगों को अन्दर चलना ही पड़ेगा, क्योंकि मुझे य़कीन हो रहा है कि वह कुछ भाँप गया है।’’
‘‘चलिए, मालूम होता है कि आपको ‘कबूतरख़ाना’ बहुत पसन्द आ गया है।’’ हमीद उठते हुए बोला।
फ़रीदी, हमीद, माथुर और वे दोनों सब-इन्स्पेक्टर लाइब्रेरी की तरफ़ गये। लाइब्रेरी में पहुँच कर फ़रीदी ने कालीन हटाया और एक छोटा बटन जो ज़मीन में लगा हुआ था। उसको दबाया। तख़्ता हट गया जिससे अन्दर का कमरा साफ़ दिखायी देने लगा। फ़रीदी पिस्तौल लिये हुए धीरे से उसमें कूदा, फिर हमीद, माथुर और इन्स्पेक्टर भी कमरे में कूद पड़े। अन्दर बिलकुल अँधेरा था। फ़रीदी ने टॉर्च जलाया। कमरे में कोई नहीं था। अलबत्ता बहुत-सी चीज़ें बिखरी पड़ी थीं और कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था।
‘‘कमरे का दरवाज़ा कैसे खुला, यह तो बाहर से बन्द था?’’ फ़रीदी बोला।
‘‘अच्छा हमीद, तुम पिछले दरवाज़े से कुछ सिपाहियों को ले कर आओ जिधर से मैं तुम्हारे पास आया था। ज़रा होशियार रहना।’’
हमीद छत पकड़ कर ऊपर चढ़ गया और फ़रीदी उस कमरे से बाहर निकला। टॉर्च की रोशनी में उसने देखा कि चार आदमी ज़मीन पर मुर्दा पड़े हुए हैं।
‘‘देखा आपने... मुझे पहले ही से य़कीन था कि वह भाग गया।’’ फ़रीदी माथुर से बोला।
‘‘लेकिन इसमें भी उसकी कोई चाल न हो।’’ माथुर बोला।
इतने में हमीद भी सिपाहियों को ले कर दूसरे दरवाजे से अन्दर आया। तहख़ाने का कोना-कोना देखा गया, लेकिन वहाँ कोई न था सिवा इसके कि कबूतरख़ाने पर उन लोगों को दो लाशें और मिलीं।
फ़रीदी अचानक कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘माथुर साहब जल्दी से एक गाड़ी का इन्तज़ाम कीजिए। वह यहाँ से बच कर निकल गया। लेकिन अभी ज़्यादा देर नहीं हुई। जाते हुए वह अपने उन साथियों को मार गया है।’’
सब लोग जल्दी से तहख़ाने के बाहर निकल आये और फ़ौरन एक सिपाही को गाड़ी लाने के लिए भेजा गया। फ़रीदी बेचैनी से टहलने लगा। उसकी आँखों में एक ख़ास क़िस्म की चमक पैदा हो गयी थी।
‘‘हमीद, ज़रा मेरे साथ आओ।’’ फ़रीदी, हमीद को लिये हुए फिर तहख़ाने में दाख़िल हुआ और बाहर के कमरे का अच्छी तरह से जायज़ा लेने लगा। वह मेज़ की दराज़ को खोल कर कुछ ढूँढने लगा जिसमें कुछ बेकार काग़ज़ात के अलावा और कुछ नहीं था। फिर उसने इधर-उधर कुछ तलाश किया, लेकिन कोई ऐसी चीज़ न मिली जो उसके लिए काम आती... अलबत्ता उसने अलमारी में से कुछ ख़त और कुछ काग़ज़ात निकाल कर अपनी जेब में रखे और हमीद से बोला। ‘‘जल्दी चलो।’’
दोनों जैसे ही बाहर निकले वैसे ही गाड़ी आ गयी। माथुर ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि वे सारी लाशों को उठा कर कोतवाली ले जायें और कुछ सिपाही यहाँ रह जायें।
गाड़ी पर माथुर और दोनों इन्स्पेक्टर और कुछ सिपाही बैठ गये।
‘‘हमीद, तुम भी बैठ जाओ।’’ फ़रीदी कहता हुआ ड्राइवर की बग़ल में बैठ गया। ‘‘अख़्तर लॉज जल्दी चलो।’’ फ़रीदी ने ड्राइवर से कहा।
थोड़ी देर बाद गाड़ी अख़्तर लॉज के सामने खड़ी थी। फ़रीदी कूद कर उतरा और सीधा सईदा के कमरे की तरफ़ बढ़ा। सईदा के कमरे में रोशनी हो रही थी। फ़रीदी ने दरवाज़ा खटखटाया।
‘‘कौन...?’’ सईदा ने पूछा।
‘‘मैं हूँ फ़रीदी।’’
सईदा ने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा। ‘‘कहिए, ख़ैरियत तो है?’’
‘‘हाँ, सब ठीक है। पहले यह बताओ कि लेफ़्टिनेंट बाक़िर की तुमसे कब मुलाक़ात हुई थी?’’
‘‘तीन दिन पहले... मगर आप इस क़दर घबरा कर भैया को क्यों पूछ रहे हैं।’’ सईदा ने सवाल किया।
‘‘कुछ नहीं, तुम परेशान न हो... यह मैं बाद में बता दूँगा।
उन्होंने तुमसे कुछ बताया था...?’’ फ़रीदी ने सवाल किया।
‘‘हाँ... वे कह रहे थे कि मैं एक काम से कलकत्ता जाने वाला हूँ।’’ सईदा ने जवाब दिया।
‘‘हूँ... और कुछ कह रहे थे।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘अच्छा, अब मैं जा रहा हूँ, वक़्त बिलकुल नहीं, फिर सारी कहानी बताऊँगा। नवाब साहब वग़ैरह से कह देना कि जाबिर बच कर निकल गया। हम लोग उसका पीछा करने जा रहे हैं।’’ फ़रीदी यह कहता हुआ तेज़ी से निकला और गाड़ी में आ कर बैठ गया।
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‘‘आपकी घड़ी में क्या टाइम हुआ है?’’ फ़रीदी ने माथुर से पूछा।
‘‘ग्यारह बज कर पंद्रह मिनट...!’’
‘‘बस, वह आता ही होगा, क्योंकि बारह बजे तक उसको यहाँ ज़रूर पहुँच जाना चाहिए।’’
इतने में कोई शख़्स तेज़ी से लाइब्रेरी की तरफ़ आता हुआ दिखायी दिया।
‘‘वह देखिए, कोई आ रहा है।’’ एक इन्स्पेक्टर ने इशारा किया।
‘‘माथुर ने पिस्तौल सँभाला।
‘‘ठहरिए।’’ फ़रीदी ने धीरे से कहा। ‘‘यह हमीद है।’’
हमीद फ़रीदी के क़रीब आ कर बोला। ‘‘अभी तक दोनों जगहों पर कोई वारदात नहीं हुई।’’
‘‘आयँ...!’’ फ़रीदी ने हैरत से कहा।
‘‘जी हाँ... बहरहाल, पुलिस वहाँ मौजूद है।’’
‘‘अच्छा... ख़ैर, तुम बैठ जाओ।’’ और फ़रीदी कुछ सोचने लगा।
बैठे-बैठे जब काफ़ी देर हो गयी तो फ़रीदी ने फिर वक़्त पूछा। ‘‘अब ठीक बारह बजे हैं...!’’ माथुर ने जवाब दिया।
फ़रीदी अफ़सोस करते हुए बोला। ‘‘अब कैदख़ाने के अन्दर चलना चाहिए।’’
‘‘लेकिन वहाँ फिर कोई नयी मुसीबत न पेश आ जाये।’’ हमीद बोला।
‘‘जो कुछ भी हो, लेकिन अब हम लोगों को अन्दर चलना ही पड़ेगा, क्योंकि मुझे य़कीन हो रहा है कि वह कुछ भाँप गया है।’’
‘‘चलिए, मालूम होता है कि आपको ‘कबूतरख़ाना’ बहुत पसन्द आ गया है।’’ हमीद उठते हुए बोला।
फ़रीदी, हमीद, माथुर और वे दोनों सब-इन्स्पेक्टर लाइब्रेरी की तरफ़ गये। लाइब्रेरी में पहुँच कर फ़रीदी ने कालीन हटाया और एक छोटा बटन जो ज़मीन में लगा हुआ था। उसको दबाया। तख़्ता हट गया जिससे अन्दर का कमरा साफ़ दिखायी देने लगा। फ़रीदी पिस्तौल लिये हुए धीरे से उसमें कूदा, फिर हमीद, माथुर और इन्स्पेक्टर भी कमरे में कूद पड़े। अन्दर बिलकुल अँधेरा था। फ़रीदी ने टॉर्च जलाया। कमरे में कोई नहीं था। अलबत्ता बहुत-सी चीज़ें बिखरी पड़ी थीं और कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था।
‘‘कमरे का दरवाज़ा कैसे खुला, यह तो बाहर से बन्द था?’’ फ़रीदी बोला।
‘‘अच्छा हमीद, तुम पिछले दरवाज़े से कुछ सिपाहियों को ले कर आओ जिधर से मैं तुम्हारे पास आया था। ज़रा होशियार रहना।’’
हमीद छत पकड़ कर ऊपर चढ़ गया और फ़रीदी उस कमरे से बाहर निकला। टॉर्च की रोशनी में उसने देखा कि चार आदमी ज़मीन पर मुर्दा पड़े हुए हैं।
‘‘देखा आपने... मुझे पहले ही से य़कीन था कि वह भाग गया।’’ फ़रीदी माथुर से बोला।
‘‘लेकिन इसमें भी उसकी कोई चाल न हो।’’ माथुर बोला।
इतने में हमीद भी सिपाहियों को ले कर दूसरे दरवाजे से अन्दर आया। तहख़ाने का कोना-कोना देखा गया, लेकिन वहाँ कोई न था सिवा इसके कि कबूतरख़ाने पर उन लोगों को दो लाशें और मिलीं।
फ़रीदी अचानक कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘माथुर साहब जल्दी से एक गाड़ी का इन्तज़ाम कीजिए। वह यहाँ से बच कर निकल गया। लेकिन अभी ज़्यादा देर नहीं हुई। जाते हुए वह अपने उन साथियों को मार गया है।’’
सब लोग जल्दी से तहख़ाने के बाहर निकल आये और फ़ौरन एक सिपाही को गाड़ी लाने के लिए भेजा गया। फ़रीदी बेचैनी से टहलने लगा। उसकी आँखों में एक ख़ास क़िस्म की चमक पैदा हो गयी थी।
‘‘हमीद, ज़रा मेरे साथ आओ।’’ फ़रीदी, हमीद को लिये हुए फिर तहख़ाने में दाख़िल हुआ और बाहर के कमरे का अच्छी तरह से जायज़ा लेने लगा। वह मेज़ की दराज़ को खोल कर कुछ ढूँढने लगा जिसमें कुछ बेकार काग़ज़ात के अलावा और कुछ नहीं था। फिर उसने इधर-उधर कुछ तलाश किया, लेकिन कोई ऐसी चीज़ न मिली जो उसके लिए काम आती... अलबत्ता उसने अलमारी में से कुछ ख़त और कुछ काग़ज़ात निकाल कर अपनी जेब में रखे और हमीद से बोला। ‘‘जल्दी चलो।’’
दोनों जैसे ही बाहर निकले वैसे ही गाड़ी आ गयी। माथुर ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि वे सारी लाशों को उठा कर कोतवाली ले जायें और कुछ सिपाही यहाँ रह जायें।
गाड़ी पर माथुर और दोनों इन्स्पेक्टर और कुछ सिपाही बैठ गये।
‘‘हमीद, तुम भी बैठ जाओ।’’ फ़रीदी कहता हुआ ड्राइवर की बग़ल में बैठ गया। ‘‘अख़्तर लॉज जल्दी चलो।’’ फ़रीदी ने ड्राइवर से कहा।
थोड़ी देर बाद गाड़ी अख़्तर लॉज के सामने खड़ी थी। फ़रीदी कूद कर उतरा और सीधा सईदा के कमरे की तरफ़ बढ़ा। सईदा के कमरे में रोशनी हो रही थी। फ़रीदी ने दरवाज़ा खटखटाया।
‘‘कौन...?’’ सईदा ने पूछा।
‘‘मैं हूँ फ़रीदी।’’
सईदा ने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा। ‘‘कहिए, ख़ैरियत तो है?’’
‘‘हाँ, सब ठीक है। पहले यह बताओ कि लेफ़्टिनेंट बाक़िर की तुमसे कब मुलाक़ात हुई थी?’’
‘‘तीन दिन पहले... मगर आप इस क़दर घबरा कर भैया को क्यों पूछ रहे हैं।’’ सईदा ने सवाल किया।
‘‘कुछ नहीं, तुम परेशान न हो... यह मैं बाद में बता दूँगा।
उन्होंने तुमसे कुछ बताया था...?’’ फ़रीदी ने सवाल किया।
‘‘हाँ... वे कह रहे थे कि मैं एक काम से कलकत्ता जाने वाला हूँ।’’ सईदा ने जवाब दिया।
‘‘हूँ... और कुछ कह रहे थे।’’
‘‘नहीं।’’
‘‘अच्छा, अब मैं जा रहा हूँ, वक़्त बिलकुल नहीं, फिर सारी कहानी बताऊँगा। नवाब साहब वग़ैरह से कह देना कि जाबिर बच कर निकल गया। हम लोग उसका पीछा करने जा रहे हैं।’’ फ़रीदी यह कहता हुआ तेज़ी से निकला और गाड़ी में आ कर बैठ गया।
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