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कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ
इधर-उधर की बातचीत के बाद ग़ज़ाला पूछ ही बैठी।
‘‘मगर तुमने यह नहीं बताया कि कुँवर साहब कौन हैं? जहाँ तक मेरा ख़याल है, इससे पहले मैंने कभी उनको तुम्हारे यहाँ नहीं देखा और न अख़्तर भाई के दोस्तों में ऐसे कोई कुँवर साहब थे।’’
सईदा सुनती रही और थोड़ी देर ख़ामोश रह कर बोली।
‘‘ये तुम्हारे उनके बहुत पुराने दोस्तों में से हैं। मैं नहीं चाहती थी कि इतनी जल्द तुमसे उन्हें मिला दूँ। वे कुछ झक्की आदमी हैं। शायद तुम उनसे मिल कर ख़ुश भी न हो सको। शाकिर भाई मरहूम और कुँवर साहब से एक मामूली-सी किताब पर झगड़ा हो गया था।’’
आख़िर जुमला कहते-कहते उसे लगा कि जैसे वह कोई ऐसी बात कह गयी हो जो उसे न कहना चाहिए थी।
अपने साथ ग़ज़ाला को लिये हुए वह बढ़ी। नौकर से मालूम हुआ कि कुँवर साहब उसकी आठ साल की बच्ची रेहाना के साथ बाग़ में खेल रहे हैं।
ग़ज़ाला और सईदा बाग़ में पहुँचीं... कुँवर साहब रेहाना को गोद में उठाये हुए नाच रहे थे। उन्होंने कई तितलियाँ और भौंरे पकड़ रखे थे और उन सबको डोरे से बाँध रखा था और सब डोरों का आख़िर सिरा उनकी गर्दन से बँधा हुआ था। उनके नाचने के साथ-साथ तितलियाँ भी इधर-उधर घूम रही थीं। मासूम रेहाना इस खेल से बहुत ख़ुश थी।
सईदा अब तक ख़ामोश थी। उसने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘ग़ज़ाला... आओ, तुम्हें कुँवर साहब से मिलवाऊँ।’’
‘‘कुँवर साहब... आपसे मिलिए। आप मेरी प्यारी सहेली ग़ज़ाला खानम और आप हैं कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ।
उनके पुराने जिगरी दोस्त और मेरे बहुत बड़े हमदर्द और सहारा।’’ कहते-कहते उसकी आँखें छलक उठीं।
कुँवर साहब ने सईदा और ग़ज़ाला की तरफ़ देखा और कुछ सूखी और दुखी आवाज़ में बोले। ‘‘चलिए, घर में चल कर बैठें। शाम को आपके कुछ मेहमान भी शायद आयेंगे।’’
शाम के खाने पर हमीद और फ़रीदी को दावत दी गयी थी। वादे के मुताबिक़ उन्हें रात सात बजे पहुँच जाना चाहिए था, मगर साढ़े आठ बज चुके थे और उनका कहीं पता न था। मजबूर हो कर नवाब साहब ने सईदा से कहा। ‘‘अब इन्तज़ार करना बेकार है... खाना लगवा दो... ख़ुद अपने हाथ से म़ुर्ग पकाया था। मगर उन लोगों की क़िस्मत ही में न था। फँस गये कहीं।’’
खाना मेज़ पर लगा दिया गया था। नवाब रशीदुज़्ज़माँ... मुर्ग़ की टाँग काट कर अलग ही करना चाहते थे के झन्न की आवाज़ के साथ कमरे के सब बल्ब टूट कर ज़मीन पर आ गिरे। एक बल्ब नवाब साहब को बेहद पसन्द शाही दाल में गिरा और गर्म-गर्म दाल उनके चेहरे पर पड़ी।
फ़ायर की पहली छै आवाज़ों के बाद एक सेकेण्ड के लिए बिलकुल सन्नाटा हो गया। नवाब साहब ने देखा कि दो लोगों ने सईदा और ग़ज़ाला के मुँह बन्द कर रखे थे और उन्हें उठाये लिये जा रहे थे। वे चीख़े, मगर चीख़ निकलने से पहले ही इतने ज़ोर का वार उनके ऊपर पड़ा कि वे चकरा कर गिर पड़े। हल्की-हल्की, धुँधली-धुँधली शकलें उनके सामने से गुज़रीं। उनमें से एक फ़रीदी भी था। उनका हाथ उठा और फिर गिर पड़ा।
कुँवर साहब इस हादसे के लिए बिलकुल तैयार न थे। बिजली के जाते ही वे हड़बड़ा कर उठे और इससे पहले कि वह कुछ कर पाते, उनके सीने पर पिस्तौल लगा हुआ था। पिस्तौलधारी ने गरज कर कहा। ‘‘ख़बरदार, अगर एक लफ़्ज़ भी मुँह से निकाला... चुपचाप खड़े रहो।’’
आवाज़ उन्हें जानी-पहचानी मालूम हुई। उन्होंने आँखें फाड़ कर देखा। सुबह वाला इन्स्पेक्टर फ़रीदी उन्हें घूर रहा था।
इतने में उनके साथी ने आ कर कहा। ‘‘उस्ताद, काम हो गया। अब चलना चाहिए।’’
‘‘अच्छा... कुँवर साहब ऐसे ही खड़े रहिए। अगर ज़रा-सा हिले तो न सिर्फ़ आप ख़त्म हो जायेंगे, बल्कि यह लड़की भी इस दुनिया में न रहेगी।’’ फ़रीदी ने रेहाना की गर्दन पकड़ रखी थी। मासूम लड़की की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसका भोला चेहरा इस अँधेरे में भी चमक रहा था। उस आदमी ने धीरे से कहा। ‘‘कुँवर साहब अपनी अन्दर की जेब में रखा हआ काग़ज़ मुझे दे दीजिए। नवाबज़ादा शाकिर की मौत के सिलसिले में यह काग़ज़ बहुत अहमियत रखता है। अगर आप वह काग़ज़ मुझे दे दें तो मैं वादा करता हूँ कि क़ीमिया बनाने वाली किताब नवाबज़ादा की क़ब्र से निकाल लाऊँगा। आप नवाबज़ादा के क़ातिल हैं। आपने उनके ख़ून से हाथ रँगे हैं। अच्छा है कि आप काग़ज़ मुझे दे दें। ये सब राज़ मेरे सीने में द़फ्न रहेंगे।’’
‘‘वह काग़ज़ मेरे पास नहीं है।’’ कुँवर साहब ने हकला कर जवाब दिया।
‘‘अच्छी बात है... मैं ख़ुद ही निकाले लेता हूँ।’’ वह अपने साथी की तरफ़ इशारा करते हुए बढ़ा। कुँवर साहब की जेब से एक सुनहरा चाकू, एक रूमाल और एक रबड़ की बिल्ली निकली। काग़ज़ का पता न था। मायूसी ज़ाहिर करते हुए उसने अपने साथी को इशारा किया। वह ग़ायब हो गया। उसने आख़िर बार कहा–
‘‘कुँवर साहब... नवाबज़ादा शाकिर के सौतेले भाई... लेफ़्टिनेंट बाक़िर आ गये हैं। आपकी सईदा को कुछ भी नहीं मिलेगा। ख़ैर, फ़िलहाल वह मेरे साथ जा रही है। मेरे असिस्टेंट हमीद ने उसे पसन्द कर लिया है। आप ख़ुद ही समझदार हैं, मगर आपको बताना मेरा फ़र्ज़ है। अगर मेरा या हमीद का नाम कभी आपकी ज़बान पर आया या मेरे आज के वाक़ये का ज़िक्र छिड़ा... तो क़ीमिया की किताब की दफ़्ती पर लिखी हुई तहरीर अदालत में पेश कर दी जायेगी और ख़ुदकुशी का यह केस क़त्ल का मुक़दमा बन जायेगा... ख़ुदा हाफ़िज़।’’
वह जा चुका था। कमरे में अब बिलकुल सन्नाटा था। कुँवर साहब कुछ बेहोश-से थे। काफ़ी देर के बाद उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया। फ़रीदी का कहीं पता न था और भयानक पिस्तौल सामने से हट चुका था। रेहाना बेहोश पड़ी थी। कमरे में अँधेरा वैसे ही था। उन्होंने नौकरों को आवाज़ें दीं, मगर उनमें से कोई न बोला। वे दो क़दम आगे बढ़े और धायँ... ठिठक कर उन्होंने दूसरी तरफ़ क़दम बढ़ाया और फिर वैसी ही आवाज़ सुनाई दी।
‘‘मालूम होता है, पटाखे बिछाये गये हैं।’’ वे बड़बड़ाये। फूँक-फूँक कर क़दम रखते हुए किसी तरह वे दरवाज़े तक पहुँचे। दरवाज़ा अन्दर से बन्द था... सिटकनी खोल कर वे बाहर आये। उजाले में आते ही उन्होंने चीख़ कर नौकरों को बुलाया। मगर कोई न बोला... तंग आ कर उनके कमरों की तरफ़ गये। हर एक मीठी नींद के मज़े ले रहा था। लाख जगाने पर भी कोई नौकर न जागा। मजबूरन उन्हें नौकरों का ख़याल छोड़ देना पड़ा। उनका ख़याल था कि शायद कनेक्शन काट दिया गया है। फिर भी उन्होंने बरामदे का स्विच दबाया। बरामदे में रोशनी फैल गयी। इसी रोशनी के सहारे वे फिर कमरे में आये। नवाब साहब और रेहाना को वहाँ से उठाने के बाद उन्होंने फ़ोन उठाया।
पुलिस ऑफ़िस में सब-इन्स्पेक्टर ने पूछा। ‘‘हैलो, कौन है?’’
कुँवर साहब ने कहा। ‘‘मैं कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ हूँ, अख़्तर लॉज से बोल रहा हूँ। क्या माथुर साहब हैं?’’
जवाब मिला। ‘‘नहीं...’’
‘‘अच्छा सुनिए, आप फ़ौरन यहाँ चले आइए और अगर फ़रीदी साहब और हमीद साहब हों तो उन्हें भी लेते आइएगा।’’
‘‘मगर वे लोग सात बजे से ग़ायब हैं।’’
‘‘ठीक है फिर आप ही आ जाइए,’’ यह कह कर कुँवर साहब ने फ़ोन रख दिया।
सब-इन्स्पेक्टर बिमल मुखर्जी के आने तक कुँवर साहब अपनी दिमाग़ी उलझनों पर क़ाबू पा चुके थे। वे बार-बार यह सोच रहे थे कि कहीं उन्होंने धोखा तो नहीं खाया। मगर वह शक्ल बिलकुल इन्स्पेक्टर फ़रीदी की थी। और अगर मान भी लिया जाये कि वह इन्स्पेक्टर फ़रीदी नहीं था तो आख़िर मुझे वह मना क्यों कर गया... अगर फ़रीदी न होता तो... वह मुझे मना न करता... वह अगर फ़रीदी था तो उसने ऐसा क्यों किया... इन्स्पेक्टर फ़रीदी एशिया का मशहूर जासूस और... लुटेरा...? यह नहीं हो सकता।’’
आख़िरकार उन्होंने यह तय किया कि वे सब-इन्स्पेक्टर को यह बता दें कि उस शख़्स की शक्ल बिलकुल फ़रीदी से मिलती थी।
मिस्टर मुखर्जी को पूरा बयान लिखवाने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उसे देखा था। उसका हुलिया और सूरत...’’ उनका जुमला पूरा भी न हो पाया था कि गोली चलने की आवाज़ आयी और सामने की कॉर्निस पर से एक कबूतर फड़फड़ा कर गिरा और मर गया। कुँवर साहब रुक गये। उनके लिए यह ख़तरे का सिगनल था।
इधर-उधर की बातचीत के बाद ग़ज़ाला पूछ ही बैठी।
‘‘मगर तुमने यह नहीं बताया कि कुँवर साहब कौन हैं? जहाँ तक मेरा ख़याल है, इससे पहले मैंने कभी उनको तुम्हारे यहाँ नहीं देखा और न अख़्तर भाई के दोस्तों में ऐसे कोई कुँवर साहब थे।’’
सईदा सुनती रही और थोड़ी देर ख़ामोश रह कर बोली।
‘‘ये तुम्हारे उनके बहुत पुराने दोस्तों में से हैं। मैं नहीं चाहती थी कि इतनी जल्द तुमसे उन्हें मिला दूँ। वे कुछ झक्की आदमी हैं। शायद तुम उनसे मिल कर ख़ुश भी न हो सको। शाकिर भाई मरहूम और कुँवर साहब से एक मामूली-सी किताब पर झगड़ा हो गया था।’’
आख़िर जुमला कहते-कहते उसे लगा कि जैसे वह कोई ऐसी बात कह गयी हो जो उसे न कहना चाहिए थी।
अपने साथ ग़ज़ाला को लिये हुए वह बढ़ी। नौकर से मालूम हुआ कि कुँवर साहब उसकी आठ साल की बच्ची रेहाना के साथ बाग़ में खेल रहे हैं।
ग़ज़ाला और सईदा बाग़ में पहुँचीं... कुँवर साहब रेहाना को गोद में उठाये हुए नाच रहे थे। उन्होंने कई तितलियाँ और भौंरे पकड़ रखे थे और उन सबको डोरे से बाँध रखा था और सब डोरों का आख़िर सिरा उनकी गर्दन से बँधा हुआ था। उनके नाचने के साथ-साथ तितलियाँ भी इधर-उधर घूम रही थीं। मासूम रेहाना इस खेल से बहुत ख़ुश थी।
सईदा अब तक ख़ामोश थी। उसने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘ग़ज़ाला... आओ, तुम्हें कुँवर साहब से मिलवाऊँ।’’
‘‘कुँवर साहब... आपसे मिलिए। आप मेरी प्यारी सहेली ग़ज़ाला खानम और आप हैं कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ।
उनके पुराने जिगरी दोस्त और मेरे बहुत बड़े हमदर्द और सहारा।’’ कहते-कहते उसकी आँखें छलक उठीं।
कुँवर साहब ने सईदा और ग़ज़ाला की तरफ़ देखा और कुछ सूखी और दुखी आवाज़ में बोले। ‘‘चलिए, घर में चल कर बैठें। शाम को आपके कुछ मेहमान भी शायद आयेंगे।’’
शाम के खाने पर हमीद और फ़रीदी को दावत दी गयी थी। वादे के मुताबिक़ उन्हें रात सात बजे पहुँच जाना चाहिए था, मगर साढ़े आठ बज चुके थे और उनका कहीं पता न था। मजबूर हो कर नवाब साहब ने सईदा से कहा। ‘‘अब इन्तज़ार करना बेकार है... खाना लगवा दो... ख़ुद अपने हाथ से म़ुर्ग पकाया था। मगर उन लोगों की क़िस्मत ही में न था। फँस गये कहीं।’’
खाना मेज़ पर लगा दिया गया था। नवाब रशीदुज़्ज़माँ... मुर्ग़ की टाँग काट कर अलग ही करना चाहते थे के झन्न की आवाज़ के साथ कमरे के सब बल्ब टूट कर ज़मीन पर आ गिरे। एक बल्ब नवाब साहब को बेहद पसन्द शाही दाल में गिरा और गर्म-गर्म दाल उनके चेहरे पर पड़ी।
फ़ायर की पहली छै आवाज़ों के बाद एक सेकेण्ड के लिए बिलकुल सन्नाटा हो गया। नवाब साहब ने देखा कि दो लोगों ने सईदा और ग़ज़ाला के मुँह बन्द कर रखे थे और उन्हें उठाये लिये जा रहे थे। वे चीख़े, मगर चीख़ निकलने से पहले ही इतने ज़ोर का वार उनके ऊपर पड़ा कि वे चकरा कर गिर पड़े। हल्की-हल्की, धुँधली-धुँधली शकलें उनके सामने से गुज़रीं। उनमें से एक फ़रीदी भी था। उनका हाथ उठा और फिर गिर पड़ा।
कुँवर साहब इस हादसे के लिए बिलकुल तैयार न थे। बिजली के जाते ही वे हड़बड़ा कर उठे और इससे पहले कि वह कुछ कर पाते, उनके सीने पर पिस्तौल लगा हुआ था। पिस्तौलधारी ने गरज कर कहा। ‘‘ख़बरदार, अगर एक लफ़्ज़ भी मुँह से निकाला... चुपचाप खड़े रहो।’’
आवाज़ उन्हें जानी-पहचानी मालूम हुई। उन्होंने आँखें फाड़ कर देखा। सुबह वाला इन्स्पेक्टर फ़रीदी उन्हें घूर रहा था।
इतने में उनके साथी ने आ कर कहा। ‘‘उस्ताद, काम हो गया। अब चलना चाहिए।’’
‘‘अच्छा... कुँवर साहब ऐसे ही खड़े रहिए। अगर ज़रा-सा हिले तो न सिर्फ़ आप ख़त्म हो जायेंगे, बल्कि यह लड़की भी इस दुनिया में न रहेगी।’’ फ़रीदी ने रेहाना की गर्दन पकड़ रखी थी। मासूम लड़की की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसका भोला चेहरा इस अँधेरे में भी चमक रहा था। उस आदमी ने धीरे से कहा। ‘‘कुँवर साहब अपनी अन्दर की जेब में रखा हआ काग़ज़ मुझे दे दीजिए। नवाबज़ादा शाकिर की मौत के सिलसिले में यह काग़ज़ बहुत अहमियत रखता है। अगर आप वह काग़ज़ मुझे दे दें तो मैं वादा करता हूँ कि क़ीमिया बनाने वाली किताब नवाबज़ादा की क़ब्र से निकाल लाऊँगा। आप नवाबज़ादा के क़ातिल हैं। आपने उनके ख़ून से हाथ रँगे हैं। अच्छा है कि आप काग़ज़ मुझे दे दें। ये सब राज़ मेरे सीने में द़फ्न रहेंगे।’’
‘‘वह काग़ज़ मेरे पास नहीं है।’’ कुँवर साहब ने हकला कर जवाब दिया।
‘‘अच्छी बात है... मैं ख़ुद ही निकाले लेता हूँ।’’ वह अपने साथी की तरफ़ इशारा करते हुए बढ़ा। कुँवर साहब की जेब से एक सुनहरा चाकू, एक रूमाल और एक रबड़ की बिल्ली निकली। काग़ज़ का पता न था। मायूसी ज़ाहिर करते हुए उसने अपने साथी को इशारा किया। वह ग़ायब हो गया। उसने आख़िर बार कहा–
‘‘कुँवर साहब... नवाबज़ादा शाकिर के सौतेले भाई... लेफ़्टिनेंट बाक़िर आ गये हैं। आपकी सईदा को कुछ भी नहीं मिलेगा। ख़ैर, फ़िलहाल वह मेरे साथ जा रही है। मेरे असिस्टेंट हमीद ने उसे पसन्द कर लिया है। आप ख़ुद ही समझदार हैं, मगर आपको बताना मेरा फ़र्ज़ है। अगर मेरा या हमीद का नाम कभी आपकी ज़बान पर आया या मेरे आज के वाक़ये का ज़िक्र छिड़ा... तो क़ीमिया की किताब की दफ़्ती पर लिखी हुई तहरीर अदालत में पेश कर दी जायेगी और ख़ुदकुशी का यह केस क़त्ल का मुक़दमा बन जायेगा... ख़ुदा हाफ़िज़।’’
वह जा चुका था। कमरे में अब बिलकुल सन्नाटा था। कुँवर साहब कुछ बेहोश-से थे। काफ़ी देर के बाद उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया। फ़रीदी का कहीं पता न था और भयानक पिस्तौल सामने से हट चुका था। रेहाना बेहोश पड़ी थी। कमरे में अँधेरा वैसे ही था। उन्होंने नौकरों को आवाज़ें दीं, मगर उनमें से कोई न बोला। वे दो क़दम आगे बढ़े और धायँ... ठिठक कर उन्होंने दूसरी तरफ़ क़दम बढ़ाया और फिर वैसी ही आवाज़ सुनाई दी।
‘‘मालूम होता है, पटाखे बिछाये गये हैं।’’ वे बड़बड़ाये। फूँक-फूँक कर क़दम रखते हुए किसी तरह वे दरवाज़े तक पहुँचे। दरवाज़ा अन्दर से बन्द था... सिटकनी खोल कर वे बाहर आये। उजाले में आते ही उन्होंने चीख़ कर नौकरों को बुलाया। मगर कोई न बोला... तंग आ कर उनके कमरों की तरफ़ गये। हर एक मीठी नींद के मज़े ले रहा था। लाख जगाने पर भी कोई नौकर न जागा। मजबूरन उन्हें नौकरों का ख़याल छोड़ देना पड़ा। उनका ख़याल था कि शायद कनेक्शन काट दिया गया है। फिर भी उन्होंने बरामदे का स्विच दबाया। बरामदे में रोशनी फैल गयी। इसी रोशनी के सहारे वे फिर कमरे में आये। नवाब साहब और रेहाना को वहाँ से उठाने के बाद उन्होंने फ़ोन उठाया।
पुलिस ऑफ़िस में सब-इन्स्पेक्टर ने पूछा। ‘‘हैलो, कौन है?’’
कुँवर साहब ने कहा। ‘‘मैं कुँवर ज़फ़र अली ख़ाँ हूँ, अख़्तर लॉज से बोल रहा हूँ। क्या माथुर साहब हैं?’’
जवाब मिला। ‘‘नहीं...’’
‘‘अच्छा सुनिए, आप फ़ौरन यहाँ चले आइए और अगर फ़रीदी साहब और हमीद साहब हों तो उन्हें भी लेते आइएगा।’’
‘‘मगर वे लोग सात बजे से ग़ायब हैं।’’
‘‘ठीक है फिर आप ही आ जाइए,’’ यह कह कर कुँवर साहब ने फ़ोन रख दिया।
सब-इन्स्पेक्टर बिमल मुखर्जी के आने तक कुँवर साहब अपनी दिमाग़ी उलझनों पर क़ाबू पा चुके थे। वे बार-बार यह सोच रहे थे कि कहीं उन्होंने धोखा तो नहीं खाया। मगर वह शक्ल बिलकुल इन्स्पेक्टर फ़रीदी की थी। और अगर मान भी लिया जाये कि वह इन्स्पेक्टर फ़रीदी नहीं था तो आख़िर मुझे वह मना क्यों कर गया... अगर फ़रीदी न होता तो... वह मुझे मना न करता... वह अगर फ़रीदी था तो उसने ऐसा क्यों किया... इन्स्पेक्टर फ़रीदी एशिया का मशहूर जासूस और... लुटेरा...? यह नहीं हो सकता।’’
आख़िरकार उन्होंने यह तय किया कि वे सब-इन्स्पेक्टर को यह बता दें कि उस शख़्स की शक्ल बिलकुल फ़रीदी से मिलती थी।
मिस्टर मुखर्जी को पूरा बयान लिखवाने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उसे देखा था। उसका हुलिया और सूरत...’’ उनका जुमला पूरा भी न हो पाया था कि गोली चलने की आवाज़ आयी और सामने की कॉर्निस पर से एक कबूतर फड़फड़ा कर गिरा और मर गया। कुँवर साहब रुक गये। उनके लिए यह ख़तरे का सिगनल था।