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पंजाबी मालकिन और नौकर complete

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Guest
पंजाबी मालकिन और नौकर

मित्रो मुझे नही पता ये कहानी किसने लिखी है मैं तो सिर्फ़ मनोरंजन के लिए यहाँ आरएसएस पर पोस्ट कर रहा हूँ

यह कहानी एक नौकर की ज़ुबानी है.

मेरा नाम धर्मा है. मेरी उमर 18 साल है. बचपन से मेरे माँ बाप का कोई अता-पता नहीं, इसलिए मैं सड़कों फूटपाथ पर ही पला - बड़ा हुआ. कभी अख़बार बेचकर रोटी खाता तो कभी गाड़ियाँ सॉफ कर के. एक साल पहले मैं एक एजेन्सी में आ गया जो लोगों को सर्वेंट्स दिलाती थी. मैं शक्ल से भोला भाला दिखता हूँ और बोलता भी बहुत कम हूँ, ज़्यादातर चुप ही रहता हूँ.

मैं-ने कुछ दिन एजेन्सी में ही पीयान का काम किया. उन्होने मुझे खाना बनाना और झाड़ू पोछा लगाना भी सिखाया जिस-से कि मैं एक सम्पूर्न नौकर बन पाऊ.

2 महीने पहले की बात है जब मैं एक घर में नौकर लगा. वह पंजाबी थे, मालिक सरदार और मालकिन पंजाबन थी. मालिक का नाम जसपाल सिंग और मालकिन का ज़स्प्रीत.

मालिक की उमर लगभग 40 और मालकिन की 33 है. उनकी एक बेटी है जो फॉरिन में पढ़ रही है. मालिक किसी कंपनी का मॅनेजर है और अक्सर टूर पे रहता है.

मालकिन एक टिपिकल पंजाबन हैं. बात पंजाबी में ही करती हैं. हाइट 5.8’’, जैसे कि टिपिकल पन्जाबनो की होती है, थोड़ी मोटी, पेट बहुत हल्का सा बाहर निकल रहा है, चूतड़ बड़े और भरे भर हैं, मम्मे (ब्रेस्ट) भी बड़े और भरे भरे हैं, कमर होगी लगभग 35 इंच, रंग काफ़ी गोरा, होंठ नॉर्मल से थोड़े बड़े जो कि लाल लिपीसटिक में शराब की बोतल लगते हैं. कहने का मतलब हैं कि मालकिन का शरीर आम औरतों से ज़्यादा बड़ा है, इतनी मोटी नहीं हैं, बस शरीर का साइज़ बड़ा है.

मेरी हाइट 5.6" है, रंग काफ़ी सावला है, मालिकिन के रंग के आयेज तो मेरा रंग काला ही कहलाया जाएगा. मेरी शक्ल भोली है, सिर के बाल बहुत कम करवा रखे हैं, एक तरह से मैं गंजा ही हूँ, इसलिए बच्चा लगता हूँ. लेकिन मेरी थोड़ी थोड़ी मसल्स भी हैं. मुझे ज़्यादा पंजाबी भाषा नहीं आती थी लेकिन मालकिन की पंजाबी सुनते सुनते अब मैं भी थोड़ी कच्ची पक्की पंजाबी बोलने लगा हूँ. मालकिन तो हमेशा पंजाबी बोलती हैं.

मैं रात को किचन में सोता हूँ. घर वालों को मुझ पर भरोसा है.

रोज़ सुबेह उठ कर मैं सबसे पहले मालिक-मालकिन के लिए बेड-टी बनाता हूँ.

यह उन दिनो की बात है जब मालिक टूर पे गये हुए थे. सुबह हुई तो मैं-ने मालकिन के लिए बेड-टी बनाई और उनके कमरे में गया.

मालकिन को मैं आवाज़ दे कर उठाता था, कमरे में जाकर मैं बोला

मैं : बीजी, चाह (टी) रखी ए..

मालकिन : लेह आया चा, धरम की टाइम होया ए ?

बीजी दी आँखें बंद सी

मैं : बीजी 7 वजेह ए..

बीजी दिन बिच (में) ते सलवार कमीज़ पान्दी (पेहेन्ती) एह्न ते रात नू सोन्दी/सोती भी सलवार कमीज़ इच ही ए.पर रात वाला सलवार कमीज़ बहुत पतले कपड़े का होता है इसलिए थोड़ा सा ट्रॅन्स्परेंट है जिस में से उनकी काली ब्रा कुछ कुछ दिखाई देती है. दिन बिच बीजी सलवार कमीज़ दे नाल दुपट्टा या चुन्नि नहीं पहन्दि. ऊना दे सलवार कमीज़ बड़े रंग बिरंगे होंदे ए. वैसे मेरा दिमाग़ उनके शरीर पर कभी नहीं गया था लेकिन एक सुबेह....

मैं चाय लेके बीजी के कमरे में गया तो मैं-ने देखा कि बीजी पेट के बल सो रही थी और उनकी कमीज़ उनके चूतड़ से भी ऊपर उनकी कमर तक चढ़ि हुई थी. उनकी सलवार उनके चूतडो के बीच में घुसी हुई थी. यह देख कर मुझे अपनी शू शू में पहली बार कुछ फील हुआ. उनकी सलवार भी थोड़ी ट्रॅन्स्परेंट थी इसलिए हल्का हल्का ऊना दा अंडरवेर भी दिख रहा सी. में पहली वार ऊना दे चूतडो दा आक्चुयल साइज़ देख रहा सी. ऊना दे चूतड़ ज़्यादा मोटे ते नहीं पर बड़े काफ़ी सी. मेरा दिल किया कि मैं ऊना दी सलवार ऊना दी चूतड़ दे बीच में से निकाल दूं.... लेकिन..क्या करूँ.. ऐसा कर नहीं सकता था..मैं ऊना दी चूतडो विच फॅसी हुई सलवार विच ईना खो गया कि मैं-नू पता ही नहीं चला कब बीजी थोड़ा मूडी और बोलीं

बीजी : धरम, किथे खोया हुआ ए, चा रखेगा वी या इसी तरह खड़ा रहेगा

बीजी दी आवाज़ में थोड़ा गुस्सा था..मेरी नज़र बीजी दे चूतडो ते सी..बीजी ने अपनी सलवार नू देखा तो पाया कि वो चूतडो से ऊपर चढ़ि हुई सी.... ते उनके नौकर की नज़र उनके चूतडो के बीच फसि हुई सलवार पर थी..

बीजी ने फॉरन एक हाथ से अपनी हिप्स में फसि हुई सलवार को पकड़ कर बाहर किया और ऊपर चढ़ि हुई कमीज़ नीचे करी..उनका अपनी सलवार को अपनी हिप्स में से निकालना मुझे बहुत अच्छा लगा

बीजी : धरम, मैं केया चा रख दे

मैं : जी बीजी....आज तुस्सी थोड़ी देर नाल उठे हो

बीजी : नहीं, मैं ते सही टाइम ते उठ गयी....तू ही चा लेके किन्ही ख़यालों विच खोया सी..

मैं : नहीं बीजी..मैं सोच रेया सी त्वानु नींद ता जागावां कि नहीं

बीजी : ज़्यादा गलां ना बना...चा रख दे और जा

बीजी को पता चल गया था कि मेरा ध्यान कहाँ था...इसलिए उन्हे थोडा गुस्सा आया..लेकिन इसमें मेरा क्या कसूर था..जो सामने होगा वही तो दिखेगा.... ........तब से मेरी आँखों के सामने बस बीजी के चूतड़ और चूतडो में फसि सलवार की ही फोटो आती रही..

बीजी नहा धोकर आई..आज उन्होने काले रंग का सलवार कमीज़ पहना था...उनके गोरे बदन पे काला रंग ग़ज़्ज़्ज़ज़ब लग रहा था...वो सलवार कमीज़ उन्होने पहली बार पहना था..

अपना नाश्ता बीजी खुद बनाती थी..लंच और डिन्नर मैं बनाता था..जितनी देर वो नाश्ता बनाती उतनी देर मैं घर की सफाई में लगा होता था....
 
करीब दोपहर के 1 बजे थे...कपड़े धोने के बाद मैं किचेन मे लंच के लिए सब्जी बना रहा था......तब बीजी किचेन मे आई.....

बीजी : धर्मा, की बना रेया है आज

मैं : बीजी तुस्सी दस्सो, वैसे मैं ते दम आलू बनाने दी सोच रेया आं

बीजी : हां, दम आलू ही ठीक है

मैं : बीजी, तुस्सी कही बाहर जा रहे हो?

बीजी : नही ते...क्यो ?

मैं : त्वाड्डे कपडो नू देख के लगा कि तुस्सी बाहर जा रहे हो

बीजी : कपडो नू......ओह..ए सूट मैं पहली वार पाया ए....नया सिलवाया ए

मैं : बीजी, एक गाल दस्सा

बीजी : की ?

मैं : तुस्सी इस सूट विच बहुत सुंदर लग रहे हो..........ए काला रंग त्वानु बहुत सूट कर रहा है

बीजी : अच्छा, ते तू ए ही देख दा रेन्दा ए की

मैं किस सूट विच कैसी लग रही आँ

मैं : नही ऐसी गल नही ए....

बीजी : काला सूट मैं पहली वार सिलवाया ए.....

मैं : बीजी इस सूट दी चुन्नी किस रंग दी ए...

बीजी : सफेद रंग दी..

मैं : सफेद.....मैंनु नही लगदा कि सफेद चुन्नि इस काले सूट नाल मैंच करे..

बीजी : मैं वी पहन के नही देखी.......हून आंदी आ बीजी अपने कमरे से चुन्नी लेने

गयी......वापस किचेन मे आई तो उन्होने चुन्नी पहनी हुई थी

बीजी : ले देख......कैसी लगदी ए ?

मैं : नही बीजी....मैंनु ते अच्छी नही लगी........इस से तो आप बिना चुन्नी के ही अच्छे

लगते हो...

बीजी : सच दस....अगर मैं ए चुननी पा के अपनी सहेली दे घर जावां ते वो मेरा मज़ाक ते नही करेंगी ?

मैं : मेरे ख़याल ते करेंगी....

बीजी : ते तू दस....केडि रंग दी चुन्नी पावां इस सूट नाल ?

मैं : पर त्वानु चुन्नी पहनने की लोड (ज़रूरत) की ए...

बीजी : ते की मैं घर दे बाहर बगैर चुन्नी दे जावां...

मैं : आ हो...ते क्या हुआ

बीजी : तू पागल ए...शरीफ घराँ दी औरते घर दे बाहर चुन्नी पहन कर के ही निकल्दि ए

मैं : पर किस वास्ते....

बीजी : किस वास्ते!..........ताकि लोग उन्हानू बुरी नज़ारा नाल ना देखे

मैं : की गल कर दे हो बीजी...........चुन्नी दे बगैर लोग बुरी नज़र नाल क्यो देखांगे ?

बीजी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी जो वो छुपाने की कोशिश कर रही थी

 
बीजी : धर्मा...तू 18 साल दा हो गया ए तेनू ए वी नही पता...

मैं : मैंनु कौन दस्सेगा बीजी...

बीजी : तेनू दिख नही रहा कि अगर मैं ने चुन्नी नही पहनी ते.......किस तरह दस्सा तेनू..?

मैं : अच्छा बीजी, चुन्नी दा काम की है..

बीजी : चुन्नी ढक्कन वास्ते की जाँदी ए...

मैं : ढक्कन वास्ते...की ढक्कन वास्ते....छोटी सी चुननी आख़िर की ढक सकदि ए..?..बीजी तुस्सी

वी ते ए सफेद चुन्नी पा रखी ए.....की ढक दी पयी ए ये?...मैंनु ते लगदा नही कुछ वी धक दी पयी ओ...

बीजी : ते ले हुन मैं चुन्नी उतार दी आं..

बीजी ने चुन्नी उतार दी

बीजी : ले..हुन दस..ए चुननी पहले कुछ धक दी नही पयी सी

मैं : ओह....बीजी...मैं समझ गया....ए औरता दे उन्हां नू धक दी ए...

बीजी : आ हो...ए औरता दे उन्हां नू धक दी ए

मैं : मैं ता कड़ी औरता दे ढक्कन वाली चीज़ ते गौर ही नही कित्ता......हुन मैं मार्केट जाते

हुए इस चीज़ ते गौर करांगा....

बीजी ने चुन्नी उतार दी थी

बीजी : चीज़.....किस चीज़ ते गौर करेगा ?

मैं : ए ही कि किस औरत ने ढकि हुई ए और किसने नही......

बीजी : तू ज़रूर मार खाएगा....

मैं : पर बीजी....औरता नू ओह ढक्कन दी लोड की ए.....मरद ते नही ढक दे

बीजी : जो औरतो दा होन्दा ए ओ मरदो दा नही होन्दा...

मैं : ओह ते ठीक ए....पर मरद औरता दे उन पे बुरी नज़र क्यो डालेंगे ?

बीजी थोड़ा सा मुस्कुराते हुए बोली

बीजी : शायद मारदा नू ओ चीज़ अच्छी लगदी ए..

मैं : ए लो...ए विच अच्छा लगन दी की गल ए...

बीजी : ए मैंनु की पता.............तू ए दस कि कौन से रंग दी चुन्नी इस सूट नाल मैंच करेगी...

मैं : बीजी मेरे ख़याल नाल ते काले रंग दी चुन्नी ही इस नाल मैंच करेगी.....

बीजी : ह्म्म.....शायद तू ठीक केंदा ए....काली चुन्नी ते मेरे पास है वी...

 


मैं : बीजी मार्केट विच जगह जगह रंग और पिचकारियाँ मिल रही है...की होली आने वाली ए ?

बीजी : आने वाली की ए....कल ते है होली..

मैं : बीजी तुस्सी खेल्दे ओ होली ?

बीजी : पहले खेल्दि सी......लेकिन इस शहर विच अस्सी नये ए....ते खेलन वाला कोई है ही

नही...ऊपरो तेरे साब वि नही है इस वारी..

मैं : बीजी मैंनु ते होली बहुत पसंद ए.........पर इस वारी लगदा ए मैं वी नही खेल पावान्गा

बीजी : क्यूँ..तेरे दोस्त नही बने यहा पर....मैं तेनू कल दी छुट्टी दे सकदि आं

मैं : इत्थे मेरा कोई दोस्त नही ए.........बीजी तुस्सी खेलोगे मेरे नाल ?

बीजी : मैं....!!....मैं-नू ते होली कोई ख़ास पसंद वी नही ए....

मैं : ठीक ए....इक साल होली नही खेली ते कौन सी आफ़त आ जाएगी.....अगले साल तक ते शायद

दोस्त बन जाए मैंने मूह लटकाते हुए बोला.....बीजी से मेरा दुख देखा ना गया

बीजी : अच्छा ठीक ए....मैं थोड़ा खेल लेवान्गी तेरे नाल.....पर ए गल तेरे साब नू पता नही चलानी चाहिए...ओ शायद बुरा

मान बैठे

मैं तोड़ा खुश हो कर बोला

मैं : नही बीजी साब नू ए गल पता कैसे चलेगी...........ते मैं मार्केट जा के थोड़ा

रंग ले आन्वा

बीजी : हून नही.........खाना खाने दे बाद जावी

बचपन मे मेरे काफ़ी यार दोस्त बन गये थे जो मेरी ही तरह सडको पर रहते थे...हम आपस

मे खूब होली खेला करते थे...भांग भी पीते थे...

खाना खाने के बाद मैं मार्केट से थोड़ा गुलाल, थोड़ा पक्का रंग, गुब्बारे और खुद के

लिए भांग ले आया..................लेकिन घर आकर मैंने बीजी को सिर्फ़ गुलाल और गुब्बारे ही

दिखाए.. बीजी टैबल पर खाना खाती थी और मैं फर्श (फ्लोर) पर. जब साब होते थे तो मैं खाना

किचेन मे खाता था......लेकिन जब साब नही होते थे तो मैं और बीजी टीवी देखते हुए

खाना खाते थे..बीजी टैबल पर और मैं फर्श पर..........खाना खाते हुए बीजी बोली

बीजी : धरम, तेनू दम आलू बनाने हून आए नही......

मैं : क्यो बीजी, की कमी सी

बीजी : दम आलू दी ग्रेवी काफ़ी गाढी होनी चाहिए....और तरी ते बिल्कुल पानी सी

मैं : गाढी कैसे की जांदी है ?

बीजी : अगली वार मैं बनावान्गि दम आलू ते देखी..

मैंने हसते हुए कहा

मैं : हाँ....हो सकदा है त्वाडे आलुओ विच दम हो....

बीजी : और ए जे तू कल आम लाया ए....विल्कुल सूखे ए....इस विच ते ज़रा वी रस नही.....तेनू आम देखने नही आंदे ?

मैं : बीजी मेरे ख़याल नाल ते आम जितना बड़ा होन्दा ए...उस विच उतना ज़्यादा रस होन्दा ए...ऐसा नही है की?

बीजी : ज़रूरी नही.......तू आम दबा के नही देखदा..

मैं : नही

 
बीजी : अगर आम आसानी नाल दब जाए ते वो रसीले है...अगर नही ते उन्हां विच रस नही है

मैं : ठीक है बीजी, अब से हर वार आम दबा के देखूँगा..

बीजी : और तू काटने वाले आम क्यो लाया है....चूसने वाले क्यो नही लाया

मैं : क्यो बीजी, चुसन वाले आम कोई अलग होंदे है

बीजी : और की...चुसन वाले आम विच रस ज़्यादा होन्दा ए....

मैं : बीजी पर मेरे ख़याल ते चुसन वाले आमा दा साईज थोड़ा छोटा होन्दा ए.....ते जिन

आमा दा साईज बड़ा होन्दा ए वे कट्टन वास्ते होंदे ए..

बीजी : चुसन वाले आम छोटे ते नही.......लेकिन इनने बड़े वी नही होंदे कि किसी

दे हाथ विच ही ना आएँ.......चुसन वाले आम हाथ विच आसानी नाल आ जांदे ए.................

मैं : मैं ते कदि चुसन वाले आम खाए नही......

बीजी : चुसन वाले आम हो ते इक आमों जी नही भर्दा........दो आम ते खाने ही पेन्दे

ए...चूसन पेन्दे ए

मुझे नही मालूम बीजी ने किस मीनिंग से कहा था...लेकिन मुझे लगा बीजी आम के बारे मे

नही अपने मम्मो (चूची) के बारे मे बोल रही है..जो कि उनकी काली कमीज़ विच दब्बे है..

अगले दिन मैं सुबह उठ कर बीजी दे कमरे विच चा (चाय) ले गया ते मेरी नज़र बीजी दे मम्मो

ते पडी ते मैंनु बीजी दी कल रात की आम वाली बात याद आ गयी......कि आम दबा के देखने

चाहिए.......................................

बीबी जी सो रही थी..........

मैं : बीजी, चा रखी ए...

बीजी : ले आया चा...

मैं : बीजी मैं कया हैप्पी होली

बीजी : ओ.....तेनू वी

फिर बीजी बाथरूम से फ्रेश हो कर आई

मैं : बीजी नाश्ता रखा ए......ते तुस्सी हून नहाना नही....होली खेलने दे बाद ही नहाना

बीजी ने मुस्कुराते हुए कहा

बीजी : अच्छा...मैंनु ना पता सी.. नाश्ता करने के कुछ देर बाद

बीजी : पर धरम पुतर....अस्सी होली खेलांगे कित्थे.?

मैं : बीजी छत (रूफ) ते खेलांगें......साड्डी छत सबसे ऊची ए..कोई सानू देखेगा

नही....और तीन तरफ ऊची दीवाराँ वी ते ए..

बीजी : ठीक ए..

मैं : तुस्सी छत ते चलो...मैं सारे दरवाज़े चेक करके ऊपर आन्दा आं..

मैंने सारा रंग रात को ही बना लिया था, और गुब्बारे भी रात को ही तैय्यार कर लिए

थे...मैंने भांग किचेन मे छुपा रखी थी..

 


जब मैं ऊपर गया तो बीजी सड़क पर देख रही थी......सिर्फ़ सामने की तरफ से ही छत की दीवार छोटी थी....बाकी तीनो तरफ से दीवारे काफ़ी ऊँची थी.....मैंने सोचा पहले गली मे जाते हुए लोगो को गुब्बारे मारे जाए

मैं : चलो बीजी.... ए रही गुब्बारों दी बाल्टी...ए मैं कल रात ही तैय्यार कर लित्ति सी

बीजी : पर इन गुब्बाराँ दा की करांगे..

मैं : की करांगे..!!...गली विच जांदे हुए लोगां ते मारेंगे.....

बीजी : कोई देख लेगा ते समझ लेगा कि तू ते मैं होली खेल रहे ए...

मैं : अडोस पडोस दे लोग ते टोली विच गये ए...मैं देखा सी...टोली वापस 2 घन्टे से पहले नही

आएगी........ज़्यादा गल है ते तुस्सी गुब्बारा मार के छुप जाना

बीजी मान गयी......बीजी ने हाथ मे गुब्बारे

लिए और मारने लगी.....

बीजी : धर्मा...जो आदमी साईकिल ते आ रहा ए..मैं ए गुब्बारा उस्ते सिर ते मारान्गी....

मैं : रहन दो बीजी..त्वाड्डे निशाने इन्ने अच्छे नही ए...

बीजी ने मारा और ओ गुब्बारा उस आदमी ते सिर ते ही पड़ा........अस्सी दोनो छुप गये.....बीजी

ज़ोर ने हसने लगी..

बीजी : देखा धरम.....मेरे निशाने ते तेनू हून वी शक ए ?......

मैं : अरे बीजी...आप नू ते काफ़ी प्रैक्टिस लगदी ए............हूँ मैं उस आती हुई औरत दे

सिर ते मारांगा

मैंने मारा और गुब्बारा उसके सिर पे

लगा............हम फिर से छुप गये और हँसने लगे..

 


बीजी : धरम लगदा ए तू वी काफ़ी प्रैक्टिस किति ए...

मैं : ओ देखो इक औरत और जा रही है.....ए ले मेरा गुब्बारा..

मैंने गुब्बारा उस औरत के मम्मो पे मारा था और वो वही लगा............हम दोनो छुप

गये.....बीजी थोड़ा थोड़ा हसने लगी फिर मुस्कुराने लगी...

बीजी : पुतर.....तू ग़लत जगह मार दित्ता है....

मैं : नही बीजी....उसको तो पता वी नही चला होगा.........कितने बड़े थे उस दे....

फिर एक आदमी आ रहा था...थोड़ा बूढा था....

बीजी : हुन मेरी वारी.....

बीजी ने उस बूढ़े को मारा तो उसके पेट पे लगा....................हम फिर छुप गये..........बीजी की हँसी नही रुक रही थी.......

मैं : ओह बीजी........थोडा ऊपर रह गया.........इस वार निशाना चूक गया त्वाड्डा........तुस्सी मारना ते पेट से थोड़ा

निच्चे सी

बीजी : धत.....मेरा इरादा उधर मारना नही सी..........मैं तेरी तरह नही जो ग़लत जगह मारू....

अब गली मे दो औरते जा रही थी..

मैं : हुन दस्सो....किस औरत दे माराँ....लेफ्ट दे की राईट दे

बीजी : लेफ्ट दे..

मैं : उस दे किस ते माराँ......लेफ्ट ते कि राईट ते..

बीजी : लेफ्ट ते.....नही नही............की मतलब.......

मैंने लेफ्ट वाली औरत दे लेफ्ट मम्मे ते मारा......................उस ते ही लगा......हम फिर छुप गये...........बीजी शरारती

मुस्कुराहट से हसने लगी...........

बीजी : तेनू ते मारने वास्ते इक ही जगह पसंद आई है.......

हुन बीजी सड़क ते देख रही सी की अगला वार कौन होगा........मे थोड़ा पीछे गया और बोला

मैं : बीजी.....औरा नू ते बहुत मार लित्ता, हुन अस्सी वी ते थोड़ा रंग लगा ले......इत्थे आ जाओ

बीजी थोड़ा पास आई और बोली

बीजी : नही नही....मैंनु डर लगदा ए.....मैं ज़्यादा रंग नही लगान्दि....

मैं : बीजी.....हूँ बहाने ना बनाओ.....इत्थे आओ..

बीजी : ना.......मैं नही आंदी.....

मैं : ते मैं ही आ जान्दा आं...

बीजी मुझसे दूर भागने लगी...........हँस रही थी

बीजी : मैं तेरे हाथ ना आवान्गी........

मैं बीजी को पकड्ने के लिए भागा...........बीजी कभी इधर होती...कभी उधर........मैंने हाथ मे गुलाल

ले रखा था.........

मैं : बीजी.......आआ.......हा हा.....बचोगे नही तुस्सी........

बीजी : ही.....दूर रे मुन्डया........

बीजी भाग रही थी...मैं उनके पीछे भाग रहा था रंग लगाने के लिए............वे

हसती जा रही थी.......कुछ देर बाद मैंने उन्हे पकड़ ही लिया और उनके गालो पे गुलाल

लगाने लगा............वे मुझे से फिर से भागे ना इसलिए मैंने एक हाथ से उन्हे कमर से

पकड़ लिया...

मैं : हाहा....ये...पकड़ लिया ना

बीजी.........ओह हूऊऊ......होली है.

मैं बीजी के गालो पे गुलाल मल रहा

था.......बीजी छुड़ाने की कोशिश कर रही थी...

बीजी : म्म्म्मीमम.......बस बस.....ज़्यादा मत लगा.......

 
बीजी छुडा कर फिर भाग गयी.............मैं भी उनके पीछे भागा.......जहा रंग रखे

थे मैंने उन्हे वहाँ जा के पीछे से पकड़ लिया.......पीछे से एक हाथ उनके पेट पे रखा

और पीछे से ही एक हाथ से उनके गालो पे गुलाल मलने लगा.....

मैं : ओ..बीजी....होली है.........

बीजी : हट शैतान.......एम्म्म

हम लोग फ्रंट की दीवार से काफ़ी दूर थे....इसलिए हमे कोई देख नही सकता था.................................क्योकि रंग और

गुब्बारे बिल्कुल पास मे ही पड़े थे, मैंने उनके गाल से हाथ हटा कर एक गुब्बारा हाथ मे

लिया.....और अपने हाथ मे ही रख के बीजी के पेट पे मारा.......

मैं : होली है...........

बीजी : ओह्ह्ह...पुतर....मैंनु वी गुब्बारे मारदा है......

मेरा एक हाथ अभी बीजी के पेट पर कस के रखा था जिससे बीजी भाग ना जाए.....................

मैंने डिब्बा (जार) रंग की बाल्टी मे डाला........और डिब्बा बीजी के सिर पे उलट दिया...........

बीजी : ओह्ह्ह.....तू ते मैंनु पूरा गीला कर दित्ता है...छोड़ मैंनु...

मैं : बीजी.....हाली ते होली शुरू ही किटी है.......

मैंने एक डिब्बा और डाल दिया बीजी के सिर पे.........................बीजी ने रात वाला

सलवार कमीज़ पहना था जो की बहुत पतले कपड़े का था....बीजी की कमीज़ गीली हो गयीथी...

.उनके बदन से चिपक गयी थी...उनका काला ब्रा सॉफ दिख रहा था...और हल्की हल्की पूरी स्किन....

अब मैंने हाथ मे थोड़ा गुलाल और लिया और

बीजी के गले पे मलने लगा..........जो हाथ मेरा उनके पेट पे था मैं उससे उनका पेट हल्का

हल्का दबाने लगा तो बीजी हसने लगी...

बीजी : हहाा..हाय........मत कर..हाआ...मैंनु गुदगुदी होंदी ए..

अब मैं उनके पेट पे गुलाल मलने लगा.....मैंने दूसरे हाथ मे भी गुलाल ले लिया और पीछे से

ही दोनो हाथो से उनके पेट पे कस कस के गुलाल मलने लगा.........

बीजी : ओह्ह्ह..हाया...तू ते मेरी कमीज़ वी खराब करेगा...

मैं : ते होली विच कपड़े कहाँ बचते है बीजी...........

अब बीजी ने झुक कर थोड़ा गुलाल उठाया और मुड कर मेरे मूँह पर मलने लगी...

बीजी : तू मेरे ही लगान्दा रहेगा.क्या....मैं तेरे वी ते लगावान्गि.......

बीजी मेरे मूँह पे गुलाल लगा रही थी....मेरा हाथ उनके पेट पे था....मैंने भी थोड़ा गुलाल

और लिया..और हाथ उनकी पीठ के पीछे ले जाके

उनकी पीठ पे गुलाल रगडने लगा......उनकी कमीज़ उनकी स्किन से चिपकी हुई थी इसलिए मेरे

हाथ उनकी स्किन के बिल्कुल पास थे...
 


बीजी ने रंग का डिब्बा उठा के मेरे सिर पे डाल दिया........मेरे हाथ उनकी पीठ पे थे....मैंने

एक हाथ उनके पेट पे रखा और फिर दबाने लगा.............................बीजी फिर हँसने लगी

बीजी : हा हा हाआआआआअ......ईईई.......

बीजी थोड़ा छूडाने की कोशिश करने लगी तो मैं फिर उनके पीछे आ गया......बीजी हँस रही थी............मैंने एक हाथ मे गुब्बारा लिया और हाथ मे रखते हुए ही बीजी की धुन्नी (नेवल) पे दे मारा...

बीजी : आह.......

मैं बीजी के गुदगुदी अब भी कर रहा था और बीजी हंस रही थी..

मैंने एक गुब्बारा और लिया हाथ मे और बीजी के राईट मम्मे पे दे फोड़ा....

बीजी : आह.....धर्मा...कित्थे मारदा पया ए...

मैंने गुब्बारा मारते ही मम्मे से हाथ हटा लिया

मैं : बीजी तुस्सी वी ते देखो इस जगह गुब्बारा लगदा ए ते कैसा लगदा ए.....

मैंने एक गुब्बारा और लिया और हाथ मे ही रखते हुए बीजी के लेफ्ट मम्मे पे दे फोड़ा..

बीजी : आह.....होली ए.....

इस बार मैंने गुब्बारा फटने के बाद बीजी के मम्मे को हल्का सा दबा दिया...

बीजी : आह...

बीजी की कमीज़ उनके मम्मो से चिपकी हुई थी....

मैंने रंगो के पास ही छुपा कर भांग रखी थी...लेकिन मैंने उस मे थोड़ा सा रूह आफज़ा

मिक्स कर दिया था................मैंने भांग का एक गिलास उठाया और बीजी को दिया...मैं बीजी

के पीछे था और बीजी के पेट और पीठ पे गुलाल लगा रहा था.......मैंने पीछे से ही

गिलास आगे किया....

मैं : ए लो बीजी.......थोड़ा नाश्ता वी कारलो...

बीजी : ए की है...

मैं : कुछ नही बीजी...रूह आफज़ा ए.....मैं पहले ही बना के ले आया सी..

किसी ने बहुत तेज़ वोल्यूम पे गाने चला दिए......."अंग से अंग लगाना, साजन हमे ऐसे रंग लगाना"..

बीजी भांग दा सारा गिलास इक झट्के विच पी गयी..

मैं : अच्छा लगा बीजी...

बीजी : आ हो.....तू पहली वार इतना अच्छा रूह आफज़ा बनाया ए..

मैं : बीजी....तुस्सी भांग पीती ए.......

बीजी : की!........भांग.....

मैं : आ हो बीजी...होली ते भांग पीती जांदी ए........त्वानु टेस्ट ते अच्छा लगा..

बीजी : टेस्ट ते ठीक ए....पर ए पीना ठीक नही...

मैं : बीजी साल विच इक बार पीने नाल कुछ नही होन्दा..........और लोगे..

बीजी : चल...थोडि दे दे...

मैं : पहले थोड़ा और गीला हो लो..

मैंने रंग का डिब्बा उठा के उनके सिर पे डाल दिया.........वो मुझसे डिब्बा छीनने

लगी.....छीना झपटी मे हम दोनो का बैलंस बिगड़ गया और हम दोनो नीचे गिर गये.....खड़े

खड़े थोड़ा थक भी गये थे इसलिए फिर से खड़ा होने की कोशिश ही नही की..........बीजी लेट गयी...

.उन्होने ने मुझसे डिब्बा ले लिया और लेटे लेटे ही मुझ पर रंग गेरा.....मैंने अब की बार पक्का वाला रंग

निकाला..और बीजी के लगाने लगा ..

बीजी : ए नही धर्मा....ए पक्का रंग लगदा ए....ए नही

मैं : बीजी अगर पक्का रंग नही लगाया ते याद कैसे रहेगा कि हम होली खेले

थे.....लगवालो बीजी वरना त्वानु पता ए मैं ते लगा ही दूँगा......

बीजी : ये रंग आसानी से नही सॉफ होगा....और अगर इस बीच तेरे साहब आ गये तो

उन्हे पता चल जाएगा कि मैं होली खेली ए........फिर ओ मेनू पुच्छान्गे कि केडे नाल होली

खेली ए..ते मैं की कवान्गी.........नही मैं नही...

ये कह के बीजी खडी हो कर मुझसे भागने लगी....

 
मैंने सोचा पहले थोड़ी भांग पीली जाए...................मैंने भांग की भरी हुई बोतल उठाई और गटा-गट पीने लगा..

बीजी : ओ धर्मा......इन्नी भांग ना पी....तेनू नशा चढ जाएगा....

मैं पीता रहा....

बीजी : बस कर......बस कर.......

मैंने पूरी बोतल एक घून्ट मे ही ख़तम कर दी........मुझे पता था कि एक दो बोतल ने नशा

नही चढ्ता था.....और वैसे भी जो भांग मैं लाया था वो ज़्यादा स्ट्रोन्ग नही

थी..........मुझे तो बस थोड़े नशे का बहाना चाहिए था..

मैं : आ...मज़ा आ गया...जान आ गयी.... मैं खड़ा हुआ...हाथ मे पक्का वाला रंग लिया

और बीजी की तरफ भाग पड़ा......बीजी भी भाग पडी....

बीजी : हा..हा..(बीजी हंस रही थी)......हुन ना पकड़ पाएगा तू मैंनु...ईई

मैं : रहने दो बीजी.......(मैं बीजी के पीछे भाग रहा था)....इक मिनट दी गल ए...तुस्सी मेरे

पास होवोगी..

बीजी के पीछे भाग के मैंने बीजी को पीछे से पकड़ लिया....मैंने उनके पीछे खड़े होकर उन्हे

पेट से जकड लिया.........

बीजी : छोड़ मैंनु...बदमाश.....

मैं : पकड़ लिया ना बीजी.........हुन छुडा के देखो...

बीजी : मेरे मूँह ते मत लगाइयो ए पक्का रंग......ए रंग उतरेगा नही ते तेरे साहब

समझ जाएँगे कि मैं होली खेली ए......

मैंने बीजी को और जकड लिया..

मैं : मूँह ते नही ते और कित्थे लगावा बीजी............तुस्सी ते पूरे कपड़े पेन रखे ए....

बीजी : की.......तेनू भांग दा नशा चढ गया ए......छोड़ मैंनु...

मैं : बीजी....रंग ते मैं लगावांगा ही....तुस्सी बच नही सक्दे

बीजी : मूह पर ते मैं लगावान्गि नही.......मेरे कपड़ेया ते लगा ले..

मैं : ठीक ए बीजी.....पर ए ग़लत गल ए...खेर...ते मैं त्वाड्डे कपड़ेया ते ही लगावांगा..

मैंने उन्हे पीछे से पेट से पकड़ रखा था......

मैंने हल्के हल्के उनके पेट पर हाथ घुमाने शुरू किए....

फिर मैंने हाथ थोड़े ऊपर कर दिए और कस के दबाने लगा....मेरे हाथ उनके मम्मो से थोड़े से

दूर थे...

मैंने एक हाथ मे गुब्बारा लिया और उनके दोनो मम्मो के बीच मे फोड़ा...

बीजी : आह....

याद रहे की मैंने बीजी को पीछे से पकड़ रखा था......मैंने एक हाथ मे पक्का वाला रंग

मला और उसी हाथ मे गुब्बारा लेके बीजी के लेफ्ट मम्मे पे फोड़ा.......

बीजी : आह....

गुब्बारा फोड्ने के बाद भी मैंने उनके मम्मे से हाथ नही उठाया......

अब...मैं धीरे धीरे उनके मम्मे पे पक्का वाला रंग मलने लगा......उनका मम्मा मेरे हाथ मे

पूरा फिट नही आ रहा था....क्या करूँ..कमीना इतना बड़ा था...

मैं उनके मम्मे पे हाथ घुमा रहा था....

बीजी : स्श्ह....धर्मा...बस कर....

मैं : नही बीजी....तुस्सी ते कहा ए कि कपडो पे लगा ले.....बीजी...........तुस्सी बड़े सोफ्ट सोफ्ट हो..

ये कह कर मैं अब बीजी के सामने आ गया..और

हाथ उनकी पीठ पे ले जाके उनकी पीठ पे रंग मलने लगा...मैं और बीजी चिपके हुए थे.....

मैंने गुब्बारा उठाया और उनके राईट चूतड पे दे फोड़ा........मैं उनके राईट चूतड को

हाथ से दबाने लगा.....मैं अपना दूसरा हाथ उनके लेफ्ट चूतड पे ले आया और उस चूतड

को भी दबाने लगा...

मैंने हाथो मे और रंग मला........अब तक उनके चूतडो के ऊपर उनकी कमीज़ आ रही

थी......मैंने हाथो मे रंग माला और नीचे से हाथ ऊपर लाया...उनकी कमीज़ के अंदर

से...............अब मैं उनके चूतड ज़्यादा अच्छी तरह फील कर सकता था क्योकि अब उनके

चूतडो और मेरे हाथो के बीच उनकी सलवार और अंडरवीयर था.........मैं उनके चूतडो को

कस के दबा रहा था.....

बीजी : आ.....पुत्तर की करदा पया हाई ए...

मैं : बीजी रंग मलदा पया आं........

बीजी : कैसी कैसी जगह ते रंग मलदा पाया ए...

मैंने एक हाथ बीजी के चूतडो के बीच मे लाया......और एक उंगली उनके चूतडो के बीच

मे ऊपर नीचे करने लगा....

 
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