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पड़ोसन का प्यार compleet

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पड़ोसन का प्यार – भाग 1


(लेखक – कथा प्रेमी)

"तुम तो मुझसे कितनी ज़्यादा बड़ी हो उम्र मे शोभा दीदी. अच्छि ख़ासी ऊँची पूरी भी हो. मुझसे तीन चार इंच हाइट भी ज़्यादा है, वजन मुझसे दस बारह किलो ज़्यादा होगा. फिर भी तुम्हारा फिगर देखो कितना आकर्षक है" प्राची शोभा के भरे पूरे मासल शरीर की ओर प्रशंसा के भाव से देखते हुए बोली.

"वैसा कुछ नही है प्राची, हां मैं टिप टॉप रहती हूँ, कपड़े और ख़ासकर अंदर के कपड़े याने लिंगरी ठीक से चुनती हूँ, आधा काम बस ईसीसे हो जाता है" शोभा मुस्करा कर बोली.

दोनो औरतें दोपहर को प्राची के घर मे बैठ कर गप्पें लड़ा रही थी. शोभा को प्राची के बाजू वाले फ्लट मे रहने को आकर बस चाह महीने हुए थे. शोभा के पति दुबई मे काम पर थे. शोभा और उसकी सौतेली लड़की नेहा दोनो अकेले यहाँ रहते थे. यह फ्लॅट ख़ासकर नेहा के पापा ने इसी लिए लिया था कि अच्छि सोसाइटी थी और उन दोनो औरतों को अकेले वहाँ रहने मे कोई परेशानी नही होगी ऐसा उन्होने सोचा था.

प्राची ने अभी तीन महीने पहले अपनी बॅंक की नौकरी से इस्तीफ़ा दिया था, उसे अच्छ वीआरएस मिल गया था. प्राची के पति भी बॅंक मे थे और उनकी पोस्टिंग कानपुर मे हो गयी थी. इसलिए उनका यहाँ मुंबई आना बस साल मे तीन चार

बार होता था. उनके पुत्र दर्शन ने अभी अभी इंजिनियरिंग के पहले साल मे प्रवेश लिया था. प्राची बेचारी इसलिए दिन भर अकेली रहती थी. नयी सोसायटि होने के कारण उनके फ्लोर पर और कोई नही था, सब फ्लॅट खाली थे. प्राची को खाली समय काटने को दौड़ता था.

इसलिए शोभा जब से उसके पड़ोस मे रहने आई थी, तब से वह खुश थी. दोपहर को गप्पें मारने को कोई साथ तो मिल गया था. नेहा सुबह कॉलेज को निकल जाती थी तब शोभा भी अकेली रहती थी. इसलिए अब दोनो पड़ोसनों की अच्छि पटने लगी थी.

प्राची सैंतीस साल की थी. दिखने मे साधारण मझली उम्र की स्त्रियों जैसी ठीक ठाक थी. हां काफ़ी गोरी थी. शरीर मझोले किस्म का था, ना ज़्यादा मोटा ना पतला. असल मे प्राची काफ़ी स्लिम थी, पर उसके कूल्हे काफ़ी चौड़े थे. अपने स्थूल भारी भरकम नितंबों की वजह से वह थोड़ी मोटि दिखती थी, उसके बाकी के छरहरे बदन का इस वजह से पता नही चलता था.

 


प्राची इसलिए जब शोभा के नपे तुले शरीर को देखती तो उसके मन मे आता कि मैं ऐसी क्यों नही हूँ! शोभा उससे सात आठ साल बड़ी होगी, रंग भी सांवला था, काफ़ी गहरा सांवला. बदन मोटा नही था फिर भी अच्छ ख़ासा बड़ा और ऊँचा पूरा था, फिर भी शोभा दिखने मे एकदम आकर्षक लगती थी.

उस दिन दोनो मे यही चर्चा हो रही थी. टिप टॉप कपड़ों के महत्व के बारे मे जब शोभा बोली तो प्राची को बात जच गयी. उसकी निगाह फिर से शोभा के पूरे बदन पर घूमने लगी. शोभा हमेशा बड़े अच्छे कपड़े पहनती थी और खुद का बहुत ख़याल

रखती थी. एकदम सलीकेसे बाँधी हुई नाभि दर्शन साड़ी, बहुत करके स्लीवलेस ब्लाउस जिसमे से मरमरि बाँहें सॉफ दिखें और पल्लू के पतले कपड़े मे से दिखता हुआ उन्नत उरोजो का उभार, ऐसा रूप था शोभा का.

इसलिए वह हमेशा अच्छि लगती थी. उसके ब्लाउस आगे और पीछे से लो कट होते थे जिसमे से उसकी चिकनी पीठ और उरोजो के ऊपरी भाग का उभार दिखता था. ब्लाउस के बारीक कपड़े मे से शोभा की कस कर बाँधी हुई ब्रा के स्ट्रैप दिखते थे, जो उसकी पीठ के मास मे गढ़े होते थे. शोभा हल्की लिपस्टिक लगाती थी और बाल अक्सर एक जूडे मे बाँधती थी जिसमे वह मोगरे की वेणि भी लगा लेती. उसके साँवले रंग के कारण उसकी लाल लिप्स्टिक अक्सर जामुनी दिखती थी पर सब मिलाकर शोभा का रूप ऐसा मादक होता था कि काफ़ी मर्द उसे नज़र गढ़ाकर देखते थे, यह प्राची ने अक्सर गौर किया था. शोभा के उस रूप पर उसे बड़ी ईर्ष्य होती थी.

ठीक इसके विपरीत प्राची अपने रहन सहन और पहनावे पर ज़रा भी ध्यान नही देती थी. ढीली ढाली लपेटी हुई साड़ी, एकदम ढीला और बिना नाप का ब्लाउस और बहनजी जैसी दो चोटियाँ! इनमे वह कितनी अनाकर्षक दिखती थी इसका उसे एहसास हो चला था. मन मे एक न्यूनता की भावना, इन्फीरियारिटी कॉंप्लेक्स, आ गया था. एक अजीब उदासी उसके मन मे घर कर गयी थी.

प्राची की आँखों मे झलकती उदासी देखकर शोभा उसे प्यार से बोली "सुन प्राची, तू असल मे दिखने मे बहुत सुंदर है. गोरी है, तेरी त्वचा पर अब भी जवानी की चमक है. बुरा मत मानना अगर मैं सॉफ सॉफ बताऊं तो. कितने ढीले ढाले कपड़े पहनती है तू, वह ब्लाउस देख, कैसा अजीब सा है, बिना नाप का. और तेरी ब्रेसियार भी बहुत ढीली है, पीछे से स्ट्रप लटक रहे हैं. मेरी मानो तो अच्छि मॅचिंग ब्लाउस सिला लो, साड़ियाँ एक दो बहुत अच्छि हैं तेरे पास, जैसे कल पहनी थी. ब्लाउस मेरे दर्जी से सिला लो चाहिए तो. और नयी ब्रेसियार खरीद लो, नाप की. ज़रा अच्छे नये फॅशन की. बालों की स्टाइल बदल लो. फिर देखना कैसे रूप खिल उठता है तेरा. अगर तू चाहे तो मैं चलूंगी तेरे साथ शॉपिंग को."

प्राची को बात जच गयी. मन मे अच्छ भी लगा कि शोभा कितनी आत्मीयता से बात कर रही है. उसके स्वर मे अब थोड़ा उत्साह था "आज ही जाती हूँ, सच मे तुम चलोगि शोभा? याने मेरे साथ चलने को टाइम है ना तुम्हारे पास?"

 


"आरे, टाइम ही टाइम है. नेहा हफ्ते भर को अपनी सहेली के साथ गयी है. उसकी सहेली की बहन की शादी है पूना मे. मैं अकेली ही हूँ. उसकी चिंता मत करो. और अगर तू बुरा ना माने तो मैं अभी तुझे सिखाती हूँ कि साड़ी ठीक से कैसे बाँधी जाती है" कहकर शोभा ने बड़ी आत्मीयता से प्राची को तरीके से साड़ी पहनना सिखाया. कैसे चुन्नटे फोल्ड की जाती हैं, कितनी ऊँचाई पर बाँधी जाती है, पल्लू कितना छोड़ना चाहिए ये सब उसने बताया. साथ ही खुद उसे साड़ी पहना दी और एक दो बार प्रॅक्टीस भी करवाई. उसके बाद शोभा ने खुद प्राची की दो चोटियाँ खोल कर उन्हे एक जूडे मे बाँध दिया. प्राची को यह भी समझाया कि उसे या तो जूड़ा बाँधना चाहिए या एक मोटि खुली खुली सी वेणि ना कि बहनजी जैसी दो कस के बँधी चोटिया. उसने इतने प्यार से यह किया कि प्राची भाव विभोर हो गयी. इतने दिनों मे पहली बार कोई उससे इतने प्यार

से पेश आया था. शोभा स्मार्ट होने के साथ साथ दिल की कितनी अच्छि है, उसके मन मे यह ख़याल आया.

उसी शाम को शोभा के साथ जाकर उसने ब्लाउस पीस खरीदे और अर्जेंट सिलाई को दे दिए. दर्शन के कॉलेज से आने का समय हो गया था इसलिए बाकी शॉपिंग उसी दिन नही की. दूसरे दिन सुबह ही दर्जी का नौकर ब्लाउस दे गया. दोपहर को दर्शन के कॉलेज जाने के बाद प्राची ने नया ब्लाउस पहनकर शोभा को अपने घर बुलाया.

"शोभा दीदी देखो, कैसा लगता है!"

"अच्छ है प्राची पर फिटिंग अब भी थोड़ी गड़बड़ है. अरे पर ये तो बता, तूने ब्रा कौनसी पहनी है? वही पुरानी वाली लगती है, मुझे लगा तू नयी ले आई होगी" शोभा ने कहा.

"नही ला पाई. असल मे मैं तुझे पूछन चाहती थी कि अच्छि ब्रा कहाँ से लाउ." थोड़ा शरमाते हुए प्राची बोली.

"ऐसा कर पहले नाप ले ले, फिर अपन दोनो जाकर ले आएँगे. स्टेशन के पास एक अच्छ शॉप है, कंचुकी नाम का." शोभा बोली.

प्राची के चेहरे पर असमंजस के भाव थे. शोभा ने उसे मुस्कराते हुए समझाया "अरे प्राची, नाप नही लेगी तो ब्रा फिट कैसे होगी? वहाँ दुकान पर पहन कर थोड़े देखते हैं! ऐसा कर. ज़रा इंच टेप ले आ, मैं सिखाती हूँ कि नाप कैसे लिया जाता है"

प्राची थोड़ी शरमा कर बोली. "शोभा, यहाँ ड्रॉयिंग रूमा मे अटपट सा लगता है. मेरे बेडरूम मे चलो ना, वहाँ ठीक रहेगा, मैं खिड़की बंद करती हूँ"

अंदर जाकर प्राची ने खिड़की बंद की और शोभा को टेप दी. शोभा ने कहा "प्राची, ब्लाउस निकालना पड़ेगा. ब्रा भी निकाल दो तो और अच्छा है. ऐसे कपड़ों के ऊपर से नाप ठीक नही आएगा."

प्राची का चेहरा लाल हो गया. "शोभा दीदी, मुझे शरम लग रही है, ब्लाउस और ब्रा कैसे निकालु?"

 
शोभा मुस्काराकर बोली "प्राची, तुम बहुत ही शरमीली हो. यह भी ठीक करना पड़ेगा, अरे स्मार्ट दिखाने के लिए अपना कॉन्फिडेन्स भी बढ़ाना चाहिए. चलो निकालो. तब तक मैं तुझे सिखाती हूँ कि नाप कैसे लेते हैं.

मैं पहले अपना ब्लाउस निकाल कर अपना नाप ले कर बताती हूँ, फिर तेरी शरम शायद कम हो जाए" शोभा ने पल्लू नीचे किया और ब्लाउस निकालने लगी. उसके लो कट ब्लाउस के आगे के करीब करीब आधे खुले भाग मे से उसके विशाल स्तनों के बीच की गहरी खाई प्राची को दिखी. क्या सेक्सी दिखती है यह औरत, ऐसा एक मीठा नटखट विचार प्राची के मन मे कौंध गया.

शोभा ने ब्लाउस के बटन खोले और हाथ ऊपर करके ब्लाउस निकाल दिया. उसकी कांखे एकदम चिकनी थी. "रोज शेव करती है लगता है, या हेयर रिमूवर् से निकाल दिए हैं. पर अच्छि लग रही हैं कांखे, नही तो मेरी कैसी बेकार लगती हैं. आज ही कांख के बाल काट डालूंगी" ऐसा विचार प्राची के मन मे आया.

ब्लाउस निकलते ही शोभा के लेस वाली एक खूबसूरत ब्रा मे कसे हुए बड़े बड़े स्तन दिखने लगे. ब्रेसियार काफ़ी टाइट थी और उसके स्ट्रप्स शोभा के मांसल बदन मे गाढ़ने से बाजू का मास बड़े मादक तरीके से उभर आया था. शोभा के वे मदमस्त उरोज मानों उस ब्रा मे समा नही पा रहे थे और उफान के साथ बाहर आने की कोशिश कर रहे थे.

प्राची स्तब्ध होकर शोभा का वह मादक रूप देखती ही रह गई. शोभा स्मार्ट थी पर उसका रूप ऐसा होगा इसकी उसने कल्पना भी नही की थी. धीरे धीरे प्राची ने भी अपने ब्लाउस के बटन खोलना शुरू कर दिया. आख़िर उससे ना रह गया और वह बोली "अरी शोभा, कितनी अच्छि है तेरी ब्रा! कहाँ से ली? कांचुकी से? पर ज़रा टाइट नही है? तुझे तकलीफ़ नही होती?"

अपने सीने पर टेप लपेटते हुए शोभा बोली "प्राची, जान बूझ कर टाइट ब्रा मैं प्रिफर करती हूँ. उससे स्तन अच्छे कस कर बाँधे जाते हैं और ज़रा तन के खड़े होते हैं. मेरी उम्र मे यह करना पड़ता है नही तो लटक जाएँगे लौकी की तरह. वैसे मेरे ज़रा बड़े ही हैं, अपना ही वजन नही सह पाते बेचारे" उसने टेप पहले अपने स्तनों के नीचे छाती पर लपेटा और बोली "देख यह पहला नाप है, इसमे पाँच जोड़ कर ब्रा की बेसिक साइज़ मिलती है. देख कितने इंच है?"

 


प्राची ने काँपते हाथों से टेप पकड़ा. उसकी उंगलियाँ शोभा के बदन को लगी और उसके बदन मे एक रोमांच सा हो आया. झुक कर उसने नाप देखा और बोली पैंतीस इंच"

"याने पैंतीस और पाँच मिलाकर हुए चालीस. तो मेरी ब्रा का नाप है चालीस. " शोभा बोली.

"काफ़ी बड़ी ब्रा है तुम्हारी दीदी, बहुत अच्छि लगती है" प्राची ने कहा.

"अब कपों की साइज़ नापना पड़ेगी. उसके लिए ऐसे पूरा नाप लेना पड़ता है, निपलों के ऊपर टेप लगाकर" कहते हुए शोभा ने टेप अपनी ब्रा के कपों के नोक पर रखकर नाप लिया.

"चवालीस" प्राची बोली.

"याने चवालीस माइनस ब्रा की साइज़ चालीस चार का फरक हुआ. इसका मतलब है कि मेरे कप की साइज़ डी है. असल मे यह ब्रा बहुत टाइट है, ठीक नाप के लिए उतारकर नाप लेना चाहिए. मैं दिखाती हूँ तुझे. ब्रा निकालनी पड़ेगी. प्राची ज़रा हेल्प करो ना प्लीज़. मेरे हुक खोल दो, टाइट हैं ना इसलिए मुझे तकलीफ़ होती है. नेहा को मैं कहती हूँ अक्सर हुक खोलने को. वह यहाँ होती है तो हुक लगाने और निकालने का काम उसी का है" शोभा ने प्राची की ओर देखते हुए मुस्करा कर कहा.

 


Padosan ka Pyar – Bhag 1

(Lekhak – Katha Premi)

"tum to mujhase kitani jyaada badi ho umra me Shobha didi. achChi khaasi

oonchi poori bhi ho. mujhase ti chaar inch height bhi jyaada hai, wajan mujhase

das baarah kilo jyaada hoga. fir bhi tumhaara figar dekho kitana aakarShak hai"

Prachi Shobha ke bhare poore maasal shareer ki or prashansa ke bhaav se

dekhate hue boli.

"waisa kuCh nahi hai Prachi, haan mai tip top rahati hoon, kapade aur khaasakar

andar ke kapade yaane lingari Theek se chunati hoon, aadha kaam bas iseese ho

jaata hai" Shobha muskara kar boli.

dono auraten dopahar ko Prachi ke ghar me baiTh kar gappen lada rahi thi.

Shobha ko Prachi ke baaju waale flaT me rahane ko aakar bas Chah mahane hue

the. Shobha ke pati Dubai me kaam par the. Shobha aur usaki sautali ladaki Neha

dono akele yahaan rahate the. yah flat khaasakar Neha ke paapa ne isi liye liya

tha ki achChi society thi aur un dono auraton ko akele wahaan rahane me koi

pareshani nahi hogi aisa unhone socha tha.

Prachi

ne abhi ti mahane pahale apani bank ki naukari se isteefa diya tha, use

achCha VRS mil gaya tha. Prachi ke pati bhi bank me the aur unaki posting

kanpur me ho gayi thi. isaliye unaka yahaan Mumbai aana bas saal me ti chaar

baar hota tha. unake putra Darshan ne abhi abhi engineering ke pahale saal me

pravesh liya tha. Prachi bechaari isaliye din bhar akeli rahati thi. nayi sosaayaTi

hone ke kaaraN unake floor par aur koi nahi tha, sab flat khaali the. Prachi ko

khaali samaya kaatane ko daudata tha.

isaliye Shobha jab se usake pados me rahane aayi thi, tab se wah khush thi.

dopahar ko gappen maarane ko koi saath to mil gaya tha. Neha subah college ko

nikal jaati thi tab Shobha bhi akeli rahati thi. isaliye ab dono padosanon ki

achChi paTane lagi thi.

Prachi saintees saal ki thi. dikhane me saadhaaraN majhali umra ki striyon jaisi

Theek Thaak thi. haan kaafi gori thi. shareer majhole kisma ka tha, na jyaada

moTa na patala. asal me Prachi kaafi slim thi, par usake koolhe kaafi chaude the.

apane sthool bhaari bharakama nitambon ki wajah se wah thodi moTi dikhati thi,

usake baaki ke Charahare badan ka is wajah se pata nahi chalata tha.

Prachi isaliye jab Shobha ke nape tule shareer ko dekhati to usake man me aata

ki mai aisi kyon nahi hoon! Shobha usase saat aaTh saal badi hogi, rang bhi

saaMwala tha, kaafi gahara saaMwala. badan moTa nahi tha fir bhi achCha

khaasa bada aur ooncha poora tha, fir bhi Shobha dikhane me ekdam aakarShak

lagati thi.

us din dono me yahi charcha ho rahi thi. Tip top kapadon ke mahatwa ke baare

me jab Shobha boli to Prachi ko baat jach gayi. usaki nigaah fir se Shobha ke

poore badan par ghoonane lagi.

Shobha hamesha bade achChe kapade pahanati thi aur khud ka bahut khayaal

rakhati thi. ekdam saleekese baandhi hui naabhiDarshana saadi, bahut karake

sleevales blouse jisame se maramari baaMheM saaf dikheM aur pallu ke patale

kapade me se dikhata hua unnat urojon ka ubhaar, aisa roop tha Shobha ka.

isaliye wah hamesha achChi lagati thi. usake blouse aage aur peeChe se lo kaT

hote the jisame se usaki chikani peeth aur urojon ke oopari bhaag ka ubhaar

dikhata tha. blouse ke baareek kapade me se Shobha ki kas kar baandhi hui bra

ke sTraip dikhate the, jo usaki peeth ke maas me gade hote the. Shobha halki

lipasTik lagaati thi aur baal aksar ek joode me baandhati thi jisame wah mogare

ki veNi bhi laga leti. usake saaMwale rang ke kaaraN usaki laal lipsTik aksar

jaamuni dikhati thi par sab milaakar Shobha ka roop aisa maadak hota tha ki

kaafi mard use najar gadaakar dekhate the, yah Prachi ne aksar gaur kiya tha.

Shobha ke us roop par use badi IrShya hoti thi.

Theek

isake wipareet Prachi apane rahan sahan aur pahanaawe par jara bhi

dhyaan nahi deti thi. Dheeli Dhaali lapeTi hui saadi, ekdam Dheela aur bina naap

ka blouse aur bahanji jaisi do choTiyaan! iname wah kitani anaakarShak dikhati

thi isaka use ehasaas ho chala tha. man me ek nyoonata ki bhaavana, inferiority

complex, a gaya tha. ek ajeeb udaasi usake man me ghar kar gayi thi.

Prachi ki aankhon me jhalakati udaasi dekhakar Shobha use pyaar se boli "sun

Prachi, tu asal me dikhane me bahut sundar hai. gori hai, teri twacha par ab bhi

jawaani ki chamak hai. bura mat maanana agar mai saaf saaf bataaoon to. kitane

Dheele Dhaale kapade pahanati hai tu, wah blouse dekh, kaisa ajeeb sa hai, bina

naap ka. aur teri bresiyar bhi bahut Dheeli hai, peeChe se sTrap laTak rahe hain.

 


meri maano to achChi matching blouse sila lo, saadiyaan ek do bahut achChi

hain tere paas, jaise kal pahani thi. blouse mere darji se sila lo chaahiye to. aur

nayi bresiyar khareed lo, naap ki. jara achChe naye fashon ki. baalon ki sTyle

badal lo. fir dekhana kaise roop khil uThata hai tera. agar tu chaahe to mai

chaloongi tere saath shopping ko."

Prachi ko baat jach gayi. man me achCha bhi laga ki Shobha kitani aatmeeyata

se baat kar rahi hai. usake swar me ab thoda utsaah tha "aaj hi jaati hoon, sach

me tum chalogi Shobha? yaane mere saath chalane ko Time hai na tumhaare

paas?"

"aare, Time hi Time hai. Neha hafte bhar ko apani saheli ke saath gayi hai. usaki

saheli ki bahan ki shaadi hai poona me. mai akeli hi hoon. usaki chinta mat karo.

aur agar tu bura na maane to mai abhi tujhe sikhaati hoon ki saadi Theek se kaise

baandhi jaati hai"

kahkar Shobha ne badi aatmeeyata se Prachi ko tareeke se saadi pahanana

sikhaaya. kaise chunnaTe folD ki jaati hain, kitani oonchayi par baandhi jaati

hai, pallu kitana ChoDana chaahiye ye sab usane bataaya. saath hi khud use saadi

pahana di aur ek do baar practice bhi karawayi. usake baad Shobha ne khud

Prachi ki do choTiyaan khol kar unhe ek joode me baandh diya. Prachi ko yah

bhi samajhaaya ki use ya to jooda baandhana chaahiye ya ek moTi khuli khuli si

veNi na ki bahanji jaisi do kas ke bandhi choTiyaa. usane itane pyaar se yah kiya

ki Prachi bhaav vibhor ho gayi. itane dinon me pahali baar koi usase itane pyaar

se pesh aaya tha. Shobha smart hone ke saath saath dil ki kitani achChi hai,

usake man me yah khayaal aaya.

usi shaam ko Shobha ke saath jaakar usane blouse piece khareede aur urgent

silayi ko de diye. Darshan ke college se aane ka samaya ho gaya tha isaliye baaki

shopping usi din nahi ki. doosare din subah hi darji ka naukar blouse de gaya.

dopahar ko Darshan ke college jaane ke baad Prachi ne naya blouse pahanakar

Shobha ko apane ghar bulaaya.

"

Shobha didi dekho, kaisa lagata hai!"

"achCha hai Prachi par fitting ab bhi thodi gadbad hai. are par ye to bata, toone

bra kaunsi pahani hai? wahi puraani waali lagati hai, mujhe laga tu nayi le aayi

hogi" Shobha ne kaha.

"nahi la paayi. asal me mai tujhe pooChana chaahati thi ki achChi bra kahaan se

laavu." thoda sharamate hue Prachi boli.

"aisa kar pahale naap le le, fir apan dono jaakar le aayenge. station ke paas ek

achCha shop hai, kanchuki naam ka." Shobha boli. Prachi ke chehare par

asamanjas ke bhaav the. Shobha ne use muskaraate hue samajhaaya "are Prachi,

naap nahi legi to bra fiT kaise hogi? wahaan dukaan par pahan kar thode dekhate

hain! aisa kar. jara inch tape le aa, mai sikhaati hoon ki naap kaise liya jaata hai"

Prachi thodi sharam kar boli. "Shobha, yahaan Drawing rooma me aTapaTa sa

lagata hai. mere beDaroom me chalo na, wahaan Theek rahega, mai khidaki band

karati hoon"

andar jaakar Prachi ne khidaki band ki aur Shobha ko tape di. Shobha ne kah

"Prachi, blouse nikaalana padega. bra bhi nikaal do to aur achCha hai. aise

kapadon ke oopar se naap Theek nahi aayega."

Prachi ka chehara laal ho gaya. "Shobha didi, mujhe sharam lag rahi hai, blouse

aur bra kaise nikaalu?"

Shobha muskaraakar boli "Prachi, tum bahut hi sharameeli ho. yah bhi Theek

karana padega, are smart dikhane ke liye apana confidence bhi badhaana

chaahiye. chalo nikaalo. tab tak mai tujhe sikhaati hoon ki naap kaise lete hain.

mai pahale apana blouse nikaal kar apana naap le kar bataati hoon, fir teri sharam

shaayad kam ho jaaye"

Shobha ne pallu neeche kiya aur blouse nikaalane lagi. usake lo kaT blouse ke

aage ke kareeb kareeb aadhe khule bhaag me se usake vishaal stanon ke beech ki

gahari khayi Prachi ko dikhi. kya seksi dikhati hai yah aurat, aisa ek meeTha

naTakhaT vichaar Prachi ke man me kaundh gaya. Shobhane blouse ke button

khole aur haath oopar karake blouse nikaal diya. usaki kaankhe ekdam chikani

thi. "roj shev karati hai lagata hai, ya heyar rimoowar se nikaal diye hain. par

achChi lag rahi hain kaankhe, nahi to meri kaisi bekaar lagati hain. aaj hi kaankh

ke baal kaat Daaloongee" aisa vichaar Prachi ke man me aaya.

blouse

nikalate hi Shobha ke les waali ek khoobasoorat bra me kase hue bade

bade stan dikhane lage. bresiyar kaafi tight thi aur usake sTraps Shobha ke

maamsal badan me gadane se baaju ka maas bade maadak tareeke se ubhar aaya

tha. Shobha ke we madamast uroj maanon us bra me sama nahi pa rahe the aur

ufaan ke saath baahar aane ki koshish kar rahe the.

Prachi stabdh hokar Shobha ka wah maadak roop dekhati hi rah gai. Shobha

smart thi par usaka roop aisa hoga isaki usane kalpana bhi nahi ki thi. dheere

dheere Prachi ne bhi apane blouse ke baTan kholana shuru kar diya. aakhir usase

na rah gaya aur wah boli "ari Shobha, kitani achChi hai teri braa! kahaan se li?

kaMchuki se? par jara tight nahi hai? tujhe takaleef nahi hoti?"

apane seene par tape lapeTate hue Shobha boli "Prachi, jaan boojh kar tight bra

mai prifar karati hoon. usase stan achChe kas kar baandhe jaate hain aur jara tan

ke khade hote hain. meri umra me yah karana padata hai nahi to laTak jaayenge

lauki ki taraha. waise mere jara bade hi hain, apana hi wajan nahi sah paate

bechaare"

usane tape pahale apane stanon ke neeche Chaati par lapeTa aur boli "dekh yah

pahala naap hai, isame paanch jod kar bra ki besik size milati hai. dekh kitane

inch hai?"

Prachi ne kaampate haathon se tape pakada. usaki ungaliyaan Shobha ke badan

ko lagi aur usake badan me ek romaanch sa ho aaya. jhuk kar usane naap dekha

aur boli paintees inch"

"yaane paintees aur paanch milaakar hue chaalees. to meri bra ka naap hai

chaalees. " Shobha boli.

"kaafi badi bra hai tumhaari didi, bahut achChi lagati hai" Prachi ne kaha.

"ab kapon ki size naapana padegi. usake liye aise poora naap lena padata hai,

nipalon ke oopar tape lagaakar" kahate hue Shobha ne tape apane bra ke kapon

ke nok par rakhakar naap liya.

"chawaalees" Prachi boli.

"yaane chawaalees mayinas bra ki size chaalees chaar

ka farak hua. isaka

matalab hai ki mere kap ki size Di hai. asal me yeha bra bahut tight hai, Theek

naap ke liye utaarakar naap lena chaahiye. mai dikhaati hoon tujhe. bra nikaalani

padegi. Prachi jara help karo na please. mere huk khol do, tight hain na isaliye

mujhe takaleef hoti hai. Neha ko mai kahati hoon aksar huk kholane ko. wah

yahaan hoti hai to huk lagaane aur nikaalane ka kaam usi ka hai" Shobha ne

Prachi ki or dekhate hue muskara kar kaha.

 


प्राची शोभा के पीछे खड़े होकर उसकी ब्रा का हुक खोलने लगी. पास से शोभा की पीठ कितनी चिकनी और मुलायम दिख रही थी! उंगलियों पर शोभा की पीठ का स्पर्ष होते ही प्राची को फिर से रोमाच सा हो आया. उसे वह मासल पीठ इतनी मोहक लगी कि सहसा उसका मन हुआ कि उसे चूम ले. फिर उसने अपने आप को संभाला. छी छी! क्या गंदे विचार आ रहे हैं मन मे! शोभा को पता चला तो बेचारी क्या सोचेगी.

हुक निकलते ही ब्रा लटक गयी. शोभा की पीठ पर टाइट स्ट्रप्स के हल्के से निशान पड़े थे. शोभा ब्रा को अपनी बाहों मे से निकालकर घूम कर खड़ी हो गयी और फिर से टेप लपेटते हुए बोली "अब फिर देखो नाप. छयालीस होगा. याने असल मे डिफ़रेंस पाँच का है. पाँच इंच फरक याने कप हुआ डीडी. इसका मतलब है कि मेरी ब्रा की साइज़ है चालीस कप डी डी. पर मैं एक साइज़ कम लेती हूँ. उनतालीस. थर्टि नाइन कप डी. उससे ब्रा टाइट बैठती है और स्तनों को अच्छा सपोर्ट मिलता है. देख ना टेप पकड़कर, नाप ठीक है यह देख ले"

प्राची के होंठों से शब्द नही फुट रहे थे. शोभा के मासल उरोज अब ब्रा से आज़ाद होकर दो बड़े पपीतों जैसे लटक रहे थे. स्तनों के बीच की गहरी खाई उनकी मादकता और बढ़ा रही थी. स्तनों के बीच फँसा मम्गलसूत्र उनकी सुंदरता को मानों चार चाँद लगा रह था. स्तनों की तुलना मे निपल छोटे थे, अंगूर जैसे, उनके चारों ओर पुराने रुपये के आकार के भूरे गोल थे.

प्राची को सहसा महसूस हुआ कि उसकी जांघें गीली हो गयी है! वह उत्तेजित हो गयी थी. इसका अहसास होते ही वह थोड़ी चौंकी. आज तक ऐसा नही हुआ था कि किसी स्त्री को देखकर उसे कामोत्तेजना हुई हो. इस बारे मे उसने कभी सोचा तक नही था. उसने किसी तरह से पास मे आकर टेप का नाप देखा पर उसकी आँखे शोभा के उन मतवाले गोलों पर गढ़ी हुई थी.

शोभा प्राची की मनस्थिति से पूरी तरह से वाकिफ़ थी पर उसने अपने चेहरे पर शिकन तक ना आने दी. बोली "अब तुम ब्लाउस निकालो प्राची, अभी तक बटन खोल कर बैठी हो. चलो तेरा नाप लेते हैं."

प्राची ने किसी तरह से अपना ब्लाउस निकाला. अंदर सादी ढीली काटन की ब्रा थी. शोभा ने उसके स्तनों के नीच छाती पर टेप लपेट और बोली "तीस. याने ब्रा साइज़ हुई तीस प्लस पाँच याने पैंतीस. अब कप का साइज़ लेंगे" उसने टेप अब प्राची की ब्रा की नोक पर से लपेटा और मूह बना दिया. ब्रा की नोक भी ढीली थी और एक्सट्र कपड़ा वहाँ लटक रह था. "अरी प्राची, ब्रा निकाल ना प्लीज़, नाप ठीक नही आएगा. बहुत ढीली ब्रा है, फिटिंग भी ठीक नही है"

 


शोभा के कहने पर प्राची ने शरमाते हुए अपनी ब्रा निकाल दी. अब उसका ऊपरी गोरा शरीर नग्न था. उसके गोल मुलायम स्तन शोभा से काफ़ी छोटे थे पर सुडौल थे. अब तक उनमे ज़्यादा ढिलाई नही आई थी, बस ज़रा से लटक रहे थे. पर उसके गहरे भूरे रंग के निप्पल एकदम लंबे थे. करीब करीब एक छोटि मूँगफली जितने. निपलों के चारों बाजू के गोल भी काफ़ी बड़े थे, टी कोस्टर जैसे.

शोभा भी अब बहुत उत्तेजित थी पर किसी तरह से अपने मन की भावना दबा कर रखी थी. उसकी योनि एकदम गीली हो गयी थी. जांघों पर बह आए पानी का गीलापन उसे महसूस हो रह था. कितने दिनों से शोभा को इस क्षण की प्रतीक्षा थी. आज शायद मन की मुराद पूरी होने वाली थी!

असल मे उसने जब से प्राची को तीन महने पहले देखा था तभी से प्राची उसे बहुत भा गयी थी. उन ढीले ढाले कपड़ों और बहनजी जैसे पहनावे के नीचे छुपी प्राची की सुंदरता उसने कब से परख ली थी. प्राची को बाहों मे लेकर उससे रति करने की उसकी प्रबल इच्छा थी. जब वह कल्पना करती कि प्राची उसकी बाहों मे है तब उसकी बुर गीली होने लगती. कब से वह इसी ताक मे थी कि कैसे अपनी इस आकर्षक पड़ोसन को फँसाया जाए.

अब जब शिकार हाथ मे आने को था वह बहुत उत्तेजित थी. उसका पूरा प्लान था कि क्या करना है. पर जल्दबाजी मे कही हाथ आया यह खजाना ना छूट जाए, यह सोच कर उसने अपना चेहरा निर्विकार रखा और टेप प्राची के स्तनागरों पर लगाकर फिर से नाप लिया. नाप लेते लेते उसकी उंगलियाँ प्राची के निपालों को छू रही थी. प्राची की उत्तेजना और बढ़ने लगी.

"सैंतीस. याने चौंतीस से तीन इंच ज़्यादा. याने तेरा कप हुआ सी. पैंतीस कप सी. मेरी मान तो इस हिसाब से तुझे एक साइज़ छोटि, चौंतीस कप ब़ी ब्रा पहनना चाहिए, एकदम टाइट बैठेगि और बहुत सुंदर दिखेगी. पर प्राची एक बात पूछूँ, पर्सनल, बुरा तो नही मानेगी?"

"नही दीदी, तुम्हारी किसी बात का मैं बुरा नही मानूँगी, तुम तो मेरी दोस्त हो" प्राची बोली.

"तेरे निपल बहुत लंबे हैं. खूबसूरत दिखते हैं. लगता है तेरे पतिदेव की ख़ास मेहरबानी है इनपर, खूब खींचते होंगे. या चूसते होंगे? है ना? देख मज़ाक कर रही हूँ, बुरा मत मानना" शोभा ने हँसते हुए कहा. वह प्राची के सामने बिलकुल पास खड़ी थी, प्राची की निगाहें अब भी बार बार उसके उरोजो पर जा रही थी.

 


प्राची शरमा कर बोली "इसमे बुरा क्या मानना! वैसे लंबे हैं ये मुझे मालूम है. असल मे पहले से ही थोड़े बड़े थे, फिर दर्शन जब छोटा था तो दो साल का होने तक दूध पीता था, मानता ही नही था. और उसकी आदत थी दूध पीने के बाद भी नही छोड़ता था, चूसता रहता था. बड़ी मुश्किल से उसकी यह आदत छुड़ाई, तब से लंबे हो गये हैं."

"खड़े भी हैं तन के देख! मैं अगर तेरे पति की जगह होती तो चूस चूस कर और डबल कर देती" शोभा ने तीर छोड़ा और सहज भाव से अपना हाथ बढ़ाकर प्राची का एक निपल अपनी उंगलियों मे पकड़कर दबा दिया. यह निर्णायक क्षण था इसलिए शोभा धड़कते दिल से देख रही थी कि प्राची की क्या प्रतिक्रिया होती है. अगर वह बिचक गयी तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा. पर उसकी शंका निराधार थी, क्योंकि अब तक प्राची उत्तेजित हो चुकी थी. अब तक उसे कभी स्त्रियों के प्रति आकर्षण नही हुआ था. पर पिछले कई सालों से वह बहुत प्यासी थी. उसके पति की अब उसमे ज़्यादा रूचि नही थी, ऊपर से वे बाहर कानपुर मे रहते थे. प्राची का स्वाभाव काफ़ी कामुक था जैसा अक्सर सीधे सादे दब कर रहने वाले लोगों का होता है, बस उसे वे खुल कर प्रकट नही कर पाते हैं.

आज शोभा के स्पर्ष से मानों उसके सब्र का बाँध टूट गया. शोभा की उंगली से निपल दबाते ही उसने आँखे बंद कर ली और एक सिसकारी उसके होंठों से निकल पड़ी.

प्राची का रियेक्शन देखकर शोभा आनंद से झूम उठि. कब से वह इस लम्हे की राह देख रही थी. उसने प्राची का दूसरा निपल भी पकड़ लिया और हल्के हल्के दोनो निपलों को अपनी उंगलियों मे मसलते हुए बोली. "अच्छ लग रह है क्या प्राची? तेरे निपल कितने कड़े हो गये हैं देख! वैसे ऐसा होना एक्साइट होने की निशानी है. देख प्राची, सम्भल जा नही तो मुझे लगेगा कि मेरे छूने से तू गरम हो गयी है! या ये मेरी इन भारी भरकम चून्चियो को देख कर हुआ है! आगे मैं नही जानती बाबा!"

प्राची चुप रही. लज्जा से उसका चेहरा गुलाबी हो गया. पर उसने शोभा की उंगलियों से अपने निपल छुड़ाने की कोई कोशिश नही की. बस सिर झुकाए आँखे बंद करके खड़ी रही और लंबी लंबी सिसकारियाँ लेने लगी. शोभा ने आगे कदम उठाया. शिकार उसके चंगुल मे था. झुक कर उसने प्राची के गाल को चूम लिया.

 
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