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परिवार(दि फैमिली) complete

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कहानी पसंद करने और उत्साह बढ़ने के लिए सभी को थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
ज्योति ने जल्दी से अपनी साड़ी उठाकर अपने जिस्म को आगे से ढक दिया।

"अरे क्या हुआ बेटी तुम तो ऐसे डर गयी जैसे अपने सामने कोई साँप देख लिया हो?" महेश ने सोफ़े से उठकर अपनी बेटी के सामने खड़े होकर मुस्कराते हुए कहा।

"पिता जी आपको शर्म आनी चहिये" ज्योति ने गुस्से से सिर्फ इतना कहा।

"वाह बेटी मुझे शर्म आनी चाहिए और तू जो हर रात को अपने भाई का बिस्तर गरम करती हो?" महेश ने अपनी बेटी के सामने ही अपना हाथ अपनी धोती के अंदर ड़ालते हुए कहा ।

"पिता जी प्लीज आप यहाँ से चले जाईये" ज्योति ने शर्म और गुस्से से अपना कन्धा नीचे करते हुए कहा ।ज्योति के आँखों से आंसू निकल आये थे।

"अरे बेटी यह वक्त आंसू बहाने का नहीं बल्कि मज़े लेने का है जब तुम अपने भाई के साथ सब कुछ कर चुकी हो तो अपने इस पिता पर भी थोड़ी दया कर दो वैसे भी मेरा तुम्हारे भाई से बड़ा और तगड़ा है तुम्हें इससे वह मजा आएगा की तुम ज़िंदगी भर इसे अपनी चूत में लेने के लिए मिन्नते करती रहोगी" महेश ने अपनी धोती से अपने खड़े लंड को निकालकर ज्योति की आँखों के सामने करते हुए कहा ।

"पिता जी जाइये मैं आपके साथ कुछ नहीं कर सकती" ज्योति की साँसें अपने पिता के लंड को देखते ही ज़ोर से चलने लगी और उसने अपनी नज़रों को वहां से हटाये बिना कहा।

"च तुम कुछ मत करो मगर एक बार इसे अपने हाथों में तो लेकर देखो" महेश अपनी बेटी को यो अपने लंड की तरफ घूरता हुआ देखकर समझ गया की चिडया दाना चुगने के लिए तैयार है इसीलिए उसने अपने लंड को अपने हाथ से ऊपर नीचे करते हुए अपनी बेटी से कहा ।

"नही पिता जी मुझे शर्म आती है" ज्योति ने अपने पिता के लंड को गौर से घूरते हुए कहा उसका दिल अपने पिता के इतने बड़े लंड को नज़दीक से देखकर बुहत ज़ोर से धड़क रहा था और उसका पूरा जिस्म भी गरम हो गया था।

"अरे बेटी तुम भी न इसमें शर्माने की क्या बात है" महेश ने यह कहते हुए अपनी बेटी के एक हाथ को पकडकर अपने लंड के ऊपर रख दिया ।

"आआह्ह्ह्ह पिता जी यह क्या किया आपने?" ज्योति ने अपने हाथ को अपने पिता के गरम और सख्त लंड पर परडते ही ज़ोर से सिसकते हुए कहा । ज्योति का पूरा जिस्म अपने हाथ को अपने बाप के लंड पर पडते ही सिहर उठा और उसके पूरे जिस्म को जैसे चींटियाँ काटने लगी, ज्योति की साँसें बुहत ज़ोर से ऊपर नीचे हो रही थी और उसे अपना हाथ वहां रखे हुए अजीब किस्म का मज़ा आ रहा था ।
 
"क्या हुआ बेटी तुम्हें अच्छा नहीं लगा क्या?" महेश ने अपने हाथ से अपनी बेटी के हाथ को अपने लंड पर आगे पीछे करते हुए कहा।

"ओहहहहह पिता जी छोड़िये ना" ज्योति अपने हाथ को अपने पिता के पूरे लंड पर आगे पीछे होने से सिसकते हुए बोली उसे इतना मजा आ रहा था की उसकी चूत से पानी बहना शुरू हो गया था मगर वह सिर्फ अपने पिता को दिखाने के लिए ऐसा कह रही थी।

"बेटी छोड दूंगा मगर पहले थोड़ी देर तुम इसे महसूस तो कर लो" महेश ने अपनी बेटी के हाथ को वैसे ही अपने लंड पर आगे पीछे करते हुए कहा । थोड़ी देर में ही ज्योति खुद अपने हाथ को अपने पिता के लंड पर आगे पीछे करने लगी जिससे उसका पूरा जिस्म तप कर आग बन चूका था, महेश ने मौका देखकर अपना हाथ अपनी बेटी के हाथ से हटा दिया और ज्योति के एक हाथ से पकड़ी हुयी उसकी साडी को जो उसने अपने सीने के आगे रखी हुयी थी अपने हाथ से खींचकर छीन लिया ।

महेश ने साड़ी को बेड पर फ़ेंक दिया।

"पिता जी" ज्योति अपने सीने के आगे से अपनी साड़ी के दूर होते ही होश में आते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी चुचियों को ढकने लगी।

"बेटी इतना शर्माओ मत मैं कुछ नहीं करूँगा बस जब तक तुम मेरे लंड को महसूस करती हो तब तक मैं अपनी प्यारी बेटी की चुचियों को गौर से देखना चाहता हू" महेश ने अपने बेटी को कमर से पकडते हुए बेड पर बिठाते हुए कहा और खुद भी अपनी धोती को उतारकर उसके साथ बैठ गया ।

"नही पिता जी मुझे शर्म आती है" ज्योति ने शर्म से वेसे ही अपनी चुचियों को अपने हाथों से ढके हुए कहा।

"बेटी शरमाओ मत मैंने कहा न। मैं आगे कुछ नहीं करूंगा" महेश ने अपनी बेटी के एक हाथ को ज़बर्दस्ती खींचकर अपने लंड पर रखते हुए कहा । ज्योति का पूरा जिस्म फिर से अपने पिता के गरम लंड को छुने से कांप उठा और उसका हाथ अपने आप महेश के लंड पर आगे पीछे होने लगा।

"आजहहह बेटी कितनी प्यारी चुचियां हैं तुम्हारी" महेश ने अपनी बेटी के दुसरे हाथ को भी अपने हाथ से पकडकर उसकी चुचियों से हटा दिया और उसकी दोनों गोरी गोरी चुचियों को देखकर उसकी तारीफ करते हुए कहा ।

महेश ने अचानक अपने एक हाथ से अपनी बेटी की एक चूचि को पकडकर अपनी मुठी में भर लिया और उसे धीरे धीरे दबाने लगा।

"आह्ह्ह्ह पिता जी । वहां से अपना हाथ हटाइये ना" ज्योति ने बुहत ज़ोर से सिसकते हुए कहा । अपने पिता के हाथ को अपनी चूचि पर महसूस करते ही उसकी हालत बुहत खराब होने लगी थी उसकी चूत से बुहत ज्यादा पानी निकल रहा था जिस वजह से वह बुहत ज़ोर से अपने पिता के लंड को आगे पीछे करने लगी।
 
महेश का लंड पूरी मस्ती में आकर झटके खा रहा था जिस वजह से वह ज्योति के एक हाथ में समां ही नहीं पा रहा था।

"बेटी अपने दोनों हाथों से पकडकर हिलाओं इसे" महेश अपने बेटी को समझाते हुए कहा । ज्योति अपने पिता की बात सुनकर अपने दोनों हाथों से उसके लंड को पकडकर आगे पीछे करने लगी, ज्योति का पूरा जिस्म पसीने से भीग चूका था और वह बुहत ज़ोर से साँसें ले रही थी ।

महेश भी अब बारी बारी अपनी बेटी की दोनों चुचियों को अपने हाथ से दबा रहा था वह अपनी बेटी की चुचियों को दबाते हुए उसकी चुचियों के गुलाबी दानों को एक एक करके अपनी उँगलियों के बीच लेकर मसल भी रहा था जिस वजह से ज्योति के मूह से ज़ोर की सिसक़ियां निकल रही थी और वह ज्यादा गरम हो रही थी । महेश अब अपने एक हाथ को अपनी बेटी की चूचि से हटाकर नीचे ले जाने लगा, वह अपने हाथ से अपनी बेटी के चिकने पेट को सहलाते हुए उसकी पेंटी तक पुहंच गया ।

"ओहहहह पिता जीईईई इसशहहहहः" अपने पिता का हाथ को अपनी गीली पेंटी पर पडते ही ज्योति के मूह से ज़ोर की सिसकी निकल गयी और उसके दोनों हाथ उसके पिता के लंड पर ज़ोर से कस गए । महेश अपनी बेटी की इस हरकत से समझ गया की वह बुहत ज्यादा गरम हो गई है इसीलिए उसने अपने हाथ से अपनी बेटी की चूत को उसकी गीली पेंटी के ऊपर से ही मसलने लगा।

"ओहहहहहह पिता जीईई आअह्ह्ह्ह ऐसा न करे" ज्योति अपने पिता के हाथ से अपनी चूत को पेंटी के ऊपर से ही मसलता हुआ महसूस करके ज़ोर से सिसकते हुए बोली ।

ज्योति की मज़े से आँखें बंद होने लगी थी उसे अपने पूरे शरीर में बुहत ज्यादा उत्तेजना महसूस हो रही थी और वह अपने दोनों हाथों से अपने पिता के लंड को मज़बूती से पकडे हुए आगे पीछे कर रही थी । महेश भी अपने हाथ को बुहत तेज़ी के साथ अपनी बेटी की चूत पर चला रहा था।

"आह्ह्ह्हह हहहह पिता जीई ओह्ह्ह्हह्हह्ह" अचानक ज्योति का पूरा जिस्म अकडने लगा और उसकी चूत ज़ोर के झटके खाते हुए झडने लगी । ज्योति के मूह से झडते हुए बुहत ज़ोर की सिसकियाँ निकलने लगी ।

ज्योति का हाथ झडते हुए महेश के लंड पर इतना कसकर आगे पीछे होने लगे की वह भी अपने आप को रोक नहीं पाया।

"आह्ह्ह्ह बेटी ओह्ह्ह्हह्ह" महेश के मुँह से भी ज़ोर की सिसकियाँ निकलने लगी और उसके लंड से वीर्य की बारिश होने लगी । महेश के लंड से वीर्य की बूँदे निकल कर फर्श से होती हुयी ज्योति और उसके जांघों पर गिरने लगी, ज्योति जब तक खुद झडती रही वह अपने पिता के लंड को ज़ोर से पकडकर निचोड़ती रही।
 
ज्योति ने जैसे ही पूरी तरह झडने के बाद अपनी आँखे खोली शर्म के मारे उसने अपने हाथ को अपने पिता के लंड से हटा लिया और वह खुद के कपड़े लेकर बाथरूम में भाग गयी । महेश भी झडने के बाद बुहत थक चूका था वह अपनी बेटी के आने का इंतज़ार करने लगा, थोड़ी ही देर में ज्योति कपडे पहनकर बाहर निकली मगर वह बेड की तरफ आने की बजाये सोफ़े पर जाकर बैठ गयी ।

महेश अपनी बेटी को शरमाता हुआ देखकर मुस्कराते हुए अपनी धोती को लेकर बाथरूम की तरफ चला गया और थोड़ी देर बाद वह अपने आप को साफ़ करने के बाद धोती पहने हुए ही बाहर निकल आया । महेश बाहर आते ही सोफ़े की तरफ जाने लगा । अपने पिता को फिर से अपने पास आता हुआ देखकर ज्योति का दिल ज़ोर से धडकने लगा।

"बेटी कैसा लगा तुम्हें?" महेश ने भी अपनी बेटी के साथ बैठते हुए कहा । ज्योति का शर्म के मारे बुरा हाल था वह बगैर कुछ बोले चुपचाप बैठी रही ।

"बेटी कुछ बोलो न कैसा लगा?" महेश ने इस बार अपनी बेटी के हाथ को पकडकर अपने दोनों हाथों के बीच लेकर सहलाते हुए कहा।

"अच्छा लगा बापू जी" ज्योति ने इस बार हिम्मत करते हुए कहा।

"बेटी तुम खवांखाह शर्मा रही हो अगर तुम मेरा साथ दो तो मेरा यह तुम्हें जन्नत की सैर करवायेगा" महेश ने अपनी बेटी के हाथ को अपनी धोती के ऊपर अपने लंड पर रखते हुए कहा।

"नही पिता जी आप जाइये मैं आपके साथ यह नहीं कर सकती" ज्योति ने इस बार अपने हाथ को जल्दी से वहां से हटाते हुए कहा ।

"बेटी जैसे तुम्हारी मर्ज़ी । मैंने तुमसे कहा न की मैं तुम्हारी मर्ज़ी के बगैर कुछ नहीं करूँगा लेकिन अपने पिता पर एक अहसान कर दो। मैं एक बार तुम्हारे इन गुलाबी लबों को चूमना चाहता हू" महेश ने अपने दोनों हाथों से ज्योति का चेहरा ऊपर करके उसके होंठो की तरफ घूरते हुए कहा।

"पिता जी" ज्योति ने शर्म से अपना कन्धा नीचे करते हुए कहा।

"क्यों बेटी क्या मैं अपनी बेटी से यह उम्मीद भी नहीं रख सकता" महेश ने अपना मुँह बनाते हुए कहा।

"पिता जी मुझे शर्म आती है आप ही कर लो जो करना है और फिर चले जाओ" ज्योति ने अपने पिता का दिल रखने के लिए कह दिया
 
"थैंक्स बेटी तुम बस चुपचाप मेरी गोद में अपना सर रखकर लेट जाओ। मैं खुद ही तुम्हारे गुलाबी लबों को चूम लूँगा" महेश ने अपनी जीभ को निकलकर अपने होंठो पर फेरते हुए कहा । महेष का ढीला लंड अपनी बेटी की बात सुनकर फिर से उठने लगा, ज्योति अपने पिता की बात मानते हुए अपना सर उसकी गोद में रखकर लेट गयी और शर्म के मारे अपनी आँखों को बंद कर लिया ।

"आह्ह्ह्ह बेटी तुम्हारे लब कितने गुलाबी है" महेश अपनी बेटी के गोद में लेटने के बाद अपना मूह उसके होंठो के बिलकुल नज़दीक करते हुए कहा । ज्योति को अपने पिता की साँसें बिलकुल अपने लबों के नज़दीक महसूस होने लगी जिसकी वजह से एक्साइटमेंट में वह फिर से गरम होने लगी।

"बेटी क्या मैं तुम्हारे गुलाबी लबों को चूम सकता हू" महेश ने अपनी बेटी से कहा।

"हाहहह पिता जीईई चूम लो न किसने रोका है" ज्योति अपने पिता की हरक़तों से बुहत ज्यादा गरम हो चुकी थी इसीलिए उसने अपने पिता से कहा क्योंकी वह जल्द से जल्द अपने लबों पर अपने पिता के होंठो को महसूस करना चाहती थी ।

महेश ने अपनी बेटी की बात सुनकर अपने होंठो को उसके गुलाबी लबों पर रख दिया और बड़े प्यार से अपनी बेटी के दोनों लबों को एक एक करके चूसने लगा । ज्योति की हालत भी बुहत ख़राब हो चुकी थी इसीलिए वह भी अपने दोनों हाथों से अपने पिता के बालों को सहलाते हुए उसका साथ दे रही थीं, महेश जाने कितनी देर तक अपनी बेटी के होंठो से खेलता रहा और अपने एक हाथ को अपनी बेटी की साड़ी के ऊपर से उसकी चूचि पर रख दिया ।

ज्योति अपने पिता का हाथ अपनी चूचि पर लगते ही सिहर उठी और एक झटके के साथ अपने पिता के होंठो से अपने होंठो को अलग कर दिया । ज्योति सीधी होते हुए अपने पिता से दूर होकर खड़ी हो गई और बुहत ज़ोर से साँसें लेते हुए अपनी साँसों को ठीक करने लगी।

"क्या हुआ बेटी?" महेश ने अचानक अपनी बेटी के ऐसा करने से हैंरान होते हुए कहा।

"कुछ नहीं पिता जी आपने चूम लिया न अब जाइये यहाँ से" ज्योति ने अपने पिता जवाब देते हुए कहा।

"ठीक है बेटी जैसे तुम्हारी मर्ज़ी मैं जा रहा हू" महेश समझ गया की चिड़िया इतनी आसानी से फँसने वाली नहीं इसीलिए वह सोफ़े से उठकर बाहर चला गया ।
 
महेश अपनी बेटी के कमरे से निकलकर अपने कमरे में जाने लगा वह अपने कमरे में आते ही बेड पर लेट गया और अपनी बेटी के बारे में सोचने लगा । वह सोच रहा था की जब उसकी बेटी उसके इतना नज़दीक आ गयी है तो अब वह बचकर कहाँ जायेगी। यही सोचते सोचते कब वह नींद के आग़ोश में चला गया उसे पता ही नहीं चला, ऐसे ही दिन बीत गया और रात का खाना खाने के बाद सभी अपने कमरों में जाकर सोने की तैयारी करने लगे।

महेश अपने कमरे में करवटे लेते हुए आने वाले टाइम के बारे में सोच रहा था उसकी आँखों के सामने उसकी बहु का ख़ूबसूरत जिस्म घूम रहा था जिसे सोचते हुए उसका लंड ज़ोर के झटके मार रहा था । इधर नीलम भी बेड पर लेटे हुए अपने पति के जाने का इंतज़ार कर रही थी क्योंकी जो मजा उसे अपने ससुर से मिला था शायद वह उसे ज़िंदगी भर न भुला पाएगी।

"नीलम इधर आओ न कब तक यूँ ही रूठी रहोगी" समीर ने अचानक नीलम को अपनी बाहों में भरते हुए कहा।

"क्या है मुझसे दूर हटो" नीलम ने गुस्से से अपने पति को दूर करते हुए कहा।

"क्या हुआ नीलम क्या अब मैं इतना गिर गया की तुम मुझे अपने क़रीब भी आने नहीं देती?" समीर ने गुस्से और गम से अपनी पत्नी को देखते हुए कहा।

"हाँ तुम मुझे नहीं छू सकते क्योंकी मुझे भी तुम्हारी तरह किसी और से ज्यादा लगाब हो गया है" नीलम ने गुस्से में सीधे अपने पति को बताते हुए कहा।

"नीलम तुम्हें क्या हो गया है? पहले तो तुम ऐसी नहीं थी वह तुम्हारे पिता के समान है कुछ तो शर्म करो" समीर ने लगभग रोते हुए कहा।

"हाँ शायद तुम सही हो मगर मुझे ऐसा करने में भी तुम्हारा हाथ है और शायद तुम ने अच्छा ही किया क्योंकी उसके बाद ही मुझे ज़िंदगी के अनमोल मज़े का अहसास हुआ जो मुझे तुमने नहीं किसी और ने दिलाया" नीलम ने अपने पति को जवाब देते हुए कहा।

"नीलम अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ" समीर ने गुस्से से बेड पर मुक्का मारते हुए कहा।

"अरे इतना गुस्सा मत हो और अब जाओ यहाँ से तुम्हारी बहन तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी" नीलम ने मुस्कराते हुए कहा।

"बुहत चिंता हो रही है तुम्हें मेरी बहन की सब समझता हूँ मैं तुम्हें उसकी नहीं अपनी पड़ी है क्योंकी तुम मेरे जाने के बाद ही पिता जी के साथ रंगरलियां मनाओगी" समीर ने अपनी पत्नी की बात सुनते ही गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"हाँ यार तो इसमें गुस्से की क्या बात है तुम भी तो वही करने जाते हो अपनी बहन के पास" नीलम ने फिर से एक क़ातिल हँसी के साथ अपने पति को जवाब देते हुए कहा।

"ठीक है भाड़ में जाओ मैं जाता हू" समीर ने गुस्से से कहा और अपने कमरे से निकलकर अपनी बहन के कमरे में आ गया।
 
नीलम ने भी अपने पति के जाते ही सुख का साँस लिया और वह लेटे हुए ही अपने ससुर का इंतज़ार करने लगी । समीर अपनी बहन के कमरे में जाते ही सीधा होकर बेड पर लेट गया वह बुहत ज्यादा गुस्से में था।

"क्या हुआ भैया?" ज्योति ने अपने भाई को आज ऐसे आते ही बेड पर लेटने से हैंरान होते हुए उसके क़रीब बैठकर कहा।

"दीदी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। नीलम हर रोज़ ज्यादा ही बदलती जा रही है अब मुझसे बर्दाशत नहीं होता" समीर ने अपनी बहन को देखते हुए कहा उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे।

"भइया धीरज रखो तुम कर भी क्या सकते हो। जितना ज्यादा सोचोगे उतना ही तुम परेशान होगे" ज्योति ने अपने कोमल हाथ से अपने भाई के आंसू को पोछते हुए कहा।

"दीदी तुम नहीं होती तो शायद में खुदकुशी कर लेता" समीर ने अपनी बहन को निहारते हुए कहा।

"बस अब आगे कुछ भी बोले तो मेरे मरा मूह देखोगें तुम चुपचाप लेटे रहो। मैं अभी आपके सारे गम ख़तम करती हू" ज्योति ने अपना एक हाथ अपने भाई के मूह पर रखते हुए कहा। समीर अपने बहन की बात सुनकर चुप होकर लेटा रहा।

ज्योति ने अपने भाई के बाहों को पकडकर ऊपर कर दिया और खुद अपनी नाइटी को उतारकर बेड पर फेंक दिया । ज्योति अब सिर्फ एक ब्रा और पेंटी में थी वह अपनी दोनों टांगों को फ़ैलाकर अपने भाई के लंड पर उसकी पेण्ट के ऊपर ही बैठ गयी और नीचे झुकते हुए धीरे धीरे अपने भाई की शर्ट के बटन खोलने लगी। समीर का लंड अपनी बहन के ऐसा करने से हरकत में आने लगा वह बड़े गौर से अपनी बहन की चुचियों को घूरने लगा जो उसके झुके होने के कारण तकरीबन पूरी नंगी ही समीर की आँखों के सामने आ गयी थी।

ज्योति ने अपने भाई की शर्ट के बदन खोलने के बाद उसकी शर्ट को उसके आगे से खोलकर साइड में किया और खुद नीचे झुककर अपने भाई के बालों से भरे सीने को अपने होंठो से चूमने लगी । ज्योति अपने भाई के सीने को पूरी तरह से चूमने के बाद अपनी जीभ निकालकर अपने भाई के सीने पर फिराने लगी।

"आह्ह्ह्ह दीदी" समीर भी अपनी बहन की हरक़तों से बुहत ज्यादा गरम हो गया था इसीलिए उसने सिसकते हुए कहा और अपने दोनों हाथों को अपने बहन के बालों में डाल दिया।
 
ज्योति ने अपने दोनों हाथों से समीर के दोनों हाथों को पकडकर फिर से ऊपर कर दिया और खुद नीचे होकर अपनी जीभ को समीर के बूब्स के दाने पर फिराने लगी।

"आह्ह्ह्ह" समीर के मूह से एक और सिसकी निकली। मगर इस बार उसने अपने हाथ को वहीँ पर पड़ने दिया । ज्योति कुछ देर तक अपने भाई के दाने को अपनी जीभ से चाटने के बाद अपना मूह खोलकर उसके पूरे बूब को अपने मूह में ले लीया और बुहत ज़ोर से चूसने लगी।

"ओहहहहहह ओहहह दीदी" समीर को आज तक इतना मजा नहीं आया था जो आज उसकी बहन की हरक़तों से मिल रहा था जिस वजह से वह बुहत ज़ोर से सिसक रहा था।

ज्योति ने अचानक अपने भाई के बूब को अपने दांतों से हल्का काट दिया और बार बार उसे चूसते हुए हल्का काटने लगी।

"उईईईई आह्ह्ह्हह बस करो दीदी" समीर का मज़े के मारे बुरा हाल था उसका पूरा जिस्म मज़े से झटके खा रहा था और वह अपने हाथ को सीधा करने की कोशिश कर रहा था मगर ज्योति ने जल्दी से अपने मुँह को वहां से हटाते हुए अपने भाई के दोनों हाथों को अपने हाथों से पकड लिया।

ज्योति अपने भाई के हाथों को पकडकर खुद नीचे हो गई और अपने होंठो को अपने भाई के होंटों के बिलकुल क़रीब कर लिया । समीर को अपनी बहन की साँसें महसूस होने लगी वह जैसे ही अपनी बहन के गुलाबी होंठो को चूमने के लिए अपने होंठो को थोडा ऊपर किआ ज्योति ने अपने होंठो को ज्यादा ऊपर कर दिया और समीर अपनी बहन को देखता ही रह गया। ज्योति ने फिर से अपने मुँह को नीचे किया और इस बार अपने भाई के होंठो पर अपने होंठो को ज़ोर से दबा दिया।

समीर ने जैसे ही अपनी बहन के गुलाबी होंठो को अपने होंठो पर महसूस किया वह अपना पूरा मुँह खोलकर बुहत ज़ोर से ज्योति के होंठो को चूसने लगा । ज्योति भी अपने भाई का पूरा साथ देते हुए उसके साथ किस्सिंग करने लगी और अचानक अपनी जीभ को भी अपने भाई के मूह में डाल दी। समीर अपनी बहन की जीभ अपने मूह में घुसते ही बड़े प्यार से उसे अपने होंठो और जीभ से चाटने लगा, ज्योति कुछ देर तक ऐसे ही अपने भाई से अपने होंठो को चुसवाने के बाद अचानक सीधी हो गई और बुरी तरह हाँफने लगी।

ज्योति के सीधे होते ही उसके हाथ समीर के हाथों से अलग हो गये और समीर ने उसी पल का फ़ायदा उठाते हुए अपने हाथों से अपनी बहन की ब्रा को उसकी चुचियों से नीचे सरका दिया । समीर अपनी बहन की ब्रा के हटाने के बाद अपने हाथों से उसकी दोनों चुचियों को मसलने लगा, ज्योति ने अपने आप को संभालते हुए अपने भाई के दोनों हाथों को पकडकर फिर से ऊपर कर दिया और खुद नीचे झुककर अपनी दोनों चुचियों को अपने भाई के होंठो पर रगडने लगी, समीर जैसे ही अपना मुँह खोलकर अपनी बहन की चूचि को अपने मूह में भरने की कोशिश करता वह अपनी चुचियों को ऊपर कर लेती।
 
समीर अगर चाहता तो अपने हाथों को अपनी बहन से छुड़ाकर अभी उसकी चूचि को अपने मुँह में भर लेता मगर उसे भी यह खेल मजा दे रहा था । ज्योति कुछ देर तक यों ही अपने भाई को परेशान करने के बाद अपनी चुचियों को अपने भाई के मूह पर रख दिया, समीर ने जैसे ही मूह खोला वह यह देखकर हैंरान रह गया की उसकी बहन ने इस बार अपनी चुचियों को ऊपर नहीं किया। समीर ने जल्दी से अपनी बहन की एक चूचि को अपने मुँह में लिया और बड़े ज़ोर से उसे चूसने लगा।

"आआह्ह्ह भैया आराम से" ज्योति ने सिसकते हुए कहा क्योंकी उत्तेजना में समीर अपनी बहन की चूचि को बुहत ज़ोर से चूस चाट रहा था।

समीर अब बारी बारी अपनी बहन की दोनों चुचियों को अपने मुँह में लेकर चूस रहा था ज्योति कुछ देर तक अपने भाई से अपनी चुचियों को चुसवाने के बाद सीधे हो गई और वह नीचे होने लगी समीर हैंरानी से अपनी बहन को देखने लगा । ज्योति अपने भाई के टांगों के बीच आ गयी और अपने हाथों से समीर की पेण्ट को खोलने लगी, ज्योति ने अपने भाई की पेण्ट को खोलने के बाद उसे उसके जिस्म से अलग कर दिया।

पैंट के उतरते ही समीर का लंड उसके अंडरवियर में तम्बू की तरह खड़ा हो गया । ज्योति अपने भाई के लंड को देखते हुए अपना मुँह उसकी तरफ झुकाने लगी और अंडरवियर के ऊपर से ही अपने भाई के खड़े लंड को अपने होंठो से चूम लिया । ज्योति ने अपने भाई के लंड को चूमने के बाद उसके अंडरवियर को भी उसके जिस्म से अलग कर दिया। समीर का लंड अब बिलकुल नंगा ज्योति की आँखों के सामने लहरा रहा था, ज्योति ने अपना एक हाथ बढाकर अपने भाई के झटके खाते हुए लंड को पकड़ा और उसके गुलाबी सुपाडे को अपने होंठो से चूमने लगी।

ज्योति कुछ देर तक अपने भाई के लंड को चूमने के बाद अपनी जीभ निकालकर पूरे लंड को ऊपर से नीचे तक चाटने लगी।

"आह्ह्ह्ह दीदी" समीर की हालत बिगडती जा रही थी उसके मुँह से बुहत ज़ोर की सिसकियाँ निकल रही थी ।ज्योति ने अपने भाई के लंड को चाटते हुए देखा की उसके सुपाडे के छेद से प्रिकम की कुछ बूँदे निकल रही हैं । उसने जल्दी से अपनी जीभ को अपने भाई के लंड के छेद पर रखा और उसके प्रिकम को अपनी जीभ से चाटने लगी, ज्योति ने अपने भाई के प्रिकम को चाटने के बाद अपनी जीभ से उसके सुपाडे के छेद को ही चाटने लगी।
 
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