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परिवार(दि फैमिली) complete

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नरेश की साँसें बुहत ज़ोर से चल रही थीं और उसका लंड पेण्ट में खडा होकर उथल पुथल मचा रहा था, नरेश वहीँ बूत बनकर खडा था । शीला ने दरवाज़े से अपना हाथ निकालते हुए अपने भैया के हाथ से शम्पू ले लीया और दरवाज़ा बंद कर दिया।

नरेश की आँखों के सामने अपनी बहन का नंगा जिस्म घूम रहा था, वह वहां से चलते हुए बेड पर आकर बैठ गया । नरेश मन ही मन में सोचने लगा उसकी बहन शीला तो इतनी सूंदर है आज तक उसका धयान अपनी बहन की तरफ कभी क्यों नहीं गया ।

नरेश ने अपनी बहन की गोरी चुचियां और काले काले बालों वाली चूत देखि थी जिसे याद करके उसके हाथ बेड पर चलने लगे जैसे वह अपनी बहन की रसीली चुचियों और चूत को सहला रहा हो, ऐसा करते हुए उसके हाथ में अपने बहन की पेंटी और ब्रा आ गयी ।

अपनी छोटी बहन की पेंटी और ब्रा अपने हाथ में आते ही नरेश का पूरा बदन उत्तेजना के मारे काम्पने लगा। नरेश अपनी बहन की छोटी पेंटी देखकर पागल हो चुका था, उसने अपनी बहन की पेंटी को देखते हुए उसे अपने नाक पर रख दिया ।

नरेश अपनी बहन की पेंटी से आने वाली गंध अपने नाक में जाते ही समझ गया की यह पेंटी उसकी बहन की चूत से अभी उतरी हुयी है क्योंकी नरेश को पेंटी में से मदहोश करने वाली गंध आ रही थी । नरेश का लंड उसकी पेण्ट के अंदर इतना तन गया था की उसे अपने लंड में दर्द होने लगा था।

शीला जो दरवाज़े को हल्का खोलकर सब कुछ देख रही थी वह अपना प्लान कामयाब होता देखकर बुहत खुश होगई ।

शीला ने अपने प्लान के मुताबिक जान बूझकर एक टॉवल लपेट कर दरवाज़े को ज़ोर से खोल दिया । दरवाज़े की आवज़ से नरेश के हाथों से उसके बहन की पेंटी नीचे गिर गयी और उसने जैसे ही दरवाज़े की तरफ देखा तो उसकी बहन सिर्फ एक छोटे से टॉवल में खड़ी थी, शीला ने जैसे ही देखा की उसका भाई उसे घूर रहा है वह बाथरूम में चलि गयी ।

"भइया आप अभी तक यहीं हो, मैं अपने कपड़े वहीँ भूल गयी थी प्लीज उठाकर दो" शीला ने बाथरूम में जाते ही कहा । नरेश के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था, उसने अपनी बहन को दूसरी बार नंगा देखा था ।

शीला जो टॉवल लपेट कर बाहर निकली थी उसमें उसकी आधी चुचियां और उसकी पूरी टाँगें नंगी नरेश को दिखाई दी थी । नरेश अपनी बहन की पेंटी और ब्रा को लेकर बाथरूम की तरफ जाने लगा, नरेश का लंड बिलकुल ठोस होकर उसकी पेण्ट को टक्कर मार रहा था।
 
नरेश जैसे ही दरवाज़े के क़रीब पुहंचा शीला ने दरवाज़ा खोल दिया और अपने भाई से पेंटी और ब्रा लेने लगी, दरवाज़े के खुलते ही नरेश की आँखें फिर से अपनी बहन के जिस्म पर जो सिर्फ टॉवल में लपेटा हुआ था उस पर टिक गयी ।

"क्या हुआ भैया?" शीला ने ब्रा और पेंटी को लेते हुए मुसकुराकर कहा । नरेश जो पहले से अपनी बहन की जवानी को देखकर पागल हो चुका था । अपनी बहन को मुस्कराता हुआ देखकर वह अपने पूरे होश हवास खो बैठा और आगे बढकर बाथरूम में घुस गया ।

शीला अपने भाई को अपने प्लान के मुताबिक अपने हुस्न का दीवाना बना चुकी थी मगर वह अपने भाई के बाथरूम में घूसने से डरने का नाटक करते हुए पीछे हटने लगी । नरेश हवस की आग में जल कर बिलकुल पागल हो चुका था ।

शीला जैसे जैसे पीछे हो रही थी नरेश वेसे ही आगे चलते जा रहा था, पीछे हटते हटते शीला की पीठ बाथरूम की दीवार से जा टकरायी । शीला के पास अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था उसकी साँसें उत्तेजना और अनजाने दर के अहसास से बुहत ज़ोर से चल रही थी जिस वजह से शीला की चुचियां भी बुहत ज़ोर के साथ ऊपर नीचे हो रही थी।

शीला के बदन पर सिर्फ एक टॉवल लपेटा हुआ था जिसे उसने अपने हाथ से पकड रखा था । नरेश अब आगे बढ़कर बिलकुल अपनी बहन के पास पुहंच चूका था । नरेश ने अपने दोनों हाथों से अपनी बहन के दोनों बाज़ू पकड लिया और उन्हें ऊपर करते हुए दीवार से सटा दिया ।

शीला के हाथ ऊपर होते ही उसके बदन पर लपेटा हुआ टॉवल उसके मख़मली बदन से सरकता हुआ नीचे गिर गया।

नरेश के सामने उसकी सगी छोटी बहन उसके इतना नज़दीक बिलकुल नंगी खडी थी, नरेश ने अपनी बहन के भीगे हुए गुलाबी लबों को देखते हुए अपने होंठ उसके होंठो पर रख दिये । नरेश और शीला के होंठ आपस में मिलते ही दोनों एक दुसरे में खो गये ।

दोनों तरफ आग बराबर लगी हुयी थी इसीलिए कभी नरेश के होंठ शीला के मूह में होते तो कभी शीला के होंठ नरेश के मूह में । उस वक्त वह दोनों अपने होश खो बैठे थे वह दुनिया से बेखबर एक दुसरे के रसीले होंठो का रस पीने में मगन थे।
 
दोनों भाई बहन के हाथों की उँगलियाँ एक दुसरे के हाथों में फँसी हुयी थी, नरेश अचानक अपनी बहन के होंठो को छोडते हुए उसके काँधे को चूमने लगा । शीला को अपने पूरा जिस्म में चींटियां रेंगते महसूस हो रही थी और उसका पूरा जिस्म टूट रहा था ।

नरेश अपनी बहन के काँधे को चूमते हुए नीचे होता हुआ जैसे ही उसकी चुचियों की तरफ बढ़ने लगा शीला ने अनोखे मज़े के अहसास को बर्दाशत न करते हुए अपने बड़े भाई के हाथों से अपने हाथों को छुड़ाते हुए उसे गले लगा दिया ।

शीला के गले लगते ही उसकी नरम नरम चुचियाँ नरेश के सीने में दब गयी । नरेश की हालत पहले से बुहत ख़राब थी । अपनी बहन की नरम नरम चुचीयों के अहसास से ही उसकी हालत और ज़्यादा बिगड गयी।

नरेश ने थोडा पीछे हटते हुए शीला को दीवार से थोडा आगे सरकाते हुए बुहत ज़ोर से अपने गले लगा लिया ।वह अपनी बहन को चूमने चाटने लगा।

"आहहहह ईश भइया" नरेश ने अपनी बहन को इतनी ज़ोर से अपनी बाँहों में भरा था की उसके मूह से मज़े और मीठे दर्द की वजह से हलकी चीख़ निकल गई।

शीला की चुचियां नरेश के सीने में दब गयी और उसकी चूत सटकर नरेश की पेण्ट में तने हुए लंड के उभार पर दब गई, नरेश को अपने लंड के दबने से इतना मजा आया की उसने अपने दोनों हाथों से अपनी छोटी बहन के चुतडों को पकड कर अपने लंड पर दबाने लगा ।

"आहहह शीला" दो चार झटको में ही नरेश के मूह से एक चीख़ निकली और उसका लंड उसकी पेण्ट में ही झरने लगा, नरेश को झरने के बाद अहसास हुआ की वह अपनी नंगी सगी बहन के साथ खडा है । वह जल्दी से अपनी बहन को अपने बाँहों से आज़ाद करते हुए वहां से बाहर चला गया, शीला बेचारी अपने भाई के अचानक चले जाने से वहां पर तडपति हुयी अकेली रह गयी ।
 
शीला नरेश के जाने के बाद हैंरान होकर वहीँ पर खड़ी थी, उसकी साँसें बुहत ज़ोर से ऊपर नीचे हो रही थी। उसका प्लान बिलकुल कामयाब हुआ था । वह सोचने लगी की नरेश को आखिर अचानक क्या हुआ जो वह अपनी नंगी छोटी बहन को ऐसे तडपता हुआ छोडकर चला गया ।

शीला को तभी याद आया के आखिर में उसके भाई ने उसकी गांड पकड़कर अपनी पेण्ट पर दबाई थी और वह ज़ोर से काम्प रहा था। अच्छा तो यह बात थी, शीला को उस वक्त अपनी चूत पर कुछ गीला गीला अहसास हुआ था । तभी नरेश ने उसे छोड दिया था।

शीला मन ही मन में मुस्कुरा रही थी वह समझ गयी थी के उसका भाई अपनी गर्मी को संभल न सका और यों ही झर गया था । शीला ने अपने कपडे पहने और बाहर निकल आई।

नरेश अपने कमरे में आकर बेड पर लेटा हुआ सोच रहा था की जो कुछ भी हुआ पता नहीं शीला उसके बारे में क्या सोच रही होगी, कहीं वह सब कुछ सब को बता तो नहीं देगी । मगर जब उसने शीला को किस दी थी तो वह भी उसका साथ दे रही थी, पर फिर भी एक अन्जाना डर नरेश के दिल में था ।

रेखा कुछ देर तक अपने बाप और मनीषा से बातें करने के बाद वहां से उठते हुए खाना बनाने की तैयारी करने लगी ।

"बापु जी रात को नींद तो अच्छी आ गयी आपको?" मनीषा ने रेखा के जाते ही अपने बाप से कहा ।

"हा बेटी नींद तो बुहत बढिया आई थी, मगर सब तुम्हारी मेहनत की वजह से" अनिल ने मोका देखकर अपनी बेटी पर लाइन मारते हुए कहा ।

"बापु जी आपकी सेवा करते करते हमारी हालत ख़राब हो गई थी रात को" मनीषा ने बात को आगे बढाते हुए कहा।

"क्यों क्या हुआ था बेटी?" अनिल ने अन्जान बनते हुए कहा।

"वो बापू जी आपको शांत करते करते हम गरम हो गये थे" मनीषा ने यह बात कहते हुए शर्म से अपना सर नीचे कर रखा था ।

"ओह इसका मतलब हमारी वजह से हमारी बेटी को तकलीफ उठानी पडी" अनिल ने अपनी बेटी की बात सुनने के बाद कहा।

"नही बापू इस में तकलीफ की क्या बात है वह तो हमारा फ़र्ज़ था" मनीषा ने कहा।

" वह तुम्हारा फ़र्ज़ था, तो क्या मेरा कुछ फ़र्ज़ नहीं बनता था की मैं तुम्हारी कुछ मदद कर पाता" अनिल ने गुस्से से कहा ।
 
" बापु आप इतना दुखी क्यों हो रहे हो, हमने अपने आप को शांत कर दिया था" मनीषा ने अपने बाप से कहा।

"वही तो कह रहा हूँ बेटी के अगर तुम्हें मेरी वजह से तकलीफ हुयी थी तो उसे हमें ही दूर करने देती मगर तुम तो हमें इस लायक समझती ही नहीं हो" अनिल ने अपनी बेटी के पास जाकर बैठते हुए कहा ।

"बापु जी आपका तो अभी भी खडा है क्या बात है अपनी बहु की बुहत याद आ रही है क्या?" मनीषा ने अपने हाथ से अपने बाप के लंड की चिकोटी लेते हुए कहा।

"हमारी इतनी चिंता मत करो अपने बारे में कुछ सोचो, तुम अभी बूढ़ी नहीं हुयी हो" अनिल ने अपनी बेटी के गालों की चिकोटी लेते हुए कहा।

"बापु आप हमारी झूठी तारीफ मत किया करो" मनीषा ने शरमाकर उठते हुए कहा । अब मनीषा अपने बाप के सामने उलटी खडी थी और अनिल अपनी बेटी के चूतडों को घूर रहा था।

"बेटी मैं सच कह रहा हूँ तुम्हें देखकर बिलकुल नहीं लगता की तुम ३ जवान बच्चों की माँ हो" अनिल ने अपनी बेटी की और ज़्यादा तारीफ करते हुए कहा।

"तुम्हे क्या लगता है बापु" मनीषा ने उलटे खडे हुए ही कहा।

"बेटी तुम्हें देखकर ऐसा लगता है की तुम किसी कॉलेज की लड़की हो" अनिल ने अपनी बेटी से कहा।

"बापु में जा रही हूँ,आप तो बुहत ज़्यादा फ़ेंक रहे हो" मनीषा यह कहते हुए जाने लगी की अनिल ने उसे कमर से पकडते हुए कहा।

"बेटी मैं सच कह रहा हूँ । कहाँ जा रही हो" ।

मानिषा अचानक अपनी कमर में हाथ पड़ने से बैलेंस खोकर अपने बाप की गोद में जा गिरी।

"आह्ह ओहह" मनीषा के चूतड़ सीधे अपने पिता के खडे लंड पर आकर पडे थे । जिस वजह से उसके मुँह से हलकी सिसकी निकल गई।

"बेटी क्या हुआ कहीं चोट तो नहीं लगी" अनिल भी अपनी बेटी के नरम नरम चूतडों को अपने लंड पर दबते ही मजा लेते हुए बोला।

"नही पिता चोट तो नहीं लगी है बस थोडी मोच आ गयी है" मनीषा ने अपने बाप के गोद से बगैर उठे उनके लंड को अपने चुतडों से दबाकर मजा लेते हुए कहा ।

"कहाँ पर मोच आ गयी है हमारी बेटी को" अनिल अपना एक हाथ अपनी बेटी के नंगे पेट पर रखते हुए उसे दबोच लिया और थोडा नीचे झुकते हुए अपने दुसरे हाथ से अपनी बेटी के पैर से साड़ी को थोडा ऊपर करते हुए कहा।
 
अनिल के झुकने और अपनी बेटी के पेट पर हाथ रखने से उसका लंड मनीषा के चूतडों में और ज्यादा चुभने लगा।

"आजहहह बापू यहाँ नहीं थोडा और उपर" मनीषा को अपने चुतडो के बीच अपने बापू का लंड बुहत अच्छा लग रहा था इसीलिए वह यह खेल कुछ देर तक यों ही खेलना चाहती थी।

"यहाँ बेटी" अनिल ने अपनी बेटी की साड़ी को अब घुटनों तक ऊपर कर लिया था ।

मानिषा की चूत मज़े से थोडा थोडा पानी टपकाने लगी थी । उसका पूरा बदन मज़े और खुमारी में टूट रहा था।

"बस थोडा और ऊपर बापु" मनीषा ने मज़े से अपने बाप को और तडपाते हुए कहा।

"अब बताओ बेटी कहाँ दर्द है" अनिल ने अपनी बेटी की साड़ी को अब उसके घुटनों से भी ऊपर कर दिया था। जिस वजह से अनिल को अपनी बेटी की पेंटी भी नज़र आ रही थी और अनिल अपनी बेटी की गोरी और चिकनी जाँघ पर हाथ फिरा कर पूछ रहा था ।

"आह्हः बापू आउच यहीं पर है दरद" मनीषा अपने बाप का हाथ अपने घुटनों के ऊपर अपनी जाँघ पर पड़ते ही मज़े के मारे सिसकते हुए बोली।

"अभी तुम्हारा दर्द ग़ायब कर देता हूँ" अनिल अपने हाथ से अपनी बेटी की गोरी गोरी जाँघ को ऊपर से नीचे तक रगडते हुए कहा।

"ओहहहह बापू अभी कुछ अच्छा लग रहा है" अनिल का हाथ अपनी जांघों पर बुहत ज़ोर से रगडने से मनीषा को बुहत मजा आ रहा था । अनिल ने अब अपनी बेटी की जाँघ पर अपना हाथ रगडते हुए बुहत ऊपर तक जा रहा था । जिस वजह से कभी कभी उसकी उंगलिया अपनी बेटी की पेंटी को छू रही थी,

"उईई ओह बापू ऐसे ही अब दर्द कम हो रहा है" अपने बाप की उंगलिया अपनी पेंटी पर महसूस होते ही मनीषा का पूरा जिस्म में चींटिया दौडने लगी और वह बुहत ज़ोर से सिसकते हुए कहने लगी ।
 
अनिल कोई कच्चा खिलाडी तो था नहीं वह समझ चूका था की उसकी बेटी को कोई दर्द नहीं है वह बस बहाने से मजा ले रही है। सो उसने अब अपने हाथ को बुहत ऊपर करते हुए अपनी बेटी की पेंटी को बुहत ज़ोर से अपनी उँगलियों से रगडना शुरू कर दिया । मनीषा का जिस्म इतना गरम हो चुका था की उसके जिस्म से पसीना निकल रहा था जिस वजह से अनिल का दूसरा हाथ भी उसकी पीठ पर फिसल रहा था ।

मानिषा का जिस्म अब काम्पने लगा वह अपनी मंजिल के बिलकुल क़रीब थी और वह किसी भी वक्त झर सकती थी, अनिल भी अपनी बेटी के पेंटी को गीला महसूस करके जान चूका था की उसकी बेटी किसी भी वक्त झर सकती है । इसीलिए उसने अपनी उँगलियाँ को सीधा अपनी बेटी की पेंटी के ऊपर से उसकी चूत पर रगडने लगा।

"आह्ह्ह्ह शहहहह बापू ओह्ह्ह्ह" मनिषा का जिस्म अचानक अकडने लगा और वह अपने बाप की उँगलियों की हरकत को बर्दाशत न करते हुए झरने लगी।

अनिल का हाथ उसकी बेटी के झरने से उसकी पेंटी के ज़्यादा गीले होने होने थोडा गीला हो गया। मगर अनिल ने अपने हाथ को फ़ौरन वहां से हटाते हुए अपनी बेटी को थोडी देर के लिए बिलकुल शांत छोड दिया।

"बेटी अब दर्द तो नहीं हो रहा है" थोड़ी देर बाद मनीषा ने जैसे ही आँखें खोली अनिल ने उससे पुछा ।

"नही बापू जी अब दर्द नही है" मनीषा ने शर्म से पानी पानी होते हुये कहा।

"बेटी मैं तो परेशान हो गया था"अनिल ने खुश होते हुए कहा।

"बापु अब मैं जा रही हूँ थोडा रेखा दीदी से काम है" मनीषा ने अपने बापू की गोद से अपने चुतडो को उठाते हुए कहा।

"ठीक है बेटी तुम अपनी भाभी से जाकर बात करो" अनिल ने मनीषा के उठते ही कहा । मनीषा अपने बापू की बात सुनकर वहां से चलि गयी ।
 
दोस्तों आपलोगों के सहयोग के लिए बहुत बहुत थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
मानिषा अपने बापू के कमरे से निकलकर अपने कमरे में आ गयी और दरवाज़ा बंद करके अलमारी से दूसरी पेंटी निकाली । मनीषा की पेंटी पूरी भीग चुकी थी इसीलिए वह अपनी पेंटी को चेंज करने अपने कमरे में आई थी ।

कंचन खाली पीरियड में अपने क्लास से बाहर आकर बैठी थी, आज उसकी सहेली नीलम भी नहीं आई थी इसीलिए वह बोर हो रही थी । विजय का भी खाली पीरियड था तो वह अपने क्लास से बाहर निकलकर टहलने लगा, अचानक विजय की नज़र अपनी बड़ी बहन पर पर गई वह सीधा चलते हुआ कंचन के पास आ गया।

"वीजू तुम कैसे आओ बैठो" कंचन ने अपने भाई को देखकर खुश होते हुए कहा।

"वो दीदी खाली पीरियड था इसीलिए टहल रहा था की आपको देख लिया और यहाँ आ गया" विजय ने बैठते हुए कहा ।

"मैंने कहा था न विजु के कोई गर्लफ्रेंड बना ले देखो अब अगर तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड होती तो ऐसे अकेले तो न घूमते" विजय के बैठते ही उसकी बड़ी बहन ने उसे छेडते हुए कहा।

"दीदी मैंने एक गर्लफ्रेंड बना ली है" विजय ने अपनी बहन से कहा ।

"सच विजु मुझसे नहीं मिलवाओगे?" कंचन ने खुश होते हुए कहा।

"हाँ क्यों नहीं मगर उसे देखकर जल मत जाना, मेरी गर्लफ्रेंड बुहत ख़ूबसूरत है" विजय ने अपनी बड़ी बहन की तरफ देखते हुए कहा।

"वीजू चलो मुझे उससे मिलवाओ ना" कंचन ने अपना भाई को हाथ से पकड़कर खीचते हुए कहा, वह अपने भाई की बातों से अंदर ही अंदर में जल रही थी की उसके भाई को ऐसी कौन सी लड़की मिल गई जो वह उसकी इतनी तारीफ कर रहा है।

"अरे ठहरो दीदी इतनी जल्दी क्या है पहले उसके बारे में पूरा जान तो लो" विजय ने अपनी बहन से हाथ छुड़ाते हुए कहा।

"वीजू मैं उसे देखकर जान जाऊँगी" कंचन ने गुस्सा होते हुए कहा।

"नही दीदी पहले उसके बारे में तुम जान लो फिर मैं तुम्हें उसकी तस्वीर दिखाऊँगा" विजय ने अपनी बहन को चिढाते हुए कहा ।

"वीजू तुम्हारे पास उसकी तस्वीर है, मुझे दिखाओ न प्लीज" कंचन अपने भाई की बात सुनकर उससे मिन्नतें करते हुए बोली।

"दीदी मैंने कहा न दिखाऊँगा पहले उसके बारे में जान तो लो" विजय को भी अब अपनी बहन को चिढाने में मजा आ रहा था इसीलिए उसने कंचन को चिढाते हुए कहा ।
 
"वीजू चलो जल्दी से बताओ क्या कहना चाहते हो" कंचन ने मूह बनाते हुए कहा।

"ये हुयी न बात दीदी, मेरी गर्लफ्रेंड इतनी सूंदर है की कॉलेज का हर लड़का उससे दोस्ती करना चाहता है मगर उसने सिर्फ मुझे अपना बॉयफ्रेंड बनाया है" विजय ने खुश होते हुए कहा ।

"उसका नाम क्या है विजू" कंचन ने वैसे ही गुस्सा करते हुए पुछा। अब तो वह सच में वह उस लड़की से जल रही थी।

"दीदी आप उसे जानती हैं नाम से आपको पता लग जाएगा" विजय ने अपनी बहन की तरफ देखते हुए कहा।

"विजू मैं उसे जानती हूँ बताओ न कौन है वह । तुम्हें मेरी कसम?" कंचन ने बुहत ज़्यादा परेशान होते हुए कहा। अब तो कंचन का सच में दिमाग घूम रहा था ।

"दीदी आपने अपनी कसम दे दी है तो अपनी ऑंखें बंद कर लो मैं उसकी तस्वीर दीखाता हूँ" विजय अपनी प्यारी बहन की कसम का सुनते ही बोला।

कंचन ने अपने भाई की बात सुनकर अपनी आँखें बंद कर ली।

"दीदी मेरी गर्लफ्रेंड को ज़रा प्यार से देखना दुनिया की सब से हसीन लड़की है वो" विजय ने अपने हाथ में कोई चीज़ लेकर अपनी बड़ी बहन के ऑंखों के सामने कर दी।

कंचन का दिल ज़ोर से धड़क रहा था की उसके भाई की गर्लफ्रेंड कौन है जिसे वह भी जानती है। उसने जैसे ही अपनी आँखें खोली उसका शर्म और गुस्से का कोई ठिकाना न रहा । कंचन गुस्से में आकर अपने भाई को अपने हाथों से मारने लगी ।

"क्यों दीदी हमारी गर्लफ्रेंड आपको पसंद नहीं आई क्या?" विजय ने हँसते हुए कहा।

"भइया आप बुहत बूरे हो हमें इतनी देर तक यों ही सताते रहे" कंचन ने गुस्से से अपना मूह दूसरी तरफ करते हुए कहा।

विजय ने अपनी बड़ी बहन की आँखें बंद करते ही उसके सामने एक आईने का टुकडा रख दिया था, जब कंचन ने आँखें खोलि तो उसे अपना चेहरा नज़र आया था जिस वजह से वह विजय से नाराज़ थी । कंचन दिल में तो बुहत खुश थी के उसका भाई किसी और की नहीं बल्कि उसकी इतनी तारीफ कर रहा था ।

"दीदी आपने सोच कैसे लिया की मैं आपके होते हुए किसी और को गर्लफ्रेंड बनाऊँगा" विजय ने अपनी बहन को सर से पकरते हुए उसका कन्धा ऊपर करते हुए कहा।

"सच में भैया आप बुहत अच्छे हो" कंचन ने इधर उधर देखते हुए अपने भाई के होंठो पर अपने होंठ रख दिये और तीन चार सेकण्डस तक अपने छोटे भाई के होंठो को चूसने के बाद अपने होंठ वहां से हटा दिए ।
 
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