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परिवार(दि फैमिली) complete

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दोस्तों आपलोगों के सहयोग के लिए बहुत बहुत थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
विजय और उसकी दोनों बहनें छुट्टी होने के बाद हर रोज़ की तरह रिक्शा में बैठकर कॉलेज से घर आ गये। रेखा ने अपने बच्चों को खाना दे दिया जिसे खाने के बाद सभी अपने अपने कमरों में आगये ।

"क्या हाल है यार । क्या कर रहे हो" विजय ने अपने कमरे में ही बेड पर लेटे नरेश से पुछा।

"कुछ नहीं यार बस नींद आ रही थी" नरेश अब सुकून की नींद करना चाहता था इसीलिए उसने करवट लेते हुए अपना मूह दूसरी तरफ करते हुए कहा।

विजय ने नरेश को बात न करते हुए देखकर चुप हो गया और खुद भी बेड पर आकर लेट गया।

"क्या हो रहा है शीला की बच्ची" कंचन ने शीला के साथ बेड पर बेठते हुए कहा।

"छोड़ो यार अपना नसीब ही खराब है" शीला ने ठण्डी साँस लेते हुए कहा ।

"क्यों क्या हुया" कंचन ने एक्साइटेडट होते हुए कहा। शीला ने अपने भाई के साथ होने वाली सारी बात कंचन को बता दी।

"शीला तुम तो बुहत चालाक हो पर यार हमारा नसीब ही खराब है कुछ सोचो न रात के बारे में" कंचन ने शीला की बात सुनकर गरम होते हुए कहा।

"यार एक बात मेरे दिमाग में है अगर हमारे भाइयों को अक्ल होगी तो मान जाएंगे" शीला ने सोचते हुए कहा।

"क्या बात है ज़रा मुझे भी तो पता चले" कंचन ने शीला से कहा । शीला ने अपना आईडिया कंचन को सुना दिया जिसे सुनकर वह उछल पड़ी ।

"यार अगर ऐसा हो जाये तो हमारी सारी हसरतें पूरी हो सकती हैं" कंचन ने खुश होते हुए कहा और दोनों बेड पर लेट कर आपस में बातें करते हुए नींद की आग़ोश में चलि गई।

मानिषा अपने कमरे में बेड पर लेटी करवटे ले रही थी उसे बार बार अपने बेटे का तगडा लंड अपनी चूत से रगडता हुए याद आ रहा था, अपनी ऊँगली से वह एक दफ़ा अपनी चूत को शांत कर चुकी थी मगर अब उसकी चूत को तो अपने बेटे का तगडा लंड ही चाहिए था ।

रेखा की भी वही हालत थी वह अपने भांजे का लंड अपनी चूत में तो ले चुकी थी मगर उसकी चूत की आग अभी तक शांत नहीं हुयी थी क्योंकी उसकी चूत की चुदाई अभी सही तरीके से नहीं हुयी थी और उसे भी उत्तेजना के मारे अपनी चूत में बुहत ज़ोर की खुजलि हो रही थी । रेखा कुछ सोचते हुए अपने कमरे से निकल कर अपने ससुर के कमरे में जाने लगी।
 
रेखा ने अपने ससुर के कमरे में पुहंचकर उसका कमरा अंदर से बंद कर दिया । अनिल गर्मी होने की वजह से सिर्फ धोती में सोया हुआ था, अपनी बहु को कमरे में आता हुआ देखकर वह समझ गया की उसके लंड को अपनी बहु की छूट मिलने वाली है ।

रेखा बुहत गरम थी तो उसने अपने ससुर के पास बैठते ही अपने ससुर की धोती को अपने हाथ से हटा दिया,

"अरे बेटी यह क्या कर रही हो हमें नंगा क्यों कर दिया" अनिल मोके का फ़ायदा उठाते हुए अपनी बहु से नाटक करते हुए कहा।

"मुझे आपके इस शैतान को उठाना है" रेखा ने अपने हाथ से अपने ससुर का ढीला पर लंड सहलाते हुए कहा।

"अरे बेटी तुम्हें शर्म नहीं आती अपने ससुर के लंड को पकडते हुये" अनिल ने अपनी बहु से फिर से नाटक करते हुए कहा।

"क्यों बाबूजी क्या हुआ आपका मूड नहीं है" रेखा ने परेशान होते हुए कहा।

"नही बेटी मूड क्यों नहीं होगा जब इतनी सूंदर बहु अपने ससुर से चुदवाने के लिए खुद उसके कमरे में आ गयी है तो मूड क्यों नहीं होगा" अनिल ने अपने बेड से उठते हुए अपनी बहु को भी सीधा कर दिया और उसकी साड़ी को उसके जिस्म से अलग करते हुए बोला।।

"वाह बेटी क्या जिस्म है तुम्हारा। काश तुम मेरी बहु नहीं बीवी होती" अनिल ने अपनी बहु की तारीफ करते हुए कहा।

"बाबू जी इस वक्त आप हमें अपनी बीवी समझकर ही चोदिये। हमारी चूत बुहत प्यासी है" रेखा ने अपने ससुर की बात सुनते ही उसको गले लगाते हुए कहा।

अनिल ने अपनी बहु की बात सुनकर उसके होंठो को चूमते हुए उसका पेटिकोट उतार दिया और खुद घुटनों के बल बैठते हुए अपनी बहु की गीली चूत को देखने लगा।

"बेटी तुम्हारी पेंटी इतनी गीली की हो गई है" अनिल ने अपनी बहु की पेंटी को सूँघते हुए कहा।

"हाहहह बाबूजी हमें पेंटी के अंदर कुछ हो रहा है । इसी लिए उसमें से यह पानी निकल कर हमारी पेंटी को गीला कर रहा है" रेखा ने सिसकते हुए कहा ।

"बेटी फिर तो इसका इलाज करना पडेगा" अनिल ने अपने दोनों हाथों से अपनी बहु की पेंटी को पकड कर उतारते हुए कहा।

"बाबूजी इसीलिए तो आपके पास आई हूँ तुम्हारा बेटा तो सही इलाज नहीं कर पाता तो हमारा ख्याल तो आपको ही रखना पडेगा" रेखा ने वैसे ही खडे कहा ।

"बेटी तुम्हारी चूत से बुहत पानी निकल रहा है लगता है बेचारी के अंदर कोई ज़ख़्म है अब हमें अपनी इंजेक्शन डालकर इसमें अंदर दवाई ड़ालने पडेंगी" अनिल ने अपनी बहु की हलकी झाँटों वाली चूत को अपने होंठो से चूमते हुए कहा।
 
बाबूजी जो करना है करो मगर हमारा इलाज सही तरीके से करो हमें बेचारी अंदर बुहत खुजलि हो रही है" रेखा ने अपने ससुर को बालों से पकडते हुए अपनी चूत पर दबाते हुए कहा।

"हाँ बेटी करता हूँ मगर बेड पर आराम से लेटकर" अनिल सीधा होते हुए अपनी बहु के ऊपर वाले भी सारे कपडे उतार दिये और उसे बेड पर सीधा लेटाते हुए उसके ऊपर चढ़ गया ।

अनिल ने अपनी बहु को होंठो को चूमते हुए नीचे होते हुए उसकी दोनों बड़ी चुचियों को ज़ोर से मसलते हुए उन्हें एक एक करके चाटने लगा।

"आआह्ह्ह्ह बाबू जी आराम से दर्द हो रहा है" रेखा ने अपनी चुचियों के ज़ोर से दबने से सिसकते हुए कहा।

अनिल अचानक अपनी बहु के पेट पर बैठते हुए अपने लंड को उसकी दोनों बड़ी बड़ी चुचियों के बीच डालकर आगे पीछे करने लगा । अनिल का लंड उसकी बहु की चुचियों से होता हुआ रेखा के होंठो को टच करने लगा। रेखा ने अपना मूह खोल दिया और जैसे ही उसके ससुर का लंड उसके होंठो के क़रीब आता वह अपनी जीभ से उसे चाट लेटी।

अनिल कुछ देर तक ऐसा करने के बाद नीचे होते हुए अपनी बहु की टांगों को पूरा फ़ैला दिया और खुद उसके बीच बैठते हुए अपनी जीभ निकालकर अपनी बहु की चूत से निकलता हुआ नमकीन पानी चाटने लगा ।

"आह्ह्ह्ह बाबजी अब अपना घुसा दो न बुहत तकलीफ हो रही है" अपने ससुर की जीभ को अपनी चूत पर महसूस करते ही रेखा ने सिसकते हुए कहा।

"क्या घुसा दूँ बहु" अनिल ने अपनी बहु से कहा और उसकी चूत के दाने को अपने होंठो में लेकर चूसने लगा।

"ओहहहह स्सस्स्स्शह्ह्ह बापू अपना इंजेक्शन घुसाओ न हम और बर्दाशत नहीं कर सकते" रेखा ने अपनी चूत का दाना अपने ससुर के मूह में आते ही बुहत ज़ोर से सिसकते हुए कहा।

"हाँ बेटी थोडा रुको अभी घुसाते है" यह कहते हुए अनिल ने अपनी बहु की टांगों को घुटनों तक मोडते हुए अपना लंड अपनी बहु की चूत पर घीसने लगा ।

रेखा की हालत बहुत खराब थी । वह बुहत ज़्यादा एक्साइटेडट हो गई थी । अपने ससुर का लंड अपनी चूत पर घिसता हुआ देखकर वह अपने चूतड़ उछलकर अपने ससुर के लंड को अपनी चूत में लेने की कोशिश करने लगी।

अनिल ने अपना लंड अपनी बहु की चूत के छेद पर रखकर एक ज़ोर का धक्का मार दिया।

"आह्ह्ह्हह्ह शह्ह्हह्ह्ह्ह बाबूजी" अनिल का लंड एक ही झटके में पूरा अपनी चूत में घूसने से रेखा के मूह से मज़े की एक सिसकि निकल गयी । अनिल अपना पूरा लंड घुसाकर अपनी बहु के ऊपर लेट गया और उसकी चुचियों को चाटने लगा।

"बाबूजी करो ना" रेखा ने अपने चूतड़ो को अपने ससुर के लंड पर उछालते हुए कहा ।
 
बेटी घुसा तो दिया अब क्या करुं" अनिल ने अपनी बहु की चुचियों को अपने मूह से निकालकर नाटक करते हुए कहा।

"बाबुजीआप बुहत बदमाश हो । आप मुझसे गन्दी बाते सुनना चाहते हो तो सुनो । बाबुजी अपने लंड को अपनी बहु की चूत में अंदर बाहर करो। आपकी बहु की चूत में बुहत ज़ोर की खुजलि हो रही है उसे मिटा दो" रेखा ने खुलकर अपने ससुर से कहा ।

अनिल अपनी बहु के मूह से यह सब सुनकर बुहत ज्यादा एक्साइटेडट होगया और उसका लंड भी उसकी बहु की चूत में और ज्यादा मोटा हो गया । अनिल सीधा होते हुए अपनी बहु की चूत में अपना लंड बुहत तेज़ी से अंदर बाहर करने लगा।

"आह्ह्ह्ह शहहह हाँ बाबुजी ऐसे ही हमारी चूत में ज़ोर से अपना लंड अंदर बाहर करो । बुहत मजा आरहा है" रेखा ने सिसकते हुए अपनी दोनों टांगों को अपने ससुर की कमर में डाल दिया । अनिल भी अपनी बहु की बातों से ज्यादा एक्साइटेडट होकर अपना लंड पूरा बाहर तक खीचकर उसकी चूत में पेल रहा था, अनिल के हर धक्के के साथ रेखा का पूरा जिस्म कांप रहा था।

रेखा झरने के बिलकुल क़रीब थी इसीलिए उसका पूरा जिस्म अकडने लगा था।

"आह्ह्ह्हह्ह बाआबूउउउउजी ज़ोर से अंदर बाहर करो मैं झरने वाली हूँ" अचानक रेखा की साँसें उखडने लगी ।और उसने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा।

अनिल अपनी बहु की बात सुनकर अपने लंड को जितना हो सकता था उतनी ज़ोर और तेज़ी के साथ अपनी बहु की चूत में अंदर बाहर करने लगा।

"आआह्ह्ह्हह हहहह ओह्ह्ह्हह्हह बाबू जी" यह कहते हुए रेखा की आँखें बंद हो गई और उसकी चूत ने अपने ससुर के लंड को ज़ोर से पकडते हुए उस पर झटके मारते हुए पानी छोडने लगी । अनिल भी अपनी बहु की चूत से अपना लंड के दबने से अपने आप को रोक नहीं पाया और वह भी हाँफते हुए अपनी बहु की छूट में पानी छोडने लगा ।

"आह्ह्ह्ह बेटी" अनिल झरते हुए बुहत ज़ोर से हाँफते हुए अपनी बहु की चूत में झटके मारने लगा और अपना पूरा वीर्य निकलने के बाद अपनी बहु के ऊपर ही ढेर हो गया।

रेखा अपने ससुर के झरने के बाद अपनी आँखें खोलते हुए उसको अपने ऊपर से हटाते हुए खुद बाथरूम में चलि गयी । मनीषा को करवटे लेते हुए अचानक ख़याल आया की क्यों न अपने पिता के कमरे में जाकर उनसे बाते करे, रेखा बाथरूम से निकल कर अपने कपडे पहनने लगी।

"बेटी इतनी जल्दी है क्या" अनिल ने अपनी बहु को कपड़े पहनता हुआ देखकर कहा ।

"हाँ बाबू जी आप तो जानते ही हैं कोई आ गया तो फिर मुसीबत हो जाएगी" रेखा ने कपडे पहनने के बाद वहाँ से जाते हुए कहा । मनीषा जैसे ही अपने कमरे से निकलकर अपने पिता के कमरे में जाने लगी। उसने देखा की उसके पिता के कमरे से उसकी भाभी निकल रही है।

"भाभी आप कहाँ जा रही हो आओ बैठकर बाते करते है" मनीषा ने अपनी भाभी को अपने सामने देखकर कहा।

"नही दीदी मैं इतनी देर से बाबजी से बाते कर रही थी। अभी मुझे नींद आ रही है" रेखा ने मनीषा का जवाब देते हुए कहा ।

"भाभी ठीक है आप बापू से बाते करते हुए बुहत थक गयी होंगी जाकर आराम करो" मनीषा ने अपनी भाभी के बिखरे बालों को गौर से देखकर मुस्कराते हुए कहा। रेखा मनीषा की बात सुनकर वहां से जाने लगी मगर वह समझ गयी थी की मनीषा इसीलिए हँस रही थी क्योंकी उसको शक हो गया है।

मानिषा अपनी भाभी के जाने के बाद अपने बापू के कमरे में जाने लगी । अनिल ने अपनी बहु के जाते ही अपनी धोती पहन ली थी, मनीषा जाते हुए यह सोच रही थी की उसके बापू ने अभी अभी उसकी भाभी की सेवा की है तो वह तो थक गए होंगे । यह सोचते हुए मनीषा की चूत में भी कुछ कुछ होने लगा की जिस कमरे में वह जा रही है। वहां पर थोडी देर पहले उसका बाप उसकी भाभी को चोद चूका है ।
 
मानिषा अपने बापू के कमरे में आ गयी । अनिल धोती में बेड पर लेटे हुए था, मनीषा सीधा अपने बापू के बेड पर उसके पास जाकर बैठ गयी ।

"अरे बेटी तुम कब आई" अनिल ने अपनी बेटी को देखकर बेड से उठकर बैठते हुए कहा।

"हाँ बापू आपको अपनी बहु की सेवा से फुर्सत मिले तभी तो अपनी बेटी के बारे में सोचेंगे" मनीषा ने अपने बापू पर बनावटी गुस्सा करते हुए कहा ।

"नही बेटी ऐसी कोई बात नहीं । तुम मुझे अपनी बहु से ज्यादा अच्छी लगती हो" अनिल ने अपनी बेटी को जवाब देते हुए कहा।

"छोड़ो बापू सारा दिन अपनी बहु के पल्लु के पीछे छुपे रहते हो और हमारी झूठ मूठ की तारीफ कर रहे हो" मनीषा ने अपने बापू से कहा।

"अरे बेटी तुम तो सब जानती हो हम अपनी बहु को अपने इसके लिए प्यार करते हैं अब इस उम्र में भी यह हमें चैन से रहने नहीं देता" अनिल ने अपनी धोती के ऊपर अपने लंड पर हाथ रखते हुए कहा।

"हाँ लगता है इसे अपनी बहु का माल बुहत पसंद आ गया है। तभी तो हर वक्त आपको तंग करता रहता है" मनीषा ने हँसते हुए अपने बाप से कहा ।

"बेटी यह हमारी बहु ही नहीं बल्कि हर ख़ूबसूरत चीज़ को देखकर उसका स्वाद लेने के लिए उतावला हो जाता है" अनिल ने अपने लंड को अपने हाथ से सहलाते हुए कहा।

"फिर तो बापू आपके पास बैठने में भी खतरा है कहीं यह आपको अपनी बेटी का स्वाद लेने के लिए न भडका दे" मनीषा ने वेसे ही हँसते हुए कहा।

"बेटी मेरा ऐसा नसीब कहाँ की तुम्हारे जैसी ख़ूबसूरत लड़की का रस चख सकूँ, भगवान ने अगर तुम्हें हमारी बेटी न बनाया होता तो मैं एक बार ज़रूर तुम्हारा रस इसे पिलाता" अनिल ने मायूस होते हुए कहा ।

"बापु क्या सच में मैं आपको इतनी सूंदर लगती हूँ।" मनीषा ने हैंरान होते हुए कहा।

"हाँ बेटी तुम मुझे बुहत अच्छी लगती हो" अनिल ने अपनी बेटी को जवाब दिया।

"फिर आपके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं हम आपकी बेटी हुई तो क्या हुआ । हम आपके इसकी ही पैदाइश हैं आपका हम पर पूरा हक़ है" मनीषा ने जज़्बाती होते हुए अपने बापू को गले लगाते हुए कहा।

"बेटी सच में तुम बुहत महान हो" अनिल ने अपनी बेटी के माथे पर चुम्बन देते हुए कहा । मनीषा को अपने बापू के बालों वाले सीने में अपनी चुचियों के दबने से बुहत सुकून मिल रहा था । इसीलिए वह अपने बापू को कस कर अपने सीने से लगा रही थी ।

"बेटी इस वक्त यह सब करना खतरनाक होगा हमें रात का इंतज़ार करना होगा, मगर बेटी यह सिर्फ मैं जानता हूँ की मुझसे यह दिन कैसे गुज़रेंगा" अनिल ने अपनी बेटी के पीठ को सहलाते हुए कहा।
 
हाँ बापू आप सही कह रहे हो हमें रात का इंतज़ार करना होगा" मनीषा ने यह कहते हुए अपने होंठ अपने सगे बाप के होंठो पर रख दिये । अनिल अपनी बेटी के गुलाबी सुलगते होंठो को अपने होंठो पर पड़ते ही पागलोँ की तरह चूमते हुए अपना मूह खोल कर उन्हें चाटने लाग। मनीषा की चूत उत्तेजना के मारे अपने बाप से होंठ चुसवाते हुए गीली होकर रस टपकने लगी ।

अनिल का लंड भी फिर से उठने लगा था, मनीषा को अपने पूरे जिस्म में अजीब किस्म की झूझुरी हो रही थी। उसने अपने हाथ को अपने बापू की धोती में डालकर उसका आधा तना हुआ लंड पकड लिया और अपने कोमल हाथों से उसे सहलाने लगी ।

"आहहहहह बेटी" अपनी बेटी का हाथ अपने लंड पर पड़ते ही अनिल के मूह से सिसकी निकल गई।

मानिषा ने अपने बापू के मूह में अपनी जीभ को डाल दिया जिसे अनिल अपने होंठो से चूस्ते हुए अपना एक हाथ अपनी बेटी के कपड़ों के ऊपर उसकी एक चूचि पर रख दिया।

"आह्ह्ह्ह शहहहहः" अपने बाप का हाथ अपनी चुचियों पर पड़ते ही मनीषा को एक करंट का झटका लगा । उसका सारा बदन अपने बाप के हाथ को अपनी चूचि पर लगते ही काम्पने लगा ।

"बापु हम आगे निकल रहे हैं इस वक्त यह सब ठीक नहीं होगा" अचानक मनीषा ने होश में आते हुए अपने बापू के लंड से हाथ हटा लिया और उससे अलग होते कहा । मनीषा यह कहकर अपने बाप के कमरे से निकल कर अपने कमरे में आ गयी ।

मानिषा अपने कमरे में आकर सोचने लगी के उसे क्या हो गया है। पहले वह अपने बेटे के साथ और अब अपने बापू के साथ बुहत गलत कर रही है वह। पर अचानक फिर उसका मन बदल गया और वह सोचने लगी इसे में बुरा ही क्या है । अगर उसका बेटा और उसका बाप उसे पसंद करते हैं तो इसमें उसका क्या क़सूर है ।।।। और वैसे भी उसे अपनी ज़िंदगी को कैसे भी जीने का हक़ है तो वह क्यों न अपनी ज़िंदगी का फुल मज़ा ले।

मानिषा ऐसे ही सोचते हुए सो गयी, रेखा भी अपने कमरे में आकर सुकून की नींद सो चुकि थी । ऐसे ही डेली की तरह टाइम गुज़रता गया और रात हो गई सभी खाना खाने के बाद सोने की तैयारी करने लगे ।

खाना खाने के बाद सभी अपने कमरों में आ गये थे।रेखा दोपहर की दो दफ़ा की चुदाई से बुहत संतुषिट थी इसीलिए वह अपने पति के साथ घोड़े बेचकर सोने लगी। नरेश विजय के सोने का इंतज़ार करने लगा की कब वह सो जाये और वह अपनी माँ के कमरे में जाकर दोपहर को छोड़ा हुआ अधूरा काम कर सके।

कंचन ने शीला से कहा की तुम जाकर जो मैंने कहा था वैसे करो। अगर हमारा आईडिया कामयाब हो गया तो हम दोनों अपने भाइयों के साथ फुल मस्ती कर सकती हैं, शीला कंचन की बात सुनकर वहां से उठकर विजय के कमरे में जाने लगी।

"क्या बात है शीला तुम इस वक्त यहाँ कैसे" नरेश अपनी बहन को अचानक अपने कमरे में देखकर हैंरान होते हुए बोला।

"वो भैया मुझे सर में बुहत दर्द है और कंचन बुहत खराटे मारती है । इसीलिए मुझे वहां पर नींद ही नहीं आ रही है" शीला ने कंचन की बतायी हुयी बात वहां पर कह दी ।
 
" शीला फिर तुम मम्मी के साथ सो जाओ" नरेश ने परेशान होते हुए कहा।

"नरेश ऐसा करते हैं मैं कंचन के साथ जाकर लेट जाता हूँ और तुम शीला को यहीं पर लेटने दो" अचानक विजय ने बीच में बोलते हुए कहा ।

"हाँ भैया आईडिया बुरा नहीं है" शीला ने भी विजय की बात को सुनकर कहा।

"बात तो ठीक है मगर किसी को पता चल गया तो वह गलत सोचेंगे" नरेश ने अपने सर को खुजाते हुए कहा।

"अरे किसी को की पता चलेगा, मैं सुबह को सवेरे आकर यहीं पर लेट जाऊँगा और शीला दीदी को अपनी बहन के कमरे में भेज दूंगा" विजय ने फिर से जल्दी से कहा।

"ठीक है भाई जैसे आपको अच्छा लगे करो" नरेश ने भी हार मानते हुए कहा।

"थैंक्स दीदी" विजय ने जल्दी से उठते हुए शीला को देखते हुए कहा और वहाँ से निकल कर अपनी दीदी के कमरे में आ गया । विजय ने अपनी दीदी के कमरे में आते ही दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया ।

कंचन नाइटी में बेड पर लेटी हुयी थी, अपने भाई के कमरे में दाखिल होते ही उसका दिल ज़ोर से धडकने लगा और उसने नाटक करते हुए अपनी आंखें बंद कर दी।

"दीदी में आ गया हूँ" विजय ने अपनी बहन के क़रीब आते ही बेड पर बैठते हुए कहा।

कंचन ने अपने भाई का कोई जवाब नहीं दिया, वह सीधा लेटी हुयी थी और उसकी सांसों के साथ उसकी चुचियां बुहत ज़ोर से हील रही थी।

"दीदी उठो न क्यों सता रही हो" विजय ने अपना हाथ अपनी बहन के लम्बे बालों में ड़ालकर उसे सहलाते हुए कहा । कंचन फिर भी चुप रही और अपने भाई को कोई जवाब नहीं दिया ।

"वाह हमारी दीदी कितनी सूंदर है । शायद दुनिया की सब से ख़ूबसूरत लडकी, सोते हुए भी कितनी प्यारी लग रही है" विजय समझ गया की उसकी बहन सोने का नाटक कर रही है।उसने अपने हाथ से अपनी बहन के बालों को सहलाते हुए उसकी तारीफ करते हुए कहा।

विजय ने अब अपना हाथ अपनी बहन के बालों से निकालते हुए उसके गोर गालों को सहलाते हुए उसके गुलाबी होंठो पर अपने होंठ रख दिये । अपनी बहन के नरन नरम गुलाबी होंठो पर अपना हाथ पड़ते ही विजय का लंड उसकी पेण्ट को फाड़ने के लिए उतावला होने लगा ।

कंचन वैसे ही सोने का नाटक कर रही थी, विजय अपनी बहन के होंठो पर अपने हाथ फिराने के बाद नीचे होता हुआ अपना हाथ उसके काँधे से नीचे ले जाते हुए अपनी बहन की चुचियों की तरफ बढ़ने लगा।

कंचन अपने छोटे भाई के हाथ से बुहत ज़्यादा उत्तेजित हो चुकी थी । उसकी साँसें बुहत तेज़ चल रही थी और उसकी चूत उत्तेजना के मारे पानी टपकाने शुरू कर दिया था । विजय अपना हाथ धीरे धीरे नीचे कर रहा था, अब उसका हाथ अपनी बहन की चुचियों के ऊपर बने क्लीवेज तक पुहंच चूका था ।
 
दोस्तों आपलोगों के सहयोग के लिए बहुत बहुत थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
" दीदी उठो न क्यों सता रही हो" विजय ने अपनी बहन की चुचियों के उपरी उभार को सहलाते हुए कहा।

"हमम्म सोने दो नींद आ रही है" कंचन ने हल्का मुस्कराते हुए सोने का नाटक करते हुए कहा।

"दीदी उठो वरना जो मुझे दिल में आएगा वह करुंगा" विजय ने अपनी बहन की चुचियों के ऊपर हाथ को ज़ोर से सहलाते हुए कहा ।

कंचन ने अपने भाई की बात का कोई जवाब दिए बगैर वेसे ही सोने का नाटक करने लगी । विजय समझ गया की उसकी बहन ऐसे नहीं उठेगी। उसने अपने हाथ से अपनी बहन की नाइटी को आगे से खोल दिया। कंचन अब विजय के सामने सिर्फ एक छोटी सी ब्रा और पेंटी में लेटी हुयी थी और उसकी साँसें बुहत ज़ोर से ऊपर नीचे हो रही थी। जिस वजह से उसकी बड़ी बड़ी चुचियां उसकी ब्रा में आधी नंगी बुहत ज़ोर से ऊपर नीचे हो रही थी।

अपनी बहन की गोरी गोरी चुचियों को देखकर विजय का लंड उसकी पेण्ट को फाडने के लिए उतावला हो रहा था, विजय ने सीधा होते हुए अपनी शर्ट और पेण्ट को अपने जिस्म से अलग कर दिया। अब वह सिर्फ एक अंडरवियर में था जिस में उसका लंड तनकर तम्बू जैसे उभार बनाये हुए था ।

विजय ने अपने कपडे उतारने के बाद बेड पर बैठते हुए अपनी बहन की आधी नंगी चुचियों को देखते हुए अपने हाथ से उसकी ब्रा को भी अपनी सगी बहन की चुचियों से खींचकर अलग कर दिया । कंचन की ब्रा के हटते ही उसकी चुचियां अपने भाई के सामने बिलकुल नंगी हो गयी।

विजय का दिल अपनी बहन की नंगी चुचियों को देखकर बुहत जोर से धडकने लगा, उसने अपनी तेज़ धडकनों के साथ अपने दोनों हाथ बढाकर अपनी बहन की चुचियों पर रख दिये । कंचन की साँसें भी बुहत जोर से चल रही थी। अपने भाई का हाथ अपनी चुचियों पर महसूस करते ही उत्तेजना के मारे उसकी चूत से रस टपकने लगा ।

विजय को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका हाथ किसी फोम के टुकडे पर रख दिया गया हो, उसे अपना हाथ अपनी सगी बहन की नरम नरम चुचियों पर बुहत ज़्यादा मजा दे रहा था।

विजय ने अपने हाथों से अब अपनी बहन की नरम नरम चुचियों को सहलाना शुरू कर दिया । कंचन को अब नाटक करना बुहत भारी पड रहा था, वह अपने भाई के हाथ से अपनी चुचियों को सहलाता हुआ महसूस करके बुहत ज्यादा एक्साइटेडट हो रही थी।

"आह्ह्ह्ह क्या कर रहे हो भैया" कंचन ने अखिरकार हार मानते हुए कह दिया।

"क्यों दीदी मजा नहीं आ रहा क्या" विजय ने अपनी बड़ी बहन की आवाज़ सुनकर उसकी दोनों चुचियों को ज़ोर से पकडकर सहलाते हुए कहा ।
 
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