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परिवार(दि फैमिली) complete

डॉ रवि समझ गया की रेखा झड चुकी है उसने अपने मुँह को रेखा के होंठो से उठाते हुए थोडा नीचे झुकते हुए उसके ब्लाउज के ऊपर निकली हुयी चुचियों पर रख दिया और वह रेखा की चुचियों के उपरी नरम हिस्से को चूसने और चाटने लगा।

"क्या कर रहे हो डॉ साहब। मैं यह सब नहीं कर सकती" रेखा थोडी देर शांत रहने के बाद अचानक रवि पकडकर अपने ऊपर से उठाते हुए बोली ।

"क्या हुआ भाभी थोडी देर पहले तो आप मजा लेकर सब कुछ करवा रही थी?" रवि ने सीधा खडा होते हुए हैंरानी से रेखा की तरफ देखते हुए कहा।

"हाँ मैं थोडी देर के लिए बहक गयी थी जल्दी से इंजेक्शन लगाओ मैं जाना चाहती हू" रेखा ने अपनी साड़ी को वापस पहनते हुए कहा।

विजय समझ गया की उसकी माँ झडने के बाद अपने आपको संभाल चुकी है इसीलिए वह भी अपने लंड को वापस अपनी पेण्ट में ड़ालने लगा।

"ठीक है भाभी जैसे आपकी मर्ज़ी मैं अभी इंजेक्शन लाया" रवि इतना कहकर अपने लंड को वापस अपनी पेण्ट में डालकर ज़िप को बंद करते हुए वापस अपनी टेबल की तरफ बढ़ने लगा । विजय रवि को बाहर की तरफ आता हुआ देखकर दौडता हुआ वापस कुर्सी पर बैठ गया ।

"बेटे बस अभी इंजेक्शन लगा देता हुँ फिर आप अपनी माँ को ले जा सकते हो" रवि ने इंजेक्शन उठाते हुए विजय से कहा और वापस अंदर चला गया । रेखा डॉ को देखकर उलटी होकर वहीँ पर लेट गई।

"भाभी मैं समझ सकता हूँ की यहाँ पर आपको मेरे साथ सब कुछ करने में परेशानी हो रही है। मैं आपको अपना कार्ड दे देता हूँ जब भी मेरी ज़रुरत हो बस मुझे कॉल कर देना । मैं आपके घर पर हाज़िर हो जाऊँगा" रवि ने रेखा की साड़ी को ऊपर खींचते हुए उसके पेटिकोट के ऊपर से ही इंजेक्शन को लगाते हुए कहा।

"उई डॉ जी आज इंजेक्शन से इतना दर्द क्यों हो रहा है" रेखा ने इंजेक्शन लगने से चिल्लाते हुए कहा।

"भाभी जी थोडी देर में ही आपका दर्द ख़तम हो जायेगा" डॉ रवि ने इंजेक्शन लगाने के बाद अपने हाथ से रेखा के मांसल चूतड़ो को सहलाते हुए कहा ।

"भाभी एक बात तो माननी पड़ेगी। इतनी उम्र होने पर भी आपने अपने फिगर को बुहत ज्यादा मेन्टेन रखा है" रवि ने अपने हाथ से रेखा के चूतडों को सहलाते हुए उसके दोनों चूतडों के बीच ड़ालते हुए बोला।

"डॉ साहब आपका कोई जवाब नहीं आप ने तो औरतों को पटाने में भी डिग्री हासील कर रखी है" रेखा ने रवि की बात सुनकर मुस्कराते हुए कहा।
 
" भाभी मैं सच कह रहा हूँ आपका जिस्म बुहत ज्यादा कसा हुआ है । इस उम्र में ज्यादा औरतों का जिस्म ढीला पड जाता है" डॉ रवि ने इस बार अपनी एक ऊँगली को बुहत ज़ोर से दबा कर रेखा के चूतड के बीच ड़ालते हुए कहा।

"ठीक है अब रहने दिजिये। आजके लिए इतना काफी है" रेखा ने जल्दी से सीधा होते हुए कहा ।

"भाभी फिर कब मोका मिलेगा आपकी ख़िदमत करने का" डॉ रवि ने अपने हाथों से रेखा की कमर को पकडते हुए अपने पास खींचकर कहा।

"बुहत जल्द लेकिन अब छोड़ो" रेखा ने रवि के होंठो पर एक चुम्बन देते हुए उसका हाथ अपनी कमर से निकालते हुए कहा।

"भाभी कम से कम इन्हें तो दिखा दिजिये ताकी मैं इन्हें याद करके ही अपना काम करता रहूं" रवि ने रेखा की दोनों चुचियों को अपने हाथों से पकडते हुए कहा।

"नही जितना देखा वही काफी है बाकी बाद में" रेखा ने रवि के हाथ को अपनी चुचियों से हटाते हुए उसके सामने झुककर अपने सैंडल को पहनते हुए कहा ।

"ओहहहह भाभी जी ऊपर से इतनी सूंदर है नीचे तो क़यामत होगी" रवि ने रेखा के झुकने के कारण उसकी चुचियों को ऊपर से ही देखते हुए कहा । रेखा अपने सैंडल पहनकर अपनी साड़ी को सीधा करते हुए बाहर निकल आई।

"बेटा सॉरी बुहत देर हो गई चलो अब चलते हे" रेखा ने बाहर निकालते ही अपने बेटे से कहा । डॉ रवि भी बाहर निकलकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया था।

"डॉ जी आपका कार्ड मिल सकता है । मेरे एक फ्रेंड ने कहा था के किसी अच्छे डॉ का पता बता दो। इसीलिए माँग रहा हू" विजय ने डॉ की तरफ देखते हुए कहा ।

"हाँ बेटे क्यों नहीं यह लो किसी और को भी चाहिए तो दे देना" डॉ रवि ने मुस्कराते हुए ४-५ कार्ड्स विजय को देते हुए कहा।

"थैंक्स डॉ रवि" विजय कार्ड लेने के बाद रवि का शुक्रिया अदा करते हुए कहा और अपनी माँ के साथ क्लीनिक से निकल गया।
 
दीदी क्या बात है आज आप दूसरी बार नहा रही हो। लगता है कुछ ज्यादा ही आग लगी हुयी है आपके जिस्म में" शीला ने जैसे ही कंचन को बाथरूम से बाहर निकलता देखा उसे टोककर कहा।

"शीला की बच्ची यह सब तुम्हारा किया धरा है" कंचन ने अपने बालों को पोछते हुए कहा ।

"क्यों दीदी मैंने क्या किया?" शीला ने हैंरान होते हुए कंचन से पुछा।

"शीला अब इतनी भोली भी मत बनो तुमने ही विजय भैया को गरम किया था इसीलिए तो उसने मुझे देखते ही दबोच लिया" कंचन ने बेड पर शीला के पास बैठते हुए कहा।

"शीला तुम कह तो ऐसे रही हो जैसे तुम्हारा भाई दूध का धुला हो। मुझे देखते ही उसका गधे जैसे लंड ऐसे खडा हो गया था जैसे कोई खम्भा हो" शीला ने कंचन की बात सुनकर गुस्सा करते हुए कहा।

"अरे शीला तुम तो नाराज़ हो गई मुझे क्या पता वहां क्या हुआ था । वह तो भैया मुझे चोदते वक्त कह रहे थे की शीला ने मुझे बुहत गरम कर दिया है" रेखा ने शीला के गाल की एक चिकोटी लेते हुए कहा ।

"दीदी एक बात पूछुं?" शीला ने कंचन की बात सुनकर उससे कहा।

"हाँ पूछो दीदी क्या बात है" कंचन ने शीला की बात सुनकर कहा।

"दीदी वह विजय भैया का लंड तो नरेश के लंड से भी लम्बा और मोटा है आपको तो मुझसे भी ज्यादा मजा आता होगा" शीला ने कंचन को देखते हुए कहा ।

"ओहहहह दीदी तो तुम भी विजय भैया से चुदवाना चाहती हो मुझे तो बुहत मजा आता है" कंचन ने शीला की तरफ देखते हुए मुसकुराकर कहा।

"हाँ दीदी मगर मुझे डर लगता है। इसीलिए तो आज मैंने उससे अपने आप को बचा लिया" शीला ने कंचन की तरफ देखते हुए कहा।

"कैसा डर दीदी" कंचन ने उत्तेजित होते हुए कहा।

"दीदी उसने अगर किसी को बता दिया तो" शीला ने कंचन को देखकर कहा।

"अरे पगली उसे क्या किसी पागल कुते ने काटा है जो वह किसी को बतायेगा। उसे हमारी इज्ज़त का बुहत ख्याल है वह कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेंगा" कंचन ने शीला की बात सुनकर हँसते हुए कहा ।

"दीदी आपको तो कोई ऐतराज़ नहीं है ना" शीला ने इस बार कंचन को चिढाते हुए कहा।

"दीदी तुम मेरे भाई से चुद्वाओगी तो मैं क्या पीछे रहूँगी। मैं भी नरेश भैया को फँसाने की कोशिश करती हू" कंचन ने शीला की बात सुनते ही कहा।
 
" वाह दीदी इसका मतलब की तुम भी दुसरे लंड का मजा चखना चाहती हो" शीला ने कंचन की बात सुनते हुए कहा।

"हाँ दीदी मैं भी आपसे कम थोडे हू" कंचन ने भी शीला की बात सुनकर हँसते हुए कहा।

"दीदी तो फिर देर किस बात की। अभी भैया अपने कमरे में ही होंगे और विजय भैया भी यहाँ नहीं है आप किसी बहाने से उसके कमरे में जाओ और देखो की वह आपकी जवानी की तरफ धयान देता है की नही" शीला ने कंचन की बात सुनते ही जल्दी से कहा ।

"ठीक है शीला दीदी । मैं अभी ट्राई करती हू" शीला ने कहा और उसने एक टॉवल लिया और अपने जिस्म पर लपेट कर विजय के कमरे की तरफ जाने लगी । कंचन ने साड़ी नहीं पहनी थी और टॉवल के नीचे उसने सिर्फ ब्रा और पेंटी पहनी थी ।

कंचन अपने कमरे से निकलते ही जल्दी से विजय के कमरे में घुस गयी और दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया,

"दीदी आप इस हालत में" नरेश जो मज़े से बेड पर लेटा हुआ था। कंचन को टॉवल लपेटा हुआ अपने कमरे में देखकर उसकी गोरी टांगों को जो बिलकुल नंगी थी घूरते हुए हैरान होकर बोला।

"सॉरी भैया में नहा ही रही थी की अचानक पानी बंद हो गया क्या मैं आपका बाथरूम यूज कर सकती हू" कंचन ने बड़े ही भोलेपन से कहा।

"दीदी मुझसे पूछने की क्या ज़रुरत है। यह घर आपका ही तो है" नरेश ने कंचन की बात सुनते ही मुसकुराकर कहा।

"थैंक्स भैया आप बुहत अच्छे हैं जब तक आप यहाँ है। यह कमरा और बाथरूम आपका ही है" कंचन ने नरेश की बात सुनकर उसकी तरफ देखते हुए कहा ।

कंचन यह कहते हुए बाथरूम में घुस गयी और शावर ऑन करके नहाने लगी । नरेश ने आज पहली बार कंचन को इतनी नज़दीक से इतने कम कपड़ों में देखा था, नरेश का लंड कंचन के जिस्म को देखते ही खडा होकर झटके लगाने लगा था। वह मन ही मन में विजय के नसीब से जल रहा था क्योंके उसकी माँ और बहन दोनों उसे अपनी माँ और बहनों से ज्यादा अच्छी लगती थी।

कंचन कुछ देर तक नहाने के बाद अपने टॉवल से अपने जिस्म को पोंछने लगी।

"भइया मेरा टॉवल तो बुहत गीला हो गया है । आप प्लीज यहाँ से कोई टॉवल दे दो जिससे मैं लपेटकर अपने कमरे में जा सकुं" कंचन ने अपने प्लान के मुताबिक नरेश को पुकारते हुए कहा।

"दीदी अभी देता हू" नरेश जो कंचन के जिस्म को सोच सोच कर अपने लंड को सहला रहा था कंचन की आवाज़ सुनकर बेड से उठते हुए बोला ।
 
नरेश अपना टॉवल उठाकर बाथरूम की तरफ बढ़ने लगा।

"दीदी टॉवल ले लो" नरेश बाथरूम ने पास पुहंचते ही कंचन को पुकारते हुए कहा।

"थैंक्स भैया" अचानक बाथरूम का दरवाज़ा खुला और कंचन ने नरेश के हाथ से टॉवल लेते हुए कहा । दरवाज़े के खुलते ही नरेश का गला सूखने लगा उत्तेजना के मारे उसका लंड उसकी पेण्ट फाडने के लिए उतावला हो गया और नरेश की आँखें कंचन के गोरी गोरी नंगी चुचियों को उसकी ब्रा से आधा बाहर देखते ही वहीँ की वहीँ अटक गयी ।

"भइया आप बड़े बदमाश हो ऐसे क्या देख रहे हो" कंचन ने नरेश को यों अपने जिस्म की तरफ घूरता हुआ देखकर मुस्कराते हुए कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया ।कंचन अपने प्लान की कामयाबी पर बुहत खुश हो रही थी, कंचन ने नरेश का दिया हुआ टॉवल लपेटा और बाथरूम से बाहर निकल आई।

"भइया मैं आपका टॉवल ले जा रही हूँ। आप मेरा टॉवल ही रख लो" कंचन ने बाथरूम से बाहर आते ही अपनी एक टाँग को बेड पर रखते हुए उसे दुसरे टॉवल से पोछते हुए कहा । नरेश जो पहले से ही कंचन के जिस्म को देखकर बुहत गरम हो चुका था । वह कंचन की टाँग को बेड पर रखने से उसकी टाँग को जांघों तक नंगा देखकर उसका लंड बुहत ज़ोर से झटके खाने लगा।

"ठीक है दीदी" नरेश के मूह से सिर्फ इतना ही निकला वह बुहत ज्यादा उत्तेजित हो चुका था और उसकी आँखें अपनी बहन की टांगों को घूरने में ही बसी थी।

"भइया आप ऐसे क्या देख रहे हो" कंचन ने अपनी एक टाँग को पोंछने के बाद उसे नीचे करते हुए अपनी दूसरी टाँग को बेड पर रखते हुए बोली।

"कुछ नहीं दीदी" नरेश ने अपनी चोरी पकडे जाने पर अपनी आँखों को कंचन की गोरी चिकनी टांगों से हटाते हुए कहा।

"भइया अब झूठ मत बोलो। आप मेरी टांगों को घूर रहे थे। सच बताइये आप ऐसे क्यों घूर रहे थे" कंचन ने नरेश को देखते हुए कहा।

"दीदी छोड़ो न। बस ऐसे ही देख रहा था" नरेश ने कंचन की बात सुनकर परेशान होते हुए कहा।

"भइया अगर आपने सच नहीं बोला तो मैं शीला दीदी को बता दूंगी" कंचन ने नरेश को धमकी देते हुए कहा।

"वो दीदी वह आपका जिस्म बुहत ख़ूबसूरत है" नरेश ने हकलाते हुए कहा।

"भइया आप बड़े बदमाश हो। क्या अच्छा लगा आपको मुझ में" कंचन ने अपनी टाँग को बेड से उतारते हुए मुसकुराकर बोली।

"दीदी अब क्या कहूँ आपका तो पूरा जिस्म बुहत ख़ूबसूरत है" नरेश ने हिम्मत करके कंचन को देखते हुए कहा ।
 
" भइया आप तो बड़े वो हो। मैं जा रही हूँ अरे आपका टॉवल तो बुहत छोटा है" कंचन ने यह कहकर अपने टॉवल को वहीँ पर नरेश के पास फेंक दिया और खुद नरेश के पहने हुए टॉवल को अपने हाथों से खोलते हुए फिर से अपने जिस्म पर बाँध दिया ।

कंचन के ऐसा करने से उसकी दोनों चुचियां फिर से सिर्फ ब्रा में ही आधि नंगी नरेश की आँखों के सामने आ गयी। जिन्हें देखकर नरेश का लंड इतने ज़ोर से झटके मारने लगा की उसे अपने लंड में दर्द महसूस होने लगा।

कंचन वहां से जा चुकी थी । मगर नरेश की हालत इतनी ज्यादा ख़राब हो चुकी थी की कंचन के जाते ही उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया और कंचन के टॉवल को जो उसके पूरे जिस्म को छु चूका था लेकर बाथरूम में घुस गया । नरेश ने अपने सारे कपडे निकाल दिए और कंचन के टॉवल को अपने चेहरे पर रखकर ज़ोर से साँसें लेते हुए उसे सूँघते और चूमते हुए अपने लंड को हिलाने लगा ।

"आह्ह्ह्ह साली का क्या जिस्म है ओहहहह तेरी जिस्म की ख़ुश्बू तो अब भी इस टॉवल से आ रही है आअह्ह्ह्ह भोसडी की एक बार मिल जाए तो उसके पूरे जिस्म ऐसे चाटूँगा जैसे शहद चाटते हैं साली कुतिया के बदन की ख़ुश्बू इतनी अच्छी है उसका जिस्म का ज़ायक़ा तो लाजवाब होगा" नरेश अपने लंड को हिलाते हुए बुहत ज़ोर से चिल्लाते हुए बड़बड़ा रहा था ।

"ओहहहहह साली कुतिया ने इस टॉवल से अपनी चूत और चुचियों को भी पोछा होगा आअह्ह्ह्हह तो इसका मतलब मैं अपने लंड पर जो टॉवल रगड रहा हूँ उसमें उसकी चूत का स्पर्श है ओह्ह्ह्हह हह कंचन" । यह सब सोचकर नरेश का जिस्म झटके खाने लगा और उसका लंड वीर्य की पिचकारियाँ छोड़ने लगा । नरेश टॉवल को अपने लंड के ऊपर रखकर उसे ज़ोर से आगे पीछे करते हुए झरने लगा ।

नरेश झरने के बाद शांत होकर नहाने लगा । नहाने के बाद उसने कंचन के टॉवल को भी धो दिया और वापस बिस्तर पर आकर लेट गया।

"दीदी क्या हुआ?" इधर कंचन के कमरे में दाखिल होते ही शीला ने उत्तेजित होते हुए पुछा ।

"शीला दीदी होना क्या था" कंचन ने दरवाज़ा अंदर से बंद करते हुए बेड पर बैठते हुए कहा।

"दीदी बताओ न पहेलियाँ क्यों बुझा रही हो" शीला ने कंचन की बात सुनकर ज्यादा उत्तेजित होते हुए कहा।

"दीदी कह तो रही हूँ बेचारा पहली नज़र में ही घायल हो गया" कंचन ने हँसते हुए कहा।

"दीदी ज़रा डिटेल में बताओ ना" शीला ने कंचन के क़रीब जाते हुए कहा । कंचन ने शीला को सारी बात बता दी की कैसे उसने उसके भाई को पागल बनाया।

"हुम्मम्म तो दीदी इसका मतलब हम दोनों के भाई एक जैसे है" शीला ने कंचन की बात सुनकर हँसते हुए कहा।।

"दीदी मैं कुछ समझी नही" कंचन ने शीला की बात सुनकर हैंरान होते हुए कहा।

"अरे दीदी मेरा मतलब है दोनों एक जैसे ही हैं घास देखी नहीं और अपना पूछ फिराते हुए चरने आ गये" शीला ने कंचन को समझाते हुए कहा।

"हाँ दीदी वह तो है मगर हमारे भाई सिर्फ ताज़ी घास ही खाते है" कंचन ने शीला की बात को समझते हुए हँसकर कहा और दोनों साथ में बातें करते हुए हंसने लगी।
 
दोस्तों आपलोगों के सहयोग के लिए बहुत बहुत थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
रेखा अपने बेटे के साथ रिक्शा में बैठकर घर आ गयी थी । रेखा जैसे ही अपने कमरे में दाखिल हुयी विजय ने जल्दी से अपनी माँ को पीछे से पकडकर अपना खडा लंड उसके चूतड़ों में दबाने लगा।

"अरे क्या हुआ बेटे छोड़ो न मुझे" रेखा ने अपने बेटे की इस हरकत से हैंरान होकर खुद को उससे छुड़ाते हुए कहा।

"माँ आपको छोड दिया तो मेरे लंड को कौन शांत करेंगा" विजय ने वैसे ही अपनी माँ को पकडे हुए अपना मूह उसके काँधे पर रखकर उसे चूमते हुए कहा ।

"आजहहह बेटे छोड़ो मुझे इस वक्त यह सब ठीक नहीं और तुम्हारे पिता भी आने वाले होंगे" रेखा अपने बेटे की हरक़तों से सिसकते हुए बोली।

"माँ आ जाने दो उन्हें । वह भी तो देखे के उसका बेटा अपनी माँ से कितना प्यार करता है" विजय ने अपना हाथ रेखा के पेट से ऊपर करते हुए उसकी चुचियों को पकडकर दबाते हुए कहा।

"बेटा तुम भी न छोड़ो मुझे" रेखा गरम तो बुहत थी। मगर वह डर रही थी की कहीं उसका पति न आ जाये इसीलिए वह अपने बेटे को रोक रही थी ।

"माँ आज तो मैं नहीं मानने वाला" विजय ने यह कहते हुए रेखा की साड़ी को खीचकर उसके जिस्म से अलग कर दिया और उसे सीधा करते हुए अपने हाथों से उसके पेटिकोट और ब्लाउज को भी उसके जिस्म से हटा दिया।

"ओहहहह बेटे दरवाज़ा तो बंद करो" रेखा के मूह से सिर्फ इतना ही निकला । अगले पल विजय के होंठ रेखा के होंठो पर थे । विजय अपनी माँ के होंठो को बुरी तरह चूसते हुए अपने हाथों से उसकी बड़ी चुचियों को उसकी ब्रा के ऊपर से ही दबाने लगा ।

रेखा गरम तो पहले से ही थी । अपने बेटे के होंठो से अपने होंठो को चूसने से वह उत्तेजित होते हुए अपने हाथ से अपने बेटे की पेण्ट को खोलकर नीचे सरका दिया और विजय के खडे लंड को उसके अंडरवियर के ऊपर से ही पकडकर सहलाने लगी ।

विजय कुछ देर तक अपनी माँ के होंठो को जी भरकर चूसने के बाद उससे अलग होते हुए अपनी पेण्ट को निकालकर बेड पर फ़ेंक दिया और अपने अंडरवियर को भी खींचकर अपनी टांगों से निकाल दिया।

"बेटे तुम मानने वाले नहीं मगर कम से कम दरवाज़ा तो बंद कर लो । कोई आ गया तो गज़ब हो जायेगा" रेखा ने अपने बेटे के नंगे खडे लंड को जो पूरी तरह तनकर झटके मार रहा था उसे घूरते हुए बोली
 
" माँ कोई नहीं आएगा आप डरो मत" विजय इतना कहकर अपनी माँ की ब्रा को अपने हाथों से पकडते हुए ज़ोर से खीँच लिया । विजय के ऐसा करने से रेखा की ब्रा उसकी बड़ी बड़ी चुचियों से निकलकर विजय के हाथों में आ गयी।

"आह्ह्ह्ह बेटे तुमने मेरी ब्रा को फाड दिया" रेखा ने अपनी ब्रा के फ़टते ही विजय की तरफ देखते हुए कहा।।

विजय अपनी माँ की बात सुने बगैर ही उसकी चुचियों पर टूट पड़ा और अपनी माँ की दोनों चुचियों को बारी बारी अपने मूह में लेकर चूस्ने चाटने और काटने लगा।

"आह्ह्ह्ह बेटे आराम से ओह्ह्ह्हह क्या कर रहे हो" रेखा के मूह से बुहत ज़ोर की सिस्कियाँ निकल रही थी।

विजय कुछ देर तक अपनी माँ की चुचियों से खेलने के बाद अपना मूह नीचे करते हुए उसकी पेंटी तक आ गया । रेखा की पेंटी उसकी चूत से निकले हुए पानी से बुरी तरह गीली हो चुकी थी, विजय अपनी माँ की चूत को उसकी गीली पेंटी के ऊपर से ही अपनी जीभ से चाटने लगा।

विजय कुछ देर तक अपनी जीभ को अपनी माँ की पेंटी के ऊपर फिराने के बाद उसकी पेंटी को अपने दोनों हाथों से खीचकर उसकी टांगों से अलग कर दिया । विजय पेंटी के उतरने के बाद अपनी माँ की फूली हुयी चूत को घूरते हुए अपनी जीभ को उसकी चूत के बड़े दाने पर रख दिया।

"आह्ह्ह्ह बेटे" रेखा अपने बेटे की जीभ को अपनी चूत के दाने पर लगते ही सिसक उठी और वह अपने बेटे के बालों में अपने हाथों को डालकर उसे अपनी चूत पर दबाने लगी ।

विजय कुछ देर तक अपनी माँ की चूत के दाने को चाटने के बाद सीधा होते हुए अपनी माँ के होंठो को चूसने लगा । रेखा ने अचानक अपने बेटे के होंठो से अपने मुँह को अलग करते हुए नीचे झुकते हुए अपने बेटे के लंड को पकड लिया और उसे अपने हाथ सहलाते हुए अपनी जीभ निकालकर उसके सुपाडे पर फिराने लगी ।

रेखा ने अपने बेटे के लंड को अपनी जीभ से चाटते हुए अपना मुँह खोलकर उसके सुपाडे को अपने मूह में भर लिया और अपने होंठो और जीभ से अपने बेटे के लंड को चूसने लगी।

"अअअअआह माँ" विजय अपनी माँ के ऐसे करने से मज़े से हवा में उड़ रहा था।
 
विजय कुछ देर तक अपने लंड को अपनी माँ से चुसवाने के बाद उसे अपनी गोद में उठाते हुए बेड पर उल्टा लिटा दिया और अपना खडा लंड पीछे से अपनी माँ की गीली चूत में पेल दिया । विजय को अपनी माँ की गरम चूत में अपना लंड अंदर बाहर करते हुए बुहत ज्यादा मजा आ रहा था । इसीलिए वह अपनी माँ की चुत में अपने लंड को अंदर बाहर करते हुए बुहत ज़ोर से सिसकते हुए अपनी माँ के चूतडों पर थप्पड मार रहा था ।

रेखा भी बुहत ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी इसीलिए वह भी अपने बेटे से चुदवाते हुए बुहत ज़ोर से सिसककर अपने चूतडो को पीछे की तरफ ढकेल रही थी । विजय तूफ़ान की रफ़्तार के साथ अपनी माँ को चोद रहा था।

"आजहहहह बेटे ओह्ह्ह्हह शहहहहः" कुछ ही देर में रेखा बुहत ज़ोर से चिल्लाते हुए झरने लगी और वह पूरी तरह झरने के बाद बेड पर उल्टा ही नीचे गिरकर लेट गयी ।

रेखा के नीचे गिरते ही विजय भी अपनी माँ के ऊपर गिर गया। मगर उसका लंड अब भी उसकी माँ की चूत में था इसीलिए वह अपने दोनों हाथों से सहारा लेकर थोडा ऊपर होते हुए इसी पोजीशन में अपनी माँ की चूत में अपना लंड अंदर बाहर करने लगा ।

"आह्ह्ह्ह बेटे ओहहहह थोडी देर भी नहीं रुक सकते" रेखा अचानक अपनी चूत में अपने बेटे के लंड को अंदर बाहर होने से चिल्लाते हुए बोली । विजय कुछ देर तक अपनी माँ को इसी पोजीशन में चोदने के बाद अपना लंड उसकी चूत से निकाल दिया और अपनी माँ को कमर से पकडते हुए सीधा कर दिया।

विजय ने अपनी माँ के सीधा होते ही उसकी टांगों को अपने काँधे पर रखते हुए अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया और बुहत तेजी के साथ उसे चोदने लगा ।रेखा कुछ ही देर में फिर से गरम होगई और अपनी टांगों को अपने बेटे की कमर में डालकर अपने चूतडों को उछाल उछाल कर चुदवाने लगी ।

"आआह्ह्ह्ह माँ आप जैसी छिनाल औरत आज तक नहीं देखी बुहत गरम है तु" विजय ने अपनी माँ को तेज़ी के साथ छोड़ते हुए कहा।

"आह्ह्ह्ह बेटे मैंने भी तुम्हारे जैसे हरामी बेटा आज तक नहीं देखा । साले अपनी माँ को किसी दुसरे मरद के साथ देखकर मज़े लेते हो" रेखा ने वैसे ही अपने चूतडों को अपने बेटे के लंड की तरफ धकेलते हुए चिल्लाते हुए कहने लगी।
 
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