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परिवार(दि फैमिली) complete

रेखा ने हर रोज़ की तरह सुबह उठकर अपने पति को नाश्ता बनाकर दिया और वह नाश्ता करने के बाद ऑफिस के लिए निकल गए । रेखा अपने पति के जाने के बाद घर के काम में मसरुफ हो गयी, घर का सारा काम ख़तम करने के बाद उसने सभी को उठा दिया और उनके लिए नाश्ता बनाने लगी ।

रेखा ने नाश्ता बनाने के बाद टेबल पर लगा दिया । जहाँ पर सभी लोग बैठकर नाश्ता करने लगे।

"भाभी अभी मेरे पति का फ़ोन आया था उनका काम ख़तम हो गया है और वह आज ही लौट रहे हैं। इसीलिए हमें भी शाम को वापस जाना होगा" सभी लोगों ने जैसे ही नाश्ता ख़तम किया मनीषा ने रेखा की तरफ देखते हुए कहा।

"मानिषा अचानक यह सब? चलो कोई बात नहीं जैसे आप ठीक समझो" रेखा ने मनीषा की बात सुनने के बाद हैंरान होते हुए कहा ।

अपनी माँ की बात सुनकर सबसे ज़्यादा बड़ा झटका नरेश को लगा था उसको अपने सारे सपने अधूरे दिखाई देने लगे। वह अपनी मामी की गांड मारने के खवाब देख रहा था जो अब उसे एक खवाब ही लग रहा था। मनीषा ने नाश्ते की टेबल से उठते हुए वापस जाने की तैयारियाँ करने लगी । उसने अपने बेटे और दोनों बेटियों से भी अपना सामान पैक करने के लिए कह दिया ।

"यार एक तो तुम आज मुझसे जुदा हो रहे हो और ऊपर से तुम अपना मुँह भी लटकाये हुए हो" विजय ने नरेश से शिकायत करते हुए कहा।

"साले तुम्हारी वजह से आज मुझे अपनी मामी की गांड का मजा लिए बिना वापस जाना पड़ रहा है" नरेश ने वैसे ही गुस्से से अपना मुँह लटकाये हुए कहा और अपने कपडे बैग में ड़ालने लगा ।

"साले हरामी तुम्हे अपने यार से बिछड़ने का कोई गम नहीं है अब भी तुझे गांड की पड़ी है" विजय ने गुस्से से आगबबूला होकर कहा । विजय की आँखों से आंसू निकल रहे थे।

"सॉरी यार मुझे माफ़ कर दो । मैं हवस में अँधा हो गया था" विजय को रोता हुआ देखकर नरेश ने उसके पास जाते हुए कहा ।
 
"जा मुझे तुमसे बात नहीं करनी" विजय ने नखरा करते हुए कहा।

"सोच ले यार मैं अगर चला गया तो फिर मत कहना की मैंने तुमसे बात नहीं की" नरेश ने विजय के काँधे पर हाथ रखते हुए कहा।

"हाँ सोच लिया जाओ मैं तुमसे बात नहीं करता" विजय ने नरेश का हाथ अपने काँधे से हटाते हुए कहा ।

"देख यार अब तो माफ़ कर दे । मैं हर चीज़ बर्दाशत कर सकता हूँ मगर अपने यार का गुस्सा नही" नरेश ने अपने कान पकड़कर उठक बैठक करते हुए कहा।

"नरेश यह तुम क्या कर रहे हो मुझे माफ़ कर दो मेरे यार" विजय ने भाग कर नरेश को अपने गले से लगाते हुए कहा और दोनों दोस्त एक दुसरे को गले लगाते हुए रोने लगे ।

"साले अब तो बस कर न और एक बार हँस दे" नरेश ने विजय को रोता हुआ देखकर कहा।

"तुम जा रहे हो यार फिर मैं कैसे हँस सकता हूँ" विजय ने नरेश को जवाब देते हुए कहा।

"तो क्या तुम मुझे रोते हुए विदा करोगे । साले मैं तेरा यार हूँ कोई बहन नहीं जो तुम रो रहे हो" नरेश ने विजय को चिढाते हुए कहा ।

"साले तुम सुधरोगे नही" नरेश की बात सुनकर विजय ने हँसते हुए कहा और दोनों आपस में बाते करने लगे।

"शीला दीदी क्या तुम सच में जा रही हो" कंचन ने शीला को अपना सामान पैक करते हुए देखकर कहा।

"हाँ कंचन दीदी हम आज शाम को ही चले जाएंगे" शीला ने भी बुझे मन से कंचन की तरफ देखते हुए कहा।

"शीला दीदी वापस जाकर हमें भूल तो नहीं जाओगी?" कंचन ने शीला को देखते हुए कहा।

"कंचन दीदी आप नहीं जानती की हमें यहं से जाते हुए कितना बुरा लग रहा है" शीला ने कंचन की बात सुनकर कपड़ों को छोडकर उसे गले लगाते हुए कहा। शीला की आँखों से आंसू निकल रहे थे।
 
"दीदी हम कितने बूरे हैं हमने तुम्हें रुला दिया" कंचन भी शीला को रोता हुआ देखकर खुद को रोक न सकी और उसे कसकर अपने गले से लगाते हुए रोने लगी ।

"कंचन दीदी आपके साथ रहते हुए हम यह भूल गए थे की हमें जाना भी होगा" शीला ने सुबकते हुए कहा।

"सही कहा शीला दीदी हमें भी बुहत बुरा लग रहा है मगर कर भी क्या सकते हैं" कंचन ने शीला के आंसू को अपने हाथ से साफ़ करते हुए कहा।

"दीदी मुझसे एक वादा करो" शीला ने कंचन का हाथ पकडते हुए कहा ।

"हाँ दीदी बताओ न हम तुमसे वादा करते है" कंचन ने शीला को देखते हुए कहा।

"कंचन दीदी तुम डेली फ़ोन पर मुझसे बात करोगी" शीला ने कंचन की तरफ देखते हुए कहा।

"पगली वह तो मैं वैसे ही करूंगी मैं तुम्हें भुला नहीं सकती" कंचन ने शीला को हँसते हुए कहा और दोनों आपस में बाते करने लगी ।

इधर पिंकी का भी वही हाल था। वह कोमल के साथ इतने दिनों तक रहने के बाद वहां से जाते हुए बुहत बुरा फील कर रही थी और वह भी आज कोमल के साथ बैठकर जी भरकर बाते करने लगी । मनीषा अपना सामन पैक करने से पहले अपने बापू के कमरे में चली गई।

"बेटी तुम्हें यह क्या हो गया अचानक तुम क्यों जा रही हो?" मनीषा को अपने सामने देखकर अनिल ने सवालों की बौछार कर दी।

"बापु मुझे कुछ नहीं हुआ है वह आपके दामाद अचानक वापस लौट रहे हैं तो मुझे भी वापस जाना होगा" मनीषा ने अनिल को समझाते हुए कहा।

"ठीक है बेटी जैसे तुम्हारी मर्जी" अनिल ने मायूस होते हुए कहा।

"अरे पिता जी आप क्यों मायूस हो रहे हैं रेखा भाभी है न आपका ख़याल रखने के लिये" मनीषा ने मुस्कराते हुए कहा।

"बेटी तुम भी न आओ आखरी बार तुम्हें मैं अपने गले लगा लुँ" अनिल ने मनीषा को देखते हुए कहा ।
 
मानिषा अपने पिता की बात सुनकर उनके क़रीब जाकर खड़ी हो गई । अनिल ने मनीषा के क़रीब आते ही उसे अपने बाहों में भर लिया।

"बेटी एक आखरी चुम्मा तो देती जाओ फिर ज़िंदगी में मुलाक़ात हो न हो" अनिल ने अपनी बेटी के होंठो की तरफ देखते हुए कहा।

"पिताजी आप कैसी बाते कर रहे हैं हम मिलते रहेंगे" मनीषा ने गुस्से से अपने पिता को देखा और अपने होंठो को उनके गाल पर रखकर एक किस दे दिया ।

"वाह बेटी यह कोई किस हुई अच्छी तरह से दो ना" अनिल ने मनीषा के किस करने के बाद उसकी तरफ देखते हुए कहा।

"दिया तो अब कैसे दूं आप ही बताओ" मनीषा ने नखरा करते हुए कहा।

"सोच लो बेटी अगर खुद ही दे दिया तो फायदे में रहोगी" अनिल ने अपनी जीभ को निकालकर अपने होंठो पर फेरते हुए कहा।

"इस वक्त फायदे नुकसान की किसे चिंता है" मनीषा ने भी थोडा रोमांटिक होते हुए कहा ।

अपनी बेटी की बात सुनकर अनिल ने उसे सर से पकडते हुए अपने होंठो को उसके होंठो पर रख दिया और उसके दोनों होंठो को पूरी तरह अपने मुँह में लेकर बुरी तरह से चूसने लगा । मनीषा ने भी मज़े से अपने हाथों को अपने पिता के सर में डाल दिया, दोनों बाप बेटी कुछ मिनटों तक एक दुसरे में खोये रहे और उसके बाद हाँफते हुए एक दुसरे से अलग हो गये ।

"पिता जी मुझे अपना सामन पैक करना है मैं चलती हू" अपने पिता से अलग होते ही कुछ देर तक तेज़ साँसें लेते हुए अपनी उखड़ी साँसों को सीधा करने के बाद मनीषा ने अनिल से कहा और वहां से निकलकर अपने कमरे में आ गयी । ऐसे ही टाइम गुज़रता गया दोपहर का लंच सब ने साथ में किया और फिर अपने अपने कमरों में चले गए ।

शाम हो चुकी थी और मुकेश भी घर आ चुका था

उसे सब कुछ बता दिया गया था । मनीषा अपने तीनों बच्चों के साथ वहां से जाने के लिए तैयार हो चुकी थी। मनीषा और उसके तीनों बच्चों ने आखरी बार सब से गले मिलकर अलविदा किया और वहां से जाते हुए अपने घर के सफ़र के लिए निकल पड़े ।
 
उन सब के जाते ही यहाँ के सभी लोग भी अपने अपने कमरों में चले गए । रेखा घर के काम काज में बिजी हो गई और देखते देखते रात हो गई । रेखा ने खाना बनाकर टेबल पर लगाया और सभी को अपने कमरों से बुला लायी, सभी बैठकर खाना खाने लगे मगर विजय, कंचन और कोमल बुहत धीमी रफ़्तार से खाना खा रहे थे।

"क्या हुआ बच्चों तुम लोगों को खाना पसंद नहीं आया क्या?" रेखा ने अपने बच्चों की तफ देखते हुए कहा ।

"माँ मुझे ज्यादा भूख नहीं लगी है" विजय ने कहा और वहां से उठकर अपने कमरे में चला गया । विजय के बाद कोमल भी उठकर अपने कमरे में चले गई।

"कंचन बेटा तुम्हें भी ज्यादा भूख नहीं होगी?" रेखा ने कंचन की तरफ देखते हुए कहा।

"जी माँ" कंचन ने सिर्फ इतना कहा।

"मुझे पता है उन लोगों के जाने से तुम्हें दुःख हुआ है मगर कुछ दिनों में ही तुम लोगों को सब ठीक लगने लगेगा ज़रा अपने भाई का ख़याल रखना" रेखा ने कंचन को देखते हुए कहा ।

कंचन अपनी माँ की बात सुनकर वहां से उठकर चले गयी । रेखा ने सब के जाने के बाद बर्तनों को उठाकर किचन में रखा और सारा काम निपटाने के बाद अपने कमरे में जाकर लेट गयी, रेखा ने देखा की उसका पति सो चुका है इसीलिए वह भी नाईट लैंप को बंद करके सोने की कोशिश करने लगी ।

कंचन अपने कमरे में बैठे बैठे बोर हो रही थी इसीलिए वह अपने कमरे से उठकर अपने भाई के कमरे में आ गयी । कंचन अंदर आते ही विजय के पास उसके साथ बेड पर बैठ गई और उसके सर में हाथ डालकर सहलाने लगी, विजय को पता नहीं था की कंचन वहां आई हुई है इसीलिए अपनी बहन का हाथ महसूस करके वह चोंक गया ।

"क्या हुआ भैया?" कंचन ने विजय को देखते हुए कहा।

"कुछ नहीं दीदी कुछ अच्छा नहीं लग रहा है" विजय ने अपनी दीदी की गोद में अपना सर रखते हुए कहा।

"वो तो है भैया मगर हम कर भी क्या सकते है" कंचन ने अपने भाई के सर को दबाते हुए कहा।

"दीदी आप बुहत अच्छी हो। मेरा कितना ख़याल रखती हो" विजय ने कंचन के हाथ को अपने सर से हटाकर उसे नीचे झुका दिया और अपने होंठो को उसके होंठो पर रख दिया ।

कंचन के नीचे झुकते ही उसके रेश्मी बालों ने विजय और उसके चेहरे को पूरी तरह ढ़क लिया । विजय ने कुछ देर तक अपनी दीदी के रसीले होंठो को चूसने के बाद उसे खींचकर अपने साथ सुला दिया और फिर से दोनों भाई बहन अपनी जवानी की प्यास एक दुसरे से मिटाने लगे । दोनों पूरी तरह से एक दुसरे के जिस्मों का मजा लेने के बाद नंगे ही एक दुसरे की बाहों में सो गए ।
 
कहानी पसंद करने और उत्साह बढ़ने के लिए सभी को थैंक्स।कहानी जारी रहेगी।अगला अपडेट जल्दी ही।कहानी के बारें में अपनी राय अवश्य दें।thanks
 
दोस्तों अब हम रेखा के ससुराल को छोडकर उसके माँ बाप के घर की तरफ चलते हैं लेकिन उससे पहले मैं फिर से वहां के सभी लोगों का आपसे परीचय करा दूं।

१. समीर (रेखा का एकलौता भाई)

२. नीलम (समीर की पत्नी)

३.ज्योति (रेखा की इकलौती विधवा बहन)

४. महेश (रेखा के पिता)

५. सरिता (रेखा की माँ)।

कहानी के पहले अपडेटस में आप पढ चुके हैं की समीर और ज्योति के बीच सेक्स समबन्ध हुआ अगर आपको याद नहीं तो मैं बता देता हूँ समीर अपनी बहन रेखा की तरह बुहत गरम आदमी है और उसकी पत्नी उसके बिलकुल अपोजिट वह सेक्स से भगति फिरती है जिस वजह से समीर ने मजबूरी में अपनी सगी बहन ज्योति से सम्बन्ध बना लिये, ज्योति को भी सेक्स की बुहत ज़्यादा भूख थी क्योंकी वह एक विधवा थी और उसका जिस्म भी कई सालों से प्यासा था ।

समीर का ज्योति के साथ एक बार हम बिस्तर होने के बाद तो जैसे भाग ही खुल गया वह हर रात को अपनी बीवी के सोते ही वहां से उठकर अपनी बहन ज्योति के कमरे में चला जाता जहाँ पर दोनों भाई बहन सारी दुनिया को भूलकर एक दुसरे की हवस की आग को ठण्डा करते । आज भी समीर अपनी बीवी के सोने का इंतज़ार कर रहा था, कुछ ही देर में नीलम नींद की आग़ोश में चलि गयी ।

नीलम के खराटो की आवाज़ सुनकर समीर बेड से उठकर बाहर जाने लगा । समीर के जाते ही नीलम ने भी अपनी आँखें खोल दी । उसे कई दिनों से अपने पति पर शक था क्योंकी जहाँ हर रोज़ वह उसे चोदने के लिए मरा जाता था वह कई दिनों से उसके क़रीब तक नहीं आया था ।

नीलम जल्दी से उठकर दरवाज़े तक आ गयी और वह अपने पति को देखने लगी की वह कहाँ जा रहा है । समीर सीधा अपनी बहन ज्योति के कमरे में घुस गया, नीलम को यह देखकर बुहत हैंरानी हुई की इतनी रात को समीर अपनी बहन के कमरे में क्या करने गया है वह भी बाहर निकलकर ज्योति के कमरे की तरफ बढ़ने लगी ।
 
नीलम ज्योति के कमरे के पास आकर रुक गयी क्योंकी उसे कुछ आवाज़ें सुनायी देने लगी । नीलम ने अपना एक कान दरवाज़े से सटा दिया और अंदर से आने वाली आवाज़ों को सुनने लगी।

"ओह भैया आप आ गये" ज्योति ने अपने भाई को देखते ही खुश होकर कहा।

"मेरी प्यारी बहन तुम नहीं जानती की अगर मुझे तुम्हारा प्यार नहीं मिला होता तो मेरा क्या होता" समीर ने आगे बढ़कर अपनी बहन को अपने बाहों में भरते हुए कहा ।

"आह्ह्ह्ह मैं भी तो कई बरसों से प्यासी थी अगर आप का प्यार न मिला होता तो मेरे पास जीने का कोई मक़सद नहीं होता" ज्योति ने भी अपने भाई के सीने में अपनी चुचियों को ज़ोर से दबाते हुए कहा।

"बस करो दीदी बातें करके टाइम बर्बाद मत करो" समीर ने अपनी बहन से कहा और अपने होंठो को ज्योति के नरम होंठो पर रख दिया नीलम का सर चक्कर खाने लगा । उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था के वह क्या करे।

"क्या दो भाई बहन के बीच भी यह सब हो सकता है?" नीलम के मन में सवाल आया ।

"नही ज़रूर उसे कोई गलफहमी हुयी है ऐसा कभी नहीं हो सकता" नीलम के दिल ने जवाब दिया मगर अगले पल ही जो आवज़ नीलम को सुनायी दी वह यह साबित करने के लिए काफी थी की अंदर दोनों भाई बहन के बीच क्या हो रहा है ।

"ओह्ह्ह्ह भैया इतनी जल्दी भी क्या है सारी रात पड़ी है आअह्ह्ह्ह एक ही धक्के में पूरा घुसा दिया" ज्योति के ज़ोर से सिसकने की आवाज़ आईं और नीलम का सर ज़ोर से चक्कर खा गया वह वहीँ पर दरवाज़े के बाहर घुटनों के बल बैठ गई, नीलम की आँखों से आंसू निकल रहे थे ।

"जाओ मुझसे दूर हटो" सरिता ने महेश को अपने ऊपर से हटाते हुए कहा।

"क्या हुआ जाने मन" महेश ने सरिता के ऊपर से हटते हुए कहा।

"कुछ तो अपनी उम्र का शरम करो मुझसे अब यह सब नहीं होता इतनी ही आग चढ़ी है तो जाकर किसी रंडी को चोद लो" सरिता ने गुस्से में अपने पति को निहारते हुए कहा ।
 
" अगर किसी रंडी को चोदना होता तो तुमसे शादी क्यों करता" महेश ने सरिता को मनाते हुए कहा।

"शादी के इतने साल जो करना था कर लिया । अब हमारे बच्चों की शादी हो गई है । हमें यह सब शोभा नहीं देता" सरिता ने अपने पति को समझाते हुए कहा।

"जानेमन वह सब मैं समझ रहा हूँ मगर यह नालायक नहीं मानता" महेश ने अपनी पत्नी का हाथ पकडकर अपने लंड पर रखते हुए कहा ।

"मैंने कहा न अब मुझसे यह सब नहीं होता बस आजके बाद मेरे क़रीब मत आना। मैं अब इस उम्र में भगवान की पूजा पाठ करके अपने ग़ुनाहों की माफ़ी माँगना चाहती हू" सारिता ने गुस्से से महेष को देखते हुए कहा और अपना हाथ वहां से हटाकर दुसरे तरफ होकर सो गयी । बेचारा महेश अपने खड़े लंड को सहलाता हुआ ही रह गया, महेश का लंड इस उम्र में भी डेली किसी को चोदने के लिए तैयार रहता था । उसके लंड का साइज बुहत ही लम्बा और मोटा था ।

जवानी में उसके लंड को देखकर कोई भी लड़की अपनी चूत को उससे चुदवाने के लिए उतावली हो जाती थी । सारिता भी सुहाग रात को अपने पति का लंड देखकर डर गयी थी और पहली बार चुदते हुए उसकी पूरी चूत बुरी तरह से फट गयी थी, आज भी जब महेश का लंड सारिता की चूत में घुसता तो उसके मुँह से चीख़ निकल जाती थी ।

महेश को बुहत प्यास लगी थी इसीलिए वह पानी पीने के लिए अपने कमरे से बाहर निकल आया । बाहर निकलते ही महेश की नज़र नीलम पर पड़ी जो नीचे बैठकर रो रही थी।

"क्या हुआ बेटी?" महेश भागता हुआ अपनी बहु के पास आकर बोला।

"बापु जी" नीलम ने अपने ससुर को देखते ही कहा और वह वहीँ पर बेहोश हो गई ।

महेश ने नीचे झुककर अपनी बहु को अपनी बाहों में सुला दिया। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था की क्या माजरा है तभी उसे अंदर से आने वाली सिस्कियाँ सुनायी दीं । महेश को सिस्कियाँ सुनकर यह समझने में ज़रा भी देर न लगी की यह किस चीज़ की आवाज़ है। लेकिन महेश को यह समझ में नहीं रहा था की उसकी बेटी ज्योति किसके साथ वह सब कर रही है ।

"आआह्ह्ह भैया में गईई आहहहहहः" तभी अंदर से ज्योति के एक ज़ोर की सिसकी भरी आवाज़ आई जिसे सुनकर महेश का दिमाग घूमने लगा और न चाहते हुए भी उसके लौडा तनकर झटके खाने लगा । महेश सारा माजरा समझ गया इसीलिए उसने उठकर नीलम को अपनी बाहों में उठाया और उसे उसके कमरे में ले जाकर बेड पर लिटा दिया। महेश ने अपनी बहु को बेड पर लिटाने के बाद उठकर बल्ब जला दिया ।
 
महेश बल्ब जलाकर वापस आ गया और वहां पर पड़े जग में से एक ग्लॉस पानी का भर लिया । महेश की नज़र जैसे ही अपनी बहु पर गयी उसका पूरा बदन सिहर उठा । क्योंकी नीलम नाईट ड्रेस पहने हुयी थी और वह उसके आगे से खुल चुकी थी, नीलम का गोरा जिस्म बलब की रौशनी में चमक रहा था ।

महेश का लंड अपनी बहु की भूरी जांघों और उसकी चुचियों के उपरी उभार को देखकर खडा होकर झटके खाने लगा । महेश का मन खराब होने लगा और वह अपनी बहु को पानी के छींटे मारकर उठाने की बजाये उसके पूरे जिस्म को घूरने लगा।

"कितनी सूंदर है उसकी बहु । काले घने बाल,गोरा जिस्म,जुलाबी गाल,चुचियों का उपरी उभार देखकर लगता है है वह भी दूध की तरह सफेद ही होंगी। क्या ज़रुरत है समीर को अपनी पत्नी को छोडकर अपनी बहन को चोदने की कितना बड़ा पाप किया है उसने" महेश मन ही मन में सोच रहा था ।

अपनी बहु के जिस्म को पूरी तरह से घूरने के बाद महेश का लंड पूरी तरह तनकर झटके खाने लगा महेश न चाहते हुए भी अपने हाथ से अपने लंड को सहलाने लगा।

"कितना समय हो गया है उसे किसी नौजवान औरत के जिस्म को हाथ लगाए। आज मौका अच्छा है क्यों न वह अपने हाथ से अपनी बहु को छू कर देखे" अचानक महेश के मन में ख़याल आया । वह अपने एक हाथ से अपने लंड को सहलाते हुए अपना दूसरा हाथ अपनी बहु के नंगे चिकने पेट की तरफ बढ़ाने लगा ।

"महेश नहीं यह पाप है" अचानक उसके दिमाग में आया।

"अरे छोड़ो आजकल पाप पुण्य कौन देखता है" उसके दिल ने कहा । दिल की आवाज़ ने उसके दिमाग को मात दे दी और उसने अपना हाथ आगे बढाकर अपनी बहु के चिकने पेट पर रख दिया।

"वह कितना नरम और चिकना बदन है" महेश के मन से आवाज़ निकली लेकिन वह सिर्फ अपना हाथ अपनी बहु के पेट पर रखे हुए था। महेश का मन आगे कुछ करने का हो रहा था मगर वह डर रहा था की कहीं उसकी बहु उठ गयी तो उसको लेने के देने पड़ जाएंगे ।
 
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