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पागल वैज्ञानिक

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उपन्यास : पागल वैज्ञानिक

उपन्यासकार : शरद चन्द्र गौड़

यह उपन्यास पूर्णतया काल्पनिक है। इसका सम्बन्ध किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से नहीं है। उपन्यास में किसी शहर , गांव एवं काल का प्रयोग काल्पनिक कथ्य को रोचकता प्रदान करने के लिये किया गया है।

राजधानी नेषनल रिसर्च इन्सटीट्यू आफ बायोसाइंस, देश का एक मात्र रिसर्च इन्सटीट्यूट जहाँ बायोसाइंस के रिसर्च स्कालर, जूनियर तथा सीनियर वैज्ञानिकों को सरकार की और से भरपूर ग्रांट मिलती है। आज तक यहां के वैज्ञानिकों ने सेंकड़ों दवाइयां इजाद की, जिनकी मदद से असाधरण से असाधरण रोगों पर शीघ्र काबू पाया जा सका। नित नई खोजों में षामिल थीं महत्वपूर्ण दवाइयाँ जिनके लिये मानव पूर्ण रूप से वनस्पतियों पर निर्भर था लेकिन नेषनल रिसर्च इन्सटीट्यू आफ बायोसाइंस के कुशल साइंटिस्टों ने पहले इनका केमिकल फार्मूला जाना, फिर उन्हें आर्टिफीसियल ढंग से प्रयोग षाला में तत्वों के निष्चित अनुपात को मिलाकर बनाया। आज भी जो औसधियाँ प्रचलन में हैं जैंसे सिफ्लोक्सीन, क्लोरोक्वीन, जैंसी दवाईयों एवं कैंसर जैसे असाध्य रोग की दवाइ्र्र तैयार करने में इस इन्स्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण रोल अदा किया है। हाल के प्रयोगों से पता चला है कि कल तक जिस सदाबहार के पौधे को गाय-बैल तक खाने को तैयार नहीं होते थे उस सदसबहार के पौधे में वैज्ञानिक कैंसर जैसे असाध्य रोगों का निदान खोज रहे हैं। आषा यही की जा सकती है कि एक दषक बाद कैंसर से किसी को भी समय से पहले मृत्यु का षिकार नहीं होना पड़ेगा, और इन सब का कारण है उस महान व्यक्ति की लगन, देषप्रेम, और विष्वबंधुत्व जिसे हम डाॅक्टर षिवाजी कृष्णन के नाम से जानते हैं।

लेबोराट्री नेषनल रिसर्च इन्सटीट्यू आफ बायोसाइंस, साड़े चार फिट ऊँची टेबलों पर रखे थे कांच के फ्लास्क, उनसे जुड़ी नलियाँ, जगह-जगह पर नलियों के स्टेण्ड रखे थे, टेबलों के दाएँ एवं बाएँ तरफ बोतलों में विभन्न्ा प्रकार के केमिकल्स वा पावडर रखे थे।

रात के 12ः30 बज रहे थे लेकिनि डाॅक्टर सत्यजीत राय अपने प्रयोंगों में बुरी तरह व्यस्त थे, जूलिया उनकी मदद कर रही थी। जूलिया बीस इक्कीस साल की खूबसूरत युवती थी। उसने एम.एस.सी. बायोसाइंस में पूरी युनीवर्सिटी को टाप किया था...फिर हुआ हुआ उसका सिलेक्सन ‘नेषनल रिसर्च इन्सटीट्यू आफ बायोसाइंस’ में।

डाॅक्टर सत्यजीत राय सुगन्धों को लेबोराट्री में बनाने का प्रयोग कर रहे थे। उनका मत था फल, फूल, पेड़-पौधे, मांस-मटन में पायी जाने वाली खुषबुओं को विभिन्न्ा केमिकल की मदद से बनाया जा सकता है।

- डाॅक्टर 12ः30 बज गये आज का प्रयोग यहीं खतम कर देना चाहिये।

- नहीं जूलिया मुझे आज के प्रयोगों से बहुत आषा हे, तुम जाओ तुम्हारे घर में तुम्हारा इन्तजार हो रहा होगा।

- इन्तजार ......इन्तजार किसका डाॅक्टर मेरा अब इस दुनिया में कोई नहीं।

- ओह..आई. एम.स्वारी। फिर भी रात बहुत हो गई है अतः तुम्हें चले जाना चाहिये।

- डाॅक्टर अकेले काम करने में तुम्हें तकलीफ नहीं होगी और इतनी रात को जाना भी उचित नहीं, इसलिये आज रात मैं यहीं रुक जाती हूँ.....डाॅक्टर मैं चाय बना कर लाती हूँ।

- ओ.के. बेबी...जस्ट एज यू लाईक।

- ठीक है फिर अच्छे बच्चों की तरह इजी चेयर पर बैठ जाइ्र्रये...जब तक मैं चाय ना बना लाऊँ।

- जूलिया तुमने तो मुझे बच्चा ही बना डाला।

जूलिया ने डाॅक्टर की बातों को नजरन्दाज करते हुए कहा डाॅक्टर इतना काम करते आप थकते नहीं हो।

- तुम भी तो बैटी सुबह से मेरा साथ दे रही हो।

- डाॅक्टर मेरी उमर अभी बीस साल हे और आपकी छैयासठ साल.....मेरी बात और .....

- यानी हम बूढ़े हो गये.....

- मेरा मतलब.....

- अच्छा अब चाय बनाओ।

---000---

कर्नल नागपाल के पास आजकल कोई केस नहीं था। वो अपनी कोठी के लान में इजी चैयर पर बैठ कर सार्जेन्ट दिलीप की बकवास सुन रहे थे। कर्नल नागपाल केन्द्रीय गुप्तचर विभाग के खतरनाक एजेण्ट और सार्जेन्ट दिलीप उनका सहायक.....जिसका चुलबला, हँसमुख स्वभाव विख्यात है।

फादर, सार्जेण्ट दिलीप ने कहा..

- बोलो बेटे

- आज ष्याम का क्या प्रग्राम है।

- कुछ भी नहीं

- में सोच रहा हूँ आज सिल्वर नाईट क्लब जाना चाहिये।

- वो किस खुषी में।

- फादर आज सटर्डे है।

- तो

- आज वहाँ स्पेन की एरिया जेडसन का डान्स हैं

- मेंने तो सुना था से ये डान्स बगैरा पर सरकार ने बेन लगा दिया है...

- सब पर नहीं फादर स्टार क्ल्ब एवं हाॅटेल जिनमें फारेन टूरिस्ट आतें हैं....दे आर फ्री फ्राम दा बैन..

- ओह आई सी..नाओ गो आन तुम क्या कह रहे थे..

- ठीक है मेरी फोर्ड ले जाना मुझे कुछ काम है।

सार्जेंट दिलीप कई दिनों से देख रहा था कर्नल नागपाल के पास कोई केस नहीं था फिर भी वो चिन्तित नजर आते थे और अधिकान्स समय उनका लेबोराट्री में बीतता था। कर्नल ने अपनी कोठी के पीछे स्थित तीन कमरों को लेबोराट्री में बदल दिया था एवं खाली बक्त में ना जाने कौन-कौन सा प्रयोग किया करते थे, सार्जेंट दिलीप को इसकी कोई खबर नहीं रहती थी।

- फादर ये देखो, सार्जेंट दिलीप ने न्यूज पेपर की एक न्यूज पर अंगुली रख दी

- क्या है।

फादर नेषनल रिसर्च लेबोराट्री आफ बायोसाइंस के एक प्रोफेसर ने अपने एक प्रयोग के लिये दस करोड़ रुपये की सहायता मांगी है।

- तो क्या हुआ

- मतलब कुछ नहीं हुआ, गोया दस करोड़ रुपये नहीं दस हजार मांगे हों।

- भाई कोई महत्वपूर्ण प्रयोग कर रहा होगा....अमेरिका में तो अंतरिक्ष के विभन्न्ा प्रयोगों पर अरबों डालर का व्यय आता है।

- फादर यहाँ अंतरिक्ष के प्रयोगों जैसी कोई बात नहीं है।

- तो क्या है।

- वो सुगंधों पर प्रयोग कर रहा है।

- अरे ये तो अच्छी बात है।

- क्या खाक अच्छी बात है भरत में वैसे ही सुगंधों की कोन सी कमी है....साला प्रोफेसर की औलाद मेरा बस चले तो साले की गर्दन काट दूँ।

अच्छा गर्दन बाद में काटना मेंने सुना है आज तुम्हारा सिल्वर नाइ्र्रट क्लब जाने का प्रोग्राम है।

अरे मैं तो भूल ही गया, कह कर सार्जेंट दिलीप उठ खड़ा हुआ।

---000---

सार्जेन्ट दिलीप की फोर्ड कार षहर की चैंड़ी सड़कों पर दौड़ती हुई सिल्वर नाईट क्लब की तरफ जा रही थी। सार्जेंट का और सिल्वर नाईट क्लब का चैली दामन का सांथ पिछले पांच ष्षाल से चला आ रहा था। सिल्वर नाईट क्ल्ब के मेनेजर से लेकर हर बैरा तक उसको अच्छी तरह जानता था....जानते तो सिल्वर नाईट क्लब के हर मेम्मबर भी थे उसको कारण था मोन्टी जो अभी सार्जेंट के बगल में पेन्ट सर्ट पहन और फेल्ट हैट पहन कर सिगरेट पी रहा था।

- बैटे तू भी क्या याद करेगा आज तुझे मैं एरिना जेडसन का डान्स दिखा के लाऊँगा।

- ऊ.....ऊ.....ऊ....

- अबे साले गधे तू तो बन्दर का बन्दर ही रहा जानता नहीं है अमेरिका के विलियम साहब के बन्दर ने चार पोयम और पचास देषों के नाम याद कर लिये हैं...बैटे तू भी जल्दी से कर नहीं तो तेरे को फिर से जंगल छोड़ आऊगा।

लेकिन मोन्टी सार्जेंट की बकवास से परे प्रेम से सिगरेट के कस लगा रहा था।

दस मिनिट बाद सार्जेंट क्ल्ब के अहाते में बने कार पार्किंग में कार पार्क कर रहा था। आज जरूरत से ज्यादा भीड़ दिखाई दे रही थी सार्जेंट की लम्बी फोर्ड मुषकिल से एक कोने में खड़ी हो सकी।

सार्जेंट मोन्टी की अंगुलियों को पकड़े क्लब में दाखिल हो गया, क्लब के एक कोने में उसकी सीट रिजर्व थी । सार्जेंट अपनी सीट पर बैठ गया, मोन्टी एक छलांग में उसके सामने था....सार्जेंट को बैठा देख एक बैरा समीप आया।

- क्या लाऊँ सर।

- एरिना जेडसन

वो तो पन्द्रह मिनिट बाद मिलेंगी बैरे ने मुस्कुराते हुए कहा।

- अभी क्या मिलेगा।

- उनको छोड़कर सब कुछ

- तो बैटे वैटर दो पैग पीटर स्काच विद सोडा...

- यस सर

बैरा लम्बे डग भरते हुए बार की तरफ बड़ गया। सार्जेंट धीरे-धीरे टेबल बजा रहा था। क्लब के एक और बने स्टेज पर कलाकार गिटार पर कोई मधुर धुन बजा रहे थे साथ में एक एंगलो इंडियन लड़की इन्गलिष में कोई गाना गा रही थी लेकिन क्लब में सायद ही कोई ऐंसा हो जो उसका गाना सुन रहा हो...मोन्टी आर्केस्टरा की धुन पर बड़े मजे से सिर हिला रहा था....तभी एक सुरीला स्वर सार्जेंट के कानों से टकराया...मैं यहाँ बैठ सकती हूँं।

आफ कोर्स मेडम मेने केवल दो सीट रिजर्व करायीं हैं। सार्जेंट ने बिना सिर उठाये टेबल बजाते हुए जवाब दिया। तब तक बैरा दो पैग पीटर स्काच के ले आया था

- सर योर

सार्जेंट ने सिर उठाया, और देखा सामने एक अत्यधिक खूबसूरत नवयुवती बैठी थी।

हैलो सार्जेंट ने कहा, हैलो उसने जवाब में धीरे से कहा।

- मेंने आप को पहले यहाँ कभी नहीं देखा.....हेना मोन्टी

- मोन्टी ने सिर हिला दिया

- जी में पेहली बार आयी हूँ...आप यहाँ के...

मेडम में अकसर यहाँ आता रहता हूँ....बन्दे को सार्जेंट दिलीप कहते हैं , और ये हैं इन्सपेक्टर मोन्टी...उसने बन्दर की तरफ इषारा किया।

- क्या

- जी हाँ

- मतलब

- ये इन्सपेक्टर मोन्टी हैं।

- ये तो षायद बन्दर है।

मोन्टी ने घूर कर लड़की की तरफ देखा ,फिर सिगरेट के कष लेने लगा।

- देखो आज इसे बन्दर कह दिया चलेगा। आइन्दा नहीं कहना नहीं तो ये बुरा मान जायेगा।

उŸार में मोन्टी ने फिर सिर हिलाया..

- ठीक है बाई दि वे यू आर एन इन्टरेस्टिंग पर्सन..

- जर्रानवाजी के लिये षुक्रिया ,क्या बन्दा अपने सामने बैठी अनिन्ध सुन्दरी का इन्ट्रोडक्सन जान सकता है।

- ओह सार्जेंट में जूलिया हूँ। मेंने आपका बहुत नाम सुना है ,लेकिन मिल पहली बार रही हूँ, आप कर्नल नागपाल के असिस्टेंट हैं ना।

- आप तो अगता है मेरे बारे में सब कुछ जानती हैं ..

- और आपके मोन्टी के बारे में भी।

- क्या लेंगी

- कुछ नहीं

- जब आयी हैं तो कुछ तो लेना ही पड़ेगा विस्की..बियर

- जी में काफी लूंगी
 


सार्जेंट ने एक बैरे को पास बुलाया और काफी का आर्डर दिया।

पांच मिनिट के पष्चात जूलिया काफी की चुस्कियां ले रही थी...अचानक हाल की लाईट गोल हो गयी। मोन्टी कुरसी पर खड़ा हो गया ,सार्जेंट का दिमाक चकराया। जूलिया की तो चीख निकलने वाली थी तभी स्टेज पर हलकी गुलाबी लाईट का प्रकास का गोला दिखाई देने लगा , गोला धीरे-धीरे बड़ा होता गया, अब गोले के मध्य में एक खूबसूरत लड़की मधुर मुस्कान के साथ खड़ी थी...उसके जिस्म पर गुलाबी रंग के गाऊन नुमां वस्त्र थे...सार्जेंट को इस प्रकार के डान्स में गाऊन की उपयोगिता समझ में नहीं आ रही थी।

आर्केस्ट्रा का स्टेज भी हलके गुलाबी प्रकास से नहा रहा था , साधकों ने आर्केस्ट्रा पर मधुर धुन छेड़ दी थी...एरिना का षरीर आर्केस्ट्रा की धुन पर बिजली की गति से थिरक रहा था, सार्जेंट को गाऊन की उपयोगिता का पता लगता दिख रहा था। एरिना आर्केस्ट्रा की धुन पर गोल-गोल घूम रही थी। उसका गाउन गर्दन से ऊपर तक उठ रहा था, उसके घूमने की रफ्तार बड़ती जा रही थी।अचानक एरिना इतने जोर से घूमी कि उसका गाऊन हवा में उड़ गया,सार्जेंट के मुख से षिसकारी निकली। हाल में हल्का सा गुलाबी प्रकास छाया हुआ था सभी मंत्र मुग्ध डान्स देख रहे थे वह नाम मात्र के कपढ़ों में बिजली की गति से थिरक रही थी या यूं कहो कि उसका अंग-अंग थिरक रहा था। अब केवल एरिना पर सर्च लाईट का सफेद दूधिया प्रकास पढ़ रहा था, बह और अधिक मादक दिखाई दे रही थी, उसके डान्स करने का अन्दाज भी बदलता जा रहा था, सार्जेंट अपने दिमाक पर जोर डाल रहा था, उसे लग रहा था मानों उसने उसे कहीं देखा है। लेकिन उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।

आर्केस्ट्रा की तेज धुन अचानक बन्द हो गई, उसने सभी को झुक-झुक कर सलाम किया और स्टेज से ओझल हो गयी।

क्लब का हाल एक बार फिर प्रकास से नहा गया, सार्जेंट अभी तक एरिना के विशय में ही सोच रहा था ,मोण्टी नई सिगरेट जला रहा था, जूलिया अभी भी आर्केस्ट्रा का मधुर धुन गुनगुना रही थीं

- सार्जेंट कहां खो गये।

- षोच रहा था वो खुषनसीब कोन होगा ............

- किसकी बात कर रहे हो..

- ...जिसके साथ इसकी षादी होगी....दूधिया बदन,सांचे में ढला षरीर, बांकी चितवन......

- मैं चली सार्जेंट

- अरे कहां अभी से

- अरे बाबा साड़े ग्यारह बज रहे हैं

उसने हाथ घड़ी में टाइम देखा।

- कहां रहती हैं आप

- नेषनल रिसर्च लेबोराट्री आफ बायो सांइस के पीछे बने क्वार्टर में।

- मैं आप को ड्रोप कर दूंगा चलिये।

- लेकिन आप तो सिविल लाईन में रहते हैं।

- अरे आप को कैंसे मालुम।

- मैंने कहा ना तुम्हारे बास की फेन हू

और मेरी नहीं, सार्जेंट ने रोनी सूरत बनाकर कहा।

- तुम्हारी भी, उसने मुस्कराते हुये कहा।

तुम्हारी भी, खेर चलो..चलो इन्स्पेक्टर मोन्टी,....मोन्टी ने सिर हिलाया, एवं तीनो क्लब से बाहर आ गये।

- आप नेषनल लेबोराट्री में काम करती हैं।

हां डाॅक्टर सत्यजीत राय की असिस्टेण्ट हूं।

बस अगले मोड़ पर दाहिने मोड़ दीजिये, अरे-अरे कहां ले जा रहे हो, मेरा घर आ गया। सार्जेंट ने अपना दाहिना पैर एक्सीलेटर से हटा कर ब्रेक के पैडल दबाया कार दाहिने और के एक क्वार्टर के सामने खड़ी हो गयी। क्वार्टर का बाहरी भाग सुन्दर पुश्पों के पौधों से सुषोभित हो रहा था, निष्चित रूप से यहां रहने वाला फूलों से प्रेम करने वाला है.......नहीं वाली है, अपने सोचने पर सार्जेंट के चेलरे पर मुस्कान आगई।

- आईये

- नहीं फिर कभी मेडम, दिन में नहीं तो वही बात हो जायेगी.....हम हैं आप हैं और ये तनहाई......

- आई थिंक यू आर नाॅट ....जस्ट लाईक देट ....आई हेव नो एनी प्राबलम फ्राम योर साइट एनी वे एस यू लाईक ओके गुड नाईट....

- गुड नाईट बट् थेंक्स टू सर्टीफाई माई करेक्ट....नाओ अगेन स्वीट ड्रीम मेडम।

जूलिया के चेहरे पर हलकी मुस्कान आ गयी.....वो अपने फ्लेट का दरवाजा खोलने लगी।

सार्जेंट ने कार स्टार्ट कर गयेर में डाल दी।

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डाॅक्टर षिवाजीकुश्णन नेषनल रिसर्च लेबोराट्री आफ बायोसाइंस के प्रधान और उनके साथ उनकी विषाल टेबल के सामने बैठे हैं उन्हीं की लेबोराअट्री के काबिल वैज्ञानिक डाॅक्टर सत्यजात राय।

- सर मुझे अपने प्रयोगों के लिये 10 करोड़ रूपयों की जरूरत है।

- मिस्टर राय 10 करोड़ कोई मामूली रकम नहीं है।

- मेरे प्रयोगों से हमारा देष कहां से कहां पहुंच सकता है।

- मैं नहीं समझता मिस्टर राय...

- सर मेरे प्रयोग अधूरे हैं....लेकिन अभी भी उनमें इतनी प्रोग्रेस हो चुकी है कि मैं आगे प्रयोगों को बढ़ाने के लिये यदी सरकार से 10 करोड़ तो क्या 10 अरब भी मांगू तो भी देना पड़ेगा।

- मतलब

- तबाही

- यानी

- अगर मुझे 10करोड़ नहीं मिले तो मैं एंसी तबाही मचाऊंगा कि भारत का बच्चा-बच्चा कांप जायेगा।

- मिस्टर राय आप हमें धमकी दे रहे हैं।

- धमकी नहीं चेतावनी.....

- मैं आपकी धमकियों में नहीं आ सकता, ना ही इतनी मोटी रकम मोहिया करा सकता हूं इसके लिये आप सेेक्रेटियेट से सहायता लें ........

- वो तों लूंगा ही।

- अच्छा आप अब जा सकते हैं....

- सर आप मुझे भगा रहे हैं।

- मिस्टर राय मुझे पूरी लेबोराट्री संभालनी है, फालती की बातों के लिये मेरे पास समय नहीं है। हाँ अगर आप के प्रयोग महत्वपूर्ण रहे तो मैं अपने विषेश कोश से 8-10 लाख की रकम मोहिया करा सकता हूँ।

- 8-10 लाख की रकम आप अपने पास पखिये सर ,लेकिन मेरी चैतावनी याद रखिये।

आई से गेट आऊट डाॅक्टर षिवाजी कृश्णन को जीवन में पहली बार क्रोध आया।

बूढ़ा सत्यजीत राय तेज कदम बढ़ाते हुए बाहर चला गया, उसके माथे पर परेषानी के लक्ष्ण थे, चेहरा क्रोध से तमतमाया हुआ था।

मैं इस देष को दिखा दूंगा ,कि मैं कोन हूँ, हमारे देष में और भी सेकड़ों इन्स्टीट्यूट हैं जहाँ मुझे काम मिल सकता है, बैंक मुझे 10 करोड़ का ऋण दे सकता है। डाॅक्टर सत्यजीत राय सोच रहे थे.....उनका तनाव कुछ कम हो रहा था।

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भारत एक बड़ा राश्ट्र है , इसकी आबादी एक अरब से भी अधिक है। इस बड़ी आबादी वाले विकास षील राश्ट्र का हर व्यक्ति कर्ज में उूबा हुआ है। चारों और भुकमरी, बेरोजगारी, कालाबाजारी,एवं भ्रश्टाचार का भयंकर यप दिखाई दे रहा है। हाँलांकी एँसा नहीं कि इस विषाल राश्ट्र में नेता नहीं हैं ना ही यहां खनिज संसाधनों की कमी है। पंच वर्शीय योजनाओं के माध्यम से देष प्रगति के पथ पर अग्रसर है। ष्षीत युद्ध की समाप्ती के पष्चात एक ध्रविय विष्व में भारत का रूस के साथ ही साथ अमेरिका के साथ भी व्यापारिक ,तकनीकी यहां तक की परमाणविक सहयोग भी बड़ा है। भारत एवं अमेरिका के मध्य असेनिक परमाणु उर्जा के लिये हाल मैं किया गया यमझोता इस क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धी है। प्रगति तो निष्चित रूप से हो रही है, लेकिन सवाल उठता है प्रगति के लाभ का, तब हमारी जनसंख्या आड़े आ जाती है और प्रगति का लाभ केवल चंद व्यक्तियों तक सीमित होकर रह जाता है......अमीर और अमरी हो जाते हैं ...जो गरीब हैं वो तो ना जाने गरीबी के दल दल में कितना धंस जातें हैं।

और आता है समय प्रतिभा-पलायन का , हमारा राश्ट्र एक-एक बच्चे को छोटी कक्षओं से लेकर उच्च षिक्षा तक पढ़ाने में लाखों रूपये खर्च करता है। फिर वही प्रतिभाएं इस देष को छोड़कर चली जाती हैं.......पैसा कमाने भारत माता रोती सिसकती आंखों पर पट्टी बाँधे उन्हैं विदा करती है, डाॅक्टर हरगोविंद खुराना,प्राफेसर चन्द्रषेखर और ना जाने कितने साफ्ट वेयर इन्जीनियर, परमाणु उर्जा वैज्ञानिक धन के आभाव में अपनी मात्र भूमि को त्याग कर पष्चिमी देषों की सेवा कर रहे हैं। लेकिन दोश उनका भी नहीं है, दोश भारत के उन नेताओं का भी नहीं है, जिनके हाथ में देष की बागडोर है। दोष है उस बढ़ती हुयी जनसंख्या का ,दोष है उस से उत्पन्न्ा बेरोजगारी का।आज डाॅक्टर सत्यजीत राय का मन भी कुछ इसी प्रकार के विचारों में खोया हुआ है, वो भी देष छोड़ने का विचार मन से निकाल नहीं पा रहे, लेकिन देष प्रेम उन्हें एंसा करने नहीं दे रहा । डाॅक्टर सत्यजीत राय अपनी उन्न्ाीसवीं सदी की पुरानी मोटर साइकिल को पंजाब नेषनल बैंक के सामने पार्क कर रहे थे। उन्होने ब्राउन कलर का सूट पहना हुआ था ऊपर से ब्राउन हेड और काले जूते। डाॅक्टर तेज कदम बड़ाता हुआ बैंक में दाखिल होता है, वो सीधा मेनेजर के कमरे में जाता है।
 
- मिस्टर षुक्ला आई.एम. डाॅक्टर सत्यजीत राय, नेषनल रिसर्च इन्सटीट्यूट आफ बायो साइंस।

‘तसरीफ रखिये जनाब’ मेनेजर ने बड़े ही षालीन स्वर में कहा।.....मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ।

- कर तो आप बहुत कुछ सकते हैं ......पर सवाल है आप करेंगे या नहीं।

- जनाब हम यहाँ बैठे ही आपकी सेवा के लिये है, या यँॅॅू कहिये आपकी मेरा मतलब आप लोगों की सेवा करने का ही तो हम वेतन पाते है।

- षुक्रिया मुझे आषा है, आप मेरा काम करेंगे।

- जी हाँ अब हमें पाइंट्स पर आना चाहिये।

- जी हाँ मिस्टर षुक्ला में भी यही चाहता हूँ पर सोच रहा हूँ सिलसिला कहां से षुरू करें.....मैं एक वैज्ञानिक हूँ और प्रयोग कर रहा हूँ।

- आप षुरू से बताईये।

- मैं षुगन्घों पर प्रयोग कर रहा हूँ, मैं जिस लेबोराट्री में प्रयोग कर रहा हूँ वो मेरे प्रयोगों के लिये पर्याप्त नहीं है और मेरे प्रयोगों पर भरी खर्च आना है। महंगे उपकरण खरीदना हैं, साथ ही मैं एक अलग लेबोराट्री की स्थापना करना है, वहाँ मुझे सहायकों की भी जरूरत पड़ेगी।....डाॅक्टर कुछ रुका।

- यस डाॅक्टर

- मिस्टर षुक्ला अमेरिका में मेरा एक मित्र आर्कीट्रेक्ट है, एक मित्र मेरे ही समान बायोसांइस का सांइटिस्ट ...सच पूंछा जाये तो उससे मित्रता ही हमारे सब्जेक्ट में मेल होने के कारण हो सकी...तो मिस्टर मैं बोल रहा था, उनसे मेने कान्टेक्ट किया और अपनी मन्सा बताई, उनके अनुसार मेरे इस प्लान पर पहले चरण में 8 करोड़ रूपये खर्च होंगे , आगे खर्च और होगा....उसका ब्योरा हम बाद में तैयार करने वाले थे....लेकिन पहला ही प्लान धरा रह गया।

- क्या

जी हाँ मिस्टर मुझे अपने इन्सटीट्यूट के प्रधान से आषा थी कि वह मेरे सब्जेक्ट के लिये नया विभाग खुलवा देगा और मुझे उस समय 10 करोड़ की रकम भी मामूली लगीं लेकिन उन्होंने मेरे अनुरोध को ठुकरा दिया....यहाँ तक की मुझे बे..इज्जत तक किया ...आप तो जानते हैं अमेरिका, रूस, फ्रान्स, ब्रिटेन ...इनके बदले हम अपने देष को ही लें तो हथियारों के निर्माण में करोड़ों रूपये खर्च हो रहे हैं....अन्तरिक्ष अनुसंधान में सरकार करोड़ों रूपये खर्च कर उपग्रहों का निर्माण एवं प्रक्षेपंण किया जा रहा है फिर केवल बायोसांइस को ही क्यों एंसी फेसेलिटी नहीं दी जा रही, देखिये में तो भावनाओं में बहकर सब्जेक्ट से हट गया, बूढ़ा हो गया हूँ ना....खेर तो मैं आपसे 10 करोड़ का ऋण चाहता हूँ डाॅक्टर ने सीधे विशय पर आते हुए कहा।

मेनेजर कुर्सी पर संभल कर बैठ गया , वह जानता था यह उसकी परीक्षा की घड़ी है। उसने नपे तुले षब्दों में कहा..बिल्कुल सही फरमाया डाॅक्टर आपने हमारी सरकार केवल योजना बनाना जानती है लेकिन उस पर अमल हो रहा है कि नहीं इस बात को नजरन्दाज कर देती है। मुझे याद है नेषनल इन्सटीट्यूट आफ बायो सांइन्स जब रूस की मदद से बना तब रूस ने 10 करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता की थी ओर भारत सरकार ने उसमें इतना ही रूपया खर्च किया था।

जी हाँ मिस्टर लेकिन मैं सोचता हूँ अभी इन्सटीट्यूट में कुल एक करोड़ का भी सामान नहीं है। तो आपने क्या निर्णय लिया...डाॅक्टर ने अपनी मन्सा पुनः दोहराई।

- डाॅक्टर हम आपको ऋण देने को तैयार हैं....

थेन्कयू मेनेजर....थेन्क्यू वेरी मच...डाॅक्टर ने भावुक होकर कहा।

लेकिन डाॅक्टर इसके लिये आपको सिक्योरिटी देनी पड़ेगी, जो कि जरूरी है, हमारा नियम है, बिना सिक्योरिटी के एक धेले का भी ऋण हम नहीं दे सकते, डाॅक्टर आप बुरा मत मानना क्योंकि देष में एँसे लोगों की कोई कमी नहीं जो लोन में लिये रूपयों को लेकर फरार हो जाते हैं, आप खुद ही सोचिये एँसी हालात में हम क्या करेंगे, हम भी तो जो ऋण में देते हैं वह जनता की ही तो होता है। मेनेजर ने डाॅक्टर के चेहरे को बारीकी से पढ़ते हुए सावधानी भरे लब्जों में कहा।

डाॅक्टर के माथे पर बल पड. गये, वह मेनेजर के षब्दों में छुपे अभिप्राय को समझने का यत्न कर रहा था, .....लेकिन था डाॅक्टर भी समझदार उसने दुनिया दारी देखी थी....उसे मेनेजर की बातों में दम लगा....‘मेनेजर मैं किसकी सिक्योरिटी लाऊँ’ उसने अत्यधिक निराषा भरे षब्दों में कहा।

किसी की भी जो 10 करोड़ की प्रापर्टी रखता हो या फिर अपने इन्सटीट्यूट की, सरकार भी सिक्योरिटी दे सकती है.....आप सचिवालय से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं।

थेन्क्यू मेनेजर डाॅक्टर ने उठते हुए कहा। वह जानता था रिसर्च इन्स्टीट्यूट उसकी सहायता करने से रहा, और किसी 10 करोड़ की सम्पŸाी वाले को तो वह ठीक से जानता भी नहीं था, कारण भी था ना जानने का, स्टूडेण्ट लाईफ से अब तक उसने अपने विशय को छोड़ किसी से मित्रता की हो एँसा उसे याद नहीं, आज उसको अपने पर खीज आ रही थी क्यों उसने बड़े लोगों से मित्रता नहीं की। विचारों में मग्न वह अपनी मोटर साईकिल की और बढ़ रहा था।

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- फादर मेने सुना है अमेरिका में एक बन्दर का दिल एक जेब कतरे के दिल से बदल दिया गया अब जब कतरा चिड़िया घर में उछल कूद कर रहा है और बन्दर जेब काट रहा है, क्यों ना हम भी मोण्टी का दिल भी किसी जेब कतरे से बदल दें तो हमारे वारे न्यारे हो जायेंगे.....हम मजे से बेठेंगे और साला बन्दर की औलाद जासूसी करेगा, साला आज कर बहुत एस कर रहा है।

मोण्टी ने घूर कर सार्जेंट को देखा और कूद कर टेबल पर बैठ गया....मानो हड़ताल पर हो। मोण्टी की कहानी भी दिलचस्प है सात आठ साल पेहले एक छोटा सा बन्दर ना जाने कहां से घायल अवस्था में कर्नल के बंगले मेें आ गया...हाँलांकी कर्नल के बंगले के लिये अभूतपूर्व सुरक्षा के इन्तजाम किये गये हैं फिर भी वह बन्दर का छोटा सा बच्चा ना जाने कहां से आ गया, लगता है इलेक्ट्रिक करेण्ट की चपेट में आ जाने के कारण ही उसकी हालात ज्यादा बिगड़ गयी थी, सुरक्षा कर्मी बन्दर के बच्चे को कर्नल के पास लेकर आये, कर्नल ने सुरक्षा कर्मियों से तो कोई बात नहीं की लेकिन घायल बन्दर का इलाज बंगले के पीछे बनी लेबोराट्री में षुरू कर दिया, कर्नल को चिकित्सा विज्ञान का इतना ज्ञान था कि कभी-कभी तो ऐसा लगता था मानो वह एक क्वालीफाईड डाॅक्टर हो...वेंसे कर्नल सेना की तकनी विंग संबद्ध एक इन्जीनियर था। सार्जेंट को भी देर सबेरे बन्दर की खबर तो लगनी ही थी और लगी भी ,इलाज तो बेसक बन्दर का कर्नल ने ही किया लेकिन उसकी देखभाल वाकई सार्जेंट ने ही संभाली..सार्जेंट ने ही उसका नाम मोण्टी रखा ,सार्जेंट जानता था माण्टी में कर्नल ने कुछ ना कुछ जेनेटिकल एवं हार्मोनिक परिर्वतन किये हैं, क्योंकि मोण्टी असाधरण रूप से इन्सानी भाशा समझ लेता था.....सार्जेंट की तंद्रा टूटी..

- बेटे कहो तो तुम्हारे दिल से इसका दिल बदल दें इसके लिये अमेरिका नहीं जाना पड़ेगा.....आपरेषन मैं ही कर दूंगा।

- क्या फादर ....आपरेषन....और आप..

और अच्छे से सुनो बेटा श्रीमती मेनिका गांधी जी को यदी पता चल गया के कर्नल नागपाल के असिस्टेण्ड ने एक बन्दर को बन्दी बना कर रखा हुआ है, तो खेर नहीं समझे...तो बेटे अब अच्छे से बैठ जाओ, अब काम करने का समय आ गया ,ये फाईल पढ़ लो आज ही मंत्रालय से आयी है।

- यानी मुसीबत

- बैटे बैठे-बैठे तनख्वा कब तक लोगे...और तुम्हारी पार्टी कैसी रही...सिल्वर नाईट क्लब की।

- पार्टी

- भाई वही पार्टी जो तुम वैज्ञानिक की सहायिका के साथ मना रहे थे....क्या नाम है उसका।

- जूलिया फादर, आप को कैसे पता चला।

- ऐसे ही मेने सोचा एक राउण्ड मैं भी मार दूँ।

- फादर फिर मुझसे मिले क्यों नहीं....

- मेनें सोचा कवाब में हड्डी बनने से क्या फायदा है

हाँलांकी सार्जेंट जानता था कि कर्नल असली कारण बताने वाले नहीं हैं, जरूर क्लब में कुछ गड़बड़ी हुयी होगी। क्या गड़बड़ी हो सकती हैं क्योंकि उसके आने तक तो कुछ नहीं हुआ था फिर आज के पेपर में भी एँसा कुछ संकेत नहीं मिला, हाँलांकी एरिना जेडसन के डांस की तारीफ जरूर की गयी थी। कहीं तो ही कर्नल के क्लब पहुँचने का कारण तो नहीं,षायद उसने षोचा क्योंकि चेहरा उे भी पहचाना लगा था।

- बैटे कहाँ खे गये

- कहीं नहीं

- डान्स में तो मजा आया ना

- क्या डान्य था, क्या सुन्दरता थी, क्या बदन था,क्या अदा थी..

- अच्छा अब काम करो मैं चला लेबोराट्री में।

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रात्री के आठ बज कर तीस मिनिट हो रहे थे, राजधानी के काफी व्यस्त इलाके में ,पैर रखने की जगह नहीं थी,लेकिन आवागमन बिना रूके चल रहा था। दुकाने नयी नवेली दुल्हन की तरह सजी थी। ग्राहकों की मानों बाड़ का गयी थी ऐंसा लगता था मानों आज सारा षहर दुकानों पर टूट पडऋा हो, हकीकत में ऐंसी कोई बात नहीं थी यह तो हर दिन का रोना था। इस भीड़ में षामिल थे दुनिया के जानेमाने जासूस कर्नल नागपाल, उनका असिस्टेन्ट सार्जेंट दिलीप और उसके साथ में था उसकी उंगली थामे बन्दर मोन्टी। उन्हें आज कुछ कपड़े खरीदने थे भीलवाड़ा सूटिंग एण्ड सर्टिंग से। लेकिन यहाँ आलम ऐंसा कार खड़ी करें तो कहाँ, कपड़े की दुकान से आधा किलोमीटर दूर, कार पार्क कर के कर्नल, सार्जेंट और मोन्टी टहलते हुए कपड़े की दुकान की तरफ बड़ रहे थे, उनके मध्य कुछ इस प्रकार की बात चीत हो रही थी।

- फादर

- यस माई सन

- मेरा बस चले तो कपड़े पहनना बन्द कर दूँ....

- क्यों बेटे..

- ये भी कोई बात हुई..

- बरखुदार जरा स्पश्ट षब्दों में कहो..

- फादर यहाँ तो हालात ऐंसे हैं कि जैंसे दुकान खेत में और कार पार्किंग खलियान में।

- सही फरमा रहे हो, पर गनीमत है,भारत में पैदा हुये अगर अमेरिका में होते तो भीलवाड़ा सूटिंग सर्टिंग आने के लिये कम से कम 10 किलोमीटर चलना पड़ता।

- लगाई गप्प फादर मानों मैं अमेरिका गया ही नहीं।
 


वो बात करते हुए बड़ रहे थे मोन्टी मजे से सिगरेट के कस लेते हुये अपने दोनों तरफ देखते हुये चल रहा था। वो अभी कपड़े की दुकान में कदम ही रखने वाले थे कि एक कुत्तों के भोंकने की आवाज आई, कर्नल और सार्जेंट दोनों पलटे, अगले ही पल वे फिर दुकान में प्रवेष कर रहे थे। लेकिन कुत्तों के भोंकने की आवाज धीरे-धीरे बड़ती जा रही थी , दो मिनिट में ही ऐंसा लगने लगा मानों वहाँ कुत्तों का ही साम्राज्य हो, मुख्य चैराहे पर सेकड़ों कुत्ते जमा हो चुके थे, वे एक दूसरे पर चढ़ दौड़ रहे थे , सेंकड़ों व्यक्ति कुत्तों की खुली जंग का षिकार हो चुके थे ऐंसा लग रहा था मानों कुत्तों के मध्य गेंगवार षुरू हो गया हो। ट्रेफिक जाम हो चुका था ,दुकान दार तेजी से अपनी दुकानो के सटर गिरा रहे थे, राहगीर दुकानों के किनारे दुपक कर अनोखी गेंगवार देख रहे थे ऐंसा दृष्य ना उन्होंने पहले कभी देखा था ना ही सुना था। कर्नल ध्यान से कुत्तों के गेन्ग वार को देख रहा था वो सोच रहा था अच्छा हुआ जो वह अपने ‘षेरा’ को साथ नहीं लाया वरना वो कल्पना से ही कांप रहा था क्योंकि कुत्तों के गेनगवार में हर नष्ल के कुत्ते दिखाई दे रहे थे उनमें पुलिष के प्रषिक्षिण प्राप्त एनसीषियन और बुल्डाग से लेकर साधारण नष्ल के कुत्ते भी षामिल थे, खेर साधारण कुत्तों को छोड भी दिया जाये तो प्रषिक्षित एलसीषियन ,ब्लडहांड, बुल्डाग नष्ल के कुत्तों से इस प्रकार की आषा करना कोई सोच भी नहीं सकता था। कर्नल देख रहा था 26 जनवरी की परेड में षामिल लाल पट्टे वाले दो एलसीसियन एक दूसरे पर घातक आक्रमण कर रहे थे....धारे-धीरे दोनों की हालात खस्ता होती चली गयी, पांच ही मिनिट बाद दोनों जीवन की अंतिम सांस ले रहे थे।

षहर के इस व्यस्त इलाके में मोत का षन्न्ााटा व्याप्त था कुत्तों के भोंकने की आवाज षांत पड़ चुकी थी, अब आ रही थी उनके कराहने की आवाज।

कुत्तों के मरने से एक अजीब प्रकार की बदबू वातावरण में व्याप्त हो गयी थी। सेंकड़ों की तादाद में कुत्ते ा तो मरे पड़े थे या अपने जीवन की अंतिम सांसे गिन रहे थे।

कर्नल ने अपने सारे जीवन में ऐंसा दृश्य कभी नहीं देखा था उसने रूमाल अपनी नाक पर रख रखा था वो इस कुत्तों की गेंगवार की तह में जाने की अथक कोषिष कर रहा था....लेकिन परिणाम षुन्य।

तभी पुलिस जीपों के सायरन की आवाज सुनाई देने लगी, जीपें तो वहाँ ट्रेफिक के चालु होने तक पहुँच नहीं सकती थी बहरहाल पुलिस दनदनाती घटनास्थल पर पहुँच गयी थी।

इंस्पेक्टर गिरीष, राजधानी का एक षक्त और गरममिजाज इन्स्पेक्टर बड़े ही आष्चर्य से मरे हुये कुत्तों को देख रहा था। तभी उसके कन्धे पर किसी ने हाँथ रखा..वो पलटा ....हेलो कर्नल।

- हेलो मिस्टर गिरीष, क्या हाल चाल है।

- हाल चाल तो देख ही रहे हो कर्नल यहाँ तो इन्सानों के गेंगवार से फुरसत नहीं ओर कुत्तों ने गेंगवार षुरू कर दिया।

ये क्या अबू सलेम, छोटाराजन, वो क्या कहते हैं मेनन मुझे तो नाम याद नहीं आ रहा उससे क्या कम हैं, कर्नल ने हँसते हुए कहा।

- इन्स्पेक्टर गिरीष को बन्दे का सलाम।

अरे सार्जेंट साहब आप भी मौजूद हैं, कहा गिरीष ने।

- जी हाँ हमारे साथ में इन्स्पेक्टर मोन्टी भी हैं।

गिरीष ने बन्दर की तरफ देखा, मोन्अी ने बड़े ही स्टाईल से नयी सिगरेट जलायी, इस गमगीन मोके पर भी इन्स्पेक्टर के ओंठों पर मुस्कान ख्लि आयी।

- कर्नल आपने यह गेंगवार देखा।

- जी हाँ जनाब बहुत अच्छे से संक्षेप में कर्नल ने वो सभी घटनायें दोहरा दीं जो उसके सामने घटी थीं।

- कर्नल मेरे तो समझ में नहीं आ रहा क्या किया जाये।

- करोगे क्या लाषों का पंचनामा करो, और पोस्टमार्टम के बाद इनके मालिकों के सुपुर्त कर दो।

- आप तो हँसी कर रहे हैं...................

नहीं मिस्टर गिरीष मैं हकीकत बयान कर रहा हूँ, ध्यान से देखे उन कुत्तों को ये वही कुत्ते हैं जिनने 26 जनवरी की परेड में भाग लिया था, अब तक ये सेंकड़ों

अपराधी पकड़ चुके हैं....इनमें से प्रत्येक के ऊपर प्रतिदिन सरकार 500 पये से ऊपर खर्च करती है। कहा कर्नल ने।

ओह माई गाड कर्नल वाकई ये तो वही हैं, और वो देखो अपनी गीता जिसकी मदद से हमने अभी हाल में एक मर्डर कैस साल्व किया था।

ओ.के. मिस्टर गिरीष तुम अपनी ड्यूटी निभाव हम तो चले ,आये थे कपड़े खरीदने लेकिन अब मूड़ नहीं रहा, देखना पड़ेगा अपने षेरा का क्या हाल चाल है।

ओ.के.कर्नल मैं आषा करूंगा इस विचित्र कैस में आप मरी सहायता करेंगे।

- वाॅई नाट मिस्टर गिरीष..

कर्नल ,सार्जेंट और मोन्टी कारों के बीच से रास्ता बनाते हुये अपनी कार की तरफ बड़ गये।

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कर्नल नागपाल, सार्जेंट दिलीप और मोन्टी ने जैसे ही सिविल लाईन स्थित अपनी कोठी में प्रवेष किया, गोरखा चैकीदार तेनसिंग उन्हैं परेषान हालत में मिला।

- साहब गजब हो गयां

- क्या हुआ सिंग कर्नल ने कहा

साहब आज षेरा पागल हो गया, जन्जीर तोड़कर भाग रहा था... उसने जन्जीर कर्नल को दिखाई और बोला..साहब मेने रस्सी का फन्दा फेंक फेंकर उसे बांध दिया, फिर उसे खाने में बेहोसी की दवा मिलाकर बेहोस कर दिया।

बहुत अच्छा किया तुमने तेनसिंग, सार्जेंट चट से बोला।

तुम चुप रहो कर्नल बोला और कुछ कुछ सिंग,।

- बस साहब तब से आप के आने का ही इन्तजार कर रहा हूँ।

- रामू और रामवती आये।

- साहब उनने आज छुट्टी ली है।

- क्यों?

- रामू की माँ मर गई...

- और रामबती

- रामू की माँ के मरने पर आँसू बहाने सिनीमा दैयीखन गयी है साहब।

- खेर तुमने आज बहुत अच्छा काम किया सिंग, षैरा कहाँ है।

तेनसिंग कर्नल को षेरा के पास ले गया, षेरा बेहोष पड़ा था ,अभी उसको होष नहीं आया था।

- पानी लाओ, मेरा फस्र्टएड बाक्स भी ले आना।

कर्नल ने षेरा के षरी पर पानी के छींटे डाले , और कुछ सुंघाया, पांच मिनिट बाद षेरा को होष आने लगा। अगले ही कुछ क्षंणों में वो पूरी तरह स्वस्थ लगने लगा। उस पर परगल पन के कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे थे। तेनसिंग पीछे खड़े होकर उसे घूर रहा था, उसे माजरा कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

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सुबह सार्जेंट को झंझोड़ कर उठाया गया।

- कोन है सोने भी नहीं देता।

- साहब आठ बज गये।

अबे साहब के बच्चे, तू कब आया तेरी तो माँ मर गयी थी...सार्जेंट ने कम्मल ओड़े-ओड़ ही कहा।

- वो साहब......

अबे उल्लू की दुम, गधे के सींग, पिछले महिने तेरा बाप मरा था, उसके पहले दादी, उसके पहले काका, साले अब कोन मरने वाला है पहले से बता....सार्जेंट ने कम्मल एक तरफ फेंकते हुए कहा।

- वो साहब बड़े साहब आप का चाय पर इन्तजार कर रहे हैं।

- ठी क है जाकर कहो छोटे साहब आ रहे हैं।

सार्जेंट ने अगले पन्द्रह मिनिट में ब्रस किया, हाथ मुंह धोकर फुरती से कपड़े बदल लिये।

- अबे दषरथ की ओलाद मेरे जूते ले आना।

- जी साहब।

- गुड माॅर्निंग फादर....

- माॅर्निंग ,बैठो

- जल्दी से चाय पियो आज बहुत काम है।

सार्जेंट चाय पीने लगा, कर्नल डेली न्यूज पेपर में उलझा था वो जानता था कर्नल चाय पी चुका है और चाय पीने के बाद आधा घण्टे पेपर जरूर पढ़ता है। पेपर में न्यूज छपी थी नगर के व्यस्ततम् इलाके मैं कुत्तों की गेंगवार। कल संध्या साड़े छह बजे नगर के मूनलाईट एरिये में कुत्तों के मध्य भीशण गेंगवार हुयी जिसमें 150 कुत्ते मारे गये। इनमें 75 प्रषिक्षण प्राप्त एलसीषियन ,ब्लडहाॅंड, एवं बुल्डाग थे।

राजधानी की पुलिस इस संदर्भ में कुछ भी कहने में असमर्थ है। एक प्रवक्ता के अनुषार मोेकाये वार्दात पर प्रसिद्ध जासूस कर्नल नागपाल और उनके सहायक सार्जेंट दिलीप मौजूद थे। उन्होंने भी अभी तक अपनी प्रतिक्रया व्यक्त नहीं की है। कर्नल न्यूज पढ़ता जा रहा था षायद कोई नई जानकारी मिले लेकिन कुछ विषेश न्यूज में नहीं था इसके अलावे कि पुलिस की बड़ी आलोचना की गयी थी यहाँ तक की विपक्षी पार्टी के नेता ने तो लोक सभा भंग कर राश्ट्रती षासन की मांग करते हुए कहा था कि इनके राज मेेेें तों इन्सानों के साथ कुत्ते भी गेंगवार कर रहे हैं, बहरहाल ऐंसा प्रतीत हो रहा था कि षहर का माहोल गर्म एवं रहस्यमयी हो गया था। कुछ लोग तो इसे देवीय विपदा मान कर अपने धरो में पूजा अर्चना तक करवा रहे थे। वहीं तांत्रिक भी इस घटना का भरपूर फायदा उठाते हुये मोटी कमाई में लग गये थे। कर्नल ने पेपर मेज पर रख दिया, सार्जेंट चाय पी चुका था।

- नींद कैंसी आयी, सपने तो सुहाने देख्ेा होंगे।

- क्या खाक सुहान , चार बार नींद खुली जानते हैं फादर क्यों ?

- तुम्ही बता दो।

- मुझे एँसा लग रहा था चारों तरफ से हजारों कुत्ते मेरे पर आक्रमण कर रहे हैं।

- खेर जाको राखे सांइया मार सके ना कोये, तुम्हैं कुछ होने वाला नहीं ,तुमने फाईल पढ़ ली।

- पढ़ली

- कुछ समझ में आया।

- थेड़ा बहुत फादर ......मेरी समझ में नहीं आ रहा वो भारत में घुस कैंसे आयी।

- ये बात तो जुदा है कि वह घुसी कैंसे, लेकिन घुसी है इतना तो जरूर है।

- क्यों

- ये सूचना हमें रूस की इन्टलीजेन्सी ब्यूरों के विस्वस्त षूत्रों से प्राप्त हुयी है और ग्रह मंत्रालय सेे ये कैस मुझे सोंपा गया दिया गया है,,,और हमारी सहायता के लिये पूरे इंडियाके गुप्तचर विभाग हैं। अच्छा ये सिल्वर नाईट क्लब के मेनेजर का क्या नाम है....

- डेविड

- वो तो तुम्हारा दोस्त हुआ करता था..

- मेरा लंगोटिया यार है।

- तुम वहाँ क्लब की डान्सर को चेक करो, उसीका जिसका परसों कार्यक्रम था.....हो जायेगा।

- ये तो मेरे बायें हाँथ का खेल है।

- ध्यान से खेलना नहीं तो बाँयां हाथ खे बैठे तो भी दिक्कतें बहुत आती हैं......तो कब जा रहे हो।

- अभी, और बस निकला..

- ठीक है अपनी रिवाल्वर भी रख लेना हो सकता है जरूरत पड़ जाये।

- फादर कुत्ते वाले केस का क्या होगा ?

- वो इन्स्पेक्टर गिरीष का सिरदर्द है। हमें तो अपने ही काम से फुरसत नही...ठीक है अब तुम जाओ।

सार्जेंट अपनी आइन्सटीन की तरफ बड़ गया।

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सार्जेंट दिलीप बड़ी सावधानी से लाल रंग की मर्सडीज का पीछा कर रहा थां हुआ कुछ इस प्रकार कि जब उसने अपनी आइंस्टीन गांधी चैक से मोड़ी तो एक लाल मर्सडीज उसकी आइन्स्टीन की बगल से गोली की तरह निकल गयी। कार इतनी तेज थी कि सार्जेट को केवल इतना अहसास हुआ कि कार कोई लड़की चला रही है जिसके बाल कंधों तक कटे हैं, उसे वह स्वेत वर्ण की लगी.....सार्जेंट के सिर में घण्टियां बजने लगी, कहीं वही तो नहीं, फिर पीछा करने में घाटा ही क्या है। दोनों कारो के मध्य सौ गज का फाँसला था ट्रेफिक अधिक तो नहीं पर इतनी जरूर थी कि लाल कार वाली लड़की पीछा किये जाने का अहसास नहीं कर सकती थी।

दोनो कारें अब कम आबादी वाले इलाके से गुजर रही थी। ट्रेफिक नहीं के बराबर था कभी-कभी कोई ट्रक या बस बगल से गुजर जाते थे।

लाल रंग की कार एक छोटी सी बिल्डिंग के सामने रूक गयी ,लड़की उतर कर बिल्डिंग के ीाीतर चली गयी, सार्जेंट अपनी कार को आगे बढ़ाता ले गया, उसने एक वृक्ष की छांव में कार को खड़ा कर वह उसी बिल्डिंग तक वापिस पैदल चलकर आया। सामने खाड़ी देषों में जाकर बसने वालों के लिये बनी एक प्राइवेट ट्रेवलिंग एजेन्सी का बोर्ड लगा था। सार्जेंट जानता था राजधानी में ऐंसी सेंकड़ों ट्रेवल ऐजेंसियाँ हैं जो सरकार की आँखें में धूल झोंक कर जनता को लूट रही हैं।

सार्जेंट अन्दर घुसा, लेकिन लड़की उसे कहीं नहीं दिखाई दी। एक मेज के पीछे फिल्मी स्टाईल का एक गुन्डा बैठा हुआ था। उसके बाल सफाचट थे मूंछें चीनी सटाईल की दिख रही थी।

- जनाब मैं कुवेत जाना चाहता हूँ।

- बाॅस नहीं हैं, पन्द्रह मिनिट बाद आना।

- साहब वो सामने जो कार खड़ी है उसमें से एक मेम साहिबा यहाँ आयी हैं वो मेरी परिचित हैं, कृपया उनसे मेरी मुलाकात करवा दीजिये।

उसने एक केबिन की तरफ इसारा करते हुये कहा..उस केबिन में चले जाओ वो भी बाॅस का इन्तजार कर रही हैं।

सार्जेंट भारी परदा उठाकर केबिन में घुसा, कोई भरी चीज उसके सिर पर टकराई उसकी आखों के सामने रंग बिरंगे तारे दिखाई देने लगे, उसने अपने को होष में रखने की बहुत कोषिष की लेकिन कामयाब नहीं हो सका। एक झटके से वह फर्स पर गिर पड़ा।

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सार्जेंट की जब बेहोषी टूटी तो उसने अपने आपको एक पलंग पर लेटा पाया।

- बैठे रहो बरखुदार।

- फादर आप, लेकिन मैं यहाँ......अरे ये तो अपनी काठी है ?

- और तुम्हारा बैड रूम ...

- मैं यहाँ कैंसे पहुँचा ?

- मैं लाया हूँ बरखुदार

- लेकिन मैं तो ट्रेवलिंग ऐजेन्सी के आफिस में बेहोस हो गया था।

- बेहोस हो गया नहीं बेहोस कर दिये गये थै।

- मेरा मतलब वही था किसी ने मेरे सिर पर किसी भारी जीच से वार किया था।

उसका हाथ षिर पर गया, सिर पर पट्टी बन्धी थी। वो हलका सा कराहा, फिर उठने की चेश्ठा की...

- लेअे रहो....हुआ क्या था षुरू ये बताओ।

सार्जेंट ने पीछा किये जाने से लेकर बेहोष होने तक की सारी घटना सुना डाली।

- बरखुरदार

- यस फादर

- लड़की को पहचानते हो

- फादर लड़की तो नहीं पर उसकी आंखे जरूर पहचानी लगी। जब मैं परदा उठाकर केबिन में घुसा तो वह लड़की वाकई एक कुर्सी पर बैठी थी।

- अच्छा अब उस डांसर को याद करो जिसकी जानकारी हाँासिल करने तुम सिल्वर नाइट क्लब जा रहे थे।

- कह नहीं सकता लेकिन उसकी आँखे और उस डांसर की आँखों में समानता थी।

- ठीक है अब तुम आराम करो, मैं कुछ पता करता हूँ।

- फादर जो ट्रेवलिंग ऐजेनसी के आफिस पर रेड करवा दो।

- बरखुरदार वहाँ अब कुछ नहीं है ,अपराधी चालाक है।

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इन्स्पेक्अ गिरीष थाने में स्थत अपने रूम में बैचेनी से टहल रहा था, कल की कुत्तों वाली घटना ने उसे बैचेन कर दिया था, आखिर कुत्ते इस प्रकार से बेकाबू हो आपस में लड़ने क्यों लगे। इससे ीाी अहम प्रष्न था सभी कुत्ते मूनलाईट एरिये में आये तो आये कैसें। षायद कर्नल ने कुछ हल निकाला हो ,उसने कर्नल नागपाल को तीन बार फोन किया लेकिन वो तीनों बार नहीं मिला...उसके मोबाईल नम्बर तक आसानी से किसी की पहुँच हो नहीं सकती थी वह जानता था....इन्स्पेकटर ने एक बार फिर लेण्ड लाईन फोन पर रिंग की....

- हैलो....में इन्स्पेकट गिरीष बोल रहा हूँ।

- राम-राम साहेब ,बड़े साहब आ गये हैं

ं- हैलो इन्स्पेक्टर कैंसे याद किया

- कर्नल परेषान बहुत हूँ, समझ में नहीं आ रहा क्या करू..............ये कुत्ते नहीं हो गये मेरे सिर का दर्द..

- पोस्टर्माटम रिपोर्ट आ गयी

- नहीं कर्नल लेकिन बस आने ही वाली है......एक हवलदार भेजा है।

- पोस्टमार्टम सीरियस ली किया जा रहा है कि फार्मेल्टी ?

- सीरियस कर्नल आई इन्फार्म पर्सनली दी बोथ ह्यूमेन एण्ड वेटेनरी डाॅक्टर..

- देखो इन्स्पेक्टर जैंसे ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ जाये उसे तुम मेरे पास आ जाना..ओ.के।

- एक मिनिट कर्नल,षायद रिपोर्ट आ गयी

एक मिनिट के लिये फोन पर सन्न्ााटर छाया रहा।

- कर्नल रिपोर्ट आ गयी है, मैं लेकर आ रहा हूँ। बंगले से कहीं जाने का मूड़ तो नहीं है।

- नहीं लेकिन जल्दी आ जाओ।

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इन्सपेक्टर गिरीष ने अपने विभाग की जीप को जिससे वह आया था बंगले के पोर्च में खड़ी कर दी। बंगले के बरांडे में ही कर्नल चेयर पर बैठे उसका इन्तजार कर रहे थे।

- हेलो कर्नल

- हेलो इन्सपेक्टर

- सार्जेंट दिखाई नहीं दे रहे

- उसके सिर में चोट आ गई है.....आराम कर रहा है।

- क्यों क्या हुआ

- कुछ नहीं यार, आज कल के लड़के आंधी तूफान की तरह कार चलाते हैं। फिर अचानक कहीं ब्रेक लगाना पड़ जाये तो फिर.....

- यानी सिर विन्डिंग स्क्रीन से टकरा गया।

- करेक्ट

- कर्नल ये रही पोस्अमार्टम की रिपोर्ट।

कर्नल ने रिपोर्ट लेकर पढ़ना षुरू किया ओर पढ़कर इन्सपेक्अर को वापस कर दिया।

- क्या रहा !

- जो सोचा था रिपोर्ट में उससे अधिक नहीं है।

- यानी आपको मालुम था कुत्ते पागल नहीं हुये।

- सही जा रहे हो इन्सपेक्टर।

- रिपोर्ट के अनुसार तो कुत्तों की मोत घातक और अत्यधिक रक्त स्त्राव के कारण लिखी अई है।

कर्नल मेरे मत के अनुसार तो कोई एंसी षक्ति थी जो कुत्तों को मून लाईट एरिये में खींच लाई और फिर वही कहावत चरितार्थ हो गई........कर्नल बीच में बोला.......जहाँ चार बर्तन होंगे वहाँ आवाज जरूर आयेगी।

- आपकी क्या राय है

- सच पूंछो तो मेने अपनी कोई राय अभी तक कायम नहीं की है। सवाल उठता है तुम्हारे अनुसार अदृष्य षकित का जिससे आषक्त होकर कुत्ते इक्ट्ठे हो जाते है। ठीक है ना ?

- जी हाँ।

- अब तुम्ही बताओ इन्सपेक्टर केवल कुत्ते ही क्यों आते हैं, गधे,क्यों नहीं आये, घोड़े क्यो नहीं आये, फिर बिल्लियाँ तो घर-घर में रहती हैं......यहाँ तक की मोकाय वार्दात पर हमारा मोन्टी भी मौजूद था उसको कुछ नहीं हुआ जबकी.......

- जबकी क्या...

- कुछ नहीं बस मेरे मुँह से यों ही निकल गया , हाँलांकी वह अपने कुत्ते षेरू के बारे में बताना चाहता था, फिर कुछ सोचकर चुप हो गया।खेर अब आपका क्या प्रोग्राम है।

- कर्नल सोचा था मोकाय वार्दात पर उपस्थित लोगों से जानकारी इक्ट्ठा करूंगा, लेकिन अब विचार बदल गया। क्योंकि मैं समझता हूँ आपसे अधिक जानकारी षायद ही किसी को हो।

तभी सार्जेंट ने बरांडे में प्रवेष किया, गुड माॅर्रिंग इन्सपेक्टर।

- माॅर्निंग, कैसा दर्द है सिर का।

- अरे तुम उठ कर क्यों आ गये तुम्हें तो कम्पलीट बैड रेसट लेना चाहिये....कर्नल ने कहा।

- अरे सार्जेंट चोट तो तुम्हारे सिर के पिछले भाग में लगी है। लगता है तुम कार चला नहीं रहे थे ....पिछली सीट पर बैठे थे...इन्सपेक्टर ने संदिग्ध ष्वर में कहा।

- जीहाँ....जीहाँ इन्सपेक्टर।

- अच्छा में चलूं कर्नल, ओ.के. सार्जेंट और तुम्हारा मोन्टी किधर गया।

- पीछे जाय फल खा रहा है....हहो तो बुला दूँ ?

- नहीं रहने दो, अपनी बला तुम ख्ुाद ही संभालो।

इन्सपेक्टर गिरीष ने जीप स्टार्ट की ,बैक मिरर मैं देखते हुए बेक कर फाटक के बाहर तक ले गया।

कर्नल ने सार्जेंट की तरफ खा जाने वाली निगाहों से देखा।

- क्या हुआ फादर...

- क्या नहीं हुआ, उस इन्सपेक्अर ने मेरा झूट ताड़ लिया।

- झूट........कोनसा झूट लेकिन आपने झूट बोला क्यों!

- अच्छा अब फुटो और आराम करो मेरे को बहुत काम है।

- अजीब लोग है सार्जेंट बड़बड़ाता हुआ पुनः अपने बेड रूम में घुस गया।

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- कुछ पता चला।

- नहीं

- तुम सब इन्डिया आकर निकम्बे हो गये हो।

सर हम कोषिष कर रहे हैं, हमारा अगला प्लान सषक्त है, मुझे पूरा विष्वास है। हमें यहाँ से महत्वपूर्ण जानकारी हाँसिल होगी, उसने अपना पूरा प्लान उसे समझा दिया।

- ठीक है, लेकिन काम नहीं हुआ तो उसके जिम्मेदार तुम लोग खुद रहोगे।

- यस सर......यस सर.....

- यस सर.....यस सर....मत लगाओ काम करो वो भी एक दिन के भीतर, मुझे षाल भर में काम करने वाले व्यक्ति जिन्दा अच्छे नहीं लगते। अब दफा हो जाओ, और मेरे केबिन मैं जों मेडम बैठी हैं उन्हें भेजो।

थोड़ी देर बाद।

- हैलो राबर्ट।

- हैलो, बैठो तुमहारा क्या ख्याल है वो किसका आदमी हो सकता है।

- कह नहीं सकती।

- मुझे कोई जासूस लगा, लेकिन मेरे यहाँ आने की सूचना तो किसी को नहीं।

- ये तुमने कैंसे सोच लिया, इन्डिया की ‘रा’ हमारे से कम नहीं है।

- यानी उन्हें मेरे यहाँ पहुँचने की खबर है।

- यकीनन नहीं तो वो नोजवान कोन हो सकता है। तुम्हारा प्रेमी तो यहाँ कोई बना नहीं होगा अभी तक...उसने व्यंग्य भरे लहजे मैं कहा।

- देखो राबर्ट मुझे बदत्मीजी पसन्द नहीं, हो सकता है वो मेरा चाहने वाला हो आखिर मैं भी मषहूर डान्सर हूँ।
 
संध्या के साड़े पांच बजे थे, कर्नल अभी तक कोठी से गायब था, सार्जेंट दिलीप बरांडे में बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। उसके सामने एक आराम कुर्सी पर मोण्टी आराम से बैठा था। तभी फोन की घण्टी बजी, सार्जेंट ने रिसीवर उठाया...

- हैलो, जीहाँ मैं सार्जेंट दिलीप ही हूँ।

- और सार्जेंट कर्नल साहब भी हैं क्या।

- आप कोन बोल रही हैं.........ओह तो आप , कहाँ से, नहीं ठीक है मैं क्वाटर पहुँच रहा हूँ, तब तक आप सावधानी से रहें।

सार्जेंट ने रिसीवर क्रेन्डिल पर रख दिया और तेजी से अपनी आइन्सटीन की तरफ भागा, मोण्टी भी उछल कर उसके साथ हो लिया। अगले ही पल वो हवा से बातें कर रहे थे।

इस समय सार्जेंट के हंसमुख चहरे पर चिन्ता के लक्षण साफ दिखाई दे रहे थे। वह सड़क के किनारे स्थित वृक्ष के नीचे अपनी आइन्सटीन खड़ी कर तेजी से पास वाले क्वार्टर की तरफ भागा।

उसने काल बेल पुस की, अन्दर कहीं घंटी बजने की आवाज आयी फिर पदचाप की आवाज धीरे-धीरे स्पश्ट होती गयी...कौन ?

- मैं सार्जेंट दिलीप

उसने दरवाजा खोला, उसे जबड़े से खुन रिस रहा था कपड़े जगह-जगह फटे हुए थे। षरीर पर हन्टर के निषान स्पश्ट दिखाई दे रहे थे। उसके खुबसूरत चहरे पर पीड़ा के भाव झलक रहे थे।

- लगता है उन्होने आपको बहुत टार्चर किया।

- हाँ सार्जेंट, सच कहूँ तो मैं टूट गयी मैंने बता दिया डाॅक्टर कहाँ गये हैं।

- कहाँ गये हैं !

- श्रीनगर वहाँ उनकी विधवा बहन रहती है।

- आहो कब गये।

- परसों

- कितने बजे..

- लेब से तो सुबह ही चले गये थे, पर गये कब मुझे नहीं मालुम, वैंसे मुझे याद आ रहा है,षाम पांच बजे की फ्लाईट के टिकिट खरीदे थे।

- तुम्हे कैंसे मालुम।

- दरअसल हमारे लेब के बगल में ही डाॅक्टर का आफिस हे, उन्होने वहीं से फोन करके एक दिन पहले टिकिट के संदर्भ में बात की थी।

- खैर देखा जायेगा, तुम्हारे पास श्रीनगर में डाॅक्टर की बहन का पता तो होगा ही।

ये लो उसने मेज से एक कार्ड उठा कर दिया, डाॅक्टर ने जानेे से पहले मुझे दे दिया था, षायद कोई आवष्यक काम पड़ जाये।

सार्जेंट ने पते को जर्कीन की जेब में रख लिया..चलो।

- कहाँ ?

- अपनी हालात देख रही हो, तुम्हें मेडीकल सहायता की आवष्यकता है..चलो।

मैं जरा कपड़े बदल लूँ उसने अपने फटे कपड़ों की तरफ इसारा किया।

- ठीक है जल्दी करो।

पांच मिनिट बाद ही तीनों आइन्सटीन मैं बैठे थे.....तीसरा था मोंटी जो इस दरमियान परिस्थती की नजाकतता को देख बेहद गंभीर बन गया था।

सार्जेंट ने कार एक क्लीनिक के सामने रोक दी, उस क्लीनिक का डाॅक्टर सार्जेंट का पहचान वाला था।

आओ सार्जेंट डाॅक्टर ने उसे दूर से ही देख लिया आज यहाँ कैंसे आना हुआ।

- मैं तो मरने पर भी नहीं आता फिलहाल तो आप इन मैडम की मरहम पट्टी कर दें।

- क्या हुआ इन्हें।

- क्या हुआ, ये पूछें क्या नहीं हुआ, डाॅक्टर जरा जल्दी करो, इनके पूरे षरीर पर ताजे जख्म हैं।

- ठीक है लेकिन मेरी नर्स और कम्पोंडर तो चले गये बस मैं भी अभी जाने वाला ही था....तुम्हें मेरी सहायता करनी पड़गी।

- ठीक है।

उससे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था, सार्जेंट सहारा देकर डिसपेन्सरी ले गया।

- उस स्ट्रेचर पर लिटा दो।

- चोट कहां लगी है।

- डाॅक्टर इसके पूरे षरीर पर बेरहमी से हन्टर बरसाये गये हैं।

- मामला क्या है।

- बाद में बताऊँगा.....पहले दवा-दारू करो।

- इनके कपड़े उतारने पडें़गे ? नर्स तो हे नहीं तुम उतारो मैं पानी गर्म करता हूँ।

- मैं!

- अरे भाई ये तो हमारा रोज का काम है, और इस समय ये सब नहीं देखा जाता।

सार्जेंट ने उसकी मिडी का बक्कल खोलकर मिडी निकाल बगल के टेबल पर रख दी ...उसने एक हाथ से अपनी आँख बन्द कर रखी थी।

- क्यों सार्जेंट तुम क्यों षरमा रहे हो, षरमाना तो मुझे चाहिये।

- मैं किसी से नहीं षरमाता...जरा उठो।

- मेरे से उठते नहीं बनेगा।

सार्जेंट ने एक हाथ से सहारा देकर उसे बिठा दिया, दूसरे हाथ से उसकी मिडी टाप की चेन खोली....फिर होले से टाप उसके षरीर से अलग कर दिया..उसके ब्रेस्ट भी हंटर की मार से लाल हो गये थे ..मैं जानता था वो एक नाजुक जगह थी..यहाँ के टेंपरेरी इलाज के बाद इस लड़की को निष्चित रूप से ब्रेस्ट की सरजरी करानी पड़ेगी। उसके षरीर से जगह-जगह खून रिस रहा था....आधा घण्टे में मरहम पट्टी पूरी हो सकी...डाॅक्टर ने उसे टिटनेस का इन्जेक्सन भी लगा दिया साथ ही दर्द के लिये इन्जेक्सन के साथ सोने के पहले खाने के लिये नींद की गोली भी उसे दे दी। अब वह कम्प्रेटिवली अच्छी फील कर रही थी..

- थेंक्यू डाॅक्टर।

- नो थेंक्स् सार्जेंट..

सार्जेंट ने संभालकर उस को कार की पिछली सीट पर लिटा दिया...और कार गेयर में डाल कर आगे बड़ा दिया।
 
रात के ग्यारह बजे कर्नल कोठी पर आया, सार्जेंट अभी तक उसके इन्तजार में यहाँ वहाँ टहल रहा था।

- तुम अब तक सोये नहीं?

- आप ही का इन्तजार कर रहा था।

- लड़की की हालात कैसी है।

- वो आपको कैसे मालूम?

हमें कल श्रीनगर जाना है, मैनें प्लेन में सीट बुक करा दी है। लड़की कहाँ है। उसने सार्जेंट की बात को नजरंदाज करते हुए कहा।

- बैड रूम में सो रही है।

- मैने डाॅक्टर वर्मा को कह दिया है, वो रोज सुबह आकर उसे कोठी पर ही चेक कर जाया करेगा, रामू और तेनसिंग को बतला देना, जहाँ तक मैं सोचता हूँ डाॅक्टर की बहन का पता तो तुमने लड़की से पूंछ लिया होगा।

- ये रहा

- शाबास आजकल अकलबंदी का काम बहुत करते हो।

- वो तो अपन बचपन से ही कर रहे है।

- अब फालतू बात नहीं बारह बज रहे हैं, सुबह जल्दी उठना है, अब सो जाओ।

- एक बात है फादर...

- बोलो कर्नल ने सर्ट उतारते हुए कहा।

- मोन्टी चलेगा।

- नहीं सरकार हमें हराम का पैसा नहीं देती, उसने सार्जेंट को घूरते हुए कहा,और प्लेन में बन्दर को ले जाने की अनुमति नहीं मिल सकी।

- क्यों?

- इन्डियन एयर लाइन के विमान का अपहरण कर अभी लाहोर ले जाया गया था, इसलिए उन्होने कड़ा रूख अपना लिया है। यहाँ तक की रिवाल्वर भी अब हमें वहीं जाकर हाँसिल होंगे। अच्छा अब सो जाओ मुझे भी नींद आ रही है, आज दिन भर दोड़-धूप बहुत ज्यादा हो गयी।

---000---

राजधानी से श्रीनगर तक चलने वाली यात्रीवाहक विमान अपने निर्धारित समय पर उतर रहा था। गेलरी से हांथ हिला-हिलाकर कर लोग अपने रिस्तेदारों अथवा परिचितों का स्वागत कर रहे थे। कर्नल और सार्जेंट कश्टम से निपट कर पार्किंग की तरफ बड़ गये।

कर्नल ने एक हरे रंग की कार का दर्वाजा खोला उसमें ताला नहीं लगा था तथा इग्नीषन स्विच में चाबी लटक रही थी। उसका नम्बर जे.के.एस.4949 था।

- फादर ये कार हमें कहाँ से मोहिया हो गयी, बिल्कुल फिल्मी स्टाईल से ?

- बरखुरदार इस कार को यहाँ हमारे एण्टी टेरीरिस्ट विंग का ऐजेण्ट मदन छोड़ कर गया है, मिस्टर मदन डाॅगा........याद है मदन की या भूल गये .....बाॅम्बे बम्ब ब्लास्ट काण्ड के समय तो तुम दोनों ने साथ में काम किया था....और मैंने तो सुना था तुम उसको बार ले कर गये थे जहाँ लड़किया डांस भी करती हैं..क्या कहते हैं उनको...बार गर्ल..या डान्सिंग गर्ल...

सार्जेंट ने बुरा सा मुह बनाकर कहा....अब तो फादर महाराश्ट्र सरकार ने डान्सिंग बार पर बेन लगा दिया है....

- तुम्हें तो बड़ा अफसोस हो रहा होगा...बहरहाल बात मिस्टर डागा..मदन डागा की हो रही थी...याद हे या भूल गये ?

- याद है वो कहीं भूलने की चीज है...षाला कब्रिस्तान में भी भेल-पूरी खा सकता है...दो पिस्तोल से दो अलग-अलग लोगों पर सटीक निषाना लगा सकता है..

- खेर और सुनो यहाँ नार्कोटिक विंग का इन्सपेक्टर चोहान...सुकीर्णों चाहान ओर इनके साथी भी मोजूद हैं।

- लेकिन ये सब हैं कहाँ ?

- सब अपना-अपना काम कर रहे हैं बरखुरदार।

- हमारी इनसे मुलाकात कब होगी।

- जल्दी ही

- फादर देखो...

- कहाँ

- उस जीप मैं...

लेकिन तब तक जीप आँखों से ओझल हो चुकी थी।

- कोन था उसमें ?

- आपने नहीं देखा

- नहीं

- इन्सपेक्टर गिरीष

- वो यहाँ किस काम से आ गया।

- मेरे को तो लगता है वह भी उसी काम से आया है, जिस काम से हम आये है।

- ओह तो ये बात है।

- क्या बात है फादर?

- कुछ नहीं

- आप मझ से कुछ छुपा रहे हैं।

- अभी मैं खुद ही कुछ निष्कर्श पर नहीं पहुँचा, तुम्हें क्या बताऊँ। अच्छा तुम्हारे सामने जो खन है उसे खोलो जरा।

सार्जेंट ने खन खोला उसमें दो रिवाल्वर और दो पेकैट कारतूस के रखे थे।

एक पेकेट कारतूस और एक रिवाल्वर मेरे को दो, बाकी तुम रख लो, कर्नल ने कहा। सार्जेंट ने वैंसा ही किया जैंसा कि कर्नल ने कहा।

हाॅटल शालीमार, कर्नल ने कार हाॅटल के पोर्च में खड़ी कर दी, दोनों के पास एक-एक सूटकेष थे जिसमें कुछ कपड़े और टूथ ब्रस वगैरा छोटे-छोटे दैनिक जीवन के लिये उपयोगी सामान थे। कर्नल काउंटर पर पहुँचा.....माई षैल्फ कर्नल नागपाल....

वेल्कम सर ...रूम नम्बर 101 इस आलरेडी रिजर्व फार यू.....सेकेण्ड फ्लोर पर पहला कमरा है....इस इट ओके सर..

रूम में पहुँचने के पंद्रह मिनिट बाद ही कर्नल के मोबाईल की घण्टी ने हलके से बज उठी.......कर्नल ने होले से टेबल पर रखे अपने मोबाईल को उठाया....यस मिस्टर चैहान पता नोट करो.....कर्नल ने वही पता दोहरा दिया जो उसे सार्जेंट ने दिया था..

- डागा...मिस्टर मदन डागा कहाँ है?

- सर वो बिना पते के ही तलाषने की कोषिष कर रहा है...पर मेरे से उसका मोबाईल संपर्क है, किन्तु हम लोग यहाँ, मोबाईल बंद रखते हैं, बस पूर्व निर्धाति समय पर ही दो-तीन मिनिट के लिये आन करते हैं..

- क्यों क्या कारण है एंसा करने का?

- कर्नल साहब यहाँ कोन किसका आदमी है पता नहीं चलता पुलिस तो पुलिस मिलेट्री तक पर भरोसा करना कठिन हो गया है...विदेषी उग्रवादियों के कारण हर व्यक्ति दूसरे पर षक करता है, इसलिये हम भी नहीं चाहते लोकल पुलिस इवन मिलेट्री भी हमारे विशय में कुछ जान सके ....दे विल टेप आल दा काल रिसीव्हड आर आउटगोन फ्राम दि न्यू मोबाईल सेट...ग्लोबल सर्चिंग सिस्टम से ये लोग आसानी से लोकेषन का पता लगा लेते हैं.....और एक बार यदी इनकी निगाह में आये नहीं कि फिर तो काम करना मुषकिल हो जाता है...

कर्नल ने फोन डिसकनेक्ट किया, फिर तेजी से अपने सूटकेष का ताला खोलने लगा, सार्जेंट दिलीप पहले ही अपने सूटकेष का ताला खोल चुका था...उनका सूटकेष विषेश रूप से बना दोहरा सूटकेष था, सार्जेंट ने सूटकेष के तले से षामान निकालते हुए पूछा....किसका फोन था?

- सुकीर्णों चोहान

- आप मदन डागा के विशय में है, बहरहाल है श्रीनगर में ही।
 
---000---

श्रीनगर....लेक-टाउन....झीलांे का षहर....धरती का स्वर्ग ना जाने कितनी उपमाओं को अपने में समेटे हुये....चारों तरफ मुँह उठाये हुयी हिम आच्छादित पर्वत मालायें सैलानियों को अपनी और आकर्षित करती हैं...षायद यही कारण है यहाँ का मुख्य व्यवसाय पर्यटन ही है, साधारण दर्जे से लेकर मंहगे से मंहगे हाॅटल सेलानियों को बर्बस अपनी और आकर्शित करते हैं.....मगर विदेषी उग्रवादियों के मकड़ जाल में उलझ कर धरती का यह स्वर्ग अब बारूद का ढेर बन चुका है, ना जाने किस गली से मिषाइल आये और आपके हंसते खेलते आषियाने का बर्बाद कर दे, सुन्दर चमचमाति कार ,बम बन कर कब बेकसूरों के चिथड.े उड़ा देती है, किसी को नहीं मालूम कल क्या होगा...षायद ही कोई खुदा का बंदा इस जमीन पर हो जिसे कल जिन्दा रहने का विष्वास हो .....मौत और सिर्फ मौत का काला साया ग्रहंण बन कर यहां की खुषहाली को लील गया कर्नल की तंद्रा टूटी.....वे दोनों हथियारों से लेष हाॅटल की लाबी में खड़ें थे।चलो कर्नल ने कहा।

दोनों अपनी हरे रंग की कार की तरफ बड़ गये। वातावरण में नमी थी हलकी बारिश हो रही थी। कर्नल और सार्जेंट दिलीप के षरीर पर इस समय वाटर प्रुफ गरम कपड़े थे तथा हाथों में पतले दस्ताने चढ़े थे। कर्नल ने कार स्टार्ट की और सार्जेंट उसकी बगल में बैठा था, उसने अपनी पेंट की जेब से एक नक्सा निकाल कर कर्नल के सामने रख दिया फिर उंगली रख कर कुछ समझाने की कोषिष करने लगा। कार षहर के आबादी वाले इलाके से होकर गुजर रही थी, उसकी रफ्तार पचास किलोमीटर प्रति घण्टे के करीब थी......................................षहर का घण्टा घर 11 घण्टे बजा रहा था, कर्नल ने दुकान एक फूलों की दुकान के सामने रोक दी......गुलमोहर फूलों की दुकान। कर्नल फूलों वाले बुड्ढे से कुछ बतिया रहा था....

- जी हाँ साहब बस 100 कोश जाकर बायें और मुड़ जाना, फिर 50 कोश तक सीध में जाने के बाद लकड़ी का कच्चा पुल मिलेगा उस पर कार नहीं जा सकती....वहाँ से पैदल चले जाना बस वहाँ पुराना गिरजाघर मिल जायेगा......साहब देखिये क्या सदाबहार फूल हैं।

- खान साहब अभी तो जल्दी है, फूल हम लोटकर लेंगे....धन्यवाद।

- अरे धन्यवाद कैसा जनाब यह तो हमारा कर्तव्य है....आप कहे तो अपने लवंडे(लड़के ) को भेज दूँ।

- जी नहीं शुक्रिया हम खोज लेंगे।

कर्नल तेज कदम बढ़ाते हुए कार में आया, सार्जेंट अभी भी नक्से में उलझा हुआ था........उसने कहा फादर यहाँ के बाद कच्च ब्रज मिलेगा फिर गिरजाघर....

- तुम्हारी मेप रीडिंग अच्छी है।

- तारीफ के लिये षुक्रिया।

कर्नल ने कार को गेयर में डाल कर दिया....ट्राफिक जादा नहीं थी कार अच्छी रफ्तार से जा रही थी..........................तभी एक कार आंधी तूफान की रफ्तार से उनके बगल से निकल गयी।

- फादर क्या मामला है।

- समझ में नहीं आ रहा बेटे, माजरा क्या है, फिलहाल तो हमारे पास वक्त नहीं है।

सामने लकड़ी का बना एक पुल दिखाई दे रहा था उस पर पैदल लोग आ जा रहे थे......निष्चित रूप से उस पर कार नहीं चलाई जा सकती थी.......साथ ही फुटबाल के गोल पोस्ट के समान उसके गेट पर ही सरिये लगे थे.....कार तो क्या वहाँ पैदल जाने के लिये भी झुक कर जाना पड़ रहा था। कर्नल ने कार सढ़क के किनारे पार्क कर दी..............चलो उसने कहा।

दोनो ने लगभग दोड़ते हुए पुल पार किया, सामने ही एक पुराना गिरजाघर दिखाई दे रहा था।

कर्नल ने एक मिनिट कुछ सोचा फिर गिरजाघर के बायें और बने गलियारे से दोड़ते हुये पिछले भाग में पहुँच गये, पीछे कुछ क्वार्टर बने हुये थे..................उनकी कण्डीषन देखने से लगता था उनको बनाने वालों ने उन्हें बनाने के बाद एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कर्नल की निगाह नेमप्लेटों को घूर रही थी। फिर वह एक नेम प्लेट की तरफ दोड़ा, उसके दरवाजे पहले से खुले थे.................जैंसे ही कर्नल और सार्जेंट क्वार्टर में घुसे................

- हेलो कर्नल तुम यहाँ।

- मैं भी तुमसे यही पूंछ रहा हूँ........

- मैं तो यहाँ एक केस के सिलसिले में आया हूँ। नेषनल रिसर्च इन्सटिट्यूट आफ बायो साइन्स का एक डाॅक्टर सत्यजीत राय यहाँ अपनी बहन के पास आया था और वहाँ उसका पता लगाने के लिये कुछ बदमाषों ने उसकी सहायिका को मार-मार कर बेदम कर दिया।

- तुम्हें कैसे पता चला?

- अज्ञात फोन आया था।

- किस का हो सकता है।

- किसी पड़ोसी ने किया होगा कर्नल ,तुम तो जानते हो आजकल पुलिस के लफड़े में कोई नहीं पड़ना चाहता।

- हेलो इन्स्पेक्टर गिरीष.............मेरे को लगता है पुलिस को अपना इमेज सुधारना चाहिए जिससे लोग बेखोफ होकर उसके पास आ सकें।

- हेलो सार्जेंट तो आप भी हैं ‘थेंक्स फार एडाईस टू चेंज दी एटीट्यूट् आफ पोलिस मेन रिगार्डिंग पीपुल’।.......एनी वे आप लोग यहाँ कैसे आये।

- जल्दी बताओ डाॅक्टर कहाँ है।

- चिड़िया उड़ गयी मिस्टर, उसकी बहन की हत्या कर अपरीधी उसका अपहरण करने में कामयाब हो गये।

- क्या

- जी हाँ

- नाका बंदी कर दी

- पूरी तरह, षहर से कोई परिंदा भी बिना मेरी इजाजत के बाहर नहीं निकल सकता।

- कब की बात है

- अभी मेरे ख्याल से आधा घण्टा नहीं हुआ।

- और आप अभी यहाँ क्या कर रहे हैं, उसका पीछा नहीं किया?

- कर्नल हम तुम्हारी तरह जासूस नहीं हैं, हमें हर तरह से घटना का निरीक्षण एवं विवेचना करनी पड़ती है, अभी फिंगर प्रिंट लिये जायेंगे................................लाष के फोटो खिचेंगे उसका पोस्टमार्टम होगा.........................चेनल वालों को इंटरव्यूह देने पड़ेंगे वो देखो उसने बाहर दूर एक बंगले की तरफ उंगली दिखाई.......वहाँ जो भीड़ है उसमें कम से कम 20 राश्ट्रीय चेनलों के पत्रकार और फोटोग्राफर मोजूद है.........जानते हो वह किसका बंगला है?

- किसका है?

- बच्चन परिवार की षादी...........एष-अभिशेक की हाईप्रोफाईल षादी की याद है या फिर भूल गये?

- यार वह तो एक-डेड़ सप्ताह पुरानी बात हो गयी।

- कर्नल षादी में उत्पाद मचान वाली हया...को अगर नहीं भूले हो तो ये उस के पिताजी का बंगला हैं।

- ओह नो, लेकिन अभी इतनी भीड़ कैंसे दिखाई पड़ रही है?

- एष-अभिषेक की षादी में उत्पाद मचान वाली हयात आज सुबह यहाँ आई है तब से ये चेनल वाले यहाँ से टलने का नाम नही ले रहे ..................एनी वे छोड़ो अपनी सुनाओ।

- इन्स्पेक्टर तुम्हें यहाँ का पता कहाँ से मालुम हुआ।

- खुद जूलिया ने बताया।

- जूलिया ने?

- मुझे एक मुखबीर ने बताया वो तुम्हारी कोठी पर मेडीकल ट्रीटमेंट ले रही है।

कर्नल को मानना पड़ा इन्स्पेक्टर गिरीष उसकी आषा से अधिक चालाक पुलिसिया है। ओ.के. मिस्टर गिरीष जब फिंगर प्रिंट की रिपोर्ट आ जाये तो मुझे बता देना.......अब हम चलें।

- तो आप नहीं बतायेंगे आप यहाँ किस सिलसिले में आये।

- अभी वक्त नहीं है.........................................लेकिन चिन्ता न करो इन्स्पेक्टर बताऊंगा जरूर।
 
तारकोल की चिकनी काली सड़क पर कार फर्राटे से दौड़ रही थी। कार सार्जेंट चला रहा था , आदतन वह तेज कार चलाता था इस समय भी रफ्तार 85 से ऊपर ही थी। कर्नल ने वाटर प्रुफ जरकीन की भीतरी जेब से ट्रांसमीषन निकाला जिसका आकार माचिस की डिब्बी के बराबर था। उसने एरियल खींचकर बाहर निकाल दिया।

- यस.....यस.....कर्नल नागपाल

- यस.....यस....09 हिअर

- मालूम करो षहर सभी नाकों पर चेकिंग हो रही है कि नहीं?

- श्रीमान मदन अभी एक संदिग्ध कार का पीछा कर रहा था, वो षहर के बाहर जाने वाले इलाके में जा रहे थे, अचानक उनका नाके के 50 गज पहले ही मूड़ बदल गया और कार वापिस षहर की तरफ चली गई....

- और मदन..

- श्रीमान वो अभी भी पीछा कर हा है......अभी रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।

- मैंने नाके की चेकिंग का कहा था?

- श्रीमान मदन के अनुसार वहाँ सादे वस्त्रों में जितने भी व्यक्ति पान, और चाय की दुकान के आस पास खड़े थे वे सभी पुलिसिये थे.........................उनमें से दो को तो मदन पहचानता भी था......कालेज के समय में वे उसके साथ पढ़ते थे।

- ओ.के. रिपोर्ट जल्दी देना।

- जी हाँ श्रीमान

कर्नल ने वायरलेस को बंद कर अपने वाटर प्रुफ जेकेट की अंदरूनी जेब में डाला, सार्जेंट दिलीप ध्यान से कर्नल की बातें सुन रहा था................

- क्या हुआ

- कुछ नहीं नाके पर चेकिंग हो रही है, मदन एक कार का पीछा कर रहा है.................मेरे ख्याल से यह कार वही होगी जो अपने बगल से निकली थी....याद है ना?

- लेकिन उसका पीछा नहीं हो रहा था।

- तुम्हें कैंसे मालूम?

- वो.........वो........

- वो.....वो मत करो , मदन षायद मोटर साईकिल पर होगा?

- बस एक बात तो बता दो फादर

- क्या

- ये पूरी टीम यहाँ कैंसे पहुँच गयी।

- बरखुरदार इन्डियन एयर लाईन के विमान का अपहरण हो गया था अभी हाॅल में याद है?

- जी हाँ उसे मुसलिम आतंकवादी नेपाल और पाकिस्तान होते हुए कांधार ले गये थे........ओसामा बिन लादेन ...और मुल्ला उमर ने उसका अपहरण करवाया था और उसके बदले हमारे विदेष मंत्रालय को उनसे समझोता करना पड़ा एवं यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के बदले हमने चार खुंखार आतंकवादी उनके हवाले कर दिये.......

- वेरी वेल सेड....जीनियस.....यू हेव ए वंडरफुल नालेज एण्ड मेमोरी....पाकिस्तानी राश्ट्रपती परवेज मुसर्रफ पर अंतर्राश्ट्रीय दबाव पड़ा तभी पाकस्तानी हुकमरानों की

मध्यस्थता से समझोता संभव हो सका.........

- षर्मनाक समझोता कहो फादर.....यहाँ तो हमने देष के स्वाभीमान को गिरवी रख कर विमान के यात्रियों की जान बचाई....................

- देखो सार्जेंट आतंकवादियों को तो हम फिर से पकड़ सकते हैं किन्तु झूटे स्वाभिमान के चलते देष के 170 नागरिकों की बली नहीं चढ़ाई जा सकती.......देष के नागरिकों की हिफाजत की जिम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है.....................हमने अपनी तरफ से हरचन्द कौषिष की, कि कमाण्डो कार्यवाही कर के अपहरित नागरिकों को छुड़वालें लेकिन तुम्हें तो याद होगा इस कोषिष में हमारा एक नागरिक उनकी गोलियों का षिकार हो गया......खैर छोड़ो इस विशय में बाद में विस्तार से चर्चा करेंगे......तुम पूंछ रहे थे ये हमारी खुपिया टीम के सारे सदस्य यहाँ कैंसे पहुँच गये......वो क्या है कि ये केस भी मुझे गृह मंत्रालय द्वारा सौंप दिया गया था, इसी सिलसिले में मैंने अपनी पूरी टीम यहाँ भिजवा दी थी.........में खुद भी आने वाला था......................लेकिन मुझे कांधार जाना पढ़ गया............और बाद में उस सर्मनाक समझोते के विशय में तो तुम्हें पूरी जानकारी है ही।

- वही में समझूं ये रेडीमेट जासूस यहा यहाँ कहां से आ गये।

वो अपने हाॅटल पहुँच चुके थे सार्जेंट ने कार एक किनारे पार्क कर दी और फिर दोनों हाॅटल में घुस गये..................उन्होंने काउंटर से चाबी ली एवं सीड़ियों की तरफ बढ़ गये।
 
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