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" फिर क्या सल्यूशन आया तेरे माइंड में ? " ....... फॉरन उसके मूँह से यह बात निकली लेकिन निक्की ने कोई जवाब नही दिया.
" फॉर गॉड सेक निक्की !!! कुछ तो बोल बेटा .. अब हम बड़े हो गये हैं .. भला ऐसी छोटी मोटी बातों पर कब तक एक दूसरे से खफा रह पाएँगे " ....... यह बात कहते हुए जल्दबाज़ी में निकुंज ने अपना हाथ निक्की की जाँघ पर रख दिया.
वैसे देखा जाए तो भाई - बहेन के बीच यह एक सिंपल टच माना जा सकता है लेकिन वर्तमान हालात काफ़ी बदल चुके थे और ज्यों ही निक्की को एहसास हुआ कि उसकी जाँघ पर उसके भाई का हाथ है .... एक सिरहन के साथ उसका पूरा जिस्म काँप उठा .... उसे लगा जैसे निकुंज ने सीधे उसकी तड़पति चूत पर अपना हाथ रख दिया हो.
वहीं निकुंज को भी महसूस हुआ उसकी बहेन की बॉडी वाइब्रट कर रही है लेकिन निक्की का चेहरा दूसरी तरफ घूमा होने से उसे इस बात का कोई क्लियर प्रूफ नही मिल पाया.
" मेरी बात का जवाब तो दे निक्की " ....... निकुंज ने उसकी जाँघ पर अपने हाथ का दबाव देते हुए कहा.
" भा .. भाई हमे पार्क चलना चाहिए " ....... निक्की हौले से फुसफुसाई .... वह रात में अपने भाई के इसी टच से रोमांचित हुई थी .... सुबह भी कुछ पल के लिए उसकी चूत से रिसाव हुआ और अब भी उसे कुछ अलग सी फीलिंग आना शुरू हो गयी थी.
" पार्क में बात नही हो पाएगी .. हमे यहीं बात करनी होगी " ...... निकुंज ने कहा और इस बार अपने हाथ को उसकी जाँघ से हटा कर उसके कंधे पर रखते हुए ज़बरदस्ती उसे अपनी तरफ टर्न करने लगा.
" भाई !!! प्लज़्ज़्ज़ घर लौट चलो " ....... निक्की सिसकी लेकिन अब तक उसने खुद तो अपने भाई की तरफ देखने से रोक रखा था .... वह डर के मारे सहमी जा रही थी कि कहीं उसके भाई को उसकी सेडक्षन भरी हालत का पता ना चल जाए और यदि ऐसा हुआ तो बेवजह ही उसे अपने भाई के सामने शर्मसार होना पड़ेगा.
" घर बाद में जाएँगे .. पहले मैं तुझसे बात करना चाहता हूँ " ........ यह कहते हुए निकुंज ने अपने हाथ का ज़ोर लगाया और ना चाहते हुए भी निक्की को उसकी तरफ मुड़ना पड़ा.
अपनी बहेन के चेहरे पर नज़र पड़ते ही निकुंज का दिमाग़ काम करना बंद कर गया .... उसने सॉफ देखा, उसकी बहेन के होंठ बुरी तरह फडक रहे हैं और उसकी साँसे इस तेज़ी से चल रही हैं जैसे वह मीलों दौड़ कर आई हो .... साथ ही उसकी पनियल आँखों की सुर्खियत भी काफ़ी हद तक उसकी खुमारी को बयान कर रही थी.
" तू ठीक तो है .. रो क्यों रही है ? " ....... टॉपिक में हल्का सा बदलाव लाते हुए निकुंज ने उससे पूछा.
" मैं कहाँ रो रही हूँ " ....... निक्की ने फॉरन अपने हाथ की उंगलियों से अपनी आँखों की पलकें चेक की और पॉज़िटिव रिज़ल्ट देख कर शॉक्ड रह गयी.
वाकयि उसकी आँखों में सिवाए उत्तेजना के कुछ शेष ना था और इसी चक्कर में निकुंज की आँखें उसके चेहरे से हट कर उसके तन चुके बूब्स पर टिक गयी .... निक्की की साँसों से ताल मिलाती उसकी चूचियों का आकार निरंतर तेज़ी से घटता व बढ़ता जा रहा था और निकुंज के हाथ का पाँजा खुद ब खुद पंप होने लगा .... आख़िर अपने इसी पंजे से उसने दो बार अपनी सग़ी बहेन की चूची दबाई थी और इतना सोचने के बाद तो किसी कीमत पर उसके लंड में कदकपन्न आना नही टाल पाया .... जो अब ढीलेपन से विकरालता में परिवर्तित होकर .... उसके छोटे से शॉर्ट्स के ऊपर बड़ा सा तंबू बनाने लगा था.
वह अपनी सोच से एक झटके में बाहर आ गया .... जब उसके कानो में उसकी कार के पिछे खड़ी कार का हॉर्न सुनाई पड़ा .... शायद उनकी कार किसी ऐसी जगह खड़ी थी जहाँ ज़्यादा देर की पार्किंग अलोड नही होगी.
" भाई घर चलो .. मुझे पार्क नही जाना " ........ अपनी बहेन की बात को अनसुना करते हुए निकुंज ने कार वहाँ से आगे बढ़ा दी .... वह कुछ देर पहले की ग़लतफहमी का शिकार था जिसमें निक्की ने अपनी दिक्कत का सल्यूशन खुद ढूँढने की बात कही थी और निकुंज के माइंड में उसकी यह बात बुरी तरह से खलबली मचा रही थी.
" तू यह बता !!! मैं तुझे कैसा लगता हूँ ? " ...... अजीब सवाल था यह लेकिन निकुंज को पूछना पड़ा और सुनते ही निक्की मे माथे में बल पड़ने लगे.
" मतलब ? " ...... निक्की ने आश्चर्य में भरते हुए कहा.
" मतलब !!! तू मुझे कितना प्यार करती है ? " ....... निकुंज के इस सवाल ने निक्की को वाकाई परेशानी में डाल दिया .... वे दोनो ही एक दूसरे से बेशुमार प्रेम करते हैं लेकिन अब उस प्रेम में वासना ने अपनी जगह बना ली थी.
" हां भाई !!! प्यार करती हूँ " ....... निक्की ने जवाब दिया परंतु वह अपनी पूरी लाइफ में आज पहली बार अपने भाई से साथ अकेले बैठने में अनकंफर्टबल महसूस कर रही थी .... हलाकी उसके असहज होने की मुख्य वहज वह खुद थी जो बीते कयि दीनो से निकुंज के संपर्क में आते ही बहकना शुरू हो जाया करती थी.
" कैसा प्यार !!! भाई - बहेन वाला या कुछ और भी इसमें शामिल है " ........ असल मुद्दे की बात पूच्छने के पश्चात निकुंज ने कार वहीं रोक दी .... वे अब बिल्कुल सुनसान रास्ते पर थे और जिसका कोई अंदाज़ा निक्की को नही हो पाया था.
अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए निकुंज ने जितनी तेज़ी से अपनी बहेन के चेहरे पर नज़र डाली .... शरम्वश उतनी ही गति से निक्की का चेहरा नीचे झुकने लगा .... अत्यधिक घबराहट में वह अपने होंठो को यूँ चबा रही थी जैसे वे कोई बेजान चूयिंग गम हों .... एक अंजाना डर उसके मन में घर कर चुका था और जिसके कारण, ना तो वह ' हां ' में अपना जवाब दे सकने की हालत में थी और ना ही ' ना ' में.
" फॉर गॉड सेक निक्की !!! कुछ तो बोल बेटा .. अब हम बड़े हो गये हैं .. भला ऐसी छोटी मोटी बातों पर कब तक एक दूसरे से खफा रह पाएँगे " ....... यह बात कहते हुए जल्दबाज़ी में निकुंज ने अपना हाथ निक्की की जाँघ पर रख दिया.
वैसे देखा जाए तो भाई - बहेन के बीच यह एक सिंपल टच माना जा सकता है लेकिन वर्तमान हालात काफ़ी बदल चुके थे और ज्यों ही निक्की को एहसास हुआ कि उसकी जाँघ पर उसके भाई का हाथ है .... एक सिरहन के साथ उसका पूरा जिस्म काँप उठा .... उसे लगा जैसे निकुंज ने सीधे उसकी तड़पति चूत पर अपना हाथ रख दिया हो.
वहीं निकुंज को भी महसूस हुआ उसकी बहेन की बॉडी वाइब्रट कर रही है लेकिन निक्की का चेहरा दूसरी तरफ घूमा होने से उसे इस बात का कोई क्लियर प्रूफ नही मिल पाया.
" मेरी बात का जवाब तो दे निक्की " ....... निकुंज ने उसकी जाँघ पर अपने हाथ का दबाव देते हुए कहा.
" भा .. भाई हमे पार्क चलना चाहिए " ....... निक्की हौले से फुसफुसाई .... वह रात में अपने भाई के इसी टच से रोमांचित हुई थी .... सुबह भी कुछ पल के लिए उसकी चूत से रिसाव हुआ और अब भी उसे कुछ अलग सी फीलिंग आना शुरू हो गयी थी.
" पार्क में बात नही हो पाएगी .. हमे यहीं बात करनी होगी " ...... निकुंज ने कहा और इस बार अपने हाथ को उसकी जाँघ से हटा कर उसके कंधे पर रखते हुए ज़बरदस्ती उसे अपनी तरफ टर्न करने लगा.
" भाई !!! प्लज़्ज़्ज़ घर लौट चलो " ....... निक्की सिसकी लेकिन अब तक उसने खुद तो अपने भाई की तरफ देखने से रोक रखा था .... वह डर के मारे सहमी जा रही थी कि कहीं उसके भाई को उसकी सेडक्षन भरी हालत का पता ना चल जाए और यदि ऐसा हुआ तो बेवजह ही उसे अपने भाई के सामने शर्मसार होना पड़ेगा.
" घर बाद में जाएँगे .. पहले मैं तुझसे बात करना चाहता हूँ " ........ यह कहते हुए निकुंज ने अपने हाथ का ज़ोर लगाया और ना चाहते हुए भी निक्की को उसकी तरफ मुड़ना पड़ा.
अपनी बहेन के चेहरे पर नज़र पड़ते ही निकुंज का दिमाग़ काम करना बंद कर गया .... उसने सॉफ देखा, उसकी बहेन के होंठ बुरी तरह फडक रहे हैं और उसकी साँसे इस तेज़ी से चल रही हैं जैसे वह मीलों दौड़ कर आई हो .... साथ ही उसकी पनियल आँखों की सुर्खियत भी काफ़ी हद तक उसकी खुमारी को बयान कर रही थी.
" तू ठीक तो है .. रो क्यों रही है ? " ....... टॉपिक में हल्का सा बदलाव लाते हुए निकुंज ने उससे पूछा.
" मैं कहाँ रो रही हूँ " ....... निक्की ने फॉरन अपने हाथ की उंगलियों से अपनी आँखों की पलकें चेक की और पॉज़िटिव रिज़ल्ट देख कर शॉक्ड रह गयी.
वाकयि उसकी आँखों में सिवाए उत्तेजना के कुछ शेष ना था और इसी चक्कर में निकुंज की आँखें उसके चेहरे से हट कर उसके तन चुके बूब्स पर टिक गयी .... निक्की की साँसों से ताल मिलाती उसकी चूचियों का आकार निरंतर तेज़ी से घटता व बढ़ता जा रहा था और निकुंज के हाथ का पाँजा खुद ब खुद पंप होने लगा .... आख़िर अपने इसी पंजे से उसने दो बार अपनी सग़ी बहेन की चूची दबाई थी और इतना सोचने के बाद तो किसी कीमत पर उसके लंड में कदकपन्न आना नही टाल पाया .... जो अब ढीलेपन से विकरालता में परिवर्तित होकर .... उसके छोटे से शॉर्ट्स के ऊपर बड़ा सा तंबू बनाने लगा था.
वह अपनी सोच से एक झटके में बाहर आ गया .... जब उसके कानो में उसकी कार के पिछे खड़ी कार का हॉर्न सुनाई पड़ा .... शायद उनकी कार किसी ऐसी जगह खड़ी थी जहाँ ज़्यादा देर की पार्किंग अलोड नही होगी.
" भाई घर चलो .. मुझे पार्क नही जाना " ........ अपनी बहेन की बात को अनसुना करते हुए निकुंज ने कार वहाँ से आगे बढ़ा दी .... वह कुछ देर पहले की ग़लतफहमी का शिकार था जिसमें निक्की ने अपनी दिक्कत का सल्यूशन खुद ढूँढने की बात कही थी और निकुंज के माइंड में उसकी यह बात बुरी तरह से खलबली मचा रही थी.
" तू यह बता !!! मैं तुझे कैसा लगता हूँ ? " ...... अजीब सवाल था यह लेकिन निकुंज को पूछना पड़ा और सुनते ही निक्की मे माथे में बल पड़ने लगे.
" मतलब ? " ...... निक्की ने आश्चर्य में भरते हुए कहा.
" मतलब !!! तू मुझे कितना प्यार करती है ? " ....... निकुंज के इस सवाल ने निक्की को वाकाई परेशानी में डाल दिया .... वे दोनो ही एक दूसरे से बेशुमार प्रेम करते हैं लेकिन अब उस प्रेम में वासना ने अपनी जगह बना ली थी.
" हां भाई !!! प्यार करती हूँ " ....... निक्की ने जवाब दिया परंतु वह अपनी पूरी लाइफ में आज पहली बार अपने भाई से साथ अकेले बैठने में अनकंफर्टबल महसूस कर रही थी .... हलाकी उसके असहज होने की मुख्य वहज वह खुद थी जो बीते कयि दीनो से निकुंज के संपर्क में आते ही बहकना शुरू हो जाया करती थी.
" कैसा प्यार !!! भाई - बहेन वाला या कुछ और भी इसमें शामिल है " ........ असल मुद्दे की बात पूच्छने के पश्चात निकुंज ने कार वहीं रोक दी .... वे अब बिल्कुल सुनसान रास्ते पर थे और जिसका कोई अंदाज़ा निक्की को नही हो पाया था.
अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए निकुंज ने जितनी तेज़ी से अपनी बहेन के चेहरे पर नज़र डाली .... शरम्वश उतनी ही गति से निक्की का चेहरा नीचे झुकने लगा .... अत्यधिक घबराहट में वह अपने होंठो को यूँ चबा रही थी जैसे वे कोई बेजान चूयिंग गम हों .... एक अंजाना डर उसके मन में घर कर चुका था और जिसके कारण, ना तो वह ' हां ' में अपना जवाब दे सकने की हालत में थी और ना ही ' ना ' में.