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पिशाच की वापसी

साथ बने रहने के लिए आप सब का बहुत धन्यवाद
 
पिशाच की वापसी – 8

चेहरे पे अजीब से खुदे हुये बड़े बड़े निशान, मानो किसी ने चेहरे को नोंच लिया हो, खून की बहती परत और अंदर की हड्डियाँ तक दिखाई दे रही थी, आधे होंठ गायब थे और आधी नाक कटती हुई थी, आँखें एक दम हरी हो चुकी थी, पर सबसे ज्यादा हैरान और रूह को हिला देनी वाली बात ये थी की वह शरीर किसी और का नहीं बल्कि खुद जावेद का था, जावेद तो थोड़ा पीछे होकर एक पल के लिए अकड़ ही गया था उसे शरीर को देख के, लेकिन उसे होश तो तब आया जब वह लाश गुराते हुई उसकी तरफ बड़ी..

"उहह एयाया…..ईएहह…

करते हुए वह लाश आगे बड़ी, जिसे देख के जावेद तेजी से पीछे मिट्टी में घिसटने लगा, वह शरीर अपने एक हाथ की मदद से आगे भी बढ़ने लगा, जावेद पीछे होने लगा, पर अचानक ही जावेद एक जगह जाकर रुक गया वह पीछे नहीं हो पाया, पीछे ट्रक खड़ा था और जावेद ठीक उस ट्रक के टायर के आगे आ चुका था, वह शरीर गुराते हुई आगे तरफ रहा था और बिलकुल करीब पहुंच चुका था, वह गुराया, इधर जावेद चीलाया, उस शरीर ने अपना वह एक हाथ उपर उठाया और जावेद की तरफ बड़ा, जावेद एक बार ज़ोर से चीलाया.

"नहियीईईईईईईईईईईईईई.....!

और फिर उस खामोश जगह पे एक बार फिर खामोशी छा गयी.

अपने हाथ से अपना चेहरा छुपाया, जावेद वहीं खड़ा था उसकी टॉर्च नीचे गिरी हुई थी, उसकी साँसें तेज चल रही थी, वह वहीं खड़ा था कुछ मिनट बाद उसने अपने चेहरे से हाथ हटाया, उसके चेहरे पे पसीने की बोंदें इतनी ठंड में उभर आई थी, डर चीज़ ही ऐसा है जिसे महसूस करके शरीर और आत्मा साथ छोड देती है, जावेद ने इधर उधर देखा और फिर नीचे गिरी टॉर्च को उठाया.

"वह सब क्या था, कोई सपना ही होगा, हकीकत तो नहीं हो सकती, पर जो भी था इतना भयानक आज तक मैंने कभी महसूस नहीं किया था"

जावेद ने अपने आप से कहा और जंगल की तरफ भी बढ़ने लगा, वह आगे निकल गया पर शायद जो उसने महसूस किया वह सच था, ट्रक से थोड़ी दूर वही हाथ पड़ा था जिसे जावेद ने फेंका था.

जावेद जंगल के अंदर घुस चुका था, अंदर घुसते ही जावेद ने महसूस किया की ठंड बहुत ही ज्यादा है यहाँ, उसको अचानक ही सांस लेने में दिक्कत होने लगी, वह गहरी गहरी सांस खींचने लगा, लेकिन उसको सांस नहीं आ रहा थी, तभी उसने अपनी नाक पे कुछ महसूस किया, उसने अपनी उंगली से अपनी नाक को छुआ तो उसने पाया की उसकी नाक के अंदरूनी सिरे में बर्फ जम गयी है, उसने फौरन उसे बर्फ को अपनी नाक से हटाया तब जाकर उसे सांस आई.

वह आगे कुछ करता की तभी उसके कानों में कुछ आवाज़ पड़ा, किसी के खांसने की आवाज़, जावेद पीछे घुमा और उसने उसे तरफ टॉर्च मर्री, लेकिन उसे टॉर्च में उसे कोई नहीं दिखा,

"कौन है"

बड़ी मुश्किल से उसने आवाज़ निकली.

"उन्हुंण… उन्हुंण…."

एक बार फिर किसी के खांसने की आवाज़ आई, वह धीरे धीरे उसे आवाज़ को ढूंढ़ने आगे की तरफ चल पड़ा, जैसे जैसे वह आगे बढ़ता वैसे वैसे उसे वह आवाज़ तेज होती जाती थी, वह कुछ मिनट तक उसे खामोश जंगल में आगे बढ़ता रहा की तभी उसे कोई दिखा, जो ठीक उसके सामने पेड़ के सहारे खड़ा था, अपना सर झुकाए, जावेद ने अपनी टॉर्च की रोशनी उस की तरफ करी हुई थी, उसकी जान, उसका शरीर इस वक्त ठंड से ज्यादा डर से कांप रहा था.

“कोन हो तुम"

जावेद ने उस इंसान से थोड़ा दूर खड़े रह कर सवाल किया.

"रास्ता भटक गया हूँ, ठंड लगी है, और भूख भी बहुत लगी है"

उसे तरफ से आवाज़ आई.

"पर तुमने अपना सर क्यों झुका रहा है, मेरी तरफ देखो"

जावेद ने वहीं खड़े रहना उचित समझा

"नहीं उठा सकता"

"अच्छा, तो फिर आओ मेरे पास में तुम्हारी मदद करूँगा, आओ"

जावेद ने उसे अपने पास बुलाने के लिए कहा.

"नहीं आ सकता, आप आ जाओ मेरे पास, में बहुत तकलीफ में हूँ, मेरी मदद कीजिए, प्लीज़ मेरी मदद कीजिए"

सामने से फिर धीरे धीरे रोने की आवाज़ आने लगी, जावेद ने एक बार तो एक कदम आगे बढाया और फिर वह अचानक से रुक गया और वह कुछ सोचने लगा, उसके माथे पे शिकन और गहरी होती चली गयी, उसकी आँखें उसके कुछ सोचने पर बड़ी होती चली गयी, उसने पाया की अभी थोड़ी देर पहले जो भी उसे आदमी के साथ बात हुई उसेमें एक फर्क था वह ये की जो में बोल रहा हूँ वह आवाज़ यहाँ गूँज रही है, पर जब वह बोल रहा है तो वह आवाज़ नहीं गूँज रही ऐसे कैसे, इतना सोच ही रहा था की अगले पल उसके दिमाग ने ज़ोर डाला और तब उसने रूह को हिला देना वाला सच पाया.

"ये तो मेरी ही आवाज़ है, जो वह इंसान बोल रहा है"

जावेद ने इतना कहा और कुछ कदम पीछे की तरफ हो गया.

"आप मेरी मदद नहीं करेंगे"?

सामने से बोलते हुये अचानक उस शरीर ने अपनी गर्दन उपर उठा ली, जिसे देख के जावेद की साँसें उखड़ने लगी, सामने उस चेहरे की हालत ही खौफनाक थी, चेहरा आधा जला हुआ था और उस जले हुये चेहरे की चमडी नीचे छोटे छोटे टुकड़ों में गिर रही थी मानो गल गयी और चेहरे से फिसल रही हो, दूसरी तरफ बड़े बड़े गढ्ढे हो रहे थे और उसेमें से खून रिस रहा था, आँखों के नाम पे सफेद रंग के पत्थर दिखाई दे रहे थे.

जावेद बुरी तरह से कांप उठा उसे देख के वह इस बार भी कोई और नहीं उसी का चेहरा था जो इस वक्त इतना भयानक दिखाई दे रहा था, वह शरीर जावेद की तरफ बढ़ने लगा, जैसे ही उसने बड़ना शुरू किया.

“मदद करो मेरी, मदद करो"

इतना बोलते हुई आगे बड़ा की उसका लेफ्ट पैर घुटनों के नीचे से टूट के अलग हो गया, वह शरीर टेडा हो गया, पर फिर भी जावेद की तरफ आने लगा, थोड़ा आगे चला की उसका दूसरा पैर भी घुटने के नीचे से टूट के अलग हो गया और वह शरीर नीचे गिर गया, लेकिन फिर भी वह नहीं रुका वह शरीर घिसट घिसट के जावेद की तरफ आने लगा, जावेद कुछ पल उसे शरीर को ऐसे ही देखता रहा लेकिन फिर एक ज़ोर दार चीख उसके मुंह से निकल गयी.

"नहियीईईईई….."

बोलते हुई वह वहां से भागने लगा, उसके कानों में बार बार यही आवाज़ आ रही थी

"मदद करो, मदद करो"

लेकीन जावेद नहीं सुन रहा था वह बस भागे जा रहा था, भागते भागते वह थक गया लेकिन जंगल खत्म नहीं हुआ, थक हार के वह एक पैर के सहारे खड़ा हो गया और हांफने लगा.

"ये जंगल खत्म क्यों नहीं हो रहा, यहाँ जरूर कुछ गड़बड़ है, मुझे मुख्तार साहब से मिलना ही होगा, उन्हें सब कुछ बताना होगा, यहाँ पे कुछ है जो ठीक नहीं हो रहा है"

जावेद हांफते हुए अपने आप से बोल ही रहा था की तभी उसे कुछ आवाज़ आई, अजीब सी चटकने की आवाज़, तभी उसे उसके हाथों पे कुछ महसूस हुआ, उसने महसूस किया जो हाथ उसका पेड़ पे था उसे हाथ पे कोई वजन है उसने उसे हाथ की तरफ देखा, तो उसे एक और झटका लगा जो की यहाँ आने के बाद ना जाने कितनी बार लग चुका था..

पूरा पेड़ बर्फ की चादर के नीचे थे, पर उसके लिए चिंता की ये बात थी की उसके हाथ पे बर्फ जमने लगी थी, जावेद ने फौरन उसे पीछे खींचने की सोची, पर वह चिपक गया था इसलिए खिच नहीं पाया.

“आ….आहह"

वह ताक़त लगा रहा था पर नहीं खिच पा रहा था, तभी उसके कानों में फिर वही आवाज़ पड़ी,

"मदत करो"

जो जंगल के अंधेरे में सी आ रही थी, जावेद की जान सूखने लगी, उसने पूरा दम लगाया और हाथ पीछे की तरफ खींचा, जैसे उसका हाथ पेड़ से अलग हो गया और पीछे की तरफ जा गिरा, पर ज़ोर ज़ोर सी चिल्लाते हुई छटपटाने लगा,

"आहह …. एयाया…आस….."

दर्द में करहता हुआ जावेद किसी तरह खड़ा हुआ, उसके हाथ से खून बह रहा था, उसके हाथों में बेहद जलन हो रही थी, उसकी हतेली का मास उसके हाथ में नहीं था, खींचने के चक्कर में उसकी खाल पेड़ पे ही चिपकी रही गयी..

कुछ मिनट तक वह ऐसे ही छटपटाता रहा, पर जैसे ही उसे वह आवाज़ और करीब से आने लगी तो वह फिर से भागने लगा बाहर की तरफ, और इस बार वह जंगल से बाहर निकल गया.
 
पिशाच की वापसी – 9

"मुझे जल्दी से यहाँ से निकल के जाना होगा, हाँ आह.."

दर्द में करहते हुए जावेद अपने हाथ को दूसरे हाथ से पकड़ा हुआ था, शायद इसे दर्द में कुछ कमी महसूस हो रही थी.

तभी जावेद ने सामने ट्रक खड़ा हुआ देखा वह उसे ट्रक की बढ़ भगा… जल्दी से उसेमें बैठा, पर उसेमें चाबी नहीं थी, उसने अपना एक हाथ स्टेरिंग वील पे मारा, और एक बार फिर उसे हैरानी का सामना करना पड़ा जिसे उसके दिल की धड़कने बढ़ गयी, वील पे हाथ मारते ही ट्रक शोर करते हुई अपने आप स्टार्ट हो गया, कुछ सेकेंड जावेद ऐसे ही सोचता रहा लेकिन फिर गियर डाल के ट्रक को वहां से निकाल ले गया.

"मुझे जल्दी पहुचना होगा, हाँ…"

बोलते हुई जावेद तेजी से ट्रक चला रहा था, रास्ता तेजी से पार हो रहा था, कुछ देर की ड्राइविंग में जावेद ने ट्रक पे ब्रेक लगाया, उसके खिड़की से देखा तो सामने मुख्तार का घर था उसने ट्रक को ऐसे ही खुला छोड, दरवाजा से बाहर निकल गया और जैसे ही उसके कदम ज़मीन पे पड़े और कुछ कदम आगे गये, उसे एक बड़ा हिला देने वाला झटका लगा जिसे उसके मुंह से एक ज़ोर दार चीख निकल गयी

“नहियीईईईईईईईईईईई…….."

जावेद सामने की तरफ देख के चिल्ला पड़ा, क्यों की सामने वही जगह, वही खामोशी और वही अंधेरा जंगल.

"खीखीखीखीखीखीखीखी……….."

तभी जावेद के कानो में एक अजीब सी भारी आवाज़ में किसी की हँसी सुनाई दी, जिसे सुन के उसकी रूह में एक बार फिर कपकपि की लहर दौड़ गयी.

"कौन है, कौन है"?

जावेद इधर उधर अपनी गर्दन को घुमा के चिल्लाता है, लेकिन उसका जवाब देने वाला उसे कोई नहीं दिखा, रात के उसे अंधेरे में जब सर्द हवा के साथ, जिंदगी मौत से टकरा रही हो तब जो चेहरा किसी इंसान का होता है इस वक्त उसे इंसान यानि की जावेद का था, साँसें उखड़ी जा रही थी, हाथ और चेहरा इतना ठंडा हो गया था की वह नीला पढ़ चुका था, जावेद हैरान परेशान वहां खड़ा कुछ सोचने में लगा हुआ था, लेकिन ऐसे वक्त में दिमाग साथ छोड देता है, सुनाई देता है तो सिर्फ़ वह डर जो अपनी तरफ खीचे इंसान को और खिंचता है, शायद इस वक्त भी डर ही जीत गया था.

"खीखीखीखीखीखीखी"

हवा की लहर के साथ एक अजीब सी भारी और बेहद धीमी आवाज़ जावेद को सुनाई दी.

"कौन है, कौन है वहां, सामने आ, आ सामने"

इस बार जावेद अपने डर को काबू करते हुए ज़ोर से चीलाया और उसके पैर खुद ब खुद जंगल की तरफ चल पड़े, उसे गीली मिट्टी पे चल रहे जूतों की आवाज़ भी इस वक्त डर की लहर शरीर में छोड रही थी

"कौन है वहां, सामने आ जा, जो भी हो"

बोलते हुए जावेद जंगल के अंदर घुस गया, पर फिर चलते चलते रुक गया, सामने कुछ नहीं था, ना कोई रोशनी, ना कोई इंसान और ना ही कोई आवाज़, जावेद सोच ही रहा था की क्या किया जाए तभी एक हाथ पीछे से आकर सीधे उसके कंधे पे पड़ा.

“आअहह…"

सहमते हुए जावेद दो कदम आगे चला गया और पीछे घूम गया, जावेद को इस वक्त अंधेरे में एक साया खड़ा हुआ दिखाई दिया, जिसे देख के जावेद का हलक सुख गया

“क..क..कौन हो तुम, देखो चले जाओ नहीं तो, नहीं तो में"

बोलते हुई जावेद ज़मीन पे कुछ ढूंढ़ने लगा, कुछ मारने के लिए हथियार, लेकिन तभी

“साहब में हूँ"

जैसे ही ये आवाज़ जावेद के कानों में पडी, उसने चैन की सांस ली और सामने देखने लगा, तभी सामने से वह साया चलता हुआ जावेद के करीब पहुंचा.

"तू यहाँ क्या कर रहा है रघु"?

जावेद ने अपना चेहरा साफ करते हुए कहा.

"साहब, जब अपने कहा था की आप यहाँ आओगे तब से आपकी चिंता हो रही थी, इसलिए में यहाँ आपको देखने आया"

रघु ने चिंता जताते हुए कहा.

"हम्म, पर तू कब आया, और तुझे कैसे पता चला की में यहाँ हूँ"?

जावेद ने थोड़ी आशंका जताते हुए कहा

“साहब में तो बहुत देर से आया हुआ हूँ, आपको ढूंढ़ते हुये जंगल के आखिरी कोने तक पहुंच भी गया था, फिर जब आप नहीं मिले तो वापिस आते हुए आपके चिल्लाने की आवाज़ सुनी, एक पल के लिए में डर गया था की कहीं आपके साथ कोई अनहोनी तो नहीं होगयी, लेकिन जब आपको देखा तब राहत मिली"

रघु ने अपनी बात से जावेद की शंका को दूर करना चाहा.

"हम्म… रघु तुमने सही कहा था, यहाँ कुछ है, जिसे में महसूस कर सकता हूँ, सुन सकता हूँ पर देख नहीं सकता, जब से यहाँ आया हूँ अजीब अजीब अनहोनी हो रही है, सच यहाँ कुछ अजीब है, कुछ ऐसा है जिसे इंसानियत का अंत नज़र आता है"

जावेद एक ही सांस में बोलता चला गया.

"मैंने तो आपको पहले ही कहा था साहब, यहाँ कोई बुरी शक्ति है, कोई बहुत बुरी जो नहीं चाहती की हम यहाँ काम करे, लेकिन अपने मेरी नहीं सुनी, यहाँ आकर ठीक नहीं किया साहब सच यहाँ से निकलना बहुत मुश्किल है"

बहुत धीमी आवाज़ में रघु ने कहा.

"लेकिन जब तुम्हें पता है, तो तुम यहाँ क्यों आए"?

"क्यों की में उस मौत से लड़ चुका हूँ साहब, मैंने सामना करा है उससे और मुझे कुछ मिला भी है, वहां पे"

रघु ने बोलते हुए जंगल के अंधेरी गहराई में अपनी उंगली से इशारा किया.

जावेद ने उसे तरफ अंधेरे जंगल में देखा और उसके दिमाग में वह सब कुछ आ गया जो उसके साथ थोड़ी देर पहले हुआ, जिसे सोचते ही उसकी रूह सहम गयी, जावेद को ऐसे सोच में पड़ता देख रघु ने सवाल किया.

"क्या हुआ साहब, क्या सोच रहे हैं”?

"बस वही सब सोच रहा हूँ, जो कुछ हुआ मेरे साथ, उसके बाद इस जंगल में जाने का सोच के ही"

जावेद ने अपनी बात यहीं खत्म कर दी.

"लेकिन साहब आप जानते हैं, की अगर यहाँ कुछ है, अगर कोई शैतानी रूह है तो उसके बिना मर्जी के आप यहाँ से नहीं जा सकते"

रघु ने डरे हुए जावेद को अपनी बात से और डरा दिया.

"मुझे मुख्तार साहब को बताना पड़ेगा की यहाँ कुछ है, यहाँ काम नहीं कर सकते, शायद सबकी जान को खतरा भी हो सकता है"

जावेद ने असमंजस में कहा,

“रघु मुझे यहाँ से फौरन निकल के मुख्तार साहब के पास जाना है, किसी भी तरह"

इस बार जावेद थोड़ी ऊंची आवाज़ में बोला

"फोन, साहब, आपके पास फोन तो होगा मिला लीजिए"

रघु ने जावेद का काम आसान कर दिया.

"हाँ राइट, फोन ये तो मेरे दिमाग में ही नहीं आया, बहुत बढ़िया रघु"

बोलते हुए जावेद अपनी जेब में फोन ढूंढ़ने लगा, उसके हाथ कांप रहे थे, डर चीज़ ही ऐसी है, हर छोटे काम को मुश्किल बना देती है, अक्खिर उसने अपनी जेब से फोन निकाला पर.....????
 
साथ बने रहने के लिए आप सब का बहुत धन्यवाद
 
पिशाच की वापसी – 10

“शीट, नेटवर्क नहीं है"

बोलते हुए जावेद जंगल से बाहर निकाला इस उम्मीद में की शायद सिग्नल मिल जाए, लेकिन बाहर निकल के भी सिग्नल नहीं आया, जावेद की परेशानी फिर बढ़ गयी,

"शीट, यहाँ भी नहीं है, रघु सिग्नल नहीं आ रहा है"

"साहब, मुझे वहां कुछ मिला भी है, आप चल कर देख लीजिए एक बार, क्या पता वहां आपको सिग्नल मिल जाए"

रघु ने वहीं खड़े आवाज़ लगाई.

"नहीं, रघु में वहां नहीं जाना चाहता, फिर से नहीं"

जावेद अपनी बात पे अटल रहा

"में समझता हूँ साहब, लेकिन मुख्तार साहब को सबूत दिखाना पड़ेगा उन्हें मनाने के लिए और शायद मुझे जो मिला है वह आपके काम आ जाए"

रघु ने आराम से समझाया.

"हाँ ये बात भी है, रघु ठीक कह रहा है, मुख्तार साहब को दिखाने के लिए सबूत चाहिये, हाँ पर, पर में दुबारा नहीं जाना चाहता, मुझे यहाँ से निकलना है, पर कैसे, कैसे निकलूं यहाँ से, शायद रघु के सहारे ही निकल पाऊ, हाँ, शायद मुझे रघु की बात माननी चाहिये"

जावेद कुछ मिनट अपने आपसे ही बातें करता रहा,

"ठीक है रघु चलो"

बोलते हुए उसने फोन पे टाइम देखा तो 3 बज रहे थे, फिर भारी मान से जंगल के अंदर उसे खामोशी भरे अंधेरे में खो गया.

कुछ देर दोनों यूँ ही चलते रहे, रघु आगे था और जावेद पीछे, दोनों में से किसी की कोई बात नहीं हुई कुछ देर, आख़िर चलते चलते काफी देर हो गयी तब जावेद अपने आप को नहीं रोक पाया.

“कितनी देर लगेगी हमें, बहुत देर से चल रहे हैं"?

"बस पहुंचने ही वाले हैं साहब"

रघु ने इतना कहा और एक बार दोनों चलने लगे.

"रास्ता खत्म क्यों नहीं हो रहा है, हम दोनों कब से चले जा रहे हैं"?

जावेद अपने आप से इतना ही कह पता है की तभी उसे कुछ महसूस होने लगता है, उसे बड़ी जलन सी होने लगती है, उसका बदन अजीब तरीके से हिलने लगा, चेहरे पे परेशानी सी आने लगी, उसे ऐसा लगने लगा मानो कोई चीज़ जल रही हो.

“आ… ये क्या हो रहा है.. बहुत जल रहा है आआहह"

फिर एक ज़ोर दार चीख उसके मुंह से निकली और उसने बिना वक्त गंवाए जल्दी से अपना पहना हुआ कोट उतार के नीचे फेंक दिया, उसकी साँसें तेज चल रही थी उसे अपने बदन के कुछ हिस्सों में जलन महसूस होने लगी, जब उसने अपनी अंदर पहनी हुई शर्ट हटाई तो देखा की उसके शोल्डर का कुछ हिस्सा जला हुआ है, वह इस बात को समझता की उससे पहले जब उसने सामने देखा तो उसका सारा दर्द गायब हो गया, सामने फेंका हुआ उसका कोट भल भला के जल उठा. तभी उसके सामने नज़र गई तो उसे रघु भी दिखाई नहीं दिया, वह कुछ कदम आगे चला ही की उसे.

"आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआअ……"

एक दर्दनाक आवाज़ कानो में पडी.

"ये तो रघु के चिल्लाने की आवाज़ है"

जावेद बुरी तरह से घबरा गया, उसे समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करना है."

"या अल्लाह मदद कर, कोई तो रास्ता दिखा इस मुसीबत से निकलने की, बक्ष दे अपने इस बच्चे को, कोई तो रास्ता होगा, फोन हाँ, फोन, फोन देखता हूँ"

जावेद ने अपने आप से कहा और जेब में से फोन निकाला, पर आज शायद अल्लाह की कोई रहमत नहीं थी, फोन में सिग्नल नहीं था.

“शीट, सिग्नल अभी तक नहीं मिल रहा है"

बोलते हुए जावेद ने अपने हाथ को झटका, तभी उसे कुछ महसूस हुआ, मानो उसने कुछ देखा हो और उसपर ध्यान ना दिया हो, उसने फौरन अपना फोन देखा, फोन की स्क्रीन को देखते ही उसकी रूह, उसकी अंतर आत्मा हिल गयी, जब फोन की स्क्रीन पे टाइम देखा तो उसेपर 2 बज रहे थे, जबकि वह जंगल में घुसा तब 3 बज रहे थे, वह आगे कुछ सोच पता की तभी उसे सामने से कुछ आता हुआ दिखाई दिया..

सामने से आती हुई चीज़ को देख के जावेद के हाथ से फोन गिर गया, सामने उस आग की रोशनी में जो अभी तक थी उस जॅकेट के जलने की वजह से उसे रोशनी में जो सामने जावेद ने देखा वह बस देखता ही रह गया, सामने से हवा में उड़ता हुआ रघु का शरीर उस की तरफ आ रहा था, जावेद वहां से हट पाता इतनी देर में वह शरीर उसके उपर आ गिरा, ढम्म्म्म ज़ोर से आवाज़ आई और दोनों ज़मीन पे गिरे हुए थे, एक पल के लिए जावेद की आँखें बंद हो गयी, उसने जैसे ही आँखें खोली तो उसके सामने रघु की लाश उसके उपर पडी थी, जिसका सर बीच में से कटा हुआ था, एक हिस्सा एक साइड पे तो दूसरा एक साइड पे था, अंदर के मास में खून रिस रहा था, इतना ही नहीं जावेद के देखते देखते उसे चेहरे से एक आँख निकल के नीचे गिर गयी, जिसे देख के जावेद अपनी चीख नहीं रोक पाया

"आआआआआआआआआ…."

चिल्लाता हुआ उसने लाश को साइड में फैंक दिया, वह उठता उससे पहले उस खामोश पड़े जंगल में फोन बज उठा.

जावेद फोन की आवाज़ सुन के चौंक गया, उसने फौरन फोन उठाया, देखा तो उसपर मुख्तार का नाम फ्लश हो रहा था, उसने बिना वक्त गंवाए आन्सर किया.

"हेलो, हेलो मुख्तार साहब, यहाँ बहुत बड़ी गड़बड़ है यहाँ कोई है, जो जो"

जावेद इतना ही कह पाया की दूसरी बढ़ से आवाज़ आई.

"कोई नहीं, में हूँ, में, खीखीखीखीखीखीखीखी"

भारी और भयानक आवाज़ जावेद के कानों में पडी जिसे सुन के उसका दिल धड़कना बंद हो गया और उसके हाथ से फोन नीचे गिर गया, उसके चेहरे से ये साफ हो गया था की अब उसे समझ आ चुका है की उसकी जिंदगी, शायद मौत में बदलने वाली है.

उसने लाश को साइड में फैंक दिया, वह उठता उससे पहले उस खामोश पड़े जंगल में फोन बज उठा.

"सिग्नल नहीं मिला, चचचच"

फिर से वह भारी खौफनाक आवाज़ सुन के जावेद का कलेज़ा मुंह को आ गया, क्यों की इस बार ये आवाज़ उसे बहुत करीब से महसूस हो रही थी.

जावेद ने घबराते हुए अपने पैर पीछे की बढ़ मोडे और पीछे का नज़ारा देख के उसके पैर लडखड़ा गये और वह नीचे गिर गया, आज से पहले ऐसा नज़ारा उसने सपने में कभी नहीं देखा था वह नज़ारा आज उसके सामने था, एक ऐसा खौफनाक दृश्य जो उस काली अंधेरी रात में और भी ज्यादा भयानक लग रहा था
 
साथ बने रहने के लिये आपका आभारी हूं
 
पिशाच की वापसी – 11

तभी वहां ज़ोर दार बिजली कड़कने लगी, कड़दड़…. कद्दद्ड…… कद्द्दद्ड…… कद्द्दद्ड……… कड़दड़…,

जिसकी रोशनी से जब सामने का दृश्य और ज्यादा चमका तो जावेद की रूह ने एक पल के लिए उसका साथ छोड ही दिया, सामने वह बीच में से कटे सर का शरीर खड़ा था बिलकुल उसेी स्थिति में जैसे वह कटा हुआ था, चेहरे का एक हिस्सा एक तरफ और दूसरा हिस्सा दूसरी तरफ, शायद सिर्फ़ दिखावे से संतुष्टि नहीं मिली की उसने अपनी खौफनाक हँसी को उस जगह में फैला दिया.

"आआआहा.आहहा..अहहा….."

वह भयानक हँसी उसके उसे कटे हुए चेहरे पे इतनी खौफनाक नज़र आ रही थी की जावेद ने अपनी आँखें बंद कर ली, उसके वह आधे होंठ एक तरफ हंसते हुए नज़र आ रहे थे तो सेम दूसरी तरफ भी ऐसा ही था, उसके बाद कुछ पल के लिए शांति हो गयी, जावेद को तो मन ही मन लग रहा था की किसी भी पल उसपर हमला होगा और वह आखिरी साँसें गिन रहा होगा, लेकिन जब कुछ पल के लिए कुछ नहीं हुआ तो उसने आँखें खोली, पर कोई फर्क नहीं था वह भयानक मंजर वैसे ही था, बल्कि अब और भयानक होने जा रहा था.

सामने खड़े उसे शरीर ने अपने हाथ धीरे धीरे उपर उठाने शुरू किए और अपने चेहरे के दोनों अलग हिस्से पे ले आया, और धीरे धीरे उन हिस्सों को पास लाने लगा, कुछ ही सेकेंड में वह दोनों आपस में मिल गये और जुड़ गये, जावेद ये दृश्य देख के बेहोश होने ही वाला था की तभी पास में पड़ा उसका फोन बज उठा, लेकिन जावेद तो अपनी ही दुनिया में था वह दृश्य देखने के बाद, आँखें खुली थी, दिल चल रहा था, पर उसकी रूह कहीं और ही थी, लेकिन तभी

"उठा ले फोन क्या पता मुख्तार का हो आआहाहा…अहहहः"

सामने खड़े रघु के शरीर ने फिर से भयनक आवाज़ में हंसते हुए कहा, जावेद अपनी दुनिया से बाहर आया और कुछ सेकेंड वह पहले सामने खड़ी अपनी मौत को देखता रहा फिर उसने मोबाइल की तरफ देखा जो उसके बगल में ही गिरा हुआ था और वह बज रहा था, उसने अपने कपकपाते हुए हाथ से फोन को उठाया, उसने सबसे पहले सिग्नल देखा जो की फूल था फिर नाम देखा जो अननोन था, उसका हलक सुख रहा था, जावेद ने अपने काँपते अंघुटे से अन्सर कॉल को स्लाइड किया और अपने कान से लगाया.

"हेलो, जावेद साहब, आप ठीक है ना, साहब, मेरी मानिए वहा उस जगह पे मत जाना, नहीं जाना साहब"

दूसरी तरफ से आवाज़ आई, जिसे सुन के जावेद बच्चों की तरह रोते हुए जवाब देने लगा.

"रघु, रघु तू ही है ना, मुझे बचा ले रघु मुझे बचा ले, में मरना नहीं चाहता बचा ले मुझे"

"साहब आप चिंता मत कीजिए, आपको कोई तकलीफ नहीं होगी, अभी कुछ देर पहले ही मुझे मौत मिली है अब आपको वह मौत मिलेगी"

सामने से जब ये बातें सुनी तो जावेद ने फोन कोन से हटा लिया, फोन पे वक्त देखा तो उसमें 3 बज रहे थे, फोन हाथ से गीर गया, और जावेद सामने खड़े उस रघु के शरीर को देखने लगा, उसे सब कुछ समझ में आ गया की ये वक्त का क्या खेल हुआ अभी अभी, रघु कभी उसके साथ आया ही नहीं, वह ही शैतान ही था जो हर वक्त उसके साथ था, वह रघु था जो 2 बजे मरा.

“खीखीखीखीखी"

सामने वह गर्दन उठा के ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा, इस हँसी को देख कर अब जावेद समझ गया की उसका ये आखिरी वक्त है, लेकिन वह मरना नहीं चाहता था, कोई इंसान ऐसे मरना नहीं चाहेगा जिसके मरने का किसी को कुछ पता भी ना चले.

"मुझे मत मारो, में तुम्हारे हाथ जोड़ता हूँ, क्यों मारना चाहते हो मुझे, क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा"

अक्सर इंसान मरने से बचने के लिए ये करता है, फिर उसकी मौत कोई इंसान ले रहा हो या फिर कोई शैतान, जो इस वक्त जावेद कर रहा था.

"मौत से क्या घबराना, मौत में जो मजा है वह मजा तो जिंदगी भी नहीं देती"

भयानक आवाज़ में उसने अपने कटे फटे होठों से कहा.

"लेकिन, लेकिन इंसान को मार के क्या मिलेगा, क्या कहते हो तुम"

जावेद फिर से गिड़गिडया.

"क्यों की मुझे वह चाहिए, चाहिए वह मुझे"

भयानक पिशाच से निकलती भयंकर आवाज़ ने जावेद को तो हिला के रख दिया साथ साथ वहां का वातावरण बदल गया, पेड़ तेजी से हिलने लगे, आसमान में बादल इकट्ठा होकर आपस में लड़ने लगे, ज़ोर ज़ोर से बिजली कड़कने लगी.

जावेद उसकी बातों को समझ नहीं पा रहा था, वैसे भी मौत और डर ने उसको घेर लिया था.

"ये जगह मेरी है, ये ज़मीन मेरी है, ये आसमान मेरा है और जल्द ही में इंसानियत का नाश कर के इस पूरे ब्रम्हांड को शैतान का घर बनाउंगा, शैतान का घर आहहहहहााआ..आ…."

जावेद ने जब उस शैतान की इस आवाज़ को सुना तब वह समझ गया की उन्होंने कितनी बड़ी गलती की है और इंसानो के उपर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जो शायद पूरी इंसानियत के लिए घातक होगा.

जावेद अपनी जगह पे खड़ा हुआ, जैसे ही खड़ा हुआ उपर से कुछ उसके सामने आ गिरा, वह थोड़ा घबराते हुए पीछे हो गया,

"आअहह"

उसके मुंह से डर की चीख निकल गयी, जैसे ही उसने सामने का नज़ारा ढंग से देखा तो उसको उबकाई सी आ गयी, सामने रघु की असली लाश उल्टी लटकी हुई थी, उसके पेट में से उसकी अंतड़ियां बाहर निकली हुई थी, गला कटा हुआ था उसेमें से खून बह रहा था, उसकी रिब्ब्स उसके शरीर से बाहर निकल रही थी, और उसकी आँखों में से खून निकल रहा था, तभी सामने से वह पिशाच चल के आया और उसने अपने बड़े बड़े नाखून से रघु के शरीर में से उसकी निकली अंतड़ियां बाहर निकली और उसे चबाने लगा, जावेद ये सब देख के अपने आप को रोक नहीं पाया और उसने वहां उल्टी करनी शुरू कर दी, फिर जब उसने सामने देखा की वह शैतान खाने में लगा हुवा है, उसने वहां से भागने की सोची, पर वह जैसे ही आगे थोड़ा निकला, उसके कानों में वही शैतानी पिशाच की हँसी पडी.

"खीखीखीखीखीखी, जब तक में ना कहूँ, तब तक यहाँ से कोई नहीं जा सकता"

उस रूह ने अपनी भारी आवाज़ में एक बार फिर से कहा, जिसे सुन के जावेद वहां रुक गया और पीछे घूम के उस शैतानी पिशाच को देखने लगा, दोनों एक दूसरे के आमने सामने खड़े थे.

"में इस धरती का सब कुछ हूँ, में हूँ अब इस धरती का मालिक, में, आआहाहहाः"

हाथ फैला के भारी आवाज़ में उसे पिशाच ने गुराते हुई कहा, और उसके गुराते ही आसमान में लड़ रहे बादलो ने दम तोड़ दिया और उसमें से बहता पानी धरती पे जोरों से गिरने लगा, एक ही पल में वहां ज़ोर से बारिश शुरू हो गयी.

"उपर वाले की ताक़त से बड़ा कोई नहीं होता इस पूरे ब्रम्हांड में"

जावेद ने बहुत ठहरे हुए लबज़ों में कहा, मानो डर उसके शरीर से खत्म ही हो गया हो.

"जो कुछ भी है सिर्फ़ में हूँ, सिर्फ़ में, आज तू अपनी मौत के सामने खड़ा है, अगर मेरे से बड़ा कोई है तो तुझे बचा के दिखाए"

बोलते हुए वह पिशाच धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा, और जावेद ने आज फिर कुदरत की शैतानी ताक़त को देखा, आगे बढ़ते बढ़ते उस पिशाच का शरीर जो इस वक्त रघु का था, वह धीरे धीरे बदलते हुए जावेद का हो गया.
 
साथ बने रहने के लिये आप सब का आभारी हूं
 
पिशाच की वापसी – 12

"तुम इंसान कुछ नहीं बिगाड़ सकते मेरा, कुछ नहीं"

भारी आवाज़ में बोलते हुए उस पिशाच ने अपना हाथ उपर किया और उसने ऐसे ही इशारा किया मानो अपने नाखून से कुछ कुरेद रहा हो, हुआ भी यही जैसे ही उसने हाथ से इशारा किया वैसे ही जावेद के हाथ उसके गले पे चले गये, उसकी आँखें बाहर निकलने को हो गयी, उसके हाथ के पीछे से खून की धारा बहने लगी, जावेद को सांस लेने में तकलीफ होने लगी,

वह पिशाच आगे बढ़ता जा रहा था, उसने अपने हाथ से एक बार फिर इशारा किया और जावेद के ठीक पीछे ज़मीन से मिट्टी हटने लगी और कुछ ही सेकेंड में एक गहरा गढ़ा बन गया, फिर उसे रूह ने हाथ से एक ऐसा इशारा किया मानो धक्का दिया हो, जावेद सीधे उसे गढ्ढे में जा गिरा.

“आआआआहह"

उसके मुंह से एक जोरदार चीख निकली, जावेद पीठ के बाल उसे मिट्टी के गढ्ढे में गिरा हुआ था और उसके गले से खून बह रहा था, बारिश का पानी उस गढ्ढे में भरने लगा, जावेद की आँखें आधी खुली हुई थी, उसे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी, उसकी आँखें बंद होती उससे पहले उसने उस काले साये को देखा जो हवा में उड़ता हुआ आया और सीधे जावेद के घुटनों पे जा गिरा …

तड्द्ड़…तद्द्द्द्द्द्दद्ड.. कर के जावेद की हड्डियाँ चूर चूर हो गयी और उसके मुंह से एक ज़ोर दार चीख निकल पडी, उसका चेहरा ज़मीन से काफी उपर उठ गया, आँखों से आँसू निकल के साइड में गिरने लगे.

"ये वक्त मेरा है, तुम इंसान मेरे गुलाम हो गुलाम"

वह पिशाच एक बार फिर अपनी उस खौफनाक आवाज़ में चिल्लाया और आसमान में एक बार फिर बिजली ने कड़कड़ाना शुरू कर दिया, उसने हाथ से इशारा किया और एक साथ ढेर सारेी मिट्टी उसे गढ्ढे में भरने लगी, जावेद का शरीर मिट्टी में धसने लगा वह अपनी गर्दन उपर कर रहा था जिससे सांस ले पाए, उसकी आँखें आधी खुली थी जिसमें वह उस पिशाच को थोड़ा थोड़ा देख पा रहा था, मौत उसके करीब थी, दहशत उसकी आँखों के सामने था लेकिन फिर भी जबान पे वह अनमोल शब्द थे,

"अल्लाह बक्श देना इसे"

जावेद इतना ही कह पाया की उस रूह ने अपना हाथ उठाया और जावेद की छाती के बीचों बीच घुसा दिया जावेद की साँसें वहीं रुक गयी, लेकिन भड़के हुए पिशाच को अभी कुछ और चाहिए था, उसने अपने हाथ को पीछे खिच के उस छाती के मास को फाड़ डाला और अपना हाथ डाल के उसमें से जावेद के लंग्ज़ को उखाड़ के बाहर निकल लिया.

"याआआआआआअ…. अहहहहहहा, अल्लाह से बड़ा है शैतान, शैतान अहाहाहहाह... में आ गया हूँ वापिस, हा, आ गया हूँ में, आहाहहा..."

वह आसमान की तरफ देख के गुर्राता रहा, उसकी आवाज़ में एक खौफ था, एक गुस्सा था और एक संदेश था की इंसान अब शैतान का गुलाम बनेगा, उस गढ्ढे में पानी और मिट्टी भरती गयी, और कुछ ही पलों में वहां कुछ नहीं बचा ना ही जावेद और ना ही वह पिशाच..

"खीखीखीखीखीखीखीखीखी"

बारिश की हँसी के साथ उस पिशाच की आवाज़ पूरे जंगल में गूँज उठी, शायद ये हँसी आने वाले वक्त में तड़पते हुए इंसानो की मौत की हँसी थी.

पिंक सूट में भागती हुई वह सीडिया चढ़ रही थी, हाथों में पहनी चूड़ियां भागने की वजह से छन छन कर रही थी, उसके सूट की चुन्नी नीचे ज़मीन पे घिसती हुई जा रही थी, चेहरे पे मासूमियत बिखर रही थी लेकिन साथ ही साथ उसपर चिंता और परेशानी की लकीरें भी थी, भागती हुई वह एक कमरे के सामने रुकी जिसका दरवाजा बंद था, उसने अपने काँपते हुए हाथ आगे बड़ा के डोर को खोला, डोर खुलते ही अंदर से एक नर्स उसकी तरफ देखती हुई बाहर निकल गयी, उसने सामने देखा तो पलंग पे वह सो रही थी बड़ी शांति से, मानो दुनिया की कोई खबर ही ना हो, उसकी आँखें बंद थी, चेहरे पे ऑक्सिजन मास्क लगा हुआ था, डोर से सामने का नज़ारा देख के उसकी आँखों से आँसू की बूंदे बाहर छलक आई, धीरे धीरे कदमों से वह रूम में एंटर हुई और बेड के पास आकर बैठ गयी…..

उसने अपने हाथ आगे बढाये और उसके माथे पे रख के उसने अपनी प्यारी सी बेहद धीमी आवाज़ में उसका नाम पुकारा.

"नीलू “………. अंशिका ने नीलू के माथे पे हाथ फेरते हुए कहा, कुछ सेकेंड बाद नीलू ने धीरे धीरे आँखें खोली और अंशिका की तरफ देख के मुस्कुराईं, अंशिका भी उसे देख के मुस्कुराईं पर उसके चेहरे पे अभी भी एक परेशानी, दुख दिखाई दे रहा था.

"नीलू सब ठीक हो जाएगा, प्लीज़ तुम हिम्मत रखो"

बोलते हुए अंशिका का गला भारी हो गया.

अंशिका की बात सुन के नीलू की आँखों से आँसू निकल के साइड से होता कहीं खो गया, नीलू ने अपने काँपते हाथों से फेस पे लगा मास्क हटा दिया.

"हा……."

नीलू ने एक गहरी सांस ली और फिर अंशिका को देखती हुई उसके चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आ गयी.

"अंशिका"

नीलू ने इतना ही कहा की उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी,"

"नीलू, डॉक्टर..!!

अंशिका चिल्लाई.

"नहीं, नहीं प्लीज़ अंशिका अब नहीं, मुझे तुझसे ही बात करनी है, ज्यादा टाइम नहीं है मेरे पास"

बोल के नीलू अंशिका को घूरने लगी, अंशिका के कानों में नीलू की कही हुई बातें घूमने लगी

"नहीं नीलू ये क्या बोल रही हो, तुम्हें कुछ नहीं होगा प्लीज़ ऐसा मत बोलो"

बोलते हुए उसने नीलू का हाथ पकड़ लिया, उसकी आँखों से आँसू एक बार फिर बाहर आने लगे.

"नहीं अंशिका, शायद ये सही वक्त है, वह मुझे याद कर रहा है बहुत और उसे ज्यादा में..."

बोलते हुए उसे प्यारे चेहरे पे दुख की परछाई छा गयी और आँखों से वह प्यार के कुछ अनमोल याद बाहर आ गयी, शायद दुख था, बिछड़ने का.

"नहीं नीलू वह कभी नहीं चाहेगा, की तू उसके पास आये, हि ऑल्वेज़ वांटेड यू टू बी हॅपी, प्लीज़ तू ऐसा मत कर, प्लीज़ हम सब का क्या होगा नीलू प्लीज़"

रोते हुए अंशिका ने नीलू को समझाया.
 
पिशाच की वापसी – 13

"हम दोनों ध्यान रखेंगे सबका, में और नहीं सहन कर सकती ये तन्हाई, मेरा दिल बिखरता जा रहा है अंशिका में क्या करूँ, में क्या करूँ"

नीलू ने बोलते हुए आँखें बंद कर ली, आँखों से उन कीमती यादों को बाहर निकालने में उसे बेहद तकलीफ हो रही थी.

"हम है तुम्हारे साथ, प्लीज़ अपने आप को संभालो, सब ठीक हो जाएगा"

अंशिका का गला भारी हो गया था, उसकी प्यारी सी आँखें असीम दुख को बाहर निकाल रही थी, कुछ देर वह बस ऐसे ही नीलू के माथे को सहलाती रही, कमरे में सिर्फ़ उन मशीनो की आवाज़ आ रही थी जो लगी हुई थी, पर तभी नीलू ने आंखें खोली.

"मुझसे वादा कर अंशिका, प्रॉमिस कर, उसे कभी पता नहीं चलना कहिए की क्या हुआ हमारे साथ, उसपर कभी उसका असर नहीं पड़ने देगी, उसे कभी नहीं पता चलने देगी की वह कौन है, में कौन हूँ, उसको इस जगह से इतनी दूर ले जाना की कभी इस जगह का जिक्र ना हो, मुझे प्रॉमिस कर अंशिका, प्लीज़, प्लीज़.."

बोलते हुए नीलू का गला भारी होने लगा.

"नहीं नीलू, में नहीं कर सकती, प्लीज़, मेरे पास इतनी ताक़त नहीं है"

अंशिका ने अपनी गर्दन ना में हिलाते हुए कहा,

"तुम्हें कुछ नहीं होगा, यू हॅव टू लाइव, तुम ऐसा नहीं कर सकती"

अंशिका ने नीलू को देखते हुए कहा.

"तुम्हें मुझसे ये प्रॉमिस करना होगा, उसके लिए अंशिका, उसके लिए, जिसने तुम्हें अपनी जिंदगी बनाया, उसके लिए, जिसे तुम प्यार करती थी, प्रॉमिस करो मुझसे"

नीलू ने अंशिका की तरफ अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया, अंशिका उसे देखते रोती रही, कुछ कह नहीं पाई, बस उसने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया और नीलू के हाथ के उपर रख दिया, एक ऐसा वादा ले लिया जिसे अब उसे निभाना था, दोस्ती के लिए, प्यार के लिए, खुशी और जिंदगी के लिए.

"में प्रॉमिस करती हूँ नीलू, में प्रॉमिस करती हूँ, कभी कुछ नहीं पता चलेगा, कभी कुछ नहीं"

बोलते हुए अंशिका आगे बड़ी और उसने नीलू के माथे पे अपने होंठ सजा दिए, शायद आखिरी कुछ पल बेहद प्यारे होते हैं किसी अपने के साथ के, अंशिका जानती थी की आने वाले कुछ ही पलों में क्या होगा.

नीलू ने अपनी आँखें बंद कर ली,

"में आ रही हूँ ‘हर्ष’, आ रही हूँ में तेरे पास हमेशा के लिए, आ रही हूँ आअ"

एक लंबी सांस भरते हुए नीलू ने अपनी आँखें नहीं खोली.

"नीलुऊऊ……."

रोते हुए अंशिका ज़ोर से चिल्लाई, नीलू को हिलाने लगी, लेकिन उसे पता था इस प्यार के आगे जिंदगी नहीं रही.

"अंशिका"कमरे के डोर पे खड़े होकर उसने आवाज़ लगाई, अंशिका फौरन पीछे मुड़ी और उसे देखकर भागते हुए उसके गले जा लगी.

"सीड, नीलू आह… नीलू"

अंशिका इतना ही कह पाई और फिर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी.

सीड भी सामने देख रहा था, जहाँ नीलू निढाल पडी थी, आँखें बंद कर के एक बहुत गहरी नींदमें, एक ऐसी नींद जहाँ से कोई उठ के वापिस नहीं आता, सीड की आँखों से भी आँसू छलक आए और उसने अंशिका को और कस के अपने में समेट लिया.

“चाहती बहुत हूँ तुझे इसलिए ये जिंदगी भी बेकार लग रही है, प्यार को मिलने में आ रही हूँ, जिंदगी को छोड के"

नीलू की डायरी में आखिरी लाइन लिखी हुई थी जो साइड में रखी टेबल पे खुली हुई थी.

2 साल बाद ………….. साल 2010

सुबह हो चुकी थी, बिती रात जो भी हुआ, उसके बारे में शायद ये कुदरत ही जानती थी, उसके अलावा कोई नहीं, वक्त ने माहौल अभी भी वैसा ही बना रखा था, बिलकुल खामोश, जैसे कुछ ना हुआ हो, ऐसी खामोशी बहुत बड़ी तबाई को दस्तक देती है.

मौसम खामोश था और वहां खड़े लोग भी खामोश थे, मुख्तार खड़ा था हाथ में हाथ बांधे चेहरे पे उसके टेन्शन थी, उसके सामने कुछ मजदूर खड़े थे, कुछ इंजीनियर खड़े थे.

"क्या करना है साहब"

उनमें से एक ने कहा.

"देखो, काम तो बंद नहीं होगा, तुम नहीं करोगे कोई और करेगा, पर में तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ की घबराने वाली बात नहीं है, किसी भी मजदूर को कुछ नहीं होगा, यहाँ कोई आत्मा वातमा नहीं है, सुना तुम सब ने, यहाँ कुछ नहीं है"

मुख्तार चील्लाते हुए बोला, उसकी आवाज़ पूरी जगह पे गूंजने लगी.

उसके इतना कहते ही, अचानक से हवा चलने लगी, पेड़ हिलने लगे और उसे हवा में कुछ अजीब सी आवाज़ थी, मानो कुछ कहना चाहती हो.

"सुना साहब अपने, सुना, ये आवाज़ हवा में कुछ कहना चाहती है, मेरी बात मानिए साहब यहाँ....”

"चुप रहो तुम"

मुख्तार गुस्से में बोला,

"कुछ नहीं है ऐसा यहाँ, हवा में कुछ है क्या है इस हवा में, ब्लडी ईडियट्स..!"

गुस्से में मुख्तार चिल्लाया.

"अगर कुछ नहीं है तो फिर रघु और जावेद साहब कहाँ गायब है, क्यों नहीं आए वह दोनों"

उनमें से एक ने कहा.

"जावेद को जरूरी काम से शहर जाना पड़ा, रही बात तुम्हारे रघु की तो वह भघोड़ा निकला भाग गया कल रात ही, ये शहर छोड के"

मुख्तार ने भड़कते हुए एक बार फिर कहा.

“देखिए आप सब, यहाँ डरने की जरूरत नहीं है, आप सब अपने अपने काम पे लग जाए, हमें ये काम वक्त पे पूरा करना है “

वहां खड़े एक इंजीनियर ने सबको समझाया.

"ये आप बहुत गलत कर रहे हैं मालिक, यहाँ कोई पिशाच बस्ती है, ये आप अच्छी तरह जानते है, अगर अभी भी काम नहीं रुका तो ना जाने कितना खून बहेगा, फिर उस खून का हिसाब कोई नहीं रख पायेगा आप भी नहीं, क्यों की शायद आप भी ना बचे"

उनमें से एक मजदूर ने गुर्राते हुए कहा.

मुख्तार कुछ नहीं बोला बस उसे देखता रहा और फिर अपनी गाड़ी में बैठ के वहां से निकल गया.

"देखो मुझे हर बात की खबर चाहिए, कौन क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है, हर एक डिटेल मुझे चाहिए समझ रहे हो ना तुम सब"

मुख्तार अपने सामने खड़े कुछ आदमियो से बातें कर रहा था.

"जी सर, आप बेफिक्र रहिए"

"एक बात और जो सबसे ज्यादा जरूरी है, कोई भी घटना घटती है, या कोई भी मौत होती है तो उसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए, कुछ भी नहीं"

मुख्तार ने गंभरी चेहरा बनाते हुए कहा.

"जी सर, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा"

इंसान जितनी चाहे कोशिश कर ले बचने की, वक्त हर मुसीबत का सामना करा ही देता है, पर शायद वक्त ने एक बदलाव ले लिया था, कुछ दिन काम बिना किसी रुकावट के बढ़ता जा रहा था, पर एक दिन का काम तीन दिन में पूरा हो रहा था, उसके पीछे कुछ वजह थी, पहली वजह ये की काम का समय सिर्फ़ 12 से 4 बजे तक हो पा रहा था, क्यों की उसके बाद ठंड उस जगह पे ऐसे पड़ती थी की वहां खड़ा होना लगभग नामुमकिन सा होने लगा था, उसके अलावा एक बहुत ही अजीब से हादसे हो रहे थे, जिसका कोई इंसानी तालूक़ तो नहीं था, पर इसे कोई दूसरा नाम भी नहीं दे सकते थे, हादसों में कई बार कोई मजदूर अपनी शकल का दूसरा आदमी देख लेता जो उसके साथ ही कम कर रहा होता था, किसी भी इंसान के लिए ये एक बेहद डरावनी बात होती है जब वह खुद पहले से डरा हुआ हो, कभी कभी काम करते करते मजदूर ज़मीन पे गिर जाता और अजीब अजीब सी आवाज़ निकालने लगता अपने आप को नोचने लगते, इसमें कुछ मजदूर घायल भी हुए, पर मुख्तार ने बात को हमेशा दूसरी तरफ मोड़ के उसे खत्म कर दिया, पर एक दिन....
 
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