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लेखक:-लीलाधर
सुबह की स्वच्छ ताजी हवा में गुलाब के ताजा फूलों की खुशबू फैल रही थी। शहर के कोलाहल से दूर प्रदूषणमुक्त शांत वातावरण में फूलों की सुगंधभरी ताजी हवा में घूमते हुए मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। हर तरफ गुलाब फैले थे भाँति भाँति के- लाल, गुलाबी, काले, बैंगनी, उजले… !
मैं उनके कलेक्शन की मन ही मन तारीफ करता क्यारियों के बीच काँटों से सावधानी से बचता घूम रहा था। पुष्पा थोड़ी दूर पर बाड़ के पास फूल तोड़ रही थी।
पुष्पा के पिताजी का बड़ा सा फूलों का बाग था, शहर के नजदीक ही एक गाँव में। वे फूलों की खेती करते थे। मैं छुट्टियों में वहाँ घूमने आया था। पुष्पा ने मुझे बुलाया था, ”आकर कभी मेरा बाग देखो। बहुत अच्छा लगेगा।”
उसने गलत नहीं कहा था। मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा था। और फूलों की क्यारियो के बीच स्वयं फूल-सी खिली पुष्पा भी मुझे कम अच्छी नहीं लग रही थी। मैं भौंरे-सा उसके आकर्षण में घूम रहा था।
मैं घूमता घूमता उसके पास पहुँचा। वह कुशलता से काँटों से बचती हुई फूलों को डंठल से नीचे पकड़कर कैंची से काट लेती। मुझे पास आता देखकर उसके चेहरे पर एक गर्व और खुशी का भाव चला आया।
“बड़ी कुशलता से तोड़ती हो। काँटे नहीं चुभते?”
वह कुछ नहीं बोली। बस गर्व से मुस्कुराई।
मुझे उसका घमण्ड अच्छा लगा। काश, मैं इसे ही तोड़ लेता।
“मैं भी तोडूँ?”
“काँटे चुभेंगे !” उसकी आवाज में गर्व था।
“मुझे परवाह नहीं !”
“अच्छा!” उसने मुझे देखकर भौंहें उठाई,”लेट मी सी?” उसने अंग्रेजी में कहा। कैंची नहीं दी।
मैंने हाथ बढ़ाया और बहुत बचाकर एक डंठल को तोड़ने की कोशिश की। डंठल टूटकर टेढ़ी हो गई मगर डाल से अलग नहीं हुई। उसे अलग करने के लिए टूटी डंठल को घुमाया।
“जानते हो !” उसने कहा।
थोड़ी कोशिश से डंठल टूट गई मगर हाथ में काँटों की खरोंच लग ही गई। एक-दो पंखुड़ियाँ भी झटकने में टूट गईं। मैंने फूल उसके हाथ में दे दिया।
“देखा?” उसने खरोंच में जमा होते खून की बूंद को देखते हुए कहा।
उसने टोकरी में से छोटे-से डिब्बे से डेटाल भीगा रूई का फाहा निकाला और उससे खरोंच का लहू पोंछते हुए दबा दिया। वह डेटाल भीगा फाहा छोटी सी शीशी में साथ रखती थी। मैं उसके झुके सिर को, एक से मेरा हाथ पकड़े दूसरे से जख्म पर रुई घुमाते उसके गोरे नाजुक हाथों को देखता रहा।
“मगर …” मैंने बात आधी छोड़ दी। उसने उत्सुकता से मेरी ओर देखा।
“मैं तो एक खास फूल तोड़ना चाहता हूँ।” मैंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए पूरा किया।
उसके चेहरे पर क्षणमात्र के लिए एक अजब-सा भाव आया। बात को कुछ ताड़ती हुई-सी प्रतीत हुई। मैंने उसके प्रश्नवाचक चेहरे पर से दृष्टि हटाकर सर से पाँव तक नजर दौड़ाई और उसकी आँखों में देखते हुए आगे कहा,”अगर वह इजाजत दे तो !”
वह समझ गई। मगर लजाकर या घबराकर दृष्टि नहीं हटाई। वह निडर थी। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगती थी।
“कितने फूल तोड़े हैं अब तक?” उसने कुछ ठहर कर पूछा।
“झूठ नहीं बोलूँगा ! सिर्फ एक ! मगर यह फूल बहुत खास है।”
उसे झूठ से नफरत थी। सच सुनना पसंद करती थी। कड़वा हो तो भी। फिर उसी कॉलेज में तो पढ़ती थी।
“उससे भी यही कहा होगा, “यह फूल बहुत खास है।” वह कुछ मजा लेती, कुछ मजाक उड़ाती बोली,”फुसलाने का पुराना तरीका है।”
“नहीं पुष्पा, यह सच नहीं। मैं पहले भी झूठ बोल सकता था मगर ऐसा नहीं किया। सचमुच यह फूल बेहद खास है। औरों से अलग ! दुर्लभ है।”
प्रशंसा से वह प्रसन्न हुई। कुछ मूड में आ गई।
“क्या खास है इसमें?” कुछ मजा लेते हुए बोली।
वह गर्व भरी नजरों से फूल को देखते हुए उसे अपनी चुटकी में घुमा रही थी, अपनी तारीफ सुनना चाह रही थी। मैंने अपना दाँव खेला।
“यह अगर उसकी इजाजत मिले तभी बताऊँगा।”
“इजाजत है !” उसने बात को हँसी में उड़ाते हुए कहा।
“सच? क्या मुझे फूल तोड़ने की इजाजत है?” मैंने भी उसी अंदाज में उसके टालने की कोशिश को व्यर्थ करते हुए कहा।
अब वह मुश्किल में थी। इस बात को हँसी में उड़ाना कठिन था। वह गंभीर हो गई।
यही सही समय था अगला वार करने का, मुझे उसके मजबूत स्वभाव का भरोसा था, मैंने उसके हाथ के फूल पर अपनी हथेली रखकर दूसरे हाथ से उसकी हथेली को नीचे से सहारा देते हुए कहा,”सच पुष्पा। यकीन मानो। यह साधारण नहीं। इसका सौंदर्य, इसका रूप, इसकी महक, इसका सब कुछ अतुलनीय है। यह बहुत भाग्य से पाने लायक है।”
उस पर प्रशंसा का असर हो रहा था। उसे तारीफ अच्छी लगती थी। मुस्कुराने की कोशिश की।
“क्या करोगे इसका? तुम इसे सूंघकर छोड़ दोगे। मैं ऐसी … ” बोलते बोलते रुक गई।
अनजाने में ही वह फूलों के बहाने को छोड़कर सीधे अपने बारे में बोलने लगी थी।
मैंने अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहा,”भगवान कसम, दिल में बसा कर रखूँगा।”
“यह काफी नहीं।”
मैंने उसके हाथ से गुलाब का फूल लेकर अपनी कमीज के बटन में टाँक लिया।