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मैंने उसे अपने से सटाकर ढांढस देने की कोशिश की। डरो नहीं, कुछ नहीं होगा……. मैंने उसके गले के नीचे अपना गाल रख दिया, खुद भी आश्वस्ति की तलाश में। उभार के ऊपरी हिस्से के नीचे उसका दिल जोर जोर धड़क रहा था। मैंने मुँह उठाकर उसकी ठुड्डी को चूमा और दाएँ स्तन को हाथ से ढक लिया। चुचूक की नोक खड़ी थी। मैंने उसे हथेली में दबाकर स्तन को हौले हौले मसला। उसकी नोक गुदगुदी कर रही थी। मेरे कान के पास उसकी हल्की कराह गूंजी।
मुँह उठाकर मैंने उसके गर्म साँस निकालते होठों पर सीधी मुहर लगाई और चूमते हुए नीचे उतरने लगा। कोमल मांस के नीचे कठोर ठुड्डी, ठुड्डी से नीचे उतरकर त्वचा का कोमल पर्दा, कंठ पर मेरे होठों के नीचे उसके गटकने की मीठी हरकत।
आऽह… आऽह की धीमी कराहटें… गला, कॉलर बोन। नीचे… और थोड़ा नीचे…. उभारों की मांसलता की शुरुआत….गुदगुदे मांस पर धँसते होंठ… पसली के नीचे दिल की फक फक …. उसकी तेज होती साँसों की गूंज… होंटों के किनारे पर रबर-सी लचीली स्तन की कली की छुअन…. उत्कण्ठा में उसकी अटक गई सांस … अब … अब …
और मैं उसे छकाता हुआ चूचुक के बगल से गुजरकर नीचे की सतह पर आ गया। उसकी ठहरी साँस निकली मगर कुंठित होकर उसने मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। टीस में मैंने उसके हाथ के नीचे दबे स्तनाग्र को चुटकी में पकड़कर दबा दिया।
ओह … उसके मुँह से निकला। छटपटाकर उसने मेरे हाथ को वहाँ से खींच दिया। मैंने उसे संभलने का मौका दिए बिना दूसरे स्तन में दांत गड़ा दिए। सी…ऽऽऽऽ… वह सिसकारी भर उठी।
इस खेल में अब वह गर्म हो रही थी। उसने मेरा सिर खींचकर चूची के ऊपर मुँह लगाने की कोशिश की और मैंने कृपा करते हुए उसकी इच्छा का पालन किया।
“हाँ…” उसके मुँह से निकला। चैन के एहसास के साथ उसने मेरा सिर अपने स्तन पर दबा लिया और मेरे सिर पर हाथ फिराने लगी।
मैं उसे बच्चे की तरह चूसने लगा। एक गर्माहट और सांत्वना का अजब एहसास मुझमें जागने लगा। स्तनों की तृप्तिदायी गंध में घिरकर मुझे अपने भीतर कुछ हल्का महसूस होने लगा। इतनी देर से मानो किसी घमंड, किसी बदले की भावना, कुछ दिखाने के भाव से संचालित था, अब उसका स्थान किसी निस्वार्थ अपनेपन, किसी कृतज्ञता ने ले लिया।
वह मेरे सिर पर हाथ फेर रही थी और मैं किसी अनजानी क्षुधा को चूचुक को खींच खींचकर चूसकर शांत कर रहा था।
कुछ पलों में उसने मेरा मुँह वहाँ से हँटा दिया और मैं स्वचालित दूसरे स्तन पर लग गया। कभी अग्र भाग को होठों से दबा देता और कभी उसे मुँह के भीतर लिए लिए उसकी नोक पर जीभ की खुरदरी नोक से गुदगुदी करता।
उसके मुँह से निकलती सिसकारियाँ, आनंद में डूबी हँसी… सिर पर घूमता हाथ मुझे उत्साहित कर रहे थे और बता रहे थे कि मैं ठीक जा रहा था। मुझे अपने पुरुष होने पर गर्व हुआ। मैं उसे संचालित कर रहा था। वह चाहे लाख अकड़ वाली लड़की हो, इस वक्त वह नन्नावस्था में मुझसे अपने स्तन चुसवा रही थी, मेरी हरकतों पर कठपुतली-सी नाच रही थी। मैं उसे चलाए गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा था।
गंतव्य?….. मुझे याद आया… ‘पुष्पा का पुष्प’।
मैंने दाएँ स्तन पर से हाथ हटाकर नीचे टटोला। उसकी पैंटी गीली हो रही थी। उंगलियों पर उसकी गर्म चिपचिपाहट महसूस हुई।
उत्सुकतावश ही उंगली को नाक के पास लाया। एक अजीब सी गंध… न अच्छी … न बुरी … बस एक बुलावे से भरी, कोई पुरानी याद दिलाती-सी…।
मैं उसकी ओर किसी जानवर सा खिंचने लगा। पेट पर चुंबन अंकित करता, पेड़ू की ओर बढ़ता..
वह मेरा सिर रोकने लगी… ना… नहीं….. उधर नहीं…..
मगर मैं सुन कहाँ रहा था…! पेड़ू का उभार, खुरदरे बालों की शुरुआत, पैंटी की इलास्टिक, पतले कपड़े के नीचे शिकार खोजते-से नथुने। मैं मानने वाला नहीं। होंठों पर झीने कपड़े के नीचे बालों की रेशमी सरसराहट महसूस होती है…. नशीली गंध का सैलाब ……। इत्र की खुशबू मिली, शायद पैंटी पर स्प्रे की थी, चुम्बनों का प्रहार।
रुको… रुको… वह रोक रही है, हाथ घुसाकर वस्तिस्थल को ढकने की कोशिश करती है मगर मैं उसके हाथों को दोनों तरफ खींचकर पकड़ लेता हूँ।
पुष्पा का पुष्प। पैंटी के नीचे ढका हुआ …. सुरक्षित, कोमल, सुगंधित, रसभरा … नथुने फुलाकर उसे जोर से सूंघता हूँ…. फिर बस धीरे से होठों से छूता हूँ।
दो हिस्सों में फटी मांसल स्पंज, जिसके बीच की फाँक को मैं कंधों से उसकी जांघों को फैलाकर चौड़ा करता हूँ, दोनों फूले होंठ, होठों के बीच झिल्ली-सा तना कपड़ा, जिस पर मैं मुँह गड़ा देता हूँ। भीतर से छनकर उसका रस आता है… स्वादहीन सा… तीखा… जीभ नहीं, किसी और इंद्रिय पर बरसता… भीतर सोए जानवर की प्यास बढ़ाताउफ्फ… उफ्फ… क्या कर रहे हो….!
उसकी लगभग डाँटती-सी आवाज की अनसुनी करते हुए मैं अपना हमला जारी रखता हूँ। उसका विरोध व्यर्थ है। लगातार उठती आनंद की लहरों के आगे वह कुछ नहीं कर पाएगी। वह वहाँ से मुझे हटाना चाहकर भी नहीं हटा रही है। उसके हाथ हालाँकि मैंने अभी भी पकड़ रखे हैं मगर अब उनमें छुड़ाने की कोशिश नहीं है। मैं साँस लेने के लिए ऊपर आता हूँ। भीगे मुँह पर पर ठंडी हवा महसूस होती है। उसका मधु, मेरे मुँह पर पुता हुआ। एक कुआँरी, कोमल, अछूती, बेहद सुंदर, सलीकेदार कन्या का इससे बढ़कर उपहार क्या हो सकता है !
एक खुशी की लहर मेरे अंदर उठती है। पुन: गोता लगाता हूँ। वह नहीं रोकती। अब मैं उसके हाथ छोड़कर स्तनों पर जाता हूँ। चूचियाँ उसी तरह खड़ी हैं। हथेलियों से उन्हें धीरे धीरे मसलते हुए योनि के तिकोन के आजू बाजू नंगी जांघों को चूमता हूँ।
उसकी सांसें गूंज रही हैं। उसके हाथ मेरे सिर पर आकर स्थिर हो जाते हैं, शायद अभी भी रोकने की दुविधा में हैं। मगर चूचुकों और चूत से लगातार आ रहा करेंट उन्हें ज्यादा देर स्थिर नहीं रहने देते। वे धीरे धीरे मेरे सिर पर घूमने लगते है, एक भरोसे में। आओ, तुम मेरे अपने हो, बेहद अपने और अंतरंग, भीतरी से भीतरी रहस्य के राजदार।
वह हल्के हल्के कमर उचकाकर इसकी स्वीकृति दे रही है। जांघें फैलाकर मुझे पहुँच दे रही है।
कुछ क्षणों पहले हाथ भी नहीं लगाने दे रही थी। अभी मस्ती में सराबोर है। मैं और उत्साहित होकर थूथन घुसा घुसाकर उसके गड्ढे को कुरेदता हूँ। उसके मुँह से कुछ अटपटी ऍं ऑं की सी आवाजें आ रही है। साथी अगर स्वरयुक्त हो तो क्या बात है ! उसकी कमर की हरकत बढ़ती जा रही है।
अब अगला कदम ! मैं अपने हाथों को स्तनों पर से हटाकर कमर के दोनों तरफ लाता हूँ और…
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मुँह उठाकर मैंने उसके गर्म साँस निकालते होठों पर सीधी मुहर लगाई और चूमते हुए नीचे उतरने लगा। कोमल मांस के नीचे कठोर ठुड्डी, ठुड्डी से नीचे उतरकर त्वचा का कोमल पर्दा, कंठ पर मेरे होठों के नीचे उसके गटकने की मीठी हरकत।
आऽह… आऽह की धीमी कराहटें… गला, कॉलर बोन। नीचे… और थोड़ा नीचे…. उभारों की मांसलता की शुरुआत….गुदगुदे मांस पर धँसते होंठ… पसली के नीचे दिल की फक फक …. उसकी तेज होती साँसों की गूंज… होंटों के किनारे पर रबर-सी लचीली स्तन की कली की छुअन…. उत्कण्ठा में उसकी अटक गई सांस … अब … अब …
और मैं उसे छकाता हुआ चूचुक के बगल से गुजरकर नीचे की सतह पर आ गया। उसकी ठहरी साँस निकली मगर कुंठित होकर उसने मेरी पीठ पर नाखून गड़ा दिए। टीस में मैंने उसके हाथ के नीचे दबे स्तनाग्र को चुटकी में पकड़कर दबा दिया।
ओह … उसके मुँह से निकला। छटपटाकर उसने मेरे हाथ को वहाँ से खींच दिया। मैंने उसे संभलने का मौका दिए बिना दूसरे स्तन में दांत गड़ा दिए। सी…ऽऽऽऽ… वह सिसकारी भर उठी।
इस खेल में अब वह गर्म हो रही थी। उसने मेरा सिर खींचकर चूची के ऊपर मुँह लगाने की कोशिश की और मैंने कृपा करते हुए उसकी इच्छा का पालन किया।
“हाँ…” उसके मुँह से निकला। चैन के एहसास के साथ उसने मेरा सिर अपने स्तन पर दबा लिया और मेरे सिर पर हाथ फिराने लगी।
मैं उसे बच्चे की तरह चूसने लगा। एक गर्माहट और सांत्वना का अजब एहसास मुझमें जागने लगा। स्तनों की तृप्तिदायी गंध में घिरकर मुझे अपने भीतर कुछ हल्का महसूस होने लगा। इतनी देर से मानो किसी घमंड, किसी बदले की भावना, कुछ दिखाने के भाव से संचालित था, अब उसका स्थान किसी निस्वार्थ अपनेपन, किसी कृतज्ञता ने ले लिया।
वह मेरे सिर पर हाथ फेर रही थी और मैं किसी अनजानी क्षुधा को चूचुक को खींच खींचकर चूसकर शांत कर रहा था।
कुछ पलों में उसने मेरा मुँह वहाँ से हँटा दिया और मैं स्वचालित दूसरे स्तन पर लग गया। कभी अग्र भाग को होठों से दबा देता और कभी उसे मुँह के भीतर लिए लिए उसकी नोक पर जीभ की खुरदरी नोक से गुदगुदी करता।
उसके मुँह से निकलती सिसकारियाँ, आनंद में डूबी हँसी… सिर पर घूमता हाथ मुझे उत्साहित कर रहे थे और बता रहे थे कि मैं ठीक जा रहा था। मुझे अपने पुरुष होने पर गर्व हुआ। मैं उसे संचालित कर रहा था। वह चाहे लाख अकड़ वाली लड़की हो, इस वक्त वह नन्नावस्था में मुझसे अपने स्तन चुसवा रही थी, मेरी हरकतों पर कठपुतली-सी नाच रही थी। मैं उसे चलाए गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा था।
गंतव्य?….. मुझे याद आया… ‘पुष्पा का पुष्प’।
मैंने दाएँ स्तन पर से हाथ हटाकर नीचे टटोला। उसकी पैंटी गीली हो रही थी। उंगलियों पर उसकी गर्म चिपचिपाहट महसूस हुई।
उत्सुकतावश ही उंगली को नाक के पास लाया। एक अजीब सी गंध… न अच्छी … न बुरी … बस एक बुलावे से भरी, कोई पुरानी याद दिलाती-सी…।
मैं उसकी ओर किसी जानवर सा खिंचने लगा। पेट पर चुंबन अंकित करता, पेड़ू की ओर बढ़ता..
वह मेरा सिर रोकने लगी… ना… नहीं….. उधर नहीं…..
मगर मैं सुन कहाँ रहा था…! पेड़ू का उभार, खुरदरे बालों की शुरुआत, पैंटी की इलास्टिक, पतले कपड़े के नीचे शिकार खोजते-से नथुने। मैं मानने वाला नहीं। होंठों पर झीने कपड़े के नीचे बालों की रेशमी सरसराहट महसूस होती है…. नशीली गंध का सैलाब ……। इत्र की खुशबू मिली, शायद पैंटी पर स्प्रे की थी, चुम्बनों का प्रहार।
रुको… रुको… वह रोक रही है, हाथ घुसाकर वस्तिस्थल को ढकने की कोशिश करती है मगर मैं उसके हाथों को दोनों तरफ खींचकर पकड़ लेता हूँ।
पुष्पा का पुष्प। पैंटी के नीचे ढका हुआ …. सुरक्षित, कोमल, सुगंधित, रसभरा … नथुने फुलाकर उसे जोर से सूंघता हूँ…. फिर बस धीरे से होठों से छूता हूँ।
दो हिस्सों में फटी मांसल स्पंज, जिसके बीच की फाँक को मैं कंधों से उसकी जांघों को फैलाकर चौड़ा करता हूँ, दोनों फूले होंठ, होठों के बीच झिल्ली-सा तना कपड़ा, जिस पर मैं मुँह गड़ा देता हूँ। भीतर से छनकर उसका रस आता है… स्वादहीन सा… तीखा… जीभ नहीं, किसी और इंद्रिय पर बरसता… भीतर सोए जानवर की प्यास बढ़ाताउफ्फ… उफ्फ… क्या कर रहे हो….!
उसकी लगभग डाँटती-सी आवाज की अनसुनी करते हुए मैं अपना हमला जारी रखता हूँ। उसका विरोध व्यर्थ है। लगातार उठती आनंद की लहरों के आगे वह कुछ नहीं कर पाएगी। वह वहाँ से मुझे हटाना चाहकर भी नहीं हटा रही है। उसके हाथ हालाँकि मैंने अभी भी पकड़ रखे हैं मगर अब उनमें छुड़ाने की कोशिश नहीं है। मैं साँस लेने के लिए ऊपर आता हूँ। भीगे मुँह पर पर ठंडी हवा महसूस होती है। उसका मधु, मेरे मुँह पर पुता हुआ। एक कुआँरी, कोमल, अछूती, बेहद सुंदर, सलीकेदार कन्या का इससे बढ़कर उपहार क्या हो सकता है !
एक खुशी की लहर मेरे अंदर उठती है। पुन: गोता लगाता हूँ। वह नहीं रोकती। अब मैं उसके हाथ छोड़कर स्तनों पर जाता हूँ। चूचियाँ उसी तरह खड़ी हैं। हथेलियों से उन्हें धीरे धीरे मसलते हुए योनि के तिकोन के आजू बाजू नंगी जांघों को चूमता हूँ।
उसकी सांसें गूंज रही हैं। उसके हाथ मेरे सिर पर आकर स्थिर हो जाते हैं, शायद अभी भी रोकने की दुविधा में हैं। मगर चूचुकों और चूत से लगातार आ रहा करेंट उन्हें ज्यादा देर स्थिर नहीं रहने देते। वे धीरे धीरे मेरे सिर पर घूमने लगते है, एक भरोसे में। आओ, तुम मेरे अपने हो, बेहद अपने और अंतरंग, भीतरी से भीतरी रहस्य के राजदार।
वह हल्के हल्के कमर उचकाकर इसकी स्वीकृति दे रही है। जांघें फैलाकर मुझे पहुँच दे रही है।
कुछ क्षणों पहले हाथ भी नहीं लगाने दे रही थी। अभी मस्ती में सराबोर है। मैं और उत्साहित होकर थूथन घुसा घुसाकर उसके गड्ढे को कुरेदता हूँ। उसके मुँह से कुछ अटपटी ऍं ऑं की सी आवाजें आ रही है। साथी अगर स्वरयुक्त हो तो क्या बात है ! उसकी कमर की हरकत बढ़ती जा रही है।
अब अगला कदम ! मैं अपने हाथों को स्तनों पर से हटाकर कमर के दोनों तरफ लाता हूँ और…
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