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प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

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प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

रचती है

प्रेम की परिभाषा

सदियों से जिन्दगी

काल के अनंत बियाबान में

क्या वह भी नियति है

किसी अनंत के मन की ? - मौलिक

बेचैन आदम उस नये जीव की तलाश में अपनी यात्रा पर था जिसे खुदा ने उसके शरीर से जुदा कर रच रखा था। बिना उसके वह अधूरा था।

रचती है

प्रेम की परिभाषा

सदियों से जिन्दगी

काल के अनंत बियाबान में

क्या वह भी नियति है

किसी अनंत के मन की ? - मौलिक

प्रियहरि भाग रहा था और भागता ही चला जा रहा था। लेकिन वह जितना ज्यादा भागता स्मृतियां और और करीब आ जा रही थीं। स्मृतियों से राहत पाने भटकता प्रियहरि ऊटकमंड के इस होटल के छज्जे की खिड़की पर हाथ टिकाए पर्वतों की चोटी पर जमे कोहरे की उस खूबसूरती को इस वक्त निहारना चाहता था. वह समूची वादी को समेटे उस एक सांवली औरत के चेहरे में तब्दील होती जा रहा थी जिसे वह भुलाना चाहता था। रात वह सो नहीं सका था। उसे नहीं मालूम कि वह अलस्सुबह की चिलकती ठंड थी या उसके अंदर बह रही लू का असर जिससे वह कांप रहा था। जिन पहाड़ी चोटियों पर उसकी निगाह थी, वे जैसे उसकी अपनी खुद की खोपड़ी में तब्दील हो चली थीं। अपनी सघनता से पर्वत-शिखरों को बोझिल करते बादलों के धुंध की तरह स्मृतियां उसपर छाई जा रही थीं। यह चित्त में गहराता धुंध था जिसमे सामने खड़े पर्वत खोए जा रहे थे। उनकी जगह एक चेहरा था, जो समूची वादी में फैलता प्रियहरि को उन्हीं भयावह अंधेरों में खींच रहा था, जिनसे वह निकल भागने के उपक्रम में भटकता रहा आया है। उसका चित्त अविराम तेजगति बह रहा था । उसके पास पहेलियां ही पहेलियां थीं। रहस्य से भरी पहेलियां, जो सुलझने का नाम ही नही लेती थीं । जितना वह सोचता उतना अधिक वे उलझाये जा रही थीं। उसके पांव स्थिर थे, शरीर जड़, लेकिन चित्त था कि सोचता चला जा रहा था।

यह औरत कौन थी ? इससे प्रियहरि का क्या संबंध था ? सिवाय दुख और अपार पीड़ा के प्रियहरि को उसने कुछ नहीं दिया। इतना-इतना कि पीड़ा के अंधकार में धकेलकर निरंतर उसे कुचलने, उसके प्राण लेने वह उद्यत रही। उद्यत मात्र नही रही, शायद सफल भी हो गई है। वह जानती थी कि वह प्रियहरि के प्राण ले रही है, लेकिन इतने पर भी उसे चैन कहां था ? प्रियहरि की हर पीड़ा, उसकी हर करुणा इस औरत को और प्रमुदित करती थी, जैसे उसका सारा सुख इसी में निहित हो। अपने रहस्यमय व्यक्तित्व और व्यवहार की तरह चीजों को हमेशा उसने जटिल बनाए रखा। प्रियहरि ने जितना सुलझाने की कोशिश की उतना वह और उलझता गया। वह कौन थी ? उसने वैसा क्यों किया ? सारा कुछ प्रियहरि के लिए एक अनबूझ पहेली रहा आयेगा। अगर ऐसा कोई स्तूप आप ढूंढ पाएं जिसमें सब कुछ प्रचंडता से भरा हो - प्रचण्ड अहंकार, प्रचण्ड ईर्ष्या, प्रचण्ड अपमान, उपेक्षा की भावना और इन सब के अलावा भी प्रचण्डता में बहुत कुछ जिसका वर्णन मुश्किल है तो वह उसी की काया हो सकती है। नाम तो था वनमाला, लेकिन वनमाला नही वह वनज्वाला की तरह थी।

स्त्री के विषय में आदिकाल से ही जितनी कोमल बातें कही गई हैं, जैसा स्वभाव बताया गया है, जो कुछ कल्पनाएं की जाती हैं वे प्रियहरि को अब झूठ लगती हैं। जो यथार्थ है उसका उसका शतांश भी लोग नही जान पाते। बाहर से जो देखा और जाना जाता है वह कितना झूठ होता है इसका अनुभव प्रियहरि अब कुछ ही कर सकता है। स्त्री को जिस रूप में लोग देखते हैं , वह उसका अन-उजागर रूप ही हुआ करता है। कुछ ऐसा ही जैसा किसी फूल की खूबसूरती को देखकर कोई यह नहीं जान सकता कि वह कितना विषैला और मारक है। उसकी गंध, उसका स्पर्श, उसका स्वाद किसी के प्राण भी ले सकता है।

यह जानते हुए भी कि वह स्त्री प्राणहारिणी है निपट क्रूर, प्रियहरि का ध्यान वनमाला पर ही टिका हुआ है। वह उसी को याद कर रहा है। याद एक भीषण दुःस्वप्न की, जिसमें प्रियहरि का सारा कुछ खो गया है। सारा कुछ यानी शान्ति, चैन, सुख, दुनियादारी, घर, प्रतिभा, जिन्दगी का सब कुछ। हो सकता है जिसे लोग प्यार करते हैं यह उस किस्म का यह अनुभव हो। लेकिन अब जी नही मानता। पहले प्रियहरि भ्रमित था, लेकिन यह शब्द उसे प्रसंग-बाहर प्रतीत होता है। वह कुछ भी हो सकता था लेकिन प्यार नहीं था। प्रियहरि को शुरू में ही जानना चाहिए था कि क्या अब तक भी उसे वह जान सका है ? अब अगर इसे प्यार कहा भी जाए तो वह प्रियहरि के लिए वनमाला को उसकी संपूर्ण रहस्यमयता के साथ जान लेने की जिज्ञासा मात्र से अधिक क्या था ?

प्रियहरि सोच में बहा जा रहा था। वह दुर्भाग्य ही था कि जितना अधिक उसने वनमाला को जानने की कोशिश की, उतना ही अधिक वह अपने को रहस्य के अवगुंठनों में छिपाती चली गई। अपने अभिनय से सारा कुछ वही रचती , ताकि प्रियहरि उसके पीछे और भागता चला आए। पूछने के लिए एक पल भी प्रियहरि को नहीं दिया उसने। मौके आते तो उसे उलझाकर, दरम्यानी पलों में रहस्य का और इजाफा करती वह मुस्कुराती निकल भागती। उसके गंभीर द्वंदग्रस्त चेहरे पर तैरती कुटिल मुस्कान में ऐसे वक्त प्रियहरि के लिए अघोषित संवाद यह हुआ करता कि 'मै तो चली, अब इसे भी हल करो।' सारी पहेलियों का साकार पुंज बनी वनमाला उसे उलझाए छोड़ जाती थी। यह एक अजीब चक्कर था जिसमें प्रियहरि की नियति भटकने की थी और नियति- नटी थी वनमाला, जिसके लिए प्रियहरि का भटकाव मनोरंजन मात्र की एक आनंदमयी क्रीड़ा थी ।

बार-बार के अनुभवों से तंग आकर उस दिन भी प्रियहरि मायूस अपने एकान्त में बैठा था । उसे ठीक-ठीक याद नहीं कि उस दिन और लोग आए थे या नहीं । ऐसा भी हो सकता है कि इक्का- दुक्का आकर बाहर अपने कामों में व्यस्त हो गए हों । कभी आलमारी खोलता, कभी फाइलों के बीच कागज पलटता प्रियहरि वहां पसरे मौन को काट रहा था । केवल वनमाला ही थी जो वहां बैठी रह गई थी । कहते हैं कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है । वनमाला के मूड से प्रियहरि इन दिनों भयभीत रहता था । बात करो तो मुश्किल , न करो तो मुश्किल । गंभीर, बीमार चेहरा वनमाला भी उसी की तरह पर्स खोलती बंद करती, रजिस्टर पलटती बैठी तो थी लेकिन अन्यमनस्कता ही थी, जो उससे वह करा रही थी । दोनों ओर से बर्फ जमी थी । वनमाला से खिन्न प्रियहरि और वनमाला के बीच की चुप्पी से भरा वातावरण इन दोनों के पशोपेश को पढ़ रहा था। लेकिन बर्फ थी कि अपनी जगह अपनी अकड़ में थी । ऐसे माहौल में जहां प्रियहरि और वनमाला संयोग से अकेलेपन में साथ पड़ जाएं, दोनों के चित्त की धुकधुकी माहौल में जैसे पसर जाती हो ।

ठीक इसी माहौल में नीलांजना का प्रवेश हुआ । नीलांजना और वनमाला में बहुत फर्क है । ठीक वैसा जैसे जमीन और आसमान का फर्क हो । नीलांजना को प्यार में हरि ने नीलिमा, लीला नाम दिया हुआ था । लीला नाम भास्कराचार्य की विदुषी, गणितज्ञा कन्या लीलावती के नाम पर था । हां लीलावती वैसी ही रही होगी । नीलांजना सी शांत, सौम्य, विनम्र, उदारता से भरा प्यारा चौकोर चेहरा, पिंडलियों के नीचे तक झूलती लंबी काली चोटी, अनधिक गुराई का वैभव और सहज संकोच से भरी नतमस्तिका । यह विनम्र संकोच उसके सुंदर व्यक्तित्व का अंतरंग आभूषण था । नीलांजना का अतिरिक्त आकर्षण सरल दृष्टि लिए मासूमियत भरी उसकी खूबसूरत आंखों में था। उनमें चमकती गहरी काली पुतलियां अथाह शांत सागर की तरह मनमोहक थीं। नीलांजना जानती थी कि प्रियहरि की आंखें अक्सर उन पुतलियों में डूब जाया करती थीं । वह खुद उन आंखों का डूबना देखती और डूबती आंखों को निहारती प्रियहरि की आंखों की भाषा को पढ़ने की चेष्टा करती थी । आंखें चुराना उसकी आदत न थी ।

जहां कहीं भी परिदृश्य में अपने होने पर भय, तनाव, विवाद की आशंका हो, ऐसे अवसरों को टालती नीलांजना प्रतिक्रियाविहीन बनाए रखकर अपने अस्तित्व को सिकोड़ लेती थी । यह उसका स्वभाव था । वह नाक की सीध में चलता और जहां अवसर हो वहीं खुलता था । नीलांजना और वनमाला दो विपरीत ध्रुव थीं । वनमाला की नाक पर गुस्सा चढ़ा रहता था । उसे मनाने थक-हार जाना होता था । वह अपने आप ठंडी होती पछताती और प्रियहरि के पास आती थी । उसके बरअक्स हरिणी सी खूबसूरत आंखों वाली मासूम नीलांजना थी कि जिसके झगड़ने, नाराज होने और जिसे मनाने के अवसर जोहता प्रियहरि का मन तरस-तरस जाता था । कई बार प्रियहरि ने अपनी यह तमन्ना जाहिर की भी कि कभी तो नीलांजना उससे झगड़ा करे ताकि उसके चांद से मुखड़े को नई मुद्रा में निहारता उसकी गोरी सुडौल जंघाओं पर सर रख उसकी लटों से खेलता, गालों को सहलाता प्रियहरि उस रूठी को मनाए । लेकिन नहीं, नीलांजना बड़ी मासूमियत से प्रियहरि को जवाब देती - ''क्यों ? मैं आपसे भला क्यों झगड़ा करूं ? आपसे मुझे कोई शिकायत है ही नहीं । जिन्हें हो, उन्हें हो । आप ऐसा कुछ करते ही नहीं कि जिससे मैं झगड़ा करूं ?''

यह अगर तपती गर्मी में भी मन को राहत देती शीतल मंद बयार की एक लहर थी, तो वह ठंडे मौसम में भी अनायास आ धमकी प्रचंड लू का झोंका थी । नीलांजना का सान्निध्य प्रियहरि को अगर सारे तनावों से आत्मीय राहत देता था तो वनमाला का सामना उपस्थि़ति मात्र से उदास आशंका, बेचैनी और तनाव का माहौल रच देता था । नीलांजना की जुबान जितनी सरल और मीठी थी, वनमाला अपनी जुबान से उतनी ही कड़वी और कुटिल हुआ करती थी ।

प्रियहरि के संबंध दोनों से थे । प्यार की कुंडली से लक्षण मिलाएं तो मोहब्बत के संबंध प्रियहरि और नीलांजना के बीच सहज ही सधने वाले थे । पर वैसा क्यों कर होता ? होनी तो होनी ही है । मामला यह था कि प्रियहरि का दिल तपती गर्मी, प्रचंड लू का झोंका, अदृश्य भय, तनाव, बेचैनी और कुटिल, कड़वी जुबान की मुहर वाली वनमाला पर ही आसना था । यह और भी विचित्र था कि खुद वनमाला की निगाह में प्रियहरि जैसा भी रहा हो ,मरती वह प्रियहरि के प्यार पर थी । वनमाला के लिए प्रियहरि प्यार के उस सजीव पुतले की तरह था जिससे खेलने, जिसे तोड़ने या मिटा डालने का हक केवल उसका था । किसी भी औरत जात का उस पुतले को छूना तो दूर, उस पर निगाह डालना तक वनमाला को सखत नापसन्द था । किसी औरत का वनमाला से टकराना अपने लिए खुद मुसीबत को दावत देने जैसा था ।

नीलांजना उर्फ नीला उस वक्त फुरसत निकालकर आई थी । प्रियहरि से उसने कहा - 'चलिए अभी मैं फुरसत में हूँ । सुबह का समय अच्छा है । अपना जो काम पड़ा है उसे निबटा लेते हैं'

'तुम्हें समय है?'- प्रियहरि ने पूछा ।

'हां इसीलिए तो आई हूँ । कोई काम पड़ा रहे मुझे अच्छा नहीं लगता । आप को तो कहीं जाना नहीं है न ।'

प्रियहरि ने चाबियां नीलांजना को सौंप दी । आलमारी पीछे ही थी । नीला ने फाइलें निकाली, कागज फैलाए और प्रियहरि से पूछती बात करती काम में व्यस्त हो गई । काम तो प्रियहरि भी नीला के साथ कर रहा था, लेकिन अन्यमनस्कता रही आने से दिल न लग रहा था । प्रियहरि और नीला दोनों मुंडियां जोड़े अगल-बगल बैठे टेबिल पर झुके थे । रस्मी बातें हो रही थीं ,लेकिन वनमाला की उपस्थिति के बोझ ने जुबानों की सहज स्वतंत्रता छीन ली थी ।

मूडी वनमाला जिसने अरसे से उस तरह प्रियहरि के साथ बैठना बंद कर दिया था ,बड़े गौर से प्रियहरि और नीलांजना को लक्ष्य कर रही थी - यूं कि देखते भी देखना दिखाई न पड़े । उसकी आंखों में एक तरह की व्यंग्य भरी शिकायत ने तैरना शुरू कर दिया था । उसके चेहरे पर अचानक कई हाव-भाव एक साथ आ और जा रहे थे । प्रियहरि ने गौर किया कि साथ बैठी नीलांजना का मन भी इसे महसूस कर रहा था । दोनों के बीच की तरंगें इधर से उधर संक्रमित हो रही थीं । अपना काम करते हुए भी नीलांजना और प्रियहरि उस निस्तब्धता में एक अदृश्य संकोच से भरे हुए थे । बातों में सामने पड़े काम को रखते हुए भी ऐसी भयावह संकोच की छाया थी जैसे वे चोरी कर रहे हों और निगाहों से वे देखे जा रहे हों ।

दूर बैठी वनमाला के होठों पर एक तरह की मुस्कान उभरने लगी थी । अब वह स्तब्ध, बोझिल एकांत उसके धैर्य से बाहर होने लगा था । वह देख रही थी कि कुर्सियों में सटे बैठे नीलांजना और प्रियहरि के सिर तल्लीनता से झुके हुए हैं । दोनों की वाणियां बुदबुदाने के लहजे में एक दूसरे से संवादरत थीं । दोनों की आंखें कागजों पर फिसलती कोण बनाती एक-दूसरे से टकरा रही थीं । दोनों उसे देखकर भी अनदेखा कर रहे थे जैसे वनमाला की उपस्थिति का अहसास ही उन्हें न हो ।

अचानक एक स्वर लहराया - ''मे आई डिस्टर्ब यू सर ?''

आखिर वही हुआ जिसका भय उन्हें सालता है। वे दोनो चुप्पी में सिहर गए। नीलांजना की मासूम आंखें प्रियहरि की आँखों से टकराईं। वे मानों पूछ रही हों कि यह क्या होने जा रहा है ? उन्होंने पाया कि अपनी पुस्तक और पर्स उठाये वनमाला उनकी तरफ देख रही है जैसे इसी की प्रतीक्षा में वह हो। वह अपनी जगह खड़ी थी और कुटिल मुस्कान में तैरता उसका ''डिस्टर्ब'' अनायास प्रियहरि और नीलांजना को विचलित कर रहा था। वनमाला अपना समान समेटे चलकर उन दोनो की कुर्सियों के सामने आकर ठिठक गई। उसने नीलान्जना से कहा -

''माफ करना मैडम, मैने आप लोगों को डिस्टर्ब किया।''

प्रियहरि की ओर मुखातिब हो इसने कहा -''आपको मालूम है न कि मेरी तनखाह का पुराना मामला रुका हुआ है।'' इस बार आप कमेटी मे हैं इसलिए कह रही हूं। मेरा काम भी आप इस बार कर देंगे क्या ? अभी हो जाएगा तो हो जाएगा, अन्यथा तो कोई उम्मीद नही है।''

प्रियहरि का मन वनमाला के ''आप दोनो'' के उच्चारण की भंगिमा से कांप उठा था। वनमाला ने उसे जैसे चोरी करते पकड़ लिया हो। उसने काम बताकर एक साथ ही अपने दो-तीन काम निपटा दिए थे। मासूम आवाज में निहायत मीठेपन से उच्चरित वनमाला के ''डिस्टर्ब'' के मायने क्या हैं ,यह प्रियहरि भी समझता था, और नीलान्जना भी समझ रही थी। एक अदृश्य घबराहट से इस जोड़े का मन भयभीत हो गया। वनमाला खुद ही कटी-कटी रहती है। बात करो तो काटती है। सबके सामने यूं बर्ताव करती है जैसे प्रियहरि से उसका लेना-देना नही। इस तरह कि मानो केवल प्रियहरि ही उसके पीछे पड़ा है। मायूसी और अवसाद के घेरे में प्रियहरि को वह खुद ठेल कर धकेल जाती है । और अब उसका यह व्यंग्य ! प्रियहरि के लिए वनमाला को समझना मुश्किल है। लेकिन फिर बस इतना ही उसका ऐसा मरहम प्रियहरि को मेमना बना जाता है। उसे जवाब दिया -

''मैने तो कभी मना नहीं किया। बस आप एक चिट्‌ठी उस मामले पर विचार करने के लिए अपने अफसर से मार्क करा दें फिर मै देख लूंगा।''

वनमाला के साथ का ''तुम'' उसकी खुद बनाई दूरी में प्रियहरि के लिए भी ''आप'' हो जाता था। इस बारे में दो-चार औपचारिक बातें प्रियहरि और वनमाला के बीच हुईं और चेहरे पर छाई अपनी उदास मासूमियत के साथ वनमाला चली गई। जिसे तिलांजलि देने पर संकल्प प्रियहरि ने बार-बार किया है, उसे कंपाते वह चली गई। इस कंपन को क्या नीलांजना ने नहीं देखा ? प्रियहरि ने चाहा कि नीलांजना उसे बचा ले लेकिन नीलांजना खुद भाग जाना चाहती है। क्यों, वनमाला का इतना आतंक क्यों ? हां, कहीं मन मे कोई चोर था। प्रियहरि नहीं जानता कि वनमाला कैसा महसूस करती थी? लेकिन उसे यह स्वीकार करने में कोई हिचक नही कि वनमाला उसे बेहद प्रिय थी। जीनत नहीं जाती तो शायद तकदीर की वे दुर्घटनाएं उजागर नही हुई होतीं, जो बाद में उसके और वनमाला के बीच इतिहास बनाकर चली गईं।

अदन के बाग का निषिद्ध फल चखने की अब यही सजा थी। बेचैन आदम उस नये जीव की तलाश में अपनी यात्रा पर था जिसे खुदा ने उसके शरीर से जुदा कर रच रखा था। बिना उसके वह अधूरा था।

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जीनत

चम्पक के फूल में अगर गुलाब की आभा भर दी जाए तो वह जीनत का रंग होगा।

अगर किसी स्त्री के बारे में सोच-सोच कर हृदय, बुद्धि, संस्कृति और कला की सारी खूबसूरती इकट्‌ठी कर ली जाएं तो उन सब का मेल जीनत ही हो सकती थी। यूं नही कि दुनिया में वह अकेली ही ऐसी होगी, मगर यह कि प्रियहरि के अनुभवों का ताल्लुक जहां तक था, वहां तक जीनत को ही उसने वैसा पाया।

जीनत को उसने कभी नाराज होता नहीं देखा। यदा-कदा वैसे अवसर आये भी हों तो वह व्यक्तिगत शिकायत जैसी बातों में ही आए रहे होंगे। जीनत से प्रियहरि की बात होती और सारी गलतफहमियां दूर हो जातीं। जीनत का हदय निर्मल था। वह बला की खुबसूरत थी। अण्डाकार चेहरे को आप अगर जरा सुतवां ढाल में देखें तो वह जीनत का चेहरा बनेगा। चम्पक के फूल में अगर गुलाब की आभा भर दी जाए तो वह जीनत का रंग होगा। नाप तौलकर बनी समानुपातिक अंगो के साथ लहराती उसकी छरहरी काया को देखकर किसी कोमल मरूलता की कल्पना जागती थी, जिसमें आंखों को उजला बना देने वाली सुन्दरता और हृदय को शीतलता प्रदान करने वाली सहजता थी। प्रियहरि ने कभी उसे यत्नपूर्वक सज्जा के भड़कीले वस्त्रों और प्रसाधनों में नहीं देखा। जीनत के अन्दर ही ऐसा कुछ था कि वस्त्रों का उसका चुनाव बड़ा सलीकेदार होता। सलवार और कुर्ती के अपने आम पहनावे में वह फबती थी, लेकिन जब कभी वह हल्की कढ़ाई वाली बादामी या दूध सी झक्क सफेद साड़ी पहनती, जीनत साक्षात सुन्दरता की कल्पित यूनानी देवी वीनस दिखाई पड़ती थी। चाल-ढाल कपड़ों, बातों, व्यवहार, कामकाज - किसी में कभी कोई बनावटी अतिरंजना उसमे प्रियहरि ने नहीं देखी। उसके अन्दर और बाहर के सहज सन्तुलन ने ऐसी खूबसूरती उसे दी थी कि उसकी झलक मात्र तनाव भरे वातावरण को खुशनुमा रंगीनियत में बदल देती थी। उसके बारीक गुलाबी होंठो पर फैली तबस्सुम, मृगी सी शीतल स्निग्ध दृष्टि वाली उसकी बोलती आंखें जिनमें बिना काजल के कजराई थी, उसकी नजाकत से तरासी गई देह-यष्टि की और इन सब में धार चढ़ाती उसकी जुकामियां पुटवाली सेक्सी स्वर लहरी जिस पर बड़े सलीके से स्पष्ट उच्चारण के साथ अपनी नर्माहट और चिकनाई में भाषा खेलती थी। सब इतने सम्मोहक कि कोई भी जीनत के जादुई आकर्षण से अछूता नहीं रह सकता था। विषय चाहे उसका साइंस हो, लेकिन कला और सुन्दरता की साक्षात प्रतिमा वह थी। इतनी उजली कि छूने की कल्पना में भी यह भय होता कि कहीं जीनत मैली न हो जाए। प्रियहरि नहीं जानता कि ईश्वर किसे कहते हैं ? लेकिन यह जानता है कि कुदरत ने जी भरकर इतनी खूबसूरती जीनत को दी थी कि हर कोई उस पर मर मिटे। ईरानी कला और सुन्दरता की भरपूर झलक जीनत में थी। सौंदर्य-बोध, अभिरूचियों, और प्रतिभा का उसमें अदभुत तालमेल था। साहित्य संस्कृति, कला,दर्शन, भावना, संवेदना की अदभुत सूझ और प्रतिभा जीनत में थी। औरों की तरह प्रियहरि ने कभी कल्पना न की थी कि जीनत उसकी पहुंच में आ भी सकती है। साधारण मुलाकातें, हंसना, बोलना और माहौल को खुशनुमा खूबसूरती से भर देने वाली जीनत की सहज अदायें - यही थे जिन्हे पाकर वह प्रसन्न था। क्या वैसा हो सकता था ? लेकिन वैसा हुआ।

प्रियहरि ने वनमाला को उस साल जुलाई के पहले हफ्‌ते में तब देखा था जब वह नई-नई वहां आई थी। साथ में उसका आदमी और कंधे पर चिपका हुआ एक नन्हा सा बच्चा। निहायत साधारण शक्लो-सूरत वाला खुरदुरी काया का सांवला पुरुष और निहायत घरू साड़ी में लिपटी खुले सांवली रंगत की उसकी पत्नी। उसकी रस्मी बातचीत और अन्दाज़ अधिक दिलचस्पी न होने पर भी प्रियहरि को दिलचस्प लगे थे।

उस समय कामकाज के बोझ में बुरी तरह दबा होने के कारण इस वनमाला से प्रियहरि का संबंध वैसा ही था जैसा साधारण कर्मियों के साथ हुआ करता था। बाद के सालों में झंझटों से तंग आकर उसने विचित्र परिस्थितियों में बड़ी जिम्मेदारियां खुद ही छोड़ दी थीं। इसी दौरान वनमाला से उसका परिचय बढ़ा था। कुछ समान बातें थी जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती थीं। दोनो ही एकान्तिक स्वभाव के थे। आसपास की संगत और वातावरण न तो वनमाला को प्रभावित करते थे, और न प्रियहरि को। घर से वनमाला उदासीन और बेजान लगती थी। ऐसा ही कुछ हाल प्रियहरि के साथ भी था। दोनों को ही गम्भीरता और सूत्रात्मक बातों से लगाव था। गप्पीपन से दोनों को नफरत थी। वनमाला चाहे एकदम साधारण और उपेक्षणिया रही हो लेकिन शुरू से ही उसमें गजब का आत्माभिमान था। लोग-बाग उसकी अकड़ का मजाक उड़ाया करते थे। अगर किसी ने उससे सहानुभूति दिखाई, तो वह प्रियहरि ही था। प्रियहरि से वह अक्सर कहा करती थी 'न मुझे फालतू बातें पसंद हैं, और न फालतू लोग।' सारी चीजों के बावजूद पुराना और अपने क्षेत्र में जाना-माना मेधावी होने के कारण प्रियहरि का अपना मान था। उसकी हैसियत बहुत ऊंची थी। इसके ठीक उल्टे वनमाला की उन दिनों न तो कोई पूछ-परख थी, न ही उसमे किसी की कोई दिलचस्पी थी। ऐसे में सुबह के माहौल में एक-दूसरे के करीब आते प्रियहरि और वनमाला ने एक दूसरे को जाना। तब पहली बार प्रियहरि ने यह महसूस करना शुरू किया कि अपने आप में कुंठित और उदास दिखाई पड़ने वाली यह औरत, जो काम निबटाकर आपने मर्द की आज्ञाकारिता और बच्चे की चिंता के दबाव में जल्दी भागने को उद्‌यत रहती है, उतनी साधारण नहीं है, जितनी लोग उसे समझते थे। थी तो वह श्यामा बंगाल की, लेकिन उसकी भाषा, लिखावट और चीजों की समझ हिन्दी में ऐसी थी कि इस इलाके में पैदा हुए लोगों में नही देखी जाती। आपसी समझ और प्रसंशा का बढ़ता संबंध कभी उसके प्रति मारक चाहत और लगाव में बदल सकता है, इसकी कल्पना भी प्रियहरि को नहीं थी।

तब इर्द-गिर्द उसके होने के बावजूद कुछ ऐसे संबंध थे जिनका ज्यादा असर प्रियहरि पर था। खास कर खूबसूरत तरासी हुई देह-यष्टि के साथ नफासत की समझ, संस्कृति, बुद्धि, और भावना वाली जीनत की उपस्थिति वहां ऐसी थी, जिसके सामने किसी और औरत का व्यक्तित्व कहीं ठहर ही नहीं सकता था। साहित्य की अपनी समझ और कविता की रोमानियत जैसी हृदय वाली जीनत तब प्रियहरि के बहुत ज्यादा करीब आ रही थी। सारे लोगों के होते हुए भी प्रियहरि पर जीनत का खास लगाव था। जीनत उसके साथ धूप में अकसर बैठ जाती और कविता पर, जिन्दगी पर, उसके फलसफे पर चन्द लमहों में ही सही, तसल्लीबख्श बातें हो जाती थीं। प्रियहरि ने कविताएं लिखी थीं और लगातार लिख रहा था। उसके लेख रिसालों में छपते और इन सब पर जीनत से बहुत बारीक बातें होतीं। प्रियहरि की तब-तक की कविताएं जीनत ने मांगकर कर पढ़ ली थीं। इधर छिपाकर संकोच से पहली बार सौंपी गयीं जीनत की कविताएं प्रियहरि ने पढ़ ली थीं। प्रियहरि की कविताओं में छिपा रोमांस जीनत को अच्छा लगता था। उर्दू की एक लम्बी नज़्म जिसमें मोहब्बत की तड़प और विरह की पीड़ा थी, उसे खूब पसंद आयी थी। अंग्रेजी और हिन्दी में लिखे प्रकृति के कुछ बिम्बों की उसने तारीफ की थी। जीनत को इस बात का अहसास था कि उस पर जान देने वालों में प्रियहरि भी है। उससे आगे भी यह कि उस अहसास के बावजूद वह प्रियहरि के क्रमश: ज्यादा निकट आती गई थी। जब भी मौका मिलता और तीसरा बीच में न होता दरबार हाल में या जीनत के कमरे में दोनो इस तरह एक दूसरे प्रति चाहत भरी प्रशंसा से बतियाते कि जैसे बरसों से उनका परिचय और कुदरती संबंध हो। यह एक ऐसा सहज आकर्षण था, जो पूरी औरत और पूरे आदमी के बीच अपनी आकांक्षाओं में परस्पर होता है। ये संबंध शायद और रंग लाते अगर जीनत तबादले पर कहीं और न चली गई होती।

जहां तक याद पड़ता है जीनत भी अपने को 'वर्गो' कहा करती थी, जैसा कि प्रियहरि तो था ही। उन दोनो में कहीं कोई कमी न दिखाई पड़ने पर भी एक खालीपन रहा होगा जिसे वे परोक्षतः महसूस करते थे। जाती तौर पर जीनत के निजी और भावनात्मक संबंध विराग से थे। तब भी किसी खास मौके को छोड़ खुले रूप में वह प्रियहरि को कभी न दिखाई पड़ा था। जीनत का व्यक्तित्व खुला था और सभी से वह पूरी गरिमा, नफासत और खुलेपन से पेश आती थी। जिस एक बार का जिक्र है उसमे भी गवाह दो ही थे - एक खुद प्रियहरि और दूसरी जीनत। हुआ यूं कि एक दिन जीनत के निजी मातहत ने आकर प्रियहरि को खबर दी कि मैडम उसे बुला रही हैं। सुबह का वक्त था और माहौल शायद जनवरी - फरवरी के गुनगुने ठण्ड का, जब पढ़ने वालों की आमद-रफ्त कम हो जाती है। प्रियहरि उसके कमरे में गया तो उसे सामने बिठाकर जीनत ने विराग की बेरुखी की शिकायत करते हुए यह कहा कि प्रियहरि उसे समझाये। जीनत का कहना था कि उसकी शादी कहीं और तय करने पर उसके घर में लोग आमादा हैं। उस वक्त जीनत कमजोर हो चली थी। प्रियहरि को समझाते उसकी भावना का बांध टूट गया और आंखों से मोती झरने लगे। प्रियहरि के सामने टेबिल पर कलाइयां फैलाए उसने सिर झुका दिया और सिसकती रही। प्रियहरि ने बड़े प्यार से उसे समझाया, उठाया, तसल्ली दी और कहा कि मैं विराग से बात करूंगा। लोगों की आवाजाही में उस दिन तो बात न हो सकी, लेकिन बाद में प्रियहरि ने ससंकोच विराग को वह बात बताई और समझाया कि जीनत का ध्यान वह रखे। विराग ने अविचलित भाव से सुना और बस इतना कहा कि ''मैं देखूंगा।''

जीनत के पास आते-आते प्रियहरि ने दो-तीन कविताएं उस पर लिख डाली थीं। उन्हे बड़ी रूचि से जीनत ने सुना और उनकी तारीफ भी की। जीनत को प्रियहरि की एक मात्र और सबसे अच्छी भेंट उसकी वह एक कविता ही थी ,जिसमें प्रियहरि ने निहायत खूबसूरती से जीनत की तस्वीर खींची थी। वह इतनी खुश हुई कि कविताओं के ढेर से उस खास कविता को पसंद कर उसकी स्क्रिप्ट प्रियहरि से उसने आग्रहपूर्वक फ़ौरन ही छीन ली थी। जीनत की यह खूबी थी कि वह शातिर औरतों की तरह नज़ाकत और अदाओं का इस्तेमाल कर प्रियहरि को प्रभावित नही करती थी, गोकि ये चीजें उसमे थीं। शायद इसीलिए उसे वैसा करने की जरूरत ही नही थी। उसकी खूबसूरत पर्सनैलिटी में ही कुदरत ने इन्हें निखार कर रख दिया था। यह शेर कहा भले ही किसी ने चुहल के रंग में है, लेकिन जीनत पर यह बिना किसी बनावट के लागू होता था कि- ''खु़दा जब हुस्न देता है, नज़ाकत आ ही जाती है।''

उस समय जीनत के अलावा नीलान्जना और चन्द्रकिरण उर्फ रोज़बूटी भी थी। वह इतनी गोरी-चिटटी, सहज और आकर्षक थी कि वनमाला की ओर किसी को ध्यान देने की फुरसत ही न थी। न जाने कौन सी परिस्थितियां थीं जिनसे वनमाला यूं गुमसुम और गम्भीर दिखाई पड़ती थी कि वह अपनी उम्र से कहीं बड़ी प्रौढ़ा नारी ही लगती। इसकी छिपी नजर चंचल चित्रकार कानन पर दिखाई पड़ती थी। इधर कानन था कि औरों की तरह वह भी सर्वोत्तम यानी जीनत की तारीफ करता था। वनमाला का प्रसंग छिड़ने पर नाक-भौं सिकोड़ता वह हंस पड़ा था - ''वह! वह तो मुझे बुढ़िया लगती है।'' व्यक्तिगत प्रसंगों में चन्द्रकिरण को प्रियहरि प्यार से रोज़बूटी या स्वीट-डॉल कहकर पुकारता था। चार फुट दस इंच की पैंतीस किलो वजनी बड़ी-बड़ी भूरी आंखों वाली यह गुड़िया बला की खूबसूरत थी। किसी एक रोज सूने में दोनों ही आ भिड़े थे. कोने में कद नापने का फूटर रखा था. न जाने क्या सूझा वह उसके पायदान पर चढ चली. साथ चिपके तरंगे कुछ इस तरह बदनों में तैर रही थीं कि प्रियाहरि ने उसे अवस्थित किया और ठुड्डी थाम नपने को सर पर जतन से संवारे बालों पर ला टिकाया. चार फुट दस इंच .

“ मैं भी तो देखूं “ प्रियहरि ने कहा . सटकर खड़ी रोज़बूटी ने प्रियहरि के सर को वैसे ही ठुड्डी से उठा ताना और नाप लिया.

“पांच फुट सात इंच.” रोज़बूटी ने उच्चारा .

उसकी खूबसूरत आँखों और गुलाबी बारीक होठों पर खुशी, हया और चंचलता को एक साथ समेटे मुस्कान तैर उठी थी. नज़रें उठतीं अर्थपूर्ण संकेतों को समेटे प्रियहरि की नजरों से मिलीं जहाँ वैसी ही तरंगें लहर रही थीं जिन्हें रोज़बूटी संजोए थी. वह मुस्कुराई. उस गोपन मुस्कराहट में सन्देश साफ छपा था.

उसे उच्चरित प्रियहरि ने किया – ‘जोड़ी ठीक बनी. नाप एकदम फिट है.’”

उस रोज़ फिर सारा समय औरों की भीड़ आ चुकने के बाद भी बार-बार टकराते दोनों के बीच मिलते और टकराते नयनों का रहा. वह एक पल ऐसा रहा कि फिर हर मिलन में कद मिलान की चाहतें फिर-फिर कि दिलों के दरम्यान हिलोरें मारतीं. पल चमत्कारी होते हैं . कभी-कभी एक पल वह कर जाता है जो प्रयत्नों के बावजूद जीवन भर भी संभव नहीं पाता. रोज़बूटी के साथ संयोग में गुजरा वह एक पल फिर दोनों के दरम्यान ऐसा स्थायी हो चला कि जब तक वह साथ रही खुशियों की बहार के दिन रहे. परिस्थितियां ऐसी बनती चली गई थीं कि विवाह की बेसब्री में डूबी रोज़बूटी का पड़ोसी और निजी हिस्सा बनता चला गया था. वह किस्सा बाद में कहना ठीक रहेगा। अभी मैं जीनत की ओर चलूँ.

दरअसल जीनत से प्रियहरि के संबंध दिनोंदिन ऐसे गहराते गये थे कि विराग को छोड़ वह प्रियहरि की रागिनी बन चली थी। कई बार ऐसे मौके आये जब दिल से बेकाबू जिस्मो-जां की ओर वे बढ़ चले, लेकिन मिलन की अधीरता को अचानक थाम जीनत कह बैठती - ''प्रियहरि, रहने दो ना प्लीज़। अपनी जीनत की बात मानलो। मैने सब कुछ किया है लेकिन वो काम मैने अभी तक नही किया है। मुझे बहुत डर लगता है। मैं अभी भी उस मामले में पाकीजा हूं ''

वो काम'' के मसले में जीनत का आशय वे दोनों समझते थे। उस काम को मन में छिपाए और कल्पनाओं में देखते प्रियहरि और जीनत के पास मन को मसोसने के अलावा कोई चारा न होता।

बदकिस्मती यह कि जीनत को जल्द ही प्रियहरि से बिछड़ना था। जीनत का तबादला कहीं और हो गया था। यही नहीं, उसकी शादी भी मर्ज़ी के खिलाफ कहीं और तय हो गई थी। जीनत मायूस और टूटी हुई थी। ज्यों-ज्यों उसकी शादी की चर्चाएं बढ़ीं, जीनत बेहद बेचैन और द्वंदग्रस्त होती चली गई थी। तनहाई में उदास बीते दिनों की यादों में वह रोया करती। इन्ही दिनों किसी एक दिन जीनत से प्रियहरि की अंतिम मुलाकात हुई थी जो उसकी स्मृतियों में इतिहास बनकर हमेशा के लिए थम गई है। विचित्र परिस्थितियों में हुई वह दिलरसाई की दिलचस्प मुलाकात थी। प्रियहरि के चित से जीनत के साथ अंतिम मिलन की उस प्यारी घटना का उतरना मुश्किल था। हां वह ,जब जीनत का पाकीज-वर्जित जीनत और प्रियहरि के बीच खेल-खेल में ही जन्नत के बाग का वह मीठा फल हो गया था, जिसके स्वाद की हर पुरुष और स्त्री में तरस होती है। उसे अब वह भूल जाना चाहता है।

जीनत की शादी का कार्ड प्रियहरि को मिला था। न जाने क्या कश्मकश थी कि प्रियहरि जीनत के उस रूप के सिवा, जो केवल उसका अपना था किसी और रूप में बर्दाश्त

न कर सकता था। वह नहीं गया। प्रियहरि के साथ ही सारे और चाहने वालों के दिलों में अपवित्र खलबली मचाती जीनत अपनी पवित्रता साथ लिए उन्हें छोड़ चली गई थी। यह अजीब किस्मत थी कि वह प्रियहरि को जैसे वनमाला के हवाले कर चली गई थी। उसका साथ छूटना ही वनमाला से प्रियहरि का मिलना था। बहुत बाद में वनमाला के प्रेम में डूबे प्रियहरि के दिल ने जब अपना सारा कुछ कविताओं में ढाल दिया तो अजीब था कि छपाई से पहले चयन और संपादन में प्रियहरि को जीनत ही याद आई। जीनत ने उन्हे खूब पसंद किया, चुनाव किया, अपनी राय दी, लेकिन यह अजीब था कि प्रियहरि की दूसरी प्रिया बंगाल का जादू वनमाला पर रची कविताओं के प्रति जीनत ने हौले से अपनी बेरुखाई साफ जाहिर कर दी थी। प्रियहरि जीनत से कैसे कहता कि कविताओं का जो अनुवाद उसके हृदय ने रचा, वह उसके नाम होता अगर समय के फेर से चिपकी वह उससे जुदा न हुई होती । जो भी हो जीनत किसी भी हृदय का प्यार हो सकती थी। वह इतनी अच्छी, प्यारी ओर खूबसूरत थी कि उसे भुलाना प्रियहरि के लिए कभी संभव न होगा।

जीनत का जाना प्रियहरि की सोहबत के लिए एक खलिश थी, जो बहुत दिनों तक बनी रही। तब-तक, जब-तक वनमाला उसके बहुत करीब न आ गई। वनमाला के करीब आने की आहट तो प्रियहरि के दिल को थी लेकिन प्रियहरि और वनमाला दोनों ने उस दिन लगभग उसे तस्लीम कर लिया, जिस दिन की यह घटना है।

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समूचे बचपन में फैले हुये थे

झांपियों और अंधेरे खंडहरों के वे दिन

आरिफ के कहने पर ही प्रियहरि वहां आया था। कहां उज्जयिनी, कहां, भोपाल, और कहां कोलिकाता और फिर यह जगह ? उसे कल्पना भी नहीं थी कि यही उसकी जिन्दगी का लंबा और निर्णायक पड़ाव होने जा रहा है। तब भी क्या वह बदल सका था ? शायद नहीं। अतीत उसे अब भी सम्मोहक लगता था। स्मृतियों में जीता अब भी वह अपने को अलस्सुबह हाथ में फूल लिये गोपाल मंदिर की ओर भगाता हुआ पाता था। सुबह और शाम की आरती पर उच्चरित समवेत स्वरों के साथ आगे-पीछे हाथ लहराते हुए काठ के हथौडे से घंटे पर टंकार की लय देता वह यूं डूब जाता कि जैसे गोपालजी मोर मुकुट धारे अभी-अभी मंदिर में प्रकट होने वाले ही हैं।

तब वह घनघोर रूप में सदाचारी था हालांकि घर में अचार या सींगदाना खरीदने आई अपनी समवयस्का सलमा की झुकी आंखों में तैरती चमक से चमत्कृत प्रियहरि का दिल तब उसे गिनने की हिदायतों के होते भी सलमा के हाथों गिनती से कुछ अधिक सौंप जाता था। सलमा कुछ समझकर तिरछी नज रों से उसे निहार दबे होठों से मुस्कुराती और प्रियहरि से वैसी ही भाषा में जवाब पा खुश होती और खुश करती लौट जाती थी। प्रियहरि के परिवार जैसी ही सलमा के परिवार की स्थिति थी। न तो वे इतने संपन्न थे कि उन्हें पैसे वाला कहा जा सके, न इतने विपन्न कि गरीबों की तरह उन्हें गिना जा सके। प्रियहरि को इसका इसका आभास था कि सलमा मुसलमान है, लेकिन जब वह उसके सामने होती तो वह खुद को और सलमा को अपने-अपने दायरों से बाहर पाता था। वहां धरम दोनों तरफ आंखों की चमक और ओठों की मुस्कान में आलिंगित हुआ एक हो जाता था। वैसे भी उसे अपने मोहल्ले में हिन्दू और मुसलमान कभी मजहब के रंग में नज र नही आते थे। वेशभूषा और जुबान से गर पहचान उभरती भी तो वह छोकरे और छोकरियों, गरीब और अमीर की पहचान से कमतर हुआ करती थी।

प्रियहरि के पिता शुद्‌धतः महात्मा गांधी के अनुयायी और आजादी के पहले के कांग्रेसी संस्कृति के थे। साहित्य और संस्कृति के वे गहन अध्येता थे। आजादी के आंदोलन में तब के बड़े-बडे रहनुमाओं के साथ उन्होंने दिन गुजारे थे। उन्होने असहयोग और सविनय अवज्ञा के आंदोलन के दौर में सैकडों मील की पदयात्राएं की थीं। अपने खास मित्र जो किसी एक विशेष संप्रदाय के संत थे की प्रेरणा से एक विशालकाय ग्रंथाकार के संचालक भी वर्षों तक रहे आए थे। अंग्रेज अधिकारियों के छापे के दौरान किस चतुराई से उन्होंने सारे प्रतिबंधित ग्रंथ छिपा लिए थे इसका जिक्र वे बडे गौरव से किया करते थे। युद्‌ध और शांति, अन्ना कैरिनिना, नाटरडैम का कुबडा, अपराध और दंड , बूढा गोरियो, पिता और पुत्र, गाडी वालों का कटरा, टाम काका की कुटिया, चैरी का बागीचा , मां जैसी अमर कृतियों के साथ ही उन्होंने सैक्सटन ब्लैक सीरीज और सर आर्थर कानन डायल के जासूसी उपन्यासों और उन जमानों में सनसनीखेज और बोल्ड समझे जाने वाले लंदन रहस्य जैसी जाने कितनी कृतियां पढ रखी थीं। देवकीनंदन-दुर्गाप्रसाद खत्री, प्रेमचंद, गोपालराम गहमरी और मैथिलीशरण गुप्त हिन्दी के और रवीन्द्रनाथ तथा शरतचन्द्र बंगला के उनके प्रिय लेखक थे। उस काल तक पिता सहित प्रियहरि के परिवार में कोई सदस्य ऐसा न था जिसने चौथी-पांचवी के आगे की शिक्षा पाई हो लेकिन यह विचित्र था कि दिन हो या रात पूरे परिवार में पढ ने और जो पढा उसपर चर्चा की धुंआंधार लत समाई हुई थी। दरअसल यही वे अवगुण थे जिसके कारण प्रियहरि के पिता को उस घर से निष्काषित किया गया था, जहां जैसा कि चर्चाओं में सुनने मिलता था, पैसे गिनने की बजाय पायली से मापकर धर दिये जाते थे। छोटी उमर में ही शादी का तब रिवाज था। ऐसे में कमा-धमाकर पैसा बनाने की जगह जमापूंजी के फूंकने को तब आवारागर्दी के सिवाय और क्या कहा जा सकता था ? तब भी पिता अपने में संतुष्ट रहा करते थे। वे स्वाभिमानी और तुनकमिजाज थे। अपनी जिन्दगी में उन्हे किसी का हस्तक्षेप पसन्द न था।

प्रियहरि को बताया गया था कि पिता को आजादी के आंदोलन के दौर में ही नाटकों का भी खूब शौक था। वे पढ़ने के अलावा खुद लिखते भी थे। नाटकों का शौक इतना बढ चला था कि उन जमानों में बाहर से तीन हजार रूपयों के कर्ज से एक नाटक मंडली बना रखी थी। जमाना पारसी थिएटर और मुक्के सिनेमा का था। पिता उन्हें बताया करते कि किस तरह थिएटर में परदे पर किस तरह चित्र एक-एक कर प्रकट होते और किस तरह सिनेमा का मालिक बाबूलाल खुद हाथ में लंबी छडी लिये तस्वीर में अंकित दृश्य की व्याख्या करता समझाता था। पिता भी आजादी के मसलों पर पारसी थिएटर की छौंक के साथ नाटक तैयार करते और उन्हें शहर में और दूर-दराज जगहों पर कभी खुले में और कभी सिनेमा-थिएटर किराए पर ले खेला करते थे। कभी एक बार तो थिएटर में ठीक प्रस्तुति के वक्त कलेक्टर का फरमान आ पहुचा था कि नाटक में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बातें हैं इसलिए नाटक पर पाबन्दी लगाई जाती है। मौज में वे खुद बुढापे से ढल चुकी आवाज में कभी-कभी अपने नाटकों के गीत जब परिवार के बच्चों को सुनाते तो सब हंस पडा करते थे।

प्रियहरि सोच रहा था कि क्या वे पिता के ही गुणावगुण थे जिनको उत्तराधिकार में पाकर वह दुनियादारी से लापरवाह फिलासफर हुआ चला गया था। वैसा न था तो क्यों उसने गरीबी के संघर्षों के बीच पाई वह नौकरी छोड दी, जिसे पाने लोग पैसा देते एडि यां रगडा करते थे ? उसकी स्मृतियों में सारे चित्र तैर रहे थे।

बाहर का सच गुजर जाता है, अंदर का सच फिर भी रहा आता है । स्त्री-पुरुष का प्रेम और रतिक्रिया समाज में कभी भी वैध माने गये हों, ऐसा मैने नहीं सुना । रतिक्रिया का नियमन विवाह की संस्था ने दांपत्य ने समाज में कर जरूर दिया है लेकिन विवाह में प्रेम की चर्चा कभी नहीं हुई । प्यार हमेशा बंधनों को फांदने की कोशिश करता रहा है और फांदकर ही होता है । संचित यौनरति जब किसी विपरीतलिंगी पर चित्त में केन्द्रित हो जाती है तब वह प्यार हो जाता है । सामान्य यौनरति केवल यौन की चाहत है और प्यार उसका विशेषीकृत रूप । यह ग़ौरतलब है कि प्यार भी तब तक ही प्यार रहा आता है जब तक वह रतिक्रिया की अतृप्त प्यास है । प्यास बुझाने की रूकावटें खत्म हुई नहीं कि सारा कुछ खो जाता है । प्रेम में भी विवाह का पड़ाव ऐसा ही मोड़ हैं । ऐसा क्यों होना चाहिये ? इसके पीछे शायद अस्तित्व और वरण की स्वतंत्रता को बनाये रखने का मनोविज्ञान है ।

यौनरति की चाहत मनुष्य के जन्म के साथ ही जुडी होती है । यौनांग छिपाये जाने की चीज है, उसकी चर्चा, प्रदर्शन, क्रिया वर्जित समझे जाते हैं । शायद इसीलिये वही बच्चे को तभी से लुभाने लगता है जब उसकी चेतना यौनांग को महसूस करने लगती है । तीन-चार साल की उम्र से ही यह महसूसना शुरू हो जाता है । तब एक ओर वर्जनायें होती है और दूसरी ओर वर्जनाओं को तोडने के लिये एकान्त और साथ की तीव्र कामना से भरी कोशिशों को आरंभ होती है । यह कामना इतनी तीव्र होती है कि जहां से भी निकल भागने की संधि हो चाहे वह नर हो या नारी मनुष्य का चित्त निकल भागता है । कामना की तृप्ति के लिये साथी की चाहत फिर जीवनभर चलने वाली चित्त की प्रक्रिया बन जाती है । ऐसी प्रक्रिया जो बाहर से आवृत्त अंदर की इतनी और ऐसी दिशाओं में ले जाती है कि मनुष्य का सारा जीवन उससे परछाई की तरह परिचालित होता है । यह वह अदृश्य है, जो कभी कभी तो समाज की सारी वर्जनाओं को तोड विस्फुटित होता है । अवसाद से अपराध तक के दायरे इसमें सम्मिलित होते हैं । घर से भाग जाना, आत्महत्या, बलात्कार, हत्या और अन्यथा सारी कुंठायें इसी से जन्म लेती है ।

हम लोगों का घरोबा का था । हम यानी मेरा साधारण मध्यमवर्गीय घर और हम की वह, यानी उसका घर साहूकार का हवेलीनुमा दो मंजिला बडी-बडी कोठरियों और पचीसों कमरों वाला बहुत बडा घर । ऊपर एक ओर उनका रहवास, बीच में विशाल आंगन और इसके इर्द-गिर्द बडी बडी कोठरियां जिनमें उनके बड़े किराना व्यापार के सामान्य अनाज नारियल वगैरह की सैकडों बोरियां, बांस के बड़े-बड़े पिटारे जिनमें न जाने क्या सामान आता था । बडे-बडे कार्टन्स उनमें ठंसे रहते थे । आंगन और वे नीम-अंधेरी कोठरियां इस घर के चंद बड़ों के बाद बच रहे बच्चों के लिये लुका-छिपाई खेलने ओैर जिज्ञासाओं को खोलने के काम आती थी । उन दिनों बिजली उस कस्बे तक नहीं पहुंची थे हम छोटे थे । छोटों में कुछ बड़े। उसका नाम कावेरी था । घर की छोटी लडकी। उसकी 14-15 साल की उम्र थी । विशाल आंगन में इधर उधर कुदराते और कोठरियों में छिपते बच्चों के साथ हम दोनों भी खिलाड़ी और दर्शक थे । कभी-कभी ऐसे मौके आते जब पाया जाता कि नीम अंधेरे कोने में खेलते नन्हों के मुन्ने हाफपैंट से बाहर है और वे उसे टुन्न-टुन्न बजाने तान रहे हैं । एक खिलंदड़ी हंसी होठों पर तैरती और कावेरी डांटती - ''छिः ये क्या कर रहे हो, ऐसा नहीं करते हैं ।''

यह साधारण अनुभव था । वैसा होता ही था ।इसी माहौल में साल दो साल गुजर चले । मैं उससे छोटा था, वह बड़ी। वह मकान जितना विशाल था उसके लिये वहां खेलते बच्चे हम कम थे । बच्चे तीन-चार-पांच वगैरह और कमरे कोठरियां उनके लिये अनंत । बाहर दूकान में नौकर व्यस्त होते । कुछ बच्चे बाहर सड़कों पर खेलते और कुछ दो तीन लुकी-छिपी में अंदर व्यस्त । एक दिन हमने पाया कि आंगन के कोने नीम अंधेरी कोठरी के पास टिका पिटारा हिल रहा है । कावेरी की नजर पडी बोली चलो देखते है क्या है। निहायत दुबली-पतली और सांवली कावेरी चंचल थी । साहूकार की लडकी थी इसलिये मेरी लीडर वही थी । हमने बारीक छिद्रों से झांकने की कोशिश की । दिखाई तो पडा नहीं आवाजें सुनीं । दूध की मलाई लगाने में बहुत अच्छा लगता है - एक स्वर । मुझे मालूम है तुम्हें दूध पसंद है । इसीलिये आज मैं मलार्इ्र लगाकर आया हूं - दूसरा स्वर । कावेरी ने होठों पर एक अंगुली टिकाई और मेरी आंखों में झांकते चुप रहने का संकेत किया । उसने एक ओर से उस जादूगर के विशाल पिटारेनुमा झांपी का ढक्कन उठाया । हम दोनों ने देखा बाबू और लक्खू के नन्हें अपना टुन्न लहरा रहे हैं । बाबू का हाथ लक्खू के कंपित पर था और लक्खू मलाई की चिकनाई से चकते बाबू के कंपित की घुंडी निगलते होंठ चला रहा है ।

मेरा दिल अचानक थमने लगा । वह ठहराव दिल की धडकनों से तेज होने के पहले का था । इस बार मैने कावेरी की आंखें में देखा और होठों पर अंगुंली टिकाते चुप रहने का संकेत किया । झांपी के अंदर बच्चे अपने आप में इस कदर तल्लीन थे कि हमने कब झांपी खोली और बंद किया उन्हें पता ही नहीं चला । कावेरी ने मेरा हाथ पकडकर खींचा और बोली -चलो अपन भी लुका छिपी खेलते है ।

वह दौड़कर परले किनारे की नीम अंधरेी कोठरी में जा छिपी । रोशनी की छाया उन कोठरियों में दरवाजे के इर्द-गिर्द ही रहती थी । शेष रहा आता बोरियों में छिपा अंधेरा । मै उसके पीछे भागा । बोरियों के ऊंचे-नीचे ढेर पर अंधेरे में मेरी नजरें कावेरी को टटोल रही थी । अचानक एक जगह सरसराहट हुई । धीरे-धीरे अंदाज से मैने बोरों की पहाडियों में वह घाटी ढूंढी जहां कावेरी छिपी थी । पास आने पर उसने और दुबकने की कोशिश की मैं पहुंचा तो उस संकरी जगह में उभरे बोरे से टकरा ठीक उसके ऊपर गिरा । दोनों का उठना मुश्किल था । उठने संभलने की कोशिश में कावेरी का बदन मुझसे और चिपका पड रहा था । लुका-छिपी का खेल कब दूसरे खेल में बदल गया इसका पता ही नहीं चला । दोनों की सांसें भारी हुई जा रही थी । मेरी छाती से कावेरी की छाती दबी पड रही थी । जंघाओं के बीच का लंब फन काढे लपका जा रहा था । कावेरी फुसफुसाई - अच्छा लग रहा है,, दिखाओ । जाहिर है ऐंठते लंब की कमर पर चुभन को उसने महसूस कर लिया था । मैं ढीली ढाली हाफ पैंट पहनता था और कावेरी वैसी ही फ़्राक में थी । उसने मेरे कंपित लंब को पकडा और नीम अंधेरे में निहारती बोली आह बडा अच्छा है । कावेरी ने मेरी गोद में सिर झुका कंपित लंब की घुंडी होठों के बीच निगलते पूछा – मैं भी देखूं भला कैसा लगता है । मेरी अधीरता वह बढाये जा रही थी । उसके होठों को निगलता मैने उसे वहीं दबाया और बोरों की गडमड्‌ड उभार के बीच उभरे उसकी नन्हीं के बीच अपनी काया के विस्तार को डुबा दिया । बच्चों के अपने हाथों गुदगुदाये जाने वाला वह मांसल विस्तार उस रोज पहली बार कहीं और कसरत करता गुदगुदा रहा था ।

''हाय रे कितना अच्छा लग रहा है'' - कावेरी बुदबुदाई । अधिक कौशल की गुंजाइश न थी। चंद मिनटों में यौवन के रस से हम दोनों के नन्हा-नन्हीं नहा गये थे । फिर कुछ देर खामोशी रही । ऐसा लगा जैसे दोनों को नींद आ चली हो । कावेरी ही बोली -चल उठ चलते है । मुझे चिपकाती और मेरा चुम्मा लेती उसने कही -

तू बहुत अच्छा है । आज मुझको पहली बार मजा आया । अब अपन रोज यूं ही खेलेंगे, हां। उसने हिदायत दी कि ये बात किसी को बतानी नहीं है ।

यह भांपते हुये कि इर्द-गिर्द आवाजाही तो नहीं है । हम बाहर निकल आये । दोपहर होने को आई थी और भूख का समय था । आंगन में पडी झांपी अब भी पडी थी । कावेरी ने ढक्कन उठाया । दोनों नन्हें खरगोश झांपी से कुलांच चुके थे । उस दिन के बाद कावेरी ने पिटारियों में झांकना छोड दिया था ।

झांपियों और अंधेरे खंडहरों के वे दिन समूचे बचपन में फैले हुये थे । गर्मियों में जब बडे बुजुर्ग घर की छांह में राहत ढूंढते थे । तब नन्हें हम लोग मिट्‌टी के खंडहरों में लुका छिपी खोलते थे । उस लुका छिपी के अंधेरों में एक एक दो-दो कर अंधेरे कोनों में साथ होना भी अजीब गुदगुदी भरा होता था । खंडहर का अंधेरा सूना एकांत बदन के अंधेरे में छिपे उपेक्षित से दोस्ती करने और खेलने की चाह जगाता था। उस उपेक्षित का ,जिसकी तरफ उजाले और स्वीकृत रिश्तों की भीड में भूले से भी देखना गुनाह था। कभी बडे लौंडों के समूह में होते थे तो वे अजीब तरह के खेल सिखाते । खंडहरों के बडे ढूह में इमली का एक विशाल दरख़्त था । चूडीहार मुसलमानों की बकरियां वहां मिमियाती चरती और खेलती थीं । एकाध दफे यूं हुआ कि बड़ी उम्र के शैतान लौंडे वहां हमारी अगुवाई में पड गये । बारी-बारी से वे छोटों को चुनते और पुटठों के बीच चढ़ने का खेल सिखाते . आनाकानी करने पर वे डांटते और मजा लेते । पशोपेश में पड़े छोटे उनकी आज्ञा का पालन करते करते डर से भाग खडे होते थे । आबादी तब कम हुआ करती थी । बस्ती से बाहर एक डेढ़ कोस में ही जंगल शुरू होता था । आंवलों के खूब पेड़ हुआ करते । भरी दुपहरी पत्थर मार-मार आंवले झड़ाते और जंगल की झुरमुटों को लांघ आध एक मील दूर घुसकर वहां के शांत सन्नाटे को धुकधुकी में महसूसते खड्‌डों, नालों, जानवरों से आशंकित खौफ खाते सांझ ढले तक लौट आते थे । उन दिनों यही हमारी पिकनिक का खेल था । बच्चे के उस मुकाम तक बड़ा हो चुकने के बाद, जहां उसकी देह का गोपन अपने स्वर्गिक रस का अहसास कराता, बच्चे में निषिद्‌ध कामनाओं की चुलबुलाहट पैदा करता आदम के बाग में विचरण की उत्कट प्रेरणा जगा देता है, उसके सामने दो ही बातें रह जाती हैं। एक वह, जिसमें वह स्वयं को पाता है और दूसरी वह, जो उसे निरन्तर खींचती आदम के बाग की सैर कराने लुभाती है। वह उमर ऐसी ही थी । औरतों-लडकियों की दुनिया उन दिनों चहारदीवारियों की ही हुआ करती थी । इसलिये उनकी तरफ ध्यान चढ़ती उमर के साथ ही जाना शुरू हुआ था । आम तौर पर छोकरों के समूह में छोकरे ही यार हुआ करते थे। आकर्षण का सूत्र क्या है, उसके नियम क्या हैं, यह कहना मुश्किल है । समवयस्कता में साथ चिपकने का लगाव और उसकी चाहत समानधर्मिता से पैदा होते थे । कुछ साथी ऐसे ही हुआ करते थे । रमण हकलाता था लेकिन सीधा और कुशाग्र था । उससे मेरी दोस्ती थी । सभी उसके इर्द गिर्द रहते थे । उन दिनों तो वैसे चिपकने-चिपकाने की जुगुप्सा केवल गुदगुदी में थी, लेकिन सालों बाद बड़े जवान हो जब हम नौकरियों में थे और आगे बढने की जुगत में एक बार संयोग से साथ किसी नगर में मिले तो उसे मैने अपनी पुरानी यादें जगाने अपने ही साथ ठहरा लिया था । खूब यादें दुहरायी गयी । मेरी कोठरी के एकांत में जब रात गहराने लगी तो माहौल भी जवानी की बातों का चल पडा । साथ सोने में हम दोनों झिझक गये इसलिये मापन की गोपन जिज्ञासा बातों और बातों सी बातों में सिमट आई । हम दोनों का ध्यान एक दूसरे के परम गोपनीय पुरुष दंड पर केन्द्रित हो गया था । उतावले पथ में सनसनाता अपना गोपन पौरुष मैने प्रकट किया और उससे कहा कि स्पर्श कर वह जांचे कि कैसा है ? उसका गोपन पौरुष जब मैने देखना चाहा तो बडे संकोच मे पड़ता वह राजी हुआ । उसने निकाला और मैने उसे जांचा । वह बोला कुछ नहीं बे, एक जैसे ही हैं । तेरा पुरुषत्व कुछ ज्यादा मोटा है । मेरा कुछ लंबा लेकिन पतला है । इस सब के बावजूद हमने वैसा कुछ नही किया, जैसा बचपन में खेल-खेल में हो जाया करता था । प्रायः वैसा खेल संकोच-भरा और एकांतिक हुआ करता है। बहुत छोटी अवस्था में ही घर से हास्टलनुमा जगह में बहिष्कृत मुझे उस मौज का भी अनुभव हो चला था ।

वहां हम लोग गिनकर कुल दस थे । खाना-पीना,, रहना, पढना, स्कूल जाना सब नियमित और समान था । हम अलग अलग पृष्ठभूमियों से आये थे । तीसरी-चौथी से आठवीं-नवीं के बीच के विद्यार्थी थे। भोजन के समय शुरू-शुरू में ''सहनाववति, सहनौ भुनक्ति, सहवीर्यम्‌ करवावहे'' का मंत्र हम पढते थे। बाद में मंत्र तो छूट गया और सहकार में केवल भावना रही आई थी ।

एक कमरे में लाइन से चार-पांच खाटें पडती थी । कभी-कभी पढते-लिखते मौज का माहौल बनता । वैसे माहौल का खास मजा तब बनता जब कुछ और साथियों की गैरहाजिरी होती और कमरा दो या चार के लिये रातों को हमारे बीच छोड जाता । सच होता या झूठ जानने का जरिया नहीं था लेकिन गांव के वे लडके देहात की ''ऐपन आड़ लिलार'' छोकरियों के किस्से छेडते और लिजलिजे चुटकले सुनाते थे। एक ने किस्सा सुनाया कि कोई गांव की लडकी थी । अपनी दादी के साथ रहती थी । बरसात के दिन लग रहे थे । पास का झडीराम बगल की अंधेरी कोठरी में गांव की उस लडकी के पीछे लगा था । बुढिया थी बगल की कोठरी में । झडीराम जब ललना की झाडियों में प्रवेश करने दंड संभाले आगे बढने लगा तो आधे भय और आधे लोभ से गदगदाई गांव की लडकी वह ललना चीखी -'' देख न दाई झडी हर करत हे मै का करों ।''

दाई ने अपनी अंधेरी कोठरी से ही जवाब दिया- ''बने हे फुलमत करन दे झडी लगही तभे तौ बनही बेटी ।'' उसका आशय वर्षा की झड़ी से था।

गांव की उस ललना ने उसमें मनचाहा आशय ढूंढ लिया था। उसने जवाब दिया

-‘ जा अब तंही कहत हस तो महूं कुछु नइ करंव।‘ बुढिया का जवाब उसके लिये स्वीकृति का बहाना था । उसने झडी को संभाला और जमकर बरसात करा अपनी सारी जमीन भिगो ली ।

पहाड़ों के उस हास्टल का संबंध एक परमार्थ संस्था से था । देखभाल एक बाबाजी वैद्यराज करते थे । उनकी एक नजदीकी मरीज दवाखानों के अंदरूनी हिस्से में उनसे परीक्षण करा ऐसी तसल्ली पा चुकी थी कि उन प्रौढ़ वैद्यराज की कोठरी में सूनी दोपहरियों में अपना इलाज कराने वह यूं घुस पड़ती थी कि बाबाजी भी धीरे-धीरे उसके मरीज हो गये थे । यह ऐसा मर्ज था कि मरीज ही मरीज का इलाज कर सकता था । कई बार कौतुक में परिसर के विशाल बागीचे में यहां वहां पेडों के पीछे छिपे हम छोकरे दो मरीजों के मिलन और इलाज की जासूसी में लग जाते थे ।

त्यौहारों की या गर्मी की छुटि्‌टयों में ऐसी रातें भी आती जब कमरे में एक दो तीन खाटें ही आबाद होती थीं । मैत्री के संबंधों में नजदीकी गहराती चली गई थी । साल दर साल गुजर चले थे । इसलिये दूरियां भाग गई थी । रात यूं लगता कि दूर-दूर क्यों सोया जाये । तब एक के इशारे से दूसरा पास की खाट में आ जाता । बातों ही बातों में दूसरी खाट कब गायब हो जाती पता न चलता । फिर देहों का साथ अंगों में सनसनी भरता दंड को दंड-बैठक कराने लगता। किशोरों के अन्दर से बाहर कुलांचते उनके वे खुलकर कब लिपटते-झपटते आपस में नाप जोख करने और टकराने लगते इसका पता ही न चलता था। पिछवाडा कभी किशोर दिमाग में घुसता न था इसीलिये अंततः एक दूसरे का हाथ मदद में सामने आता और ढेर सारी झाग उगलते उन्हे शांत कर जाते थे। एक-दूसरे को देखने की जिज्ञासा हर किसी के मन में रहती थी।और यूं फिर सब ने धीरे-धीरे सब को जान लिया था । हममें से एक था मनीराम, दुबला पतला, पक्की काली रंगत का किशोर । लेकिन उसकी सरलता और स्वभाव सभी को पसंद थे । था तो मनीराम साधारण ही कद का हमीं लोगों जैसा । बल्कि कुछ छोटे ही कद का, लेकिन गहरे श्याम रंग के चिकने चेहरे वाले मनीराम का अंदर वहां सभी को लुभाता था । वहां भी गहरी श्यामता थी, लेकिन पूरी चिकनाई के साथ । यह विचित्र था कि छोटे कद के सुकुमार मनीराम का अंदरूनी मनीराम औरों से लंबा और लुभवना था । वह सर्वविदित हो गया था । यहां तक कि उस पंद्रह एकड़ में फैले बागीचे से युक्त हास्टल का नेपाली माली सह चौकीदार भी जो उम्र में हम लोगों से बहुत बडा और जवान था स्पृहा में आश्चर्य करता और बोल उठता - ओरे बाबा रे मैने देखा है मनीराम को। वह तो लंबा है, जोरदार है ।

बाबा वैद्य तो क्या वहां का चौकीदार, वहां का रसोइया जो बदलते रहते थे, सभी अपने-अपने ढंग से चालाक थे । बाहर से नौकरानियां काम करने आती और धीरे-धीरे यूं होता कि इन सब के तनावों को राहत देने का काम निबटा जाती थी । एक लडका था पूरनदास । उसके बारे में चौकीदार ने कभी यह जाना और फैलाया कि किसी दिन पूरनदास ने विशाल लंबाई में पसरे कमरों के छोर पसरी सीढ़ी पर उस परिसर में रिरियाती कुतिया से पश्चालिंगन में अपना प्रेम दर्शा डाला था । किसी और एक दिन बताया गया कि सुबह-सुबह रसोई या में रसोई बनाते रंगीन मिजाज रसोइये खोरबहरा ने अंदर पुताई करने गई नमकीन रेजा मजदूरनी के साथ गुप्त रसोई भी पका डाली थी । बहाना यह था कि ठीक दरवाजे के ऊपर दीवार पोतनी थी सो सीढ़ी टिकाने और सहारा देने उसने रसोई का दरवाजा बंद कर लिया था । वह हाफ पेंट पहनता था । रेजा की पुताई करने में उसे परेशानी नहीं हुई होगी ।

दिन और रात गुजरते दस में से सात-आठ फेल या पास होकर या दीगर पारिवारिक दबावों से हास्टल छोड चुके थे । उमर के बढ़ते-बढ़ते रुचियों और संगत में भी बदलाव आ गया था । यहां एक बहुत समृद्ध लाइब्रेरी थी, जहां बैठकर मैं सारे अखबार और पत्रिकायें माया, मनोरमा, मनमोहन, मनोहर कहानियां, धर्मयुग, हिन्दुस्तान वगैरह चाट जाया करता था । वह सब तो सुबह शाम का दो दो घंटे का दिमागी नाश्ता था । दिमाग का पेट न भरता तो सेक्स, बच्चों के सीरीज के उपन्यास, कुशवाहा कांत की किताबें, बाल्ज़क, शरतचंद्र, रवीन्द्र, बंकिम, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, गुरूदत्त वगैरह के उपन्यासों से दिमाग को तंदुरूस्त करता । सेहत को अंगूठा दिखाता मैं समय बिताता था । चर्चाओं में अब प्रौढ़ता थी और स्कूल के दूसरे दोस्त साथ बैठने लगे थे ।

एक था आनंद । वह स्कूल के खुलने और बंद होने के बाद किसी दुबली, सांवली रेशमा के दीदार से आंखे सेंकता था । मेरी पसंद सरोजनी थी, दुबली-पतली सुतवां देहयष्टि की गंभीर गोरी छोकरी । हम दोनों अपनी अपनी पसंद की यादों में कसीदें काढते कविता, कहानी की उधेडबुन में रहते गो कि वह उस समय हमारे बस के बाहर की चीज थी । पहाड़ी कस्बे के एकमात्र सिनेमाघर के बगल में वह रहता था और फिल्मों के टुकड़ों को कांच के लैन्स से सिनेमा की तरह फैलाकर देखने का शगल वह रखता था । तीन-चार मील के दायरे में और सात-आठ हजार की आबादी के कस्बे में वह सिनेमा रोज शाम बगैर घडी घंटाघर का काम करता था । पूरे शहर में वहां बज रहे ग्रामोफोन ही आवाज गूंजती थी । बाहर लाउडस्पीकर और रेडियो का चलन भी बहुत कम था इसलिये ''अंखिया मिलाके नजरें चुराके, एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन, सांझ ढले खिडकी तले तुम सीटी बजाना छोड दो,'' वगैरह की तरंग से क्रस्बे का मौसम भी रोमानी हो जाता था । लोग समझ जाते कि शुरूवात छः बजे से हुई है । ठीक साढे-छः बजे जब ''आरती करो हर हर की करो, नटवर की, भोले शंकर की'' वाली धुन बजती तो पता लग जाता कि सिनेमा शुरू हो रहा है । नाडिया-जानकावस, जयराज, निरूपाराय, भगवान और मुकरी की फिल्में आती जाती रहती । दिलीपकुमार देवानंद, अशोक कुमार, राजकपूर जैसे बडे कलाकारों की या जैमिनी, महबूब सोहराब मोदी, फिल्मिस्तान की फिल्में महीनों के पोस्टर प्रचार के बाद जब आती तो लोग बा-कायदा घरों में सिनेमा देखने के कार्यक्रम बनाते अपनी रोजमर्रा की सारणी को योजनापूर्वक तब्दील करते थें । वह उत्सव की तरह हुआ करता था ।

मदर इंडिया, मुगले आजम, कोहिनूर, जंगली, गंगा जमुना, जिस देश में गंगा बहती है, तुमसा नही देंखा के जमाने तक मेरी स्कूलिंग खत्म हो चली थी और चर्राती जवानी अब नये सपने देखने लगी थी । ये वे दिन थे जब पंडित नेहरू, लोहिया और चीन भारत पर छाये थे । नेफा की वारदात गर्म हो रही थी ओर कृष्ण मेनन का जादू गायब हो रहा था । इस समय तक प्रकाशित सारा चर्चित साहित्य मैं पढ चुका था । यशपाल का झूठा-सच, ताराशंकर का गणदेवता, विभूतिभूषण का पाथेर पांचाली, आरण्यक, और ढेर सारा साहित्य मैं दिन-दिन पढ़ता बैठता । बचा समय आवारागर्दी और सिनेमा देखने में गुजरता । यह दौर मेरे पुष्पा युग में प्रवेश का था । नवीं दसवीं में पढ़ने वाली यह छोकरी ठीक सामने के मकान में थी । पहाड़ी गोरी रंगत लेकिन आंचलिक हिन्दी का परिवेश । चेहरा उसका अंडाकार था, सिर से चिपटी घुंघराली जुल्फें, बडी बडी आंखें और अल्हड अदायें ।

लडकों के समूह में कद काठी में असाधारण होकर भी मैं प्रखर था । पुष्पा से देखा-देखी की शुरुवात एक अनोखे अंदाज में हुई । आंखें जब-तब मिलती थीं और आंखों के इस मिलन में एक दूसरे की गतिविधियों को चाहत के साथ देखने का लगाव जाहिर है हम दोनों में छिपा था । एक रोज मै अपने दो मंजिले पुराने ढब के बाडे के दरवाजे सामने नल के कटघरे में बैठा था । आसपास छोकरे खेल रहे थे । कोई ऐसी बात हुई कि हमारी आंखें मिली, चमकीं और पुष्पा के होंठों को उसकी आंखों की संगत में मैने चुहल से हंसते चेहरे के साथ हंसता देख लिया । दिलों के तार खनखना रहे थे । मेरी आंखों ने उसे बरजा और मेरे नल की सपाट दीवार पर मेरे हाथों ने लिख दिया हंसों मत । वह और मुस्कुराई और हंसी । मैने वैसा इसलिये लिखा था कि आंखों से आंखों की मुठभेड़ लोगों की आंखों में न आये । बस क्या था संकेतों की भाषा पर सहमति और मौज का मूड बदलकर इश्क में तबदील हो गया । मेरे दो मंजिले की खिड़की से उसके दरवाजे की सीढ़ी दिखाई पडती थी जहां वह बैठ जाती थी । देखा-देखी का बुखार सर पर इस कदर चढा कि सम्मिलन और सहभोग की चाहत बेचैन करने लगी । घंटों की टकटकी और मौन संवाद । उन जमानों में अवसरों की छूट ज्यादा न थी तो प्रेम उसकी प्यास में होता था । बल्कि सच तो यह है कि अब भी प्यास ही प्रेम है । प्यास बुझी कि प्रेम खतम । इसीलिये अब तो स्कूल के छोकरे-छोकरियों के बीच खुली बातचीत का माहौल और मोबाइल फोन ने प्यार को पेप्सी बना लिया है । इंस्टेंट प्यार, इन्स्टेंट संभोग । देवदास की कथा दोहराने यहां कोई अवकाश नहीं है । औरतें मर्द की कमजोरी और अपनी कीमत जानती हैं। इसलिये अब हो तो यहां तक चला है कि मजबूर औरतों ने ही नहीं, बल्कि भद्र श्रेणी की छोरियों और औरतों ने मर्द की मजबूरी को मनोरंजन और पैसा कमाने का धंधा बना लिया है ।

किशोरी पुष्पा से मेरे किशोर ह्रदय का इश्क साल-डेढ़ साल चला। लेकिन माजरा वही था। ''सब कुछ सौंपना, लेकिन ताला न खोलना'' की नैतिकता आड़े आती थी। कमला मेरी पड़ोसन थी, तकरीबन हमउम्र गदराया श रीर। कमला से मैंने चिट्‌ठी भिजवाई कि मेरा प्यार पुष्पा कुबूल करती है फिर मिलने से क्यों कतराती है ?''

कमला चिट्‌ठी के साथ ही चिट्‌ठी का जुबानी जवाब लाई'-''वो कहती है कि नहीं। वह काम संभव नहीं।''

उतावला होता मैं धीरे-धीरे बहुत अधीर हो चला। सरे आम पुष्पा को छेड़ना, मोहल्लों में ट्‌यूशन पर जाते उसमें जूड़े से फूल खींच लेना, फिकरे कसना, उसके घर में सीकचों के पार कंकड़ में फंसाकर मोहब्बत के पुरजे फेंकना वगैरह। होली में मैंने सरे आम उसे छेड़ते उसके गालों पर रंग पोत दिया। अपनी समझ में दीवानगी के वैसे इजहार से मैं हीरो बना जा रहा था। मुझे क्या मालूम था कि औरत की निगाह में प्यार बंधनों और पोशीदगी में होता है। उस पर हक जताना और सरेराह दावा ठोकना स्त्री की निगाह में अभद्रता और गुंडागर्दी होते हैं। पुष्पा मुझ पर नाराज़ हुई और यूं रूठी कि बाद का बड़ा अरसा मेरे लिए मायूसी और उदासी का रहा आया। बाद में आवारागर्द और गैर-जिम्मेदार होने से बचाने मुझे कहीं और दूर भेज दिया गया। पुष्पा कहां गई, कहां है फिर मैंने नहीं जाना। यह कैशोर्य का वह दौर था जवां चढ़ती उमर उस बछड़े की होती है जो चढ़ तो नहीं पाता लेकिन चढ़ने की उतावली भरी कोशिश जरूर करता है।

पुष्पा से संबंधों-असंबंधों का दौर बीतते-बीतते ही मेरी निकटता आरसी से हो लगी थी। किशोर-वय बड़ी अजीब होती हैं। प्यार-व्यार तो जो कुछ होता हो, एक किस्म की चंचल उतावली और खिलंदड़ापन ज्यादा होता है। भविष्य के जीवन की सच्चाइयों और उतार-चढ़ाव का तब वैसा ध्यान नहीं होता है जैसा प्रौढ़ होते-होते आदमी अनुभव इतना है। आरसी और मेरी उम्र में तकरीबन तीन साल का फर्क था। उसे मुझसे उम्र में काफी बड़ा मेरा रहनुमा दोस्त ब्याह कर लाया था। दोस्त की उमर अगर पच्चीस थी तो मेरी सत्रह और आरसी की बीस। वह उस शहर में अकेला था। हालांकि मैं चंचल और आवारागर्द समझा जाता था, पढ़ने-लिखने की गंभीर रुचियों में हममें दोस्ती पैदा कर ही थी। राजनीति, साहित्य और दीगर ज्ञान-विज्ञान के मामलों में हम दोनो में खूब चर्चा होती। दोस्त और आरसी के सामने मैं बस बच्चा ही था। मैं अक्सर उन्हीं के यहां रहा आता था। अंदर किशोर सुलभ जिज्ञासाएं थीं, ज्ञान-विज्ञान के लिए भी और लुगाई स्त्री-देह के प्रति भी। बड़ा देखने की कोशिश करने पर भी काया और व्यवहार में ऐसा बचपना था कि मैं युवा या युवा जैसा बड़ा समझा जाने के काबिल उनकी निगाह में न था। दोस्त की गैरहाजिरी में भी बातें करना-गप्पें लड़ाना और छोटे-मोटे कामों में हाथ बटाना, सौदा सुलफ पास की दूकानों से लाना-लेजाना में अपने दोस्त और आरसी का लगभग प्रिय अनुचर ही था। मैं खुद भी अपनी उस हैसियत से खुश था। न जने क्यों बहुत दिनों तक अन्यथा कोई बात मेरे चित्त में आई भी नहीं।

आरसी आई तो देहात के किसी बड़े घर से ही थी, लेकिन अनिन्द्‌य सुन्दरी थी।बेदाग गुलाबी चमक और सुचिकरण देहयष्टि के हाथ उसकी जवानी कैशोर्य से आगे बढ़ चली थी यद्यपि अपने सहज स्वभाव और ग्रामीण संस्कारों के चलते शहर में होने के बावजूद उसके व्यवहार में किशोरपन ही छलकता था। मेरे दोस्त पति की तरह ही उस आरसी में भी खुलापन और निश्छलता थी। उसका खूबसूरत चौकोर चेहरा भरा-भरा था। आंखें अपनी चमकती भूरी पुतलियों की लुभावनी चमक के साथ बड़ी-बड़ी थीं। मुलायम गुलाबी होठों के बीच उसकी झक्क सफेद दंतावली जैसे समानुपातिकता में यत्न से तराशी गई थी। जब वह सहज मुस्कुराहटनुमा हंसी हंसती तो विस्तरित गुलाबी होठो के बीच उसकी दंतावली की चमक उसकी अनगढ़ सुरीली आवाज की खनक के साथ बिजली की चकाचौंध पैदा करती थी।उसके वक्ष पुष्ट थे और चोलियों के बीच कुंभों की तरह उभरे दिखाई पड़ते थे। साधारण औरतों में ब्रा का चलन बाद में धीरे-धीरे हुआ था लेकिन बगैर ब्रा के भी चोली के कसाव में स्तनों की नुकीली घुंडियां स्पष्ट दिखाई पड़ती थीं। चेहरा ही नहीं, आरसी नख से शिख तक कोमल बदन की तराशी जीती-जागती गुड़िया की तरह थी। उसकी केश-राशि घनी थी। काली घटा की तरह सघन केश-राशि अपनी हल्की सलवटों के साथ घुंघरालेपन का आभास देती और सिर से पीठ पर लहराती कटिप्रदेश के नीचे तक उसकी अयत्नज देहाती चोटी के रूप में फैली झूलती रहती थी। यह अजीब बात थी कि किशोरी कामिनियों के प्रति ललक भरी चाहत के बावजूद मेरा ध्यान बहुत अधिक अपने ठीक करीब खेलती इस खूबसूरत आवाज गुड़िया पर नहीं गया था। सहज परिवार जैसे आपस के संबंधो और विवाहिता की हैसियत के साथ उसके उम्र में बड़े होने के अहसास के चलते शायदवैसा नही हो पाया था। फिर अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि पहली बार उस अहसास ने मुझसे प्रवेश किया। बसन्त का मौसम और होली का माहौल था, होली अभी दो-दिन की दूर थी। शाम का समय होने को आया था। जब मैंने उसके घर प्रवेश किया तो वह सफाई के सीमेन्टी चौखटे पर जूठे बर्तन घिस रही थी। मेरी ओर उसकी पीठ थी इसलिए मेरा आना वह देख न पाई थी। अपनी किशोर सुलम चंचलता में दबे पांव पहुंच मैने पीछे से हथेलियां बढ़ा उसकी पलकों पर अंगुलियां रख दीं। आरसी में अल्हड़ खुलापन था। इसलिए हल्के से चौंकने के बावजूद वह भयभीत न हुई। मेरी अंगुलियों को उसने अपनी अंगुलियों के स्पर्श से पहचाना और बोली-'छोड़ो न, मैं बर्तन मांज रही हूं। मेरा नाम उशा रते उसने कहा कि मैं पहचान गई तुम अमुक हो।'' अनौपचारिक संबंधों का माहौल, बसंत का मौसम और उस खास क्षण की रंगत अचानक कुछ ऐसी हो उठी कि उसका गुलाबी चेहरा अपनी अस्तव्यस्त अलकों के साथ किंचित लालिमा से भर गया था। मैंने पलकों पर से अंगुलियां हटा दी थीं । लेकिन अचानक वे लालिमा से सक्रिय हो उसे उसके गालों पर चहलकदमी करने लगीं। उसकी आँखों ने एक बार मुड़कर मुझे निहारा था, लेकिन अवरोध का भाव न तो आंखों में था न मुद्रा में। सफाई की चौखट के लंबे संकरे कोर पर वह बैठी थी इसलिए बदन असंतुलन में लड़खड़ा गया था वह पीछे लुढ़कने जैसी हो रही थी-''छोड़ो न, मैं गिर जाऊंगी -उसने कहा। मेरे घुटनों पर वह थमी थी। गालों से हथेलियां हटीं और न जाने क्या मुझे क्या सूझा कि उसके कमर को दोनो हाथों से घेरते अपनी हथेलियों में उसके गदराए कुम्भों को थामे आगे झुकते हुए उसके गुलाबी होठों पर मैंने अपने होठ रख लिए। सारा कुछ आकस्मिक और अनियोजित था। उसकी सांसों की धड़कनों की तेजी मेरी हथेलियों में फंसे काया- कुंभों के उतार-चढ़ाव से मेरी नसों में पहुंच रही थी। वह कह रही थी-''तुम भी अच्छे हो। कोई देख लेगा तो ! देखो दरवाजा खुला है।''

उस वक्त अचानक मेरे बलात बंधन से मुक्त सामने खड़ी आरसी के चेहरे पर मेरी नजर पड़ी थी। मैंने देखा कि आरसी के गुलाल मिश्रित दूध जैसी गोरी रंगत का चेहरा अचानक गहरी लालिमा से भर उठा था। कोमलता की जगह वहां जड़ता ने ले ली थी। आरसी की मुद्रा गंभीर हो उठी थी और वाणी मूक हो चली थी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें लाल होती आंसुओं से डबडबा रही थी। वे मूकता में मुझे घूर रही थीं। मेरा मन तब भय से भर उठा था। इस आशंका से कि वह नाराज न हो उठी हो और कहीं चुगली न कर बैठे मेरा मन घबरा रहा था। जीवन के बाद के पड़ावों में फिर कभी यह ज्ञान हुआ कि वैसी अवस्था स्त्री में नाराजगी में ही नहीं, अपितु वासनाओं से दीप्त देह की संभोगातुर कामना में भी प्रायः प्रकट होती है। ऐसे ही पड़ावों में प्यार की विचित्र कथा बनी।

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''हाय प्रियो, लुक हियर'' : वनमाला बनाम अनुषा

वह जाड़े की शुरुआत की एक गुनगुनी सुबह का दिन था। वहां सुबह का समय प्रायः शांत और कोलाहल रहित होता था। स्टॉफ रूम में प्रियहरि अकेला बैठा था जब वनमाला ने जाड़े की गुनगुनी धूप की तरह ही हरे पल्लू की पीली साड़ी में एक साथ ही स्टॉफ रूम और प्रियहरि के दिल में इस जगह पहले-पहल प्रवेश किया। वनमाला को देखते ही प्रियहरि को तब ऐसा लगा था जैसे हवा के एक खुश बूदार झोंके में समाई कलकत्ते की वह बंगाली बाला अनुषा दबे पांव उसका पीछा करती उसे चौंकाने सामने आ खड़ी हुई हो। पल भर में ही अनुपस्थित-उपस्थिति की अपनी वैसी प्रभा में समेट प्रियहरि को वह उस जगह उड़ा ले चली थी जो इस वक्त उसकी स्मृतियों को आंदोलित कर रहा था।

सुबह-सुबह हावड़ा के विशाल रेलवे स्टेशन पर वह उतरा था। स्टेशन कैम्पस के बाहर सटे हुए गुमटीनुमा स्टाल पर उसने उतनी सुबह ही गरमागरम इडलियों के साथ चाय ली थी। लंबी यात्रा की थकावट से उस तरह उसने राहत की सांस ली थी। नजर जहां-जहां दौडती गई उसने पाया था कि एक करोड की जनसंखया का कास्मापोलिटन महानगर समझे जाने के बावजूद यहां भी अपनी भीड के साथ वही देहाती भदेसपन बरकरार था जो हिन्दुस्तान के हर बडे-छोटे शहर में अट्‌टालिकाओं और झोपडियों, भद्रलोक और अकिन्चनवत्‌ जन के बीच पसरा होता था। मुम्बई का महानगर ही एक अपवाद था। वहां की चकाचौंध और उसमें आत्मकेन्द्रित जन के रेले के विपरीत यहां फुटपाथों, बाजारों, गलियों में कस्बाईपन का ठीक वैसा ही माहौल पाया जाता था जैसा उसके अनुभव में बसा था।

आधे किलोमीटर पर ही आवारा सांडों, हाथगाड़ियों, मानव-रिक्शों के साथ तादात्म्य स्थापित किये सडती सब्जियों का ढेर पसरा था और उन सब के साथ सब को चीरकर निकल जाने की कस्मकस में ट्रामों, टैक्सियों, और कारों की चीख दौड रही थी। हाटों, पुकुरों, टोलों, पाडों और सरणियों में पसरे इस महानगर ने जल्द ही उसे भी लील लिया था। बहुत धीरे-धीरे उसकी समझ में आया कि रोशोगुल्ला, रोबिन्द्रो भारती, ऐतिहासिक महत्व के पुस्तकालयों, कालीघाट की स्थायी चहल-पहल, एस्प्लेनेड, प्रेसीडेन्सी कालेज, नन्दन थिएटर और ज्योतिबाबू में रचा-बसी उसकी एक खास संस्कृति है, जो समानता में भी विशिष्टता लिए कोलकाता को अलग पहचान देती है। तब वह भी उसका गुणगान यूं करने लगा था जैसे उस जमीन पर उसका पैदाइशी हक हो। अब वह नवागन्तुकों को वैसी ही चिढ़ाने वाली निगाहों से तौलता जैसा उसे शुरुवाती दिनों में तौला जाता था। वह जैसे बदस्तूर एक नियम था, जिससे हर नवागंतुक को गुजरना होता था। अब उसकी जुबान ने भी वाक्यों और शब्दों के अकारान्त पर ओकारान्त की परत सगर्व चढा ली थी। उसका व्यक्तित्व ऐसा था कि अंदर से एकांतिक होता भी समाज और माहौल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए बिना वह चैन से नहीं बैठ सकता था। मार्क्सवादी राजनीति और ट्रेड यूनियन के तौर-तरीकों में रंग चलने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा था।

तकरीबन दो सौ सरकारी-गैरसरकारी कालेजों का नियमन करने वाली यूनिवर्सिटी के अपने दूरस्थ कालेज का वह हिस्सा बन चुका था। अजनबीयत का पहला महीना गुजरते-गुजरते पचास-साठ के स्टाफ वाले उस कालेज का हिस्सा प्रियहरि बन चुका था। जल्द ही अपनी प्रतिभा और व्यक्तित्व से लोकप्रियता और इज्जत हासिल करने में वह सफल हुआ था।

उसका खुद का ठिकाना बहू बाजार की नयी-पुरानी इमारतों के बीच दो कमरों का एक फ्‌लैट था जो एक सदी से रचे-बसे मारवाडियों की मिल्कियत का एक हिस्सा था। एक-दो को छोड उसकी संस्था का सारा स्टाफ इस मेट्रोपोलिटन के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पच्छिम से लंबी दूरियां पार कर पहंचता था। बहुतेरों के अपने घर थे और कुछ बेघर थे।

शिक्षकों में उनकी अपनी सीमा चाहे जो हो लेकिन कहने के लिये सब की अपनी ठसक थी। काजोल के पास अंग्रेजी के साथ सुहरावर्दी एवेन्यू के लेडी ब्रेबोर्न कालेज से बी.ए में फ्रेंच की डिग्री थी। गार्डन रीच की ओर रहने वाली विभावरी साल्टलेक इलाके के स्काटिश चर्च की स्टुडैन्ट रही आई थी। अनुषा ने मिडिल टाउन के लोरेटो से मैनेजमेन्ट का कोर्स किया था और बैंकिंग की विशेषज्ञा समझी जाती थी। नीहार को गर्व था कि वह प्रेसीडेन्सी कालेज का स्टुडेन्ट था। प्रियहरि जैसे कुछ एक ही थे जो उज्जैन, दिल्ली, बनारस, पटना, रांची से भटकते यहां आ पहुचे थे।

शुरू-शुरू में लगता था कि इस महानगर का यह कालेज भी महान होगा लेकिन जल्द ही प्रियहरि को अनुभव हो गया कि वहां भी माहौल वैसा ही था जैसा देश के किसी भी आम शिक्षा-संस्थान में हुआ करता था। वैसे ही छात्र और छात्राएं, वैसी ही पाठ्‌यक्रम केन्द्रित तैयारी और पढ़ाई की खानापूरी, वैसे ही छात्रसंघ के चुनावों की हुल्ल्ड , वैसी ही हडतालें और वैसे ही समझौते जैसे हर जगह हुआ करते थे। यहां की राजनीति और जगहों से कुछ अधिक गरम हुआ करती थी। बात-बात पर इलाके के नेताओं से लेकर बडे समझे जाने वाले नेता तक दिलचस्पी लेते यूं दखल देते जैसे कोई राष्ट्रीय मसला आ खडा हुआ हो। कुछ ही सालों में प्रियहरि का मन उचाट हो चला था।

उस एक दिन वह बी.बी.डी बाग से पैदल ही चौरंगी तक चला आया था कि किसी एक परिचित स्वर का सांगीतिक लय कानों से उलझ गई -

'' हाय प्रियो, लुक हियर ''

प्रियहरि ने पलटकर नजर दौडाई। करीब ही उसे सुनहले किनारों से सजी हरी साडी और कुसुम्भी छींटदार ब्लाउज में कसा वह चेहरा दिखाई पडा जिस पर कंधे तक लहरातीं केशराशि और माथे पर जुल्फ की लटें लहरा रही थीं।

'' तुम देखते ही नहीं। कब से तुम्हें देखती मैं हाथ हिलाये जा रही हूँ।''

'' मुझे क्या मालूम ओन्नी डियर कि तुम यहां शापिंग कर रही हो।''

यह अनुषा थी। स्टाफ में सब से निराली और बेहद नफासत-पसंद समझी जाती थी। गप्पों से उसे नफरत थी। ऐसा कभी-कभार होता जब अनुषा और प्रियहरि के साथ-साथ मिल बैठने का संयोग होता। चर्चा में राजनीति और कल्चर ही ओन्नी की रुचि के विषय थे। जब कभी मौका और फुरसत के लम्हे मिलते, दोनों के बीच खूब बातें होतीं। लगाव तो जाहिर था लेकिन प्यार-व्यार के चक्कर तक पहुंचने से रह गया था।

वे साथ-साथ एस्प्लेनेड की तरफ बढ़ चले थे। अनुषा के हाथ का थैला प्रियहरि ने थाम लिया था। चलते-चलते अनुषा ने शिकायत की-

'' यू नाटी हिन्दी, ये ओन्नी क्या है ? मैं अनुषा हूं। ज्यादा से ज्यादा ओनुषा। ''

'' सारी डियर लेडी। तुम ''ओनुषा'' होकर तो सब की रही आती हो। मेरा अपना तो उससे अलग कुछ और होना चाहिये न।''

'' अपना ही चाहिये तो नाम क्यों नहीं बदल देते ?''

'' जैसे ?''

'' जैसे ओनुप्रिया। और क्या ? ''

काफी हाउस में बैठे हम ठंडी काफी की चुस्कियां ले रहे थे। वही हमारी पसंद थी।

''मैं कालेज से ही इधर निकल आई थी। तुम्हें कुछ खबर है ?''

मैं किसी काम की वजह से दो दिनों की छुट्‌टी पर रहा आया था। अनुषा ने बताया कि मेरा वहां चयन हो गया है, जहां अपने आवेदन पर पिछले महीने साक्षात्कार देकर मैं लौटा था।

'' टेल मी, विल यू बी जाइनिंग देयर ? यू आर एक्सपेक्टेड देयर बाइ दि एन्ड आफ दिस वीक आनली ''

'' वाइ नाट ? आफकोर्स ''- न जाने अचानक मेरे मुह से जवाब निकल गया था।

'' आई नेवर कुड असेस दैट यू कुड आलसो बी होम-सिक सो मच । हमारा बंगाल कितना अच्छा है ? डिडन्ट यू लाइक अस ''

'' नो, इट्‌स नाट लाइक दैट ''

'' ओउ, नाउ डोन्ट टैल मी दैट ''

प्रियहरि से कुछ कहते न बना था। तब से लगातार उसके मन में यह अहसास बना रहा आया कि कहने में उसने गलती कर दी थी। बहुत देर तक अनुद्गाा और वह आमने-सामने बैठे रहे थे। मन में बातें ही बातें कहने को भरी थीं पर दोनों के होठ जैसे सिल गए थे। एक उदास छाया थी जो दोनों पर मंडरा रही थी। कितनी देर वैसा रहा वह बताना कठिन था। वह अंतिम दृश्य था जब दोनों के मौन एक-दूसरे की आंखों में टकराए थे और बाहर निकल एक ठंडी '' ओ क़े दैन '' के साथ अलग-अलग दिशाओं में मुड चले थे।

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नौ बजकर चालीस मिनट : हरे पल्लू की पीली साड़ी

तुम आयीं मानो

गुलाबी धूप

निकल आयी हो

-एक बिम्ब/शमशेर/कहीं बहुत दूर से सुन रहा हूं/

वनमाला पर निगाह पड़ते ही न जाने किस अज्ञात प्रेरणा से उसे निहारते प्रियहरि के मुंह से वे शब्द फूट पड़े थे - ''वाउ ! यू आर लुकिंग वंडरफुल टुडे। वेरी ब्यूटीफुल। इस पीली साड़ी में आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो। हरीतिमा में लिपटी अमलतास की स्वर्णिम पीताभ वासंती छटा !''

सामने दीवार पर टंगी घड़ी पर कांटे दर्शा रहे थे - नौ बजकर चालीस मिनट। प्रियहरि उस वक्त नहीं जानता था कि हरे पल्लू की पीली साड़ी में लिपटी वनमाला की छबि के साथ घड़ी के कांटे उसके दिल में वक्त को हमेशा के लिये यूं थामकर रख चले हैं कि रुका हुआ वह पल उसकी नियति हो चला है। ऐसी नियति जिसमें वनमाला और उसका सारा कुछ उलझकर रह जाने वाला है। यह वह वर्तमान था, जिसमें छिपा भविष्य उनकी अदाओं पर मुस्कुरा रहा था।

अचानक और अप्रत्याशित वैसी तारीफ से वनमाला की आंखों में चमक और अन्यथा गंभीर होठों पर स्मिति एक साथ फैल गई थी। प्रसन्न संकोच में डूबी उसने प्रियहरि की आंखों में झांकते यूं जवाब दिया था जैसे उसे उस पर विश्वास न हो रहा था, जो उसने अभी-अभी प्रियहरि से सुना था।

''अच्छा ! ऐसा है क्या ? क्या सचमुच मैं खूबसूरत लग रही हूं या आप मजाक कर रहे हैं'' - वनमाला बोली।

प्रियहरि ने जवाब दिया - ''हां सचमुच। बहुत, बहुत खूबसूरत। भरोसा न हो, तो पूछ लो आईने से।''

''आईना है कहां ? लाऊँ कहां से ? आप ही लाइए, ज़रा दिखाइए तो।''

''मेरा दिल जो है। झांक लो उसमें।''

वनमाला शरमाई भी और खुश भी हुई। उसके कपोलों पर लाली चमक उठी। औरत चाहे वह कोई और कैसी भी क्यों न हो, अपनी प्रशं सा पर फूली नहीं समाती।

- ''अच्छा ! अगर ऐसा है तब तो आज मुझे आप को चाय पिलानी पड़ेगी।'' वनवाला का मूड खिल गया था। वह मूड जो अज्ञात दबावों से उसी तरह अवगुंठित रहता था जैसा प्रियहरि में कहीं था। वह बहुत खुशनुमा दिन था।

उस दिन की खुशनुमाई धीरे-धीरे उन दोनों के दिलों में फैल चली थी। वनमाला की आहट की प्रतीक्षा करता प्रियहरि का दिल धड़कता था। आंखें उसके इंतजार में बिछी रहती थीं। बोला चाहे कुछ जाए लेकिन रोज सामना होते ही आंखें मिलतीं, खिलतीं और एक-दूसरे में छिपे उस मौन संदेश को पढ़ लेती जो लिखे दो दिलों द्वारा जाते लेकिन जिनकी इबारत एक सी होती थीं। यह अब आदत में शुमार हो चला था। इसी के साथ वह पोशीदगी और संकोच भी आदतन शामिल हो गये थे जो औरों के सामने उनके होठ सिले रखते थे। आंखें इस संकोच का फायदा उठाने लगी थीं। जितनी बार, जितनी देर रहना, आमना-सामना होता - चाहे बैठे या चलते-फिरते, वे अपना काम कर जाती थीं। मौन में छिपा यह व्यापार ऐसा संक्रामक था कि उसके लिए उन दोनों का कुछ कहना नहीं, बस होना ही काफी था। इस वक्त जब रात के चौथे पहर में वनमाला प्रियहरि की यादों में घुसी चली आ रही है, जरूर वह भी कहीं न कहीं वनमाला के सपनों में अवश्य टहलता पाया जायेगा भले ही दोनों मीलों दूर क्यों न हों।

वह कौन सी चीज रही होगी जो अलग-थलग, उदास और अज्ञात पीड़ाओं से ग्रस्त दिलों को जोड़े जा रही थी इसे ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह जो अपने आप हो रहा था उसके पीछे शायद प्रियहरि और वनमाला दोनों की वृत्तियों, परिस्थितियों और सोच की समानता रही होगी। प्रियहरि की तरह वनमाला भी बाहरी दिखावों की तरफ से लापरवाह और सादगी पसंद थीं। वह भी एक निचले मध्य वर्ग से थी जहां सीमित साधनों के बीच जिन्दगी पलती और बढ़ती है। वह भी प्रियहरि की तरह ही कस्बाई संस्कारों वाली लेकिन उन्नत मूल्यों और सोच की हामी थी। दोनों की भाषा और लिखावट औरों से ज्यादा नफीस और खूबसूरत थी। प्रियहरि की तरफ से खास बात यह थी कि वह वनमाला में वह बांगला रोमांस और आकर्षण आता था जो आरंभ से ही उसकी चाहत में थे। वनमाला की ओर से शायद यह कि गहन विचार,दर्शन, अध्ययन और कला-साहित्य-संस्कृति की गहरी अभिरूचि जो प्रियहरि में थी, उसे बांधती थी। प्रियहरि की दिली इच्छा रही कि वनमाला के अंदर जो छिपी प्रतिभाएं वह देखता था उन्हें उजागर होता भी वह देखे। वह कल्पना में देखता कि वनमाला भी उन ऊँचाइयों पर पहुंच रही है और जीवनसाथी बनकर प्रियहरि और वनमाला साथ-साथ घर में इन पर बहसें कर रहे है, लिख रहे हैं, एक-दूसरे को राहत पहुंचाने चाय की प्याली थमा रहे हैं और स्थापित व्यक्तित्वों की तरह एक-दूसरे के साथ जिन्दगी बसर कर रहे हैं। इतने करीब कि जहां दूरियों का अहसास खो जाता है। तब भी दूरियां तो थी हीं। दूरियों से प्रियहरि का मन मसोसता था।

ऐसी ही कसमसाहट वनमाला में भी प्रियहरि देखता था। तब फर्क यह कि बहुत, बहुत करीब आते-आते वनमाला मानो हमेशा मध्यवर्गीय नैतिकता का ढाल अचानक सचेत हो तान लेती थी, जो खुलने से उसे रोक लेता रहा था । उस दिन दोनों ने अचानक सौंप दिये काम को साथ बैठकर करना शुरू किया था। उन कमरों के चक्कर साथ-साथ लगाये थे, जिन्हें खूबसूरत बनाया जाना था। उन दीवारों का मुआयना किया था, जिनमें वे खूबसूरत कला-कृतियों की प्रतिकृतियां लगाने की योजना पर काम कर रहे थे। साथ-साथ बढ़ते दोनों उस आखिरी कमरे तक पहुंचे जो अभी खाली था। अपने से सटी खड़ी वनमाला से, जो दरवाजे पर ही अटक गई थी, प्रियहरि ने कहा – “ए..इ वनमाला, अब अंदर भी आओ न !''

दोनों की नज़रें मिलीं। वनमाला की नज़र ने प्रियहरि से कहा - ''शरारत ! मुझे मालूम है। गलियारे और कमरे में भटकते दिल के धड़कनों की भाषा तुम्हारी तरह मैं भी सुन रही थी। मेरा दिल अब भी धड़क रहा है। कहीं तुमने मुझे बाँहों में बांध लिपटाया और चूम लिया तो ?'' जुबान की भाषा उसकी अलग थी। बोली - ''आज रहने दो, चलो अब चलते है। फिर कभी देखेंगे।''

उस दिन प्रियहरि और वनमाला ने पहली बार महसूस किया कि तब मौजूद चन्द लोगों की नजरें अब उन्हें पढ़ने की कोशिश में लग चुकी हैं। उन्हें क्या मालूम था कि जिन नज़रों से वे खुद को छिपाना चाहते थे वे ही बाद में ऐसा कहर ढाने वाली हैं कि दोनों की जिन्दगियाँ तबाह हो जाएं।

वनमाला से प्रियहरि और प्रियहरि से वनमाला का लगाव मुकम्मल शक्ल लेता जा रहा था। सुबह तब तक और लोगों का आना, दफ्तर की चहल-पहल जब तक शुरू न होती तब तक अपने कामकाज के बीच से ही चुराए समय में दोनों आपस में बातें कर लेते थे। बातें सीधे मोहब्बत की हों, यह न था। बल्कि यह कि छोटी-छोटी मुलाकातों, बैठकों और अलफाजों के दौरान साथ के लम्हे ही मोहब्बत का इजहार कर देते थे। ज्यादातर वे तो कम बोलते, उनकी निगाहें ज्यादा बात करती थीं। वनमाला के मिजाज़ का यूं कोई भरोसा न रहता। जब-तब वह उदास, थकी और अवसाद से ग्रसित नजर आती थी। ऐसे में चुप्पी उसका औजार हुआ करता थी। वह गुमसुम रही आयेगी। न बात करेगी, न कोई बात सुनेगी। जैसा कि धीरे-धीरे प्रियहरि ने जाना पति के ताने और घर की जिम्मेदारियां उसे तनावग्रस्त और उदास कर जाते थे।

इस तरह के माहौल में उसका मायूस गुस्सा कभी-कभी प्रियहरि पर टूटता था - ''आपको क्या है ? काम-धाम है नहीं इसलिए बस मोहब्बत सूझती है। यहां तो चार-चार कक्षाएं हैं और फिर यहां से भागकर घर के बोझ संभालो।''

वनमाला के मूड की चाबी उसके घर में थी। जब खुश होती तो एक भद्र और बुद्धिमती साथी की तरह पेश आती और पेश होती थी। बहुत ज्यादा फुर्सत से साथ बैठने का मौका अब तक नहीं मिल पाता था।

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क्या ऐसा नहीं हो सकता कि शादियां मियादी समझौते की शक्ल में हों?

समय बदला। एक दिन ऐसा हुआ कि कागज का एक सरकारी फरमान वनमाला और प्रियहरि - दोनों को मिला। लिखा था कि सुबह की परीक्षाओं में प्रियहरि और वनमाला दोनों को साथ-साथ जिम्मेदारी निभानी थी। अपना पुर्जा लेकर उस दिन जब प्रियहरि स्टॉफ रूम पहुंचा तो देखा कि वनमाला वहां मौजूद है। दोपहर बाद तक उस दिन लोग वहां व्यस्त थे। इस समय अब वे चलने की तैयारी में थे। प्रियहरि और वनमाला की निगाहें मिली।

प्रियहरि ने पूछा - ''कागज मिला ?'' उसने कहा - ''हां।''

उस दिन निगाहों की टकराहट में एक-दूसरे के लिए चमक भरा संदेश था - ''कितने दिनों से तमन्ना थी कि ऐसा मौका मिले जब हम आधिकारिक रूप में साथ हों। फुर्सत के लम्हे हों ,बीच में कोई न हो और हम खूब मिलें। ईश्वर ने सुन ली।''

वे दिन ऐसे थे कि प्रियहरि का सारा अस्तित्व सुबह के वनमाला के साथ के चार-पांच घंटों में समा गया था। बाद का सारा समय उस खो जाने की बेला के लौटने के इंजतार में बीतता। साढ़े दस के करीब वनमाला के मिस्टर प्रायः उसे लेने कैम्पस में अवतरित हो जाते। जुदाई में दिल कचोटता था लेकिन मजबूरी थी, जो अक्सर आंखों की टकराहट में बयां होती थीं। एक दफा ऐसी ही बेबसी में प्रियहरि ने वनमाला को छेड़ा था -

''लीजिए, आपके वे आ पहुंचे है आपको लेने।''

मुस्कुराती हुई वनमाला ने प्रियहरि की आंखों में झांका और बोली - ''आह, आप तो यूं कह रहे हैं जैसे मेरा जाना आपको बड़ा अच्छा लग रहा हो।''

प्रियहरि ने कहा - ''मैं तो चाहता हूं कि तुम्हें हमेशा -हमेशा के लिए रोक लूं। काश, ये पल ठहर जाएं।''

बेबसी से काल का वह नियत टुकड़ा उन्हें रोज जुदा कर देता। बाद का सारा समय प्रियहरि का मन वनमाला की याद में तड़पता था और रातें बेचैन गुजरने लगी थी। औरत और मर्द के बीच के रात का रोमांचक खेल बेमज़ा लगता था। उसे दुरुस्त करते वनमाला की तस्वीर प्रियहरि अपनी निगाहों में बसाए रखा करता था। यूं रोज अपने आप कविताएं उसके अंदर बनने लगी थीं। घर वनमाला की भी मजबूरी था और प्रियहरि की भी। इसी प्रसंग की एक कविता प्रियहरि से वनमाला ने किसी एक दिन सुनी थी –

विवाह के मंत्र

शोर करते हैं

शुरू जो हुआ

टेप बंद ही नहीं होता

चलता रहा आया दिन-महीने-साल

साल-दर-साल

रात के अँधेरे में

बिस्तर के बीच दुहराए जा रहे

मंत्र के शोर में घुसता है एक चेहरा

घुसता ही चला जाता है

दिल,दिमाग, शिराओं में

और थमता है शोर

देता है सुकून

चेहरे पर आरोपित चेहरा

पल भर

कविता की लय लहराती वनमाला को अचानक जैसे होश आया हो, उसकी पलकें प्रियहरि की आँखों में डूबती भी हया में झुक चली थीं। उसका चेहरा अनजाने उपज आयी लाली से सुर्ख हो चला था। कुछ यूं जैसे उसकी चोरी पकड़ ली गई हो। धीएमे स्वर में उसने इतना कहा -

''छिः ! आप ऐसा क्यों लिखते है। मुझे लाज आती है। आप तो कुछ भी सोचते रहते हैं।''

प्रियहरि जानता था कि दिली तमन्नाएं फन्तासी में भिड़ती हैं और तसल्ली पाती हैं, भले ही वे झूठी हो। ऐसा वनमाला के साथ भी है लेकिन मध्यवर्गीय नैतिकता का जनाना संकोच 'हां' को भी 'ना' में ही कहने मजबूर हुआ करता है।

ऐसे ही एक दिन गुनगुनी धूप में सुबह प्रियहरि बाहर खड़ा था। इशारों से उसने वनमाला को भी अपने पास बुला लिया। बीच में कोई नहीं था और इतमीनान का मूड था। बातों के दरम्यां प्रियहरि ने पूछा - ''वनमाला, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि शादियां मियादी समझौते की शक्ल में हों। दो-साल, चार, या पांच साल ? फिर हम आजाद हों कि दूसरा साथी चुन सके और साथ रहें।''

वनमाला लजाई। बोली - ''ऐसा हो सकता है क्या ? काश, ऐसा हो सकता।'' अचानक जैसे उसे कुछ याद आया हो आंखों में मुस्कुराती वह बोल पड़ी - ''मैं समझ गई। आप बड़े शरारती है।''

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प्रेम केवल शरीर की कामना का आरंभ ही है

धारावाहिकों में दिखाए जा रहे एक्स्ट्‌रा मैरिटल अफेयर आज के समाज का सच हैं जो हमें कई बार अपने आसपास ही देखते को मिल जाता है । आज ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनकी पत्नी के साथ आफिस मे भी एक गर्लफ्रेन्ड होती है। -कसौटी जिन्दगी की प्रेरणा उर्फ़ श्वेता ने कहा/नई दुनिया 2/11/07 पेज 07

सुबह-सुबह वनमाला को आता देख अपने साथ काम करता देख, उसकी बुद्धिमत्ता, सूझ और आत्मीयता का आभास पाकर प्रियहरि का चित्त प्रायः कल्पना में उसकी अपनी बीबी को वनमाला के सामने ला खड़ा करता। उसकी बीबी खुद तो कभी आठ बजे से पहले बिस्तर छोड़ती न थी। खुद वह तो वैसी थी ही लेकिन हद यह थी कि बच्चों तक को सिखाने, उन्हें जगाने पर वह प्रियहरि से झगड़ा करती कि फालतू सुबह-सुबह वह शोर क्यों मचा रहा है। वनमाला की साफ, मीठी और लहरदार उस आवाज का प्रियहरि मुरीद था जो उसकी समझ में किसी गायिका में हुआ करती है। प्रियहरि उससे कहा करता - ''तुमसे अपनी प्यारी, मीठी आवाज में मैं किसी रोज बंग-संगीत सुनने की गहरी चाह है। कभी सुनाओ प्लीज़।''

प्रशंसा और चाहत के ऐसे पल कभी वनमाला को स्पष्टतः खुशी से भर देते थे, वह चहक उठती थी और कभी ऐसा भी होता था कि वनमाला का मुख अन्यमनस्कता से पथरा सा जाता था और आंखें ऐसी हो जाती मानो स्तब्ध होकर शून्य में देख रही हों। उसे शायद विश्वास न होता था कि प्रियहरि की वे बातें उसी के लिए हुआ करती थीं। वनमाला और प्रियहरि यूं अपने पारिस्थितिक अभावों को एक-दूसरे में पूरा होता अनुभव करते थे। जो बात वनमाला के पति में होनी चाहिए थीं, जो बातें उसकी पति को करनी चाहिए थीं वे प्रियहरि कर रहा था और जो अपेक्षाएं प्रियहरि अपनी पत्नी में रखता था, उन्हें वह वनमाला में पूरी होता देख रहा था। एक-दूसरे के लिए वनमाला और प्रियहरि का साथ प्रतिपूरक बनता जा रहा था।

हालांकि ऐसी औरतें भी होती हैं जो चाहत के पहले ही स्पर्श से समानावेग से पिघल जाती है लेकिन प्रियहरि ने पाया था कि वनमाला वैसी न थी। वह उन अधिकांश मध्यवर्गीय पारम्परिक गृहस्थिनों में थी जिनमें नैतिकता का बोझ कूट-कूटकर भरा होता है। जंघाओं के बीच का वह बिन्दु जहां अंततः प्रेम पर्यवसित होना चाहता है, उनके लिए नैतिकता का चरम केन्द्र और कसौटी हुआ करता है। औरते जानती है पुरुष की निगाह में वही स्त्री होने का अर्थ है। इसलिए समाज और परम्परा ने इनमें गहरा सुरक्षा बोध और चालाकी पैदा कर दी है कि वे शरीर के प्रति बेहद संचेत रहती हैं। उन्हें मालूम होता है कि शरीर उन्हें वहीं ले जायेगा, जहां जाने से उन्हें बचना है। वनमाला को यह समझाना मुश्किल था कि प्रेम केवल शरीर की कामना का आरंभ ही है। शरीर में एकाग्र होकर विसर्जन से ही प्रेम यानी हृदय और शरीर द्विधारहित होकर उस स्वर्ग तक पहुंचते हैं जो समाज स्वीकृत बंधन में बांध देने से शारीरिक क्रीड़ाभ्यास का बेमजा काम मात्र होकर रह जाता है।

वनमाला ने प्रियहरि से कहा था -''यह तो मुझे घर में ही भरपूर मिल जाता है, उसकी कोई कमी नहीं है। इसकी मुझे जरूरत नहीं है।''

वनमाला का अक्सर भभराया चेहरा, चेहरे और आंखों की थकावट, उड़ी हुई रंगत इसकी पुष्टि करते थे कि वह मशीन की तरह रात में चलाई गई है, लेकिन फिर ! फिर वह क्या था जिसे वह पाना चाहती थी ? क्या बिना इसके प्रियहरि खुद जीवित रह सकता है ? वनमाला ने कहा था - ''सुहाग की रात को मैंने और मेरे मिस्टर ने एक-दूसरे से वादा किया था कि हम आपस में कुछ भी छिपाएंगे नहीं। जो भी है, वो एक-दूसरे को बता देंगे और आपस में बेवफाई नहीं करेंगे।''

प्रियहरि का खयाल था कि एक ओर चित्त में बसा यह गहरा बोझ और दूसरी ओर अभाव को भरने की चाहत ही वनमाला का द्वंद्व था जो उसे मूडी और स्किजोफ्रेनिक बना रहा था।

वनमाला के निर्बाध साहचर्य और प्यार की चाहत में प्रियहरि में दीवानगी पैदा कर दी थी। एक पल भी - दिन या रात कभी, उसकी याद के बगैर नहीं गुजरता था। एक तरफ प्रियहरि की चाहत थी जो फैल कर वनमाला में समा जाना चाहती थी, दूसरी तरफ सतर्क वनमाला का भय था जो उसे ऐन मौके पर सतर्क कर सिकोड़ देता था। एक ओर उन्नत दंड और दूसरी ओर खुलता दरवाजा अचानक बंद। बड़ी मुसीबत थी। प्रियहरि पर जुनून सवार था। उसने निर्णय लिया कि अपने दिल की बात उसे वनमाला से कहनी ही है फिर परिणाम चाहे जो हो और ऐसा उसने किया भी। वनमाला के जन्मदिन की बधाई देते प्रियहरि ने उसकी आंखों में झांकते सीधे कह दिया था - ''वनमाला आई लव यू, आई लव यू। आई कैन नाट लिव विदाउट यू।''

वनमाला आनंदित थी। थोड़े से सूखे फल,चाकलेट का एक पैक, कुछ टाफियां और फाउंटेन पेन का एक सेट, वगैरह प्रियहरि ने उसे भेंट की थी। उस वक्त प्रियहरि को यह नहीं मालूम था कि उपहार के मानी क्या होते हैं, उपहार में औरत को क्या दिया जाना चाहिये, उपहार के लिये औरत प्रेमिका की क्या अपेक्षाएं होती हैं, और उपहार को आंकने में औरत के लिये उसकी मौद्रिक कीमत का क्या महत्व होता है वगैरह ? यह बाद में कभी धीरे-धीरे उसे समझ में आया कि उपहार की नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे मौद्रिक मूल्य की अहमियत बाज औरतों के लिये ज्यादा महत्व रखती है। खैर, उस वक्त वनमाला का मन फूला न समा रहा था उसने कहा - ''आह, मैं आज कितनी खुश हूं। मेरे अपने घर में तो मेरा जन्मदिन किसी को याद तक नहीं रहता। आपने कैसे याद किया ?'' फिर अचानक उसके आंखों में शरारत की एक चमक उभरी। वह बोली - ''अच्छा, अगर मैं यह बात अपने मिस्टर को बताऊँ तो ?''

प्रियहरि ने बिन्दास अंदाज में जवाब दिया - ''अब तुमसे कोई भेद नहीं, जिसे बताना हो, बता दो।''

वनमाला हंस रही थी। कहा - ''घबराइए मत, मैं ऐसा करूंगी नहीं।'' वह कहती गई - ''आज का दिन कितना अच्छा है। आज मैं बहुत खुश हूं।''

वनमाला का खुशी का यह इज़हार मानो प्रियहरि के साहसपूर्वक रख दिये गये प्रेम के प्रस्ताव की स्वीकृति थी। वनमाला और प्रियहरि के बीच घर के अनुभव भी मलाल के साथ चर्चा में आया करते थे। वनमाला कहा करती - ''प्रियहरि, आप मेरी इतनी तारीफ करते है लेकिन मेरे मिस्टर तो हमेशा मुझमें, मेरे हर काम में नुक्स निकालते रहते हैं।

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औरत का मन पढ़ना शायद दुनिया का सबसे मुश्किल काम है

" Despite my thirty years of research into the feminine soul, I have not been able to answer.. the great question that has never been answered and which I have not yet been able to answer, ...is 'What does a woman want?" (Sigmund Freud)

औरत का मन पढ़ना शायद दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। औरत का संकोच और आदमी का भय होनी को भी अनहोनी बना देता है।

रक्त बुद्धि से अधिक बली है और अधिक ज्ञानी भी

क्यों कि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है। - दिनकर रामधारीसिंह /उर्वशी

परीक्षाओं में एक साथ काम करने के दौर में प्रियहरि और वनमाला ने एक-दूसरे को पहचाना। दोनों ही वैज्ञानिक कार्यशैली और सुसंगत बौद्धिकता के हामी थे। दोनों एक-दूसरे की युक्तियों पर पूर्वाग्रह-रहित ढंग से राय रखते थे। दोनों ही शेष सारे स्टॉफ से अपने को प्रतिभा और कार्यशैली में जुदा और बेहतर पाते थे। दोनों का यह अनुभव था कि किसी और कमतर के साथ काम करने पर सामने वाला अपनी कमतरी को छिपाने उन्हें काट-फेकना पसंद करता था। वनमाला और प्रियहरि के बीच मानो यह संयोग एक किस्म से अभावों की दो जिन्दगियों, प्रतिभाओं, संवेदनाओं की एक पक्की और खुश जोड़ी से बना संयोग था। दोनों एक-दूसरे के बेहद प्रशंसक थे और दोनों ही इस राय पर एक थे कि उनकी जोड़ी का कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। इसे बनाए रखाने की चाहत दोनों में हमेशा बनी रही फिर चाहे परिस्थितियां कितनी भी बुरी क्यों न हो गई हों। दोनों के बीच इस मुआमले में यह आपस का वादा था कि किसी तीसरे को वे अपने बीच नहीं आने देंगे। परिस्थियां चाहे जितनी बदल गईं; दूरियां चाहे इस कदर बढ़ गईं कि एक-दूसरे को एक झलक देख पाना भी मुमकिन न हो; बात करना तक मुमकिन न हो; लेकिन इसे केवल वनमाला और प्रियहरि दोनों ही समझ सकते हैं (जबकि यह सच सारे दीगर भी महसूस कर सकते हैं) कि रूहानी चाहत और भरोसे का वह रिश्ता आज भी कायम है। वनमाला से जुड़ी और उसके साथ की चाहत ने प्रियहरि को उसका दीवाना बना दिया था। वनमाला इसे अच्छी तरह जानती और महसूस करती थी भले ही मध्यवर्गीय महिला का प्रशिक्षित नैतिक संयम और बाल-बच्चों की जिम्मेदारी चाहे जितनी भी दूर तक बचाव के उसके ढाल बन जाते हों। वनमाला के नाम प्रियहरि की इबारतें, रोज लिखी जाती कविताएं और नज़्में - कागजों में कैद सब का सब -, आलमारी के एक कोने में सलीके से रखा रहता। परीक्षा की व्यवस्तताओं में दोनों के बीच की बेताब मोहब्बत बाधा बन रही है यह वनमाला प्रियहरि से ज्यादा समझती थी। इसीलिए प्रियहरि के सामने और काम के बीच वह उन सबसे से गुजरना अक्सर टालती थी। यह बात और थी कि प्रियहरि ने वनमाला को जाहिरा तौर पर बता दिया था कि उन कागजों में क्या है, वे कहां रखे है और क्यों रखे है। कागजों में लिखा लगभग सारा यूं भी रू-ब-रू बातचीत और आंखों से दोनों के बीच उजागर था। बाद में वनमाला ने उन कागजों पर कितनी, कब और कैसे नजर डाली इसकी परवाह प्रियहरि न करता था। परीक्षा के दौरान कायम हुई इस मोहब्बत का दौर परीक्षाओं के गुजरने के बाद भी लंबे चलता रहा।

उस एक दिन सुबह-सुबह प्रियहरि और वनमाला दोनों ही वहां अकेले थे। खामोशी में जीने वाली वनमाला उस दिन भी खामोश थी। आलमारी बंद कर कमल के लोच के साथ गर्दन पर टिके चाँद की नजरें प्रियहरि की नजरों से टकराईं।

''इक खलिश दिल में रही आई जो ता-उम्र रही।

देख लूं आंख भर तुमको ये तमन्ना ही रही।''

-वनमाला की आंखों में छिपे दर्द और पशोपेश में झांकते हुए प्रियहरि ने आगे कहा - ''वनमाला, तुम्हारा आदमी बहुत भाग्यशाली है जो उसे तुम्हारा साथ मिला है। तुम बेशकीमती हो। काश, उसकी जगह मैं तुम्हारे साथ होता।''

लज्जा से लाल हुए फूल गये गालों और पलकों के कोरों से निहारती वनमाला ने जवाब दिया - ''मैं बदकिस्मत हूं। आप तो मुझसे इतना प्यार करते है, मेरे लिए यह कहते है लेकिन आपको मालूम है कि मेरे मिस्टर मेरे लिए क्या कहते हैं ? वह तो मुझे काली-कलूटी और बेकार की औरत कहते हमेशा कोसते और बुराइयां ही ढूंढते रहते है। कहते है कि मुझे एक से एक संबंध मिल रहे थे, सुन्दर लड़कियां मिल जातीं, लेकिन न जाने कहां से तुम आ गईं।''

फिर किसी रोज प्रियहरि और वनमाला साथ बैठे ऐसे ही माहौल में मशगूल थे कि अचानक प्रियहरि वनमाला से पूछ बैठा -''ए...इ वनमाला, मुझे एक ही तरीका दिखता है तुम्हारे पास हमेशा बना रहने का। बताओ वह कौन सी युक्ति है जिससे मैं तुम्हारे घर निर्बाध जा सकूं। कि मैं तुम्हारे मिस्टर का सहज मित्र बन सकूं ताकि तुम्हें देखना, तुमसे मिलना दुष्कर न हो।''

वनमाला का जवाब था - ''आप नहीं जानते। वे बड़े विचित्र स्वभाव के है। उन्हें दोस्त बनाना बहुत कठिन है। बल्कि उन्हें आपकी ऐसी कोशिश अगर पता लग गई तो वे मुझे भी मार डालेगें और आपको भी।''

प्यार-मोहब्बत तो अपनी जगह पर थे लेकिन वनमाला को यह भय हमेशा सताया करता था कि ये चीजें आम हो गईं और घर तक फैल गई तो वह मारी जायेगी। उसकी दीवानगी में खोया प्रियहरि उसे समझाया करता कि उन दोनों का मिलना, यह आकर्षण आकस्मिक नहीं है।

वह कहता - ''आज जो है, वह अकारण नहीं है। रक्त का यह आकर्षण पूर्वजन्मों का है जिसने हमें मिलाया है और जो रक्त के एक होने तक कायम रहेगा। फिर इसमें चाहे कितने ही जन्म क्यों न लग जाएं।''

जो था, वह प्रियहरि की पांचवीं इन्द्रिय कह रही थी और जिसे गहराई से वह महसूस करता था। वह उसके दिल की सच्ची आवाज थी। वनमाला इसका अहसास कर कांप गई। वह बोली - ''मुझे यह सुनकर न जाने क्यों घबराहट हो रही है। ऐसा नहीं होना चाहिए। मुझे डर लग रहा है।''

औरत का मन पढ़ना शायद दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। वनमाला प्रियहरि की बातें सुना करती और अक्सर गंभीर, अन्यमनस्क, और पशोपेश में पड़ी दिखाई पड़ती। तब उसकी गंभीरता, फूल उठे गाल और मिलती-बचती आंखों की भाषा में क्या लिखा होता था यह कहना मुश्किल था। प्रियहरि डरता था कि कहीं वनमाला उससे नाराज़ न हो जाए। वह नाराजगी के एवज में केवल वनमाला का रहस्यमय मौन देखा करता था। पहल उसे ही करनी पड़ती एक रोज ऐसी ही बातों के दरम्यान वनमाला सूजी हुई आंखों और फूले गालों के साथ बैठी थी। शायद इधर के मिठास के साथ घर की कड़वाहट का द्वंद्व और किंकर्तव्यता का पशोपेश उसे विफल करता था। प्रियहरि पूछ रहा था -''हे...इ, वनमाला, तुम्हारे लिए न जाने कितना-कितना लिखा है। देखोगे नहीं ? तुमसे कुछ कहना है, सुनोगी नहीं ?''

उदास भीगे स्वर में वनमाला ने बहुत धीमे से कहा - ''जो भी कहना है, कहिए और जो करना हो कीजिए न ! पूछते क्यों है ?''

प्रियहरि ने वनमाला को अनमना और उदास पा संकोच में कह दिया - ''रहने दो।''

अब प्रियहरि को लगता है कि उस दिन वनमाला को पढ़ने में उससे गलती हो गई। औरत कहती कुछ नहीं, आप से करने की उम्मीद रखती है। अधिक प्रतीक्षा शायद मन को बोझिल बना देती है। समर्पण और स्वीकार की मुद्रा में बैठी श्यामा को उस एक खास पल में पीछे से प्रियहरि की बांहें घेर लेतीं और उसके सूजे आतुर चेहरे को हथेलियों में थाम उसके होठों पर प्रियहरि के होठ जा ठहरते तो शायद वनमाला का विकल मन स्वीकार लेता। औरत का संकोच और आदमी का भय होनी को भी अनहोनी बना देता है। प्रियहरि इतना ही कायर था। वनमाला के उस आमंत्रण को पढ़ने में प्रियहरि का चित्त उस दिन भूल कर गया था कि - ''जो भी करना हो, कीजिए न। पूछते क्या हैं ?''

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आखिर मैने ऐसा किया क्या हैं जो तुम मुझे इतनी बड़ी सजा देना चाहते हो।

मुझे कैद में रखकर मुक्ति पा लेना क्या तुम्हें अच्छा लगेगा ? : वनमाला

परीक्षाएं चल रही थीं। सुबह-सुबह प्रियहरि और वनमाला एक दूसरे की प्रतीक्षाओं को समाप्त करते जब मिलते तो निगाहों के टकराव के साथ ही दोनों के मन खिल उठते थे। प्रियहरि और वनमाला इतने निकट आ चुके थे कि अब प्रतीक्षा और विलम्ब उनकी स्थाई आदत में शुमार हो चले थे। इसे वनमाला भी अच्छी तरह समझती और महसूस करती थी। व्यक्ति की और समाज की आकांक्षाओं के बीच, अक्सर तीन और छह का आंकड़ा होता है। खास तौर पर मुद्‌दा जब स्त्री और पुरुष के बीच संबंधों का हो वनमाला घर की झंझटों और अपने शक्की पति से यूं ही परेशान थी। आगे बढ़ने का खतरा मोल लेने से वह बचना चाहती थी। वनमाला के जन्मदिन को दोनों ने एक दूसरे के प्रेम-दिवस की तरह मनाकर खुशी तो हासिल कर ली थी, लेकिन वनमाला की उदासीन हिचक और दूरी बनाये रखने की पेशकश ने प्रियहरि को दुखी भी कर दिया था। उदासी भरे भविष्य और वनमाला से दूरी की कल्पना से मायूस प्रियहरि ने एक दिन वनमाला के सामने इस बात का प्रस्ताव रखा कि उसका मन अब परीक्षाओं से अलग हो जाने का है ताकि व्यर्थ ही वह उसे परेशान न कर सके। आखिर उसी के कारण तो वनमाला का चित्त विचलित होता प्रियहरि के लिए नाराज़गी बन जाता है।

परीक्षाओं के अब कुछ ही दिन शेष रह गये थे। वनमाला ने प्रियहरि की आंखों में झांका और कहा-'' इतने दिन साथ गुजारने के बाद अगर आप मुझसे अलग होने काम छोड़ देंगे तब फिर मेरे भी यहां रहने का मतलब क्या है ? आप के बिना मैं भी परीक्षाओं का काम नहीं करूंगी।''

वनमाला के चित्त को पढ़ने में प्रियहरि कभी भी सक्षम न हो पाया, लेकिन अगर वे शब्द वनमाला के हृदय से निकले थे तो वे ही उसके लिए वनमाला पर ईमान को और मजबूत कर जाते थे। उस एक सुबह प्रियहरि ने वनमाला से कहा –

''वनमाला, ऐसा लगता हैं कि इस जीवन में तुम्हें पा सकने का भाग्य मेरा नहीं हैं। मुझे कुछ कहना है। मेरी प्रार्थना स्वीकार करोगी ?”

वनमाला के पूछने पर प्रियहरि ने भारी मन और भावुक स्वर में उससे कहा - ''मैं तुम्हारे बगैर जिन्दा नहीं रहना चाहता। इससे अच्छा तो यह होगा कि मैं कि तुमको खुद मुझे अपने हाथों थोड़ा सा ज़हर दे दो। मैं चाहता हूं कि तुम्हारी गोद में सिर रखे तुम्हारे उस खूबसूरत चेहरे पर आंखें टिकाये मैं अपनी जान दे दूं, जिन्हें हमेशा के लिए कैद रखने वे मरी जाती रही हैं।''

प्रियहरि का उदास मन वनमाला के अंदर भी संक्रमित हो चला था। उसने कहा - '' नहीं, ऐसा मैं कभी नहीं कर सकती। आखिर मैने ऐसा किया क्या है, जो तुम मुझे इतनी बड़ी सजा देना चाहते हो। मुझे कैद में रखकर मुक्ति पा लेना क्या तुम्हें अच्छा लगेगा ? ''

वनमाला अपने को संभाल नहीं पा रही थी। उसकी आंखें भीग चली थीं। प्रियहरि के सामने से उठकर वह तुरंत दफ्तर के उस सूने कमरे में जा बैठी थी, जो सुबह-सुबह खाली पड़ा था। केवल एक बूढ़ा बाबू अभी-अभी वहां पहुंचा था। उसे इस बात की कतई परवाह न थी कि वहां दूसरे क्या कर रहें हैं और क्या बतिया रहे हैं, इसकी ओर ध्यान दे। वनमाला के पीछे-पीछे प्रियहरि भी वहां जा बैठा था। प्रेमी के जान देने की बात प्रिया को भावातिरेक से भरती भी अन्दर-अन्दर खुशी से भर जाती है। उसकी अपनी ही निगाह में खुद की कीमत बढ़ जाती है। इस वक्त वनमाला अपने टूटे हुए प्रेमी पर तरस खाती अपने को उस पर न्यौछावर कर देने की मुद्रा में थी। इधर पशोपेश की हालत में विचलित वनमाला की वासनाओं को और उत्तेजित करता प्रियहरि उसे मनाये जा रहा था -''एइ वनमाला, मान जाओ न प्लीज़। वह मेरी जिन्दगी का सबसे सुखद क्षण होगा और तुम्हारी समस्या भी उससे हल हो जाएगी '' -प्रियहरि धीमे स्वरों में वनमाला के हृदय में बुदबुदा रहा था।

रूंधे हुए गले और टूटती आवाज में वनमाला जवाब दे रहीं थी -''आह..,इससे अच्छा तो यह होता की मैं ही मर जाती। आखिर मै यहां आई ही क्यों ? इससे तो अच्छा यह होगा कि मैं तबादले में जहां से आई हूं , वापस फिर वहीं लौट जाऊँ ।''

बूढा बाबू मुन्डी झुकाए बगैर ध्यान दिये ही यह देखता सुनता मजे ले रहा था। वह देख रहा था कि कैसे घनघोर उदासी के बादलों और असहाय प्रियहरि और वनमाला की आंखें एक दूसरे में डूबी पड़ रही हैं। भावना का ज्वार दोनों को बहाए ले जा रहा था। बाबू की आंखों से ओझल होती वनमाला भागती स्टाफ-रूम के एक कोने में चिपकी आंखों की भीग चली पलकों को हथेलियों से पोछती सिसक रही थी। वनमाला ने पीछे आ खड़े प्रियहरि की हथेलियों का कोमल स्पर्श अपने बालों और गालों पर महसूस किया। उसकी पलटती निगाहें प्रियहरि की उन आंखों से बिंध गई थीं जो बादलों की नमी से बोझिल थीं। प्रियहरि की हथेली में वनमाला के एक हाथ की अंगुलियां उलझी पड़ी जा रही थीं। ऊपर कंधे पर बांह को कसता दूसरा हाथ और नीचे पैर पर अंगूठे से खेलता प्रियहरि का अंगूठा वनमाला को रोमांचक थरथराहट से भरता जादुई आकर्ष ण से कंपती काया को हौले-हौले प्रियहरि की काया के स्पर्श से सहलाता इतने करीब ले चला था कि मादकता की बेहोशी में अब प्रियहरि की छातियों से टकराती वनमाला की छातियां चिपकी पड़ रही थीं। एक-दूजे की देह को लीलती आंखों की सम्मोहकता में छातियों की चीखती हुईं धड़कनें एक-दूजे को पिघलाती आपस में कब गुंथ कर सारी दूरियां मिटा डालने की होड़ में खेलने लगी थीं इसका होश अब न प्रियहरि को रहा था, और न वनमाला को।

सांसें तेज़ थीं, धडकनें चीख रही थीं पर आवाजें इतनी मंद, जैसे बहुत दूर कहीं आ रही हों। वनमाला के अधरों पर लहराते प्रियहरि के ओठ मंत्रवत बुदबुदा रहे थे -'' मान लो। मेरी प्यारी वनमाला, मेरी बात मान लो प्लीज़।''

वैसी ही मंत्रमुग्धता में किसी अन्य लोक से वनमाला के कांपते अधर बेहोशी में जवाब दे रहे थे - ''नो प्लीज़, नो । मुझे छोड़ दो प्लीज़।''

आकर्षण ऐसे दुर्निवार आवेग से दोनों के रक्त मे प्रवाहित हो रहा था कि उनके अधरों पर उच्चरित शब्द अपना निहितार्थ छोड़ दोनों प्रेमियों की कायाओं में खेलते हठपूर्वक अवहेलना पर उतर आए थे। स्वामियों की अवहेलना करते मनाने और छोड़ने की पारस्परिक मनुहारों के बीच ओठ, देह, छातियां, हाथ और पैर और भी अधिक बेताबी से लिपटते दोहरे हुए पड़ रहे थे। इनमें प्रियहरि और वनमाला का वह दूसरा मन छिपा था, जो विवशता से आशंकित चित्त की अस्थिरता से भयभीत इस वक्त हाथ आए पलों को ही संपूर्णता में भोग अपनी चिरसंचित प्यास को अभी ही एकबारगी बुझा लेने मचला जा रहा था। चेतना इस वक्त केवल देह की पोरों और आतुरता से परस्पर गुंथे ओठों में सिमट आई थी । प्रियहरि और वनमाला सारा कुछ छोड़ जैसे किसी अन्य लोक में विचरण कर रहे थे। अचानक खलल पड़ा। बाहर कुछ लोगों के बतियाते चले आने की आहट थी।

'' छोड़ दीजिये, कोई आ रहा है '' - वनमाला बुदबुदाई ।

दोनों ने एक-दूजे की जलती आंखों और लाली से चमकते चेहरों को प्यार से निहारा था। एक बार फिर वनमाला के प्यारे मुखड़े को हथेलियों में थाम प्रियहरि ने उसके अधरों को गहराई से झिंझोड़ा और फिर गालों पर विदाई का कोमल चुंबन टांकता उसे अलग किया। अपने दीगर साथियों के प्रवेश के वक्त वे एक-दूसरे से दूर कुर्सियों के त्रिकोण में अपनी पुस्तकों में गड़े यूं देखे गए, जैसे सरोकारों से रहित दो अजनबी इक-दूसरे से बेखबर दो भिन्न लोकों में बैठे हों।

प्रियहरि ने अनुभव कर लिया था कि आगे मुसीबतों और बाधाओं से भरा अंधेरा रास्ता ही है। वह समझ चुका था कि नियति उनका साथ देने नही जा रही है। इस घटना से वनमाला बेहद विचलित और इसीलिए सतर्क रहने लगी थी। जानबूझ कर उसने इस तरह का व्यवहार शुरू कर दिया था, जिससे यह प्रकट हो की वह अब प्रियहरि को दूर रखना और उससे दूर जाना चाहती है। इधर प्रियहरि था कि खुलेआम वनमाला पर प्यार लुटाने आमादा था। वह समझ रहा था कि वनमाला के अन्दर वह नहीं है, जो बाहर उसमें दिखाई पड़ रहा हैं। दूर जाने के बजाए पूरी तौर पर समर्पित किए वह अपने को गहराई से वनमाला में डुबाए जा रहा था। तब भी कभी-कभी उसका धीरज टूट जाता था और मन बिखर जाता था। वह पशोपेश में पड़ जाता कि जिसे वह अभिनय समझ रहा है कहीं वह वनमाला का असली चेहरा ही तो नहीं हैं। वह आस्वस्त नहीं हो पाता था कि वनमाला भी क्या उसे उतनी ही गहराई से चाहती है, जितना वह वनमाला को चाहता है। वनमाला सारा कुछ बहुत अच्छी तरह महसूस करती थी लेकिन भविष्य से इस कदर भयभीत थी कि इस मुद्‌दे पर बात करने का मौका जब भी आता, वह टाल जाती थी। कभी-कभी तो वह कर्कश भी हो उठती थी।

तब कहती - ''छोड़िए न इन बातों को। क्या हम लोगों के पास उस एक के अलावा कोई और राह नहीं जिसपर ले चलने के लिए आप बार-बार मेरे पीछे पड़े रहते हैं ?'' - या फिर यह कि -''प्रियहरि यथार्थ की दुनिया में आओ प्लीज़। जो तुम चाहते हो वह संभव नहीं हैं। या फिर यह कि - मैने तो उस तरह से कभी सोचा ही नहीं, जैसा आप अपनी कल्पना और आग्रहों में सोचते रहे हैं। बताइए मैं आपके साथ क्या करूं? अब इस मामले में बात करना मुझे पसन्द नहीं हैं। आप कवि हैं और अपनी कल्पना में स्वतंत्र हैं ,.वगैरह।''

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''अ.......रे...... मैं आपको कैसे समझाऊँ?

आप समझते क्यों नहीं?''

प्रेम की तरंग और उनका असर भले ही स्त्री और पुरुष के हृदय में समान आवेग से ही छिपा होता है। लेकिन जहां तक परिस्थितियों का संबंध हैं, स्त्री की परिस्थितियां जटिलतर होती हैं। इसीलिए चाहती हुई भी स्त्री पुरुष के फन्दे से बचना चाहती है। वनमाला इसका अपवाद न थी। उसे अपने घर और घरवाले की कल्पना से बड़ा भय होता था। जब-जब भी वनमाला के इतर संबंधों पर शक को लेकर उसका आदमी उसपर कहर बरपा करता था, तब-तब उसका गुस्सा और नफरत उसी आवेग से प्रियहरि पर टूट पड़ते थे। वनमाला के व्यवहार से आहत प्रियहरि अपने भटकाव को छिपाए गहरी उदासी में खुद को डुबाये रहने का आदी हो चला था। बार-बार वह दयनीय स्वरों में वनमाला से कहता -''आह, वनमाला वह मेरी खुद की भूल थी। मैने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी तुम इतनी क्रूर और निष्ठुर हो सकती हो। काश मैं जान पाता कि तुम्हारे हृदय में मेरे प्रेम के लिए गहरी नफरत के अलावा और कुछ भी नहीं ।''

प्रियहरि इस बात को लेकर वनमाला के पीछे पड़ा रहता कि वह एक बार साफ-साफ कह दे कि उसे प्रियहरि से नफरत है ताकि वह निश्चिन्त हो जाए और वनमाला से सचमुच कोई संबंध न रखें । यह भी कि एक बार यह अगर निश्चिन्त हो जाए तो वह अपने दुर्भाग्य को ढोता खुद को वनमाला से दूर रखेगा। लेकिन नहीं, वैसा कभी न हो पाता। प्रियहरि का आग्रह वनमाला हर बार बड़ी सफाई से टाल जाती। वह कहती-''अ.......रे...... मैं आपको कैसे समझाउं ? आप समझते क्यों नहीं? मेरे कहने का वो मतलब नहीं था। सच केवल इतना है कि न मैं आप से प्यार कर सकती हूं, और न आप से नफरत कर सकती हूं।''

पशोपेश को और बढ़ाते अनिश्चय में ढकेलते वनमाला के ऐसे शब्द प्रियहरि को उदासीनता के अकेलेपन में ढकेलते वनमाला से दूर कर जाते थे। अकेला वह अंधेरे में घुटता होता। उसने वनमाला से बात करने से परहेज करना शुरूकर दिया। जब वह सामने होती, तब वनमाला की निगाहों से खुद को बचाता शून्य में कहीं और देखता होता। यह अजीब बात थी कि ऐसे मौकों पर प्रियहरि के हृदय में बसी उदासीनता फौरन वनमाला की आंखों अन्दर भी जा बैठती थी। जब भी मौका होता वह ऐसी हालत में प्रियहरि को अपनी सफाई खुद देती नजर आती -'' उफ.... ओह... प्रियहरि। आख़िर मैंने आपसे ऐसा क्या कह दिया कि आप मुझसे नाराज हो गए । या कभी-कभी यह कि -''उन सब बातों को भूल जाइए न प्लीज़। आाप उन बातों को अपने दिमाग में बिलकुल न रखें । वह कहती -आप तो छोटी-छोटी बातों का बुरा मान जाते हैं।''

कभी वह प्रियहरि को मनाती अपनी कमजोरियां उजाकर करती कहती - ''मुझे जब गुस्सा आता हैं तब भगवान जाने क्या हो जाता है। अपने गुस्से पर मैं काबू कर नहीं पाती और तब मुझे होश नहीं रहता कि मैं क्या-क्या कहे जा रही हूं। जो भी मुह में आता हैं मै बोल जाती हूं। आप मेरी बातों का बुरा न माना कीजिए ....चीज़ों को समझा कीजिए न प्लीज़।''

प्रियहरि की उदासीनता और दिमागी बेचैनी को इन सब से राहत तो मिलती नहीं थी बल्कि अब वह 'हां' और 'नहीं' के बीच पशोपेश की हालत में गमज़दा रहने का आदी हो चला था। ऐसे मौकों पर वह विस्मित हो अपने आप से पूछता -कि आखिर यह रहस्यमयी है कौन ? उन दोनों के बीच यह कैसा संबंध हैं ? वनमाला वैसा व्यवहार क्यों करती हैं ? अपनी प्रिया के चेहरों में से किस पर वह यकीन करे -इस या उस । जो था, उसे नियति ने ही शायदवैसा रच रखा था। वह सोचता कि दोनों के बीच जो हालात हैं वे वैसे ही अनिर्णय के क्यों रहें आते हैं। वह सोच कर कि शायदऐसे हालातों से उसे तब तक गुजरना होगा जब तक वनमाला को चित्त में बसाये और उससे संबंधो को ले कर बसी पहेलियों और सवालों से भरे मन के साथ बेचैन वह इस दुनिया से दूसरी दुनिया में नहीं चला जाता। उसके खयाल में आता कि मृत्यु के समय वैसी दुनिया और कष्ट भरी ज़िन्दगी को समेटे किसी की क्या हालत हो सकती हैं इसे केवल वे ही समझ पाएंगे जो ऐसी दुर्घटनाओं से गुजरे हों। काश , वनमाला भी उनमें होती। प्रियहरि लगातार गहरे अवसाद और विचलन से परेशान था। राहत पाने उसने गर्मियों में यात्रा पर चले जाने और ध्यान की पद्धति का सहारा लिया । ऐसे ही वह देहरादून और ऋषीकेश में समय बिता कर लौटा था। ध्यान की ओट में वनमाला की ओर से अपने चित्त को टालने की कोशिशें अब वह किया करता था। वनमाला सामने भी होती तो प्रियहरि उसे अनदेखा करता तटस्थ रहा आता। वनमाला प्रियहरि की इस मुद्रा पर लगातार गौर करती आई थी। एक दिन जब प्रियहरि वनमाला को अनदेखा करता यूं ही तटस्थता की राहत में था, उसके चित्त को पढ़ती सामने बैठी वनमाला मुस्कुरा उठी। एक निगाह उसने प्रियहरि पर डाली और जैसे उससे नहीं बल्कि हवा से बातें कर रही हो उसने मजा लेते यह टिप्पणी उछाल दी

''-क्या बात है कि जब से हमारे प्रियहरि जी ऋषीकेश से लौटे हैं, उन्होने किसी से बात करना तो क्या किसी कि तरफ देखना भी छोड़ दिया है ?''

वह कह रही थी-'' अब तो ऐसा लगता हैं कि ये सन्यासी हो गये है, अब किसी से क्यों बातें करेगें ?''

केवल कुछ महिला-मित्र जो वनमाला के लिए हानि-रहित थीं, उसके अगल-बगल बैठी थीं। वनमाला इसका खयाल रखती थी कि प्रियहरि से जब यूं चुहल कर रही हो तब वहां केवल उसकी ऐसी हानि-रहित सहकर्मी मौजूद हों, जो उसके अपने प्रेमी से संबंधों के मामले में दिलचस्पी न रखती हों। या फिर वह ऐसा मौका ढूंढ़ती जब वह और प्रियहरि अकेले साथ मौजूद हों। वनमाला को प्रियहरि इतना चाहता था कि उसकी छोटी से छोटी चुहल प्रियहरि को विचलित और उदास कर जाती थी।

परीक्षाएं खत्म होने को आ रही थीं। प्रियहरि ने वनमाला से बात करने, उसकी ओर देखने से परहेज करना शुरूकर दिया था। उसे इस बात का मलाल था कि वनमाला केवल उसे छेड़ती ही हैं उससे प्यार नहीं करती। उसका मन इस शिकायत से भरा था कि उसकी अपनी परेशानियों से वनमाला कोई सरोकार नहीं रखती।

यूं ही दो चार रोज गुज़र गए। अपने प्रति अपने उदास प्रेमी के बदलते मूड और उपेक्षा भरे रवैये को देखती खुद भी बेचैन वनमाला ने एक रोज प्रियहरि से बातें शुरूकरने की पहल की - ''प्रियहरि, मेरा एक छोटा सा काम हैं आप कर देगें क्या प्लीज़..........।''

वनमाला को पिघलता जान प्रियहरि मान से भर उठा था। सिर झुकाए वह यूं अपना काम करता रहा, जैसे वनमाला वहां मौजूद ही न हो।

रूठे हुए प्रियहरि को मान से भरा पाकर चतुर वनमाला मुस्कुराई। उसे मनाना आता था। वह प्रियहरि से मुखातिब हो फिर बोली - ''ए..ई प्रियहरि.., आप मुझे सुन नहीं रहे हैं क्या ? मैं आप ही से बात कर रही हूं।''

प्रकट में वनमाला को अनदेखा किये भी, लेकिन उदासी में उत्सुकता से धड़कते हुए दिल से प्रियहरि ने जवाब दिया - ''कहो, क्या कहना है।''

''मुझे अपने किसी परिचित के लिए एक पुस्तक की ज़रूरत है''- अपनी बात साफ करते हुए आगे वह बोली-'' मेरा मतलब है कि वे हमारें पारिवारिक डॉक्टर हैं। आप अपने श हर में तलाश कर मेरे लिए वह पुस्तक ले आएंगे क्या।''

रूपयों के कुछ नोट दबाये वनमाला की हथेली प्रियहरि तक बढ़ी हुई थी।

'' और भी लोग तो हैं उनसे कह दो ले आयेगे। चित्रकार छैला भी तो तुम्हारा बहुत करीबी हैं। तुम उससे क्यों नहीं कहतीं '' -प्रियहरि ने जवाब दिया,

वनमाला बोली - ''नहीं, मैं आप ही से यह काम कराना चाहती हूं, आप अगर नहीं करेंगे, तो मैं किसी और से भी नहीं कहूंगी ।''

प्रियहरि ने वनमाला की आँखों में झाकते उस अलिखित संदेश को पढ़ना चाहा जो उन आंखों में छिपा था । वहां शिकायत भी थी और रूठे हुए के लिए दिलासा भी थी । लिखा था कि ''तुम कितने नादान हो प्रियहरि। मेरे मन की भाषा तुम क्यों नहीं समझते ? तुम तो हल्के-फुल्के मज़ाक को भी दिल में बिठा लेते हो। मेरे शब्दों पर क्यों चले जाते हो। निरे पागल हो। तुम यह भी नहीं समझते कि शब्दों से परे यह वनमाला तो तुम्हारे साथ है।''

वनमाला की आंखों ने प्रियहरि को समर्पण के लिए मजबूर कर दिया था। उन आंखों के जादू से वह बच नहीं पाया।

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'' अच्छा, आप यह बताइये कि हम दोनो में से आप किसको ज्यादा चाहते हैं ?''

: मन्जूषा

प्रेम का संक्रमण, प्रेम के रोग को फैलाता है। समूचा माहौल ही उससे संक्रमित हो जाता है। यह बड़ी विचित्र बात है कि प्रेमियों के इर्द-गिर्द बैठे वे लोग जो जाहिरा तौर पर ऐसे संबंधों की आलोचना करते हैं खुद अपने आप को विपरीत लिंग के उस स्त्री या पुरुष की ओर अधिकाधिक आकर्षित होता पाते है जिसकी वे आलोचना कर रहे होते हैं। प्रेम अनिवार्यतः ईर्ष्या को जन्म देता है। प्रेमी-जन एक दूसरे से जल उठते ह, जब वे पाते हैं कि कोई तीसरा उन दोनों के बीच सेंध मारने की कोशिश कर रहा है। ऐसी हालत में प्रभावित प्रेमी भयानक ईर्ष्या से भरा असहिष्णु हो उठता हैं। दूसरी तरफ पास बैठे लोग जैसे ऐसे ही मौकों की तलाश में हुआ करते हैं। यह मौका बीच में घुसने और ज़रूरत के मुताबित अनबन में पड़े दिखाई दे रहे प्रेमी-युगल से जरूरत के मुताबित किसी एक प्रेमी को छीन लेने का मुफ़ीद अवसर होता है। तमाशबीनों को यह पता होता है कि प्रेमी-युगल के गहरे प्रेम-संबंधों के बावजूद ऐसे ही मौकों पर किसी एक प्रेमी को तोड़ा जा सकता हैं। प्रियहरि ने अनेक बार वनमाला को सावधान किया था कि वह सतर्क रहा करे और अपने गुस्से का इज़हार उस तरह सबके सामने किया न करे जिससे औरों के दिमाग में श क पैदा हो, लेकिन वनमाला थी कि समझती ही न थी। प्रियहरि की सलाह को दरकिनार करती वह कहती - ''आप बेकार परेशान होते हैं। कोई इस तरफ ध्यान नहीं देता और न कुछ वैसा समझता जैसा आप सोचते हैं।''

परीक्षाओं के दौरान वह पहला अवसर था जब वनमाला और प्रियहरि को पास आता देख मन्जूषा बीच में आ पड़ी थी। अफसर और सहायक की तरह प्रियहरि और वनमाला का पास-पास बैठना और एक दूसरे से बतियाना आम बात थी। उस दिन मन्जूषा ने जब दोनों को इस तरह घुलता हुआ पाया था तब दोस्ताना आवाज में लेकिन विस्मय से भरी आंखों के साथ वह वनमाला पर चीख पड़ी थी - ''हाय रे ,माइ डीयर वनमाला ! तुम प्रियहरि जी के बगल में ही कैसे बैठ गई हो ? चलो उठो वहां से और इधर दूसरी ओर यहां मेरे पास आकर बैठो। तुम जानती नहीं क्या कि वे तुमसे कितने ज्यादा वरिष्ठ और बड़े हैं।

यह वही मन्जूषा थी, जिसे कभी यूनिवर्सिटी में काम के दौरान उसके साथ बैठा एक दबंग पंडित मित्र ने श रारत से प्रियहरि पर छींटा कसा था - ''यार, तुमसे बड़ी लगी हुई दिख रही है। कौन है यह रमणी, जो बहुत हंस-हंस कर तुमसे चुहल करती मजा ले रही है ? क्या बात है, वाह ! गजब की खूबसूरत है यार तुम्हारी यह चहेती। सफेद साड़ी में लिपटी यूं दिखाई पड़ रही हैं जैसे साक्षात्‌ सरस्वती है, जो तुम्हे छेड़ रही है। अच्छा पटाया है तुमने इसे। किस्मत वाले हो तुम।''

पंडितजी की ख्याति शिक्षित-समाज में मुंहफट और झगड़ालू व्यक्तित्व की रही आई थी लेकिन जहां तक प्रियहरि का तआल्लुक था, पंडितजी से उसके बहुत अच्छे संबंध थे। यह शास्त्रीजी एक विद्वान की तरह प्रियहरि को मानते और पेश आते थे।

मन्जूषा का तबादला अब कहीं और हो चला है। खुबसूरत रमणीय चौकोर सुचिक्कण चेहरा, शरारत भरी आंखें और गुलाबी होठो में समाए तरासे हुए खूबसूरत दांतों की पंक्ति। सब मिलाकर रंगीन आकर्षक व्यक्तित्व की धनी मन्जूषा। न तो उसे दुबली कहा जा सकता था और न तो मोटी देह की। बनावट यूं ठोस और तरासी हुई थी कि उसे परंपरागत भारतीय समाज की खूबसूरत आम स्त्री की छबि में देखा जा सकता था। प्रियहरि से मन्जूषा के संबंध बिलकुल खुले और तनाव रहित थे। मन्जूषा कोई बात अपने दिल में छिपाकर नहीं रख सकती थी। ऐसी खुली और वाचाल थी कि जो भी बात उसके दिमाग में आती, बिना किसी मुलम्मे के अपनी ठेठ जुबान में वह बे-लिहाज बोल जाती थी। यही मन्जूषा बहुत दिलचस्पी के साथ प्रियहरि और वनमाला के संबंधों पर गौर किये जा रही थी। प्रियहरि को उन दिनों की वह घटना कभी नहीं भूली जब वे उस जगह साथ-साथ काम कर रहे थे । वह एक खुशनुमा सुबह थी। प्रियहरि अकेला स्टाफ-रुम में किनारे की खिड़की के पास बैठा था, जब उसने देखा कि मन्जूषा अपनी दूसरी सहचरी सुचिता को साथ लिये प्रवेश कर रही हैं। उसके ठीक विपरीत कोने पर टेबल से लगी वे दोनों बैठ गई थीं। कुछ देर खामोशी बनी रही। प्रियहरि ने तब पाया था कि एक दूसरे की आंखों में झांकती दोनों रमणियां जैसे बड़ी गंभीरता से पशोपेस को हटाकर किसी निर्णय पर पहुंचने के लिये मौन संवाद में व्यस्त थीं। फिर अचानक प्रियहरि को जैसे किसी गंभीर आवाज ने संबोधित किया था। यह मन्जूषा थी, जो उससे पूछ रही थी - ''प्रियहरि सर, बहुत व्यस्त हैं क्या ? अगर आप बुरा न मानें तो आपसे एक बात पूछनी थी।''

''इसमें क्या है। तुम्हें जो पूछना हो बेहिचक पूछ सकती हो ''-प्रसन्न मन प्रियहरि ने जवाब दिया।

'' नहीं, पहले मुझसे वादा कीजिए कि आप टालेंगे नहीं और ईमानदारी से सच-सच जवाब देंगें ''

अब प्रियहरि के चौंकने की बारी थी। आखिर ऐसी क्या बात हो सकती थी जिससे चंचला मन्जूषा आज इतनी गंभीर हुई पड़ रही है। मन्जूषा तो इतनी बिन्दास थी कि बेहिचक जो चाहे प्रियहरि से कह दिया करती थी। उसका मिजाज हंसमुख था, जिससे चलते फिरते प्रियहरि को सताने की उसकी आदत हो चली थी। आखिर नई बात क्या हो सकती थी ?

''आखिर तुम उसके लिये इतनी भूमिका क्यों रच रही हो। जो पूछना है पूछ लो.....''- प्रियहरि ने कहा।

'' नहीं, आपका कोई भरोसा नहीं। पहले आप वादा कीजिए कि आप सच-सच जवाब देंगे। आप टालेंगें नहीं या कोई बहाना नहीं बनायेंगें ''- मन्जूषा ने प्रियहरि की आंखों में झांकते हठपूर्वक कहा। मन्जूषा की गंभीरता से अब प्रियहरि भी घिर आया था। उसने सोचा कि आखिर मन्जूषा अपनी गम्भीरता के प्रति आज इतनी आग्रहशील क्यों है ? मामला क्या हो सकता है ? प्रियहरि की समझ से वह सब परे था। फिर भी बड़ी लापरवाही से उसने जवाब दिया –

'' ओके आइ प्रामिस्‌ । अब बता भी जाओ कि बात क्या है ?''

मन्जूषा कुछ संकोच में थी। उसके चेहरे पर सहमी हुई लालिमा ठहर गई थी। आवाज़ भारी हो चली थी। उसने पूछा - '' अच्छा, आप यह बताइये कि हम दोनो में से आप किसको ज्यादा चाहते हैं ?''

प्रियहरि इस तरह के प्रश्न के लिए तैयार न था। दरअसल इस बारे में कभी उसने सोचा भी न था। हिचकते हुए उसने जवाब दिया -''इसमें क्या बात है ?'' मैं तुम दोनो को चाहता हूं । मेरे साथ तुम एक साथी के रूप में बहुत लंबे समय से पास रही हो और जहां तक इनकी बात है, ये मेरी पत्नी की ससुराल की जगह से हैं और इसलिए स्वभाविक रूप से मुझसे जुड़ी हैं। ''

इस दौरान सुचरिता दिल और आंखों को थामे बड़ी जिज्ञासा से प्रियहरि को देख रही थी।

मन्जूषा मुस्कुराई और चंचलआँखोंसे प्रियहरि को देखती हुई बोली -''प्रियहरि आप अब चालाकी कर रहे हैं। मैं जानती थी कि आप ऐसा ही जवाब देगें। ''

उसने कहा - '' आप भूल गये हैं कि आपने हमसे सच बोलने का वादा किया है। आपको साफ-साफ और बिना किसी हिचक के यह बताना है कि हम दोनो में से एक कौन, दोनो नहीं। दो-दो नहीं चलेंगी।''

मन्जूषा ने प्रियहरि को पशोपेश में डाल दिया था। उस बारे में आखिर वह क्या कह सकता था ? उसने तो इस पर कभी सोचा ही न था। उसकी निगाह में तो वनमाला के सिवा वहां कोई और था ही नहीं।

उसने जवाब दिया - '' क्यों ? जो मुझे लगा वह मैने कह दिया। दरअसल इस बारे में सोचने का कभी मौका ही न मिला। ''

'' आप झूठ बोल रहे हैं। देखिये, ये बात ठीक नहीं है आने वचन दिया है और पीछे हट रहे हैं। आपको अभी इसी वक्त निर्णय करना है और बताना है कि कौन ? हम दोनों में से किसका साथ आपको ज्यादा पसंद होगा -सुचरिता का या मेरा ? एक साथ आप हम दोनों को नहीं रख सकते। आपको हममें से केवल एक को चुनना है। अब बताइये यह या मैं ?''

प्रियहरि के मुंह से अचानक निकल पड़ा - '' तुम ।''

वह नहीं जानता था कि ऐसी कौन सी बात थी जिसने उसे इस जवाब के लिए प्रेरित किया। वह प्रियहरि के साथ मन्जूषा का साहचर्य और खुला संबंध था, या मन्जूषा की लुभाने वाली सुपुष्ट दूधिया देह को भोगने का रुझान ?उस दिन के अपने निर्णय पर प्रियहरि को हमेशा उलझन रही आई। अचानक उसके मुख से ठीक वैसा क्यों निकला ? यूं प्रतीत होता है, जैसे उस दिन मन्जूषा और सुचरिता के बीच कोई गोपनीय शर्त रही आई होगी। अब तक दोनो रमणियां उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा में थीं, लेकिन जवाब मिलते ही मन्जूषा की आंखों में खुशी की चमक लहरा उठी थी।

मन्जूषा का चेहरा प्रसन्नता से अब चमक उठा था। जैसे वह जीत गई हो, लगभग उछलती हुई उसने सुचरिता के चेहरे पर निगाह डालते घोषित किया -'' देखा, मैने तुमसे कहा था न। मै जानती थी प्रियहरि मुझे ही पसंद करेंगे।''

सुचरिता का चेहरा अचानक धूमिल हो उठा था। उसकी आंखें बदरा गई थीं। बगैर कुछ कहे उसने आंखों में अलिखित पीड़ा के साथ प्रियहरि की आंखों में झांका। उन आंखों का सामना करने का साहस प्रियहरि में न था। वह गहरे संकोच में पड़ गया था। अब भी जब कभी प्रियहरि का सामना यहां-वहां कही अचानक सुचरिता से होता है तब अतीत के उस क्षण की स्मृतियां दीवार बन दोनों के बीच इस तरह आ पड़ती है कि दोनों के सामने धर्मसंकट हो आता है। ऐसे मौकों पर प्रियहरि अपने आपको इस बात के लिए शर्मिन्दा और अपराधी महसूस करता है कि उस दिन उसने सुचरिता की आकांक्षाओं को अपने चुनाव से वंचित क्यों कर दिया ? सुचरिता की आंखों में हमेशा के लिये शिकायत वह क्यों छोड़ गया था ?

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उसकी मुद्रा उस वक्त यूं हो गयी थी जैसे उसने अपनी कल्पना में वनमाला की जगह खुद

अपने को प्रियहरि के साथ बिस्तर में भोगरत पाया हो।

शुरू से ही प्रियहरि के मन में यह शंका थी कि उसकी प्रिया वनमाला की आदत अपने निजी गोपनीय संबंधों को अपनी कुछ महिला सहकर्मियों से उजागर करने की है। कहना मुश्किल था कि वह वैसा क्यों करती थी। संभवतः वैसा करने के पीछे उसमे छिपा स्त्री का वह स्वभाव काम कर रहा होता था जो अपयश के भय से पुरुष-समाज में तो खुले आकाश में उड़ने की अपनी महात्वाकांक्षाओं को छिपाए रखता है किन्तु स्त्री-समूह के बीच अपनी आकर्षण-क्षमता और आकांक्षाओं का प्रदर्शन करता संगिनियों को जलाता यह आभास कराता है कि मुझमें वह कुछ है जो तुम्हे हासिल नहीं है। मन्जूषा और अनुराधा उसकी ऐसी ही सहेलियां थीं, जिनसे वह यूं खुली थी।

प्रियहरि को याद आया कि अपने स्वभाव की गंभीरता और मौन में छिपी रहने वाली वनमाला की मौजूदगी में एक बार मन्जूषा ने अपनी शरारती आंखों से ताकते ताना दिया था -'' प्रियहरि जी तो ऐसे ही हैं। उनका क्या है ? वे तो कवि हैं। जो भी मन में आता है वे लिख जाते हैं।''

प्रियहरि तब समझ गया था कि जरूर मन्जूषा का इशारा वनमाला पर लिखी उस कविता की तरफ था, जिसमें उसने वनमाला को हम-बिस्तर सहचरी की तरह चित्रित किया था। जरूर वनमाला के चित्त में भी वह कविता तैर रही थी। मन्जूषा की ऐसी हिम्मत की कल्पना उसे भी नहीं रही होगी। मन्जूषा के बगल में छुई-मुई सी लजाती वनमाला मौन खड़ी रही थी।

वनमाला के मौन में छिपे पशोपेश पर मन्जूषा जैसे वकील की तरह प्रियहरि से मुखातिब थी - '' हाए रे.. , मैं बता नहीं सकती। न जाने मुझको तो कैसा-कैसा लगता है। प्रियहरि जी भला ऐसा लिख कैसे जाते हैं ?''

मन्जूषा के खुद के चेहरे पर हया उतर आई थी। उसकी मुद्रा उस वक्त यूं हो गयी थी जैसे उसने अपनी कल्पना में वनमाला की जगह खुद अपने को प्रियहरि के साथ बिस्तर में भोगरत पाया हो। शिकायत में प्रियहरि को प्रश्नित करती उसकी आंखें शरमाई पड़ रही थीं और भरे चेहरे पर गालों के उभार में अतिरिक्त लालिमा चढ़ी जा रही थी।

वनमाला को मन्जूषा सयानी सहेली की तरह संबोधित कर रही थी -''ये तो बस ऐसे ही हैं। लेकिन डियर वनमाला रानी, तुम्हें अपने आपको इनसे बचाकर रखना चाहिए।''

प्रियहरि सोच रहा था कि 'बचाकर' कहती मन्जूषा के चित्त में उस वक्त बचाने की वह कौन सी चीज़ लहरा रही होगी । अपनी समझ में मन्जूषा जिसकी ओर से वकालत कर रही थी, अविचलित, वह वनमाला मौन और गंभीर रही आई थी। मन्जूषा की नसीहतों के दौरान उसकी आंखें अर्थ भरी दृष्टि लिए केवल प्रियहरि की आंखों में झांक रही थीं। इधर मन्जूषा थी कि वनमाला को चेतावनी देती हुई भी अपने नाज़-ओ-नखरों के साथ प्रियहरि को छेड़ती मजे ले रही थी।

मन्जूषा का स्वभाव ऐसा ही था। प्रियहरि को याद आया कि किसी पहले भी कभी मन्जूषा अज्ञात प्रेरणा से वनमाला की शुभचिन्ता में उन दोनों के बीच आ पड़ी थी। उस वक्त कोई निहायत मासूम और कमसिन एक खूबसूरत लड़की अपनी पढ़ाई के मामलों मे प्रियहरि के साथ बातों में लगी थी। प्रियहरि का मन भी पूरी तौर पर सामने उपस्थित के साथ लगा था। तभी अचानक वहां खड़ी वनमाला से मन्जूषा प्रियहरि की ओर संकेत करती बतिया रही थी -'' देखा, देख लिया न? मै तो कहती हूं कि ये मर्द लोग ऐसे ही होते हैं। सब एक से होते हैं।''

मन्जूषा का आशय प्रियहरि ने समझ लिया था। अपने खिलाफ वनमाला को इस तरह उकसाने की मन्जूषा की हरकत उसे पसन्द नहीं आई थी। खीझ कर उसने टोका था -'' इसमें ऐसी कौन सी गंभीर बात है ? तुम आखिर ऐसा क्यों कह रही हो और किसके बारे में कह रही हो ? मै जो हूं , मेरी जो निष्ठा है , उस पर किसी को विश्वास होना चाहिए। अर्थ में अनर्थ आखिर लोग क्यों ढूंढने लगते हैं और किसी को ऐसा क्यों करना चाहिए।

वैसा कहते हुए क्षण-भर को प्रियहरि की आंखें वनमाला की आंखों से मिली थीं। मन्जूषा को चिढ़ाते हुए मानो उस वक्त वनमाला के प्रति घोषित वफादारी से प्रियहरि अपनी प्रिया को तसल्ली देता उसका मन जीत रहा था।

वनमाला उस सब के दौरान प्रियहरि को देख रही थी। उसने एक श ब्द भी न कहा था। इधर मन्जूषा थी कि प्रियहरि की झिड़की उसे नागवार गुजरी थी। जल्दबाजी में वह बडबड़ा उठी थी ''-ओ.के बाबा, अब मैं तुम दोनो के बीच नहीं आऊँगी। मुझको तुम लोगों से क्या करना है? मै तो कहती हूं तुम्हारी जोड़ी जुगजुग सलामत रहे।''

प्रियहरि कभी यह न समझ पाया कि मन्जूषा के हृदय में क्या छिपा था ? क्या वह उसकी शुभचिन्तक थी या प्रियहरि और उसकी प्रिया वनमाला के प्रति उसके मन में मीठी ईर्ष्याथी ? ऐसी कौन सी बात थी, जो मंजूषा को प्रियहरि के खिलाफ वनमाला को सलाह देने, तसल्ली देने और आगाह करने उकसाती थी ? जो भी हो मन्जूषा के रहते चीजें यूं ही चलती रही थीं। प्रियहरि से अलग होकर कहीं और चली जाने के बावजूद मन्जूषा वैसी ही चंचल, खुश और प्रियहरि के साथ संबंधो में बिन्दास रही आई थी। पहेली अब भी बरकरार है कि आखिर क्या ऐसा क्या था जिसने मन्जूषा को प्रियहरि से यह पूछने के लिए प्रेरित किया था कि वह उसके और सुचरिता के बीच किस एक को चुनना और पाना पसन्द करेगा।

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यह समझना मुश्किल था कि वनमाला की वह खीझ किस पर थी ?

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन ।

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले ॥

- मिर्जा गालिब

जन्मदिन पर वनमाला प्यार में मदमस्त गर्वोन्नत थी - प्रसन्न, और प्रियहरि भी । उस पल फिर प्रतीक्षा और मिलने की ख्वाहिश के साथ वे दोनों अलग हुए थे । लेकिन परीक्षाओं के दिन कितने थे ? भीड़ के बीच मुलाकातों का वही पुराना ढर्रा शुरू हो गया। प्रियहरि का वनमाला के बगैर रहना मुश्किल था । वनमाला से प्यार भरी मुलाकातों की ख्वाहिश उसे मारे डाल रही थी ।

वनमाला की चेतावनी के शब्दों को कि - ''ऐसा होना नहीं चाहिए । मेरे मिस्टर ने पूछा कि उपहार कहां से आए तो मैं क्या कहूंगी ? असलियत जान गये तो वे मुझे भी मार डालेंगे और आपको भी'' - याद करता भी प्रियहरि भूला जा रहा था । दिन काटे न कटते थे और रातें काटने दौड़ती थीं । दीवाली में प्रियजनों को शुभकामनाओं के कार्ड भेजते उसने शेष बचे एक को साहसपूर्वक वनमाला के नाम घर के पते ही भेज दिया । चालाकी बस इतनी कि उसके साथ उसके भयानक पतिदेव का नाम भी दर्ज कर दिया ताकि वह महज सद्‌भावना प्रतीत हो । ग्रीटिंग का वह कार्ड कलात्मक था । कांगड़ा शैली की राधा और कृष्ण की युगल तस्वीर उस पर छपी थी।

दीवाली की छुटि्‌टयां बीत चली थीं। उस बाद के दौर में वनमाला दुचित्तेपन के मूड के साथ प्रियहरि से कभी झगड़ती और कभी प्यार से उसे सहलाती रही थी । उसका गुमसुम रहा आना प्रियहरि को दुखी करता था। संस्था में काम के घंटों के बीच का अन्तराल इतना संक्षिप्त हुआ करता कि वह वनमाला से फुरसत में बातें कर सके। यूं ही बेचैनी में उसके दिन कटते गये थे। वह अक्टूबर का तकरीबन आखिरी दिन था। कामकाज की छुट्‌टी जल्दी कर बारह बजे के बाद उस दिन प्रियहरि सीधे वनमाला के दरवाजे पर जा पहुंचा था।

प्रियहरि की गणना से यह अनुमान था कि उस दिन सुबह की ड्‌यूटी पर वनमाला के श्रीमान जा चुके होंगे और बेखौफ वनमाला से मिलना हो सकेगा। लेकिन नहीं, वैसा हुआ नहीं । तीन बजे काम से लौटने की जगह उनका दोपहर दो बजे की ड्‌यूटी पर जाना तय था। प्रियहरि से कहा तो किसी ने कुछ नहीं। सौजन्य की बातें ऊपर-ऊपर हो रही थीं , लेकिन अंदर कहीं था, जो कुछ असहज था। उस वक्त प्रियहरि को लगा कि शायदवह गलत समय पर जा पहुंचा था। वनमाला के बच्चे '' अंकल-अंकल'' पुकारते प्रियहरि के साथ बड़ी दिलचस्पी के साथ बातें कर रहे थे। अचानक वनमाला के मिस्टर की खीझ बाहर आई। नाराज़ होते हुए वे बंगला भाषा में पत्नी से उन्मुख हुए ।

''ये इन्हें अंकल क्यों कह रहे हैं ? किसने सिखाया है इन्हें ?''

''क्या हो गया कह रहे हैं तो ?'' वनमाला ने अपने मिस्टर को समझाना चाहा।'

उसके मिस्टर बड़बड़ाए -''ये हमसे काफी बड़े हैं। इन्हें अंकल नहीं कहना चाहिये।''

प्रियहरि पशोपेश में पड़ गया था। पति-पत्नी के बीच की बहस बंगला में होती और प्रियहरि से वे हिन्दी में बात करते थे। उससे चाय के लिये पूछा गया था। प्रियहरि ने बता दिया कि चाय तो वह लेता नहीं। वनमाला के मिस्टर ने तब कहा कि चाय नहीं लेते तो मैं काफी ले आता हूं, काफी बना दो।

वनमाला का मूड खराब हो गया था। उसने अपने मिस्टर और प्रियहरि का तनिक भी लिहाज किये बगैर आवेश में कहा - ''कोई ज़रूरत नहीं है काफी लाने की। रहने दीजिये। जो चीज़ घर में नहीं है उसके बारे में क्या ज़रूरत है परेशा न होने की ?''

यह समझना मुश्किल था कि वनमाला की वह खीझ किस पर थी ? पति पर , प्रियहरि पर , या अपने आप पर ? वनमाला के पति दफ्‌तर जाने की तैयारी में थे और वह उन्हें खाना खिलाने की तैयारी में। जल्दी-जल्दी खाने की औपचारिकता सी पूरी कर वे निकलने लगे। वनमाला को शायद यह गवारा न था कि उसके पति के न रहते प्रियहरि उसके साथ बैठ सके। उसे किसी भी संदेह की आशंका से खौफ़ था। पति के वहां रहते ही उसने प्रियहरि को भी टालने के लिहाज से अपने मिस्टर से कहा-''इन्हें भी ले जाइये। चौराहे तक छोड़ दीजियेगा।''

वनमाला के पति ने सचमुच देर होने के कारण या वनमाला को चिढ़ाने उसकी बात टाल दी -''नहीं, मुझे देर हो गई है। वैसा न होता तो मैं इन्हें छोड़ देता।''

प्रियहरि से मुखातिब होते उन्होंने कहा-'' आप बैठिये आराम से , मैं निकलता हूं।''

उनके जाने के बाद तनाव और खीझ में भरी विषादग्रस्त वनमाला प्रियहरि से बोली -'' अब आप भी चले जाइये। खुद मुझे भी खाना खाना है और आराम करना है।''

विवश , स्तब्ध, उदास प्रियहरि उसके यहां से उठ पड़ा। उसे महसूस हुआ कि दीपावली में वनमाला की यादों में बेकरार होते अपने दिल को ग्रीटिंग-कार्ड के बहाने जो उसने भेज दिया, वह उसकी बहुत बड़ी भूल थी। वनमाला के नाम के साथ उसके पति का नाम जोड़ना भी कारगर न हुआ था। लिफाफा देखकर ही अलिखित मजमून को बांच लिया गया था। वही वनमाला और उसके पति के बीच तनाव का सबब था। दोनों के बीच ज़रूर उस बात को लेकर इस दौरान झगड़े हुए थे। आज भी उनकी बातों के बीच उस ग्रीटिंग का जिक्र किन्चित व्यंग्य के साथ हुआ था। अवश्य इसीलिये वनमाला इन दिनों उससे बच रहने की फिराक में खिंची-खिंची, अलग-थलग, चिन्तित और उदास रही आई थी।

उस दिन के बाद प्रियहरि लगातार वनमाला के चेहरे पर गंभीर उदासी और खिंचाव देखता रहा था। वह उसकी ओर निहारती जरूर लेकिन एक चुप्पी थी, जिसमें उसकी प्रसन्नता को लील रखा था। वनमाला को अवसादग्रस्त और चिंतित देख प्रियहरि का मन भी रोता था। वह चाहता था कि वनमाला के साथ बैठे, उसके गले से लग जाए और कहे कि तुम्हारा दुख मेरा भी दुख है। तुम इतनी अकेली और उदास क्यों हो? लेकिन मन को मसोसकर वह रह जाता था। विवश ता और आतुरता का द्वंद प्रियहरि के अंदर मानो वनमाला की आंखों में झांकता उतर आता था।

प्रियहरि के लिये वनमाला रहस्यमयी थी। उसे लेकर इसका मन चौबीसों घंटे झंझावातों से घिरा होता था। कभी–कभी उसे ऐसा प्रतीत होता जैसे अपनी चुप्प उदासी में वनमाला शायद उससे भी अधिक झंझावातों से गुजर रही होती थी। वह इतना गहरा हुआ करता था कि उसकी तह तक जा पाना प्रियहरि को असंभव दिखाई पड़ता। वह अन्दर का विचलन ही था जो वनमाला की किंकर्तव्य उदासी की तरह सदैव उसके चेहरे पर छाया होता। वे दिन ऐसे ही थे जब दोनों मिलते, एक–दूसरे में सुलगती आग के उन धुएं से रूबरू होते, पर शब्द होठों पर थरथराकर थम जाते। यही नियति थी।

उस एक दिन अचानक ऐसा संयोग बना बना था कि लरजते होठों से शब्द फूट पड़े थे। दोनों ही नजरें मिलाते और नजरें चुराते एक–दूसरे की उदासी को पढ़ रहे थे कि बाहर कार के रुकने की आवाज हुई और क्षण भर बाद वनमाला की ही हमउम्र एक सांवली कृशकाय लता डोलती हुई अंदर नमूदार हुई।

वह दौड़कर वनमाला से लिपट चली थी और प्रियहरि के सामने ही ’’ हाय कितने दिनों बाद तुझे देख रही हूं। फोन तक करना भूल गई है और लगाओ तो तेरा फोन हमेशा बंद मिलता है। कैसी है तू ’’ कहती उसके गालों पर चुम्बन बरसा रही थी। मिलन की वैसी ही अधीरता वनमाला में भी छाई थी। गहरा आलिंगन और चुंबन दोनों तरफ से बरस रहा था। यह वनमाला के पुराने कालेज की संगिनी अन्शुलता थी। दोनों इस मिलन से अपार खुश थीं। इस खुशी की लहर का छींटा प्रियहरि तक भी पहुंच चला था। वनमाला ने आत्मीयता से प्रियहरि की आंखों में झांका और प्रशंसापूर्वक उसका परिचय अन्शुलता से कराया । अन्शुलता की निगाहें उत्सुकता की दिलचस्पी में जैसे प्रियहरि को तौल गई थीं।

कहीं कुछ ऐसा न था जिसमें यह आभास हो कि तब वनमाला और प्रियहरि के बीच कहीं दूरी हो। अन्शुलता के आने का फायदा यह हुआ कि बातचीत का सिलसिला फिर चल पड़ा। अक्सर वैसा होता था। रूठी हुई मौज को बाहर आने का बहाना दोनों के अंदरूनी मामलों से बेखबर किसी तीसरे के आकर पुल बना जाने से होता था। अन्शुलता के जाने के बाद उसी के बहाने वनमाला और प्रियहरि के बीच तफसील से बातें हुई थीं। इस तरह जैसे किसी से किसी की कोई शिकायत न हो।

प्रियहरि वनमाला से कह रहा था – “बताऊँ ? तुम्हारी वह अन्शुलता जब तुमसे लिपट बेतहाशा चूम रही थी तो मुझे उससे बेहद जलन हो रही थी।’’

’’ क्यों ? भला आप को जलन क्यों होनी चाहिये ?’’

’’ इसलिये कि तुम्हारे साथ वह जो कर रही थी उसपर तो केवल मेरा अधिकार था।जी करता था उसे परे

ढकेलूं और वैसे ही लिपट दोनों के बीच की सारी कसर निकाल डालूं।’’

वनमाला खिलखिला पड़ी।

’’ हां। खयालों में तो मेरे भी वैसा ही मौसम आ चला था। अब पछताइये। वक्त तो चूक गया।’’

वनमाला ने बताया कि उसकी वह सहेली क्रिस्चियन थी और मिलन की खुशी में वैसा चुम्बन प्रचलित रिवाज ही था।’’

’’ बाबा रे, क्या आवेग था उसके लिपटने और तुम्हें चूमने में। तुममें भी तो वैसा ही ज्वार उमड़ा था। मुझे तो ऐसा लगा कि आगे तुम दोनों के बीच बस वह दृश्य अब उपस्थित होने ही वाला है। ’

’’ छि: आप बड़े वैसे हैं ’’– वनमाला बोली।

’’ क्या उसे तुमने हम दोनों के बारे में और कुछ कहा था ?’’

’’ क्यों ? मैने तो कुछ नहीं बताया था।’’

’’ मुझे ऐसा लगा कि उन आँखों में कुछ और भी था’’

’’ औरत की आंखें बिना कुछ बताए भी बहुत–कुछ तलाश लेती हैं।’’

समय वैसे ही कटा। इससे पहले कि दूसरी पाली के लोग काम पर आएं, वनमाला अपनी पुस्तकें और पर्स समेट हाथ हिलाती विदा हो गई थी।

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आप तो बस कुछ भी समझ लेते हैं।

बाइ गाड, मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा है : वनमाला

बर्फ पिघली। फिर जैसे एक-दूसरे के मन की लिखावट पढ़कर कब प्रियहरि और वनमाला निकट आए, बैठे, बात करने लगे यह पता ही नहीं लगा। उन दुखों और मजबूरियों के बीच का यह सुख और मिलन भी सहज था। ऐसे क्षणों में वे दोनों यूं हो जाते जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो।

एक दिन चाहत और प्यार के क्षणों में प्रियहरि ने उससे कह दिया कि 'वनमाला, तुम्हारी उदासी और विचलन मुझे भयभीत करते है। ऐसा लगता है कि टूटकर घबराहट में तुम हमारे बीच के संबंधों में मेरे प्रति अपनी नाराजगी की चर्चा अपनी महिला संगिनियों से कर जाती हो।' प्रियहरि ने जानना चाहा था कि क्या उसका संदेह सही है ? वनमाला प्रियहरि की आंखों से झांकती उदासी और वाणी में छिपे दर्द को पढ़ रही थी जब वह उससे कह रहा था कि 'वनमाला, मैं चाहता तो अन्यों से भी पूछ सकता था लेकिन मेरी नैतिकता ने कभी मुझे यह इजाजत नहीं दी कि मैं तुमसे पूछने के सवाल औरों से पूछूं।'

परम एकांत के निर्विघ्न क्षणों में उस दिन वनमाला के जवाब में प्रियहरि को तसल्ली दी। वनमाला ने कहा था कि आपस की बातें उसने कभी किसी से नहीं की वह कह रही थी - ''आप बेकार दुखी होते है, संदेह करते है। विश्वास रखिए कि आपस की बातें मैं कभी किसी दूसरे से नहीं किया करती।''

दिन गुजरते गए। एक दिन प्रियहरि जब कालेज गया तो देखा कि प्रशासन के खिलाफ स्टॉफ के द्वारा यूनियन के जरिये की गई शिकायतों की जांच के लिए उनके बड़े अफसर आए हुए है। यूनियन का सचिव वह ही था इसलिए प्रशासन के विरूद्ध केन्द्र में वह ही था। उसे पता लगा कि सारी महिलाओं ने यह लिखकर दे दिया था कि उन्हें शिकायत तो थी, लेकिन अंदरूनी थी। सरकार तक भेजने की बात उन्होंने नहीं कही थी। सत्यजित, नलिनजी और कानन के अलावा प्रियहरि के पक्ष में कोई न बोला। खूबसूरत अनुराधा स्पष्टतः बॉस के पक्ष की थी। इसलिए उसे छोड़कर बाकी महिलाओं को कालेज न आने की ताईद कर दी गई थी। प्रियहरि के मन को यह धक्का लगा कि जिन पर वह भरोसा करता था; जिन्होंने शिकायत की, कागजों पर दस्तखत किये वे ही डर कर बॉस के कहने पर आज गायब हो गईं। खासतौर पर उसकी प्रिया वनमाला भी जिसके लिए वह जाहिर तौर पर प्रशासन से झगड़ा कर बैठता था, उस दिन गायब थी। वनमाला को परीक्षा के काम की कुछ पैसे नहीं मिले थे। केवल उसका भुगतान किया दिखाकर हिसाब भेज दिया गया था। एक दिन कभी वनमाला के साथ और उसके सामने ही प्रियहरि ने प्रशासन के एजेन्ट को भोले मोशाय को इस पर फटकार भी लगाई जिससे वनमाला पर उसने अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए उसे धमकी भी दी थी। सरला नीलांजना के साथ भी यही हुआ था ऐसी शिकायतें बहुतों की थीं। इन्हीं सब की प्रोत्साहन से प्रियहरि लीडर बना उस बॉस झगड़ पड़ा था जो खुद उसे अपना पुराना परिचित और मित्र जान पास लाना चाहता था । और तो जैसे तैसे पर जिसे वह भरोसे का साथी समझता था उस वनमाला के उस दिन न आने की शिकायत प्रियहरि के मन में रही आई थी वह प्रतीक्षा में था कि उससे भेंट हो और वह पूछे कि प्यारी वनमाला, क्या यही मेरे विश्वास और प्रेम का प्रतिफल है जो तुम मुझे दे रही हो ? प्रियहरि उसे देखने की इच्छा करता तरसता रहा। न वह दिखाई देती थी, न कोई उसकी खबर देने वाला था। वह उस टेबिल की ओर देखता जिस पर उसका काला पर्स कालेज में उसकी उपस्थिति बताता था और जो अब लगातार गायब पाया जा रहा था।

तीसरे दिन अचानक दफ्तर में प्रियहरि को चन्द्रनाथ नजर आए। उन्होंने यह कहकर उसे

चौंकाया कि मैडम का तो ट्रांसफर हो गया है और अब मैं यहां आ गया हूं। वातावरण की रहस्यमय चुप्पी और हवा में घुली असाधारण उदासी का कारण अब प्रियहरि की समझ में आया। एक दिन की उसकी छुट्‌टी और अनुपस्थिति के दौरान ही बहुत कुछ घट गया था। प्रियहरि की आंखों में वह दृश्य और उस पल का विषाद तैर गया जब पिछले दिनों उस पर मर-मिटते उसने वनमाला से कहा था कि 'ऐसे दूर रहने से तो अच्छा होता कि वनमाला चुटकी भर विष उसे अपने हाथों ही दे दे ताकि कम से कम ऐसी प्यारी मौत से तृप्त वह अपनी आंखों में वनमाला को बसाए प्राण त्याग दे।'

तब वनमाला ने जवाब दिया था - ''छिः रे, इससे तो अच्छा यह होता कि मैं अपने पुराने कालेज में ही रही आती। कम से कम मजबूरी के ऐसे दिन तो न आते।''

हां, उसका तबादला तकरीबन चालीस मील दूर मालवा के उसी कालेज में हो गया था जहां वह पहले रही आई थी। बाद में किसी दिन सुचरिता ने प्रसंग आने पर बड़े अनमनेपन से प्रियहरि को सूचित किया था - ''वनमाला आई तो थी। आपको यहां-वहां ढूंढती बेचैन नजर आ रही थी। आप ही नहीं आए थे।'' सुचरिता का इशारा उस दिन की तरफ था जब वनमाला यहां से मुक्त कर चुपचाप बिदा कर दी गई थी।

वनमाला के साथ की आदत इस कदर जिन्दगी को रास आ गई थी कि उसका चला जाने प्रियहरि को सूना छोड़ गया था उसे देखे और अनदेखे पांच दिन गुजर चले थे तभी बातें चली तो किसी ने व्यंग्य भरे स्वर में उसे बताया कि बॉस के खिलाफ स्टांफ के शिकायत पर जो पूछताछ हुई उसमें बॉस के पक्ष में हस्ताक्षर करने वालों में 'आप की' वनमाला भी तो शामिल थी। प्रियहरि को बहुत पीड़ा हुई। कमस्कम वनमाला से ऐसी उम्मीद वह नहीं करता था। प्रियहरि ने सोचा कि वैसे व्यवहार से वनमाला में मानो इससे पूर्व जन्मों का बचा-खुचा ऋण भी वसूल लिया था । उसने तय किया कि जाकर इस बात के लिए वनमाला को वह बधाई तो दे दे। जो होना था वह तो पहले ही हो चुका था। अब होने को बचा क्या था जो भय हो।

बहुत भारी मन से प्रियहरि वनमाला के घर गया। दोपहर बाद जब उसके घर दाखिल हुआ तो उसके श्रीमन काम कर जा चुके थे। मार्ग निष्कंटक था। वनमाला अकेली थी, शांत थी। पूछ परख हुई, बातें हुई। प्रियहरि के पहुंचने से वनमाला का मूड खिल गया था। प्रियहरि ने उसे बताया कि छुट्‌टी से लौटने के बाद उसने क्या देखा, क्या पाया और उस क्या गुजरी। बात चलाते प्रियहरि ने वनमाला के दस्तखत की चर्चा उससे की और मायूसी में डूबा उसे धन्यवाद दिया। उसने कहा कि वैसी उम्मीद वनमाला से उसे न थी।

वनमाला ने प्रियहरि को तसल्ली देने की कोशिश की। उसने कहा - ''आप बेकार परेशान होते है। आपको क्या होने को है ? भोला बाबू घर आ गये थे। वे परेशान थे, मिनमिनाने लगे कि 'मैडम, दस्तखत कर दो अन्यथा में फंस जाऊँगा। मेरे खिलाफ जांच शुरूहो जाएगी। आप तो अब वहां से चली गई है। आखिर उसमें हर्ज ही क्या है ? उससे मेरा भला हो जाएगा।' वनमाला ने आगे जोड़ा - ''मैंने ही सोचा कि अब जब सचमुच उस कालेज से मेरा लेना-देना ही नहीं रहा तो क्या हर्ज है ? बस ऐसे ही दस्तखत कर दिया।''

वनमाला ने प्रियहरि से कहा कि अब आप भी वहां से निकल जाइए और अपना तबादला अपने नगर में करा लीजिए। वनमाला हमेशा अपनी उन सहकर्मियों से सशंकित रहा करती थी, जो कभी उन्हें मिलाने और कभी अलग करने अपनापा दिखाती प्रियहरि के गिर्द मंडराया करती थी। वह आश्वस्त होना चाहती थी कि उसके जाने के बाद कोई और प्रियहरि और उसकी यादों और प्यार के बीच प्रवेश न कर पाए। जैसी दुविधा और संदेह वनमाला के मन में थे वैसे ही प्रियहरि के मन मे भी थे जिससे वह भी वैसा ही व्यथित था। वनमाला की अन्यमनस्कता और रहस्यमय व्यवहार प्रियहरि के लिए पहेलियां थीं। वह उन्हें बूझना चाहता था। संकोच में सहमते हुए प्रियहरि ने भी वनमाला से पूछ लिया - ''वनमाला, आज एक रहस्य से पर्दा उठाना होगा। बताओ कि दीगर महिलाओं का व्यवहार कभी-कभी मेरे प्रति अचानक कुछ खिंचाव का क्यों कर हो जाता था ? क्या तुम्हारा खुद का हाथ इसमें नहीं था ? क्या सचमुच आपस की बातों की जुगाली तुम उनसे नहीं करती थीं ?''

प्रियहरि ने खुलासा करते हुए अनुराधा की वनमाला से कानाफूसी और अनेक बार वनमाला में लक्षित उस रवैये का प्रसंग छेड़ा था जब वह उसे अकेला छोड़ स्टांफ रूम से बाहर खिसक लेती थी।

वनमाला बोली - ''आप तो बस कुछ भी समझ लेते हैं। बाइ गाड, मैंने कभी किसी से कुछ न कहा है। जहां तक स्टाफ-रूम से बाहर रहे आने की बात है तो मैं इसलिए बाहर रहती थी कि कामर्स के हमारे प्रमुख नलिन सर से मुझे सखत नफरत थी।''

कुछेक पल ऐसी चुप्पी में बीते जिनमें वनमाला और प्रियहरि दोनों का पशोपेश छिपा था। वनमाला का प्रियहरि से और प्रियहरि का वनमाला से दूर रहना कल्पनातीत था। वे दोनों जैसे अतीत की सारी उलझनों का समाधान करते-कराते एक-दूसरे की वफादारी और प्यार को विदाई की इन पलों में तृप्ति के साथ बांधकर एक-दूसरे को आश्वस्त कर लेना चाहते थे। वनमाला के दिलासे के बावजूद प्रियहरि का चित्त उदास था । किस वनमाला पर वह भरोसा करे-वह सोचता रहा ?

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शून्य में खोया समय : मैं तृप्त मैं अतृप्त

अंधेरे में उसकी देह में

तृप्त सुख दमका

जैसे दमकी नाक की कील

जैसे सुख समूची देह में गड़ती

कील था ।

-अंधेरे में/अशोक वाजपेयी/उम्मीद का दूसरा नाम/पृ. 25

बादलों की धमक, बिजली की सनसनी और मूसलधार बारिश : कोई किसी से प्यार नहीं करता . कर ही नही सकता . वह जिसे हम प्यार कहते हैं , महज एक जूनून है. हर आदमी में एक वहसी जूनून होता है. अपने उस जूनून को ही वह प्यार का नाम देता है.

उस मुलाकात का एक-एक पल प्रियहरि की स्मृतियों मे तैर रहा था।

प्रियहरि यानी मेरे चेहरे को गौर से वनमाला ने देखा । उसकी आंखों में शरारत झांक रही थी । अचानक वह खिलखिलाकर हंसने लगी । मेरी आंखों ने उसकी आंखों में झांका । उदासी की परतें और गहरी हो गई । अचानक वनमाला बोली- ''तुम्हारा यही बुद्धूपन तो मुझे भाता है ।बेकार किस चिन्ता में पड़े रहते हो ?''

मेरे करीब आती उसने पीछे से सिर के बाल पकड़े और तड़ातड़ मेरे गालों को चूम गई । बोली-

''तुम्हारा यही भोलापन तो मुझे खींचता है । छोटी सी कोई बात क्या हुई, बस मुंह फूल गया और आंखें शून्य में झांकने लगती हैं । मैं सामने हूं । मुझसे मिल रहे हो फिर भी उदास हो । बताओ भला क्यों नाराज हो ?''

''मुझे न जाने क्यों तुमसे डर लगता है । पास होकर भी तुम दूर जो लगती हो ।'' वनमाला वहां पड़े तखत पर बैठ गई थी । मेरी बात के जवाब में बोली-

''तुम्हारी यही अदा तो मुझे भाती है । बिल्कुल बच्चे हो, भोले और मासूम । मेरी आंखें नम हो चली । उसके पैरों के पास बैठकर मैंने उसकी गोद में अपना सर रख आंखों की नमी को छिपाने की कोशिश की । मेरा सर उसकी जंघाओं के बीच धंसा था ।'' मैंने धीरे से कहा-

''मेरा मजाक मत उड़ाओ प्लीज़ । मैंने कहा न वह कल बोली न मैं । उसके हाथ मेरे बालों को सहला रहे थे और गालों का स्पर्श करते उसे हौले-हौले मसल रहे थे । वह क्षण मौन के संवाद का था ।'' मैंने कहा-

''आज मुझे भगाओगी नहीं ।''

जैसे बहुत दूर से आवाज आ रही थी, उसने उसी आवाज में जवाब दिया । ''नहीं ! वो अब रात दस बजे आएंगे और बच्चे किसी ग्रुप के साथ पिकनिक पर हैं । रात उन्हें लेकर आना होगा ।''

उसी तरह सिर गड़ाए मैंने धीमे से पूछा-

''कामवाली नौकरानी''

''वो दो दिनों से गायब है । खबर आई थी कि कोई बीमार है । शायद कल आए । मेरा बैचेन सिर उसकी जंघाओं की संधि में धंसा पड़ रहा था । मेरे हाथ उसकी जंघाओं पर पसरे थे और उसके पुट्‌ठों को दबाते घर रहे थे । वनमाला का सिर झूककर मेरी पीठ पर टिका जा रहा था । उसके स्तनों का गुदाज स्पर्श मेरी पीठ को सहला रहा था ।''

वनमाला पूछ रही थी- ''सीधे कॉलेज से चले आए हैं ना ? ठहरो ! हटो, मैं तुम्हारे लिए कुछ लाती हूं ।'' झटके से वह उठ खड़ी हुई । पहले बाथरुम की ओर गई । फिर एक छोटी प्लेट के साथ रसोई से वह नमूदार हुई । पानी के छींटों से उसका चेहरा धुला था । चेहरा उसने पोंछा न था और पानी की छींटें नन्हीं बून्दों की शक्ल में उसकी लटों पर सजे थे ।‘’

''लो आज मेरे हाथों से खाओ'' वह सामने खड़ी रसगुल्ले मेरे मुह में ठूसने लगी ।

मैंने निगला । कहा- ''ऐसे नहीं, मेरे साथ तुम भी खाओगी ।'' मैंने प्लेट से एक-पर-एक दो रसगुल्ले उठा उसके मुह में ठूंस दिया । मेरे होंठ उसके रसगुल्ले से अंटे फूले गालों को बारी-बारी से चूमते उन ओंठों तक पहुंचे जहां रसगुल्ले समाये थे । होठों से होठ भिड़ा मैंने धीरे से मुंह में भरे रसगुल्लों से एक टुकड़ा दांत में दबाया और बोला- ''वनमाला तुम्हारे होठों की मिठास रसगुल्लों की चासनी से दोगुनी हो गई है ।''

'' आह , झूठे । मुझे मस्का लगा रहे हो '' वह मुझे परे ढकेलती है।

'' तुम्हारे सिवा है भी कौन जो इस काबिल हो ? तुम्हें बुरा लगता हो तो न लगाया करूं ?''

मेरी आंखों में झांक वह निगाहें झुका लेती है। उसके पांवों की अंगुलियां थिरक रही हैं। अंगूठा जमीन को कुरेद रहा है।

मेरी आंखें उसके चेहरे में डूबी मुग्ध हैं। बाहर आंगन में रंग.बिरंगे फूलों की छटा के साथ उसकी वाटिका की हरीतिमा वासन्ती धूपछांही छटा में मनमोहक लग रही है। उस तरह सलजता में ठिठकी वनमाला में भी मुझे वही छटा नजर आ रही है। आंखों ,पलकों, भौहों , होठों, गालों, लटों, नासिका - सब पर टिकतीं मेरी आंखें वनमाला को लील रही हैं। मुझे याद आ रहा है -''सर्वे नवा इवा भान्ति मधुमास इव द्रुमा :''।

सफेद फूलों की चमक से भरी सघनता में फैली चमेली की पत्तियों में जरा चिकनी लालिमा मैं भर देना चाहता हूं। उसकी छितराई पतली डालियों में मैं उस लता की नमकीन लहसुनिया गंध भर देना चाहता हूं, जो बारिश के बाद नीले फूलों के गुच्छों से लद जाती है। वनमाला ठीक वैसी ही होगी। भुजाओं की ठीक वैसी ही नमकीन गंध के साथ। वनमाला की पलकें झुकती हैं। वक्षस्थल को कंपाती गहरी सांस बाहर आती है और थिरक कर मौन हो जाती है। अपने मंदस्वर से वनमाला मेरे कानों में प्रवेश करती है।

''मुझे पहली बार देख रहे हैं क्या ?''

क्या निस्तब्धता में भी माधुर्य हो सकता है ? हां, यह मैने उस वक्त जाना।

'' तुम्हें जब भी देखता हूं वह पहली बार ही होता है। इससे पहले कि आंखों में तुम्हें बसाकर तृप्त हो पाऊँ, तुम ओझल हो जाती हो। आज जी भर निहारने दो। ''

आज वह फिर देखने से वंचित कर रही है। जवाब में वनमाला का चेहरा मेरे वक्ष में समा जाता है। उसी अतल गहराई से एक रागिनी उठ रही है।

'' तुम मुझे पागल बना दोगे। ''

उसी तरह नीरव पदचाप से मेरा जवाब वनमाला का स्पर्श करता है।

'' अपनी वाटिका की खूबसूरती आज तुमने चुरा ली है।''

वनमाला की चिबुक को अंजुरी में थामे मेरा मन्द्र स्वर उससे कह रहा है -''तुमने मुझे पागल बना दिया है।''

मैं पूछता हूं - आज जी चाहता है तुम्हारी वाटिका की सारी खूबसूरती समेट लूं। सैर कराओगी न ?''

उसकी हथेलियों ने मुझे थाम लिया है।

''आओ ।'' अपनी बड़ी-बड़ी आंखोंसे मुझमें झांकती वह उस ओर खींचती है जिधर वाटिका की ओर खुला द्वार है। मेरा बायां हाथ अंगुलियों में असज्जा में भी सज्जित उसके सपाट केशों पर हौले-हौले थिरक रहा है। दायां हाथ उस द्वार की सिटकिनी सरकाता है और बागीचा कैद में सींकचों के पार चला जाता है। एक अनाम मिठास की भीनी-भीनी सुगंधि से भरी मादक स्तब्धता के बीच केवल दिल की धड़कनों का ही शोर है, जो निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अहसासों में उसे केवल दो सुन रहे हैं। एक वनमाला, और दूसरा मैं यानी प्रियहरि।

''वाटिका वहां है, जहां वनमाला है। मैं वहां जहां मेरी वाटिका है।'' मेरी आवाज़ इतनी धीमी है कि वनमाला के उन उस कान के अलावा जिसकी तांबे की तरह ललाई लौ के करीब मेरे होठ अपना संदेश उस तक पहुचाने बढ़ चले हैं, उस अपनी ही आवाज़ को मै भी नहीं सुन सकता। एक झटके से वनमाला के उस हाथ को मेरे हाथ अपनी ओर यूं खीचते हैं कि द्वैत में शोर मचाती धड़कनें परस्पर संक्रमित और संगमित होतीं निर्झर की तरल शीतलता में तब्दील हुईं पहाड़ी का आवेग खो समतल धरती पर आ उतरती हैं । अलस-अनमने बाहर जाते वनमाला के उन कदमों को मैं, मेरा जादुई संदेश इस तरह खींच लौटाता है जैसे उन्हें बस ऐसे ही मनुहार की प्रतीक्षा थी।

वनमाला मुझे अपने बागीचे की सैर करा रही थी। मैं उस कोने की ओर बढ़ रहा था जहां

लहराती झाड़ियों के झुरमुटे में नीम अंधेरों में छिपी एक नन्ही कली चिनगारी सी दमक रही थी।

''उधर नहीं प्लीज़। वह संरक्षित कोना है। उधर जाना खतरनाक है।''

मैने वनमाला की आंखों में झांका। मुझे बुरा लगा था।

'' क्या फायदा जो बाहर की सैर से लुभाती अब तुम ऐसा कह रही हो? ठीक है मैने देख लिया तुम्हें। जब तुम्हारी ही इच्छा नहीं तो मैं क्या कहूं? मैं जाता हूं। बस देख लिया तुम्हें।''

'' आप बुरा मान गये। जरा आराम कर लीजिये फिर जाइयेगा। मुझे तो आप का यूं ही रहा आना भी बहुत भा रहा है।''

''नहीं तुम्हारी बाहर की सैर ने मुझे बेचैन कर दिया है। अंदर जाने से तुम मना कर रही हो। कितनी देर से तुम्हारे साथ यूं टहल रहा हूं। मेरी तीसरी टांग थरथरा रही है और तुम हो कि ऐन उसे थामने की जगह भगा रही हो।''

''लाओ'' वनमाला ने उसे थाम लिया। ''आह ! यह मुझसे नहीं संभाला जाएगा। बहुत तप रहा है। इसे झुरमुट के उस अंधेरे में मुझे टिकाना होगा जहां मेरे बागीचे की धरती लावा उगल रही है। चलो आओ?

आ जाओ। अरे टेढ़े-मेढ़े कहां टांग भटक रही है। राह देख सीधे घुसे चले आओ। आओ और खूब देख लो तुम्हें मैने कहां-कहां सजा रखा है?''- वह बोली।

बगीचे के उन झुरमुटों का तंग अंधेरा कपाट की तरह तना था। कपाटों की संधि को टोहती-टटोलती मेरी टांग अंदर प्रवेश करने बेताब थरथरा रही थी। वनमाला ने कसकर थामा और कपाट की संधि पर यूं टिकाया कि फिर धक्का देता मैं सीधे खुद ही धंस चला।

मेरी टांग बागीचे की उस अंधेरी सुरंग में भी जो नमी से भीग रही थी, हर कोने को वह अब टोह-टोह कर टटोल रही थी। दीवारें रिस रही थीं। लार टपकाती मानों वे उस ताप की प्रतीक्षा में थीं जो उन्हें सोख ले। जहां-जहां मैं धंसता वनमाला मुझे संभालती साथ चिपकी होती। दोनों को एक-दूसरे का खूब ध्यान था। मैने पाया सचमुच वह एक दहकते फूलों की वाटिका थी।

वनमाला की उस प्यारी वाटिका में कभी मेरे हाथ लहराती बेला के भूरे रसीले अंगूरों को तोड़ते, चबाते और चूसते रहे और कभी उन कदली स्तंभों को मापते रहे जो सुतवां चिकनाई में ढले थे। कभी मैं उन खूबसूरत गोलाइयों पर फिसलता जो वाटिका में बेल के फल जैसे भरपूर पुष्टता में फूले जा रहे थे और कभी उस संकरे नक्काशीदार पुल को मापता जो आवाजाही करते कंप-कंप कर लचकता खूब गुदगुदाए जा रहा था।

'' कितना सुन्दर बागीचा है? बहुत मजा़ आ रहा है। जी चाहता है कि अपनी उछलती टांग में चिपका साथ लेता जाऊँ।''

'' अब जब घुस चले हो तो यह वाटिका तुम्हारी है। ले लो भरपूर। जितना जहां-जहां से भाए लेते जाओ।''

''आह, सचमुच तुम्हारा जवाब नहीं। लो ये लिया।''

''और लो''

''यह देखो, और लिया''

''लो? और, और,और लिया''

''आह? लेते चलो। ले-लेकर इसे जितना निचोड़ोगे उतनी ही ज्यादा मैं हरी होती चलूंगी''

''आह, वनमाला मेरे साथ भी वही घट रहा है जो तुम्हारे साथ घट रहा है। जितना लेता हूं? जितने अंदर जाता हूं, उतना मजा बढ़ता जाता है''

'' हाय.हाय। यह क्या हो रहा है? बिजली चमक रही है। बादलों की नमी मुझको भिगा चली है। अब रुकना मुश्किल है। दौड़ चलो। चलो जल्दी, और-और जल्दी''

कूद-कूद कर , उछल-उछल कर चोट खाता और वनमाला के बागीचे की हर सतह से टकराता मैं बेतहाशा दौड़ रहा था।

'' आह, मुझमें बिजलियां कड़क रही हैं।'' मैं चीख रहा था।

'' मुझमें बूंदें बरस रही हैं। मैं भीगी जा रही हूं।'' - वनमाला बुदबुदा रही थी।

'' अकेले नहीं। हम दोनों भीग रहे हैं। आह इस सनसनी को कैसे निगलें। यह बिजली गिरी- एक.. दो.. तीन.. चार.. पांच.. छः.. सात ''

'' आह मेरी छतरी में समा कर चिपक रहो। बस करो बाबा बहुत भीग लिये''

इधर फुहार की सनसनी मेरे अंदर फैलती जा रही थी और उधर गुफाओं की लरजती-कंपती दीवारें उसे गुदगुदा रही थीं । फिर एक बिन्दु ऐसा आया जहां हल्की पड़ती बारिश चार-पांच तरंगों के साथ अघाकर समूची झर चली। बागीचे की जमीन खूब नहा चली थी। वे पांव जो साहचर्य की गुदगुदी पैदा करते वनमाला और मुझे सैर का मजा़ दे रहे थे इस वक्त कीचड़ में सने सुस्ता रहे थे। हमारे बीच सारा पठार बारिश की चिपचिपाहट से भर गया था ।

छतरी में समाए हम कब तक बेहोश रहे आए यह कहना मुश्किल है। जब होश टूटा तो हमने पाया कि मौसम साफ हो चुका था। प्यार में उपजायी कीच और मिटटी की फसल उतार, आवरणों की सिलवटें सजा मासूम दुनियादारों की तरह स्वर्ग की सैर से लौट पुनः सोफे-कुर्सियों के जीव हो चले थे। बातें करते, हंसते-बोलते,हिलते-हिलाते, डोलते-डुलाते, खिलते-खिलखिलाते आराम में अलसा चला मन अब फिर जाग चला। इक-दूजे को तकतीं, इक-दूजे में डूबीं, मिलती-खिलतीं-उठती-झुकती आंखें अधिक मजबूती और तैयारी के साथ उस एक अनुभव को पुखता कर लेने बुला रही थीं।

रसगुल्ले की मिठास अब तक बाकी थी पर अब वनमाला के रस में डूब मिठास दोगुनी हो चली थी। उसे अभी -अभी मैने चखा था लेकिन जी फिर उस मिठास को निगलने मचलने लगा था। वनमाला अभी.अभी ठीक ही तो कह रही थी कि यह आज कल फिर शायद न लौट पाएगा।

उस दिन मैं सारा कुछ एकबारगी वसूल लेना चाहता था । ऐसा कि मेरी प्रिया और मेरे अंदर की सारा सामर्थ्य एक-दूसरे में एक-दूसरे को हमेशा के लिए खलास कर दे । इस खयाल की सनसनी के साथ मेरे होठों ने अचानक फिर वनमाला के होठों पर हमला कर उन्हें दबोच लिया । करवट से फिर उसके शरीर को चितावस्था में धकेलता उसकी कटि को घेरे उस पर सवार था । कुछ वक्त पहले चखी मिठास का नशा दरअसल अब असर करता चढ़कर बोलने लगा था। इस बार बगैर मौका गंवाए वनमाला भी फौरन लता की मानिन्द लहराती मेरे बदन पर लिपट छाती चली गई थी। कसकसाती छातियां कोई कसर न छोड तीं एक-दूसरे को मसलती होड़ ले रही थीं । गालों से गालों की छेड़-छाड़ चल रही थी । इस छेड़-छाड़ में होंठ फिर कहां जा भिड़े पता ही न चला । कभी वह अपने होठों के बीच मेरे होठों को निगल जाने की कोशिश करती और कभी मैं प्रतिद्वंद्विता में आगे निकल जाता । जंघाओं के बीच छिपा मेरा कोमल मन फन काढे बाहर आने को बेताब लहरा रहा था । वनमाला की जंघाओं के बीच के कोमल गुहाद्वार से चिपकी जाती मेरी बेताबी उसके चित्त को भी छू रही थी । प्यार की इस प्यारी कस्मकस में गिरते-संभलते दोनों अंततः उसके पर्यन्क पर जा गिरे थे । पल भर को सारा कुछ थम गया था । जैसे हम चिपके खड़े थे, वैसे ही बिस्तर पर गिरे पाए गए । वह मुझे और मैं उसे मुग्ध आंखों से निहार रहे थे । मेरी हथेलियां बडे हौले-हौले उसके बालों पर फिर रही थी । बारी-बारी वे दोनों गालों पर प्यार भरी थपकियां दे रही थीं । वनमाला की बांहें मुझे घेरे जकड रही थी । मेरी जीभ की कांपती नोक उसके होठों पर फिरने लगी थी और फिर होठों से होठों को निगलने की होड़ शुरू हो गई थी ।

अचानक मैंने झटके से खुद को ऊपर उठाया । अब मेरी मुटि्‌ठयों में उसके वे दो गोल घेरे थे जो बैलून की मानिन्द फूल-फूल कर बढ़े जा रहे थे । अंगूठे और तर्जनी के बीच ललियाए और ललचाते अंगूरों जैसे मीठे और होठों में लपक आने को आतुर उसके सुंदर, भूरे स्तनाग्रों से मैं खेल रहा था । वनमाला 'आह-आह, छोड़ो न..' कहती सिसकारियां भर रही थी । मैने उन सिसकारियों में ''हां - हां और न '' सुना ।

हाथों को अपनी जगह कायम रखे मेरा सिर उसकी कमर से नीचे जंघाओं की संधि को ध्वस्त करने ठोकर मार रहा था । अब तक जकडी उसकी जांघें पिघलने लगी थीं ।

''आह, तुम मुझे मारे डाल रहे हो । मैं पागल हुई जा रही हूं, । छोड़ दो ना प्लीज । अब मैं और बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी ।'' वनमाला बुदबुदा रही थी ।

मेरा शरीर फैलकर उसके माथे तक पहुंचा । वनमाला की बायें कान की कोमल लौ मेरे होठों की गिरफ्त में थी । मैंने हल्के से उस पर दांत गड़ाए और इतने धीमे कहा कि उसके कानों के बाहर ध्वनि न जाए- ''छोड़ दूं सचमुच,.. या अंदर आ जाऊँ। ।'' बरसों से भरा सब्र का बांध अब टूटने की कगार पर था ।

''आह'' उसने सिसकरी भरते कहा - ''जो भी करना हो करो न । जल्दी करो प्लीज़, मैं मरी जा रही हूं।''

वनमाला घर में प्रायः गाउन में हुआ करती थी । मुझे यह गवारा न था कि उसके और मेरे बीच वह आए । मेरी अंगुलियों की फुर्ती ने तड़ातड़ गाउन के सारे बटन खोल दिए और फिर भी मेरी बांहों की दुश्मन बनी कमरबंद की गांठें खोलीं । अपनी प्रिया की भुजाओं से नीचे खींचता उसके गाउन को पैरों के पास फेंकते मैंने कहा- ''प्यारे गाउन, आज तुम दूर रहो और मेरे बदन को ही मेरी प्रिया का आवरण बनने दो । ऐसी ही क्रिया और ऐसे ही संवाद से वनमाला मेरे वस्त्रों को भगा रही थी ।''

उसके पांवों पर मेरे हाथ प्यार से फिसल रहे थे । मैंने उसके पांव के अंगूठे को होठों के बीच दबा दांतों से काटा । पिंडलियों के गुदाज मोड़ों को दबाया । उसकी पुष्ट जंघाओं पर हथेली से थापें दी और उन जंघाओं से पूछा कि तैयार हो या नहीं । उनके उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर मैंने दोनों जंघाओं को फैलाते अपनी जंघाओं के लिए जगह बनाई । मेरी आंखों को अपने नाजुक अस्तित्व का टोह लेना देख वनमाला हठ से अपने उन होठों को ढकने की कोशिश में लगी थी, जहां प्रवेश करने मेरी मुट्‌ठी में थमा पौरुष लालायित था । उधर बचने की कोशिश थी और यहां प्रवेश की उत्तेजना से अंगडाइयां लेता मेरा बेताब लाड़ला था । वनमाला की एक बांह पसरकर नीचे आ खिसकी थी । उसकी मुट्‌ठी मेरे पौरुष को सहलाती जकड़े जा रही थी । वनमाला की हथेलियों को चूम मैंने हौले से अलग किया। वनमाला के दिल के उस नाजुक कोने में ऐसा लावा भरा था जिसमें परम शीतलता छुपी थी । मुझे उसी की तलब थी। वनमाला की आतुर हथेली ने फिर फिर मुझे थाम लिया था । वह मेरे पौरुष को थामे राह दिखाती खुद वहां ले जा रही थी जहां उसकी कोमल वनमाला उस पौरुष को निचोड़ जाने बेताब थी । वनमाला के मुड़े हुए घुटने पसर चले थे और मेरा अस्तित्व उन दोनों के बीच छिपी वनमाला में समा चुका था । मैने हाथ फैलाए और वनमाला के गोल गुंबदों पर चिपकते हुए अपने उन हाथों को हौले-हौले वनमाला की बांहों के नीचे से गुजारते अपनी हथेलियों से उसके सिर को थाम लिया । नीचे होंठ अपनी जगह भिड़े थे और अब ऊपर उसके चेहरे पर, उसकी पलकों पर चुम्बनों की बौछार हो रही थी । वनमाला के होठ थरथराए, लपके और मेरे होठों से गुंथ गए । मेरी जीभ ने होठों को ठेलते जगह बनाई और सीधे वनमाला के मुह में धंस गई । वह निपुण थी। स्पर्धा में यह देखने का वक्त न था कि किसकी जीभ ओर किसके अधर किसे परास्त करते लीलते घुसे पड रहे हैं। अंदर की ज्वाला बाहर भड़कती बार-बार केन्द्र को ऐंठाती, गुदगुदाती, सिहराती लौटती फिर और भीषण लपटों के साथ हमे सुलगा जाती थी। चेहरों के खेल का असर छातियों पर दबाव बढाता जा रहा था । और तब जैसे कमरे में भूचाल आया । वनमाला के साथ मेरा बदन हिलने और डोलने लगा । सारी शैया जैसे उस समय दो से एक हुए बदनों के बीच समाई जा रही थी । लावा पिघलता-रिसता जा रहा था और उसकी चिकनाई वनमाला और मुझे गुदगुदाए जा रही थी । प्यारी वनमाला, आज मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा । तुमने मुझको बहुत तरसाया है । हर बार मैं वनमाला के अंदर जाता और बाहर निकलता । जंघाओं के बीच की थप्प की आवाज के साथ मैं दोहराता -

''लो ..... और लो ..... लेती जाओ आज सारा प्यार समेट लो ''

भूतल से वनमाला की पृथ्वी सिसकारियां लेती कराहती -

''दो ..... पूरा दो और मेरी समूची पृथ्वी हिला समेट लो। लो यह मैने दिया..... कोई कसर मत छोड़ो''

वनमाला का आनन्दलोक ''आह,--आह..'' की गुदगुदी लहर बन मेरे अधरों पर उफन रहा था । वनमाला के गले से प्रतिध्वनित होती वह लौट रही थी -

''आओ ..... और आओ ..... मार डालो मुझे आज''

वह बुदबुदा रही थी- ''आप को मैंने बहुत तरसाया है । सारी शिकायत मिटा डालो आज। आज वनमाला आपकी है । यह 'आज' शायद कल लौटकर, कभी लौटकर फिर न आए।''

इधर फुहार की सनसनी मेरे अंदर फैलती जा रही थी और उसकी गुफाओं का कंपन उसे गुदगुदा रहा था । फिर एक बिन्दु ऐसा आया जहां चार-पांच-छः-सात-आठ जितनी ना-मालूम तरंगों के साथ बारिश खत्म हुई और कीचड़ में हम डूब गए । उसका पठार बारिश की चिपचिपाहट से भर गया था । वनमाला की छातियों में सर गडाए मैं स्थिर हो गया था और वह थी कि मेरे बालों को सहलाती बार-बार मेरे गालों को चूमे जा रही थी ।

''बस ऐसे ही सोए रहो । अभी मुझे छोड कर न जाना । यहीं आराम करो । ''

वनमाला रानी, प्यार में बुदबुदा रही थी । मैं उसका गुलाम था । इसी हालत के साथ उस सन्नाटे में हम गुम रहे जो हमारे दरम्यान बादलों की धमक, बिजली की सनसनी और मूसलधार बारिश के साथ घटी थी ।

वनमाला और मैं एक–दूसरे की तरफ मुंह किये आराम की मुद्रा में यूं लेटे थे जैसे सारे संसार की बाधाएं पारकर हम निश्चिन्त किनारे आ लगे हों। उसकी भुजाएं मेरे कंधे पर पसरी थीं और मेरा हाथ वनमाला की गर्दन पर होता उसके सिर के बालों को संवार रहा था।

’’ जी नहीं मानता। चाहता हूं तुम्हें अपने साथ भगाकर कहीं दूर ले जाऊं’’– मैने कहा।

वनमाला ने मेरी आंखों में झांका। एक चमक उभरी और एक मुस्कान तैर गई।

’’ क्यों ? मिल तो गया जो तुम चाहते थे। मुझे भगाकर अब क्या करोगे ’’– वह बोली।

’’ तुम मेरी प्यास हो। यूं चोरी–चोरी कब तक चलेगा ? तुमसे मिल पाना क्या सरल होगा ? सारा कुछ अनिश्चित है। क्या तुम्हें तसल्ली होगी ?’’

अभी–अभी तिरती चमक उदास हो चली थी। चेहरा उन बादलों से घिर चला था जो हमेशा उस पर छाए रहने के आदी थे।

’’ मैने वैसा कब कहा ? लेकिन आदमी की फितरत से मैं वाकिफ हूं। आखिर औरत हूं न! सपनों और हकीकत के बीच एक कठोर फासला होता है।’’

’’ अचानक यह बात कहां से आ गई ?’’–वनमाला की चिबुक थाम उसकी आंखों में झांकते मैने कहा।

दोहरी होती अपना मुंह उसने मेरी छाती में गड़ा दिया था।

’’ सब कहने की बातें हैं। भगाकर ले जाओगे कहां ? जिम्मेदारियों और मुसीबतों का अहसास होते ही तुम्हारी प्यास बोझ बन जाएगी और तुम भाग खड़े होओगे। हर मर्द यही करता है। जो है, वह है। उसे ही स्वीकार लेना चाहिये। क्या इतना काफी नहीं है ?– वह बोली।

अच्छे क्षणों के बीच आ चले वैसे कड़वे विचारों को मैने चित्त से झटक देना चाहा लेकिन उसमे कारगर न हुआ।

वनमाला का चेहरा मेरी छाती में धंसा था और उसे अपनी ओर खींचता मैंउससे चिपका पड़ रहा था। वह खुद भी आतुरता से लहराती लिपटती जा रही थी, लेकिन उसकी वाणी में बसा दार्शनिक गंभीरता में बुदबुदाए जा रहा था –

’’ जो इस वक्त हममें है, वह हकीकत है प्रियहरि। लेकिन मैं बताऊँ ? उससे भी बड़ी हकीकत यह है कि कोई किसी से प्यार नहीं करता। कर ही नहीं सकता। वह जिसे हम प्यार कहते हैं महज एक जुनून है। हर आदमी में एक वहशीजुनून होता है। अपने उस जुनून को ही वह प्यार का नाम देता है। इच्छा मेरी थी, इच्छा तुम्हारी थी। मैं और तुम तो एक–दूसरे के लिये अपनी ही चाहत के आलंबन थे। इच्छाओं की बेलें टकरातीं लिपट चलीं तो उसे हमने प्यार का नाम दे दिया। कल मेरी या तुम्हारी इच्छा का रुख बदल गया तो अपना प्यार इस बिस्तर से समेट हम कहीं और बिछा देंगे। समीकरण हटा कि प्यार घटा। तुम रूठना नहीं। लेकिन न जाने क्यो यह विचार मेरे चित्त में बार–बार आता मुझे बिखरा जाता है। मेरे प्यारे बुद्धूराम मैं जानती हूं कि मेरी बेरुखी, मेरे दूर–दूर भागते बच रहने से ही तो तुम मुझसे नाराज़ थे। मेरी भी इच्छा तुम्हारी इच्छा में समा जाने की उतनी ही बलवती थी, जितनी तुम्हारी। आखिर अंदर–अंदर छीलता अंतर का द्वंद्व जब असह्य हो गया तो मैने ठान लिया कि जो होना हो, वह होता रहे। मुझे समर्पण करना होगा और समर्पण पाना होगा। मुझे मालूम था कि तुम आओगे। आज वैसा हुआ। भविष्यको मैं नहीं देख सकती पर आज तुमसे मिलकर मैने राहत तो पा ली है।’’

मुझे अब तक नहीं मालूम कि रसरंग की वेला में वैसी बात की क्या प्रासंगिकता हो सकती थी ? क्या वनमाला मुझे विरक्त करना चाहती थी ? क्या वह खुद विरक्त होना चाहती थी ? क्या वैसा कहती वह प्यार में मुझे और अधिक डुबाना चाहती थी ? या क्या विश्वास और समर्पण में भीगती वह खुद मुझमें गहराई में डूब रही थी ,? जो भी रहा हो, वनमाला पर मुझे और ज्यादा प्यार उमड़ आया। उसका एक–एक शब्द मुझमें गहरे उतरता चला गया था। भविष्यमें क्या छिपा था मुझे भी नहीं मालूम था लेकिन उस वक्त मैने महसूस किया कि वनमाला उससे कहीं अधिक बुद्धिमती है, जितना मैं सोचता था। अपनी श्रेष्ठता का मेरा अहंकार खो गया था। मुझे निश्चयहो गया कि वनमाला का साथ ही सर्वथा मेरे अनुकूल है। उससे बेहतर सहचरी मिलना संभव न था। मैं उसे कभी न छोड़ूंगा और हमेशा उससे प्यार करता रहूंगा।

 


शून्य में खोया समय अचानक हमारे बीच घुस पड़ा । वनमाला की नजरें घड़ी पर पड़ गई थी । ''बस, अब आज और नहीं, परे हटो ।'' उसने मुझे झटके से अलग कर दिया । मैं तृप्त था, मैं अतृप्त था । अचानक पैदा हुई रूकावट से सारा तनाव ठंडा तो पड़ गया, लेकिन वह एक अफसोसजनक उदासी भी भर गया था ।

विदाई के शब्द थे- ''आपको मैंने बहुत तरसाया था न । औरत की मजबूरी आप नहीं समझते इसीलिए रूठ जाते थे । आप क्या समझते हैं ? मेरे अंदर भी वही चाहत, वही आग, वही प्यास, तृप्ति की वही कामना थी । आपकी तड़प मुझे भी तड़पा कर रख देती थी ।''

वनमाला की आंखों से उमड़ते आंसुओं ने उसके स्वर को अवरुद्ध कर दिया था । रुंधे गले से उसने उस बेला के अंतिम शब्द कहे- ''आज मैंने अपना सब कुछ आपको सौंप दिया है । आपको भारमुक्त करते आज मैंने भी मजबूरियों का सारा भार खत्म कर डाली है । आज हम दोनों तृप्त हुए । इस अवस्था में आकर अब तक बचती, वनमाला आपसे बंध चली है । स्त्री याद रखती है, पुरुष तृप्त होकर भूल जाता है । देखूं आप मुझे याद रखते हैं या नहीं ।''

यह कैसी मजबूरी थी कि वनमाला से मिलन की चिर-इच्छित बेला ने मिलने की प्यास बुझाकर प्यास की आग और भड़का दी थी । मैं सोच रहा था-'' क्या वनमाला के साथ मेरा मिलन यूं फिर कभी होगा ?''

दरवाजे से बाहर निकलती सड़क तक वह मुझे छोड़ने आई । श ाम का धुंधलका हो चला था । वृक्ष के नीचे अंधेरा गहराया हुआ था । मुझे बिदा करती वनमाला की चाहत से भरी आंखें मेरी आंखों में झांक रही थी । वे भर आई थीं । आंसू के दो बूंदें गालों पर ढुलक पड़ी थीं ।

मैं तृप्त था मैं अतृप्त था. मेरी आँखें उसके चहरे में डूबी मुग्ध हैं . बाहर आँगन में उसके रंग-बिरंगे फूलों की छटा के साथ उसकी वाटिका की हरीतिमा वासंती धूप-छाहीं छटा में मनमोहक लग रही है. उस तरह सलाजता में ठिठकी वनमाला में भी मुझे वही छटा नज़र आ रही है. आँखों,पलकों,भौहों,होठों, गालों,लटों,नासिका – सब पर टिकती मेरी आँखें वनमाला को लील रही हैं. मुझे याद आ रहा है – “सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमा:”.

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कालोनी की आठवीं सड़क :

ठंड की गुनगुनी धूप का मौसम और दोपहर बाद का समय

उस दिन प्रियहरि लौट तो आया, लेकिन मन उसका वनमाला की कैद में ही रहा आया था । वह दिन-रात बेचैन रहता कि कैसे फिर वनमाला से उसका वैसा ही मिलन हो ? कैसे उससे मिलने की तरकीब वह करे ?, लेकिन सामाजिक मर्यादाएं, संकोच, उसके घर की पीड़ाएं, वनमाला के घर वाले का खयाल, उसके दूर के उस नए कालेज में जाने लौटने और मिलने का माकूल समय-ये सब के सब प्रियहरि का मन बांध देते थे । बहुत सोचकर उसने एक तरकीब निकाल ही ली । प्रियहरि को मालूम हुआ कि वनमाला की कालोनी की आठवीं सड़क में उसके एक परिचित गजानन रहते थे । उसने सोचा कि सहपरिवार गजानन के यहां जाने के बहाने वनमाला के यहां भी पहुंचा जा सकता है। इसे आप बेशर्म, दीवानगी की हद कह सकते हैं कि प्रियहरि ने वैसा किया भी। एक-सवा महीने के अंदर ही छुट्‌टी के किसी रोज अपने इरादे को पारिवारिक जामा पहनाते उसने सपत्नीक वनमाला के दरवाजे पर दस्तक दी ।

वह दिसम्बर का महीना था । ठंड की गुनगुनी धूप का मौसम और दोपहर बाद का समय । वनमाला प्रकट हुई । खोले गए किवाड़ के पल्लों पर टिकी उसकी कलाइयां और उनींदी आंखें लिए थके चेहरे की यादें प्रियहरि की आंखों में अब भी अटकी हैं । उसकी ही तरह सादगी में लापरवाही से पुराना स्लीपिंग गाउन उसके उन जिस्मों को ढके था जिनके पार झांकती प्रियहरि की पारदर्शी आंखें अपने तन को उससे चिपकाए रखना चाहती थी । उन ढलती गोलाईयों को उसने देखा जिन्हें मांज-मांज कर वह सख्ती और ताजगी से भर देना चाहता था । उसकी यही साधारणता मोहक थी। वह उस पुल का काम करती थी, जिससे दोनों के मन एक-दूसरे के साथ जुड़े थे । उस रोज घर बाधा रहित था । वनमाला और प्रियहरि की आंखें और दिल उनके बीच यादों भरे अतीत को देखते मौन संवाद कर रहे थे । लेकिन तब बीच में प्रियहरि की पत्नी थी, जिसकी मौजूदगी में व्यक्तिगत संभव नहीं था ।

कुछ ही देर में उनके बीच एक और मेहमान आ टपका था। वह उसकी पारिवारिक मित्र थी । पढ़ी-लिखी, जर्मन भाषा की अनुवादक एक ब्राम्हणी सम-वयस्का जो वनमाला के पति के बंगाली मित्र के साथ प्यार में ब्याह रचा वनमाला की मनःस्थिति लिए दिन काटती दिखाई पड़ रही थी । शादीशुदा जिंदगी की ढर्रे भरी नीरसता को उसकी बातों के अंदाज से प्रियहरि ने पढ़ लिया। नवागंतुका रमणी ने जिज्ञासा भरी दिलचस्पी से उन सब को देखा था और फिर बातों के सिलसिले चल पड़े थे । वनमाला को देखने की इच्छा उस दिन पूरी तो जरूर हुई लेकिन इस पूरी इच्छा ने दिलों की उस आस को अधूरा छोड़ दिया, उस प्यास को और अधिक बढ़ा दिया जिसकी तृप्ति के लिए प्रियहरि का मन छटपटा रहा था ।

भले ही वनमाला प्रियहरि की आंखों से ओझल हो चली थी। प्रियहरि के मन पर कब्जा उसी का रहा आया। घर-बाहर, सोते-जागते उसे वनमाला का प्यार, उसकी विवशता, उसका पशोपेश सालते रहे। हर पल बेकरारी में बीतता। कभी यह इच्छा होती कि भाग कर वह वनमाला के नए कालेज जा पहुंचे और कभी मन करता कि वनमाला के घर चला जाए। जी करता कि वनमाला से जा लिपटे और कहे कि प्रिये और परीक्षा ने लो। इस जन्म में अगर मिलना इस कदर मुश्किल है तो मेरे प्राण ले लो। तुम्हारी गोद में सर रखकर, तुम्हारे सांवले मुखड़े को निहारते लाचार उदासी में डूबी आंखों में आंखे डाले अपने प्यार में अंतिम स्वास लेना भी मेरे लिए परममुक्ति का क्षण होगा।

वे दिन ही ऐसे थे। चाहे वह बनारस विश्वविद्यालय में महीने भर रिसर्च के काम से रहा आया हो चाहे अपने संस्थान में सर खपाता बैठा होए या कहीं और व्यस्तताओं में रहा हो हर वक्त प्रियहरि को वनमाला की याद सताती रही थी। उन दिनों न जाने क्या-क्या और कितना वनमाला की स्मृतियों में उसने लिख डाला था।

साल भर बाद जब वनमाला फिर लौटकर आई तब प्रियहरि ने जुदाई के उन दिनों के एक-एक पल की गाथा उससे कह डाली थी। प्रियहरि के प्रेम में अभिभूत वनमाला ने वह सब सुना था। उसे अखबार के बहाने भेजे प्रियहरि के संदेश याद थे।

'हाय रे' की अदा में वनमाला प्रियहरि की इस दीवानगी से सराबोर कहती - ''आप भी तो बस ..........।'' बिछड़ने का दर्द और पुर्नमिलन की दीवानगी ने एक बार फिर वनमाला और प्रियहरि के ताल्लुकातों में बहार लौटा दी थी।

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औरत भला क्यों चाहेगी

कि उसका चहेता उसके किसी और रकीब के दर का ठिकाना उससे पूछे ?

वे दिन नवरात्रि और दशहरे की छुटि्‌टयों के थे । दिनचर्या से हटे इन दिनों में उस रोमांस का अभाव खटक रहा था, जो प्रियहरि को वनमाला के साहचर्य से मिलता था । वनमाला की याद बेतरह सताए जाती, लेकिन प्रियहरि पर अ-मिलन के ये पाँच-छः रोज ही भारी पड़ रहे थे । तीन-चार दिन बीतते न बीतते घर के उबाऊ अकेलेपन को भगाने प्रियहरि ने तरकीब निकाली । सामाजिक मेल-मुलाकात के बहाने अपनी बीबी को स्कूटर में बिठा वह पास ही के उस नगर को जाने वाली सड़क पर निकल गया जहां दूर-दूर बसे अंतरालों में उन ललनाओं का बसेरा था, जो उसका अतीत थीं । हालांकि सब से मिलने की आड़ में उसकी खास कसक उस वनमाला से मिलने की थी, जिसके यहां जाना संदेह को जन्म देता था । पहला डेरा सुंदरी जीनत के यहां पड़ा था, जो जहां भी होती अपनी सुंदरता और सलीके को अपनी जगह पर भी रच देती थी । उसकी सुंदर अभिरुचियों, कमनीयता और कोमलता की छाप उस घर में भी थी, जिसे विवाह के बाद उसने बसाया था। उस अंतिम छोर से लौटते एक पुराने सज्जन अधिकारी से मिलता वह विराग के यहां पहुंचा था । नीलांजना के घर का उसे ठीक-ठीक अनुमान न था । सीधी-सादी, विनयशीला नीलांजना को हालांकि प्रियहरि की बीबी ने एक-दो बार देखा था, वह उसे पसंद करती थी । जीनत और वनमाला से संबंधों और प्रियहरि के लगाव से वह परिचित थी । संबंधों के दौर में जब भी अपनी बीबी के संस्कारहीन विचित्र स्वभाव से बेरुख प्रियहरि अन्य मनस्क और उदास होता, जब भी प्रियाओं से बातचीत या लगाव के लक्षण या प्रमाण उसकी बीबी टोहती, अचानक उसमें एक गुनगुनाती गायिका प्रकट हो जाती । 'दीदी तेरा देवर दीवाना, हाय राम चिड़ियों को डाले दाना' या फिर 'भूला नहीं देना जी, भूला नहीं देना, जमाना खराब है, दगा नहीं देना' की गले में भी फंसी बेसुरी टेर से प्रियहरि वैसे मौकों पर बीबी की ईर्ष्या, उसके संदेह और तानों को खूब पढ़ सकता था ।

विराग के यहां से लौटते शाम ढल रही थी । चित्त में नीलांजना भी थी और वनमाला भी । वनमाला की राह पर संकोच में पड़ता भी वह खिंच चला था । उसका घर भी प्रियहरि के अपने घर की तरह अस्त-व्यस्त और झंझटों की छाया से घिरा हुआ करता था । प्रियहरि की बीबी के मन का गुबार जैसे प्रियहरि के मन तक धंसता समूचे वातारवण को खिझा जाता था, वैसे ही वनमाला के घर भी अजीब तरह के पशोपेश और संकोच की छाया उसकी अस्त-व्यस्तता में पसरी होती थी । बंगालियों के पूजा-पर्व का वह एक दिन भी वैसा ही था । नीम-अंधेरे में पति-पत्नी के अनमेल से उपजा उबाऊ उल्लासहीनता का वातावरण वहां प्रियहरि और उसकी पत्नी का स्वागत कर रहा था । आधी खुशी और आधे गम की मुस्कानें वहां थीं । जैसे उनके पहुंचने ने वनमाला और उसके पति को रोक लिया हो, वे संकोच में साथ बैठे । रसगुल्ले और नमकीन 'ना-ना' करते भी वे बाजार से ले आए गए थे । बीबी की उपस्थिति में सब कुछ पढ़ती भी आंखें उस सब को जुबान नहीं दे पा रही थी, जो प्रियहरि के दिल में था । अपने मिस्टर की छाया में वनमाला की हालत भी वैसी ही थी । औपचारिक बातें ही हुईं, सिवाय उन संवादों के जो प्रियहरि की बीबी और वनमाला के पतिदेव की मौजूदगी के बावजूद और उसकी आड़ में वनमाला और प्रियहरि के बीच एक-दूसरे की तारीफ में चले । वनमाला ऐसे उन पलों में खुश हुई जिनमें न जाने प्रियहरि की बीबी और रकीब के मनों में क्या चल रहा होगा । उन पलों में जैसे वे दोनों बातों में शरीक होकर भी अनुपस्थित थे ।

चलते-चलते प्रियहरि की बीबी बोली- ''नीलांजना के घर भी हो आते ना । यहीं-कहीं तो होगा ।'' प्रियहरि ने वनमाला की ओर देखा । उससे कहा- ''चलिए न आप भी साथ । हम लोगों ने तो घर देखा नहीं है ।''

वनमाला के कानों के लिए नीलांजना का नाम ज़हर था ।

वनमाला का मूड गड़बड़ा गया था । उसने तुरंत ने टाला- ''उसका घर तो बहुत दूर है । हम लोगों को भी ढूंढ़ना पड़ेगा । मैं तो वहां कभी गई नहीं । आप लोग चाहें तो हो आइए ।''

औरत भला क्यों चाहेगी कि उसका चहेता उसके किसी और रकीब के दर का ठिकाना उससे पूछे ? प्रियहरि बुद्धू था । सहज मन से वह वनमाला से तब पूछ तो गया था, लेकिन बाद में इस भूल का अहसास उसे हुआ कि वनमाला खुद उसे कितना और किस तरह चाहती थी यह वनमाला ही जाने, लेकिन यह तय था कि अपने चाहने वाले को किसी गैर की झोली में डालने वह तैयार न थी। प्रियहरि ने गौर किया तो पाया कि उसके मुआमले में सच भी वही था । उसकी प्रेमिका उसके घर आए और उसके रकीब का ठिकाना पूछती मिलने चली जाए - क्या प्रियहरि को वह भाता ? उस रोज नीलांजना रूट से बाहर हो गई थी, लेकिन इस चर्चा का जिक्र बाद में नीलांजना से प्रियहरि कर बैठा था । उधर वनमाला थी कि उस प्रसंग के बाद नीलांजना और प्रियहरि को साथ पा अपने आपको नाराज और प्रियहरि से कटी दिखने उतारू हो गई थी ।

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घर बनाम मकान

आदमी सारी दुनिया को जीत सकता है अपने घर को नहीं

Marriage is a romance in which the Hero dies in the first chapter. - Laurence J Peter

वनमाला घर में त्रस्त थी और प्रियहरि घर से बेजार। वनमाला को प्रियहरि हमेशा उसके अंदर छिपी प्रतीभा और गुणों की तारीफ करता प्रोत्साहित करता था। लिखने, रचने, पी.एच.डी. करने, संगीत सीखने कहता था। एक से एक योजनाएं प्रियहरि बनाता था लेकिन आंकाक्षा में उन सबको स्वप्नों की तरह समेटे वह कहा करती थी कि आप तो यह सब कहते है, लेकिन मेरे मिस्टर नहीं चाहते कि मैं कुछ करूं वे तो थोड़ी सी देर हो जाने पर जवाब-तलब करते है कि देर क्यों हुई ? वह प्रियहरि से कहती कि आप मेरे लिए व्यर्थ सोचते हैं। मैं पी.-एच.डी. नहीं कर सकती। मेरे मिस्टर को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। मुझे लेकर हमेशा वे श क करते है। उनका बस चले तो कह दें कि घर से बाहर ही न निकलो। वह कह रही थी - ''मुझे कितनी तकलीफें है यह मैं जानती हूं। आप क्या समझते है ? आप जब मेरी तारीफ करते है तो क्या उन्हें अच्छा लगता होगा ? आपका खयाल गलत है आप के मुंह से मेरी तारीफ उन्हें बुरी लगती है। बंद कर दीजिए सोचना मेरे बारे में मैं कुछ नहीं कर सकती।

इधर प्रियहरि का हाल भी कुछ वैसा ही था। अपनी अर्धांगिनी से उसके लिए कोई प्रेरणा नहीं थी। दोनों के व्यक्तित्व, रुचियां और संस्कार जमीन और आसमान की तरह की दूरी के थे। प्रियहरि अक्सर सोचता उलझकर रह जाता कि वह महज संयोग था या नियति का कर्ज जिसे चुकाने वह इस स्त्री से जुड़ा था। इस तरह वनमाला और प्रियहरि का मिलन त्रास और बेजारी के दो दिलों का मिलन था। प्रियहरि वनमाला में अपनी राहत ढूढंता था और वनमाला प्रियहरि में अपनी आकांक्षों के स्वप्न देखती तरसती थी। प्रियहरि अक्सर सोचा करता कि स्वप्न उसने भी घर बनाने के ही कभी देखे थे, लेकिन वे महज चिन्ताओं की उदास चहारदीवारी में कैद होकर रह गए थे।

किस्मत का लेखा भी अजीब होता है। चाहते आप कुछ और हैं और होता कुछ और है। न जाने कितनी जगह भटक कर प्रियहरि ने कितनी लड़कियां देखी थीं लेकिन जाकर टकराया वह सोमा से, जो उसकी पत्नी बनी। जल्द ही प्रियहरि को यह आभास हो गया था कि सुंदर शरीर में वह एक प्राणहीन मन थी। निबाहने के तब भी बहुत प्रयास उसने किये लेकिन वह असफल रहा। घर और परिवार के उसके सारे सपने चकनाचूर हो चले थे। जि़न्दगी उसके लिए यह अहसास बनकर रही आई कि वह अजनबियों के बीच एक ऐसे मकान का कैदी है, जिसने उसे केवल अपना कर्ज उतारने को बंधक बना कर रखा गया है। आदमी सारी दुनिया को जीत सकता है लेकिन अपने घर को कभी नहीं।

विवाह के बाद थेाड़े दिनों में ही यह उजागर हो गया था कि सोमा के पास महज कहने को स्नातकोत्तर की एक डिग्री तो है, मगर तीसरे दर्जे की वह डिग्री भी बराए नाम ही है। अपने विषय का न तो रत्ती भर ज्ञान उसे था ,और न उसमें उसकी कोई दिलचस्पी थी। आड़े–टेढ़े अक्षरों के साथ अपने दस्तखत भी वह प्रयत्नपूर्वक ही बना पाती थी। प्रियहरि का खयाल था कि सामान्य पृष्ठभूमि की घरेलू लड़की होने के लिहाज से वह घर को सजाने–संवारने में दिलचस्पी दिखाएगी, लेकिन वह भ्रम भी टूट चला था। निहायत बोझ की तरह घर की दिनचर्या के सामान्य काम सोमा निबटाती थी, और वैसा करते भी चेहरे पर वहखीझसे भरी होती।

प्रियहरि भी बेहद संघर्षों के बीच पला था। घर में झाड़ू लगाने, चूल्हा जलाने, रोज लालटेन की कांच को राख से मांजकर चमकाने, कपड़े धोने और खाना बनाने, मिट्टी खेादने और कुल्हाड़ी चलाते लकड़ी चीरने तक के संस्कार उसे बचपन से ही मिले थे। उसके लिये ये संस्कार अध्ययन औरशिक्षाके संस्कारों के अंग जैसे ही थे। उसे संघर्षों से भरा वह बचपन याद आता जब आठ–नौ साल की उमर से ही घर से बाहर रहते आश्रम की व्यवस्था में अपने हम-उम्र बच्चों के साथ पढ़ाई करते उसे नियत सारणी के दिनों मं। अपनी टीम के साथ दस–बारह साथियों की रसोई संभालनी होती। उसे आश्रम की हरे–भरे वृक्षों, पादपों और लताओं से सजी वह विषाल वाटिका याद आती जिसे संवारने में अपने सहपाठियों के साथ वह घंटों मिहनत किया करता था। उसे इन सब में भी उतना ही आनंद मिलता जितना उस नन्ही उमर में अखबारों, पत्र–पत्रिकाओं और साहित्य के अनुपम ग्रन्थों को पढ़ने और कपड़े की गेंद को हाकी या फुटबाल की गेंद बनाकर अपने साथियों के साथ मैच खेलने में मिलता था। तब अपना सामान लादे मन की मौज में सात–आठ मील का रास्ता तय करके आसपास के मौसमी मेलों या वनांचलों में पिकनिक मनाना उसके लिये मानों आमोद का भव्य आयोजन हुआ करता था। सामाजिक आयोजनों, सांस्कृतिक परंपराओं और देश–दुनिया की जटिलताओं को गहराई तक जाकर समझने में प्रियहरि की रुचि थी। सगे–संबंधियों, बुजुर्गों और विद्वानों का आदर करना उसके पारिवारिक संस्कारों में था। सामाजिक–पारिवारिक आयोजनों में उसके घर के सदस्य सश्रम सहभागी होते और इसके लिये उन्हेंप्रशंसाऔर सम्मान के साथ याद किया जाता था।

अपने सांस्कारिक अनुभवों पर प्रियहरि को गर्व था। वह उसका स्वाभिमान था। सुविधा–संपन्नता की संस्कृति से उसे बिचक नहीं थी, लेकिन श्रम और संघर्ष की संस्कृति के प्रति कथित भद्र–वर्ग की उपेक्षा और अलगाव की मनोवृत्ति उसे नापसंद थी। शायद यही कारण था कि वैसी संस्कृति के अभ्यस्त और पोषक सहचर और सहचरियों के निकट आने पर भी उनसे एक मानसिक दूरी उसमें प्राय: बनी रही। अपने इन्हीं संस्कारों में वह अपने घर को भी देखने के सपने देखता था।

सोचने और होने में बहुत फर्क होता है। बहुत जल्द उसने जान लिया कि सोमा घर के महज दैनन्दिन काम बसकिसी तरह निबटा जाने और शयन-सुख में मशीनकी तरह बिछाई जा सकने वाली मशीन जितनी ही अच्छी हो सकती थी। लगाव या अभिरूचि जैसी कोई चीज़ उसके स्वभाव में ही नहीं थी। यह मालूम हुआ कि तीसरे दर्जे की उसकी डिग्री थी और कागज–कलम से उसका नाता बस किसी तरह उस डिग्री को हासिल करने तक ही था। अपनी अनुरूपता में ढालने प्रियहरि ने उसे उत्साहित करना चाहा था कि वह आगे और पढ़ ले और विदुषी बने, लेकिन जबाब था कि वैसा करना अब उसके लिये संभव नहीं। उसे उसमें न रूचि है और न उसका कोई काम। जैसा साधारण लड़कियां अमूमन हुआ करती है शादी ही मकसद था। मकसद पूरा हो चला था और अब उसे करना ही क्या था? तीन के परिवार में पति और पत्नी के बीच प्रियहरि की मां बूढ़ी सदस्या थी। वह भोर हुए उठ जाती थी और दिन भर कुछ न कुछ करती अपने को व्यस्त और घर को व्यवस्थित रखा करती थी।

सोमा की जुबान उसके घुन्नेपन के कारण हिलने में आलस करती थी। दिन भर में प्रियहरि से ताल्लुकात में जुबान से रोबोट की तरह यंत्रचालित संक्षिप्त शब्दों का एक कंजूस समूह निकलता और संबंध की बस वही निशानीहुआ करती थी। प्रियहरि की अम्मा उस रोबो के लिए आरंभ से अवांछित तीसरा जीव रही आई। प्रियहरि के लिये यदि उसे शब्द होते –’’ खाना निकाल दूं क्या ? ’’, तो अम्मा के मुआमले में यह होता कि प्रियहरि के खा–चुकने के बाद एक संक्षिप्त सी थाली नि:शब्द लाकर सामने रख दी जाती थी। न तो दोबारा उससे जरूरत पूछने सोमा का सौजन्य होता और न तो मां की हिम्मत होती कि वह सोमा से कह सके। यह देखते प्रियहरि को बुरा लगता। वह चाहता था कि सोमा आत्मीयता से पेशआये, लेकिन जवाब में घूरती हुई उसकी उपेक्षा-भरी दृष्टि से वह टकराता। सोमा से कुछ कहना खीझ भरी बड़बड़ाहट को दावत देना होता था। गलती से कभी माँ को और ज़रूरत के लिए पूछ लेने की संकोच-भरी सलाह पत्नी को देने का दुस्साहस भी प्रियहरि को महँगा पड़ता था। चीखती हुई कड़वी जुबान फ़ौरन उलटकर हमला करती –

“ तुम चुपचाप अपनी थाली देखो। तुम्हारे कहे बिना वे भूखी मारी जा रही हैं क्या ?”

व्यवस्था पर सोमा का ऐसा आधिपत्य हो गया था कि सास की हैसियत बेचारी की हो चली थी। सोमा उससे यूं पेशआती जैसे दयावश ही प्रियहरि के यहां वह आश्रित रही आई हो। प्रियहरि को पहले वाकये से ही इसका आभास हो चला था कि सोमा पर लगाम लगाना कलह को दावत देना था।

वह दिन आज भी उसकी स्मृतियों में जीवित है। दोपहर बाद के करीब चार बजे का समय रहा होगा। मां ने प्रियहरि से इच्छा जताई कि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा था। मां चाहती तो खुद भी चाय बना सकती थी लेकिन बहू का व्यवहार उसे रोकता था। अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी भी चीज में दूसरे का हाथ लगाना पत्नी को पसंद न था। प्रियहरि ने सोमा को जगाया कि चार बज चले है। अब वह उठ जाए और चाय बना ले। बजाय वैसा करने के सोमा ने नाराजगी से बड़बड़ाना शुरूकर दिया था –

’’ इन माँ-बेटे के कारण सोना भी मुश्किल हो गया है। अभी तो कुछ देर पहले खाना खाया है और इतनी जल्दी चाय की पड़ गई। ’’

प्रियहरि ने डांटा तो वह लड़ने पर उतारू हो गई।

’’ क्या समझ रख है तुम मां–बेटे ने कि मुझे दबा लोगे ? भूल में मत रहना। बताए देती हूं कि मुझे कम न समझना। मुझसे उलझोगे तो ठीक न होगा। ’’

प्रियहरि के भाई, बहन, या रिश्तेदारकभी भूले–भटके आ जाते या बाहर कहीं मिल जाते तो वह उन्हें चाहते हुए भी अपने यहां बुलाने से कतराता। सोमा में इतना भी सौजन्य न था कि वह आत्मीयता से उनसे पेशआती । अपनापे का आभास तो दूर रहा यदि प्रियहरि उनके लिये चाय–वाय का इंतजाम करने की बात भी करता तो अंदर जाकर उसपर मुह बनाती वह तुरन्त अपनी खीझ उतारती –

“ तुम क्यों फालतू टोकते रहते हो ? तुम अपना काम किया करो। मेरा काम मैं जानती हूं। अभी–अभी तो आए हैं। बैठने दो अभी। तुमको क्या जरूरत है बीच में आने की । तुम चुपचाप मुंह बंद किये बैठा करो। मैं जानती हूँ कि मुझको क्या करना है ? हमको भी क्या उस तरह कोई पूछता है जैसा तुम उनके लिए मरे जाते हो ? ’’

परिवार में एक–दूसरे के यहां आने–जाने, मिलने–बैठने, खाने–खिलाने की बात निकलती तो सुनने से पहले ही सोमा का मुंह बनाना शुरूहो जाता –

’’ रहने दो। दूसरों के पीछे हमें पैसे खर्च करने की जरूरत क्या है ? मेरे भरोसे मत रहना। करेगा कौन वह सब ?”

घर यानी ईंट–गारे की ऐसी प्रयोगशाला जहां परिणाम की महज बेउम्मीदी थी। बीबी महज ऐसा रोबोट, जिसमें अपनेपन और भवनात्मक लगाव की कल्पना भी व्यर्थ थी। मकान उससे घर तो बनता न था लेकिन घर का भ्रम देते उसे ढके रखने का यह रोबोट एक दुनियाबी यंत्र था। ज्यादा से ज्यादा यह था कि अपना मियादी बुखार उतारने बेमन फैली टांगों के बीच की कसरत के लिये जब–तब उसे काम में लाया जा सकता था। प्रियहरि के पास इसके अलावा कोई चारा न था कि वह इस जकड़नसे भागता फिरे। उसके लिये घर का सुख अब उन संबंधों और लम्हों में ही था जहां उसके समान ही भागती सपनीली आंखें प्रियहरि में अपनापा देखती टकरा जाया करती थीं।

*************

सारी चिटि्‌ठयां टुकड़े-टुकड़े जो टूटे हुए दिल की थीं

''लाइए, मेरे लिए जो भी लाए है, दे दीजिए। मैं बाद में देख लूंगी।

अंदर मुझे देख रहे होगें। सोचेंगे कि इतनी देर वह बाहर क्या कर रही है'' :

पश्चिम बंगाल के एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में प्रियहरि को कलकत्ता जाना था। वनमाला उसके लिए आत्मीय, घर जैसी, घरनी जैसी थी। दोनों बात करते तो यूं सहज घुलकर जैसे बरसों का नाता हो। ऐसी अधिकार-भावना परस्पर थी कि जैसे पति और पत्नी के बीच हो। प्रियहरि ने वनमाला से पूछा था - ''तुम्हारे लिए क्या लाना है ?''

अगर मिल जाए तो खूबसूरत सा एक पर्स ले आने की बात वनमाला ने कही थी। सम्मेलन की बैठकों, जलसों के बाद बाजार घूम-घामकर चौरंगी से आगे न्यू मार्केट को छानते प्रियहरि ने वैसा ही एक पर्स अपनी प्रिया वनमाला के लिए खरीद लिया। कलकत्ते में भी दिन-रात हर पल दिल को चैन देने वाली वनमाला की मुखड़े की छवि, उसकी यादें प्रियहरि के साथ रहतीं। उन दिनों वहां विश्व पुस्तक मेला भी लगा था, लेकिन वहां जाने का मौका देखते खबर आई कि पंडालों में आग लगने की दुर्घटना घट गई थी।

प्रियहरि लौटा तो बेसब्री से वनमाला से मुलाकात की प्रतीक्षा में रहा। आमना-सामना होता भी तो ऐसी चहल-पहल रहती कि आलमारी में रखा बड़ा पर्स सब के रहते निकालना ही संभव न था। एक-दो रोज बाद एकांत के क्षणों में वनमाला से प्रियहरि की आंखें चार हुई। प्रियहरि ने बैग निकाला और वनमाला के सामने रख दिया।

' कैसा है ?' - प्रियहरि पूछ रहा था।

'खूबसूरत लग रहा है। खोल कर बताइए न' - वनमाला ने जवाब दिया।

प्रियहरि ने खोलने की कोशिश की फिर कहा कि मुझसे बनता नहीं, समझ नहीं आ रहा है, तुम ही देखो। वनमाला ने उसे खोला, अंदर-बाहर देखा और खुश हो गई बोली -

''सचमुच बहुत खुबसूरत है। धन्यवाद, आप मेरा कितना खयाल रखते है। मेरी इतनी फिक्र तो मेरे मिस्टर भी नहीं करते।''

प्रियहरि ने वनमाला को बताया कि किस तरह कलकत्ते में भी उसे आंखों में बसाए दिन-रात वह याद करता रहा था। इससे पहले कि उन दोनों के बीच कोई आता, प्रियहरि की हिदायत के मुताबिक अंदर का सारा कागज-पत्तर फेंक बैग को मोड़कर वनमाला ने अपने पुराने बैग में ठूंस दिया। फिर अचानक पशोपेश भरी आंखों से वह बोली -''ले तो जा रही हूं। मगर देखें ? मेरे मिस्टर पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगी ?'' प्रियहरि ने सुझाया - ''कह देना कि तुमने पैसे दिये थे, मंगाया तो मैं ले आया।''

चार दिन बाद जब फिर एकांत में दोनों आमने-सामने हुए तो प्रियहरि की प्रिया ने चुपचाप वही पर्स अपने कपबोर्ड से निकाला और उसके सामने रख दिया। वनमाला का चेहरा विषाद से मुरझाया हुआ था और आंखों में उदासी थी।

वह बोली - ''इसे आप रख लीजिए घर में काम आ जाएगा। मेरे मिस्टर को इस पर आपत्ति है कि मैं इसे रखूं।''

प्रियहरि ने वनमाला की मायूस आंखों में झांका और अपमान की उस पीड़ा को पढ़ लिया जो उसे घर से मिली थी। वनमाला ने कहा होगा तो मिस्टर ने संदेह किया होगा और फिर जमकर तकरार हुई होगी। प्रियहरि को बड़ा धक्का लगा। वनमाला की उदासी के सदमे से प्रियहरि का दिल भी मायूस और उदास हो गया। दोनों के दिल टूट गये थे। उदास, नजरें झुकाए वनमाला चुपचाप चली गई थी। ऐसी दुर्घटनाओं के संयोग वनमाला के चित्त को अवसाद से भर देते थे - इस कदर कि फिर चंद रोज उसकी दिनचर्या अन्यमस्य चुप्पी और घनघोर उदासी में बीतती। उसकी आंखों में शून्य भर जाता। मौन वह सामने रहती, देखती और चली जाती जैसे प्रियहरि से उसका कोई नाता न हो।

इधर वही अवसाद प्रियहरि में और अधिक बेसब्री और बेताबी भर देता था। उसकी इच्छा होती कि वह वनमाला के नजदीक जाए, उसकी पीड़ा को समझे, उससे बातें करे, उसके चित्त को बहलाए और उसे खुश करे। यह जानते हुए भी कि वनमाला के घर जाना मुसीबतों को और बढ़ाना है, यंत्रचालित प्रियहरि का मन उसके कदमों को वनमाला की घर की राह पर मोड़ देता था। बातों के दौरान संकेतों से ही वह अनुमान लगा लेता था कि वह मौका कब होगा जब वनमाला के घर दोनों के बीच बाधा न होगी। एक सप्ताह बाद उस दोपहर जब गया तो घर में ताला पड़ा था। दूसरे दिन जाना कि वनमाला बीमार हो गयी थी। उसके मिस्टर उसे अस्पताल ले गये थे।

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यूं एक सप्ताह और बीता। इस बार वनमाला के मिस्टर की रात की ड्‌यूटी यानी शाम छः से रात दो बजे तक की फुरसत का अनुमान लगाता प्रियहरि शाम को उसके घर जा पहुंचा। सचमुच वनमाला के पतिदेव नहीं थे। उसने दरवाजा खोला, उदास मुस्कुराहट से प्रियहरि को आंख भर निहारा और अंदर बिठाया। कोई मेहमान वहां पहले से मौजूद था। वनमाला ने ही परिचय कराया। वे उसके बड़े भाई साहब थे । इधर-उधर की बातें होती रहीं - घर की दफ्तर की, भविष्य की, उसके भाई साहब से परिचय की - लेकिन ढेर सी बातों के बावजूद वह नहीं, जो एक-दूसरे से टकराती लाचार बेताबी भरी आंखों और दिलों में छिपा था। हाय, यह कैसी लाचारी थी कि कालेज में शोधी दृष्टियों का भय हुआ करता और यहां ?- एक तो पहुंचना दुष्कर, और पहुंच भी गये तो उसके मिस्टर के होने और खीझने की आशंका। वे न हुए तो मेहमान। वे भी नहीं तो बड़े होते बच्चे प्रियहरि और वनमाला के बीच में आ पड़ते। अन्यमनस्क वनमाला भी, अन्यमनस्क प्रियहरि भी। बातों की कोई गुंजाइश न थी।

प्रियहरि का मन मसोस रहा था कि काश अपने दिल की बाtतें वह वनमाला से कह पाता। जब-तब कनखियों से वह उसे निहार लेता। छरहरी, सांवली, निचुड़ी हुई काया और कमजोर लग रही थी। रंग उड़ा हुआ जैसी थकी हुई हो। चेहरे से चमक गायब थी। वनमाला ने साड़ी नहीं पहनी थी जो उस पर ज्यादा फबती थी। सलवार-कुर्ती भी नहीं, महज उजड़े रंग का पुराना स्लीपिंग गाउन जिसके अंदर शायद चोली ही नहीं थी। हल्का ढीला उभार प्रियहरि को दिखाई पड़ रहा था। हां, यही तो वह छबि थी जिसे वह चाहता था। उसका मन वनमाला की उपस्थिति को यूं महसूस करता जैसे वह उसकी प्रिया नहीं अपितु सदियों से साथ गुजारती उसकी घरवाली हो। प्रियहरि वनमाला के उजड़े हुए रंग पर, उसकी कमजोर काया पर भी फिदा था। उसने चाहा कि वनमाला से लिपट जाए, उसे चूमे और पूछे कि बताओ, तुम इतनी कमजोर लग रही हो ? कहे कि चिन्ता न करो, मैं आ गया हूं। वह कमजोरी बेजार दिल से सहे गये बिस्तर की हो सकती थी। कितना अच्छा होता कि खुशनुमा दिल से एक-दूसरे की चाहत के साथ उस बिस्तर पर, उस तखत पर वनमाला और प्रियहरि दोनों की कामनाएं एक-दूसरे से गुंथी मचल रही होतीं, जो उनके सामने ही वहीं बिछा था । प्रियहरि को लगा कि तब शायद वनमाला की वह कमजोरी तुरंत दूर हो जाती। वनमाला की उड़ी हुई रंगत उसी क्षण लौटकर उसके चेहरे में गुलाबी हो जाती। तब उस तरह अवसाद की गुफा से निकल प्रियहरि और उसकी प्रिया वनमाला आसमान की सैर में होते। चाहत की बेताबी में आधा घंटा बीत गया लेकिन कहीं कोई मौका न था।

प्रियहरि चलने को हुआ तो भाई को अंदर बैठा ही छोड़ वनमाला बाहर सड़क तक उसे छोड़ने आई। रात हो चली थी। बाहर बिजली की रोशनी दूर थी। उसके घर के सामने झिटपुटा अंधेरा था जो पेड़ों की घनी छाया से और भी गहरा हो गया था। प्रियहरि ने कहा -

''वनमाला, तुमसे बातें करना भी शायद भाग्य में नहीं लिखा है। तुम्हें मालूम नहीं कि तुमने मुझे कितनी पीड़ा पहुंचाई है।''

वनमाला ने दबी आवाज में कहा - ''यहां ज्यादा बात करने का अवसर नहीं है। लाइए, मेरे लिए जो भी लाए है, दे दीजिए। मैं बाद में देख लूंगी। अंदर मुझे देख रहे होगें। सोचेंगे कि इतनी देर वह बाहर क्या कर रही है।''

प्रियहरि के अपने बैग में वही पर्स था। वही, जिसे मायूसी के कारण उसने काट कर पचासों टुकड़ों में बदल दिया था। ढेर सारी चिटि्‌ठयां थी। सारी चिटि्‌ठयां टुकड़े-टुकड़े जो टूटे हुए दिल की थीं। वनमाला का इशारा था कि वह उन्हें फुर्सत से पढ़ लेगी लेकिन प्रियहरि ने तो सारे पत्र फाड़ डाले थे। उसने वनमाला से कहा -

''अब क्या कहूं। तुमने पहले तो अस्वीकार कर दिया। मैंने भी सोचा कि अगर यह तुम्हारे लिए नहीं, तो किसी के लिए भी नहीं। वहीं टुकड़े तुम्हें सौंपने आया हूं।'' प्रियहरि ने सारे टुकड़े वहीं पेड़ के नीचे छाये कचरे और पत्तियों के ढेर पर बिखेर दिए।

वनमाला बोली - ''ऐसा आपने क्यों किया।'' एक-दूसरे से दिलासे की दो-चार बातें हुई। वनमाला से बिदा लेकर प्रियहरि लौट चला।

बाद के दिन यूं ही गुजरते रहे। वनमाला का मूड प्रियहरि की समझ में नहीं आता था। बहुत दिनों तक वह उससे खिंचीं -खिंचीं रही। आंखों में पथराई उदासी और शायद प्रियहरि को प्रश्नित करती शिकायत। वनमाला के मिस्टर चाहे उस दिन घर पर नहीं थे तब भी प्रियहरि के वहां जाने, बैठने, मिलने की बात तो मालूम हो ही गई होगी । वनमाला के इस रवैये के पीछे आकांक्षाओं और विवशताओं के संघर्ष का त्रास रहा होगा। प्रियहरि पढ़ रहा था कि दोनों के बीच विवशताओं के साथ बने रहने का पक्ष कानूनी था। उसकी नियति तो वही प्रियतमपुरा. के सेक्टर आठ तक जाने वाली सड़क और उसकी उन्नीसवीं स्ट्रीट में ईंट-गारों से चाक-चौबंद छः-ए की दीवारें थी। प्रियहरि की चाहत वनमाला की मुसीबत थी। वह इशा रों में कह भी जाती थी - ''कुछ नहीं हो सकता। भाग्य को स्वीकार लो।'' यह वही भाग्य था प्रियहरि ने चाहा था कि वह वनमाला से बातें करे लेकिन वह साफ मना कर उस एकांत से निकल भागती थी जो यदाकदा दोनों को मुहय्‌या होता था।

दोनों के बीच लाचारी, उदासी और बोलता हुआ अनबोलापन स्थायी रूप से बस चले थे। वनमाला खीझती, रूठती, झगड़ती, अनबोली रहती और अचानक आंखों में आंसू सारी लाचारियां तोड़ प्रियहरि के साथ, प्रियहरि के पास टूट कर बिखर जाया करती थी।

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फिर भी औरत की जात में ही वनमाला भी थी

प्रियहरि को ऐसा संदेह था कि वनमाला का त्रस्त मन शायद खीझ में कभी-कभी दूसरी संगिनियों पर खुल जाता हो । ऐसा नहीं कि इन दूसरों से उसका अपनापा हो । अपनापा तो जो प्रियहरि से था वह कभी टूट न सकता था । वह खुद इसे महसूस करती, स्वीकारती थी । वह भी प्रियहरि की तरह गर्विता और एकांतिक स्वभाव की थी । कहा करती- ''मैं इन सब जैसी नहीं हो सकती, इनसे मुझे नफरत है । मेरी इनसे नहीं पटती'' ......... वगैरह । फिर भी औरत की जात में ही वनमाला भी थी । मर्दों की तुलना में औरतों के साथ का सहारा लेना उसकी भी स्वाभाविक मजबूरी थी ।

प्रियहरि और वनमाला की निकटता इस दरम्यान लोगों की निगाहों में चढ़ गयी थी । साल बीतते जब फिर परीक्षा का दौर आया, तो जान-बूझकर इस बार वनमाला को सुबह और प्रियहरि को शाम के वक्त तैनात किया गया था ताकि इनके बीच मिलने तो क्या देखा-देखी की भी संभावना न रहे । ऐसे ही माहौल में किसी दिन वनमाला गमगीन चेहरा लिए परीक्षा की तैयारियों में अपने कागज-पत्तर लिए काम कर रही थी । उसी की तरह खिन्न प्रियहरि पास ही बैठा था । तभी कहीं से अनुराधा नमूदार हुई।

गोरी चिट्‌टी, सुंदर और हमेशा अपनी भव्यता के लिए जानी जाने वाली अंगरेजी की प्रवक्ता अनुराधा को वनमाला से दबी आवाज में प्रियहरि ने कहता सुना - ''चलो । हम लोगों के पास बैठना । यहां अकेली मत बैठो, नहीं तो वो फिर अपनी बातें शुरू कर देंगे ।''

वनमाला अनमनी थी, लेकिन शायद उस दिन उसे प्रियहरि के साथ के एकांत की चाहत थी । यह टका सा जवाब दिया- ''मुझे परीक्षाओं का अपना काम यहां करना है, मैं रुकूंगी, आप चली जाइये ।'' उसने अनुराधा को चलता कर दिया था ।

प्रियहरि की हरकतों को लेकर वनमाला की चुहलनुमा चुगली पर भरोसा कर उस दिन वनमाला की मदद करने चली अनुराधा को मायूसी का सामना करना पड़ा । अनुराधा ने विस्मय भरी खीझ से वनमाला और प्रियहरि को देखा, होंठ बिचकाए और चली गयी ।

आंखों की गहरी उदासी, चेहरे के अवसाद और गहरी गंभीर अन्य-मनस्कता से वनमाला को न जाने क्यों कभी बाहर आते प्रियहरि ने नहीं देखा । उस दिन अनुराधा के जाने के बाद सहज और सामान्य बातें दोनों के बीच हुई । अपनी उदासी के बीच भी प्रियहरि के अवसाद को ठंडा करने की चाहत में ही शायद वनमाला भीड़ के छंटने की प्रतीक्षा करती उस दिन दोपहर बाद तक रुकी थी । उसकी यही अदाएं तो प्रियहरि के बिदकते मन को फिर से बाँध लेती थीं । वनमाला की बेरुखी से खिन्न प्रियहरि उससे बातें करने की कोशिश अक्सर मौके आने पर भी बंद कर देता था । तब वनमाला की उदास आंखें प्रियहरि को देखती जैसे समझाया करती थीं कि मजबूरियों को समझा करो, नाराज क्यों होते हो ?

दो ही दिन बाद वनमाला को फिर न जाने क्या हुआ कि सामने होकर भी मुंह फुलाए उसने अपनी कुर्सी इस तरह मोड़ ली कि न प्रियहरि उसके चेहरे को देख सके और न वनमाला की नजरों के प्रियहरि की नजरों से मिलने की गुंजाइश हो । प्रियहरि और वनमाला के बीच यह एक अनिवार्य हादसा था, जो घटता ही रहता था ।

भले ही व्यक्तित्वों के अंतर, प्रियहरि की काबिलियत,वरिष्ठता और गंभीर स्वभाव के कारण कोई कहता उससे न हो, स्टॉफ में नीचे से ऊपर सब को इस बात का एहसास था कि वनमाला और प्रियहरि के बीच कुछ-कुछ है । औरतों में ही प्रियहरि के निकट की कुछ ललनाएं अपवाद थीं जो प्रियहरि से नजदीकी के कारण कभी-कभी चुपचाप चुहल से उसे छेड़ जाती थीं । इसे विचित्र संयोग कहा जाए कि पुरुषों से प्रियहरि का ताल्लुक ज्ञान-विज्ञान और गरिमा की गुरु-गंभीर चर्चाओं तक सीमित था, लेकिन ललनाएं लगभग सबकी सब प्रियहरि के निकट आकर, बातें करके उसे प्रभावित करतीं गर्व का अनुभव करती थीं । सांवली, गंभीर, एकांतिक स्वभाव की वनमाला इन सब की निगाह में नकचढ़ी और बदतमीज थी । अक्सर वनमाला से प्रियहरि की संगत पर वे सब संकेतों ही संकेतों में मलाल जाहिर करतीं और वनमाला को कोसती थीं । औरतों से प्रियहरि की बातें आत्मीय, निजी और छेड़छाड़ भरी होती थीं । उनमें अभद्रता नहीं होती थी । केवल आंखों ही आंखों के बीच हुए संवादों और एक ऐसी निजता का स्पर्श होता था कि पल भर के लिए सामने वाला सम्मोहित हो यह महसूस करता कि प्रियहरि की आंखों में उसके लिए वह चाहत है जिसकी दरकार स्त्रियां मन ही मन किया करती हैं ।

परीक्षाओं का दौर पूरी गहमा-गहमी से चल रहा था। वनमाला को देखने उससे मिलने प्रियहरि का मन मसोस कर रह जाता था । ऐसे में परीक्षाओं के बीच ही उसे किसी काम से भोपाल जाना पड़ा था । कल ही वह लौटा था । शाम की परीक्षाएं तकरीबन तीन बजे शुरूहोती थीं, लेकिन उस खास दिन प्रियहरि दो बजे से पहले ही पहुँच गया था । उसे पता लगा कि अगले दो दिन अधिकतर महिलाएं छुट्‌टी पर रहेंगी । प्रियहरि के सहायक अधिकारी को भी संभवतः छुट्‌टी पर रहना था । ऐसी हालत में शाम को निरीक्षकों की कमी होती । प्रियहरि ने ड्‌यूटी का चार्ट देखा और गौर किया कि वनमाला उन दो दिनों में सुबह की परीक्षाएं न होने से बिल्कुल मुक्त है । उसे सुबह के लिए सहायक अधिकारी बनाया गया । प्रियहरि ने सुझाया कि क्यों न उन दिनों वनमाला को शाम को रख दिया जाए ।

सत्यजित और भोला दादा ने एक-दूसरे की तरह अर्थ भरी निगाहों से देखा और कहा कि- वनमाला तो नहीं आ सकती, क्योंकि सुबह की ड्‌यूटी के बाद वह चली जा चुकी है और उसे खबर भला कौन करेगा । वे दोनों दूसरे-दूसरे विकल्प सुझाने में लगे थे और प्रियहरि उनकी टाल-मटोल पर गौर कर रहा था । प्रियहरि को तब इसका बिल्कुल अंदेशा न था कि अब तक उपेक्षा में अलग-थलग पड़ी वनमाला की खूबियाँ और उसके प्रति प्रियहरि का खुद का चाहत भरा लगाव इन सज्जन दीखते लोगों की निगाहों में भी खटकने लगा है । उसे नहीं मालूम था कि ईर्ष्या इनमें से एक की निगाह में ऐसा लालच भर रही है, जो आगे चलकर वनमाला से उसे इस तरह जुदा कर देने वाला है, ऐसी दरार पैदा करने वाला हो रहा है, जो वनमाला के साथ प्रियहरि के संबंधों, प्रियहरि की चाहत को ही ग्रसने जा रहा था ।

उन दिनों प्रियहरि के साथी नलिन जी ही अफसर की खुर्सी पर थे । उनके आने पर प्रियहरि ने उन्हें राजी कर अगली दो शामों के लिए वनमाला की ड्‌यूटी अपने साथ शाम के लिए दर्ज करा ली और उसके करीबी मुहल्ले के एक सहायक के हाथों वनमाला को खबर भी भिजवा दी ।

वनमाला और प्रियहरि के ताल्लुकात गहरे थे लेकिन ऐसे कि प्रियहरि को वनमाला के मूड का खयाल ही अधिक रखना होता था। इसके विपरीत वनमाला प्रियहरि के तरफ से निश्चिन्त थी कि वह तो उसका हो ही चुका है। औरत-जात होने के कारण उसकी अनेक-विध समस्याएं थी। खासकर तब जबकि प्रियहरि से लगाव वनमाला की घरू और सामाजिक जिन्दगी के लिए भारी पड़ रहा था। प्रियहरि का मन आशंका-ग्रस्त था। वनमाला से मिलते उसकी धकड़नें तेज हो जातीं। उसका मन भयभीत होता कि न जाने वनमाला की स्थिति, परिस्थिति, मनःस्थिति क्या है और उसका मूड कैसा होगा। बाधाओं के कारण इस तरह कई दिन गुजर जाते और प्रियहरि को वनमाला से आमने-सामने की अंतरंगता के मौकों के लिए तरस जाना होता था।

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''बाइ गाड, मैने आप के बारे में उससे कभी कुछ नहीं कहा है ।

यहां आजकल औरतों की भी बड़ी राजनीति चल रही है ।''

पिछली रात से ही प्रियहरि को डर था कि कहीं उस तरह बुलावे की व्याख्या उल्टी न हो। वनमाला के मिजाज के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता था। प्रियहरि को आशंका हुई कि वनमाला उस पर अपना प्रभुत्व दर्शाने, नीचा दिखाने, और परेशान करने का आरोप लगाए और छुट्‌टी न ले ले । दोपहर दो पैंतालीस पर उसने वनमाला को देखा तो आश्चर्य से भरपूर उल्लास से उसका मन थिरक उठा ! वनमाला आई । बिल्कुल अच्छा मूड । बहुत दिनों के बाद मिलने की प्रच्छन्न खुशी । पहले-पहल वनमाला के संभावित मूड के बारे में प्रियहरि ने जो-जो सोच रखा था, उसे हॅंसते हुए उसने बताया ।

वनमाला ने हंसकर कहा- ''मुझे कोई परेशानी नहीं । एक बार आना था, सो अभी आ गई । लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि नलिनजी ने ये वीक्षण की सूचना भेजी कैसे ? क्योंकि आप की शाम की पाली में ही तो बतौर अधिकार मैं आप के साथ सहायक अधीक्षक हूँ। अब आप बताइए कि सहायक अधीक्षक अपनी ही ड्‌यूटी में क्या वीक्षण करेगा ? तय कीजिये ?''

अब चौंकने की बारी प्रियहरि की थी । उसे यह बात मालूम नहीं थी । न कभी वनमाला ने इस वक्त उसके साथ सहायक अधिकारी की ड्‌यूटी की थी ।

उसने कहा-'' अरे ! यह बात तो मुझे भी नहीं मालूम तब तो आप को यहीं रखना था । ये तो गलत बात है । आइ विल रेज़ दिस मैटर विद नलिन जी।''

प्रियहरि के शब्दों के पीछे छिपी मंशा को वनमाला ने भली-भॉंति समझ लिया । वह सुबह की जगह शाम प्रियहरि के साथ रहना ही रहना चाहती थी ।

वनमाला ने कहा- ''आप को मालूम नहीं ?'' हंसकर ताना देती हुई वह बोली –

'' मैंने तो समझा था कि आपने ही मुझे अपनी जगह से टालने के लिए कहकर सुबह की पाली में भिजवाया है । आप तीसरी पाली के अधीक्षक हैं और आपको यह बात मालूम होनी चाहिए थी । ''

'' अरे ठीक इसके उल्टे मैं समझता रहा कि तुमने मुझे अवाइड करने सुबह की पाली मांगी है। मैने तो समझा कि प्रशासन के निकट रहकर मुझे जलाने के लिए ही खासतौर पर तुमने सुबह के साथ दोपहर की पाली भी चुनी है '' - प्रियहरि ने जवाब दिया ।

'' मुझसे पूछा किसने ? बस लगा दिया । मेरी मजबूरी थी । मैं करती भी क्या ? ''

वनमाला ने प्रियहरि से कहा- '' अब आप कहिए उनसे कि शाम की पाली में मेरा नाम है, तो सुबह-सुबह वे मुझे क्यों बुला रहे हैं ? वैसे भी सुबह की पाली में परेशानी है । पॉंच-पॉंच, छः-छः लोग आते नहीं । कार्यालय का आदमी भी ड्‌यूटी पर चला जाता है । मुझ पर ताने कसे जाते हैं कि इन्हीं में बड़ी योग्यता है, जो दो-दो पालियों में सहायक परीक्षधिकारी बनी बैठी हैं, वगैरह । ये सब महिलाओं की राजनीति है । ''

'' वनमाला तुम क्यों नहीं कहती हो उनसे ? तुम कहो उनसे और मैं भी कहूंगा । ''

जवाब में वनमाला बोली -'' मेरे कहने से कुछ होता नहीं । उल्टे गलत अर्थ निकाला जाएगा । ''

सारा माजरा प्रियहरि की समझ में आ गया था। यह शरारत ईर्ष्या में ग्रस्त भोलाराम की थी । अवश्य उसी ने बड़े साहब के कान फूंकते वनमाला को प्रियहरि से जुदा रखने की तरकीब निकाली थी।

प्रियहरि ने वनमाला को उम्मीद दिलाई।

''ठीक है मैं ही कोशिश करूंगा ''- उसने कहा।

साथ बैठे प्रियहरि और वनमाला का सारा वक्त प्यार में एक दूसरे से बेरुखाई की शिकायतों और मनुहारों में कटा । वनमाला को अपने अनेक श त्रु होने की शिकायत थी। वनमाला की शिकायत थी कि प्रियहरि भी उसका ध्यान नहीं रखता है। वैसी ही शिकायतें विपरीत ध्रुव पर वनमाला से प्रियहरि की भी थीं । इस मिलन से दोनों के बीच की गलतफहमियॉं दूर हुईं । वे दोनों ही बहुत प्रसन्न थे । तीन घण्टे का समय कैसे गुजरा इसका पता ही उस दिन न चल पाया था। प्रियहरि के टिफिन की दो पूरियां आज वनमाला और नीलांजना सहित तीन ने खायी । नाश्ता हुआ, चाय चली । प्रच्छन्न आरोप-प्रत्यारोप, उपालंभ चले । आज तीसरी नीलांजन थी, जो प्रियहरि और वनमाला के एक हो जाने पर संकोच में सहमी, सकुची रही और बाकायदा प्रियहरि की सहायक अधिकारी होने के बावजूद इन दोनों को वहां छोड़ निरीक्षण में भी जाती रही । आज अपनी-अपनी जगह से न प्रियहरि हिला और न वनमाला हिली । शाम होते-होते भोलाबाबू सौंपा गया अपना सरकारी काम पूरा कर लौटते हुए आ पहुंचे थे। वनमाला और भोलाबाबू एक ही इलाके के बासिन्दा थे। सुविधा की दृष्टिसे मैने वनमाला को समय से कुछ पहले ही भोला के साथ भेज दिया ।

कल से ही प्रियहरि को कुछ अंदेशा होने लगा था । अनुभव बताता है कि वनमाला के साथ संबंधों में एक दिन की उड़ान दूसरे दिन खाई बन जाती है । वही हुआ । सुबह फोन पर प्रियहरि ने भोलाबाबू से अनुरोध किया था कि परीक्षा-ड्‌यूटी संबंधी व्यक्तिगत बात प्राचार्य से करके वे आदेश ठीक कराएं और वनमाला को शाम उसके साथ रखें । बात बहुत औपचारिक ही थी । दोपहर पता लगा कि मौजूदा स्थिति को यथावत पुष्ट करके फिर उन्हें आदेश सौंप दिया जाएगा। बदकिस्मती कि प्रियहरि और वनमाला को वैसी ही दूरी पर रहना था ।

दूसरे दिन फिर साथ होने पर प्रियहरि ने वनमाला को सुझाया कि नलिनजी से अपने सुबह के झगड़ों की बात बताकर तुम्हीं प्रधानजी से आग्रह करो कि वे तुम्हें उनकी जगह मेरे साथ रखें।

वनमाला ने उदास भाव से कहा- '' मैं नहीं कह सकती । मुझे मालूम है कि होना-जाना कुछ नहीं है । फिर पारिवारिक सुविधा की दृष्टि से तो सुबह ही ठीक है । रहने दीजिये ।''

प्रियहरि ने वनमाला पर नजर डाली । आंखों और चेहरे के उदास भाव से पता लग रहा था कि बड़े साहब से न कहने का कारण पहला ही था दूसरा नहीं । मैंने बात समझी और कहा कि तुम ठीक कहती हो । होगा कुछ नहीं उल्टे अपनी हंसी उड़ेगी । वनमाला ने मेरी आशंका की पुष्टि की ।

कल का जो उल्लास था, वह आज केवल सामीप्य का हर्द्या था । चेहरे और आंखों पर विवश ता और उदासी वहां भी थी, और यहां भी । प्रियहरि ने उसकी ओर देखकर कहा-''वनमाला, आदमी सोचता कुछ और है, होता कुछ और है ।''

वनमाला के अंदर केवल एक लाचार शून्य था । दोनों का वह दिन उदासी में ही कटा ।

वनमाला ने कहा- '' मैंने कहा था न ! यहां कुछ न होगा । आप बेकार दुःखी होते हैं । मेरी सलाह मानिये, भोलाबाबू की तरह हो जाइए । सुखी रहेंगे ।''

नीलांजना से मुखतिब हाते प्रियहरि ने कहा और वनमाला को सुनाया ।

'' अपने बहुत करीबी मित्रों से भी जब मैं यह सुनता हूं, तो मुझे बड़ा धक्का लगा भी । क्या सचमुच वनमाला को भी यही सब प्रभावित करता है ? ऐसे सड़े विचार ?''

वनमाला ने फिर कहा- '' आप को लगता है कि केवल यहां ही ऐसा माहौल है ? ऐसे ही अफसर हो रहे हैं और ऐसे ही चाटुकार राज कर रहे हैं । '' प्रियहरि स्तब्ध और उदास हो आया । दोनों में से किसी ने कुछ न कहा । शाम ढलते वनमाला ने प्रियहरि से आज्ञा ली और वापस जाने तैयार हो गयी । इस वक्त कमरा बिल्कुल सूना था । नीलांजना भंडार के सामान की जांच के बहाने कहीं और चली गयी थी । बाबू और अन्य सेवक शायद जान-बूझकर ही बाहर कहीं चाय आदि को चले गये थे ।

प्रियहरि ने वनमाला को आवाज देकर टोका- ''सुनो, अपनी शिकायत कहने, मुझे ताना देने तुम्हे अनुराधा की जरूरत उस दिन क्यों पड़ी वनमाला ? क्या तुमने उसे अपना सलाहकार बना रखा है ?

वनमाला ने कहा- ''नहीं, आप को गलतफहमी है। मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा है ।''

प्रियहरि ने उसे याद दिलाया- ''उस दिन सूने स्टाफ रूम में जब सारी महिलाएं साड़ी रंगने और देखने जा रही थीं, तब तुम्हें परीक्षा सामग्री के साथ और मुझे वहां अकेला पाकर अनुराधा ने फुसफुसाकर तुमसे क्या यह नहीं कहा था कि चलो यहां से, नहीं तो ये फिर से अपनी शुरूकर देंगे ।''

वनमाला ने अपना गला छूकर कहा- ''बाइ गाड, मैंने आप के बारे में उससे कभी कुछ नहीं कहा है । अनुराधा का संकेत शायद

महिलाओं की राजनीति की ओर रहा होगा । आप जानते नहीं यहां आजकल औरतों की भी बड़ी राजनीति चल रही है ।''

वनमाला के 'बाइ-गाड' कहने ने प्रियहरि में विश्वास अवश्य जगाया। पर तब भी वह तय न कर पाया कि उसकी बात कितनी विश्वसनीय है । प्रियहरि ने केवल इतना ही कहा- ''वनमाला, मैं तुम्हारा ऐसा ही हंसता हुआ चेहरा हमेशा देखना चाहता हूं । मेरी शिकायत तो तुम खुद मुझसे कर सकती हो । मुझ पर तुम्हारा पूरा अधिकार है । हमारे बीच तीसरे किसी को क्यों आना चाहिए ?''

वनमाला ने जवाब दिया- ''आप सच मानिये, मैंने कभी किसी से कुछ न कहा है। आप तो बस फिर वही शिकायत ले बैठे ।'' ऐसा कहती खिलखिलाती हुई वापस जाने अपना बैग उठाए वनमाला दरवाजे से बाहर हो गई ।

इस साथ के सुख ने वनमाला के लिये प्रियहरि की प्यास को और बढ़ा दिया था। जुदा होती वनमाला के पीछे दौड़ता उसका अधीर मन गुनगुना रहा था - '' अभी न जाओ छोड़कर अभी तो मन भरा नहीं -''।

एक हफ्ते बाद फिर वनमाला के साथ होने की युक्ति प्रियहरि ने निकाली । हुआ यूं कि परीक्षा में निरीक्षक कम पढ़ते थे और लगातार छः-छः घण्टे ड्‌यूटी लगने से दूसरे निरीक्षक शिकायत करते थे । प्रियहरि ने चतुराई से सुझाया था कि परीक्षा अधिकारी भी आखिर जरूरतों पर ऐसी ड्‌यूटी क्यों न करें । दो परीक्षधिकारियों सत्यजित और भोला बाबू ने वैसा करने में अनमनापन दिखाया । वैसा करना वे अपनी शान के खिलाफ मानते थे। उनसे अलग हो प्रियहरि ने अपने को हाजिर कर दिया था । वनमाला तो सहायक अधिकारी थी ही। उसे तो पहले से ऐसी ड्‌यूटियां करनी होती थीं । भोला दादा बड़े साहब के करीब हुआ करते थे। उनसे प्रियहरि ने आग्रहपूर्वक यह शर्त रखी थी कि उसको निरीक्षण में लगाते वे अधिकारी के साथ अधिकारी या सहायक अधिकारी की ड्‌यूटी ही वे लगाएं ताकि मातहतों के साथ काम करते अटपटा न लगे और वह अवमानित न महसूस करे । वनमाला की ड्‌यूटी भी उन तारीखों पर लगनी ही थी । उन आने वाले दो दिनों के लिए उसने वनमाला को अपने साथ रखने की पेसकश भोला दादा से की थी । देखने में यह उसकी चालाकी थी, लेकिन ऐसा लगता था कि उस चालाकी की मूर्खता औरों ने पकड़ ली थी । भोला दादा को तो आभास हो ही गया था । भोला दादा ने वैसा कर भी दिया लेकिन बहुत जल्द प्रियहरि को इसका अहसास हो गया कि वैसा कराना शायद उसकी खुद की मूर्खता थी । वह उन हालातों को लेकर सोच में था जिनसे गुजरता वह अनिर्दिष्ट की ओर बढ़ रहा था।

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वनमाला के होठों पर आधे इंच की मुस्कान को देखना दुर्लभ नजारा था,

जिसे सौभाग्य के वैसे ही दुर्लभ क्षणों में देखा जा सकता था ।

मैं सोचता हूं कि जिंदगी भी कितनी अजीब है । सरल और सीधी राह भी परिस्थितियों के वशीभूत हो, कितनी टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है । मेरी बार-बार इच्छा होती थी कि वनमाला की एक झलक मैं देख लूं । बेताबी के चलते दो-तीन रोज बाद ही एक दिन अपने नियत समय से पहले यानी दोपहर को ही मैं दफ्तर चला गया । उसी दिन मैंने सुन लिया था कि बाबू के न रहने के कारण सुबह वनमाला तनखाह नहीं ले पाई है । मेरा मन कहता था कि शायद आज वह रुके और फिर आमना-सामना हो जाए । मेरी उम्मीद ठीक निकली । काली साड़ी वनमाला को खूब फबती थी । श्यामा तन्वंगी वनमाला की खूबसूरती उसमें और निखर आती थी । कमस्कम मुझे तो ऐसा लगता था । हमारी आंखें चार हुईं । वह प्रसन्न थी । बैठने की जगह तो परीक्षा के प्रशासन का कमरा ही था । उस दिन वह दो बजे तक रुकी रही और भीड़ से आंखें बचाते कुछ हिचकते और कुछ पशोपेश में हम दोनों इस-उस बारे में बतियाते रहे ।

ईश्वर जाने क्यों अंदरूनी खुशी की वे तरंगें जो हम दोनों में छिपी रहती थी, मौका मिलते ही एक-दूसरे के दिलों पर फैलकर एकाकार हो जाती थी । वनमाला और मेरे बीच जो चल रहा था उसे कमरे की भीड़ भी दबे-छिपे आश्चर्य और कौतुक से देख रही थी । इस बात का अंदाजा आज मुझे हो गया था कि चार रोज बाद हमारे एकांतिक सहमिलन का शुभ अवसर फिर आने वाला था। संभवतः वनमाला को भी वैसा आभास हो गया हो । पर तब इसका आभास मुझे नहीं हो सका था कि निरीक्षण की ताजा तालिका देखकर ही औरों को भी वनमाला और मेरी साझा ड्‌यूटी पर दाल मे काला नज़र आएगा।

उस तरह इंतिजार कराता वह पूरा सप्ताह अगले उस अवसर की कल्पना में बीता जिसमें उसकी प्रिया काम के बहाने और काम के बीच भी केवल उसके साथ होगी। उसका मन बार-बार वनमाला रानी के पीछे भागता था । वनमाला उसके अस्तित्व मे समा चली थी। आंखों में वनमाला की छबि समाई थी। हृदय का हर स्पंदन मंत्र की तरह जप रहा था - मैं और मेरी वनमाला। वनमाला रानी और उसका प्रियहरि यानी मैं।

वह दिन आया । लेकिन ठीक उस तरह नहीं जैसा उसे आना था । सुबह दस बजे ही मैंने पाया कि स्टाफ-रुम में हम लोगों को साथ पाकर और एक ही कमरे में दर्ज देख खुसर-पुसर शुरू हो गई है । खोजी निगाहें इशारों में बतिया रही थी । चित्रकार कानन कार्यालय के नारायण बाबू से पूछ रहा था- ''अच्छा तो आजकल कुछ लोग अपनी सुविधा के मुताबिक ड्‌यूटी लगवा रहे हैं ।''

वह कहना ऐसा था जिसे सुना जा सके या जिसे जानबूझकर सुनाया जा रहा हो । यह छैला, तुनक-मिजाज ,चंचल और बातचीत में लिहाज-विहीन था, गो कि उसकी यह वृत्ति समय-समय पर ही प्रकट होती थी । चिर-प्रतीक्षित उम्मीद पर पानी पड़ने ही जा रहा था । किसी कमरे में कोई एक तब-तक अनुपस्थित था ।

बाबू ने सुझाया कि प्रियहरि सर को बदलकर दूसरे कमरे में भेज दिया जाए तो कैसा रहे ? भोलाबाबू ने मना कर दिया -''नहीं-नहीं, उन्हें वहीं रहने दो ।''

यह सब देख-सुनकर वनमाला और मैं दोनों ही एक अनजान भय और संकोच से घिर गए थे। हमारे मन का चोर दूसरों ने पकड़ लिया था। प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः।

हम दोनों रहे तो तीन घण्टे के लिए एक ही कमरे में आए, लेकिन वनमाला का मूड बिगड़ गया था । जिस तरह से चीजें उजागर हुई, उससे वह अपने को फजीहत में पड़ा हुआ महसूस कर रही थी और रुष्ट थी । वनमाला ने शायद तय कर रखा था कि उस दिन मैं जो भी उससे कहूंगा या चाहूंगा, उसे वह नहीं मानेगी । मैंने उसे पास बिठाने, मनाने की चेष्टाएं कीं, लेकिन उसने यत्नपूर्वक दूरी बनाए रखी ताकि अपवादों से वह अपने को बचा सके । औरत चाहती वह सब कुछ है, जो मर्द चाहता है, लेकिन लोकापवादों से वह हर कीमत पर बचना चाहती है । औरतों की ईर्ष्या की उसे उतनी परवाह नहीं होती । वनमाला को भी नहीं थी। लेकिन आदमियों की दुनिया में औरत बदनामी से बहुत परहेज करती है । दूर-दूर भाग रही वनमाला रानी को अपने पास बिठा रखने में मुझे काफी दिक्कतें हुई । मेरे मनाने पर वनमाला राजी तो हुई, लेकिन रही वह अन्यमनस्क ही आई । मैने उससे पहले ही कह रखा था कि आज हम साथ रहेंगे और मैं उसके टिफिन से उसके साथ ही खाना खाऊंगा।

मैने पूछा-'' टिफिन लाई हो न ? ''

उसने कहा- ''आज मैं घर से ही खाकर आ गई हूं । ''

मैं उसे मनाता रहा।

''कल लेकर जरूर आना प्लीज़। क्या तुम मेरा इतना भी ध्यान न रखोगी ?''

वनमाला को मालूम था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूं ।

मुझे चिढ़ाती हुई वह बोली- ''कल मैं ब्रेड और आमलेट लेकर आऊँगी ।''

'' ठीक है।''

मैने कहा -'' मेरी परीक्षा ही ले रही तो यही-सही, मैं वही खाऊँगा ।''

अनमनी वनमाला ने मुझसे कहा - ''मुझे कानपुर सेमिनार में जाना है । अकाउन्ट्‌स के किसी टॉफिक पर एक पेपर तैयार कर दीजिए न । करेंगे न ?''

मैने कहा- ''करूंगा तो, लेकिन तुम साथ बैठोगी तब ।''

वनमाला नाराज़ हो गयी ।

''मुझे साथ ही बैठना होता तो क्या ? रहने दीजिए मैं खुद कर लूंगी ।''

मैं समझ तो रहा था कि हमारे संबंधों का उस तरह औरों पर प्रकट होना और फिर ताने उसे चुभ गए थे । वह अपने को सिकोड़ना चाहती थी । फिर भी मुझे उसका वैसा जवाब देना बुरा लगा । मैंने उसे समझाया कि विषय तुम्हारा है और वह भी तकनीकी। तुम साथ न बैठीं, तो मैं किससे बात करूंगा और क्या मेरा मन लगेगा ?

वह बोली ''रहने दीजिए मुझे मालूम है, आप सब कुछ कर सकते हैं । नहीं ही लिखना है तो बहाना मत कीजिए ।'' मुंह फुलाए वह टहलने लगी ।

अपने से खिन्न पा मैने उसे बिठाया । उससे कहा- ''प्यारी वन्या, मुझसे इतनी नफरत मत करो जिसे तुम खुद भी संभाल न पाओ । बताओ तो मेरा कसूर क्या है ?''

वनमाला मौन रही आई, उदास ।

उसे मुंह फुलाया पाकर मैंने कहा-''जानती हो कलकत्ते से तुम्हारे लिये संदेश लाया था । उस वक्त भी तुम्हारा मुंह फूला रहा था । इसलिए तुमसे तब कहा नहीं । तीन दिन रखा रहा, आखिर फेंकना पड़ा ।''

'सच' ? वनमाला के होठों पर आधे इंच की मुस्कान को देखना दुर्लभ नजारा था, जिसे सौभाग्य के वैसे ही दुर्लभ क्षणों में देखा जा सकता था ।

वह बोली- ''आपने कहा ही नहीं, तो मैं जानती कैसे ।'' उसने कहा- ''के. सी. दास का रसगुल्ला लाना था, मुझे बहुत पसंद है ।''

''वह ले आता तो रानीजी कुछ और लाने की बात कहतीं ।'' अपनी बात जारी रखते मैने कहा- ''यार तुम्हारा मूड इस तरह से उखड़ा हुआ क्यों रहता है ? मुझे बहुत डर लगता है कि तुम न जाने कब नाराज़ हो जाओ । हमारे बीच खटपट और तनाव पर लोग गौर करते हैं । आखिर तुम ऐसा करती क्यों हो ?''

बड़ी मासूमियत से उसने जवाब दिया- ''आप यूं ही सोचते हैं । मैंने तो ऐसा महसूस नहीं किया ।''

शरारत से मैने कहा- ''तुम्हारी कुंडली में मंगल है क्या ? हमेशा गरम रहती हो ।''

''मुझे नहीं मालूम । यह भी कि कुंडली बनी भी, या नहीं ।''

''शादी फिर कैसे तय हुई ?''

''मिस्टर की भी कुंडली भी नहीं है ।''

अतीत में कहीं देखती वनमाला ने यूं कहा मानो वह बहुत दूर से बोल रही हो

- ''गनीमत है शादी हो गई । यही क्या कम है ?''

''यार, तब तो तुम्हारा पति बहुत सौभाग्यशाली निकला । अगर कुंडली का चक्कर होता तो शायद वो तुम्हे नहीं पा सकता था ।''

जैसे वनमाला कहीं दूर खो गई थी ।

मैने कहा- ''काश मै तुम्हें पा सकता । तुम्हें नहीं लगता कि जैसे तुम मेरे लिए ही रची गई थीं ।''

वनमाला अनमनी हो गई थी । कुछ अस्तित्व उसका कमरे में चहलकदमी करता और बैठता मेरे पास था ; कुछ और कहीं शून्य में ; कुछ वहां जहां उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें थीं कि लोग क्या कह रहे होंगे ? चिंता की उन लकीरों का फलित यह था कि अगले दिन हम जुदा कर दिए गए थे ।

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मेरी हालत ऐसी है कि मैं कुछ न कर पाऊंगी।

मेरे मिस्टर नहीं चाहते कि मैं कुछ करूं।''

यह दूसरा दिन था। वनमाला के कमरे में जाकर मैं उससे मिला । बरामदों का चक्कर लगाते श्रीमान्‌ भोलाबाबू बीच में आ टपके । बातों-बातों के बीच वनमाला के लिए मेरा प्रशंसा-भाव पकड़कर उन्होने अनजाने में वह बात कह दी, जिससे मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ ।

वनमाला की तारीफ सुनते वे बोल उठे- ''हां, मैंने इन्हें पहले पहचाना नहीं । ये काबिल तो हैं । सोचता हूं कि इसे अपनी शिफ्ट में सहायक बनाकर रख लूं । लेकिन फिर लोग कहेंगे कि सारे बंगाली इकट्‌ठा कर लिए हैं ।'' विराग गांगुली पहले से ही भोला का एक सहायक अधिकारी था।

यकीनन भोला ने पशोपेश ग्रस्त वनमाला पर यह बात जाहिर कर दी थी कि मैंने वनमाला को अपने साथ ड्‌यूटी में रखने की बात उससे कह दी थी । बातों के दौरान ही वनमाला अचानक बोल उठी थी- ''आप तो इनके (यानी मेरे) कहने पर मेरी ड्‌यूटी न लगाया कीजिए, खास तौर पर इनके साथ । ये तो यूं ही मेरी तारीफ करते रहते हैं ।''

जाहिर है कि लोकापवाद के भय से वनमाला में और सदैव उसे उपेक्षिता रखने के बाद भोला के मन में लोभ के जागने का परिणाम ही दोनों के वे संवाद थे, जो मुझे संकोच में डाल गए थे । बाद में फिर एकांत पा मैने वनमाला से पूछा था- ''मेरी बात याद है, आज टिफिन लाई हो न ?''

उसके 'ना' करने पर मैंने कहा- ''ठीक है, मैं आज समझ गया । बात महज टिफिन की नही थी, टिफिन लाने वाले की भावना की थी और मैंने वह देख ली है ।''

उसने बात टालनी चाही- ''क्या बताऊँ, सुबह-सुबह हो नहीं पाता है ..... ''

मैने बीच में ही कहा- ''वनमाला, कुछ न कहो, परीक्षा हो गई ।''

तसल्ली की कोशिश में उसने कहा- ''आप तो बस यूं ही हर बात पकड़ बैठते हैं । मैने ऐसी कोई बात मन में सोची ही नहीं थी ।''

उस दिन मैंने उसे बताया कि उसकी पी.एच-डी. के पंजीयन के लिए मैंने डॉ. माथुर से बात कर ली है । वह पंजीयन के लिए तैयार रहे ।

वनमाला अनमनी और अपने आप मे गुम थी। सुनकर भी जैसे उसने कुछ न सुना हो । जैसे किसी दूर के लोक से क्षीण सी आवाज सुन पड़ी -''रहने दीजिए। मेरी हालत ऐसी है कि मैं कुछ न कर पाऊंगी। मेरे मिस्टर नहीं चाहते कि मैं कुछ करूं।''

उस दिन पहली बार मैंने अपनी गलती महसूस की । वनमाला और अपने बीच भोला की मदद लेना मेरी मूर्खता थी । घर से तो वनमाला त्रस्त थी ही। यहां भी उसपर निगाह रखते उसकी खुशी छीनने, उसे बदनाम करने लोग घुस आए थे।

किंकर्तव्य-विमूढ मैं सोचता रहा कि हम दोनों की नियति भी कैसी है ? आज सुबह ही मुझे इसका आभास होने लगा था कि जैसा माहौल बन चला था उसमें वनमाला का मूड शायदवैसा खिला न रह पाएगा जैसा हमारे साथ के पिछले संयोग में रहा आया था । यह निश्चय था कि भोला नहीं चाहता था कि वनमाला मेरे निकट रहे। बाद में मुझे यह मालूम हो चला था कि सुबह-सुबह वनमाला को अपने साथ रखे जाने की प्रियहरि की बात सुनकर भोलाबाबू अप्रसन्न था। इससे पहले कि उस दिन मैं पहुंचता, वनमाला पर अपनी खीझ भोला बाबू ने उतार दी थी। उस दिन वनमाला के बुझ चले चेहरे के पीछे यही रहस्य था। तब भी मुझ में इस बात का क्षोभ रहा आया कि प्रियहरि का साथ देती विरोधियों से खुले आम लड़ पड़ने की बजाय वनमाला क्यों परिस्थितियों के दबाव में आती मायूस हो जाती है ? क्यों तब अपनी रुखाई दिखा वह बदला प्रियहरि से लेती है ? वह सोच रहा था कि पल-पल बदलती उसकी प्रिया वनमाला का कौन सा रूप सही है ?

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अक्सर मुझे संदेह होता कि कहीं गहरे अतीत में उसका कोई भयानक अनुभव तो नहीं था ?

बाहर बर्फ की ठंडी, ठोस, लादी हुई चट्‌टान ; लेकिन अंदर बाहर निकलने को बेताब उद्‌दाम ज्वाला ।

वनमाला के अंदर भी वैसी ही उद्‌दाम ज्वाला तो नहीं छिपी थी ?

वनमाला अच्छी तरह जानती थी कि मैं उसे चाहता हूं पर उसके अंदर कुछ रहा होगा, जो प्रत्यक्ष को टालना चाहता था । वह क्या था ? शायद मध्यमवर्गीय नैतिकता का भय ? या उन उलझनों और परेशानियों का भय जो पेश आ रही थीं । या शायदघर में उसके पति की झंझटों और बच्चों की परवरिश आदि की चिंताएं और व्यस्तता । वह उन सारी स्थितियों से बचने की कोशिश करती थी, जो हमें एक दूसरे की ओर खींच रही थी । यह इसके बावजूद था कि दिली आकांक्षाएं मेरी तरह उसकी भी उन्हीं में बने रहने की थी ।

मुझे याद है । आरंभिक लग-लगाव के दिनों में रुठती-मानती वनमाला से यह पूछने पर कि क्या तुम्हें मेरा साथ पसंद नहीं, क्या तुम मुझे नहीं चाहती ? अगर ऐसा है, तो मैं तुमसे दूर चला जाऊँगा '', उसने जवाब दिया था- ''मैंने आप से ऐसा कब कहा ? आप तो फिर भी बहुत अच्छे हैं, कुछ लोग तो यहां ऐसे हैं, जो आप अपने को जैसा समझते हैं उससे कई गुना ज्यादा खराब हैं । अब मैं आपसे क्या बताऊँ ?''

वनमाला क्या कहना चाहती थी ? किसकी ओर इशा रा करना चाहती थी ? मैं समझ नहीं सका था । जहां तक मैने देखा था, उससे लोग चिढ़ते ही थे । मेरे ही ताल्लुकात उससे सबसे जुदा और खुले थे, जिसमें प्यार-मोहब्बत की बातें होती थीं । मुझे ऐसा लगता कि उस चित्रकार का ध्यान तो वनमाला की ओर कम था, पर वनमाला के मन में ही उसके लिये ललक ज्यादा थी । काम के प्रति लापरवाह और गैर-जिम्मेदार उस छैला ने एक बार परीक्षा की ड्‌यूटी के दौरान ही हमारे कमरे में आकर पूछा था । पूछा तो क्या, महज कहा ही था-

''मुझे चाय पीने की इच्छा है । जरा गुमटी से चाय पीकर आता हूँ।''

परीक्षा का कमरा अपने साथी के जिम्मे छोड़ टहलना-घूमना और अलस्सुबह चाय या नाश्ता ढूंढना उसकी आदत में शुमार था ।

वनमाला ने कहा था- ''चाय पीने की तो मेरी भी इच्छा हो रही है ।''

उस छैला ने कहा था- ''चलिए आप भी, पीकर आते हैं ।''

तब वनमाला शायद मेरा लिहाज कर चुप्पी साध गई थी । उसके बाहर निकलते ही वनमाला ने मुझसे पूछा था- ''मैं भी साथ हो आऊँ क्या ?''

मैंने इतना ही कहा- यह गैर-जिम्मेदारी है कि कोई परीक्षा के कमरे से इस तरह ठेले पर चाय पीने सड़क पर जाए । तुम परीक्षा-अधिकारी हो । तुम्हारा जाना क्या अच्छा लगेगा ?'' वनमाला के दोहरे मन को मैं पढ़ रहा था । आखिर चाहकर भी वह नहीं जा सकी थी ।

एक और बार मेरी मोहब्बत भरी बातों को टालती उसने बुदबुदाया था- ''नहीं, आप समझते नहीं । वे आ रहे होंगे ना ।''

जिस दिन की यह बात है, उस दिन उस छैले और आम लोगों के आने का समय हो रहा था । क्या वनमाला का इशारा इसी खास व्यक्ति की ओर था ?

मैने सोचा कि वनमाला के 'बुरे लोग' का क्या मतलब था ? क्या कोई उसे सीधे-सीधे संभोग के लिए प्रेरित कर रहा था । मुझे संदेह हुआ । कभी-कभी चीजें जैसी होती हैं, उसके ठीक उल्टे दिखाई पड़ती हैं । बाहर बर्फ की ठंडी, ठोस, लादी हुई चट्‌टान ; लेकिन अंदर बाहर निकलने को बेताब उद्‌दाम ज्वाला । वनमाला के अंदर भी वैसी ही उद्‌दाम ज्वाला तो नहीं छिपी थी ?

एक और रोज प्रशिक्षार्थियों की कापियां जांचती उसने मुझसे किसी और की शिकायत की । यह व्यक्ति तबादले पर उसके विभाग में साल-दो साल हुए आया था । वनमाला ने कहा- ''यह आदमी मेरी चापलूसी करता मिनमिना रहा था कि अगर उसके भतीजे की कापी आई हो, तो मैं जांच में नंबर बढ़ा दूं ।''

यह व्यक्ति और इसके विषय के बहुतेरे लोग ट्‌यूशन करके पैसा कमाने, शेयर का कारोबार घर में करने और किसकी कापी कहां गई है, यह जानकारी हासिल करके छात्रों के बीच दलाली करके नंबर बढ़वाने और पैसों के मोल-तोल के लिए बदनाम थे । वनमाला, मैं और दीगर लोग इनके विभाग की हरकतें जानते थे । वनमाला इस सब में लिप्त नहीं थी । उसे इन बातों से कोफ्त थी ।

मेरे यह कहने पर कि अपने विवेक से वह खुद ही सोचे, वनमाला ने कहा था- ''इसीलिए तो मैं आप से पूछ रही हूँ। क्या मुझे इसकी मदद करनी चाहिए ?'' आगे उसने खुद बताया - '' हालांकि उस परीक्षा और रोल नंबर की कापी मेरे पास आई है , मैने तो उससे कह दिया है कि मेरे पास उस परीक्षा की कापियां नही हैं । मैं इसका कहा क्यों मानूं ? ये धंधेबाज है, पैसा कमाता है और यहां चापलूसी कर रहा है । मैंने तो इससे झूठ बोल दिया है । मैने नंबर बढ़ाना भी नहीं है ।''

न जाने क्यों भोलाबाबू से भी वनमाला को चिढ़ थी । आखिर वनमाला कहना क्या चाहती थी ? उसके सब से ज्यादा निकट और चहेता मैं ही था, जिससे उसकी पटती थी । वनमाला का प्रशंसक शायद ही तब कोई रहा हो । तब क्या वनमाला का सोचना उसके अपने ही दिमाग की उपज थी, जो इसलिए सामने आ रही थी कि वह अपने को ज्यादा काबिल समझती थी ? क्या इसीलिए वह इन घटिया लोगों को तरजीह नहीं देना चाहती थी ? क्या वनमाला की इसी उपेक्षा और अकड़-भरे स्वभाव से लोग उसके आलोचक थे । वैसा था तो मैं भी, लेकिन तब क्यों सारी महिलाएं, लगभग सारा स्टॉफ मेरी इज्जत करता था । न जाने वे कौन से कारण रहे होंगे कि लोग वनमाला को नाकाबिल, उपेक्षणीय समझते थे और मेरा उसे तरजीह देना उन्हें नहीं भाता था । बहुतेरे मुझे इशारों में संकेत भी करते कि उस वनमाला में क्या है, जो में उसे देता तरजीह देता हूं ?

सारा कुछ देखते-बूझते भी वनमाला मुझे दिनों-दिन आकर्षित कर रही थी । मैं उसके प्यार में पागल हुआ जा रहा था । निश्चित ही बुद्धि और समझ दोनों में औरों से वह बहुत आगे और मेरे करीब थी । उससे हर विषय, हर पक्ष पर भावना और बुद्धि की इतनी बातें मेरी होती थी कि मैं हर बात में उसकी तारीफ करता था । वनमाला और मैं जैसे एक दूसरे का स्वप्न थे । हम दोनों एक-दूसरे को अपना पूरक मान अपने संबंधों पर गर्व करते थे । वह नहीं चाहती थी कि मैं कभी किसी और को अपने नजदीक रखूं या उसे छोड़ किसी की तारीफ करूं । यह एक स्वतः-स्फूर्त संबंध और दिलो-दिमाग का राजीनामा था कि हमारे समतुल्य खुद हमारे अलावा कोई और हो ही नहीं सकता था । इसीलिए मेरा या उसका एक-दूसरे से छीना जाना न उसे पसंद था, न मुझे । लेकिन तब भी यह रहस्यमय था कि वनमाला आखिर मेरी तरह साफ और बेझिझक किसी निष्कर्ष पर कभी क्यों नहीं पहुंच पाती थी । एक तरफ अपने घर की जिंदगी से मुक्ति की छटपटाहट और मुझ से दिल लगाने की चाहत वनमाला में थी । फिर दूसरी तरफ दैहिक संबंध और संभोग के नाम से चिड़चिड़ाहट, उदासी भरी अन्यमनस्कता भी थी । आखिर वह ठीक-ठीक क्या चाहती थी ? वनमाला को समझ पाना मुश्किल था । ठीक मौका आने पर वह सिकुड़न भरा माथे का पशोपेश , चेहरे पर उभर आई गंभीर उदासी, और अनमने भाव से भरी कहीं दूर अज्ञात में खोई जाती वनमाला की पीड़ा भरीदृष्टि- इन सब में क्या था ?

अक्सर मुझे संदेह होता कि कहीं गहरे अतीत में उसका कोई भयानक अनुभव तो नहीं था ? क्या ऐसा हो सकता है कि किशोरवय में ही घर या बाहर के किसी परिचित ने उससे अप्रत्याशित और बलात्‌ संभोग की चेष्टा की हो, जिससे वह अचानक दुचित्ता, मनोरोगी औरत में तब्दील हो जाती थी । मानो यह उसका वह रहस्य ही था, जिसका तिलस्म मुझे और अधिक उसकी ओर खींचता था । मैं उसे तोड़ना चाहता था, समझना चाहता था। वनमाला को मैं उसकी संपूर्णता में ,उसके मन और देह के साथ हासिल करना और भोगना चाहता था ।

हम दोनों के बीच यूं ही लुका-छिपी चलती रही । मैं आतुर था कि एकबारगी हम दोनों खुल जाएं । मैने ठान लिया था कि जो भी हो, सारी बातें दिल की कहकर वनमाला को मैं अपने पास खींच लाऊंगा । इधर संस्था का माहौल ऐसा था कि खोजी निगाहों और कामकाजी वातावरण में दिल की बातें बहुत फुरसत से हो न पाती थीं। उधर वनमाला का घर ऐसा कि हमेशा भय और आशंकाओं को दावत देता नजर आता । मुसीबत ही मुसीबत थी। राह निकालना कठिन था।

बाबा रे, इतना प्यार कि बूढ़ी हो जाने पर भी न छोड़ोगे

''बाबा रे, इतना प्यार कि बूढ़ी हो जाने पर भी न छोड़ोगे । मुझे मार डालोगे क्या ?''

सारा कुछ तो आप कह देते हैं और मैं जान लेती हूं ।

प्यार की चिठि्‌ठयों से क्या फायदा ?''

वे दिन नए वेतनमान के लिए आंदोलन के थे । धरनों और जुलूसों का माहौल था। इलाके के अलग-अलग हिस्सो में बारी-बारी सामूहिक धरने का कार्यक्रम तय हुआ था। उन दिनों मैं अपनी यूनियन का रसूखदार लीडर था । वनमाला को मैंने राजी कर लिया था कि इलाके के तयशुदा दूरस्थ संस्थान के बाहर पहले दिन ही वह, मैं और नीलांजना धरने पर बैठेंगे ।

वनमाला से उस सुबह फोन पर मैंने बात की थी- ''मैं तुम्हारे यहां पहुंचूंगा, तुम वहीं नीलांजना को भी बुला लो, साथ चलेंगे ।''

उसने पहले तो खुशी में 'हां' कह दी, लेकिन तुरंत बाद जैसे कुछ सोचा हो, कहा कि ''नहीं, मेरे घर आना ठीक न होगा । आप पहुंचियेगा, मैं भी सीधे पहुंच जाऊंगी । वनमाला को अवश्य यह अंदेशा था कि मेरे वहां पहुंचने और मेरे साथ उसके जाने से घर में बवाल मच सकता है ।

मैं खुश था कि बाहर हमें साथ रहने, पास आने और जी भर निर्भय बातें करने का अच्छा अवसर रहेगा । वनमाला मेरी खुशी में शामिल थी । ठीक समय पर किस्मत ने धोखा दिया । इच्छा के विपरीत मुझे प्रतिनिधि के रूप में इस बार दिल्ली जाना पड़ा । मैंने वनमाला को उसके घर फोन करके अपनी मजबूरी बता दी थी और कहा था कि लौटते ही हम मिलेंगे । मैंने कहा था कि उससे दूर रहकर मुझे उसकी याद बेचैन करती रहेगी ।

मैं चला तो गया था लेकिन वनमाला की यादें थीं कि चौबीसें घण्टे बेकरार करती थीं । चिटि्‌ठयां लिखता वनमाला के नाम और हर चिट्‌ठी अधूरी लगती ।ट्रेन में, प्रवास पर मैंने उसे याद कर अनेक चिटि्‌ठयां लिख डालीं । अब मेरे मन को रेल से उतरकर बोरिया-बिस्तर सहित वनमाला के पास पहुंचने की बेचैनी थी । तीन दिन बाहर रहकर लौटा तो बजाय अपने घर जाने के ठीक उस सब-स्टेशन पर उतर पड़ा, जहां से हमारा संस्थान करीब था । नजरों की यह चाहत लिये कि शायदवह मिल जाए, उसकी एक झलक देख लूं धड़कते दिल से मैं कॉलेज पहुंचा ।

मैंने कल्पना की थी कि ठीक उसके निकलने से पहले मैं पहुंचूंगा और उससे आंखें चार होंगी, लेकिन व्यर्थ । मैंने उसे ढूंढ़ा पर वह न मिली । हमारे पास साथ बैठने टाइम-टेबिल कमिटी के काम का बहाना भी था। पता लगा कि वनमाला नहीं आई थी या आकर चली गई है, वगैरह । अगले दिन सुबह-सुबह दोगुनी बेचैनी में भागता नौ बजे मैं कॉलेज पहुंचा । एकांत हो, इसलिए प्रिंसिपल के बड़े कमरे में जो अलग-थलग और खाली था, कोने की वर्क-टेबिल पर कागज फैलाए मैं जम गया था । सुबह-सुबह भीड़ न होने के बावजूद औरों के सामने वनमाला को चलकर साथ बैठने के लिए कहकर अपनी आतुरता व्यक्त करने की बजाय मैंने नीलांजना से संदेश भिजवाया कि फुरसत मिलते ही वनमाला मेरे पास आ जाए । टाइम-टेबिल को अंतिम रूप देना है ।

मैंने देखा दो कमरों के बीच के द्वार पर परदे से झांकती वनमाला प्रकट हुई । उसका चेहरा खिला था । उसने कहा कि नीलांजना से आपका संदेश मिल गया था । वह मेरे सामने बैठ गई । मैंने उलाहना दी।

''वनमाला कल दिल्ली से लौटकर बजाय अपने नगर पहुंचने मय सरो-सामान मैं बीच के अपने इस अपने उपनगरीय स्टेश न पर ही उतरा और सीधे यहां आया कि अपनी प्रिया की एक झलक देखॅूं, लेकिन तुम मिली नहीं ।''

उसने कहा ''कल तो मैं आई ही नहीं थी ।''

फिर अंदर ही अंदर खुश होती लेकिन चुलबुली शिकायत में वनमाला ने आगे कहा- ''आप यूं ही मुझे खुश करने कह रहे हैं । मुझे भला आप क्यों याद करने लगे ? अपनी ड्‌यूटी लगाने आप आ गए होंगे और बहाना मेरा बना रहे हैं ।''

मुझे बुरा लगा । उसकी आंखों में डूबता मैं बोला-

''प्यारी वनमाला यूं अविश्वास करके, मुझे दुःखी करके तुम्हें खुशी होती है ? फिर पूछा ''बताओ उस दिन 'हां' कहकर तुमने अपने घर आने से फिर मना क्यों कर दिया ?''

''जिस लिए आप घर आते वह तो रोज यहीं हो जाता है । मेरा चेहरा तो यहीं आप देख लेते हैं, घर आकर ही क्या करेंगे ? वहां इतनी सुविधा रहती ही कहां है ''

वनमाला ने आगे कहा- ''मेरे मिस्टर बीमार थे, तब आना था । तब क्यों नहीं आए ? बाद में आप के आने से वो क्या समझते ? यही कि मैं बीमार पड़ा तो याद नहीं आई और इसे देखने ये जब भी हो मेरे घर चले आते हैं । आप सोचते थोड़ा भी नहीं ।''

मैंने बताया कि मैं तो जाना चाहता था, लेकिन भोलाराम ने मेरी इच्छा जानते ही बड़े साहब के सामने टोक दिया कि क्या करोगे जाकर बिना बुलाये ? फालतू वहां क्यों जाते हो ? मैने वनमाला से पूछा- ''तुम्हीं बताओ मैं क्या करता ?''

मेरी कमअक्ली पर वनमाला का मन जरूर तरसा होगा । उसने मन ही मन कहा होगा- ''मेरे करीब रहना चाहते हो और, तरकीब भूल जाते हैं ।''

हम दोनों के बीच चंद बातें हुई । मैने उसे बताया कि किस तरह मैं उसे हर-पल याद करता रहा । हर-पल किस तरह वह मुझे बेचैन करती रही । हंसकर वह बोली ? ''रहने दीजिए, आप झूठ बोलते हैं ।''

वनमाला ने कहा- ''बताइये क्यों बुलाया है ? स्टाफ-रुम में अनुराधा मैडम बैठी हैं । सोचती होंगी कि न जाने आप के साथ मैं यहां क्या कर रही हूं सूने में ।''

हंसते हुए मैने भी जवाब दिया- ''क्या करूंगा तुम्हारी याद के सिवाय । टाइम-टेबिल तो बहाना था, दिन-रात बैठा तुम्हें प्रेम-पत्र लिखा करता हूं ।''

''झूठ'' उसने कहा। ''मुझे क्यों कोई प्रेम-पत्र लिखेगा । मैं अब प्रेम-पत्र लिखने लायक कहां रही ? दो बच्चों की मां, अधेड़ । मुझमें अब वो बात कहां कि आप प्रेम-पत्र लिखें ।''

''अच्छा ! कहां है दिखाइये।'' वनमाला के कहने पर मैंने वह खास खाकी सरकारी पुराना लिफाफा उठाया और उसे वे पांच पत्र दिखाए जो उसके लिए ही थे ।

उसने केवल एक झलक देखकर ही जान लिया कि मैने सच बात कही थी । उसका चेहरा सुर्ख हो चला था । झिझकते हुए मंद स्वरों में उसने कहा- ''रहने दीजिए न इन्हें । सारा कुछ तो आप कह देते हैं और मैं जान लेती हूं । प्यार की चिठि्‌ठयों से क्या फायदा ?''

उसने उठने की आज्ञा चाही और चल पड़ी । मैंने पीड़ा भरी शिकायत उससे की -''वनमाला तुमसे कुछ छिपा तो है नहीं । ये अदा तुम्हारी पुरानी है । ठीक है तुम्हारी मर्जी नहीं है तो रहने दो । मन तुम्हारा है । मेरा तुम पर क्या हक है कि तुम्हें मजबूर करूं ।''

वह ठिठकी, मेरी आंखों की उदासी को उसने पढ़ा और कहा- ''आप से मैं क्या कहूं ? मेरी मजबूरी तो आप समझते नहीं ।''

''वनमाला मैं सब समझता हूं, लेकिन तुम जैसी भी हो, जो भी हो, मेरा मन तुम पर मरता है । तुम अधेड़ हो, बूढ़ी हो जाओ, तब भी मैं तुम्हीं पर जान देता रहूंगा ।''

वनमाला हंसकर बोली- ''बाबा रे, इतना प्यार कि बूढ़ी हो जाने पर भी न छोड़ोगे । मुझे मार डालोगे क्या ?''

वनमाला ने मेरे हाथ से लिफाफा ले लिया । मैंने आग्रह किया कि वह यहीं पढ़ ले, लेकिन वह बोली- '' मैं फुरसत से पढ़ूंगी। यहां पढ़ने में देर हो जाएगी ।'' मैंने आगाह किया कि याद रखना, यह मेरे और तुम्हारे बीच की बात है, सार्वजनिक नहीं । संभालकर रखना ।''

''मैं जानती हूं । निश्चिन्त रहिए । कोई भी नहीं देखेगा । फिर यूं भी इस लिफाफे पर शासन के सचिव का पता लिखा है । पुराना है इसलिए कोई न पूछेगा ।''

कुछ देर बाद एकांत से रुखसत हो मैं स्टाफ-रुम में पहुंचा । मैंने देखा कि अनुराधा के बगल में ही कुछ दूरी लिए वनमाला बैठी थी । दूर से ही मुझे अपने अक्षर और कागज पहचान में आ रहे थे, जिन्हें वनमाला पढ़ रही थी । मुझे आया और देखता जान वनमाला ने झटपट कागज लिफाफे में डाले और थैलानुमा पर्स में उसे रखकर चल पड़ी ।

उसके जाने के बाद अनुराधा ने अर्थपूर्ण नेत्रों से मुझे देखते कहा- ''प्रियहरि, मुझे आप से कुछ कहना था। मैं बाद में कहूंगी ।''

उसका कहना ही काफी था । मैंने अनुमान लगा लिया कि माजरा क्या होगा ? जरूर वनमाला ने अपने गर्व में चुहल से अनुराधा को वे पत्र दिखाए होंगे या खूबसूरत अनुराधा को जलाने वाले अंदाज में अपने जादू की बात छेड़ते व्यंग्य के अंदाज में कोई संकेत किया होगा। मैं समझकर भी चुप रहा . औरत की आदत ही ऐसी होती है . ज़रा सी तारीफ आशिक के मुंह से निकली नहीं कि वह अपने को अखबार बनाए अपनी संगिनियों के बीच फ़ैल जाती है.

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संबंध क्या हैं ? स्मृतियां ही तो संबंध हैं।

वही पुल बनाती है - दो दिलों के बीच ।

रिश्तों और विश्वास का एक नाजुक धागा था, जो विपरीत परिस्थिति में भी हमें जोड़े रखता था।

अगले दिन वनमाला और मैं अकेले ही कमरे में थे । उसकी मुद्रा गंभीर थी । मैंने पूछा- ''वनमाला पत्र पढ़ लिए । उसने कहा- ''मैने एक ही पत्र पढ़ा, आगे हिम्मत न हुई । बाप रे ! मैं तो उसे ही पढ़कर बेचैन हो गई । न जाने कैसा-कैसा लगने लगा । आप ने क्या-क्या शिकायतें लिख दी हैं । मैने आप का क्या बिगाड़ा है, कब भला आप का अपमान किया है ?''

मेरे पत्र निहायत व्यक्तिगत और आत्मीय थे । वनमाला से वनमाला के मूड, अकल्पित व्यवहार अपनी दीवानगी और उसकी बेरुखी की जिन शब्दों में मैंने शिकायत की थी, वे बेचैन कर देने वाले ही थे । सच कहूँ तो यह कि आशिक की सफलता ही उस तरकीब में छिपी होती है जो मासूका को बेचैन करती पिघलाकर रख दे. यानी मैं सफल हो चुका था. ईमानदारी से सारे पत्र वनमाला ने मुझे लौटा दिए ।

अनुराधा से बाद में मैंने टोहना चाहा कि आखिर वह कौन सी बात है, जो वह कहना चाहती थी, लेकिन वह टाल गई । अपने मन का संदेह मौका देख काफी दिनों बाद एकांत पा वनमाला के सामने मैंने रख दिया । मैंने पूछा कि क्या मेरे वे पत्र तुमने अनुराधा को दिखाए थे या उस पर उसने कोई चर्चा की थी ?

मुझे वनमाला पर संदेह था, जो अकारण नहीं था । मैंने पूछा कि क्या तुमने आपस की बातें कभी भोला से भी कहीं थीं । परीक्षा के दौरान भोला का बीच में आना और वनमाला की सफाई कि 'इनके कहने पर तो खासतौर मुझे उनके साथ मत रखा कीजिये' मुझे याद थी ।

वनमाला ने आश्वस्त करते हुए गंभीरता से कहा- ''आप बेकार संदेह क्यों करते हैं ? मैं न अपनी बातें किसी से बताती हूँऔर न कभी बताऊँगी ।''

उस दिन मैंने फिर वनमाला को समझाया- अपने मन की पीड़ाएं उससे कही । हम दोनों के बीच उस दिन विश्वास में वादा हुआ कि एक-दूसरे पर हमारा विश्वास गोपनीय और सुरक्षित रहेगा । हमारे विश्वास के बीच कोई कभी नहीं आएगा । अकेलेपन की आत्मीयता में वनमाला सदैव की तरह अपनी उदासी, पशोपेश और चेहरे पर उभर आए तनाव के साथ इसी तरह पेश आती थी । उसकी विचित्र मुद्रा और गंभीर रहस्यमयता को समझना कठिन था ।

वनमाला के साथ मेरा संबंध विश्वास और अविश्वास, प्यार और विग्रह के बीच झूल रहा था । उसके बदलते स्किजोफ्रेनिक मूड से मैं अक्सर परेशान हो जाता । उसके होठों पर मुस्कुराहट ईद के चांद की तरह ही दुर्लभ थी । यह मेरे चित्त के लिए एक समस्या और शोध का विषय बन गया था कि हमेशा परेशान, गंभीर, उदास और चिड़चिड़ी वनमाला से मैं कैसे पेश आऊँ ? मन को मारता कई बार मैं सोचता कि जिस संबंध का भविष्य ही नहीं नजर आता उससे मैं दूर क्यों नहीं हो जाता । तब मेरा मन मुझे समझाता कि वनमाला की अपनी समस्याएं हैं । स्त्री की अपनी विवशताएं और जटिलताएं होती हैं । वह घर से उदास है - ठीक तुम्हारी ही तरह। उसमें मुक्ति की वह छटपटाहट भी है, जिसके पीछे स्वतंत्रता के स्वप्न हैं-ठीक तुम्हारी तरह । उसे समझाने और मनाने, साथ देने की जगह केवल इसीलिए छोड़ जाना कि तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं, क्या अन्याय नहीं होगा ? इसके अलावा यह भी कि जब-जब निराश मैं उससे दूर होने की कोशिश करता, अचानक एकांत के ऐसे पल आ जाते, जो वनमाला के साथ का मीठापन, विश्वास और आत्मीयता फिर से भर जाते थे । सच तो यह है कि परिस्थितियां ऐसी ही थीं, जिसमें न हम पास आ पा रहे थे और न दूर जा सकते थे । रिश्तों और विश्वास का एक नाजुक धागा था, जो विपरीत परिस्थिति में भी हमें जोड़े रखता था।

वनमाला से फुरसत में अपनी बात कहने या अपने दिल का शिकवा जाहिर करने की हरचंद कोशिश मेरी होती । वनमाला की यह खासियत थी कि घर के झंझटों और झगड़ों को वह कभी उजागर नहीं करती थी । पूछो तो यह कहकर टाल जाती कि छोड़िए न, जो होना है होता रहना है । घर के मामले मैं संभाल लेती हूं, कोई खास बात नहीं है । फिर भी ऐसे क्षण यदा-कदा आते जब वह अपनी मजबूरियों पर खीझती कहती- ''आप का क्या है । यहां थोड़ा सा काम है । आप मजे से लिखते-पढ़ते और मोहब्बत फरमाते हैं, मुझे तो पहर हुए उठना पड़ता है । फिर हर चीज में खोट निकालने वाले अपमानित करने वाले मिस्टर के लिए नाश्ता बनाना, बच्चों का टिफिन बनाना, उन्हें स्कूल भेजना होता है । यहां से जाकर मिस्टर के लिए खाना बनाना, बच्चों को देखना होता है । उनकी ड्‌यूटी सुबह होने पर कभी-कभी तो यह पाती हूं कि बच्चे बस्ता लिए ताला बंद घर के सामने सूखा सा मुंह लिए मेरे इंतजार में बैठे होते हैं ।''

वनमाला अक्सर कहा करती- ''छोड़िए न मुझे । भूल जाइए आप मुझे। मेरी किस्मत में वह सब नहीं लिखा है, जो आप चाहते हैं । क्यों आप मेरे पीछे अपनी प्रतिभा और समय बरबाद करते हैं ?''

यही तो वह साधारणताएं और जटिलताएं थीं जो आम स्त्री-पुरुष की विवशताएं होती है । मैं उस पर और ज्यादा मर मिटता । वह मुझे और निकट और घर की मालूम होती । मैं भूल ही जाता कि वनमाला किसी और की पत्नी है । रुठने-मनाने झगड़ने और एक-दूसरे पर अधिकार के संबंध इस प्रकार हो चले थे कि हम यूं व्यवहार करते जैसे लाचार विवशता के क्षणों में हम पति-पत्नी के रूप में करते होते । कभी-कभी वह कह भी जाती- ''अच्छा आप तो यूं कह रहे हैं, जैसे आप मेरे हसबैन्ड हों ।''

सच भी यही था कि एक स्त्री अपने पति से जिस आत्मीयता और उस पर जैसे मन भरे अधिकार की अपेक्षा रखती है वह उसे मुझसे ही सम्पूर्णता में मिला करती थी. ऐसे ही वे क्षण हुआ करते जो उससे दूर जाते निराश मन को और अधिक तेजी से खींचकर उसके पास जा फेंकते । उसे प्रसन्न करने और रखने का मौका ढूंढ़ता मैं अनेक फितरतें करता और सोचता कि मैं चालाक हूं । बाद में पता लगता कि मेरी चालाकी मेरा उतावलापन थी। वह ऐसी भूलें कर जाती कि बनते संबंधों को बिगाड़ जाती और वनमाला को परेशानी में डाल जाती थी । प्रायः बातों-बातों में मैं वनमाला से मालूम कर लिया करता कि उसके पति की ड्‌यूटी सुबह या शाम किस शिफ्ट में चल रही है, ड्‌यूटी की शिफ्ट किस दिन बदला करती है, छुट्‌टी कब रहती है वगैरह । इससे मैं अनुमान लगा लेता कि घर पर लाइन कब साफ है । यह जरुरी नहीं था कि उसके पति की ड्‌यूटी या शिफ्ट, उसकी छुट्‌टी का नियम हमेशा मेरे अनुमान के मुताबिक हो और यहीं हादसे के बीज पड़ा करते थे ।

उस दिन भी दोपहर वनमाला को फोन कर बैठा था । दूसरे दिन वनमाला आई तो मैंने देखा कि आंखें उदास और मुंह सूजा हुआ है । वह तनावग्रस्त और गंभीर थी । स्टॉफ रुम में मैने जब प्रवेश किया तो पाया कि वनमाला अकेली ही बैठी थी । मैने देखा कि ज्यों ही मेरा पहुंचना हुआ, इससे पहले कि मैं कुछ बात करता संशोधित समय-सारिणी बनाती वनमाला ने मुझे घूरकर तेज नजरों से देखा और उपेक्षापूर्वक सारे कागज-कलम छोड फौरन बाहर निकल गई । वह नाराज थी और मैं पशोपेश में था । कुछ देर बाद वह उसी मुद्रा में लौटी और कागज-कलम झटपट बैग में डाल घर के लिए निकल पड़ी ।

उदास मन मैंने उससे इतना ही कहा- ''वनमाला, तुम नाराज़ हो न ! केवल इसीलिए कमरा छोड़ कर चली गई कि कहीं मैं तुमसे बात न कर लूं ।''

वह निकल पड़ी झटके से । उसने कहा था- ''आप चाहे जो समझ लें ।''

मैं समझ गया कि मेरे फोन के वक्त उसके पति घर पर थे । जरूर उसने शंकालु पति के दुर्व्यवहार की ज़िल्लत उठाई है । सिवाय मुंह लटकाए अफसोस करने कि मैं और क्या करता ।

संबंध चाहे अच्छे हों या बिगड़ जाएं, वे संबंध ही होते हैं । हर हालत में एक टीस तो होती ही है । संबंध क्या हैं ? स्मृतियां ही तो संबंध हैं। वही पुल बनाती है-दो दिलों के बीच । वनमाला अब मुझसे बचने लगी थी । बात या तो करती न थी, या फिर टाल जाती थी । एकांत को टाल वह स्टॉफ रुम से बाहर यहां-वहां बैठ समय गुजार लेती थी । एक जगह होते और एकांत मिलता भी तो एकाध बार अनमने मन से नाराज, शिकायत भरी आंखों से देखती और विमुख हो जाती । और कुछ न मिला तो अखबार हाथ में फैला यूं बैठ जाती कि चेहरा उसमें गुम हो जाये और मेरी आंखें उसे देख न सकें ।

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वनमाला जो बाहर है उसे न देखो,

अंदर उन पलों के एकांत में झांको और वनमाला के प्यार भरे मन को देखो ।

निराशा , उदासीनता और अवसाद से मेरा मन व्यथित था । मैं सोचता था कि ऐसे प्यार से क्या फायदा जिसका कोई अंजाम न हो और जो किसी को नाराजगी और नफरत से भर देता हो । अपना प्यार, अपनी पीड़ा मन में छिपाए मैं भी वनमाला से कटने लगा था । मन था कि दिन-रात उसकी यादों को उधेड़ता और बुनता लेकिन वह केवल वार्तालाप और उन रचनाओं, डायरीनुमा अनुभवों में होता जिन्हें वह किसी दिन किसी तरह उसके नाम कर मुझे दृश्य से हट जाना था । लेकिन कहां ऐसा हुआ ? वह तो केवल मेरे दुर्दिनों का मध्यांतर था । ऐसा कहां संभव था कि एक ही जगह, एक ही साथ हम रहें और एक-दूसरे के चित्त एक दूसरे में संक्रमित न हो । बहरहाल, उस समय मेरी स्थिति वैसी ही थी,। मन को मारे अपने निर्णय पर मैं भी कायम रहा आता । सब जानते थे, लेकिन दूसरों पर अपनी ओर से अपनी पीड़ा मैने कभी उजागर नहीं की । स्टॉफ में महिलाएं और भी थीं, वनमाला से सुंदर, सरल और खुले स्वभाव की-जिनसे मेरे सहज संबंध थे । मंजरी का जिक्र मैं कर चुका हूं, फिर नीलांजना, श्यामा, नेहा, अनुराधा, नंदिता, बाद में आई वल्लरी उर्फ गैरिकवसना, मंजूषा के बाद आई संध्या और भी आती-जाती अनेक । मेरा व्यक्तित्व, मेरी गंभीर भाव भरी खोई दृष्टि, मेरा सर्वतोन्मुखी व्यापक ज्ञान, सारगर्भित बातें, मेरी परिष कृत रुचियां, मेरा पठन-पाठन, रचनात्मक लेखन, कला-साहित्यिक-सांस्कृतिक की अपार रुचियां वैज्ञानिक सोच और कार्यप्रणाली-यह सब मिलकर ऐसी छबि बनाते थे कि मेरा साथ सबके लिए सहज आकर्षक था । यहां तक कि वनमाला के प्रति मेरे प्रशंसा-भाव और उससे मेरी निकटता से ही वे दृष्टियां प्रायः मुझे प्रश्नित करती कहती कि कहां और किस सनकी औरत के पीछे आप समय बर्बाद कर रहे हैं । मेरा पुरुष हृदय भी जाहिरा तौर पर इन औरतों को कभी-कभी अधिक तरजीह देता और उन्हें बांधे रहता था । वनमाला से नफरत के कारण नहीं, उसे चिढ़ाने और जलाने के लिए मैं वैसा करता था । पुरुष सहयोगियों में भी मैं पुराना और जाहिर तौर पर सर्वाधिक प्रखयात था । इसीलिए मुझे इज्जत दी जाती थी । वनमाला के प्रायः सभी आलोचक थे । उससे दूर रहते और मुझे दूर पा खुश होते थे । वह प्रायः सब से कटी रही । मुझसे वह खुद कहा करती थी कि मैं ऐसी-वैसी नहीं हूं, इन साधारण औरतों के साथ बैठना, बात करना मैं पसंद नहीं करती ।

वनमाला की बेरुखी के बावजूद उसका आग्रह याद कर उसे खुश रखने उसके लिए मैने लेख तैयार कर दिया था । वैसा करने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी थी । लेख विश्व-व्यापार के तंत्र और उसमें भारत के संकट से संबंधित था । क्या दिन और क्या रात मैंने महीने-डेढ़ महीने खूब मेहनत की और लगभग चौबीस पृष्ठों का अपना लेख पूरा किया । वनमाला का चेहरा हर पल मेरी आंखों के सामने होता। उसकी यादें हर पल मेरे लिए प्रेरणा का काम करती । मैं इतने लगन से भिड़ा रहा जैसे लेख का हर शब्द मेरे लिए वनमाला, वन्या का साकार जाप था । मेरा चित्त उसमें तल्लीन था । वह मुझे समझाता था कि वनमाला मायूस है, पशोपेश में है। तुम उसकी लाचारी को समझो कि वह क्यों वैसा करती है, जो तुम्हें बुरा लगता है । उसके मन में तुम्हारे लिए कोई मैल नहीं है । वह तो लोगों की निगाहें हैं, घर की मजबूरियां हैं, जो उसे वैसा बना देते हैं । मेरा मन मुझे समझाता कि तुम्हारे तो सब प्रशंसक हैं । तुम पुरुष हो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन उन मानसिक पीड़ाओं, तनावों, घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों की याद करो, जो उसे झेलनी पड़ती है । वह कहता कि वनमाला जो बाहर है उसे न देखो, अंदर उन पलों के एकांत में झांको और वनमाला के प्यार भरे मन को देखो । तुम्हारी आंखों में झांकती कुछ कह रही उसकी उन गहरी उदास आंखों को याद करो, जो तुमसे कह रही होती है कि मुझे भी तुमसे इतना ही प्यार है, जितना तुम्हें मुझसे है। लेकिन तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं ? जहां तक स्मरण है वह कानपुर गई थी उस पाठ्‌यक्रम के लिए जिसमें उसे अपने लेख के पढ़े जाने की उम्मीद थी । लौटी तो बोली कि इतनी मेहनत से उतना अच्छा लेख बना, लेकिन वहां तो लेख पढ़ने-पढ़ाने का कोई जिक्र ही नहीं था ।

शायद वह मई का महीना था, जब वह गई थी । उसकी बहुत याद मुझे आती थी । हर पल मैं उसकी कमी महसूस करता था । जी चाहता था कि उड़कर उससे जा मिलूं । लेकिन हाय, कि समाज और उसकी मजबूरी, पहचाने जाने और चर्चाओं का डर उसे भी था, और मुझे भी । कितनी लाचारी थी ? मैंने बीच में एक बार उसे फोन पर बात की थी । कहा था -'' मैं चाहता हूं इसी दौरान अखबार में छपे ताकि वहां लोग पढ़े, चौंके, और उसकी प्रतिभा की खूब तारीफ हो ।''

मैंने पूछा था कि क्या उसे यह पसंद आएगा कि उसके नाम के साथ मेरा भी नाम संयुक्त रूप से लेख में हो ताकि हम दोनों को यह एहसास रहे कि हमारा साथ कितना अच्छा, नाम-कमाऊ हो सकता है ।

वनमाला ने तब बड़ी सरलता से कह दिया था- ''भला मुझे क्यों आपत्ति होगी ? मैं तो आप की एहसानमंद हूं कि इतनी बड़ी प्रतिभा मेरे साथ है । मुझे कोई आपत्ति नहीं है । अपना नाम भी दे सकते हैं ।''

उसकी स्वीकृति के बावजूद मैंने वैसा नहीं किया, क्योंकि मैं जानता था कि मेरे नाम का वनमाला के साथ जुड़ना लोगों में शक पैदा करेगा और उसका नाम पीछे रह जाएगा । तब तो नहीं, एक सवा महीने बाद लेख एक-एक कर चार किस्तों में छपा था । हर किस्त पूरे दैनिक अखबारी पेज का आधा घेरती थी ।

मुझमें जैसे वनमाला का अस्तित्व ही समा गया था । पहली ही किस्त गयी तो उसका नाम देखकर मैं यूं प्रसन्न हुआ जैसे मेरा नाम हुआ हो । हां, ऐसा था तो । उसके लिए मेरी मिहनत रंग लाई थी । जी चाहता था कि उड़कर पहुचूं और उससे लिपटकर उसकी उदास, भूरी आंखों में झांकूं ताकि हमारी खुशियॉं घुल-मिल जाएं । लेकिन मजबूरी । मैं रोज की तरह सुबह साढ़े नौ बजे पहुंचा तो पाया कि वनमाला दक्षिण में दीवार से लगी अपनी जगह बैठी है । उसकी आंखों में उदास खुशी की चमक थी, लेकिन साथ बैठी उसकी साथियों या दीगर पुरुष-स्टाफ की आंखों में कोई प्रतिक्रिया नहीं थी । अनुराधा वहां बैठी थी । उसने खीझ और शिकायत भरी एक नजर मुझ पर डाली । मुझे उम्मीद थी कि वहां चहल-पहल होगी । वनमाला को बधाइयों का अंबार लगा होगा । प्रिंसिपल उसे बुलाकर तारीफ करेगा । कॉलेज के लड़के-लड़कियां उस पर प्रशंसा से झूमेंगे, लेकिन वैसा कुछ न था । था तो केवल स्टॉफ की आंखों में झांकता एक तटस्थ भाव, जो यह बता रहा था कि वे असलियत जानते हैं । तारीफ की जगह उन आंखों में वनमाला के लिये बेरुखी, वितृष णा और नफरत भरी थी । मुझे वैसी प्रतिक्रिया अच्छी न लगी । एकांत में हम मिले तो वनमाला ने बताया था कि स्टॉफ में तो एक ने भी उससे उस बारे में बात तक नहीं की । हां, सुबह-सुबह उसे जानने वाले पारिवारिक परिचितों की कुछ ताजगी भरी बधाइयां और शुभकामनाएं घर में फोन पर मिली थीं ।

मैने वनमाला से पहले ही कहा था कि कोई पूछे तो कहना कि लेख उसने खुद तैयार किया है । उस विषय में केवल चर्चाएं मुझसे होती थीं, बहसें होती थीं। उस तरह प्रेरणा और मार्गदर्शन मात्र में मेरा सहयोग था । लेख मैंने जब उसे विस्मित करने मई में उसके जाने से पहले ही लिख और उसी के अनुरोध पर बाकायदा टाइप भी कराके तैयार सौंपा था, तभी उसने स्टॉफ में अनेक को दिखाया था । लेकिन तब भी 'अच्छा है' की ठंडी प्रतिक्रिया स्टॉफ से मिली थी, जिसमें वितृष्णा की वह मुस्कान शामिल थी जो कहती कि ''रहने दो, तुम क्या बता रही हो ? सारा रहस्य हमें मालूम है।''

वनमाला में मेरी आंखें अपार प्रतिभा देखती थीं । उसका साथ मेरे लिए प्रेरणा था और स्वप्न भी । उसके साथ मैं हमेशा चाहा करता कि काश सदैव के लिये हम साथ हों । मेरी रचनाओं में वह बसी रहे और वनमाला की रचनाएं उसके उस स्वप्न को साकार करें जो मेरी आंखें उसके लिए देखती थीं । हम दोनों इस मामले में हम-खयाल और हम-पसंद थे । तब भी वनमाला को जहां मैं प्रेरित करता कि वह निर्भय हो, खुलकर मेरे साथ आ जाए, लोगों की आलोचनाओं का जवाब दे और हमारा साथ निर्द्वन्द हो, वहां वनमाला खुद अपने को असहाय और लाचार पाती थी । उसमें आत्मविश्वास जगाने की मेरी कोशिश निष्फल हो जाती थी । वह सोचती, वैसा करने का भावुक निर्णय लेती, लेकिन घर और बाहर के दबावों से फिर टूट जाती थी ।

किस्तों पर किस्तें छपती गयीं । वनमाला मुझे देखती, लेकिन वही उदास नजरें उसमें मैं देखता । जिस लेख से उसे तारीफ और यश की उम्मीद थी, वह उसके लिए लोगों की ईर्ष्याऔर नफरत का कारण बन गया था । संदेह की आशंका को टालने उसने भय से पहले ही घर में कह दिया था कि मैं उसकी मदद कर रहा था, मैंने वह लेख उसके लिए तैयार किया था । तब भी विश्वास जीतने की उसकी आशा तब धूमिल हो जाती जब उसका पति अपनी खीझ और शिकायत से उसे प्रश्नित करता । लेखों के छपने के बाद एकाध बार कभी वनमाला के घर पर बैठा था। चर्चाओं के बीच वनमाला की तारीफ करते वक्त मैने वह सारा कुछ पढ़ लिया था, जो ऐसे मौकों पर मेरी उपस्थिति और प्रशंसा के दौरान मेरी प्रिया के पति की आंखों और उसकी भारी ऊबड़-खाबड़ आवाज में लिखा होता था ।

बाद में वनमाला ने स्पष्टत: खुलासा करते मुझसे कहा था कि- ''आप क्या समझते हैं कि मेरे मिस्टर आप से मेरी तारीफ सुनकर खुश होते हैं ? गलतफहमी छोड़ दीजिए । उस दिन जब आप मेरी तारीफ किए जा रहे थे, तब उन्हें बुरा लग रहा था और मन ही मन वे चिढ़ रहे थे । उन्हे ईर्ष्या हो रही थी। उनका बस चले तो पी-एच.डी. की बात दूर रही, नौकरी छुड़ा वे मुझे घर बिठा दें ।''

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सर्पयुग्मों की रचनात्मक रेखाकृति : मंगल-परिणय

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'जब मैं और आप हैं तो तीसरे की जरूरत क्या ?”

वनमाला जैसी भी थी मुझे कुबूल थी । फिर भी कभी-कभी मेरा मन इस बात के लिए दुःखी होता, अफसोस करता कि अपने दबावों और दूसरों के खयालों के खयाल से मुझे अनदेखा क्यों कर जाती है । मुझे बहुत बुरा लगा जब पूरा लेख तैयार कर मैने उसे सौंपा था और वह थी कि अपने लेख पर, जाने की तैयारियों पर मेरे ही सामने चहकती हुई गैरों से बातें कर रही थी और मौन मैं उसे देखता रहा था । इतनी अवसादग्रस्त और कंजूस कि निहायत तटस्थ और सूखे धन्यवाद के कुछ शब्दों को छोड़कर, जो बड़ी जल्दी में मानों भय में परोसे गए थे, उसने कोई बात न की थी । काश, वह कभी समझ पाती कि उसके ऐसे उदास व्यवहार से मेरे मन पर क्या बीतती थी, जो उससे चौबीसों घण्टे बातें करने आतुर और उसकी एक झलक पाने आंखें बिछाए रहा करता था । मेरे मन को समझ पाने उसकी पर्वाह करने की जगह मुझसे निकटता के आभास को दूर रखने की चिंता उसे अधिक सताती थी । थोड़ी भी मुसीबत का भय उसे मुझसे दूर कर देता था । मैंने अनुभव से पाया था कि दो ही स्थितियां ऐसी होती थीं जब वनमाला मेरे साथ के मामले में सहज मूड में हुआ करती थीं । एक तो उन दिनों और क्षणों में जब उसके चित्त घर पर की अप्रिय स्थितियां और समस्याओं का दबाव न हो । दूसरे तब, जब पुरुषों खास तौर पर हमारे साथ पर गौर करने वाले मेरे और उसके वर्ग के समवयस्क कुछ पुरुष साथियों की निगाहों में वह मेरे साथ दिखाई पड़े । भोलाबाबू, उसके विभाग में चुटकुलेबाज कुटिलाक्ष, विभाग को लिफ्ट देने की बजाय औरों के साथ देखकर अप्रकट ईर्ष्या से भरा विपुल, समय-असमय स्थितियों को भाँपता और चुटकियां लेता चित्रकार वगैरह सारे इसी कोटि में थे । अन्य पुरुष साथी भी थे । वनमाला स्टॉफ में अपने को सब से अलग और काबिलतर समझती थी। इसीलिए मुझे छोड़ सारे उसके लिए प्रायः फालतू और सामान्य कोटि के लोग थे । वह मुझे मानती थी और मैं उसे। वह खुश थी कि उसके लिये मेरी चाहत और सद्‌भावनाओं ने उसकी काबिलियत पर मुहर लगा दी थी । औरतों की तो उसे खास तौर पर पर्वाह न थी । उनका मेरे इर्द-गिर्द फटकना भी नापसंद था, बात करने की बात तो दूर रही ।

कॉलेज में लिखने-पढ़ने गंभीर रचनात्मक क्रियाकलापों के प्रति प्रायः लोगों का रुझान नहीं था । दिया हुआ सरकारी काम सरकारी ढंग से ही निबटा दिया यही उनके लिए काफी था । मेरी दिलचस्पी एक ऐसी पत्रिका के प्रकाशन में थी जो कॉलेज के छात्रों और स्टॉफ की रचनात्मकता को प्रेरित और उजागर करे । प्राचार्य डॉ. नलिन जी मित्रवत और हमखयाल थे । उन्होंने मुझ पर विश्वास करके यह जिम्मा दे दिया था । मुझे पूरी छूट थी कि जिसे चाहे साथ रखूं । मुझे तो वनमाला पसंद थी । वनमाला से मैंने राय ली । मेरे साथ का हर काम उसे पसंद था । दिल-दिमाग, विचारों के तार ऐसे जुड़े थे कि किसी काम के करने ढंग, उसकी कल्पना पर बढ़-चढ़कर हम एक-दूसरे की तारीफ करते थे ।

मैने सुझाया- ''हम दोनों ही साथ रहे आए तो लोगों की निगाह में चुभेंगे । किसी तीसरे को साथ लें तो ?'' उसने दो टूक शब्दों में मुझसे कहा- ''आप चाहें तो वैसा कर सकते हैं, लेकिन मेरी शर्त यह है कि भोलाबाबू को आप ने रखा तो मैं आप के साथ नहीं काम करूंगी ।''

भोला से उसे न जाने क्या नफरत थी ? और-और नामों का खयाल मुझे आता रहा । एक-दो नाम मैंने सुझाए भी, लेकिन सहमति न मिली । वनमाला ने खीझकर कहा- ''जब मैं और आप हैं तो तीसरे की जरूरत क्या ? बेकार की बाधा ही रहेगी ।'' मैं उससे सहमत हुआ ।

जब-तब बैठते, बातें करते, रूप-रेखाएं बनाते हम दोनों ही काम करते रहे । किसी को कुछ भी लगता रहा हो, हमें पर्वाह नहीं थी । जाहिर है कि पत्रिका छपी और बढ़िया छपी । ठोक-पीटकर, सुधारकर, मनाकर हमने रचनाएं एकत्रित और संपादित की थीं । भोला का लेख मुझे ठीक-ठीक लगा था । मैंने कहा- ''इन्होंने तो उम्मीद से ज्यादा ही अच्छा लेख लिखा है ।''

वनमाला का मुंह बना- ''चोरी का काम है, तो अच्छा क्यों न होगा । खुद वे तीन लाइन नहीं लिख सकते । एक रोज आए थे । 'इंडिया टुडे' पत्रिका को मेरे यहाँ आकर मांग ले गए थे । उसी की नकल मार दी है । वह उसकी हंसी उड़ाती हुई बोली- ''ऐसे ही हैं, बौड़म टाइप के । एक रोज सुबह-सुबह डिब्बा ले पेट्रोल मांगने आ गए थे, गिड़गिड़ा रहे थे पेट्रोल के लिए ।''

मेरी समझ में भोलाबाबू के प्रति वनमाला की चिढ़ समझ से परे थी । चिढ़ का कारण यह भी शायद था कि भोला की समझ और बातें तर्क से परे, झूठी और गोलमाल होती थीं । वनमाला ही नहीं, सारे लोग उसका मजाक उड़ाते थे । दूसरे यह कि कुर्सी पर चाहे जो भी हो, भोला उसका पिठ्‌ठू हुआ करता था । उसकी ख्याति इसी रूप में थी । कई लोगों की शिकायत थी कि परीक्षाओं के कुछ रुपये उन्हें दिए नहीं गए थे । पहले ही करा लिए दस्तखत के साथ हिसाब भेजकर रुपये वह हजम कर गया था । एक रोज अपने मुंहफट स्वभाव के अनुसार मैंने वनमाला के सामने ही भोला को इसी वृत्ति के लिए फटकार दिया था । उसने वनमाला को नाराजगी से देखा था और झिड़की लगाई थी । वनमाला, नीलांजना और अन्य सभी को ऐसी शिकायतें थीं, पर मुंह खोलने से लोग संकोच करते थे ।

उस दौरान सब कुछ ठीक चला सिवाय इसके कि वनमाला की संगत और चाहत में जब-तब मैं सुबह, रात, दोपहर डरता-डरता भी घर या कॉलेज उसे फोन पर बैठता । कई बार मामला ठीक-ठीक रहता, लेकिन कभी-कभी यह फोन झगड़े का कारण बन जाता । उसका सूजा हुआ मुंह और बेरुखा गूंगापन उसका मूड मुझ पर जाहिर कर जाता था ।

पत्रिका में हमारी फोटो पृष्ठ के बीच में परस्पर आलिंगित सर्प-युग्मों की रचनात्मक रेखाकृति के साथ अगल-बगल छपी थी । जान-बूझकर मैंने वैसा नहीं किया था, बल्कि मुद्रक की वह अपनी समझ या शरारत थी । मुझसे तो किसी से ने कुछ नहीं कहा था, लेकिन जरूर उसके सामने लोगों ने इस पर चुहल की होगी । उसके घर भी उस पर तीर बरसे होंगे । पत्रिका की सफलता और उस पर गर्व तो पीछे रहे, वनमाला का उखड़ा मूड और सूजा चेहरा मेरे सामने आता था । मैंने कहीं एक रोज देखा था कि शरारत से किसी मनचले ने फोटो के ऊपर मंगल-परिणय लिखकर फाड़ फेंका था । यह अजीब सिलसिला था कि मेरे साथ से उभरती उसकी प्रतिभा मेरी छाया से ही वनमाला के लिए व्यंग्य और अपमान की वजह बनती जा रही थी । इससे पहले कि उसके होठ और उसका दिल खिले, वनमाला मुरझा जाती थी ।

रुठना और मनाना, प्यार और विग्रह हमारे बीच स्थायी नियम बन गए थे । एक रोज हम साथ बैठे काम कर रहे थे । वनमाला जानती थी कि मेरा उसके साथ बैठना काम के अलावा भी एक काम था । मैं उससे चुहल करता और मेरा मन उसे भी चंचल कर जाता । मेरी प्यार की बातों से विचलित वनमाला अपनी परिचित अदा से बोली- ''प्लीज़ नइॅं ना, ऐसे में काम कैसे होगा । मैं उठ कर चली जाती हूँ । अन्यथा न आप काम कर पायेंगे, न मैं ।''

वह जानती थी कि मैं किसी भी हालत में उससे दूर जाने वाला नहीं था । अधिकार का ऐसा आत्मविश्वास कि इस तरह मुझे दुःखी कर मजा लेना उसकी आदत बन गई थी । मैंने कहा- '' ठीक है मेरा साथ पसंद नहीं तो मैं ही चला जाता हूँ।''

मुझे उठता देख वह बोली- ''रहने दीजिए, मुझे मालूम है आप नहीं जाएंगे ।'' छेड़ की मुस्कुराहट उसके चेहरे पर थी । कहा- ''और फिर आप चले जाएंगे तो ये काम कौन कराएगा ?''

वनमाला की आंखों में झांकते मैने उदासी और क्षोभ से कहा- ''जाने क्यों मुझे चोट पहुंचा कर ही तुम्हें खुशी होती है । तुम अच्छी तरह जानती हो कि तुम्हारे बगैर में रह नहीं सकता । इसीलिये तुम ऐसा कहती हो । तुम अपनी जगह बनी रहो, मैं कभी न बदलूंगा । जो जगह मैंने चुन ली है, वहीं बना रहूंगा । मुझे ऐसा लगता है कि कुसूर मेरे प्रारब्ध के पूर्वजन्मों का है । याद रखना मेरी अंतिम सांस तुम्हारे नाम को साथ लेकर जाएगी । अगले जनम में भी ।'' वह मुझे चंचल नेत्रों और होठों की हल्की मुस्कान के साथ निहारती यूं देख रही थी जैसे उसके सामने मासूम बच्चा बैठा हो । मैं कह रहा था- ''याद रखो कि एक जनम तो क्या, अगले जनम में भी, जन्मों तक मैं तुम्हारा पीछा करता रहूंगा ।''

वह मजे लेती हंस रही थी ''अरे बाप रे ! तब तो आप मेरी मुसीबत हो जाएंगे ।''

इसी दौरान अनुराधा ने कमरे में कदम रखा । हम दोनों चुप हो गए थे । वनमाला का मुझे चिढ़ाने का मूड अभी बरकरार था । उस रोज वह खुश थी । उसके सामने प्रतियोगिता में छात्रों के लिखे निबंधों का बंडल खुला हुआ था ।

अनुराधा ने बातें करते फिर चुप होते हमें गौर कर लिया था । पूछा- ''क्या चल रहा है ?'' वनमाला ने चपल आंखों से मेरी आंखों में झांका और कहा- ''बता दूं, कह दूं अनुराधा मैडम से ?''

अनुराधा ने पूछा- ''क्या बात है ? कोई खास बात है क्या ?'' वनमाला ने शरारत से बात बदल दी । बोली- ''कुछ खास नहीं रे । ये निबंध देख रही हूँ। कितनी गलतियां करते हैं ? क्या लिखते हैं कुछ समझ में नहीं आता ।''

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क्यों-क्यों छिपाऊँ ? मैं तो इसे ऐसे ही ले जाऊँगी

तुम अपनी नाप की चप्पल छोड़कर बड़ी साइज के पीछे क्यों भागते हो ?''

नाजों और नखरों के बीच रूठने और मनाने के ढेर से प्रसंगों के बावजूद भी वनमाला उन दिनों मेरे साथ थी । जब हस्तक्षेपी और खोजी निगाहें न होती, लाईन क्लीयर होती तो यूं मौज होती जैसे सरल बच्चों की तरह हम साथ बैठ बजे कर रहे हों । परीक्षा शुरू होने के दिनों में खुद प्राचार्य नलिन जी हमारे ढाल थे । उन्हें वनमाला में कोई वैसी दिलचस्पी न थी, जैसी मेरी थी । उनकी उपस्थिति में उनके बहाने बातें करते हम एक-दूसरे की नाजुक अदाओं का जायजा लिया करते थे । कभी अखबार से चेहरा छिपाती और कभी उसके बीच से मुझे झांकती थी, कभी मजाक में आमलेट और मछली का जिक्र कर मेरे टिफिन लाने वाले प्रसंग पर चिढ़ाती वह जब भी समय निकलता मेरे साथ एकांत में पत्रिका के काम के बहाने बैठती । पत्रिका तो बहाना था बैठने का । काम तो मेरा ही था ।

परीक्षाओं के उस दौर में मैं और वनमाला प्राचार्य और भोला की अनुपस्थिति में प्राचार्य कक्ष में साथ-साथ बैठ जाते और घंटों काम करते । बीच-बीच में

'काम करना' दिखाई पड़ने के लिए इसे या उसे बुला भेजते कि एन.सी.सी. की रिपोर्ट आप ने दी नहीं है, बना कर दीजिए ,या खेलकूद की रिपोर्ट अभी तक नहीं आई वगैरह । वनमाला पर लिखी गई प्रेम कविताओं के बीच अपनी आम कविताएं मिला मैंने बाकायदा एक संग्रह बना लिया था । कम्प्यूटर से पुस्तकाकार रूप में बनी प्रतियों को मैं उस रोज बाकायदा चमकीली पन्नियों में फीते से लपेट साथ ले गया । संभवतः उस साल का वह दिन वनमाला का जन्मदिन ही था । मैंने कहा- ''आज तुम्हें मेरी पुस्तक का विमोचन करना है ।''

लजाती उसने कहा- ''मैं भला कहां इतनी योग्य कि आप की पुस्तक का विमोचन करूं ।''

''प्यारी वनमाला, मेरे लिए तुमसे बढ़कर कोई नहीं । और फिर यह पुस्तक तुम्हारी ही तो है । तुमने ही तो मुझमें समा इसे रचा है ।'' वह प्रसन्नता से दोहरी हो गई । उसने फीते खोले । एक प्रति मैंने उसे सौंपकर कहा- ''नाम लिखने से शायद गड़बड़ होगी अन्यथा मैं प्यार के लब्जों के साथ तुम्हारा नाम लिख होता । कहो तो लिख दूं ।''

''घर में देखेंगे तो मुसीबत होगी ।'' उसने कहा ।

मैने छिपाकर ले जाने की बात कही तो पूछा- ''क्यों-क्यों छिपाऊँ ? मैं तो इसे ऐसे ही ले जाऊंगी।'' संभवतः वनमाला में अपना गौरव उजागर करने की भी कामना रही होगी । फिर बोली- ''अभी रहने दीजिए मैं बाद में यहीं ले लूंगी और पढूंगी ।''

उसी दरम्यान परीक्षाओं में नकल के मामले जांच रही उड़नदस्ता की टीम आ गई थी । सभी मित्र थे । अनन्त ने हमें देख लिया था । वापस घर लौट चलने के उसके आग्रह पर मैंने हिचक दिखाई थी । अनंत ने जैसे मामला भाँपते हुए कहा था- ''अरे छोड़ो आज बहुत हो गया । अब मैडम के साथ कल बैठ लेना ।''

मैंने वनमाला से बात की और सामान समेट जीप की ओर बढ़ा । वनमाला भवन के मुख्य द्वार से बाहर निकल हाथ हिलाती मुझे विदा कर रही थी । उसने पूछा- ''कल फिर बैठना होगा । आप आएंगे ना ।'' मैंने कहा- '' हां, जरूर आऊँगा ।'' उसकी ओर निहारता उसे आंखों में कैद किए मैं चल पड़ा ।

दूसरे दिन प्राचार्य नलिनजी ने चुटकी ली ''आप दोनों कल काफी देर तक जमे रहे सुना है । लोग बता रहे थे । अब तो अच्छी पट रही है आप लोगों में लगता है ।''

उन्हीं दिनों खबर मिली, शायद उसी दिन कि भोला को परीक्षा के दौरान संस्था में उपस्थिति बताकर कहीं और कापियाँ जांचने के आरोप में निलंबित करने का आदेश हो गया है । सूचना जिज्ञासा की तरह डॉ. नलिनजी के प्रश्न के रूप में ही आई थी ।

वनमाला का मूड, उसका व्यवहार मेरे लिए रहस्यमय था । वह मुझसे मेरे एकांत में कहती कुछ थी और दिखाई कुछ और पड़ता था । सामने होने के सप्ताह के छः दिनों में से अमूनन पाँच दिन ऐसे होते जब वनमाला का चेहरा अवसाद से सूजा दिखाई पड़ता, आंखें उदासी के सूनेपन से भरीं और मूड अन्तस्थ उदासी और अदृश्य लाचारी की खीझ से भरा होता । सब से विचित्र तो यह कि अपनी ऐसी मुद्रा के साथ वह मुझी से नहीं, सारी भीड़ से कटी रहती । मैं समझ लेता कि घर में वह भूचालों से गुजर रही है । नाराजगी की छोटी सी बात हुई कि उसका आदमी मुझे लक्ष्य कर प्यार, मोहब्बत, आशिकाई के आरोपों से उसे नोच डालता होगा । जैसी वनमाला की हालत होती थी उससे मुझे संदेह होता कि उसका पति उसे मारता-पीटता भी रहा होगा । उसकी छबि मूडी, अज्ञात समस्याग्रस्त, रूखी और बेकार की अकड़ में जकड़ी औरत की हुई जा रही थी । प्रकटतः मैं ही ऐसा ग्राहक था जो सारे कुछ के बावजूद उसके पीछे भागता था । सब कुछ देखते और जानते हुए भी न जाने कौन सी अज्ञात प्रेरणा थी, जो उसे रहस्यमयता से और ज्यादा मुझे बॉंधती थी । वह मेरी नियति बन गई थी और मैं उसके पीछे भागता जा रहा था । कई दफा हमारे बीच घट रहे को लक्ष्य कर, विशेषत: मेरी मायूसी को लक्ष्य कर लोग आश्चर्यपूर्वक मुझे देखते और समझाते थे कि क्यों बेकार में मैं उसके पीछे अपना समय बर्बाद कर रहा हूं ।

एक बार स्टॉफ-रुम छोड़कर जाती मुंह फुलाई वनमाला को मैंने रोकना चाहा था- ''रुको, तुमसे कुछ बात करनी है ।'' वनमाला मुझे अनसुना कर बगैर रुके चली गई थी। तब वहां अनुराधा मौजूद थी। स्टाफ केऔर अनेक लोग भी साथ बैठे हुए थे। वनमाला का बेरुखा रवैया देख भोलाबाबू ने उन सब के बीच मजाक में टिप्पणी की थी- ''छोड़ो यार उसको । जब वो तुमसे बात नहीं करती, तो बेकार क्यों तुम पीछे पड़े हो उसके । तुम अपने साइज की ढूंढो न ?'' अनुराधा की ओर इंगित करते उसने कहा था- ''जो तुम्हारे लायक है, उससे तुम क्यों नहीं संबंध रखते । ये ठीक है तुम्हारे लिए।''

मुझे नहीं मालूम कि भोला का का आशय क्या रहा होगा ? उसकी बातों में कुछ-कुछ तो आपसी वृत्तियों और योग्यता की तालमेल की बात दिखाई पड़ती थी फिर कुछ-कुछ ऐसी भी, जिसमें कद-काठी और स्त्री-पुरुष जननांगों के तालमेल का संकेत था । उसने कहा था- ''तुम अपनी नाप की चप्पल छोड़कर बड़ी साइज के पीछे क्यों भागते हो ?''

कभी-कभी बहुत गंभीर और विवादजनक बातें भी भीड़ के वातावरण को अनछुई छोड़ जाती हैं । उस दिन वैसा ही हुआ अन्यथा बहुत बड़ा बवाल उठ खड़ा होता । मैंने अनुराधा पर गौर किया था । निश्चय तो उसने उसे सुना और समझा था, पर कहा कुछ नहीं । भोलाबाबू प्रायः विवादों से दूर रहता था, लेकिन दोस्ती में इस तरह की संबंधित टिप्पणी यदा-कदा फेंक दिया करता था । वनमाला से सभी की खुन्नस थी, इसलिए जाहिर है कि वह टिप्पणी मेरे पक्ष में और सद्‌भावनापूर्वक थी । उसमें यथार्थ का निश्चित संकेत तो था ही, जो बहुत समय के गोपन, गहरे निरीक्षण के बाद अचानक यूं व्यक्त हो उठा था ।

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न जाने किसी को इमोशनली एक्सप्लाइट करके उन्हें क्या मिलता है ?

''आजकल मैं देखती हूं कि कुछ औरतें आदमियों से भी आगे निकली जा रही हैं ।

न जाने किसी को इमोशनली एक्सप्लाइट करके उन्हें क्या मिलता है ? मुझे तो ये बिलकुल अच्छी नहीं लगता ।'' अनुराधा

मेरी आंखों के सामने दो छबियां थीं। कहां जीनत थी और कहां यह कहां वनमाला ? एक इतनी साफ और सरल कि जिसे समझने की उलझन ही न थी। दूसरी यह जिसे उलझनों के बीच से गुजरकर भी समझना मुश्किल है। अनुराधा मेरे करीब बाद में आई थी। उसको पहली बार मैंने वर्षों पूर्व तब देखा था, जब वह कहीं और हुआ करती थी । यूनिवर्सिटी के कला भवन के दरवाजे पर आंखों को चुंधियाती पहली झलक मेरी आंखों में अब भी बसी है । फिर ऊपर उस हाल के बाहर उसे मैंने पाया, जहां कापियां जांची जा रही थी । चुस्त एन.सी.सी. आफिसर की वेशभूषा में उसकी जवानी का सौंदर्य समाया न पड़ रहा था । जैसे मेरी निगाहों के सामने सुंदरता की देवी आ खड़ी हो । जिसकी ओर भोलाबाबू संकेत किया था, वह अनुराधा बहुत अधिक सुंदर थी । नैन, नक्श जैसे यत्नपूर्वक तराशे हुए, ललचाते गुलाबी होंठ और उनके बीच लहराते, मोती की आभा को मात देते दॉंतों की चमक । उसका पूरा बदन गुलाबी आभा से चमक रहा था । चेहरे पर ऐसी ताजगी जो निगाहों को तरोताजा कर दे । उभरे हुए नशीले उरोजों के साथ चपल मुद्रा और चंचलता की ऐसी तरंग जो मानों सारे वातावरण को अपनी सम्मोहता से भरता, उससे बचने की चुनौती दे रहा था । काया छरहरी, कद मुझसे दो इंच छोटा, पर्मिंग किये यत्न से संवारे सुंदर उसके सुनहरे कत्थई बाल जो देख-रेख की नियमित साज-संभाल से हमेशा आकर्षित करते थे ।

भाषा, साहित्यक और रचनात्मक कलाओं के प्रति उसकी बारीक रुझान, स्वभावजन्य सौजन्य और विनम्रता-सारा कुछ ऐसा कि अनुराधा सभी के लिए आकांक्षा और आकर्षण का केंद्र थी । ऐसा भी नहीं कि वह मेरे प्रशंसकों में नहीं थी । वनमाला की तरह उसमें भी यह अहसास था कि वह विशिष्ट थी । आलतू-फालतू आम स्टॉफ के लोग उसे नापसंद थे, जिन्हें तनखवाह के काम की खानापूरी और चालू पाठ्‌य-पुस्तकों के अलावा कुछ सरोकार न था । अनुराधा मुझसे यह बात कहा करती थी और मेरी बातें मेरा गहन अनुभव, बारीक बातें उसे लुभाती भी थीं । मैंने अनेक प्रसंगों में यह अनुभव किया था कि वनमाला पर मेरा झुकाव उसे अजीब और नापसंद लगता था । विस्मय और खीझ उसकी आंखों से झांकते थे । एक बार तो वनमाला के रवैये से मुझे किंचित परेशान देख वनमाला के सामने ही उसने व्यंग्य में एक जुमला फेंक दिया था -

''आजकल मैं देखती हूं कि कुछ औरतें आदमियों से भी आगे निकली जा रही हैं । न जाने किसी को इमोशनली एक्सप्लाइट करके उन्हें क्या मिलता है ? मुझे तो ये बिलकुल अच्छी नहीं लगता ।''

उसे सुनती मुंह भुलाए गंभीर वनमाला यह सुनती बाहर निकल गई थी । फिर वैसा क्यों न हुआ जैसा भोला कह गया था ? शायद इसलिए कि चित्त और भावना से अपार सुंदरता और कोमलता के बावजूद भव्य लोगों का साथ मुझमें कहीं निराशा पैदा करता था । शायद वह हीन भावना थी, जो यह अहसास पैदा करती थी कि भौतिक सुविधा-संपन्नता से भरी भव्य, नाजुक आकृतियां भला मुझ जैसे गंभीर किताबी कीड़े , भदेस रहन-सहन और वस्त्रों वाले मुझ गरीब को क्या घास डालेगी । शायद यही रहा होगा जो मेरे सारे प्रभावों व अनुकूल वातावरण देती परिस्थितियों और इस वर्ग की कामिनियों की मुझमें रुचि के बावजूद उनके ज्यादा अंदर पैठने की मेरी आकांक्षा को दबा देता था । जीनत के मामले में मेरे साथ ऐसा ही हुआ था ।

मुझे याद आता है जीनत के साथ एकांत में उठना-बैठना, कविताओं का पढ़ना-सुनना, कविताओं सी ही स्वप्नलोकीय बातें और परम आत्मीयता का अहसास, एक-दूसरे के अभावों को महसूसने की हाय, ठंड की गुनगुनी धूप में साथ बाहर बैठ जाने और समय को पंख लगा देने वाली निजी बातों का दौर, रूठना-मनाना और चुलबुली यदा-कदा की छेड़छाड़ । जैसे अभी-अभी घटा हो सब कुछ मेरी स्मृतियों में है। कॉलेज की पिकनिक पर लड़के-लड़कियों और जीनत, नीलांजना वगैरह के साथ टीम एक आरामदेह मिनी-बस में निकली थी । मेरी अपनी कोई योजना न थी, लेकिन मुझे वहां अनुभव और साथ में अनुकूल पाकर ये ढूंढते हुए मेरे घर आ पहुंचे थे । उस समय तो पत्नी भी युवा ही थी । मनाकर तैयार कर हमें भी साथ ले चलने का आग्रह था । और इस तरह हम धार और मांडू की यात्रा पर निकल पड़े थे । रास्ते में फिल्मी अंताक्षरी और फिल्मी गानों की धूम-धाम में मैं भी शामिल था । भीड़ में भी जीनत मेरी आंखों का चुंबक थी और मेरे मन से वह अपना दिल चस्पा किए हुए मुझे हर पल विशेष बनाए जा रही थी ।

मांडू में बिही के पेड़ों और पुरानी धर्मशाला-नुमा मंदिर के बीच हमारा डेरा था । रसोई की तैयारियॉं चल रही थी कि जीनत ने मुझे टोका । जैसे अन्य साथी, मेरी पत्नी उसके लिए अनुपस्थित थे, जीनत ने मुझसे कहा- ''चलिए न, यहां बैठे बोरियत होगी, अपन कहीं टहल कर आते हैं ।''

हम दोनों भीड़ से बाहर यूं टहलते रहे जैसे साथ टहलने के लिये ही बनाए गए हों । उजड़ा सा पुराना खंडहर सा धर्मशाला-नुमा मंदिर-परिसर देखा, सूखी झाड़ियों से भरे उजाड़ खेतनुमा पठारों में टहलते रहे, निर्मल बच्चों की तरह बतियाते रहे और यूं घूम-फिर कर हम साथ लौटे थे । खाना परोसने-खाने, घूमने और बतियाने के दौरान, और फिर धार के मंदिर के परिसरों में घूमते, भीड़ के बीच और भीड़ से अलग हम यूं साथ रहे जैसे भीड़ के साथ हम नहीं, बल्कि हमारे साथ भीड़ आई हो । पुरातात्विक मंदिर के अंदर प्रवेश करने में उसे झिझक थी । वह मुसलमान थी और शायद यह भय रहा हो कि गलती से भी अगर उसके मुसलमान होने की बात वहां उजागर हो जाती है, तो परेशानी हो सकती थी । उन दिनों वैसे भी भगवान या खुदा को लेकर नहीं बल्कि खंडहर हो चले मंदिरों की मिल्कियत को लेकर राजनीति चल रही थी। कभी-कभी तो ऐसा लगता जैसे महन्तों और मुल्लाओं के झगडों से भयभीत होकर वह एक अपनी जगह छोड़कर अंर्तधान हो गया है जिसे एक खुदा के और दूसरा भगवान के नाम से पुकारा करता था। जीनत का अस्तित्व मेरे साथ जुड़ा था । हम दोनों हिन्दू या मुसलमान होने से परे कहीं उतने ऊपर थे, जहां धर्मान्धता से धुंधलाई नज़रों की पहुँच नामुमकिन थी। जीनत का भय दूर करता मैं उसे मंदिर के शिल्प की बारीकियाँ दिखाता रहा, मिथुन-रत मूर्तियां दिखाता रहा। अंदर-बाहर मेरे साथ चिपकी जीनत निसंकोच उन पलों का आनंद उठाती जिज्ञासा से उन्हें देखती और समझती रही। उसे मैने समझाया था कि मंदिर के बाहरी आवरण में तराशा वह शिल्प इस सच को

दर्शाने वाला था कि यह संसार चाहे जितना बेमानी दीख पड़े लेकिन इसी से गुजरकर वहां जाया जा सकता है जो अदृश्य और लोकातीत है। वह सपने सा झूठ होगा भी तो उस जादूगर के लिये जिसने उसे रचा है। उसके सपने का हिस्सा बने इस जगत और उसके बासिन्दों के लिये तो यह संसार ही जमीनी सचाई है। बुदि्‌धमती जीनत बहुत उदार विचारों वाली और संकीर्णताओं से कोसों दूर थी । मुसलमान कही जाती भी सुरुचि-संपन्नता, स्वभाव और संस्कृति में हजारों-हज़ार हिन्दू स्त्रियों से वह बेहतर थी । इतनी कि उसे पाकर मुझ सा कोई भी हिन्दू अपने को गर्वोन्नत समझता । उस दिन पिकनिक की गाड़ी को लौटते बहुत रात हो गई थी । वह दिन मेरे लिए मादक बेहोशी का था । वह रात मेरे लिए और शायद जीनत के लिए भी गुदगुदाते स्वप्नों की थी ।

उस दिन नीलांजना भी साथ रही आई थी -सरल, सौम्य और विनीत । लंबी, छरहरी सुंदर काया जिसकी आंखों की घनी काली पुतलियॉं इतनी आकर्षक थीं कि कालिमा भी उससे फिसल कर छिटक पड़े । लेकिन नीलांजना से पारस्परिक अकृत्रिम-आकर्षण और संबंधों के बावजूद वह दिन और रात जीनत के थे । साथ के उन क्षणों में जीनत और मैं यूं जुड़े कि उसके बाद हम एक-दूसरे से जुड़ते ही चले गए थे। मेरी आंखों के सामने दो छबियां थीं। कहां जीनत थी और कहां यह कहां वनमाला ? एक इतनी साफ और सरल कि जिसे समझने की उलझन ही न थी। दूसरी यह जिसे उलझनों के बीच से गुजरकर भी समझना मुश्किल है।

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वह तसल्ली प्रियहरि का केवल भ्रम था

वितृष्णा और रोष से वह भीड के बीच चिल्लाये जा रही थी - ''जिस साली को धन्यवाद तक ज्ञापित करना नहीं आता, दो शब्द अपने मन से लिख नहीं सकती, उसे आप बीच में ले आए ?''

कुछ एक कमेटियों में खासकर अकादमिक, साहित्यिक कमेटियों में वनमाला का नाम दोनों की अघोषित रजामंदी से प्रियहरि के नाम के साथ जुड़ा था । वह खुद कला, विज्ञान और वाणिज्य की परिषदों का समन्वयक और परामर्शक था । रीमा, नीलांजना और वनमाला इन परिषदों की कार्यकारी प्रभारी थीं । औरों से प्रियहरि के संबंध व्यक्तिगत और ऊपर थे। बातें होती, विचार विमर्श होता। अदाओं के साथ सहज चुहल होती और वे मिलते बैठते थे लेकिन वनमाला की आदतों से तंग प्रियहरि उससे बात करने की अब कोशिश भी नहीं करता था। बैठकों की सूचना कागज से या फिर और किसी के जरिये भिजवा दी जाती थी।

उस एक दिन बॉस के खाली एकांत चैम्बर में सुबह साढ़े नौ बजे नीलांजना, रीमा और प्रियहरि एकत्रित थे। वनमाला को तो सुबह ही अपनी कक्षा के समय आ जाना था पर वह नहीं आई थी। वहां मौजूद सब के बीच सब-कुछ सहज चल रहा था। नीलांजना प्रियहरि के और प्रियहरि नीलांजना के साथ हमेशा सहज और प्रसन्न रहे हैं। दोनों की हर मुलाकात एक आत्मिक शांति के साथ खत्म होती थी। दोनों के कामकाजी संबंध, जो धीरे-धीरे निजी हो चले थे बगैर किसी तनाव का एहसास कराये मजे में बीतते थे। किसी भी कमेटी में नीलांजना को साथ रखा जाना वनमाला को सखत नापसंद था। इन दिनों भी वनमाला का मूड प्रियहरि की तरफ बेरुखी का इजहार करते यही दिखाने का था। वनमाला जैसे जानबूझकर देर से आई थी।

नीलांजना को कागज-कलम सौंप प्रियहरि रूपरेखा लिखवाने में व्यस्त था। बीच-बीच में आपसी बातें भी उनमे जारी थीं। दोनों की निगाहें जब-तब टकरा जाती थीं। सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक वनमाला प्रकट हुई। आदत के मुताबिक उसने देर से आने, बैठक की सूचना के बारे में, और इसी तरह कुछ एक बातों पर उसने आते ही टिप्पणी की थी। नीलांजना और रीमा दोनों की आंखों ने कौतुक से नाराज वनमाला की अदाएं देखीं। जैसे वे कह रही हों कि लीजिए, अब ये आ गई और अब शांति गई।

वनमाला के पूछने पर कि क्या चल रहा है, उसी की शैली में उसने जलाने निहायत तटस्थ भाव और कुछ बेरुखी लिए प्रियहरि ने उसे संक्षेप में समझा दिया। नीलांजना की ओर उसने देखा जिसकी आंखें उसे मिलीं। प्रियहरि ने कहा - ''नीला, चलो समय नष्ट न करो, आगे लिखो।''

वनमाला ने शिकायत भरी प्रश्न करती नाराज आंखों से पहले घूरकर प्रियहरि को देखा फिर वितृष्णा और उपेक्षा से नीलांजना के चेहरे पर नजर डालते उसके हाथ से रजिस्टर और कागज झटककर छीन लिए। वनमाला जैसे हुक्म दे रही हो प्रियहरि से बोली - ''आप बोलिए, मै लिखूंगी।'' उसकी वाणी में दृढ़ संकल्प था। उसकी मुद्रा अदभुत आत्मविश्वास से भरी थी। किसी में हिम्मत न हुई कि उसे चुनौती दे सके।

इस अचानक दखल से रीमा की आंखें आश्चर्य से फैल गई थीं। नीलांजना की आंखे जिनमे लाचारी भरी थी प्रियहरि की आंखों से पल भर को टकराईं। उसकी सुन्दर बड़ी-बड़ी आंखों की गहरी मायावी पुतलियों में शिकायत थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों होता है। नीलांजना जानती थी कि उसके साथ होकर भी प्रियहरि वनमाला का था। इधर प्रियहरि नीलांजना को चाहता और उसका साथ देना चाह कर भी साथ न दे पा रहा था। वनमाला के अप्रत्याशित आतंक से सभी आतंकित और स्तब्ध थे। प्रियहरि कुछ न कह सका था क्योंकि उसके दिल ने वनमाला के दिल का गुस्सा पढ़ लिया था, जिसमें लिखा था - ''इस नीलांजना की यह हिम्मत कि हमारी अनबन में मौका देख यह बीच में सेंध मार जाये ? और प्रियहरि तुम! याद रखो, तुम पर अधिकार मेरा है। चार दिन बात क्या बंद हो गई, तुमने इसे लिफ्ट दे दी।'' जो कहना था वनमाला ने बगैर बोले प्रियहरि से कह दिया। वातावरण की असहजता के बावजूद प्रियहरि को दिली तसल्ली हुई। यानी यह कि वनमाला पर प्रियहरि ही नहीं जान देता, वह भी उस मरती है। इतना कि किसी और का उसके पास भटकना भी उसे नापसंद है।

उस बैठक के बाद फिर बैठकों की जरूरत ही न हुई। नीलांजना को वनमाला और प्रियहरि के बीच के रिश्तों का एहसास था। नीलांजना न जाने किस मिट्‌टी की बनी थी। कभी उसकी ईर्ष्या प्रगट हुई, न शिकायत। चुपचाप वह सारा कुछ देखती, सहती और अपने को पीछे खींच लेती थी। पीछे खीच लेने के बावजूद संबंध, वाणी की मधुरता, व्यवहार में कुछ बदलाव न होता हालांकि उसकी मासूम खूबसूरत आंखों में पास आने का वह पशोपेश प्रश्न की तरह अवश्य होता जो प्रियहरि को शर्मिन्दा कर जाता था। प्रियहरि के मन में कामना होती कि कभी नीलांजना भी विद्रोह कर मन में उसके प्रति छिपे उस अपनापे को प्रगट करे, जो उसके मन में था। लेकिन नहीं, वह नीलांजना के स्वभाव में भी नहीं था।

वनमाला के साथ फिर दो-तीन दिन तक बैठना-बतियाना चलता रहा और कार्यक्रमों की रूपरेखा बनती रही। प्रियहरि और वनमाला के बीच से अब रीमा और नीलांजना गायब पाई जा रही थीं। वनमाला चाहती थी कि समन्वित उद्‌घाटन होने पर भी चूंकि विभाग और विषय उसका था, वह ही मंच पर प्रियहरि के साथ रहे। शेष दोनों महिलाओं की भूमिका वहां न रहे। प्रियहरि उसे समझाता रहा कि चूंकि यह आयोजन समन्वित है, नीलांजना और रीमा की भी भागीदारी वहां रहने चाहिए। उसने समझाया कि या तो विषय का प्रतिपादन वनमाला करे और संचालन नीलांजना करे - या फिर संचालन खुद वनमाला करे, और विषय का प्रतिपादन नीलांजना को सौंप दे। वनमाला इससे रूष्ट और असहमत थी लेकिन प्रियहरि की खातिर वह मान गई थी। दोनों के बीच एक बार फिर आत्मीयता और विश्वास का रिश्ता जीवित हो चला था। उससे प्रियहरि को तसल्ली थी। लेकिन कहां ? वह तसल्ली प्रियहरि का केवल भ्रम था।

अगले दिन सुबह दस बजे प्रियहरि अपने मित्र व साथी लेकिन अफसर नलिनजी के पास कार्यक्रम की रूपरेखा और तैयारी के बारे में चर्चा करने बैठा था। वनमाला अपनी क्लास में थी लेकिन नीलांजना प्रियहरि के साथ बैठी थी। नलिनजी ने सब देखा - सुना फिर कागज पर एक जगह इशारा करते हुए कहा - ''इसे काटिए, संचालन वनमाला नहीं करेगी, आप करेंगे।''

प्रियहरि ने समझाया कि वनमाला की सहमति से यह रूपरेखा बनी है। वह अच्छी है, योग्य है इसलिए अवसर उसे ही दें और उसका ही नाम रहने दें। लेकिन नलिनजी माने नहीं। उन्होंने कहा - ''आपसे बेहतर यहां कोई नहीं है। आप नहीं काटते तो मैं ही अपनी कलम से काट देता हूँ।''

नलिनजी वनमाला के मिजाज से अच्छी तरह वाकिफ थे। बोले - ''वह कुछ न कहेगी, मैं उसे समझा दूंगा। वह कहे तो कह दीजिएगा कि नलिनजी ने ऐसा किया है।''

इस बीच वनमाला का नया शुभचिंतक यार विपुल भी आ पहुंचा था। उसकी ओर किसी ने तवज्जुह देने की जरूरत न समझी। अपने को उपेक्षित पा इधर-उधर झांकती अपनी जिज्ञासा लिए वह दो मिनट में ही वहां से चलता बना था। नलिनजी के कमरे से निकलकर प्रियहरि स्टॉफ-रूम में गया तो पाया कि तब-तक कला संकाय के लोगों की भीड़ वहां जम गई थी। वनमाला के बगल में कुर्सी जमाए विपुल बैठा हुआ था। प्रियहरि ने वनमाला से मुखातिब हो प्रशंसा के कुछ शब्द कहे थे। नलिनजी से चर्चा के दौरान वनमाला के न होने का उपालंभ प्रियहरि ने उससे किया। वनमाला को यह सूचना प्रियहरि ने दी कि खुद उसकी असहमति के बावजूद नलिनजी ने आग्रहपूर्वक संचालन से वनमाला का नाम काटकर उसका अपना नाम रख दिया है। वनमाला से उसने कहा कि - ''अब जाओ तुम ही बात कर लो और समझाओ ।''

वनमाला प्रतिक्रियाविहीन स्थिति में प्रियहरि की ओर घूरती देख रही थी। इससे पहले कि वनवाला जवाब दे, उसकी बगल में बैठा विपुल चिल्ला उठा - ''रहने दीजिए जनाब, यहां तो आप मैडम के तारीफों के आप पुल बांध रहे है, और वहां ? वहां मैं बैठा था। मेरे सामने आपने खुद इनका नाम कटवा दिया है और यहां आकर बातें बना रहे हैं।'' जाहिर था कि विपुल का मकसद प्रियहरि को झूठा और मक्कार सिद्ध करना था। विपुल के झूठ पर प्रियहरि नाराज हो उठा। उसकी चालाकियां वह समझता था। उसने विपुल को जोर से डांटा कि वह झूठ बोल रहा है। वनमाला की ओर मुखातिब हो उसने बताया कि नीलांजना वहां मौजूद थी। उससे वनमाला पूछ सकती है कि क्या बातें हुईं।

प्रियहरि की कुर्सी के पीछे नीलांजना आ खड़ी हुई थी। उसने मुंडी हिलाई और अपनी सहज विनम्रता मे कहा कि 'हां प्रियहरि ठीक कह रहे हैं।'

शायद नीलांजना की कक्षा रही होगी। वह बाहर चली गई थी। यह संयोग ही था कि बचाते-बचाते भी नीलांजना हर बार वनमाला और प्रियहरि के बीच उपस्थित हुई जा रही थी। वनमाला को अचानक गुस्से का दौरा पड़ा। नीला का होना तो क्या उसका नामोल्लेख तक वनमाला के तन-बदन को जलाकर रख देता था। हालांकि वह वनमाला का भ्रम था, लेकिन निश्चय ही ऐसा संदेह उसमें आग की तरह भड़क उठा था कि ज़रूर नीला और प्रियहरि के बीच कुछ ऐसा था जिसके चलते जानबूझकर उसके खिलाफ साज़िश रची गई थी । ऐसे में इस वक्त नीलांजना का जिक्र वनमाला के प्रति निष्ठा की भावना के साक्ष्य और सफाई के लिए प्रियहरि करे यह उसकी सहन-सीमा के बाहर था। वनमाला क्रोध से बेकाबू हो चली थी। पूरे उन्माद से वह चीख पड़ी - ''रहने दीजिए, मैं क्या कुछ नहीं समझती प्रियहरि। कार्यक्रम का सारा बोझ मुझ पर डाल रहे हैं और मेरा ही नाम आपने कटवा दिया? काम आप मुझसे कराते हैं, मीठी-मीठी तारीफ करते हैं और पक्ष दूसरों का लेते हैं। मैं सब समझती हूं अगर वे इतनी ही काबिल हैं तो इन्हीं से ही सारा काम क्यों नहीं करा लेते ?''

प्रियहरि स्तब्ध और लाचार दिखाई पड़ा। वह वनमाला को ही चाहता था, उसका पक्ष लेता था, लेकिन वनमाला की गलतफहमी उस वक्त वह दूर न कर सका। जाहिर था कि माकूल मौका देख वनमाला को किसी और ने भी खूब भड़का रखा था। उसके मन में यह धारणा बो दी गई थी कि प्रियहरि उसे बेवकूफ बनाता है - दरअसल चाहता वह वनमाला को नहीं, नीलांजना को है। ईर्ष्या से भरी वनमाला का स्वर बहुत ऊँचा था। उसे जैसे उन्माद का दौरा पड़ा हो। वितृष्णा और रोष से वह भीड़ के बीच चिल्लाये जा रही थी - ''जिस साली को धन्यवाद तक ज्ञापित करना नहीं आता, दो शब्द अपने मन से लिख नहीं सकती, उसे आप बीच में ले आए ?'' वनमाला आपे से बाहर थी बीच में आपसी संबंधों के क्षणों का संकेत करती वह चीख-चीखकर प्रियहरि की कमजोरियां उजागर करने उतारू थी। वैसा करने में कुछ क्षण संबंधों की सारी मर्यादाएं उसने दरकिनार कर दी। वह चिल्ला रही थी - ''अकेले में यही प्रियहरि मेरी तारीफ करते हैं, चापलूसी करते हैं और बाहर ? देख लो, यही मेरा ही पत्ता काटते हैं। उस साली नीलांजना में ऐसा क्या रखा है जो ये उसका पक्ष लेते है।''

वनमाला के ठंडा होने की आशा में अब तक प्रियहरि चुपचाप धीरज रखे था लेकिन न थम रही वनमाला की अनर्गल बातों, आरोपों से फिर वह भी उत्तेजित और आक्रामक हो उठा था। उसने समझाना चाहा था कि वनमाला समझने की कोशिश क्यों नहीं करती। विपुल झूठ बोल रहा है और उसे व्यर्थ ही भड़का रहा है। प्रियहरि ने उसे समझाना चाहा कि वह चीख क्यों रही है ? चीखती हुई औरों को गाली देती अपमानित क्यों कर रही है ? आखिर वे भी सह-योजकों में हैं। उन्हें गाली देना और कोसना ठीक नहीं है। रीमा वहां मौजूद थी। उसने प्रियहरि के कथन की तसदीक करते हुए कहा कि प्रियहरि ठीक तो कह रहे हैं। इन्होंने कुछ नहीं किया है। जिन्होंने किया है, जो कहना है उनसे जाकर कहा जाए।

वनमाला को न कुछ सुनना था और न उसने किसी की सुनी। गुस्से में उबलती वह प्रियहरि को ही कोसती, प्रताड़ित करती उससे झगड़ती रही। यह खयाल करके कि यह वही स्त्री है जिसे मैं चाहता हूँ, जिसका पक्ष लेता हूँ और तारीफ किया करता हूँ, प्रियहरि का मन पीड़ा से भर उठा। वनमाला का स्वभाव ऐसा ही था। उसे समझाने की कोशिश करता प्रियहरि वहीं अपने को अपमानित होता देख आत्मग्लानि से पीड़ित होता सुबककर रो उठा था। इस बीच नीलांजना फिर लौट आई थी। वनमाला के रोष और प्रियहरि की लाचार दयनीयता को वह मौन देख रही थी। प्रियहरि को वह सांत्वना देती ढाढस बंधा रही थी।

प्रियहरि को इस बात का भी अफसोस था कि ढेर से लोग मौजूद थे, लेकिन ऐसी अवस्था में उसका पक्ष ले वनमाला को समझाने कोई आगे न आया। यह ठीक है कि वनमाला से प्रियहरि के संबंध कुछ और थे लेकिन तब भी अपने ही उन साथी सदस्यों का अपमान, जो उसे बेहद चाहते थे। प्रियहरि को क्षोभ से भर रहा था। प्रियहरि नीला से, रीमा से और वहां मौजूद अन्य मित्रों से यह कहता सहानुभूति की उम्मीद था कि वे खुद सोचें कि वनमाला के लिए उस प्रकार की उग्रता, गाली देना, तथा अभ्रदता का व्यवहार क्या उचित था ? कुछ देर बाद यह देख कर कि सचमुच उसके व्यवहार ने प्रियहरि को दुखी और सभी को स्तब्ध कर दिया है, वनमाला का रुख अचानक पलट गया।

उसने सफाई दी - ''मैने कोई गलती नहीं की, वैसा कुछ नहीं कहा।''

अपने को झूठा ठहराया जाता देख प्रियहरि ने वनमाला को इस बात के लिए धिक्कारा कि एक तो वह झूठ कह रही है, दूसरे वह सच को ईमानदारी से स्वीकार करते हुए गलती मानने से कतरा रही है। उसने वनमाला की आराध्या काली माता की दुहाई देते हुए पूछा कि वह सच बताए कि क्या उसने नीलांजना के लिए 'जिस साली को' जैसे फूहड़ शब्द कहे या नहीं ? अब वनमाला सिकुड़ने लगी थी और बचाव चाहती थी। बजाय विनम्रता से सच को स्वीकारने और सुनने की बजाय वह इसी बात पर फिर झगड़ पड़ी। छोटी सी बात में प्रियहरि देवी देवताओं की तो साक्ष्य में क्यों लाना चाहता है ? उसने इसी बात पर फिर प्रियहरि की खूब लानत-मलामत कर डाली। अंदर की बात यह कि एक तो नीलांजना को साथ लेना ही वनमाला पर भारी था, दूसरे नीलांजना के चक्कर में वनमाला का महत्व घटना वनमाला के रोष का कारण था। इस पर भी यह कि प्रियहरि अब भी बजाय वनमाला को समझ पाने के नीलांजना का पक्ष लेता वनमाला से लड़ रहा था।

वनमाला का स्वभाव सभी जानते हैं। कोई उससे न उलझा। यह बात अलग है कि उसके जाने के बाद सभी ने उसकी आलोचना की। प्रियहरि क्षुब्ध था। वनमाला को अपने पर अधिकार देने का ही एक कुफल यह अपमान था। प्रियहरि से हमेशा की तरह लोगों ने कहा -''आप बेकार ही उसकी तारीफ करते हैं, महत्व देते है, अब देख लिया न ?''

उस दिन बाद में भयानक उदासी से घिरा प्रियहरि राहत पाने नीलांजना के कमरे में जाकर बैठा। वहां और कोई न था। नीलांजना की आंखों में झांकते प्रियहरि ने अपने आहत मन की पीड़ा उससे कही और वैसा करते-करते फिर रो पड़ा। नीलांजना ने उसे तसल्ली दी - ''छोड़िए न, भूल जाइए जो हुआ। उसका तो स्वभाव ही ऐसा है। सब जानते हैं उसे। आप भी तो समझते नहीं और मैं हूं कि शायद आपको समझाने लायक नहीं।''

प्रियहरि की उदासी से नीलांजना का मन भी उदास हो गया था। वह उसे प्रसन्न रखना चाहती थी लेकिन रखती तो रखती कैसे ? वह वनमाला नहीं थी। वह पूरा दिन प्रियहरि के लिए भयानक अवसाद का था। रह-रहकर उसके चित्त में वनमाला के साथ की स्मृतियां हरी हो उठती थीं। उसे अफसोस था कि वनमाला उसे क्यों नहीं समझ पाती ? उसका जी करता था कि वनमाला से संबंधों के प्रायश्चित में वह अपनी व्यथा को साथ लिए प्राण दे-दे। यह विचित्र था कि उस तरह अपमानित होने पर भी उसका मन वनमाला को ही याद कर रहा था। वह उसके सामने ही रो कर उसे पिघलाने की उम्मीद रखता था और उसे मनाना चाहता था। वह चाहता था कि नीलांजना को लेकर वनमाला के मन में जागी ईर्ष्या और संदेह को वह ठंडा कर सके। उसका मन बेचैन था, पीड़ा और छटपटाहट से भरा हुआ था।

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'' मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है ।

बस इनसे इतना कह दीजिए कि फोन करें तो समय देखकर किया करें।''

जमा करते हो क्यों रकीबों को

ये तमाशा हुआ गिला न हुआ।

दर्द मिन्न्तकसे दुआ न हुआ

मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ॥ - ग़ालिब

उस रात इसी प्रयास में प्रियहरि ने फोन पर वनमाला से अपनी पीड़ा कहनी चाही। वह कुछ न सुनना चाहती थी। दोबारा फिर फोन पर कुछ बातें हुईं। वनमाला ने कहा था - ''ठीक है, आपने कहा मैंने सुन लिया। आपने सारा कुछ सुबह कह तो दिया था। अब क्यों बार-बार फोन कर रहे हैं ?'' वनमाला भयभीत थी कि बार-बार की घंटी कहीं उसके पति के जो संयोग से इस वक्त घर मे नहीं था और बच्चों के मन में संदेह न पैदा कर दे। फोन को लेकर उसके घर पहले भी बवाल हो चुका था। इधर प्रियहरि का मन अधीर था कि वह वनमाला से खूब लंबी बात करे। उतनी जब-तक उसकी बातें वनमाला के मन का मैल दूर न कर दें। बाहर जाकर उसने तीसरा फोन किया। कहा - ''वनमाला तुम्हें मेरी बात सुननी होगी। तुम नहीं जानतीं कि मेरे मन पर क्या बीत रही है । क्या मैं जान दे दूं तभी तुम्हें तसल्ली होगी ?'' उसने शिकायत की कि वनमाला ने उसकी बात पर विश्वास क्यों नहीं किया? उसने बताया कि वनमाला का नाम उसके विरोध के बावजूद नलिनजी ने अपनी कलम से काटा था। उसने समझाना चाहा कि विपुल ने झूठ बोलकर उसे भड़काया था ।

वनमाला भी शायद सुबह की घटना से तनावग्रस्त और क्षुब्ध थी। वनमाला के तसल्ली देने के बावजूद कि ''जो हुआ, वह हुआ। उसे भूल जाइए। आप कह रहे है तो मान लेती हूँ। मुझे कोई शिकायत नहीं है। अब फोन रख दीजिए।'' प्रियहरि उसे कह रहा था कि ''वनमाला, शायद कल मैं न आऊँ। शायद कभी तुम्हारे सामने न आऊँ। मुझे न जाने कैसा-कैसा लग रहा है। मैं अपनी आलमारी की चाबी भेज दूंगा। आगे की रूपरेखा अब तुम खुद बना लेना।''

वनमाला पर जो भी असर हुआ हो, प्रियहरि उस रात सो न सका था। उसका अवसाद-ग्रस्त चित्त रूठा रहा था। अगले दिन मन को संभालता न चाहते हुए भी वह अपने काम पर गया। जाने का कारण शायद काम उतना नहीं था, जितना उस स्त्री के चेहरे को देखना और उस चेहरे पर खुद के प्रति लौट आये कल्पित विश्वास की उम्मीद था। नलिनजी सुबह ही मिल गये प्रियहरि ने उन्हें बताया कि वनमाला का नाम काटना कितने अनर्थ बात कारण बन गया और उस पर क्या-क्या गुजरी। उसने आग्रहपूर्वक कहा कि अब बात तभी बन सकती है, जब वे खुद वनमाला को अकेले में बुलाएं और सच्चाई बताएं। प्रियहरि के बाहर जाते ही नलिनजी ने वनमाला को बुला भेजा होगा। कक्षा की ओर जाते हुए उसने गौर किया कि वनमाला ही नहीं, उसके साथ विपुल, अनुराधा, भोला, विराग वगैरह की टीम लिये नलिनजी के गिर्द उपस्थित थी। संभवतः नलिनजी द्वारा बुलाए जाने का मतलब भय में डूबी वनमाला ने यह लगाया होगा कि अवश्य प्रियहरि ने उसके कल के दुर्व्यवहार की शिकायत की होगी। यह केवल प्रियहरि जानता था कि वैसा नहीं था। वनमाला इसे नहीं जानती थी। इसीलिए वह स-संदेह अपना पक्ष मजबूत करने भीड़ के साथ गई थी। सहज रूप में प्रियहरि जा खड़ा हुआ था। उसे देखते ही वनमाला नाराज हो नलिनजी से बोली - ''देखिए, कल इतनी छोटी सी बात पर इन्होंने मुझसे झगड़ा किया। इतने बड़े विद्वान हैं, लेकिन जरा सी बात पर मुझसे काली माता के साक्ष्य पर उतर आए और मुझे लज्जित करना चाहा। आप ही बताइए कि क्या यह इन्हें शोभा देता है।''

वहां पर पहले से ही जमा भीड़ देखकर और अपने खिलाफ वातावरण की संभावना पाकर प्रियहरि उस समय उल्टे कदम लौट आया था। और-सबों के बाहर निकल जाने के बाद फिर से नलिनजी ने उसे बुलाया था। प्रियहरि को एहसास था कि भीड़ लेकर वनमाला ने जरूर अपने को बचाने प्रियहरि की उल्टी-सीधी शिकायत की होगी। उसके व्यवहार के चलते पहले से ही वह बेहद व्यथित और आहत था। इससे पहले कि नलिनजी कुछ कहते प्रियहरि ने अपना दुखी मन उनके सामने, बल्कि उनके बहाने वहां उस समय बैठी वनमाला के सामने खोल दिया। प्रियहरि ने कहा - ''मेरे पास कहने को अब कुछ नहीं है। वनमाला पर मेरा विश्वास है। ये जो भी कहती हैं, उसे मेरी तरफ से भी सच मान लिया जाय। इनकी सारी शिकायतें आप मान लें और मुझे जो चाहे सजा दें। मैं ही झूठा और दोषी हूँ।''

नलिनजी हंसे। बोले - ''अरे वैसी कोई बात नहीं। मैंने सब समझ लिया है और समझा दिया है। कोई गलतफहमी अब नहीं है। आप लोग निश्चिन्त रूप से मिल-जुलकर काम कीजिए।''

भीड़ में कुछ और नजर आती वनमाला प्रियहरि के पहुंचते ही तब मानो पच्च्याताप और लज्जाशील नारी के संकोच की मुद्रा में थी। उसके ठीक बगल वह बैठ गया था। वनमाला कुछ न बोली। दोनों संकोच में गड़े जा रहे चुप थे। दोनों को लग रहा था कि कहीं कुछ गलती उन्होंने खुद ही की है, जिसका पछतावा लिये इस तरह वे यहां बैठे हैं। बाद में नलिनजी से ही प्रियहरि को मालूम हुआ कि उस सुबह विपुल ने ही उनसे शिकायत की थी कि रात में प्रियहरि ने मैडम को फोन कर - करके परेशान कर डाला था। प्रियहरि समझ गया कि उसका दीवानगी से भरा क्षोभ, उसका अवसाद वनमाला को भयभीत कर गया होगा कि कहीं उसका प्रियहरि सचमुच कुछ कर न बैठे। इसीलिए वनमाला ने शायद विपुल को गवाह बनाने की गरज से रात या सुबह अपने भय और फोन की बात बता दी होगी।

नलिनजी ने बताया कि वनमाला को बुलाकर उन्होंने फोन के मामले में खुलासा करने कहा था। वनमाला ने जवाब दिया था कि उनके - मेरे बीच जब यहां की बात साफ हो गई थी तो प्रियहरि ने रात में उसे फोन क्यों किया? नलिनजी के अनुसार वनमाला को उससे कोई शिकायत नहीं थी। नलिनजी के यह पूछने पर कि क्या फोन पर कोई गलत या आपत्तिजनक बातें की गई थीं, वनमाला ने कहा था कि आपत्ति-जनक कुछ न था। केवल यह कि बार-बार अफसोस जाहिर कर रहे थे और नाम नहीं कटवाने पर अपनी सफाई दे रहे थे। रहस्य की बात जो नलिनजी ने उजागर की, वह यह थी कि वनमाला रो रही थी। उसका कहना था कि प्रियहरि जब फोन करते हैं तो मेरे घर में पति को संदेह होता है कि मेरा इनसे प्रेम है और फोन पर मैं इनसे प्यार की बातें करती हूँ। उसने बताया था कि - ''मेरे पति शक्की हैं और मुझ पर व्यंग्य करते है । इसीलिए घर में मेरी मुसीबत हो जाती है। नलिनजी के सामने अंततः वनमाला ने प्रियहरि की आंखों में झांक कर यह कबूल किया था कि - '' मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है । बस इनसे इतना कह दीजिए कि फोन करें तो समय देखकर किया करें।''

नलिनजी वहां मौजूद जरूर थे लेकिन वनमाला जैसे यह बात उनसे नहीं प्रियहरि से कह रही हो। प्रियहरि को पास पाकर वह संकुचित थी लेकिन उसकी आंखें अफसोस भरी शिकायत से भरी हुई थीं। प्रियहरि का भी मन उस आत्मीय साथ में हल्का हो चला था। फिर भी मन ही मन वह सोच रहा था कि वनमाला दिल से चाहे जितनी साफ हो, संबंधों में विश्वसनीय नहीं है। घबराहट में वह आपा खो बैठती है और ''नहीं बताने की बातें'' उजागर कर जाती है। उसका मन बाद में निर्मल हो जाता है। वह अपने किये पर पछताती है। लेकिन उन दूसरे लोगों का क्या जो उसके गुस्से को नफरत में बदलने की चाहत रखते हैं ? वनमाला प्रियहरि की आंखों में यह सारा कुछ पढ़ रही थी। सारी पीड़ा के बावजूद प्रियहरि का मन वनमाला की वफादारी और तारीफ से भी भर उठा था।

यह क्या कम बात थी कि विघ्न-संतोषियों की कोशिशों के बावजूद उसके मन में शिकायतें जड़ नहीं जमा पा रही थीं। उसकी यही मासूम अदा प्रियहरि के लड़खड़ाते मन को फिर से सहारा देती वनमाला से बांध देती थी। ऐसे संकट में उसे हमेशा वनमाला का वह आग्रह याद आता जो कभी बेहद एकांत के आत्मीय क्षणों में इन शब्दों में किया गया था - ''न जाने क्यों मुझमें यह कमजोरी है कि गुस्से में मैं अपना आपा खो बैठती हूँ। तब मुझे होश नहीं रहता कि मैं क्या-क्या बक जाती हूँ।'' उसने कहा था - ''आप तो ऐसी बातों को बिल्कुल मन में न लिया कीजिए। मुझे खुद याद नहीं रहता कि मैं क्या-क्या कह गई थी। बाद में याद करके मैं पछताती हूँ। आप मुझे माफ कर दिया कीजिए।''

मजबूरियों के बीच गुस्से और पछतावे का खेल ही था, जिसने वनमाला और प्रियहरि को एक-दूसरे से दूर न जाने दिया और जो अन्त तक चलता रहा। प्रियहरि की उस दिन की भूमिका तयशुदा थी। वनमाला के साथ उसके संबंध बाहर चाहे जैसे भी दिखाई पड़ते हों अन्तरंग तौर पर बेहद आत्मीय और विश्वास के थे। पहले ही कई बार प्रियहरि ने वनमाला से कह रखा था कि उस पर उसका पूरा भरोसा है। अगर आत्मीय बातों को उजागर कर वह शिकायत भी करती है तो वह मान लेगा कि उसकी किस्मत खराब है। वह उसके नाम सरेआम कबूल कर लेगा कि जो भी वह कहती है, उसे बिना विरोध किये सच मान लिया जाये क्योंकि उसकी खुशी में ही प्रियहरि की अपनी खुशी है। उस दिन भी प्रियहरि ने फिर वैसा ही किया था। उसके समर्पण ने वनमाला की आत्मा को जगा दिया था। नलिनजी के सामने उस एकांत मुलाकात में वनमाला का सारा गुस्सा काफूर हो गया था। अफसोस कहीं उसके अंदर भी था। उसके मन का यह संदेह दूर हो चुका था कि शायद उसके पिछले दिन के खराब व्यवहार पर प्रियहरि ने शिकायत की होगी । मैल न वनमाला के मन में था, और न प्रियहरि के मन में ।

नलिनजी ने प्रियहरि के सामने ही वनमाला से पूछा था - ''बस, इतनी सी ही गलफहमी थी न !''

''कोई खास बात नहीं थी, मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है'' - वनमाला ने जवाब दिया। चुहल भरी नजरों से प्रियहरि की ओर देखते उसने जोड़ा था कि ''बस इनसे इतना कह दीजिए कि मुझे बार-बार फोन न किया करें।'' नलिनजी ने हंसते हुए कहा था कि ''ठीक है, ये अब आपको फोन नहीं करेंगे।'' इस पर वनमाला ने झट सफाई फिर पेश की कि ''फोन के लिए मना मैं नहीं करती, लेकिन बस इतना ध्यान रखें कि गलत समय पर फोन न किया करें।''

वहां से वे दोनों उठे तो मन एकदम हल्का था उन दोनों की यह खुशकिस्मती थी कि सारी भीड़ के विरूद्ध उनकी जोड़ी नलिनजी को मान्य थी। उससे उन्हें न कोई शिकायत थी, न ईर्ष्या थी। यह बात वनमाला और प्रियहरि ही जानते थे। इसीलिए नलिनजी का सामने होना उनके लिए बाधा नहीं सुविधा ही थी। वे इनके संबंधों के लिए ढाल का काम भी करते थे। अपेक्षा के विपरीत औरों की मुहिम उस दिन धरी की धरी रह गई।

जो आयोजन प्रस्तावित था, वह हुआ। वही आयोजन था या वह कोई बाद का आयोजन यह याद नहीं। शायद कुछ बाद का रहा हो। उस दिन वनमाला संचालन कर रही थी। संभवतः समापन करती-करती वह नलिनजी को अंतिम उद्‌बोधन के लिए आमंत्रित करने जा ही रही थी कि नलिनजी ने प्रियहरि की ओर इंगित कर वनमाला को इशारा किया कि वह उसे आमंत्रित करे। वनमाला के मन में क्या था कहा नहीं जा सकता। उसने प्रियहरि की ओर नजर डाल घोषणा की कि ''प्रियहरि भी शायद कुछ कहना चाहते है। मैं अब उन्हें आमंत्रित करती हूँ कि वे आएं और अपने बात कहें।''

प्रियहरि को यह अटपटा लगा। सारे लोग एक अच्छे चिन्तक और प्रखर वक्ता के रूप में उसे जानते थे। उसे यह बात नागवार गुजरी कि नलिनजी के याद दिलाने पर उसे तसल्ली के लिए बुलाया जाये। उसने अपनी जगह पर उठकर साफ कह दिया कि उसने कभी यह नहीं चाहा कि उसे बुलाया जाय। शायद संयोजिका को कुछ गलतफहमी हुई है।

''मुझे कुछ नहीं कहना है'' कहकर वह अपनी जगह बैठ गया। नलिनजी और सारी सभा ने प्रियहरि के बात में छिपे क्षोभ को पकड़ लिया था। आयोजन खत्म हो जाने के बाद स्टॉफ के अनेक साथियों ने कहा कि वनमाला ने जानबूझकर प्रियहरि को अपमानित करने वैसा किया था, जो बहुत गलत था। सभी को उसके व्यवहार पर आश्चर्य और अफसोस था। प्रियहरि ने मन की पीड़ा छिपाकर बात टाल दी थी। वह समझ गया था कि उसके प्रति रोष जताने का वनमाला का वह एक तरीका था।

''बड़ी मूर्ख स्त्री है, उसे ऐसा नहीं करना था'' - नलिनजी ने प्रियहरि से कहा। अचानक गलियारे में ही बगल से गुजरती वनमाला प्रियहरि के समीप आती बोली - ''आप बुरा मान गये लगता है। बाई गॉड, न जाने कैसे मैं भूल गई थी। वह तो बस यूं ही मुंह से निकल गया था। मैंने जानबूझकर वैसा नहीं किया था। मुझे माफ कर दीजिए प्लीज़।'' प्रियहरि के लिए यह निर्णय करना कठिन था कि कौन सी वनमाला असली है ? वह, जो ऐन मौके पर उसे नीचा दिखाकर अपने मन का मैल निकालना चाहती है, या वह जो पछतावे से भरी उस पर तसल्ली का मरहम लगाती है ? उसके लिए अब वह अभेद्‌य रहस्य से भरा अजनबी व्यक्तित्व होती जा रही थी।

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