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आधी रोटी
नेकनामी और पोशीदगी पर धब्बे का खतरा जहां आता दिखाई पड़ता है, वहां प्रेमी के प्रति
उनकी सारी वासनाएं तिरोहित हो जाती हैं। अपनी छबि बेदाग साबित करने तब सारा ठीकरा
वे अपने प्रेमी या प्रिय पुरुष के सर पर फोड़ना चाहती हैं।
वनमाला का संदेहास्पद व्यवहार और सब के बीच चुहल या अनियंत्रित आक्रोश में की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों से प्रियहरि नाराज था। बल्कि उसने नाराजगी कम, क्षोभ ज्यादा था। वह देखता कि वनमाला खुद भी गुस्से मे की गई वैसी नादानियों पर बाद में पछताती थी। मौन की जमी हुई बर्फ को पहले कौन तोड़े यह सोचते वह और वनमाला एक-दो दिन अपने मौन में ही यह कहते आमने-सामने बैठे होते कि इतना भी गुमान क्या ? क्या तुम ही मौन नहीं तोड़ सकते ? आखिर एकांत के वैसे क्षणों में मुंह फुलाए सोच में डूबी बेरुख वनमाला के सामने आहें भरता प्रियहरि ही उस बर्फ को पिघलाता जो दीवार बनी तब तक उन दोनों के बीच अड़ी हुई होती। वह कहने से न चूकता कि वनमाला इतनी क्रूर क्यों है ? टिफिन का जिक्र कर प्रियहरि ताने देता कि उसे तो वनमाला से आधी रोटी की तलब थी, लेकिन वह इतनी कंजूस थी कि उसकी इतनी इच्छा भी वह पूरी न कर सकी।
एक दिन अपना टिफिन खोल कर बैठी वनमाला ने प्रियहरि के सामने ही सत्यजित से औपचारिक आग्रह किया - ''आप भी लीजिए।''
सौजन्य से सत्यजित ने प्रियहरि से आग्रह किया था - ''आइए न आप भी।''
प्रियहरि ने खीझ भरी उदासी से आच्छादित वनमाला के चेहरे को देखा और सत्यजित से कहा - ''आग्रह आप से किया गया है। मुझ से तो नहीं पूछा गया इसलिए नहीं लूंगा।''
प्रियहरि के वैसे जवाब पर वनमाला उस दिन बुझे-बुझे चेहरे और अपनी उदास आंखों से उसे देखती सिर झुकाए रह गई थी। वनमाला को प्रियहरि की वह बात याद रही आई होगी। एक दिन जब वे दोनों ही अकेले थे, वनमाला ने अपना टिफिन खोला और प्रियहरि को भी आग्रहपूर्वक अपने साथ शामिल होने कहा। प्रियहरि ने भिण्डी की सूखी सब्जी के साथ ठीक आधी रोटी ली थी। वह तो बात की बात थी। प्रियहरि के लिए वनमाला की रोटी का मतलब केवल वह साथ और मनुहार था जो वह वनमाला से चाहता था। अन्यथा तो वह शाकाहारी जीव इस आशंका से ही उसका खना छूने से परहेज करता था कि मांसाहार वालों के टिफिन का क्या भरोसा था ? न जाने कब क्या उसमें रहा आता होगा ? वनमाला के साथ टिफिन बांटने उस दिन भी वह लालायित न था। बावजूद इसके उसे वनमाला की आत्मीयता उस दिन अच्छी लगी।
आधी रोटी वाली घटना के ठीक बाद का दिन था न जाने क्यों वनमाला का मूड उखड़ा हुआ, चेहरा पशोपेश भरा उदास और खीझा हुआ था। प्रियहरि कभी न जान सका कि क्यों ऐसा होता था ? क्या फिर घर या बाहर से कोई छेड़-छाड़ हुई थी या किसी भद्दे मजाक से वह गुजरी थी ? या फिर उन नलिनजी के साथ परीक्षा में जोड़ दिये जाने का अफसोस उसे था, जिनसे उसे अपार चिढ़ और नफरत हुआ करती थी ? नलिनजी उस दिन नहीं थे। उनकी जगह प्रियहरि ही काम चलाघ् अफसर की तरह काम पर था। स्टॉफ रूम में भीड़-भाड़ थी। सारा स्टॉफ परीक्षाओं के कागज बनाने में लगा था और लड़कों की भारी भीड़ कालेज में दो-चार दिन बाद शुरू हो रही परीक्षाओं के प्रवेश पत्र लेने मौजूद थी। आफिस के मिश्रा बाबू को वनमाला ने अपना काम करने बिठा लिया था। प्रियहरि ने इसी बीच मिश्रा से कहा था कि वह जाए और प्रवेश पत्र का काम देखे क्योंकि लड़के समस्या पैदा कर रहे थे। वनमाला को प्रियहरि की बात पर आपत्ति थी। उसे सुबह के समय की परीक्षाओं में नलिनजी के साथ काम करना था। उसी की तैयारी में वह लगी थी। मिश्रा के उठकर जाते ही वनमाला को मनाते हुए प्रियहरि ने वे कागज काम करने के लिए खुद उठा लिये थे जो मिश्रा के पास थे। बमुश्किल दस मिनट का काम था। प्रियहरि ने काम पूरा कर वनमाला के सामने कागज रख दिये। वनमाला जानबूझकर प्रियहरि से उलझ गई। बिना इस बात का खयाल किये कि उस रोज प्रियहरि ही नलिनजी की जगह बकायदा उसका अफसर था वनमाला ने सारे कागज उठाकर उसकी ओर फेंक दिए। वह उससे यूं पेश आई जैसे किसी कीड़े-मकोड़े से पेश आ रही हो। गुस्से में गरजती वह चिल्लाई -
''नहीं चाहिए मुझे आपके ये पेपर। मैंने काम करने आपसे नहीं, क्लर्क मिश्रा से कहा था। आप उसे काम करने दीजिए। जो मेरा मातहत है वही मुझे सौंपेगा।'' वह विक्षिप्तों की तरह चिल्ला रही थी - ''मैने उसे बड़ी मुश्किल से बुलाया था, आपने उसे क्यों भेज दिया?''
वनमाला के मन में कारण अवश्य कोई और दबा था जिसका यह विस्फोट था। सारे स्टॉफ के सामने अपमानित प्रियहरि उस दिन दयनीयता और क्षोभ से गड़ गया। सब के सब वनमाला के व्यवहार पर अचंभित थे। होना तो यह था कि प्रियहरि वनमाला पर बरसता और उसे डांटता लेकिन उसके कायर मन ने अफसोस जाहिर करते हुए उल्टे वनमाला से माफी मांगी और उसके काम के लिए तैयार कागज फाड़ कर वहीं फेंक दिये। जाहिर है कि वनमाला के मन को पढ़ने में प्रियहरि असमर्थ था। वनमाला का मन उतना सरल नहीं था, जितना प्रियहरि की भावुकता उसे समझती थी। प्रियहरि की दीवानगी उसे दयनीय बना रही थी और वनमाला थी कि अहंकार से भरी जा रही थी।
औरतें अंदर से चाहे जैसी हो, उनमें स्वच्छंदता और मस्ती की चाहे जितनी लहरें हिलोरे लेती हों, वे अपने को कभी समाज में प्रकट नहीं होता देखना चाहतीं। छुई-मुई और जांघों के बीच छिपे हृदय को परम पवित्र दर्शाने वाली आम स्त्रियां इस मामले में कुछ ज्यादा ही सतर्क होती हैं। नेक-नामी और पोशीदगी पर धब्बे का खतरा जहां आता दिखाई पड़ता है, वहां प्रेमी के प्रति उनकी सारी वासनाएं तिरोहित हो जाती हैं। अपनी छबि बेदाग साबित करने तब सारा ठीकरा वे अपने प्रेमी या प्रिय पुरुष के सर पर फोड़ना चाहती हैं। तब उससे वे इस तरह किनारा काटती हैं जैसे उनसे कभी कोई मतलब उन्हें न रहा हो। अखबारों में यह पढ़ना कि घर से भागी हुई कोई लड़की या अमुख औरत इतने-इतने दिनों बाद अपने प्रेमी के साथ पकड़ी गई और फिर यह बयान कि उसमें औरत का कोई कुसूर न था, वह तो प्रेमी ही था जो उसे बहका ले गया और यौवन शोषण करता रहा जैसे समाचार ऐसी ही तस्वीर पेश करते हैं। आदमी कटघरे में खड़ा होता है और कथित रूप से मजबूर औरत जो दिनो-महीनों-जमानों से आदमी के साथ पूरी औरत होकर देह संबंधों के आनंद में शरीक थी, महज भोली-भाली और बेकसूर बनी आती है। लोग इसे जानते हैं और ईर्ष्या, स्पृहा, जुगुप्सा से तब दोहरे वेग से ऐसी ललनाएं हवा में उन पराग कणों को बिखराती हैं जो देहगंध में छिपाए न छिपतीं अब तक अनजान भौरों को उनकी ओर लुभाती है। वनमाला इसका अपवाद न थी। अब वह प्रचार से बचती अपने गर्व भरे सतीत्व के खजाने में छुईमुई की तरह सिमट अपनी ऐसी छवि पेश करने आतुर थी, जिससे वह औरों की निगाहों में ताजा-तरीन बनकर चढ़ सके। प्रियहरि था कि अपनी लाचार निष्ठा और विश्वास के साथ वनमाला की मजबूरी को मजबूरी की तरह देखता हालात के सुधरने की ना-उम्मीद उम्मीदों में कैद था।
पिछले कुछ अनुभवों ने प्रियहरि को अन्यमनस्क बना दिया था। उसका मन यह कहता था कि वनमाला से उसे दूर ही रहना चाहिए। ऐसी औरत से संबंध रखने का क्या मतलब था जिसे संबंधों की कद्र न हो, जो प्यार को महसूस न करती हो और उसी की जड़ खोदे जो उसकी शुभचिन्ताओं में डूबा रहता है। वनमाला और प्रियहरि में यह बहुत बड़ा फर्क था कि जहां वनमाला न जाने क्यों - चिढ़ से, नफरत से या अपनी तसल्ली दूसरों पर यह जाहिर करनेके लिये कि चाहे सारे लोग उसे कुछ न समझें, जिसकी सबसे ज्यादा कद्र है वही प्रियहरि उसे मानता है उससे प्यार करता है - वह खुद आपस की प्यार-मोहब्बत की बातों को, भावना भरी आत्मीयता के क्षणों को उजागर कर देती थी। यह उजागर करना बिगड़े मूड के क्षणों में तो सारी हदें पार करता लांछन के इशारों तक पहुंच जाता था। दूसरी तरफ प्रियहरि था कि वनमाला की इन हरकतों के बावजूद उससे सहानुभूति रखता था और भयंकर अपमान और पीड़ा के क्षणों में भी मौन का सहारा ले अवसाद के अंधेरों में डूब जाता था। प्रियहरि और वनमाला दोनों को एक-दूसरे का स्वभाव मालूम था। यह विचित्र था कि वनमाला प्रियहरि पर अपना अधिकार समझती थी और प्रियहरि से उसके बगैर रहा न जाता था, तब भी दोनो के बीच के संबंध ही असहज थे। जिसे वह अपना समझता था वही उससे शत्रुता रखती थी।
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निःशब्द पर्स से खंगाल एक टॉफी वनमाला की हथेली पर उजागर होती प्रियहरि के सामने यह कहती हुई पसर गई कि - ''लो, इसे मुंह में डालो। यहां मुंह बंद रखना पड़ता है।''
नीलांजना का सहज साथ तो प्रियहरि को हमेशा ही उपलब्ध रहा है। मंजरी, वल्लरी, सुरंजना, मंजूषा, विराग और नंदिता वगैरह भी उसके अच्छे साथी और शुभचिन्तक थे । अंगनाओं से संबंधों में भावुक आकर्षण और पारस्परिक प्रशंसा तथा विश्वास का आलम हुआ करता और पुरुषों से संबंधों में ज्ञान और तर्क का माहौल बना रहता था। अब इन्हीं सब के बीच प्रियहरि का समय कटता था।
दुर्व्यवहार और अपमान की पिछली घटना के बाद प्रियहरि ने एक किस्म की बेरुखी वनमाला के प्रति ओढ़ ली थी। इस तरह के अलगाव वनमाला पर क्या असर होता था इसे कहा नही जा सकता। कभी-कभी आंखों से प्रश्नित उसकी शिकायत प्रियहरि की आंखों से टकराती लेकिन जहां सद्भावना और संबंधों की कोशिशें बिच्छू की तरह डंक मारतीं वहां प्रियहरि को कोई भविष्य नजर ही न आता था। प्रियहरि और करता भी क्या ? तब से दो-चार दिन बाद की बात है। प्रियहरि ने देखा वनमाला उसके ठीक सामने कुछ दूर बैठी काम कर रही है। प्रियहरि की उससे बोलचाल बंद थी। उसके पास भी ढेर सारे कागज थे।
प्रियहरि को काम के लिए साथी की जरूरत नहीं थी लेकिन प्रकट में वनमाला को वह ऐसा महसूस कराना चाहता था। वल्लरी से प्रियहरि के अच्छे संबंध थे। यह कोई जुलाई की बात होगी। वल्लरी मुस्कुराती वनमाला और प्रियहरि के बीच छाए मौन और खीझ को पढ़ रही थी। प्रियहरि ने बड़े प्यार और अधिकार से वल्लरी को आवाज दी -'अगर व्यस्त न हो तो मेरे पास आना, कुछ काम करा देना।'
वल्लरी प्रसन्न थी। अंदर-अंदर बगैर मेरे कुछ अतिरिक्त कहे ही आँखों ही आँखों में मेरा मकसद पढ़ लिया था। यानी यह कि वनमाला को उस वक्त चिढाने में उसकी रजामंदी शामिल थी।
''हां हां, क्यों नहीं ? बताइए जो भी काम हो, मैं साथ बैठकर कर दूंगी'' - कहती वल्लरी तुरंत प्रियहरि के पास आ बैठी। खुशी से उसका चेहरा चमक रहा था। आवाज में मुलामियत भरी प्यार की मिठास थी। इस मेल ने माकूल असर पैदा किया।
वनमाला की आंखें अचानक उठीं। उसकी आंखों में खीझ और गुस्सा था। उनमें लिखा था - ''अच्छा, तो ये बात है ? मैं नहीं, तो दूसरी सहीं ?''
प्रियहरि ने भी वनमाला को उसकी घूरती निगाहों से निगाहें मिलाते मानों यह जवाब दे दिया - ''तुम हीं नहीं, मेरे चाहने वाले और भी हैं।''
अपनी चिढ़ दिखाती, अपनी अकड़ लिए वनमाला ने कागज समेटा और तेजी से विरोध दर्शाती बाहर निकल गई। प्रियहरि ने वनमाला को जलाने के लिए जानबूझकर वैसा किया था। प्रियहरि और वल्लरी एक-दूसरे की आंखों में झांकते मुस्कुरा रहे थे।
जिस दिन की यह बात है स्टॉफ-रूम में अनुराधा, वनमाला और प्रियहरि - तीन बैठे थे। आंखों में उदासी, शिकायत, खीझ और अपने अकेलेपन के बावजूद चेहरे का अकड़ से फूला रहना वनमाला की स्थायी मुद्रा थी। घर में सुबह नाश्ता करना या खाना प्रियहरि की जीवनी में कभी शरीक नहीं रहा। उसने सेव के फल निकाले। आलमारी से चाकू निकाल उन्हें तराशा , काटा और कुछ टुकड़े अखबार पर रखकर अनुराधा की तरफ बढ़ा दिये। वनमाला से उसे उलझना न था लेकिन सौजन्य का संकोच भी था। प्रियहरि ने अनुराधा से कहा -
''अनुराधा, मैडम (वनमाला) को भी ये दे दीजिए।'' अनुराधा ने सेव के टुकड़ों से भरी हथेली वनमाला की ओर बढ़ाई। अपने स्वभाव के अनुरूप विनम्रता से उसने कहा - ''वनमाला-दी, आप भी लीजिए।''
वनमाला ने कनखियों से प्रियहरि पर नजर डाली और फिर सिर झुकाए ही एक नजर अनुराधा पर डाल धीरे से कह दिया - ''नहीं, मैं नहीं लूंगी। अभी मेरी इच्छा नहीं है।''
प्रियहरि उठा। टेबिल का चक्कर काट दूसरी तरफ से गुजकर वनमाला के सामने पहुंचा। बिना कुछ बोले सेव के टुकड़े अपने हाथों उसने वनमाला के सामने रख दिये। वनमाला ने इस बार फिर अनुराधा की ओर देखा। अब उसकी आंखों में चमक और होठों पर तिरछी मुस्कान थी। इधर अनुराधा के चेहरे पर इस बार आश्चर्य और खीझ भरे थे। वह वनमाला को देख रही थी। जैसे इससे पहले कुछ न हुआ हो, वनमाला बड़ी संजीदगी से एक टुकड़ा उठाए मुंह में बड़ी अदा से हौले-हौले चबाने लगी थी। ऐसे क्षणों में वह निहायत मासूम और भोली लगती थी। प्रियहरि उसे देखता और उसका मन सोचता रह जाता कि वनमाला आखिर क्या है ? उसके मन में भला क्या होगा ? वह तो अपना मन तार-तारकर वनमाला के सामने रख देता था लेकिन वह ? वह क्या चाहती थी ? कौन सी उलझन थी जो उसे खुलने न देकर बंद और रहस्यमय बना देती थी ? प्रियहरि के लिए वनमाला का ऐसा व्यवहार एक पहेली ही रहा आया।
सरकार के एक आदेश से सभी काम करने वालों के शैक्षिक योग्यता के प्रमाण-पत्र मंगाकर जांचे जा रहे थे। नीलांजना और वनमाला को काम दिया गया था कि मूल प्रतियों से फोटो कापियों का मिलान कर उसे दर्ज करें। भोलाबाबू का मामला रहस्यमय था। उसके कागज या तो - 'कोई और न जाने, न देखे की तरह' शामिल होते थे या फिर वे आते ही न थे। वह प्राचार्य का हमेशा मुंह लगा था इसलिए संरक्षित था। उस पर कोई दबाव डालने की हैसियत में न था। आफिस में अपने दस्तावेज नीलांजना-वनमाला को सौंपते प्रियहरि ने पूछा था कि क्या भोलाबाबू के दस्तावेज आ गए ?
नीलांजना बोली – “ना, वे तो यूं ही कापियों की झलक दिखाए बगैर कह गए कि सब ठीक है। उन्हें भला कौन कहेगा? वे तो प्रिंसिपल के खास हैं।“
प्रियहरि की आँखों से नीलांजना की मासूम झुकी नज़रें उठ मिली थीं लेकिन उसकी तल्ख़ प्रतिक्रिया का रुख वनमाला की तरफ था - ''हां भई, वे तो खास हैं। उनसे कोई क्या कहेगा ? एक मैं ही हूं जिससे सारी बहसें की जा सकती हैं।''
उसके ऐसा कहने के पीछे प्रसंग यह था कि पिछले दिन जब प्रियहरि ने मूल प्रतियों के बगैर दस्तावेज सौपे थे तो नीलांजना ने कह दिया था कि प्राचार्य के आदेश है कि मूल प्रतियां लानी है इसलिए उन्हें ले आइए।
प्रियहरि के अंदर कुछ था जो खीझ और उदासी से भरा था। वनमाला का चेहरा, जो उस दिन भी सदैव की तरह अनमनस्क, द्विधाग्रस्त, उदास था, और जिसमें होठों के बीच टॉफी का एक टुकड़ा पिघल रहा था, प्रियहरि की तरफ अचानक उठा। सूनी आंखों से उसने प्रियहरि के चेहरे में झांका। निःशब्द पर्स से खंगाल एक टॉफी वनमाला की हथेली पर उजागर होती प्रियहरि के सामने यह कहती हुई पसर गई कि - ''लो, इसे मुंह में डालो। यहां मुंह बंद रखना पड़ता है।''
ऐसा ही वह एक क्षण था जब कभी वनमाला से बेरुख प्रियहरि अपने उदास मन को बहलाता नीलांजना को बगल में बिठाए यू.जी.सी. का काम देख रहा था। वनमाला उपस्थित थी लेकिन नीलांजना और प्रियहरि के बीच आत्मीयता का ऐसा सहज, शांत राग छिड़ा था कि एक-दूसरे में डूबे उन्हें वनमाला की परवाह ही न थी। वही क्षण था जब कुछ देर उदास अकेली बैठी वनमाला की बेसब्र आवाज ने खलल डाली थी। प्रियहरि और नीलांजना के ठीक सामने पहुंच वह बड़े भोलेपन से निहारती पूछ रही थी - ''माफ कीजिएगा, मे आई डिस्टर्व यू प्रियहरि सर ?''
वनमाला की आंखों के उस मौन से, उसकी ऐसी अदा से प्रियहरि धराशायी हो जाता था। वनमाला रानी की अदा ही निराली थी। उसकी बातें उसके मौन में ही छिपी होती थीं और प्रियहरि से उसका प्यार वैसी सांकेतिक सवालिया वाणी में व्यक्त होता था। वनमाला से यूं टकराते प्रियहरि की सारी धारणाएं, सारे पूर्वाग्रह, सारी आशंकाएं, सारे भय, सारा गुस्सा - सब के सब ध्वस्त हो जाते थे। प्रियहरि ने वनमाला का वह काम कर दिया था, जो वर्षों से फाइलों में रखा था। सारे स्टॉफ ने उसका विरोध किया था कि वनमाला के पुराने मामले का निर्धारण के इस हालिया मामले से क्या संबंध है? आखिर क्यों अचानक प्रियहरि को वनमाला के पुराने मामले में दिलचस्पी हो आई है? सब नाराज हो उठे थे। सब की आशंका थी, आरोप था कि इस चक्कर में मामला उलझ जायेगा और दूसरे भी परेशान होंगे। समिति से प्रियहरि के इस मुआमले में इस कदर मतभेद थे कि तू-तू मैं-मैं की नौबत आ पहुंची थी। वनमाला के पक्ष में जिद्द पर अड़े प्रियहरि ने भी चुनौती देते हुए सार्वजनिक घोषणा कर दी थी कि लोग इसे चाहे जो समझें, यदि काम होगा तो वनमाला के पुराने मामले को हल करने के साथ ही होगा, अन्यथा किसी का भी वेतन नहीं निर्धारित होगा चाहे मामला महीनों पड़ा रहे। नौबत गाली-गलौच और गुस्से के प्रदर्शन तक पहुंच गई थी।
यह बाद की बात है कि किसी रोज कुटिलाक्ष ने प्रियहरि के रवैये पर ताने देते हुए उसे कहा था - '' प्रियहरि, आप भी अजीब बेवकूफ है। आप उसी औरत का पक्ष ले रहे हैं, जो पीठ पीछे आपकी बुराई करती, आपके लिए न जाने कितनी गंदी बातें कहती फिरती है। आप सा आदमी मैंने नहीं देखा।'' वह कहता जा रहा था - ''ऐसी-ऐसी गंदी बातें, जो मैं बताऊँ और आप सुन लें तो गश खाकर गिर पड़ेगें''?
कुटिलाक्ष की बातें जरूर सच रही होंगी। यह अजीब बात थी कि सब कुछ सुन और जानकर भी वनमाला ने प्रियहरि से बात करने की जरूरत तो समझी नहीं, बल्कि औरों के तानों से घबराकर न जाने क्या-क्या प्रियहरि के खिलाफ सब से बोल गई थी।
बहुत बाद में प्रियहरि ने वनमाला से उसके इस रवैये के प्रसंग में अपनी व्यथा कही थी तो उसे जवाब मिला था - ''आप बेकार इन लोगों से मेरे लिए क्यों लड़ पड़े थे ? यहां का माहौल क्या है, कैसी बातें लोग करते है, ताने देते है - यह आपको नहीं मालूम क्या ?'' वनमाला कहती चली गई थी - ''मैं करती भी क्या ? मुझे सारे लोग दोष दे रहे थे कि ये उनकी खास हैं न ! इन्हीं के कारण यह सब हो रहा है। ये किसी का भला न होने देंगी। न जाने क्या-क्या मुझे सुनना पड़ा था ? इसीलिए तंग आकर मुझे मजबूरन कहना पड़ा था कि मेरा आप से कोई संबंध नहीं है और मैने आप से अपने लिए वैसा करने कुछ नहीं कहा था।''
वनमाला में औरत का वह चेहरा प्रियहरि को बार-बार दिखाई पड़ रहा था, जो अविश्वसनीय था। वह ऐसा चेहरा था जो ऐन वक्त पर धोखा देता अपने बचाव के लिए पलट कर उसी को मार डालता है जो खुद उसके अपने दिल में छिपा हो। वनमाला ने अपने विभाग के एक और उत्साही साथी की योजना प्रियहरि के पास रखी थी। विश्व-व्यापार और भारत के आर्थिक हितों से संबंधित अंतर महाविद्यालयीन किसी निबंध प्रतियोगिता का वह प्रस्ताव था। पीछे कोई भी रहा हो, बातें, विचार-विमर्श और फिर निर्णय प्रियहरि और वनमाला ही मिलकर तसल्ली से करते थे। यह बात दूसरों को चुभती थी कि हर बात पर प्रियहरि की कसौटी बीच मे क्यों घसीट लाई जाती थी ? मानदेय की घोषणा सहित निबंधों की जांच के लिए प्रियहरि को भी परीक्षक और निर्णायक रखा गया था। एकाध बार वनमाला ने प्रियहरि को संकेत किया था कि निर्णायक के पुरस्कार पर एक पैकेट रखा हुआ है, जिसे वह ले लें। उसके अनुसार नलिनजी ने उसे प्रियहरि को देने कहा है। वनमाला का कहना ऐसा सहमा और संकोच-भरा होता कि जैसे उसमें उसकी इच्छा शामिल न थी और वह महज एक सूचना थी। प्रियहरि का मन दिखावे के इन प्रयासों से चिढ़ता था।
प्रियहरि ने सोचा यूं तो वनमाला उखड़ी-उखड़ी रहती है, बात तक करने से बेरुखी, हमेशा जड़ें खोदती है इसलिए भला क्यों मैं इस बेरुख उपहार से अपने को उपकृत करूं ? उसके लिए वनमाला के प्यार और संबंध की कामना इन औपचारिकताओं से अधिक थी । बाद में फिर शायद इनमें बातें हुई हों । प्राचार्य की पहल पर प्रयास यह हुआ कि बाकायदा उनकी उपस्थिति में ही प्रियहरि को वह सम्मान दिया जाए । वनमाला अपनी आलमारी से एक पैकेट निकाल ले आई थी । पीछे उसका विभागीय सहयोगी रहा था । वनमाला ने उपहार प्रियहरि को सौंपने अपने हाथ आगे बढ़ाये । प्रियहरि के मन में कटु स्मृतियां थी । यह वही चेहरा था जो उसे अपमानित करने में आनंद उठाता था । प्रियहरि ने मना कर दिया ।
उसने वनमाला से कहा -'' मैने अपना काम किया । मुझे पुरस्कार की कोई जरूरत नहीं । पुरस्कार से बड़ी चीज सद्भावना है । वह बनी रहे यही बहुत है ।''
विराग ने ठीक इसी वक्त वहां प्रवेश किया था। वनमाला के जाने के बाद जब उसने प्रियहरि को अकेला पाया तो कहा - '' वनमाला जैसी है, वैसी है । पर आप ने अच्छा नहीं किया । आप से सरोकार कुछ तो होगा, जो वनमाला आप की परवाह करती है ? लोक के भय से वह यूं ही अपने में सहमी-सिमटी होती है। अब जब वह यूं खुली तो आप ने आग्रह टाल औरों के सामने उसे यह बतलाने बेइज्जत कर दिया कि आप को उससे कोई मतलब नहीं । अपना अहंकार तो आप ने प्रदर्शित कर दिया पर अब जरा यह भी सोचियेगा कि वनमाला को भला आप के व्यवहार से कैसा लगा होगा ?
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