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फटफटी फिर से चल पड़ी



अपुन ने सोचा काकी को नहाने जाने दो फिर काकी की राम तेरी गंगा मैली देखेंगे.

पर साला काकी मुस्कुराई तो थी....

ज्यादा स्पीड में चलो तो एक्सीडेंट होता है....थोड़ा हल्लू हल्लू....

मगर कल जिस तरह काकी को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया था मेरी गांड फटी....मैंने सोचा कुछ न्य एंगल बनाते है. उस बाथरूम की दीवारें 6 -7 फूट ऊँची थी मगर छत से मिली हुयी नहीं थी.....काफी गेप था. मैंने गार्डन घुमाई और देखा की अगर सामने से छत पर खड़ा हो जॉन तो कुछ सीन बन सकता है.

लौड़ा क्या चाहे.....कुछ नज़ारे.

मैं भाग कर छत पर गया. अपना idea बिलकुल सही था बाबा.

फुल बालकनी नज़ारा था.....

मगर काकी का सर ही दिख रहा थी. वो इतनी देर में नहा भी ली थी.और झुक क शायद अपने बदन को पोंछ रही थी.

मैंने मुंडेर से झाँकने की कोशिश भी की लेकिन लंड बाबाजी.

निर्मल बाबा की सलाह के जैसे ये idea भी फुस्सी फटाका निकला.

काकी का सर देखकर क्या करूँगा......बाथरूम की दीवार पर लगा एक लकड़ी का पटिया पुरे view की मां कर रहा था.

काकी ने अपना हाथ उठाया.....नरम नरम ...गोरा...गोरा.....मोटा......ताज़ा हाथ.....भेनचोद....हाथ नहीं देखना......सीन दिखा दो काकी.

काकी ने ब्लाउस जो की धन्नो का था उसमे हाथ डाला और वो आधे में फंस गया....

वो मारा पापड़वाले को.

धन्नो के कपडे तो छोटे है.. काकी ने कोशिश की मगर उनका हाथ कोहनी के ऊपर से ही ब्लाउस में फंस गया. फिर उन्होंने हार कर ब्लाउस खोला....और शायद झुक कर पेटीकोट में पैर डाले.....उनके सर हिलने से लग रहा था की वो भी छोटा था....

कहाँ 6 फ़ीट की कद्दावर औरत और कहाँ पौने 5 फ़ीट की धन्नो.

लंड धन्नो के कपडे लल्ली काकी को नहीं आने वाले. मैंने तो पहले ही लेग्गिंग और टी-शर्ट निकाल कर बाथरूम मे टाँग रखी थी काकी के लिए.

साला मौका छुट गया.

मैं कुछ झलक के इंतज़ार में वहीँ खड़ा हो गया....मगर काकी की शायद मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया. उन्होंने कहा " लल्ला....."

भाई कसम से डर वाले शाहरुख़ खान वाली फीलिंग आयी...

."क़....क़.....क़......किरण ...."

"क़....क़.....क़......काकी....."

मैं तुरंत पीछे हटा.....आज थोड़ा सावधान था नहीं तो फिर बर्तनों में जा गिरता.....

भेनचोद मारे ठरक के मेरा मुंह सूखा जा रहा था..

बाथरूम से काकी की आवाज़ आ रही थी....वो ज़ोर लगा लगा कर कपडे पहन रही...थी.

मैं जल्दी से नीचे आया और चुपचाप आँखे बंद करके चारपाई परलेट गया

मैं खाट पर ही पड़ा रहा....काकी 20 मिनट बाद बाहर निकली. मैं चटपट उठ बैठा.

सफ़ेद झीनी लेग्गिंग......सफ़ेद पतली छोटी टीशर्ट....

माँ.....धुरी.....

काकी ने अपने कन्धों पर तौलिया डाला हुआ था.....आगे से पूरा ढंका हुआ.

लेग्गिंग काकी के नाप से कम से कम २ साइज छोटी थी.....उनकी टांगों से ऐसी चिपक गयी थी मानो चमड़ी हो..

काकी की मोटी मोटी गदराई जाँघे ऐसी लग रही थी की चिकन का लेग पीस हो....रसीली ..

गीले बदन पर ही लेग्गिंग पहनने से लेग्गिंग हलकी से गीली हो गयी थी.

एक तो पतला सफ़ेद कपडा, उस पर भीगा हुआ....

तू ही समझ ले प्यारे...

अपने कान फूंक फूंक गरम हो गए बे.

काकी ने तौलिये को सामने से शाल की तरह लिया हुआ था.....वो मेरे सामने ने पंजो के बल चलती हुयी गयी और मेरी नज़र जा चिपकी लेग्गिंग में फंसे उनके विशाल पिछवाड़े पर....

गीले बालों से गिरता पानी पीछे से उनकी लेग्गिंग को पूरा पारदर्शी बना चूका था....काकी की चड्डी तो मैंने कल ही छुपा दी थी..

काकी की २१ गज़ की विशाल गांड सफ़ेद भीगी लेग्गिंग में लिपटी मानो मेरे को चिड़ा रही थी.

लेग्गिंग पुरानी सी थी. उसका रेशा रेशा काकी की विशाल गांड के वजन से चौड़ा हो गया था....गांड की दरार क्या मेरेको तो उनके दांये कूल्हे पर एक मोटा सा तिल भी दिख रहा था.....

कसम उड़ान छल्ले की ...

बाबू अपन कही नहीं जा रहे...

अब मामला गंभीर हो चुका था. सुबह सुबह अपने बाबूराव को काकी को पकड़ा के अपना एंजिन वैसे ही सिटी मार रहा था. मेरी नज़रे काकी को ऐसे घूर रही थी की मुझे पक्का यकीन था की काकी भी अपने बदन पे मेरी निगाहों को महसूस कर रही है.

काकी मेरे सामने से धीरे धीरे चलती हुई चोक के कोने मे गयी और अपने तौलिए को हटा कर अपने बालों को फटकारने लगी.

काकी की पीठ मेरी तरफ थी और उनके झुक जाने से उनकी विशाल गददर गांड फेल कर मुझे मुँह चिडाने लगी. ऐसा लग रहा था की लेगिंग अब फटी.

लेगिंग काकी की जाँघ के पिछले हिस्से पर कस गयी और उनकी जाँघ के पिछले हिस्से का गदराया हुआ नरम नरम नाज़ुक माँस लेगिंग के रेशों मे से झाँकने लगा.

किसी भी औरत मे लोग जाने क्या क्या देखते है. मम्मी गांड होन्ट. आँखें, कमर.

अबे भैय्ये.....किसी औरत की भारी भारी जाँघे देखो….जाँघ का पिछला हिस्सा देखो.

काकी के इस राम तेरी गंगा मैली रूप को मे अपनी आँखों से हुमक हुमक के पी रा था.

काकी तो अपने बालों को फटकारने मे व्यस्त थी और मैं रूप दर्शन मे.

ना जाने कब मेरा हाथ अपने बाबूराव पर पहुँचा और मैं अपने भन्नाये बाबूराव को हाथ फेर कर समझने लगा.

काकी की तो लेनी है बाबू…

और हाँ घोड़ी बना के ही...

शायद मैं सोचते सोचते ज़ोर से बोल गया. काकी एक दम पलटी और बोली…

“हैं….लल्ला….जाग गया क्या….?”

अपुन चुप.

काकी का सफेद टी शर्ट आगे से भी भीग चुका था. शर्ट उनके निप्पल और उसके आसपास का भूरे हिस्से पर लेमिनेशन जैसा चिपका हुआ था.

ठंडे पानी से शायद काकी के चूचुक टनटना गये थे. काकी के जामुन जैसे निप्पल शान से सिर उठा के खड़े थे.

इसकी मा की

अबे बच्चे की जान लोगे.

मैं तो काकी के इस गदराये हुस्न को ही देखे जा रा था. नीचे से देखना शुरू किया.

 


काकी की विशाल जंघे, गोरी गोरी कमर पर कसी लेग्गींग , हल्का सा बाहर निकला पेट, कमर के दोनो और के उठाव और घुमाव, उनकी विशाल नाभि पर पड़ी पत्दर्शी सफेद टी -शर्ट.

और उसी टी -शर्ट से झँकते दो पपीते. काकी सच्ची मे पॉर्न स्टार लग रही थी मामू .

बस साला ये पॉर्न पिक्चर न्ही थी.

काकी फिर बोली, “ अरे लल्ला……चाय पिएगा क्या….?”

अब बोलना पड़ा.

“ह…ह….हन….काकी…..”

भेनचोद ठरक के मारे मेरा गला सुख गया था. कौए जैसी आवाज़ निकली.

काकी बोली, “ हैं…..बेटा….क्या हुआ….”

मैने गला सॉफ किया और बोला “ ब…ब….ब्ना दो….काकी….”

काकी वहीं पर बनी रसोई की तरफ बढ़ी और मैं उनके पिछवाड़े की लचक देखता रहा.

वहाँ पर एक छोटा स्टूल था…काकी टटोल कर उस पर बैठ गइ. साला इतने से स्टूल पर काकी की विशाल गांड कैसे टिक गइ ?

काकी ने धीरे से गॅस को टटोला और अंदाज़े से बर्तन उठाया. एक बात थी, अंधी काकी को अंदाज़ा और अपने आसपास्स का पूरा ज्ञान था.

वो धीरे से हाथ बढाती मगर चीनी चाहिए तो चीनी ही उठती, चाय पत्ती चाहिए तो चाय पत्ती .

चाय गॅस पर उबलने लगी. काकी बोली, “ लल्ला….वहाँ बर्तन पड़े होंगे….एक ग्लास ले आ…”

मैने ग्लास उठाया और मेरे होश तीतर बटेर हो गये.

ग्लास मेरे हाथ से छूट गया और मेरी साँस ही रुक गयी.

काकी स्टूल पर पैर चौड़े किए बैठी थी. उनकी मुनिया के ठीक उपर लेगिंग ने साँस छोड़ दी थी.

वहाँ की सिलाई उधड़ गयी थी और जन्नत का दरवाज़ा ठीक मेरे सामने……

काकी एक दम से चौंकी

“हाय राम क्या हुआ….”

इधर मेरी आँखें नही हट रही, बाबूराव फंनफना रहा. गिरा हुआ ग्लास फर्श पर गोल गोल घूम रहा और मेरी नज़रें…

काकी की लेगिंग बेचारी काकी के नरम गरम गुदाज गदराये भरे बदन के आगे हार गयी थी.

क्या है बेटे अपनी किस्मत तो कामदेव भगवान ने लिखी थी न .

मर्जानी लेगिंग फटी भी तो कहाँ से….

हा..हा..हा

अपने अंदर का प्रेम चोपड़ा, पापा रंजीत और शक्ति कपूर तीनो एक साथ आउ बोल पड़े.

काकी की मुनिया पर घमासान झांटे थी.

झांट वाली या सफाचट हो, पर प्यारे चूत तो चूत होती है

काकी घबरा गइ थी इस लिए एकदम उठने को हुई तो उन्होने अपने पैर सिकोडे और अपना शो बंद.

परदा गिरा तो अपुन को होश आया.

“अरे…क्या हुआ…लल्ला…..ग्लास कैसे गिर गया….अरे राम तू फिसल तो न्ही गया….?’

“अरे न…न….नही….काकी…..वो….थोड़ा ..फिसल…गया..”

“हाय राम…..लगी तो न्ही….” ये कहकर काकी उठने लगी. मैं बोला “अरे न्ही….न्ही…काकी….मैं ठीक हूँ पर पैर मूड गया”

काकी बोली “ आ इधर आ…मोच आ गइ क्या..?”

अब कुछ न्ही सूझा तो मैने बोल दिया “ह…ह….हाँ ....हाँ …मोच आ गइ”

“आ मेरे पास बैठ, . दिखा पैर…कहाँ पर आई….”

लौड़ा क्या मांगे....चूत.

मैं झट से उनके सामने बैठ गया. अब वो बैठी थी स्टूल पर और मैं ज़मीन पर. पास आते ही उनके गीले टी शर्ट मे से मम्मे और सॉफ सॉफ दिखने लगे. काकी के झुकने से मम्मे मस्ती से झूल रहे थे और उनके साथ ही मेरा बाबूराव भी झूम रहा था.

जैसे की मम्मे बीन और अपने बाबूराव सपोला

काकी ने अपने पैरों को फैलाया और झुकी. मैं तुरंत आगे आया की चलो दरवाजा खुला.

काकी का सर झुकना और मेरा आगे होना एक साथ हुआ और मेरा सर उनके कंधे से जा टकराया. काकी बोली, “ हाय राम….दिखता नही क्या…..मैं तो आँधी हूँ…तू तो आँख वाला है”

आबे अपनी आँखे कहा है क्या बोलू…

“पीछे सरक……ला तेरा पैर बता….”

मैने अपने पैर उठा कर काकी की नाज़ुक नरम हथेली पर रख दिया….इसकी माँ की आँख..... काकी की तो हथेली भी गद्देदार थी. जब काकी मेरे बाबूराव को अपनी मुठ्ठी मे लेकर मसलेगी…

“अरे….कहाँ खो गया रे…..”

“हैं….ह…हन….हन…..क…क्या ….काकी…”

“अरे मैं पूछ रही हूँ कहाँ मोच आई, तलवे मे…..कहाँ….घुटने पर ?”

मैने बगैर सोचे समझे हाँ बोल दिया….काकी का गुदज हाथ मेरे पैरों पर फिसलता हुआ मेरे घुटनो पर आ गया. उन्होने मेरे घुटने की कटोरी टटोली और बोली,

“ मामूली सी मोच लगती है….ज़्यादा दर्द है क्या….?”

“न…न….नही….हल्का सा….”

“ला तेल लगा दूं………”

उन्होने स्टूल पर बैठे बैठे ही पीछे मूड कर तेल की बरनी टटोली.

वो सफेद टी शर्ट इन सब मे और उपर चड गया था और काकी का मांसल पेट और कमर पूरी नंगी मेरे सामने थी.

जिस औरत की मुँह दुनिया ने कभी पूरा नही देखा था मैं उसको ऐसे आधी नंगी हालत मे देख रहा था ये सोच सोच कर मेरे गोटों मे उबाल आने लगा. काकी की दोनो जाँघे तो अब जुड़ चुकी थी मगर मेरी नज़र उनकी घुमावदार कमर के कटाव पर थी.

काकी ने सरसो का तेल उठाया और थोड़ा सा हाथ मे ले कर आगे झुकी….आगे झुकने की लिए उनको फिर से अपनी टाँगें खोलनी पड़ी……

वो मारा पापड़ वाले को..

 


लेगिंग थोड़ी सी और उधड़ गयी थी. ऐसा लग रा था की काकी की मुनिया ही लेगिंग को फाड़ कर बाहर आ गइ हो….लेगिंग का बचा हुआ हिस्सा काकी की मुनिया को चारो और से दबा रहा था और इस कारण उनकी मोटी गददर मुनिया और फूल कर पाव रोटी जैसी निखर आ रही थी.

अभी अगर मैं अपने बाबूराव को छू भी लेता तो वो अपने प्राण छोड़ देता…दे पिचकारी पे पिचकारी मारता की काकी को नहला देता.

काकी मेरे घुटने को रगड़ते हुए कुछ बोल र्ही थी….

“तेरे पैर तो बड़े तगड़े है छोरे….दौड़ लगाता है क्या……?”

अब क्या बोलू की मेरे कंजूस बाप ने बाइक तक नहीं दिलाई. चप्पल घिस घिस के ये तगड़ी हो गइ.

काकी ज़ोर लगा लगा कर मेरे घुटने को मसल रही थी …..वो तो भला हो की मैने चड्डी पह्न ली थी वरना कही काकी का हाथ थोड़ा उपर आ जाता तो….इतनी ही देर मे काकी के उकड़ू होकर ज़ोर लगाने से और तेल की चिकनाई से काकी का हाथ फिसला और काकी के हाथ सीधे मेरे बाबूराव तक ही आ गये….

“हाय राम……अरे मेरा हाथ ही फिसल गया…..”

काकी पीछे होकर उठी और स्टूल पर जा बैठी. उन्होने फिर से टाँगे चौड़ी की और अपने गले से पसीना पोंछने लगी….

शायद अंधी काकी की मुनिया की नज़रे बाबूराव पर पड़ गयी थी….काकी ने धीरे से अपनी मुनिया को खुजाना चाहा और नीचे हाथ ले गइ. जैसी उनका हाथ अपनी नंगी झांटों पर पड़ा उनका मुँह हैरत से गोल हो गया और वो अपनी फटी लेगिंग से झाँकी मुनिया को टटोलने लगी.

काकी ने तुरंत अपने टाँगे बंद कर ली.

काकी ने कुछ लंबी साँसें ली और नॉर्मल होने की कोशिश करने लगी…

“य…….यह….कपड़े भी बहुत ही छोटे है ……पुराने भी है…..उधड़ उधड़ जा रहे है…..?”

अपुन ने मौके की नज़ाकत समझी और बोला, “ क…क….कहाँ से उधड़ा …..मुझे तो नहीं दिखा..”

काकी बोली “ अरे राम …मैं बोली उधड़ ना जाए….”

अपुन ने हिम्मत बटोरी और बोले “ अरे नही.....हो... काकी…..कुछ नहीं होगा….थोड़ा बहुत कुछ हो गया तो अपन लोग तो घर मे ही है ना…..आप के कपड़े सूखे तब तक भले पह्न के रख लो….”

“हाय राम…मुझे तो शरम आ र्ही है….बहुत तंग है ये….”

“न…न….नही……काकी……इसमे…क….क….क्या शरम…….”

“हाय राम तो क्या तेरी तरह नंगी घूमू घर मे बेसरम……..हैं…..लल्ला…….एक बात बता……तू……नंगा क्यू सोता है रे…..”

अपनी......फटफटी चल पड़ी

“क…क….क्या……काकी ?”

“और नहीं तो क्या, सुबह मैं तेरी खाट के पास आई थी, तू नंगा ही पड़ा था….बेटा अब तू बड़ा हो गया है…..”, काकी समझाने के अंदाज़ से बोली.

“व् ….व् ....वो क्या है की काकी….मुझे…..तंग कपड़ो मे नींद नही आती और फिर इतनी गर्मी थी….इसलिए….म…म…मैं…..”

“हाय राम तो मैने तो तुझसे कहा ही था की अंदर मेरे कमरे मे सोया कर, कूलर है, पंखा है….मुझे तो रात को ठंड लगने लगती है…..”

अब मैं कैसे मना करता. मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है.

“सच बता लल्ला….यह कपड़े बहुत झीने है क्या…..?”

मैने सोचा की अगर हाँ बोला तो ये कहीं कुछ और ना पहन ले.

“न…न…नही…काकी….ऐसे तो झीना नही है….मगर आप बाहर मत जाना….इन कपड़ो मे….”

“लो बताओ…..मैं अंधी क्या करूँगी बाहर जा के…..हाँ मगर…..मंदिर मे पूजा थी…..वो भोलेनात जी के मंदिर मे आज अभिषेक था…..प्रसाद भी चड़ना था…..

चल मेरी साडी सुख जाएगी तो….”

“अरे म.म.म…..मैं चला जाता हूँ काकी….”

“हैं…..अरे…..हाँ यह हीक रहेगा. बेटा तू ही चला जा. आज धन्नो भी नहीं आएगी और मैं थोड़ा समान ठीक कर लूँगी….देख तो बेटा मेरा पेटीकोत सूखा की नही….यह मरा पाजामा तो बहुत ही तंग है….बैठा नही जा रहा…”

बैठा तो क्या नही जा रहा. काकी की लेगिंग मे खिड़की खुली थी. इसीलिए काकी को लेगिंग बदलनी थी. अपुन गये और ईमानदारी से एक लोटा पानी काकी के सारे कपड़ो पे डाल दिया और चिल्लाया “ काकी…..कपड़े तो अभी भी भीगे हुए है..”

काकी ने ठंडी साँस ली और बोली, “ठीक है बेटा…..कपड़े थोड़े धूप मे कर दे….अब क्या करू…इन्ही कपड़ों मे मरना पड़ेगा….”

मैं जाके तुरंत काकी के सामने बैठ गया. काकी आटा लगा रही थी. धीरे धीरे उनके पैर फिर खुल गये और नज़ारा ए जन्नत अपने सामने.

तंग कपड़ो मे कसा हुआ काकी का बदन धीरे धीरे पसीने मे नहा गया. उनके गले से पसीने की एक धार उनके विशाल मम्मो के बीच की खाई मे उतर गयी और उनके मांसल पेट पर से होती हुई उनके लेगिंग के एलास्टिक को भिगोने लगी.

धीरे धीरे काकी का पूरा बदन पसीने मे नहा गया.

अब प्यारे तू मेरी हालत सोच.

मेरे से 3 हाथ की दूरी पर एक मांसल ग़ददर गुदाज़ बदन की मलिका पसीने मे नहाई अधनंगी बैठी थी और उसके खाना बनाने से उसके मम्मी कभी झूलते कभी तन जाते…कभी टाँगे चौड़ी होती…विशाल जांघों के बीच मे काले बालों में गुलाब सी काकी की मुनिया दिखती…..

बाबू…काकी को पता था उनकी लेगिंग उधड़ चुकी है, उनके कपड़े अर्धपारदर्शी है फिर भी वो बड़ी मस्ती से वहाँ बैठ खाना बना ने मे लगी थी. अब अपुन लल्लू हो मगर चूतिये तो नही है ना…

कुछ कदम बढ़ाना पड़ेगा प्यारे…

“क…..क…..काकी….” अपुन टर्राए.

काकी आटा लगाते हुए बोली, “ हाँ लल्ला…..”

“आ…आ….आप का अकेले मन कैसे लगता है….”

काकी ने ठंडी साँस ली और बोली, “ बेटा अब किस्मत मे जो लिखा सो लिखा है……तेरे काका यूँह भी साल मे दो बार आते थे मगर ये घर भरा पूरा था इस लिए उनकी इतनी कमी नही खलती थी…..रूपा की देखभाल और घर खेत खलिहान मे ही दिन काट जाता था…..रात को ज़रूर उनकी बड़ी याद आती थी…..उनकी चिट्ठियें सीने से लगा की सोती थी बेटा…..”

“काका भी जल्दी चले गये…..काकी”

“हन बेटा….अभी उनकी उमर ही क्या थी…..45 पूरे ही हुए थे…”

“आप तो उनसे कितनी छोटी है काकी…..”

“हैं….बेटा…..मैं तो……अब मेरी उमर…देख जब रूपा हुई थी तो मैं थी 17 की……और रूपा हो गयी है 20 की तो देख ले मेरी उमर…..”

“काकी आ….आ….आप 17 साल की उमर मे ही मा बन गयी थी ?”

“हाँ तो बेटा……मेरी शादी तो कम उमर मे हो गयी थी….वो तो मांजी ने 2 साल मुझे इनसे अलग सुलाया नही तो ……”

“म….म….म…..मतलब काकी…..?”

काकी के चेहरे पर एक तिरछी मुस्कान खेल गयी, “अरे लल्ला….इतना भी नही समझे हो क्या…..राम शहर के छोकरे..यूँ तो बड़ा ज्ञान बघरे है…..है पूरे निख्खटू ….”

भेनचोद काकी ने अपुन को निख्खटू बोल दिया अभी बताता हूँ की कैसी मैं नीलू चाची की दरार को सुरंग बना रहा हूँ…

 
काकी कुछ बोल रही थी…..

“ह..ह….हाँ काकी…..?”

“ अरे तू कहाँ खो गया……”

“नही….वो….म…म…मैं….”

“रूपा के होने के बाद बहुत कोशिश की एक बार और गोद भर जाए मगर रामजाने कुछ नहीं हुआ….बेटा तेरे काका को तो बच्चे बहुत पसंद थे…कहते थे….लल्ली…..देखना कबड्डी की टीम खड़ी करूँगा…..और मैं कहती जाओ जी….7 बच्चे मुझसे ना होंगे….इतना बोलती और वो मुझे……”

“क….क….क्या काकी….”

ठंडी साँस…”कुछ नही रे लल्ला…..जल्दी चले गये तेरे काका….इतनी उमर मे विधवा कर गये……पहनना ओढना सब धरा रह गया…..मुझे बहुत शौक था….मेहंदी महावर लगाने का….क्रीम पाउडर लगाने का………वो जब आते तो ओंठ लाली लाते थे और कहते लगा कर दिखा….मैं कहती क्या करना जी लगा कर अभी आप इसे मिटा …..”

काकी रुक गयी और काकी की साँसें थोड़ी सी भारी हो गयी…..अपुन समझ गये काकी को काका की याद आ रही है. और याद आ रही है काका का मूसल.

“क…काकी….आपको काका कश्मीर ले गये थे…ना….”

“हाँ रे बेटा….”

“क्या क्या देखा वहाँ पर…..”

“देखा….? अरे तेरे काका ने कमरे से निकालने दिया हो तब ना…..अरे राम….होटेल का पलंग ही तोड़ डाला था….” और खि खि कर हँसने लगी.

अगर काकी अपनी आइटम थी तो काका भी अपना था तो सख़्त लौंडा

पलंग तोड़ डाला.

“क्या बताऊ बेटा….मुझे तो छोड़ते ही नही थे…”

“उनकी पकड़ ऐसी थी की एक बार पकड़ लेते तो छूटना मुश्किल……कभी मेरे गाल पर चिकोटी काट लेते तो निशान तीन तीन दिन तक नही जाते थे…..उनके कारण मैं रोज़ सुबह देर से उठती और मांजी की डांट खाती….मगर उनको कोन समझाए…….”

काका को याद करते करते काकी धीरे धीरे गरम हो रही थी…..उनकी टांगे बार बार खुल बंद हो रही थी और कसम उड़ान छल्ले की मेरे को ऐसा लग रहा था की काकी की मुनिया पर कुछ गीला गीला सा दिखा……

इधर काकी की गाड़ी ने तो स्पीड पकड़ ली थी. “

“पूरे बदन पर चिकोटियां काट काट कर निशान कर देते थे….हाय इतनी शरम आती थी………मेरी सब सहेलियाँ खूब मज़ाक बनाती थी मेरा……और मैं कहती मर्द है……रात भर प्यार करेगा तो यह सब तो होगा निगोड़ियों………सब चुप कर जाती……किसी का मरद ऐसा नही था जो पलंग तोड़ प्यार करे……..मैं मुँह पर हाथ रख लेती तो भी मेरी आवाज़ें बाहर तक आती थी……मांजी ने तो मुझे कई बार डांटा भी…था……मगर….अब वोही सहेलियाँ अपने मरद की बातें करती है और मैं सुनती हूँ……कैसे किसी के मरद ने उसे शहर से इंग्लीश कपड़े ला के दिए और उसके पहनने के बाद…..उन्होने……...….बेटा उनकी तो इतनी याद आती है, कभी कभी तो रात भर नही सोती..”

काकी की आवाज़ एकदम भर्रा गयी और उनकी आँखों से आँसू छलक आए. मैं तुरंत उठा और उनके आँसू पोंछ दिए और उन्हे चुप करने लगा.

काकी ने मेरे हाथ पकड़े और हटते हुए बोली, “ रहने दे बेटा…..रोने दे”

मैने काकी के हाथ पकड़ लिए और बोला, “न…न…न..नही काकी मैं आपको रोने नही दूँगा….”

काकी ने ज़ोर लगाया मगर अपुन भी इतने तो सींकिया पहलवान नही थे अपुन ने भी ज़ोर लगाया.

काकी छोटे से मुड़े पर बैठी थी और मैं उनके सामने घुटनों के बल खड़ा उनसे ज़ोर आज़माइश कर रहा था. अब था ऐसा की काकी के किससे सुन सुन कर और उनकी मुनिया को पनियया देख कर अपने बाबूराव ने भी खड़े होके सलाम दे रखा था….अपुन थे सिर्फ़ ढीले ढले चड्दे मे. बाबूराव पूरा टेंट बना के गुर्रा रहा था.
 
काकी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की मैने आगे झुक कर ज़ोर लगाया. काकी के पसीने से भीगे बदन से ऐसी खुश्बू आ रही थी की भेन चोद मेरा तो रोम रोम खड़ा हो गया. यह किसी सेंट की खुश्बू नही थी यह महक थी एक मादा की......जो गरमी में आयी हुयी है....वो खुशबु जो उसके पूरे बदन से उड़ उड़ कर आसपास के हर मर्द को बावला कर देती है.

मेरे नथुने गली की कुत्ते जैसे फड़कने लगे…बाबूराव तो एकदम तन्ना के पूरा सरिया हो गया,

इधर काकी ज़ोर लगाए जा रही थी की अचानक उनका बॅलेन्स बिगड़ा और वो मुड़े से फिसल कर पीछे की और गिर पड़ी . अब अपुन फुल ज़ोर लगा रहे थे और उनके दोनो हाथ पकड़ रखे थे, उनके पीछे गिरते है मेरा भी बॅलेन्स बिगड़ा और मैं उनके उपर ही आ गिरा.

अब सीन ऐसा की इधर काकी फर्श पर टाँगे चौड़ी किए गिरी हुई और उनके उपर अपुन.

अपना मुँह टी शर्ट मे फँसे उनके विशाल मॅमन पर……अपुन सिर्फ़ चड्डी पहने.

काकी चिल्लाई…..

“हाय राम……..उठ…….राम राम……छोकरे तूने….मुझे ही….”

एकदम से काकी चुप हो गयी……चड्डी मे तंबू बनाए अपना बाबूराव उनके पेट के निचले हिस्से पर गड़ रहा था. काकी खेली खाई औरत थी उनके ये समझने मे देर नही लगी की यह कड़क चीज़ क्या है.

काकी के बोबे तो नरम थे मगर उनके निप्पल फूल कर कुप्पा हो गये थे. अपना पूरा ध्यान उनके नरम मम्मो और कड़क निप्पल पे था और उनका ध्यान उनके पेट पर चुभ रहे मेरे सरिये पर….

काकी की साँसे तेज़ तेज़ चल रही थी और मेरी तो रेल के एंजिन जैसी चल रही थी. काकी अपना हाथ छुड़ा कर सीधे अपने पेट पर ले गयी और उनका हाथ सीधे मेरे सवा सात इंची लौड़े से जा टकराया.

“हाय राम………” वो चिल्लाई….

उनकी उंगलियाँ धीरे से मेरे बाबूराव पर कस गयी और वो फिर से बोली मगर अबकी बार उनकी आवाज़ फुसफुसाते हुए निकली थी….

“हाय……..राम…….”

“हाय राम….” काकी का यह फुसफुसाहट वाला हाय राम बहुत सेक्सी था ईमान कसम मेरे रोए रोए मे करेंट दौड़ गया.

काकी की उँगलियाँ अभी भी पाजामा मे तंबू बनाए मेरे बाबूराव को पकड़े थी. उन्होने अचानक बाबूराव को भींच लिया और मेरे मुँह से सिसकारी निकल पड़ी.

काकी ने एकदम से झटका खाया और बोली, “ उठ……जा……..उठ……”

और फिर ज़ोर से चिल्लई, “ अरे हट परे….निगोड़े …उठ……”

मेरी तो फटफटी चल पड़ी भाई

मैं तुरंत बबुआ जैसे उठ खड़ा हुआ. काकी कुछ पल ज़मीन पर ही पड़ी रही और उनकी साँसे धोंकनी जैसी चल रही थी, चेहरा लाल भभूक हो गया था. उनकी टाँगे अभी भी खुली हुई थी और फटे लेगिंग मे से झांकता झांटों का जंगल मुझे मुँह छिड़ा रहा था. मेरी नज़रें अभी भी काकी के बदन पर ही चिपकी थी. कसी हुई लेगिंग और मम्मो पर चिपकी शर्ट मे काकी कामदेव की लुगाई लग रही थी.

अपुन की हालत गैस पर उबलते दूध के जैसी थी की बस अब उफना. बड़ी मुश्किल से अपने आप को रोक रखा था इच्छा तो हो रही थी की भेन चोद मा चुदाए दुनिया काकी के कपड़े तार तार कर दूं मगर …..

बस…..फटफटी

काकी ज़मीन पर लेटे लेटे बोली, “ ला….हाथ दे….”

मैने अपने हाथ आगे किया और काकी को उठाने लगा. काकी ज़ोर लगाकर उठी और झोंक झोंक मे मुझसे फिर टकरा गयी. बाबूराव फिर उनके जांघों पर रग़डी खा गया.

कसम उड़ान छल्ले की बाबू….चिंगारियाँ उड़ी चिंगारियाँ.

काकी ने लंबी लंबी साँसें ली और बोली, “ छोरे……तू…..क्या…….अरे राम….क्या बोलू………सुन…..यह सब…………ये…….. ठीक ना है…..तू आपे मे रह….”

और धीरे धीरे टटोलते हुए अपने कमरे मे चली गयी. अपुन को काटों तो खून नही. सारी ठरक उतार गयी भेन चोद .

मैने जैसे तैसे अपने आप को संभाला. मुझे भी लगा की यह तो चोद हो गयी यार….बिचारी अंधी …विधवा……मेरे बाप की काकी……मेरी दादी हुई रिश्ते मे……ये ग़लत है.

बुरा लगा यार.

फिर अपने अंदर का क्राइम मास्टर गोगो बोला की अगर ये सब ग़लत लगा तो काकी ने जो दो दो बार ग़लती से तेरा लौड़ा पकड़ा…..और वो खाट के नीचे जो माल ढोला उस पर काकी का हाथ लगा था क्या उनको नही पता की वो क्या था…..और जो सुबह सुबह फिर से लौड़े पर हाथ लगा दिया……अभी फिर लौड़ा पकड़ लिया….मसल दिया.

बाबू….सीन तो है मगर इतना सीधा नही.

अब क्या करू समझ नही आ रहा था तभी किवाड़ बजा. मैं तुरंत चिल्लाया “ कौन….?”

“छोटे बाबू….हम है हरिया…”

“हाँ ….बोलो….क्या काम है…?”

“अरे बाबू वो मालकिन तो ले जाने आए है……महादेव मंदिर मे अभिषेक रखे है ना अपने तरफ से…मालकिन ने दक्षिणा डी है तो परसाद…..और दर्शन….”

मैं गया काकी के कमरे के बाहर….और आवाज़ लगाई, “ काकी…….वो हरिया आया है मंदिर जाने का पूछ रहा है….”

अंदर से काकी की घुटि घुटि आवाज़ आई,” तू चला जा…….”

काकी रो रही थी शायद. मा की चूत यार ये क्या हो गया.

मैने खिड़की से झाँका काकी औंधे मुँह बिस्तर पर पढ़ी थी और उनका पूरा बदन हिल रहा था.

रो ही रही थी. अरे यार एक मिनट.....उनका हाथ उनके शरीर के निचे था और.......अबे वो हिल क्यों रही थी इतनी ज़ोर ज़ोर से....

मैं कंफ्यूज टाइप बाहर आया और किवाड़ खोला. हरिया उल्लू जैसा मुँह बनाए खड़ा था.

“मालकिन को देर है क्या…..?”

“ मालकिन की तबीयत ठीक नही है….वो नही आएगी…”

हरिया का मुँह लटक गया फिर एकदम खुश होकर बोला “ तो मलिक आप चलेंगे ……..चलिए खेत भी ले चलू…”

इसकी मा के भोस्डे मे घुस गया खेत…ये गांडू पागल है क्या…जब देखो खेत खेत.

मैने गुस्से से कहा, “ म….म….मंदिर चलो…..”

“जी भैया जी….”

मंदिर काफ़ी बड़ा और पुराना था. बढ़िया पूजा पाठ चल रहा था. हरिया ने पंडित जी से पूछा और बताया की अभी थोड़ा समय है पूजा ख़त्म होने मे. वो जाक्र 2-3 गाओं वालों के साथ बैठ गया जो सिला-लौड़ी पर कुछ हरा हरा पीस रहे थे.

मैने थोड़ी देर बैठा रहा. मारे गर्मी के गला सूखा जा रहा था. कुछ ही देर मे तो पसीने से भीग गया. मैने हरिया को आवाज़ लगाई और ठंडे पानी का पूछा.

“अरे छोटे भैया आप रुकिये तो सही…..ठंडाई बन जा रही है….गर्मी वर्मी सब गायब हो जाएगा…”

मैने पूछा, “ क्या….कैसी ठंडाई……?”

“ अरे छोटे भैया…..देखे नही सामने घोंट रहे है ना…..एकदम ठंडा ठंडा फ़ील करेंगे….”

वो चटपट एक ग्लास ले आया. ग्लास मे एक दो बर्फ के टुकड़े तैर रहे थे मैने थोड़ा सा सुड़का.

मस्त हरियाली छा गयी. ठंडी ठंडी ठंडाई मेरे गले को तर बतर करते करते नीचे उतरी. मानो जनम जनम की प्यास एक घूँट मे बुझ गयी. मैं सुड़क सुड़क कर पूरा ग्लास पी गया और हरिया से और माँगी.

हरिया खि खि करके बोला, “ नही….भैया…..अब आप रहने दीजिए…..ये गांव का ठंडाई बहुत भारी होता है….”

मैं मन मसोस के बैठ गया. ठंडाई इतनी शानदार थी के पूरे बदन मे चंचलाई आ गयी. मैं हाथ पीछे टेक कर आराम से पैर फैला कर बैठ गया. थोड़ी देर मे ठंडी ठंडी हवा के झोंके आने लगे. आंखे भारी भारी से होने लगी.

मैं कब तक ऐसे बैठा रहा मुझे याद न्ही. मैने आसमान देखा तो ऐसा मस्त झक नीला ..जैसा मैने आज तक नही देखा…..मेरा गला फिर से सूखने लगा.मैने पानी पीया और इधर उधर देख कर मुस्कुराने लगा. अचानक से मेरा मूड अच्छा हो गया था. मंदिर से आते मंत्र पूजा की आवाज़ ऐसी मधुर लग रही थी. मैने सोचा यार आज तक ना कभी आसमान इतना नीला दिखा और ना ही पूजा पाठ इतना अच्छा लगा.

मैने हरिया को आवाज़ दी भेन चोद …मेरी आवाज़ मेरे ही कानों में गूंजने लगी. मैने चोंक कर इधर उधर देखा. हरिया सामने बैठा बैठा मुस्कुरा रहा था.

“हम न बोले थे बाबू…..सहर की ठंडाई से बहुत अलग है गांव का ठंडाई ..”

इस भेन के लौड़े ने मेरेको भांग पीला दी मादरचोद

 


थोड़ी ही देर मे तो अपुन झूमने लगे. हरिया ने सहारा दिया और मुझे घर ले जाने लगा.

जाने मैने हरिया को क्या कहा. वो हंसता जा रहा था और मुझे संभाले घर तक ले आया.

उसने किवाड़ खड़खदाया. कुछ देर बाद काकी की मीठी आवाज़ मेरे कानों मे पड़ी और अपना बाबूराव भन्न से खड़ा हो गया.

काकी ने कुछ देर बाद दरवाजा खोला. वो एक चादर को शॉल जैसे लपेटे थी. अपुन तो उसमे भी उनके मम्मों को देखे जा रहे थे. कसम उड़ान छल्ले की मेरे को तो उसमे से भी उनके निप्पल का शेप दिख रहा था.

काकी बोली, “ क्या हुआ रे हरिया……छोटे बाबू कहाँ है ?”

“यहीं है मालकिन. वो मंदिर मे……ठंडाई पी लिया इन्होने……इतना सा दिए थे परसाद…..फिर भी चड गयी इनको….”

“आबे पूरा ग्लास दिया था ना तूने..” अपुन तुरंत उछले.

“हाय राम सत्यानाश हो…..अरे भंग पीला दी इसको…..अरे नासपीटे हरिया …..तेरी बुद्धि क्या घास चरने गयी थी……पूरा ग्लास…..हैं….अरे….बछिया के ताऊ अक्कल वक्कल कुछ है……कैसी बहका बहका बोल रहा है छोरा…….अरे राम……रे…मूरख……शहर के लोगों को ना पचे ये सब…..ला इसको अंदर ला…..

सुला इसको मेरी कमरे मे…..है भगवान……”

काकी फोकट ही लोड ले रही थी अपने को तो भोत मज़ा आ रहा था. बिना बात के हँसी आ रही थी वो अलग.

हरिया ने काकी के कमरे मे पलंग पर मुझे लिटा दिया. मैं तुरंत उठ बैठा और हरिया से कहा.

”यार…..थोड़ी ठंडई और पीना है….गला सुख रहा है…….क्या भाई…..थोड़ी….और..”

काकी हमारे पीछे पीछे कमरे तका आ गयी थी. वो चिल्लई

“अरे नासपीटे …..भाग यहाँ से…..बित्ते भर के छोकरे को भंग पीला लाया……रे…इसकी तबीयत खराब हो गयी तो कहाँ भागुंगी मैं रात मे……जा भाग यहाँ से…..”

हरिया माफी माँगता माँगता चला गया.

काकी फिर से अंदर आई.

“ अरे राम…..छोरे….तू ठीक तो है……अरे घबराहट तो ना हो रही….?”

“अरे नही काकी…..कुछ नही……..मुझे तो बस प्या....यास लग रही रही है…..गला सुख रहा है”

बाबू नज़रें अपनी अभी भी थी काकी पे. काकी ने वो चादर तो रख दिया था साइड मे और अभी भी थी वहीच लेगिंग और टी शर्ट मे.

अगर पहले काकी माल लग रही थी तो अब तो भेन को चोदे छोड़े अप्सरा हो गयी थी.

काकी के पूरे बदन पे अपनी नज़र ही नही टिक पा रही थी…उपर से देखना शुरू करते नीचे तक…फिर वापस उपर से नीचे तक.

“गला सुख रहा है…रुक जा….मैं नींबू पानी बनती हूँ…..तेरी भंग भी उतार जाएगी…..”

“हो….ठीक है काकी….थोड़ा मीठा ज़्यादा बनाना……."

"हैं......क्या करू..." काकी झल्लाई

"अरे........खट्टा मीठा खाने की इच्छा हो रही है..” अपुन तो लौड़ा परवाह ना करे अब.

काकी एक पल ठिठकी फिर धीरे धीरे से टटोल कर बाहर चली गयी…..अपन ने अपने दोनो हाथ सर के पीछे रखे और लेट गये.

बड़ी मस्त चीज़ है भंग तो…..ऐसा हल्का हल्का लग रहा है.

मगर भोसड़ी की गर्मी बहुत लग रही है.

मैं उठा और कूलर पंखा सब फुल पर चला दिया. और फिर से हाथ सर के पीछे लगा कर लेट गया.

बाबूराव अभी भी पाजामा मे तंबू बनाए खड़ा था. इस को अलग प्यास लगी है चूतिये को

जाने कितनी देर मे काकी आई और बोली, “ ले लल्ला……ये ले….पी ले….”

मैने बिस्तर पर लेते लेते ही कहाँ, “यहाँ ले आओ काकी…..”

काकी ग्लास लेकर आई और बिस्तर के पास खड़ी हो गयी और धीरे से हाथ आगे किया.

अपुन काकी के गद्दर बदन को बेशर्मी से देख रहे थे. गर्मी से काकी के कपड़े फिर पसीने से भीग गये थे और उनका पसीना और उसकी वो ही मदमाती खुसबु

अपुन से रहा नही गया और अपुन पाजामा के उपर से ही अपने सपोले को सहलाने लगे.

अब तुम सोचो……एक छोटा कमरा …..उसमे अपने जैसा ठरकी लौंडा ….वो भी फुलटू नशे मे……सामने उसके गद्दर कद्दावर 6 फुट की सेक्सी औरत…..वो भी तंग टी शर्ट और लेगिंग मे…..लेगिंग जो चूत के उपर से फटी हुई.

तो इसकी माँ को चोदे

अब क्या होगा.

 


भाई अपनी तो हालत राजा-नवाब वाली हो रही थी. मस्त बिस्तर पर हाथ पीछे टिकाए टाँगे फैलाए लौड़े को सहला रहे है और सामने काकी नींबू पानी का ग्लास लिए खड़ी है.

“ले..रे….लल्ला….”

मैने काकी के ग्लास लिया उनके हाथ पर हाथ फेरते हुए. भाई भांग ने अपने हॉंसले बुलंद कर दिए थे.

काकी ने हाथ झटके से पीछे किया. फिर बोली.

“देख तो मीठी हो गयी……..3 चम्मच चीनी डाली है…..राम राम….ये भंगेड़ियों का तो बस…..हरिया की कल खबर लेती हूँ….तू छोरे तुझे समझ नही आया क्या…..जो गटका गया….”

“अरे वो मुझे प्यास…………लगी………थी………काकी……..यह बिस्तर घूम क्यो रहा है……?”

“हाय राम….अरे चक्कर आ रहे है क्या…..तू सो जा……..”

अपुन ने ग्लास ख़तम किया और पैर लंबे कर लिए…आँखें बंद की और इसकी मा को चोदे ….थोड़ा नाटक कर लिया पर भांग तो भांग हैं भैय्ये …..

आँखें बंद करते ही अबे तारे सितारे इंद्रधनुष सब दिख गये….गांड की फट फटी चल पड़ी ……कहीं सही मे तो नशा ज़्यादा न्ही हो गया……थोड़ा पानी ह पिया तो ठीक लगा….भोसड़ी का अब आँखें बंद नही करूँगा..

काकी तो बाहर चली गयी थी…..थोड़ी देर मे आई और बोली

“लल्ला….ठीक तो लग रहा है ना…. “

“हैं….हाँ….हाँ……अब…..ठीक……” ( थोड़ी चूतिया एक्टिंग ज़रूरी है)

“तू यहीं सो जा बिस्तर पर मैं नीचे दरी डाल कर सो जाती हूँ…….यहाँ तुझे गर्मी भी नही लगेगी….”

अपुन को जोश आया “अरे…..आप क्यू दरी पर सो जाओगी…..बिस्तर पर ही सो जाओ…..ऐसी कड़क फर्श पर कोई नींद आएगी क्या….?”

“ सो जाऊँगी रे बेटा……”

मैने कहाँ ये तो प्रोग्राम की मा भेन हो गयी.

मैं लड़खड़ाती आवाज़ मे कहाँ, “तो फिर मैं भी नीचे सो जाऊँगा ..हाँ ..मैं भी…..”

काकी बोली, “ अरे राम…..नही नही बेटा….रुक….मैं बिस्तर पर ही सो जाऊँगी …….कहाँ है तू…..सरक थोड़ा ….सरक गया क्या….?”

मैं तो थोड़ा सा पीछे हुआ और बोला “हाँ आ जाओ काकी……”

काकी घूम कर बिस्तर को टटोलते हुए बैठ गयी.

कसम उड़ान छल्ले की…..बैठ के उनकी गांड तो गोदाम हो गयी……सफेद लेगिंग मे कसे उनके चूतड़ ऐसे लग रहे थे मानो 2 तरबूज़ टिके हो….

बे मेरे तो रोए रोए मे से पसीना निकालने लगा.

काकी अपनी गांड को उपर नीचे करते करते पीछे हुई आहा क्या सीन था…

तभी काकी बोली, “ रे….बत्ती बुझी है या जल रही है….?”

“बुझी हुई है ना काकी….कितना अंधेरा है यहाँ…..” अपुन तुरंत झुत बोल दिए.

काकी थोड़ा और पीछे हुई और उनके चूतड़ मेरे पैरों से आ लगे…

“रे….छोरे…थोड़ा और उधर हो….”

“कहाँ……यहाँ तो दीवार है…..”

“अरे राम….भंग ना उतरी तेरी…….छोरे……सरक….”

“कहा सरकू…….”

काकी ने माथा पीटा और बोली, “ हो….जो मर्ज़ी हो कर….”

वो तो मैं करूँगा….

काकी लेट गयी और मैं उनके बगल मे. उनके बदन से वोही खुश्बू फिर मेरे नथुनों मे जाने लगी….लौड़ा तो अपने पहले ही तन्नाया था अब तनटना गया.

अब क्या ?

भेनचोद.....फटफटी......चल......पड़ी.



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