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Guest
अपुन ने सोचा काकी को नहाने जाने दो फिर काकी की राम तेरी गंगा मैली देखेंगे.
पर साला काकी मुस्कुराई तो थी....
ज्यादा स्पीड में चलो तो एक्सीडेंट होता है....थोड़ा हल्लू हल्लू....
मगर कल जिस तरह काकी को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया था मेरी गांड फटी....मैंने सोचा कुछ न्य एंगल बनाते है. उस बाथरूम की दीवारें 6 -7 फूट ऊँची थी मगर छत से मिली हुयी नहीं थी.....काफी गेप था. मैंने गार्डन घुमाई और देखा की अगर सामने से छत पर खड़ा हो जॉन तो कुछ सीन बन सकता है.
लौड़ा क्या चाहे.....कुछ नज़ारे.
मैं भाग कर छत पर गया. अपना idea बिलकुल सही था बाबा.
फुल बालकनी नज़ारा था.....
मगर काकी का सर ही दिख रहा थी. वो इतनी देर में नहा भी ली थी.और झुक क शायद अपने बदन को पोंछ रही थी.
मैंने मुंडेर से झाँकने की कोशिश भी की लेकिन लंड बाबाजी.
निर्मल बाबा की सलाह के जैसे ये idea भी फुस्सी फटाका निकला.
काकी का सर देखकर क्या करूँगा......बाथरूम की दीवार पर लगा एक लकड़ी का पटिया पुरे view की मां कर रहा था.
काकी ने अपना हाथ उठाया.....नरम नरम ...गोरा...गोरा.....मोटा......ताज़ा हाथ.....भेनचोद....हाथ नहीं देखना......सीन दिखा दो काकी.
काकी ने ब्लाउस जो की धन्नो का था उसमे हाथ डाला और वो आधे में फंस गया....
वो मारा पापड़वाले को.
धन्नो के कपडे तो छोटे है.. काकी ने कोशिश की मगर उनका हाथ कोहनी के ऊपर से ही ब्लाउस में फंस गया. फिर उन्होंने हार कर ब्लाउस खोला....और शायद झुक कर पेटीकोट में पैर डाले.....उनके सर हिलने से लग रहा था की वो भी छोटा था....
कहाँ 6 फ़ीट की कद्दावर औरत और कहाँ पौने 5 फ़ीट की धन्नो.
लंड धन्नो के कपडे लल्ली काकी को नहीं आने वाले. मैंने तो पहले ही लेग्गिंग और टी-शर्ट निकाल कर बाथरूम मे टाँग रखी थी काकी के लिए.
साला मौका छुट गया.
मैं कुछ झलक के इंतज़ार में वहीँ खड़ा हो गया....मगर काकी की शायद मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया. उन्होंने कहा " लल्ला....."
भाई कसम से डर वाले शाहरुख़ खान वाली फीलिंग आयी...
."क़....क़.....क़......किरण ...."
"क़....क़.....क़......काकी....."
मैं तुरंत पीछे हटा.....आज थोड़ा सावधान था नहीं तो फिर बर्तनों में जा गिरता.....
भेनचोद मारे ठरक के मेरा मुंह सूखा जा रहा था..
बाथरूम से काकी की आवाज़ आ रही थी....वो ज़ोर लगा लगा कर कपडे पहन रही...थी.
मैं जल्दी से नीचे आया और चुपचाप आँखे बंद करके चारपाई परलेट गया
मैं खाट पर ही पड़ा रहा....काकी 20 मिनट बाद बाहर निकली. मैं चटपट उठ बैठा.
सफ़ेद झीनी लेग्गिंग......सफ़ेद पतली छोटी टीशर्ट....
माँ.....धुरी.....
काकी ने अपने कन्धों पर तौलिया डाला हुआ था.....आगे से पूरा ढंका हुआ.
लेग्गिंग काकी के नाप से कम से कम २ साइज छोटी थी.....उनकी टांगों से ऐसी चिपक गयी थी मानो चमड़ी हो..
काकी की मोटी मोटी गदराई जाँघे ऐसी लग रही थी की चिकन का लेग पीस हो....रसीली ..
गीले बदन पर ही लेग्गिंग पहनने से लेग्गिंग हलकी से गीली हो गयी थी.
एक तो पतला सफ़ेद कपडा, उस पर भीगा हुआ....
तू ही समझ ले प्यारे...
अपने कान फूंक फूंक गरम हो गए बे.
काकी ने तौलिये को सामने से शाल की तरह लिया हुआ था.....वो मेरे सामने ने पंजो के बल चलती हुयी गयी और मेरी नज़र जा चिपकी लेग्गिंग में फंसे उनके विशाल पिछवाड़े पर....
गीले बालों से गिरता पानी पीछे से उनकी लेग्गिंग को पूरा पारदर्शी बना चूका था....काकी की चड्डी तो मैंने कल ही छुपा दी थी..
काकी की २१ गज़ की विशाल गांड सफ़ेद भीगी लेग्गिंग में लिपटी मानो मेरे को चिड़ा रही थी.
लेग्गिंग पुरानी सी थी. उसका रेशा रेशा काकी की विशाल गांड के वजन से चौड़ा हो गया था....गांड की दरार क्या मेरेको तो उनके दांये कूल्हे पर एक मोटा सा तिल भी दिख रहा था.....
कसम उड़ान छल्ले की ...
बाबू अपन कही नहीं जा रहे...
अब मामला गंभीर हो चुका था. सुबह सुबह अपने बाबूराव को काकी को पकड़ा के अपना एंजिन वैसे ही सिटी मार रहा था. मेरी नज़रे काकी को ऐसे घूर रही थी की मुझे पक्का यकीन था की काकी भी अपने बदन पे मेरी निगाहों को महसूस कर रही है.
काकी मेरे सामने से धीरे धीरे चलती हुई चोक के कोने मे गयी और अपने तौलिए को हटा कर अपने बालों को फटकारने लगी.
काकी की पीठ मेरी तरफ थी और उनके झुक जाने से उनकी विशाल गददर गांड फेल कर मुझे मुँह चिडाने लगी. ऐसा लग रहा था की लेगिंग अब फटी.
लेगिंग काकी की जाँघ के पिछले हिस्से पर कस गयी और उनकी जाँघ के पिछले हिस्से का गदराया हुआ नरम नरम नाज़ुक माँस लेगिंग के रेशों मे से झाँकने लगा.
किसी भी औरत मे लोग जाने क्या क्या देखते है. मम्मी गांड होन्ट. आँखें, कमर.
अबे भैय्ये.....किसी औरत की भारी भारी जाँघे देखो….जाँघ का पिछला हिस्सा देखो.
काकी के इस राम तेरी गंगा मैली रूप को मे अपनी आँखों से हुमक हुमक के पी रा था.
काकी तो अपने बालों को फटकारने मे व्यस्त थी और मैं रूप दर्शन मे.
ना जाने कब मेरा हाथ अपने बाबूराव पर पहुँचा और मैं अपने भन्नाये बाबूराव को हाथ फेर कर समझने लगा.
काकी की तो लेनी है बाबू…
और हाँ घोड़ी बना के ही...
शायद मैं सोचते सोचते ज़ोर से बोल गया. काकी एक दम पलटी और बोली…
“हैं….लल्ला….जाग गया क्या….?”
अपुन चुप.
काकी का सफेद टी शर्ट आगे से भी भीग चुका था. शर्ट उनके निप्पल और उसके आसपास का भूरे हिस्से पर लेमिनेशन जैसा चिपका हुआ था.
ठंडे पानी से शायद काकी के चूचुक टनटना गये थे. काकी के जामुन जैसे निप्पल शान से सिर उठा के खड़े थे.
इसकी मा की
अबे बच्चे की जान लोगे.
मैं तो काकी के इस गदराये हुस्न को ही देखे जा रा था. नीचे से देखना शुरू किया.