"कमीने...नमकहराम, जिस खानदान का नमक खून बनकर तेरी रगों में दौड़ रहा है....उसी खानदान के
मालिक के साथ जबान लड़ा रहा है... भूल गया, क्या उपेदश दिया था जेल जाते समय तेरे पिता ने...हमारे पुरखों की आत्माओं को मत शर्मिंदा होने देना। बड़ा आया इंजीनियरा बनने वाला। अरे यह डिग्री मिली है तो किसकी दया से....देवी जैसी मालकिन की दया से जिनके पति यह देवता.... मालिक हैं।"
"मा....!"
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"दूर हो जा मेरी आंखों से कर ले नौकरी कहीं इंजीनियर की मगर मैं तेरी कमाई से एक ग्रास तक नहीं खाऊंगी। मैंने तेरे पिता को वचन दिया था इस खानदान की सेवा का उनकी वापसी से पहले मैं एक कदम भी यहां से बाहर नहीं निकालूंगी।"
राजेश के चेहरे पर कई रंग आए और गए-फिर उसने धीरे से कहा-"मां! मुझे क्षमा कर दो।"
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"कदापि नहीं...तुझ जैसे नालायक की तो मैं सूरत तक नहीं देखना चाहती।"
अचानक पारो ने आगे बढ़कर कहा-"जाने दो कमला ! बच्चा ही तो है...जोश में कह गया-फिर सारे राज्य में अव्वल नम्बर पर आया है-कितनी मेहनत की है-इसे गले से लगाकर बधाई दो।"
"मैं इसे तब तक क्षमा नहीं करूंगी जब तक इसे बड़े मालिक क्षमा न कर दें।"
पारो ने राजेश ने कहा-"जा, राजे बेटा, मालिक
से माफी मांग ले।"
राजेश सेठ दौलतराम जी के पास गया और बोला-"बड़े मालिक-मुझे क्षमा करे दें-भावुकता में न जाने मैं क्या-क्या बक गया-अब मैं कभी ऐसी हरकत नहीं करूंगा-आप हमोर अन्नदाता हैं।"
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सेठजी बोले-"हमने तुम्हें माफ किया।" फिर वह मुड़कर चलने लगे तो पारो से बोले-"जब तुम लोग आपस में मिल लो तो राजेश को हमारे आफिस में नीचे ही भेज देना।"
"जी मालिक ! मैं हाजिर हो जाऊगा।"
"हां पारो।" सेठ पारो से बोले-"इन दोनों के पास होने की खुशी में पार्टी का इन्तजाम करो जिसमें...इनके सब दोस्तों और साथियों को निमंत्रण पत्र भिजवा दो। हमें बहुत खुशी हुई है।"
यह कहकर सेठ दौलतराम अंदर चले गए। राजेश अनायास जगमोहन से लिपट गया-पारो ने भी उसे लिपटा लिया-उनकी आंखों में भी आंसू छलक रहे थे।
"मैं अंदर आ सकता हूं मालिक ?"
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"हां राजेश....आ जाओ।"
राजेश ऑफिस में दाखिल हुआ तो सेठ ने कहा-"बैठो।"
राजेश में आश्चर्य से कहा-"मैं....आपके सामने ?'
"हां ! अब तुम हमारे ड्राइवर के बेटे नहीं हो बल्कि दौलत बिल्डर्स के एक इंजीनियर हो।"
राजेश बैठ गया....दौलतराम ने कहा–''पहले तुम हमें वचन दो कि इस कमरे में हम जो बातें तुमसे करेंगे वह हम दोनों के सिवा किसी तीसरे को नहीं मालूम होनी चाहिए–चाहे वह तुम्हारी मां हों या बड़ी मां।"
"मालिक ! मैं आपको वचन देता हूं। यह सब मुझ तक ही रहेगा।"
"दूसरी बात...अब तुम हमें मालिक नहीं, सेठ जी कहा करोगे।"
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"जी, सेठजी।"
सेठ जी ने कुर्सी की बैक रेस्ट से पीठ लगा लगाकर कहा-"यह समझ लो, हमने तुम्हें आज ही से अपनी कम्पनी में नौकर रख लिया है।"
"मालिक ! मैंने आपके साथ इतनी उद्दण्डता की, फिर भी आप मुझे यह सम्मान दे रहे हैं।"
"मालिक नहीं.सेठ जी।"
"जी....सेठजी।"
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"राजेश ! तुम्हारी इस उद्दण्डता ने हमारी आंखें
खोल दी हैं.....हमें याद आ गया है....हमें ज्ञान हुआ कि अब वह समय नहीं रहा जब नौकर मालिक सदा के लिए नौकर मालिक ही रहते थे। आज का नौकर अपनी सन्तान को पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना चाहता है ताकि वह नौकरों की भीड़ से अलग हो सके....ऊंचा उठ सके....स्वयं अपना भविष्य निर्माण कर सके।
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तुम्हारे पिताजी पुराने विचारों के हैं....यूं भी जो उपेदश उन्होंने तुम्हें दिया था, वह दस बरस पहले की बात थी-दस बरसों में जमाना कहां से कहां जा पहुंचा है...फिर तुम जैसा पढ़ा-लिखा योग्य नौजवान जो सिविल इंजीनियर में स्टेट भर में अव्वल आया है-क्या वह ड्राइवर या माली बनना पसंद करेगा ?"
चंद क्षण रूककर उन्होंने कहा-"इसलिए हमने फैसला कर लिया है कि तुम हमारे खानदानी नौकर नहीं हमारी कम्पनी में इंजीनियर बनकर रहोगे...कमला बहन भी अब सर्बेन्ट क्वार्टर में नहीं रहेंगा।"
"सेठ जी! आप सचमुच देवता हैं।"
"नहीं राजेश, हम एक मामूली आदमी हैं...आम आदमियों की तरह जिनसे भूले भी होती हैं हमसे भी एक बहुत बड़ी भूल हुई है। जिसका सुधार अब तुम ही कर सकते हों"
"हुक्म दीजिए सेठजी।"
"तुम जानते होगे कि हमने मास्टर देवीदयाल का बंगला खरीदना चाहा था...उनसे बात भी तय हो
चुकी थी-मगर मास्टर देवीदयाल जैसे महात्मा की नीयत में खोट आ गई और उन्होंने हमारा दस लाख रूपया एडवांस में दिया हजम कर लिया।"
"ओहो!"
"तुम दिमाग से सोचो-"आदमी चाहे करोड़पति हो अगर उसकी जेब, कटकर दस हजार रूपए भी निकल जाएं तो कितना दुःख होता है।"
"बेशक....सेठजी!
"हमें भी दुःख हुआ था और हमने फैसला किया था कि उन्हें इसकी सजा जरूर देंगे।"
"स्वाभाविक है।"
"हमने मास्टर देवीदयाल को मामला निबटाने के बहाने बुलाया मगर हमें नहीं मालूम था कि दूसरे नेताओं के सामन वह भी दिखावे के नेता हैं...वह मामला निबटाने आए तो मगर भरा रिवाल्वर साथ लेकर आ गए थे।"
"ओहो !"
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"मामलात प्रेम द्वारा तय होने थे-मास्टर देवीदयाल तो आ गए, मगर उस समय प्रेम नहीं आया था-देवीदयाल ने हमारे साथ हिस्की का पैग भी लिया था।
"अच्छा !"
"और फिर मामले की बात हुई तो वह भड़क गए....दस लाख वाले एडवांस के लिए उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया और तैश में आ गए। खून हमारे हाथों अपने बचाव में हुआ, लेकिन इसका आरोप अपने सिर तुम्हारे पिता ने ले लिया...यह बहुत बड़ा आत्म बलिदान है उनका जिसे हम स्वीकार करते हैं।"
"नहीं...।" राजेश सन्नाटे में रह गया।
सेठ ने कहा-"अगर तुम विश्वास ने करो तो हम जगमोहन की सौगंध खा सकते हैं। हमने कैलाश को बहुत रोका था, मगर कैलाश भगवान को दूसरा रूप है, वह देवता है.... हम उसके चरण छूने के भी योग्य नहीं-उसने कहा था-'मालिक, हमारे पुरखों ने आपका नमक खाया है, वह हलाल करने का यही तो अवसर है' ।"
राजेश अब भी सन्नाटे में बैठा था-सेठ उसे ध्यान से देखते हुए बोले-"राजेश ! तुम मुझे गलत तो नहीं समझ रहे ?"
"बिल्कुल नहीं सेठ जी–मैं तो यह सोच रहा हूं कि मेरे पिताजी ने इतना बड़ा बलिदान देकर अपनी वफादारी का प्रमाण दिया है और मैं उन्हीं का बेटा आपके साथ इस उद्दण्डता से बकवास कर गया।"
सेठ से चेहरे पर सन्तोष की प्रतिक्रिया नजर आई-उन्होंने कहा-"भूल जाओ....मुझे भी याद नहीं रखना....भगवान जो कुछ करता है ठीक ही करता है अगर तुम जोश और गुस्से में नहीं आते तो ड्राइवर और नौकर ही बनकर रहते-तुम्हारी मां को गुस्सा न आता....वह तुम्हें न मारतीं तो तुम उन्हें लेकर चले जाते...और मेरे गले में भी हड्डी अटकी रहती और तुम्हारे पिताजी के माथे से कलंक भी न मिटता ।"
"आपके गले में कैसी हड्डी ?"
"जब मास्टर देवीदयाल ने मेरे ऊपर हमला किया था और मैं अपना बचाव कर रहा था तब उनके हाथ से रिवाल्वर गिरकर मेरे हाथ में आगया-उस वक्त मास्टरजा पर जुनून सवार था अगर मैं उन्हें ने मारता तो वह मुझे मार देते-मैं इस बात से भयभीत था और मैंने न चाहते हुए भी उन पर गोली चला दी। जब मुझे होश आया तब मेरे हाथ से रिवाल्वर छुटकर गिर गया।"
"फिर-?"
"इस घटना की कोई आदमी फोटो उतारता रहा था।"
"नहीं...!"
"हां राजेश ! वह आदमी पिछले दस साल से अब तक मुझे ब्लैकमेल कर रहा है।"
"ओ गॉड !"
"राजेश, मैं कई करोड़ का नुकसान सहन कर चुका हूं...अभी चंद दिन पहले ही दस लाख ठगे गए हैं।"
"आपने पुलिस को खबर की ?"
"नहीं....पुलिस को खबर करने का नतीजा होगा कि मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा और मास्टर
जी के खून के अपराध में मुझे सजा मिलेगी और यह राज खुलने पर शायद कैलाश की सजा भी बढ़ जाए।"
"क्यों ?"
"क्योंकि उसने झूठा अपराध अपने सिर ले लिया है-कानून को गुमराह किया है।"
"ओहो...फिर..?"
"तुम्हारे पिताजी की सजा खत्म होने में कुछ ही समय रह गया है...हो सकता है, जेल में अच्छे चाल-चलन के कारण आखिरी दो साल आजादी के जश्न पर माफ भी कर दिए जाएं। अगर ब्लैकमेलर का पता लग जाए तो मेरा नुकसान बच
सकता है।"
"और कोई दूसरी बात ?"
"मास्टर जी ने उस बंगले पर दस लाख रुपए लिए थे जो दस बरस में करोड़ों हो जाते.वैसे भी मास्टर जी ने बेइमानी की थी....इस सारे फसाद की जड़ वही बंगला है।"
"फिर..?"
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"वह बंगला दरअसल मेरा है...मगर मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है और वह बंगला मेरे दिल में कांटे की तरह खटकता है, क्योंकि उसके कारण मेरा दस लाख ब्लाक हो गया.ब्लैकमेलर के करोड़ो बन गए और कैलाश जैसा वफदार पुरखों से सेवा करता भला आदमी लम्बी सजा काट रहा है-मेरी खातिर-इसका मुझे बहुत दुःख है।"
"ठीक है सेठजी-वह बंगला भी आपकी मिल्कियता होगा और वह ब्लैकमेलर भी पकड़ा जाएगा।"
"मुझे तुमसे यही आशा थी।"
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"मगर आपको किसी पर सन्देह...।"
"किस पर सन्देह करूं?"
"इस मामले के बारे में आप मास्टर जी के अलावा
और भी कोई था?"
" सिर्फ प्रेम था जो असिस्टैंट मैनेजर था.अब मैनेजर है।
"आपको उन पर सन्देह नहीं ?"
"नहीं। क्योंकि जितनी रकत अब तक अनजाना ब्लैकमेलर हासिल कर चुका है, उतनी रकत से तो प्रेम अब तक बहुत बड़ा बिल्डर बन चुका होता-मगर आज भी वह फ्लैट में रहता है...बस एक पुरानी फियेट कार उसकी अपनी है।"
"अच्छी बात है, सेठ साहब पहले ब्लैकमेलर ही का पता लगाना है-मगर उसके लिए आपको एक 'नाटक' करना पड़ेगा।"
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"कैसा नाटक?"
“मैं बताता हूं।"
सेठजी आगे झुक गए...राजेश उनके कान में कुछ कहता रहा।
प्रेम के कान खड़े हो गए-उसने कुछ देर सुना-फिर घंटी बजाई-और चपरासी अंदर आ गया।