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फोरेस्ट आफिसर

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'हलो केसरी?'

'कौन? मेयर साहब।'

'आज सुबह का अखबार देखा?'

'इस जंगल में इतनी सुबह अखबार कहां?'

'कल की तुम्हारी प्रेस कांफ्रेस की रिपोर्ट छपी है। तो मुझे जरा कर्तव्य निष्ठ फारेस्ट आफिसर को निहित स्वार्थ सम्पन्न' लोगों द्वारा धमनियां, वन जनता की सम्पत्ति है और फारेस्ट आफिसर जनता की उस सम्पत्ति का रखवाला है, लेकिन शहर के कुछ प्रभावशाली लोग जो कि बास्तब में थमता की इस सम्पत्ति के लुटेरे हैं, इस कर्तव्यनिष्ठ फारेस्ट आफिसर को अपनी लूट चालू रखने के लिए तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं, लेकिन फारस्ट आफिसर उन लुटेरों के सामने झुकने के लिए कतई तैयार नहीं है त्रौर इस मामले में वह जनता के महयोग की प्रार्थना करना है। इसी सिलसिले में वह शहर की जनता वो प्रतिनिधि मेजर थी गिरीश चन्द्र शर्मा से भी मिला। श्री शर्मा ने फारेस्ट आफिसर को हर सम्भव सहायता देने का वचन दिया है कि उन लुटेरों के विरुद्ध शहर की जनता हर तरह का सहयोग देने के लिए तैयौर है। नवगठित वन रक्षा समिति ने आज शहर में एक व्यापक जलूस निकालने का निश्चय किया है। ताकि उन सफेद पोश लटेरो को शान्ति पूर्ण प्रदर्शन से समझाया जा सके कि अगर उन्होंने अपनी नीचतापूर्ण हरकतें बन्द नहीं की तो जनता उसे सबक सिखाने के लिए और कड़े कदम उठाने से नही हिचकेगी, कहो सब अभियान ठीक है ना?'

'लेकिन इसमें कालिया का तो कही कोई जिक्र नहीं है?'

'इतनी जल्दी नहीं। अभी देखते हैं कि इस सबका क्या असर पड़ता है और वह पलटकर क्या कार्यवाही करता है। उसके बाद धीरे-धीरे कालिया और उसके सहयोगियों का पर्दापाश किया जाएगा।'

'लेकिन वे अभी अपने हरकतों से बाज तो नहीं आ रहे। कल रात भी उसके आदमियों ने हमला किया था।'

'अच्छा कितने आदमी थे?'

'अन्धेरे में गिन तो नहीं सका लेकिन दस-बारह आदमी तो थे।'

'अरे रे रे 'जरा खुलकर बताओ क्या हुआ था।'

केसरी ने सारा किस्सा सुनाया। 'ज्यादा चोट तो नहीं आई?'

'जी नहीं। सिर में मामूली सा जख्म है और कनपटी पर थोड़ी सूजन।' 'खैर तुमने और तुम्हारे बहन ने काफी हिम्मत दिखाई।

शाबासी है तुम्हें। तुम्हें। लेकिन वह दूसरा आदमी कौन था?'

'मालूम नहीं सर।' वह बोला-'दरअसल सिर पर चोट लगने की वजह से मैं बेहोश हो गया था। हो सकता हैं कि जंगल का ही कोई मजदूर हो जो इतने आदमियों से अकेले लड़ते देख कर मदद के लिए आ गया हो।'

"उसका पता करो भाई। ऐसे बहादुर मजदूरों को तो तुम्हें अपने साथ रखना चाहिए। चार-रांच आदमी भी अगर ऐसे मिल गए तो कालिया की याधी हिम्मत तो वैसे ही टूट जाएगी। और हां इस घटना की रिपोर्ट पुलिस में जरूर कराना। या ठहरो मैं खुद ही पुलिस कमिश्नर से बात करके तुम्हारी सुरक्षा का प्रबन्ध करवाता हूं।'

फोन रखकर वह उठा। चोटें जरूर चसक रही थी। लेकिन वैसे वह अपने आपको स्वस्थ्य ही महसूस कर रहा था।

साधना से उस अजनबी के बारे में पूछा। उसने जो हुलिया वताया वह जगतार से मिलता था। निश्चित रूप से जगनार ही होगा। उसे ही तो उसने कल काम पर से हटाया था कालिया का आदमी समझ कर।

'अगर वह ऐन वक्त पर सहायता के लिए न आ जाता तो इतने बदमाशों को सम्हालना मुश्किल हो जाता हमारे लिए।'

'इसीलिए तो कह रहा हूं दीदी कि जब तक यह किस्सा न निबटे तुम शहर चली जाओगी।'

'नहीं।' हठपूर्वक बोली साधना।

'आखिर तुम समझती क्यों नहीं...'

'हर बात समझ सकती हूं लेकिन अन्याय के आगे मे हट जाना नहीं समझ सकती और आगे से यह मुझे सममाने की कोशिश भी मत करना।'

"लेकिन दीदी।'

'तुम जानते हो केशो कि मैं अन्याय का मुकाबला करते-करते मर जाना तो पसन्द करूंगी लेकिन उसके सामने सिर प्रका कर हट जाना नहीं।'

कहकर साधना रसोईघर में घुस गई। उसने असहाय भाव से आने कन्धों के। झटका दिया।

तैयार होकर काम पर जाने के लिए निकला ही था कि तभी अधेड़ सुपरवाईनर आ गया। हाथ में अखबार लिए हुए।

'आपने तो सर कमाल कर दिया। इस सारे मामले को अखबार में उछाल दिया।'

'हां मेयर साहब से मिला था। उनसे बातचीत करके इसी नतीजे पर पहुंचा कि कालिया जैसे लुटेरों का मुकाबला करने के लिए जनचेतना जगानी जरूरी है। आपका क्या ख्याल है कि इस सबका कुछ प्रभाव पड़ेगा जनता पर।'

'प्रभाव तो निश्चित रूप से पड़ेगा सर। अखवार में पढ़कर ही आज मेरे मुहल्ले के चार पांच आदमी मेरे पास आए और पूछने लगे कि जंगल में ऐसी कौन सी सम्पत्ति होती हुऐ जिसके लुटने का खतरा है। जब मैंने उन्हें बताया तो बोले कि उन्हें तो आज तक यह सब कुछ मालूम ही नहीं था। एक ने तो साफ मेरे मुंह पर कह दिया कि उसे यह तो मालूम था कि मैं जंगल विभाग में नौकरी करता हूं लेकिन वह अब तक यही समझता था कि सरसर ने फालतू का खर्चा पाल रखा है। यह तो उसे आज मालूम हुआ कि मेरा काम भी अन्य लोगो जैसा महत्व का काम है। सो यह तो जाहिर हो ही गया कि लोगों मे चेतना तो जाग रही है।'

इसका मतलब है जनचेतना जागनी तो शुरू हो गई। मेयर साहब ने जो लाईन बाफ एक्शन चुनी वह ठीक ही है। अब शहर जाकर कल रात की घटना की पुलिस मे रिपोर्ट लिखा आए। लेकिन मेयर साहब ने मना करा है। पहले पुलिस कमिश्नर से बात करेंगे। ठीक है माथे की पट्टी तो करवा आए।'
 
दरअसल वह शहर जाना चाहता था। सुपरवाईजर ने जो जनचेतना का संक्षिप्त रूप सुनाया वह काफी आकर्षक लगा था उसे। शहर जाकर उसका विस्तृत रूप अपनी आंखों से देख लेना चाहता था।

बोला-'मैं काम देखने ही जा रहा था। अब आप गए हे तौ देख लीजिएगा। में जरा शहर जाकर पट्टी करा आऊं।'

'अरे हां यह पूछना तो भूल ही गया। पता चला रात बहुत से आदमियों ने हमला किया था बंगले पर।'

'वह सब में आकर बताऊंगा। फिलहाल तो मैं डाक्टरी पट्टी करा आऊं और हां, अगर जगतार दिखाई दे तो उसे काम पर, लगा लीजिएगा।'

'आओ-आओ जगन सेठ।' कालिया बपनी कोठी के ड्राइंगरूम में जगन सेठ का स्वागत करता हुआ बोला-'सुबह-सुबह कैसे आने का कष्ट किया? मुझे हुक्म देकर बुलवा लिया होता।'

'आखिर तुम माने नहीं ना?'

'क्यों क्ने क्या किया है।'

'मेरे मना करने के बावजूद भी तुमने रात अपने षादमी भेज दिए उस फारेस्ट आफिसर के बंगले पर।' जगन सेठ ने सोफे

पर बैठते हुए कहा।

'आपसे किसने कहा?'

'तुम क्या समझते हो कालिया कि तुम वहीं बताओगे तो मुझे तुम्हारी कार्यवाही पता नहीं चलेगा।' जगन सेठ ने जेब से कीमती सियरेट केस और लाईटर निकालते हुए कहा। 'यह कौन कहता है जगन सेठ? क्या मैं वानता नहीं कि आप के हुक्म के बिना पत्ता तक नहीं हिल सकता। फिर कालिया की बिसात कि बापकी मरजी से बाहर निकल आए।'

'देखो कालिया, मुझसे उड़ने की कोशिश करोगे तो घाटे में ही रहोगे। हम दोनों का ही?' नुकसान है इसमें।'

'आप तो मुझ पर बेकार ही खफा हो रहे हैं अमन सेठ। मैंने किसी को कहीं नहीं भेजा। वह तो जब लौंडों को मालूम हुआ मेरे अपमान के बारे में तो अपने आप पर काबू नहीं रख सके

और उस आफिसर के बच्चों को सबक सिखाने लिए पहुंच गए।'

'सिखा दिया सबक उन्होंने?'

जगन सेठ के इस सवाल पर कालिया बगलें झांकने लगा।

रात अब भैरों ने उसे लौटकर फोन द्वारा बपनी मोर अपने आदमियों की असफलता की खबर दी थी सभी से उसके दर्प का आहत नाग बड़ी बेचैनी से कुंडलियां ले-लेकर खेल रहा था।

लेकिन जगन सेठ के सामने उन भावों को छुपाए रखने के लिए उसे काफी मेहनत करनी पड़ रही थी। जगन सेठ ने सिगरेट केस खोलकर उसकी ओर बढ़ाया। उसने एक सिगरेट निकाल ली। जगन सेठ ने भी एक सिगरेट निकाल कर होंठों में दबा ली और फिर लाईटर जलाकर दोनों सिगरेट सुलगाई। लेकिन लाईटर बुझाया नहीं।

उसकी लौ को देखते हुए कहा-'इस आग को देख रहै हो ना कालिया। दुनिया की सबसे बड़ी विनाशक शक्ति है यह। फायदे से पकड़े रहो तो हमारे हाथों में कितनी बेबस है यह। जब चाहे मरजी बुझा दो जव चाहे मरजी जलाओ।'

जगन सेठ ने दो-तीन बार लाईटर जलाया-बुझाया।

'हमारी सिगरेट भी जलाएगी, खाना भी पकाएगी। हमारी मरजी के मुताबिक हमारे सुख के सब काम करेगी यह। लेकिन सिर्फ तब तक जब तक कि यह हमारे काबू में रहेगी। काबू से बाहर इसकी जरा-सी भी चिंगारी सब कुछ जलाकर राख कर देगी।'

रुककर जगन सेठ ने कालिया की आंखों में झांका और फिर कहा-'हां कालिया, यहा फारेस्ट आफिसर बो चिंगारी है जो अभी हमारे काबू से बाहर है। हमारे दश्मन इस चिंगारी को हवा देने में लगे हुए हैं। अभी हालत ऐसे हे कि इस चिंगारी को

अगर हमने पकड़ने की कोशिश की तो हमारे हाय जल जाएगे। आज का अलगर तो देख लिया होगा तुमने।'

'अभी कहा? रात देर से सोया था सो देर से आंख खुली।

कोई खास खबर है क्या?'

'मेयर ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। जंगल की तरफ आम जनता का ध्यान खींच दिया हैं। हम लोगों का नाम लिए बिना बहुत कुछ कह दिया गया है। कोई वन रक्षा समिति भी पठित हो गई है जो आज जलूस निकाल रही है।'

'मेयर के चमचे होगे। कहो तो आज उस जलूस का ही जलूस निकलवा दूं।' 'अभी तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है। जब जरूरत होगी मैं तुम्हें खुद कह दूंगा। मेयर उस फारेस्ट आफिसर की आड़ में जो गढ़ा हम लोगों के लिए खोद रहा है मैं उसे ही उसकी कब्र बना दूंगा बशर्ते कि तुम जरा अपने आप पर काबू रखो।'
 
'मेरी तरफ से निशा खातिर रहिए आप। अब तक जो हो गया सो हो गया। अब आपसे पुछे बिना एक इंच भी नहीं हिलूंगा।'

'तो वायदा रहा कि जब तक मैं न कहूं तब तक तुम उस

फारेस्ट आफिसर की तरफ औख उठाकर मी नहीं देखोगे।'

'पक्का वायदा रहा।' कालिया बोला-'लेकिन एक वायदा

आपको भी करना होगा।'

'वो क्या?'

फोरेस्ट आफिसर

'यह फारेस्ट आफिसर मेरा शिकार है। जब भी मौका आएगा इसका शिकार करूगा मैं ही।'

'और उसकी बहन?'

'वह तो सांझे का माल है। लेकिन बड़े होने के नाते पहला देग

आप ही लगाएंगें।'

'लाओ तो फिर इसी खशी में चाय पिलबाओ।'

वे लोग चाय पी रहे थे कि भैरों आ गया। हाथ में पट्टी बंधी हुई थी।

'आ गए सूरमा पिट-पिटाकर?' कालिया उसे देखते ही बोला। 'इसकी तारीफ तो नहीं कर रहे उस्ताद कि कितनी बहादुरी से अपनी खोपड़ी सलामत रख सका। जब बिलकुल अकेला रह गया तभी मजबूरी में मोरचा छोड़ कर हटा हूं। बाकी सबके सब तो पहले ही भाग लिए और उनमें से कोई खटिया से नहीं उठ सकता। और ऊपर से तुम सुझे ताने दे रहे हो।'

'ताने “अबे शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब कर नहीं मर जया कि इतने सारे लोग एक छोकरे से पिट कर आ गए।'

'अकेला कहां दो-दो बने थे।'

'दूसरी उसकी बहन ही तो थी औरत जात।' 'नहीं उस्ताद एक और भी था।'

'और कौन था?' इस बार जगन सेठ ने भी एकदम चौंककर पूछा।

'यह देखने का मौका ही कहां मिना सरकार।' भैरों बोला-'उस छोकरे को हमने कब्जा लिया था लेकिन तभी वो न जाने कहां से छलावे भूत की तरह आ टपका और आते ही उसने क्या गदर मचाया है"तौबा तौबा कहते हुए शर्म तो

आती है सरकार मगर सच्चाई यही है कि अगर वहां से मैदान छोडकर भाग न लिए हाते तो हम सबकी लाशें उठा कर लानी पड़ती सरकार।'

'यह दूसरा कौन आ गया?' जगन सेठ ने विचारपूर्ण मुद्रा में कहा।

'यह तो पता लमाना पड़ेगा कि यह दूसरा कौन आ गया साला। भैरों उस दूसरे का पता तो लगा बेटा।'

'उस तरफ याने की अब कोई जरूरत नहीं है।' जगन सेठ ने एकदम दृढ़ स्वर में मना करते हुए कहा। 'लेकिन यह पता तो लगाना ही पड़ेगा कि यह दूसरा कौन है।'

'उसका भी पता लग जाएगा। लेकिन तुम फिलहाल जंगल से

दूर ही रहना।' जगन सेठ ने कहा-'तुम्हें पता नहीं है कि अभी-अभी मेयर ने पुलिस कमिश्नर से बात की है और उस फारेस्ट आफिसर के थमने की सुरक्षा के लिए कहा है।'

'लेकिन पुलिस कमिश्नर साहब तो अपने ही आदमी ई।'

'यह पुलिस वाते भी कभी किसी के हुए हैं। हमारा पब्बा भारी

है तो वह हमारे साथ है। कल को मेयर का पव्वा भारी होगा तो वह उसके साथ हो जाएगा।'

'पर वो तो हमारे सारे कामों में बराबर के हिस्सेदार है।'

'तू बड़ा भोला है रे कालिया। इन सब बातों को नहीं समझेगा, यह राबनीति है राजनीति। इसे मेरे लिए ही रहने वे तू सिर्फ वह करता रह जो मैं कहता रहूं।'

बड़े ही अपनत्व भरे शब्दों में कहा जगन सेठ ने।

फिर कालिया के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-'तुम फिलहाल इतना समझ लो कि पुलिस कमिश्नर ने फारेस्ट

आफिसर के बंगले की सुरक्षा का आश्वासन दे दिया है मेयर को। इसीलिए तुम्हें सलाह दे रहा हूं कि कुछ दिन जंगल की तरफ पैर करके भी मत सोना। समझे। और भैरो।'

'जी सरकार?'

'तुम्हारा उस्ताद तुम्हें जो हुक्म दे उसे आंख बन्द करके मानो। लेकिन अगर जंगल के बारे में यह कोई हुक्म दे तो उसे तामील करने से पहले जरा मुझसे पूछ लेना।'

'जी सरकार।'

कालिया को जगन सेठ की यह बात कतई पसन्द नहीं आई कि उसके ही सामने उसके आदमी को उसका हुक्म न मानने के लिए कहा जाए। लेकिन वह चुप रहा। जगन सेठ के जाने के बाद उसने भैरों को भी टरका दिया। क्योंकि वह जानता था कि जगन सेठ ने मौका दिया है तो भैरों अब उसकी नाक का बाल बनने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। जंगल से सम्बन्धित तो क्या अब वह उससे सम्बन्धित हर छोटी-बड़ी खबर जगन सेठ तक पहुंचा दे तो कोई ताज्जुब नहीं।

लेकिन उस दूसरे के बारे में तो पता करना ही पड़ेगा। जगन सेठ की जानकारी के बिना।

यह जाने बिना उसे चैन नहीं पड़ेगा कि आखिर वह दूसरा था कौन जो ऐन वक्त पर फारेस्ट आफिसर की मदद के लिए पहुंच गया। लेकिन इस काम पर समाए किसे। भैरों को लगाना ठीक नहीं। वह तो सीधा जगन सेठ को खबर कर देगा।

किसे लगाए?

सोचते-सोचते उसे अपने छोटे भाई हरिया के दोस्त रघुबर का ध्यान आया। साथ ही घनी मूंछों से नीचे होंठों पर एक गहरी मुस्कराहट फैल गाई-जगन सेठ को अभी मालूम नहीं कि

कालिया के पास काम करने के कितने रास्ते हैं।
 
साधना की समझ में नहीं आ रहा था कि यह उसे क्या होता

जा रहा है। उसका विवेक उससे कह रहा था कि जो कुछ भी वह कर रही है गलत कर रही है। लेकिन मन अवश होता था रहा था।

उस अजनबी के भद्दे रूप रंग में ऐसा कुछ भी तो नहीं था जो उसे आकर्षित कर सके। लेकिन फिर भी म जाने क्या था जो उसे बरवस अपनी ओर खींच रहा था।

चौड़ी छाती और मजबूत बांहों का वह क्षणिक आलिंगन अथवा प्रथम भेंट का वह अनचाहा चुम्बन।

या फिर उसकी वह चमत्कारिक मर्दानगी जो बिजली की तरह कड़कती हुई उनके दुश्मनों पर टूट पड़ी थी।

या फिर उसका वह अक्खड़पन"सबकुछ चलचित्र की तरह धूम गया था साधना की आंखों के आगे। उसके बेहोश भाई को चाकर लिटानाषाव में रेशमी राज भरना पानी पीकर आस्तीन से गीले होंठों को पोंछना और उसके नाम पूछने पर मेरा नाम अपने भाई से पूछना जिसने आज सुबह नौकरी से निकाला है मुझे झटके के साथ बाहर निफल जाना। केसरी से पूछ न पाई वह कि उसे क्यों नौकरी से निकाल था। काफी देर तक वह बैठी हुई उस अजनबी के बारे में ही सोचती रही। अपने आपसे पूछती भी रही कि आखिर क्यों सोच रही है वह उसके बारे में?'

इस बात का कोई जबाब नहीं था उसके पास?'

जब मन न माना तो दरांती कमर मे खोंस कर बंगले से बाहर निकल आई वह। उसने उस अजनबी को खोजने का निश्चय किया था। लेकिन समझ में नहीं आया कि कहां खोजे उसे।

कल रात तो तुरन्त ही सहायता के लिए आ गया था। इसलिए ज्यादा दूर तो नहीं होना चाहिए उसे।

काफी देर तक वह उसे इधर-से-उधर तलाश करती रही मगर वह नहीं मिला।

उसके न मिलने से साधना को और भी गहरी सोच में डाल दिया। उसी से सम्बन्धित विचार उसके मन-मस्तिष्क को

घेरने लगे।

शाम को खाना बाले हुए केसरी ने भी साधना के उन्मन चेहरे की ओर लक्ष्य किया। बोला-'तुम्हारी तबियत तो ठीक है दीदी?'

'हां हां ठीक है।' वह एकदम चौंककर बोली थी-क्यो-'क्यो हआ है मेरी तबियत को।'

'पता नहीं।' वह मिर झटककर बोला-'अजीब गुमसुम-सी

बैठी हो।'

'अगर सोच रही हो कि आज फिर कोई हंगामा होगा तो

बेफिक्र रहो। आज कोई हगामा नहीं होगा। आराम से सोना तुम।'

'क्यों आज कोई खास बात है क्या?'

'पुलिस कमिश्नर ने दो हथियारबन्द सिपाही नियुक्त क दिए हैं जो रात-भर बंगले पर पहरा देगे। रात आठ बजे सुबह चार बजे तक। अब तुम रात भर बाराम से खर्राटे अरना।'

'चलो अच्छा हुआ। उस आदमी को काम पर लगा दिया था?'

'किसे?'

'अरे वही जिसने रात हमारी मदद की थी।'

'मैन मुपरवाइजर साहब से कह तो दिया था किन्तु शाम को पता चला कि वह काम पर आया ही नहीं था।'

'आया ही नहीं, क्यों?'

'मुझे क्या पता। दिहाड़ी का मजदूर था कहीं और निकल गया होगा। शक्ल से ही आवारा लगता था। ऐसे लोग एक जगह टिककर काम करने में विश्वास नहीं रखते दीदी। खैर तुम शहर की सुनो। सुबह की खबर ने हलचल मचा दी वहां। एक जलूस भी निकला था।' केसरी कहे जा रहा था लेकिन वह सुन नहीं रही थी।

कहां निकल गया होगा ऐसे आवारा लोग एक जगह टिक कर काम करने में विश्वास नहीं रखते विचार बापस में गड्ड मड्ड से हुए जा रहे थे।

दोनो सिपाही आ गए थे। उन्हें चाय बनाकर दी। केसरी कुछ देर उनसे बतियाने बैठ गया था। उसने दूध का गिलास कमरे में रचने के बाद वह अपने पलंग पर आकर बेट गई थी।

न चाहते हुए भी फिर उन्हीं विचारों ने आवर घेर लिया उसे बला गया होगा कैसे? लेटे लेटे वह अपने आपसे पूछ रही थी कि आखिर वह क्यों सोच रही है उसके बारे मे जो चला गया होगा।

क्यों उस क्षणिक छाया के पीछे पगलाई हुई है जिसका अस्तित्व एक जुगनू की चमक से ज्यादा कुछ भी नहीं।

लेकिन वह उन बांहों का क्या करे जो अपनी अदश्य उंगलियों से उसकी मन-वीणा के तारों को निरन्तर झंकृत किए जा रहे हैं। उन होंठों का क्या करे जो उसके अधसें पर एक अतृप्त प्यास की रागिनी गुनगुनाए जा रहे हैं।

अपने अब तक के जीवन मे कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था साधना ने जब उसका विवेक उसकी भावनाओ के आगे बेबस-सा होकर रह जाए।

अगली सुबह केसरी के जाने के बाद वह फिर उसकी तलाश में बंगले से बाहर निकल आई।

जंगल के नए पुराने सब खतटों को भूल गई थी वह। एक लगन थी तो उस अनजाने को। ढूंढ़ निकालने की।

आदत-दर्ज की तड़प भी थी उसके मन के भीतर। क्या उसके रूप में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी को बांधकर रख सके।

और फिर न जाने कहाँ से वह अचानक ही निकलकर उसके सामने आ गया।

ठगी-भी देखती रही वह उसके बेढब अनगढ़ रूप को- उलझे बिखरे बाल कई रोज की बढ़ी हुई दाढ़ी, चैकदार कमीज के

बटन छाती पर खूले हुए।

'मुझे ढूंढ़ रही हो?' सीधा सवाल किया था उसने।

सकपका नई साधना!

'कल से ढूंढ़ रही हो?'

'तुम्हें मालूम है?'

'झाड़ियों में से छुपकर देख रहा था तुम्हें?'

'तो फिर सामने आए क्यों नहीं?' ।

'यकीन नहीं आ रहा था कि तुम मुझे ही ढूंढ रही हो।'

'बर तो यकीन आ गया?'

'कुछ-कुछ।'

और उसने अपनी बांहें फैला दीं। साधना दौड़कर उनमें समा गई।
 
तीसरे दिन जगन सेठ ने मेयर के अखबारी अभियान के जवाब में एक बड़ा जोरदार बयान अखबारों में प्रकाशित करवाया। वह बयान लिखा तो किसी और ने था लेकिन अखबारों में वह मेयर पद के नए उम्मीदवार सम्पतराय मुनीम के नाम से छपा था।

अपनी डूबती हुई नैया को बचाने के लिए वर्तमान मेयर द्वारा एक हास्यास्पद चुनावी हथकण्डा।

शहर की जागरुक जनता को बन सुरक्षा के नाम पर मूर्ख बनाने की एक बचकानी कोशिश।

एक फारेस्ट आफिसर की आड़ में जिसे आए अभी एस महीना भी नहीं हुआ वर्तमान मेयर श्री गिरीसचन्द्र शर्मा अपनी राजनीतिक नैया को असफलताओं के भवर से निकालने के लिए एक प्राणघाती कोशिश कर रहे हैं। जिस

फारेस्ट आफिसर को अपना पद सम्हाले हुए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ रोज भी नहीं हुए हैं वह श्री शर्मा की नजरों में कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और न जाने क्या-क्या बन गया। क्या इससे यह अनुमान लगाया जाए कि इससे पहले नितने फारेस्ट आफिसर आए वे सब श्री शर्मा की नजरों में चोर और हरामखोर थे।

पिछले फारेस्ट आफिसर श्री सरन महतो की लाश जंगल में संदिग्ध अवस्था में पाई गई थी। उसके निए तो श्री शर्मा के दिल में कभी कोई दर्द नहीं उमड़ा। उसके बारे में उन्होंने

अखबार में कभी एक शब्द नहीं कहा। फिर इस नए फारेस्ट

आफिसर से इतनी हमदर्दी क्यों?'

क्या उसकी कथित कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी म्ए कारण ही अथवा कोई अन्य ऐसा कारण है विस पर श्री शर्मा की पारखी नजर गड़ी हुई है और उद हासिल करने के लिए नए फारेस्ट आफिसर को यह सब उपाधियां अन्धा बांटे रेवड़ी की तरह खैरात में दी जा रही हैं।

बहरहाल सच्चाई छुप नहीं सकती कभी झूठे असूलों से बौर खुशबू आ नहीं सकती कमी कागज के फूलों से। श्री शर्मा को मालूम होना चाहिए कि वे थमाने गए जब झूठ की सीढ़ी लगाकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा जा सकता था। अब जनता जागरूक हो गई है। उसमें सच और झूठ पहचानने की अक्ल है।

उसी रोज मेयर का फोन जगन सेठ के पास पहुंचा। 'तो युद्ध का ऐलान कर दिया जगन सेठ?'

'पहले तो आपने ही की है शर्माजी।'

'लेकिन हमने किसी का नाम नहीं लिया था।'

'परदे के पीछे बैठकर तो औरतें गालियां देती हैं शर्माजी। मर्द

तो सीधे मैदान में आकर ताल ठोंकते हैं।'

'अब बेकार हंसी तो दिलात्रो मत जगन सेठ। अच्छी तरह मालूम है कि परदे के पीछे कौन बैठा है और आगे कौन शिखण्डी नाच रहा है।'

'इस बार वह शिखण्डी ही आपकी गद्दी हथियाने वाला है।' 'यह सपना तो खैर कभी पूरा होने वाला नहीं। लेकिन आपसे मुझ यह उम्मीद न थी कि आप इस तरह मेरे ऊपर कीचड़ उछालें। भला बताइए तो कहां गड़ी हुई है मेरी नजर?'

'पुरानी कहावत है शर्माजी कि शीशे के घर में बैठने वालों को दूसरी के घरों में पत्थर नहीं फेंकने चाहिएं।'

'खैर हम भी जब मैदान में आ ही गए है तो पीछे हटने वाले नहीं हैं। एक बात याद रखिएगा कि जीत हमेशा सच को होनी है।'

कुछ देर बाद ही जगन सेठ का फोन पहुंचा कालिया के पास।

'आव का अखवार पढ़ा।'

'बिल्कुल पढ़ा जगन सेठ। मेयर भी पढ़कर पटबीजने की तरह उछल गया होगा।'

'सच कह रहे हो। अभी-अभी उसका फोन आया था।'

'अच्छा क्या कह रहा था?'

'कहता क्या? अभी तो एक ही खुराक दी है कि पेट में दर्द

शुरू हो गया। मुझसे पूछ रहा था कि बताइए जरा मेरी नजर कहां गढ़। हैं।'

'सब्र करने दो बेटा को जरा अभी। वक्त आएगा तो वो भी बता देंगे।'

'वह तो जब बताएंगे तब बताएंगे। फिलहाल तो हमें उस बात

का फायदा उठा लेना चाहिए जिसकी तरफ मेरा भी ध्यान नही गया था और वह अपनी बेवकूफी से मुझे बता गया।'

'कौन सी बात।'

'अपने सारे आदमियों को एक-एक अखबार लेकर पूरे शहर में धूम जाने के लिए कहो।' जगन सेठ ने कहा-'वे शहर के हर आदमी को अखबार दिखाकर पूछेगे कि साहब यह मेयर की नजर कहा गड़ी हुई हो सकती है।'

'उससे क्या होगा?'

'सारा पहर आपस में यह सवाल करने लग जायेगा कि यह

मेयर की नजर कहां गड़ी हुई हो सकती हैं।'

'तब हम बताएंगे कि मेयर की नजर कहां पड़ी हुई हैं।'

'नहीं हमें कुछ भी बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी। शहर की

जनता बब सवाल करने लगेगी तो जबाब ही खुद-ब-खुद ढूंढ़ निकालेगी। हम तुम्हें कहने की कुछ भी जरूरत नहीं पड़ेगी।'

'मान गए जगन सेठ तुम्हारी अक्ल को।'

'उस मेयर के बच्चे ने तो शायद रसगुल्ला समझकर यह अखबारी लड़ाई छेड़ी होगी। लेकिन मैं उसे लोहे के चने चबवा दूंगा। तुम देबते जाओ जरा।'

'अब एक खबर हमसे भी सुन लो।'

'क्या?'

'उस फारेस्ट आफिसर के दूसरे साथी का पता लग गया है।'

तुमने मेरे मना करने के बावजूद फिर जंगल का रूख किया?'

कालिया को तुरन्त अपनी भूब का अहसास हुआ कि यह बात जगन सेठ से कहनी नहीं थी।

एकदम संभलकर बोला-'जब तुमने मना कर दिया तो फिर भला मेरा जंगल से क्या बास्ता। वो तो यूं ही सुपरवाईजर की भेजी हुई खबर पहुंच गई थी मेरे पास।'

'तब ठीक है।' जगन सेठ का शान्त स्वर सुनाई दिया-'कौन है दो आदमी।'

'जगतार है उसका नाम। अभी इससे ज्यादा उसके बारे में

और कुछ नहीं मालूम हुआ। हुक्म हो तो पता करवाऊं।' 'अभी तुम उस बारे में कुछ करो। जंगन के बारे में एकदम से

भूल जाओ फिलहाल। वह अखबार बाला काम जो तुम्हें बताया है उसे करो।'
 
कालिया ने भैरों को फोम करके वह अखबार वाला काम-बता दिया उसे। लेकिन वह जंगल और उसके फारेस्ट आफिसर को भूला नहीं।

शाम को हरिया और रघुबर ने आकर खबर दी। 'साधना रोज दिन में जगतार से मिलने जाती है छुपकर।'

'अच्छा तो वह आदमी हमारे फारेस्ट आफिसर की बहन क यार है।' कालिया गर्दन हिसाता हुआ बोला-'उसके पीछे-पीधं शहर से यहां तक पहुंच गया।'

'कुछ चक्कर समझ में नहीं आ रहा भईया।' हरिया बोला, 'अपना फारेस्ट आफिसर जगतार को पहचानता तो है नहीं। सुपरवाईजर ने जो उनकी पहले दिन की मुलाकात देखी उससे तो उसे यही लगता है।' 'इसका मतलब है कि फारेस्ट आफिसर को उन दोनों के मिलने का भी पता नहीं होगा।'

'नहीं, जद वो बाहर चला धाता हं तब वह निकलती है उससे मिलने के लिए।

हरिया की बात में लुकमा लगाया रघुबर ने-'और उसके लौट के आने से पहले ही वापिस आ जाती है बंगले में।'

'अच्छा?' गम्भीरता से सिर हिलाया कालिया ने-'और अपने यार फारेस्ट आफिसर को पता ही नहीं कि उसकी सती साध्वी बहन क्या गुल खिना रही है। बेचारा।'

कहकर सबने नान मुर से बगाई और हुक्का गुड़युड़ाया। 'कहो तो उस्ताद हम बता दें?' रघुबर बोला।

'नहीं।' कालिया ने एकदम डपटकर कहा-'किसी को कुछ बताने पी जरूरत नहीं है। यहां तक कि अपने आदमियों से भी इसका कोई जिक्र नहीं करना है। यह बिलकुल सीक्रेट मामला सौंपा है मेंने तुम दोनों को।' वे दोनों चुप रह गये।

'कल तुम दोनों एक काम करना।' कुछ सोचकर बोला

कालिया।

'क्या?'

'गोदाम मैं से जानवरों की खाल ले लेना और कैमरा भी।' उसके साथ ही कालिया ने उन्हें अच्छी तरह से समझाया कि क्या करदा है।

सममाने के बाद बोला-'बहुत होशियारी से काम करना है।

और उस आदमी को जरा भी भनक न पड़ने पाए तुम लोगों की। समझ गए ना?'

अगली शाम हरिया और रघुबर दोनों खुशी से झूमते-झामते

आए। उनकी चाल-ढाल ही बता रही थी कि खशी में मतवाले होकर उन्होंने वहां आने से पहबे ही कुछ चढ़ा ली थी।

गनीमत यही थी कि नसे में मदमस्त नहीं थे वे लोग।

'मोर्चा फतह कर लिया सस्ताद आपकी दुआ से।' रघुबर ने खशी से झूमते हुए कहा-'ऐसे-ऐसे बढ़िया फोटो खींचें हैं कि देखैते ही फड़क उठोगे। दिखाना हरिया गुरु जरा।'

हरिया ने जेब से एक गीला सा लिफाफा निकालकर कालिया की ओर बढ़ाते हुए कहा-फोटो बीच कर सीधे फोटोग्राफर की दुकान पर गए। हाथ के हाथ रील धुलवा कर प्रिंट निकलवाए। अभी थोड़े गीले हैं। तुम्हें दिखाने के लिए गीले ही

उठा लाया।

कालिया ने प्रिंट देखे।

साधना और जयतार के प्रेमालीन फोटो।

उतने उत्तेजक तो नहीं थे बितने भैरों के माध्यम से उसने साधना के फोटो अपने एक अन्य आदमी के साथ खिंचवा लिए थे। लेकिन फिर भी बदनाम करने के लिए अथवा उस

फारेस्ट आफिसर की नस दबाने के लिए काफी थे।

अब फारेस्ट आफिसर उसकी मुट्ठी में होगा।

एक नहीं दो अबग-अलग आदमियों के साथ लिपटा-चिपटी के फोटो। ऐसा कौन माई का लाल है जो इन्हें देखकर उसे बद- इच्छा हुई जगन सेठ को अपनी कामयायी की सुचना देने की। मगर रुक गया।

शाबासी देता हुआ बोला-'शाबास हरिया, अब यकीन हो गया कि तू मेरी जगह सम्हाल सकता है। अक्ल है तेरी खोपक में।

और रघुबर तू भी पास हो गया रे अपने इम्तहान में। आज से हमारे खास आदमियों में आ गया तू।'

'बहुत-बहुत मेहरबानी उस्ताद।'

रघुवर ने इस तरह झुककर कहा जैसे मन मांगी मुराद मिल गई हो उसे।
 
पांचवे दिन केसरी मेयर के घर से जीप में लौट रहा था

इन पांच दिनों में वह मेयर के काफी नजदीक आ चुका था। किन्तु फिर भी वहां से लौटते समय वह कोई खास प्रसन्न नहीं था। मेयर ने जो अखबारी युद्ध छेड़ा था वह अब उसी के लिए मुसीबत बन गया था। उसे मालूम हुत्रा कि कालिया का पृष्ठ पोसी जगन सेठ खुल कर सामने आ गया है। वह उसे और उसकी बहन को पूरी तरह टदनाम करने पर तुला हुआ है।

'मैंने तो आपसे पहले कहा था कि वे कमीने लोग उस बात

का नाजायज फायदा उठाएंगें।' उसने कहा था।

'उसके लिए तो मैं तैयार था।' मेयर परेशान से स्वर में बोला-'तुम्हारी सच्चाई पर और तुम्हारो बहन की नेकचलनी पर मुझे पूरा भरोसा है। इसीबिए मैंने सोचा था कि बदनाम करन के लिए वे जिस आदमी को भी सामने लाएंगें उसे मैं साबित कर दूंगा कि वह उनका ही आदमी है। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि वे लोग मुझे ही सानने की कोशिश करेंगे।'

'तो क्या किया जाए?' 'कुछ समझे में नहीं आ रहा।'

'कोशिश करू दीदी को वापिस भेजने की। हालांकि वे तैयार नहीं होगी।'

'उससे तो उन लोगों के प्रचार को और बन मिल जाएगा। ऐसे मौके पर सामने से हट जाने का मतलब होना यह साबित करना कि उनकी ही बात सच है।'

काफी देर तक बात करता रहा था वह किन्तु कोई उत्साह-वर्धक नतीजा नहीं निकला।

लौटने के समय साधना के बारे में ही सोच रहा था वह। अगर उसकी बात मानकर वह भी सामाजों के यहां चली गई होती तो शायद इन बदमामों से लिपटने में कुछ सहूलियत होती।

लेकिन वह भी तो एक मम्बर की जिद्दी है।

बंगले पर रात को पुलिस का पहरा लग जाने की वजह से कुछ सुख-शान्ति थी। बदमाशों का उपद्रव शान्त हो गया था। लेकिन साधना में उसने कुछ परिवर्तन अवश्य लक्ष्य किया था।

पहले से भी ज्यादा गम्भीर हो गई थी वह। कारण पूछने का कोई मौका नही मिला था उसे। क्योंकि वह स्वयं इस अखबारो युद्ध और इसके सम्भावित परिणामों को सोचने मे उलझा हुआ था।

आज मेयर की बात सुनकर तो वह और भी अधिक हतोत्साहित सा महसूस कर रहा था।

आज साधना से बात करेगा।

लेकिन क्या बात करेगा।

मेयर ने सच कहा है कि ऐसे नाजुक मौके पर सामने से हटने

का मतलब होगा उन लोगों की और बन आना।

यही सब सोचते हुए उसने पेट्रोल डलवाने के लिए गाड़ी एक पैट्रोल पम्प में मोड़ दी।

रोकते रोकते यह देखकर चौंक पड़ा कि वहां कालिया एक आदमी के साय खड़ा पैट्रोल डलवा रहा था। उसे यह नहीं मालूम था फि वह आदमी उसका छोटा भाई हरिया है। वह अपनी ड्राईविंग सीट पर ही बैठा रहा था। लेकिन हरिया ने उसे देख लिया था और उसे देखकर जोर से गाना भी शुरू कर दिया था।

अरे मेरे जगतार यार तेरे गले में डालूं बांहों का हार

साधना पूरी कर दे रे..

साधना पूरी कर दे रे... कोई शक नहीं था कि यद् सब उसे उत्तेजित करने के लिए जान-बूझकर ऊंची आवाज में सुनाया जा रहा था। उसने अपने आपको समझाया कि उसे उत्तेजित नहीं होना है।

किन्तु हरिया की आवाज उत्तरोत्तर तीव्र ही नहीं होती जा रही थी बल्कि उसकी मुखमुद्रा अश्लीलता की सीमा का छूने लगी थी।

पैट्रोल डालने वाला भी उसकी ओर देखकर एक अवीब सी न समझ में आने वाली हंसी हंसा।

बस तमी उसके संयम का बांध टूट गया।

एक छलांग में वह बाहर कूद गया। हरिया के जबड़े पर जो चूंसा पड़ा तो वह घूमता हुआ जीप से टकराकर नीचे गिर पड़ा।

कालिया ने एकदम घूमकर उसे पकड़ा।

बिफरे हुए शेर की तरह उसने कालिया के पेट में घूसा मारा

और वह छिटक कर जमीन पर जा गिरा।

वह उस पर झपटने ही जा रहा था कि पैट्रोल डालने वाले ने उसे रोका-'क्या कर रहे हैं वाबू जी?'

वह शयद रुक भी जाता मगर तमी उसने कालिया को अपनी पिस्तौल निकालते हुए देख लिया। सो पैट्रोल डालने वाले को

तेजी से एक ओर को उछालकर उसने पैर की ठोकर कालिया के हाथ पर मारी।

एक ही झटके में पिस्तौल हाथ से निकल कर दूर जा गिरी। तब तक हरिया भी सम्हल कर फिर से उस पर झापड पड़ा था।

उसने थोड़ा सा झुकंकर जो धोबी पाट मारा तो हरिया हवा में बल खाता हुआ सौंधा कालिया पर जा गिरा।

पिस्तौल हाथ से निकलते ही कालिया की स्थिति उस नाग

जैसी हो गई थी जिसके जहरीले दांत तोड़ दिए गए हों। उसे यह भी अहसास हो गया था कि छोकरा उस समय उस पर भारी पड़ रहा है।
 
हरिया को अपने ऊपर से धकेलता हुआ बोला वह-'अबे यहां क्या अपनी मरदानगी दिखा रहा है। घर जाकर अपनी बहन को सम्हाल। जाकर देख वह अपनी जवानी का थाल किस कुत्ते को परोस कर खिला रही है।'

वह क्रुद्ध शेर सा फिर झपटने को उद्यत हुआ। लेकिन पैट्रोल पर उपस्थित अन्य लोगों ने थाम लिया।

बीच-बचाव हुआ।

लोगों ने दोनों भाईयों को जीप में बैठा कर विदा किया। पिस्तौल भी उठाकर कालिया को दे दी।

उनके जाने के बाद उसकी गाड़ी मे भी पैट्रोल डालकर उसे विदा किया।

अन्धाधुन्ध तेज गति से जीप चलाता हुआ वह सीधा बंगले पर पहुंचा। सारे रास्ते बस दो ही शबद उसके मस्तिष्क में गूंथते रहे थे।

साधना जगतार "जगतार साधना।

क्या हुआ दीदी को जो अगतार जैसे भद्दे और कुरूप व्यक्ति की ओर फिसल गई नहीं दीदी ऐसी नहीं है कालिया साला बदनाम करने के लिए झूठ बोल रहा है. मगर उसने भी पिछले दिनों दीदी में परिवर्तन तो लक्ष्य किया था तो क्या दीदी का संयम.. शंका के सर्प मस्तिष्क में फन उठाकर फनफनाने लगे। तो क्या अन्याय के सामने से हट जाने वाली बात सिर्फ एक दिखावा था एक धोखा था और असल में यह जगतार से मिलने के लिए यहां बने रहना चाहती थी। मगर एक

अजनबी व्यक्ति के प्रति इंतना झुकाव आखिर क्यों और कैसे?' कुछ समझ में नहीं आ रहा उसकी।

जितना भी सोचता मस्तिष्क उतना ही भ्रमित सा होता लग रहा था।

जीप रोकते ही उसने देखा कि बंगले का दरवाजा बन्द है। कुंडा लगा था मगर ताला नहीं।

तो दीदी कहीं गई है।

कहां?"जगतार से मिलने?

सोचते ही चेहरा सख्त हो गया। जबड़ा कस गया। आंखों में

खून सा उतर आया।

चारों ओर नजर दौड़ाई। साधना कहीं नजर न आई।

कहां जाकर पकड़े उन दोनों को? किस तरफ गई होगी।

फिर अचानक ही पूरी शक्ति से चिल्ला उठा वह-दीदी दीदी...।

हवाओं को चीरती हुई उसकी तेज आवाब जंगल में चारों ओर

को गूंजती चली गई।

कभी वह एक ओर को बढ़कर आवाज देता कभी दूसरी ओर

को। जैसे पगला-सा गया हो।

फिराक ओर की झाड़ियां तेजी से हिलती दिखाई दी। वह उसी ओर झपटा।

झाड़ियों से अस्त व्यस्त सी साधना निकल कर वाहर आई।

कहां गई थी?' वह एकदम गरजा।

उसे अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था। क्योंकि आज से पहले कभी भी साधना के आगे इतनी तेज आवाज में बोलने का साहस नहीं हुआ था उसे।

साधना के चेहरे का उड़ा हुआ रंग देखकर उसे अपना सन्देह पुष्ट होता नजर आया।

'कहां गई थी?' वह क्रोध से कांपता हुआ फिर गरजा। 'तुम इस वक्त आपे में नहीं हो केशो।' साधना ने कहा और उसके पास से गुजर जाना चाहा।

वह वास्तव में अपने आपे में नहीं था।

उसने हाथ बढ़ाकर साधना की बांह पकड़ ली और जोर से झिंझोड़ता हुआ बोला-बेहया-बेशम पहले ही क्या कम मुसीबतें थी जो तू इस रास्ते पर फिसल गई मालूम है सारे

शहर में थू थू हो रही है।'

'तुम हद से आगे बढ़ते जा रहे हो केशो।' निर्भीकता से कहा साधना ने और साथ ही झटके से अपनी बांह छुड़ा ली। 'मैं हद से आगे बढ़ता जा रहा हूं या त लाज शरम की सारी सीमाएं बांध गई बता, किससे मिलने गईाई थी उस कुत्ते जगतार से आज उसे भी जिन्दा नहीं छोडूंगा बता कहां है वह हरामजादा?'

'होश में आओ केशो।' साधना डपटकर बोली-'खबरदार जो उनके बारे में एक शब्द भी गलत निकाला।'

'चुप बेशर्म।'

और उसने साधना के मुंह पर एक तमाचा ही तो जड़ दिया।
 
'बस।' तभी एक कड़कदार आवाज गंजी।

उसने एकदम घूमकर देखा। झाड़ियों के पास जगतार खड़ा धा कूल्हों पर हाथ रखे हुए। सिर के बाल उनके बिखरे। कई दिनों की बड़ी हुई दाढ़ी। छाती के बटन खुने हुए भद्दा और कुरूप मा जगतार। लेकिन इसके बावजूद भी उनकी आकृति में उसके खड़े होने के स्टाईल में एक अजीब मव्यता और गरमा सी थी।

जैसे कोई जंगली शेर अपनै वीरोचित अभिमान के साथ अन्य सभी को अपनी तुच्छता का बोध करा रहा हो।

हां जंगली शेर सा ही लगा था वह उसे। क्योंकि इस तरह अचानक ही उसे अपने सामने पाकर न जाने क्यों उसका कलेजा धक्क से रह गया था।

वह डरा नहीं था उससे। शायद उस अजनबी को अपने सामने पाकर उसे अचानक ही कुछ दिन पहले की वह रात याद आ गई थी जब यह अचानक ही उस संकट की घड़ी में देवदूत की तरह सहायता करने के लिए पहुंच गया था।

तब का सहायक आज दुश्मन के रूप में सामने खड़ा था लेकिन सहायता का यह मतलब तो नही कि वह अपने उपकार का ब्वाज उसकी बहन को फुसलाकर वसूल करने

लगे।

जगतार कह रहा था उससे-'अब अगर अपनी बहन के हाथ लगाया तो यह हाथ तोड़कर रख दूंगा।'

जगतार के चुनौती भरे शब्द सुनते ही उसकी आंखों में फिर से खन उतर आया। उसका इतना साहस कि उसकी बहन पर उसके सामने इतना अधिकार दिखा रहा है।

'जा चला जा यहां से कुत्ते।' वह गर्राया-'अब अगर कभी इस जंगल में नजर आया तो टुकड़े करके फेंक दूंगा।'

'जा रहा हूं।' जगतार ने गुरू गम्भीर स्वर में कहा-'मगर इतना ध्यान रखना कि अगर अपनी बहन पर हाथ उठाया तो मुझे अपने सामने पाने में देर नहीं लगेगी।'

और फिर उसे जगतार पर झपटने में देर नहीं लगा। कुत्ता दुम दबा कर भागने की बजाए उसी पर गुर्राए जा रहा है।

पहले तो जगतार अपना बचाव करता रहा। लेकिन जब उसके आक्रमण की भीषणता बढ़ती ही गई तो उसने भी मुकावला करना शुरू किया।

तभी उसका जोरदार घंसा जगतार की नाक पर पड़ा। जगतार उसकी चोट से न सिर्फ लड़खड़ा गया बल्कि उसकी पक से खून भी छलक आया।

खून देखते ही जैसे जगतार भी सब कुछ भूल गया हो खाली शेर की तरह भीषण गर्जना करता हुआ वह उस पर झपटा। दो चार हाय पड़े तो सिर घूम गया।

उसे पता भी न चल सका कि कब जगतार ने उसे अपने हाथों में सिर से ऊपर उठा लिया।

'नही।'

उसके फेंकने से पहले ही साधना पूरी शक्ति के साथ चीखी।

जगतार एकदम रुक गया। उसने धीरे से उसे जमीन पर लिटाया और फिर छलांग लगाकर झाड़ियों के नीच गुम हो

गया।

वह हतप्रभ सा हिलती हुई झाड़ियों को देखता रहा।

इम तरह सरेआम बेइज्जती करने के बाद वो जिन्दा बच कर निकल जाए भईया तब तो फिर हो चुका हम लोगों का इस

शहर मे अब रहना।

जिस तरह घायल सांप इधर से उधर फन पटकता है उसी तरह कालिया भी फुफकारें सी मारता हुआ अपने घर के कमरे में इधर से उधर घूम रहा था। उसे मालम था कि हरिया झूठ नहों कह रहा। पैट्रोल पम्प की घटना की खबर सारे शहर में फैलते देर न लगेगी। लोग सामने नहीं पीठ पीछे हंसना शुरू कर देंगे। जीना हराम हो जाएगा इस शहर में।

अगर उसने ठोकर मारकर पिस्तौल हाथ से न निकाल दी होती तो आज साले को वहीं भून के रख दिया होता। लेकिन साले के बदन में क्या कड़क की ताकत थी। दोनों भाईयों को पीटकर चला गया।

सरेआम कालिया के सिर पर बंसरी बजा ही दी उसने।

अपमान की ज्वाला से सारा बदन जल रहा था कालिया का। छाती में प्रतिहिंसा की ज्वाला धधक रही थी। अब जब तक उस हरामजादे की लाश नहीं बिछा देगा तब तक चैन नहीं पड़ेगा उसे।

तभी फोन की घंटी बजी।

हरिया ने रिसीवर उठाया। फिर माऊथ पीस पर हाथ राखकर उसकी कोर वढ़ाता हुआ बोला-'जगन सेठ हैं।'

उसने रिसीवर ले लिया।

'यह पैट्रोल पम्प पर क्या हंगामा हो गया?' दूसरी ओर जगन

सेठ की आवाज आई।

'वही हो गया जो होना चाहिए था।' वह अपने स्वर यथा-सम्भव संयत रखता हुआ बोला। लेकिन साथ ही अपना आक्रोश छुपाने की भी कोई कोशिश नही की उसने-'हमारे हाथ तो आपके हुक्म से बंधे हुए थे जगन सेठ। सो उस हरामजादे की बन आई। भरे चौराहे पर इज्जत धूल में मिलाकर चला गया।' 'तुम्हारी सहनशीलता की तारीफ करने के लिए फोन किया है मैंने तुम्हें। अपने आप पर काबू रखकर जिस अक्लमंदी का सबूत दिया है तुमने वो वाकई काबिले तारीफ है।' 'वह साला मेरे सिर पर बंसरी बजाता रहेगा ओर तुम मेरी सहनशीलता की तारीफ करते रहना जगन सेठ।' कालिया ने तल्ख से स्वर में कहा। 'बस कुछ दिन तक अपने ऊपर काबू और रखो, फिर देखना कि यह फारेस्ट आफिसर तुम्हारे ही पैरों में अपनी नाक रगड़ता नजर आएगा।'

'हम तो तुम्हारे हुक्म के गुलाम हैं जगन सेठ। जब तक कहोगे तब तक सब्र किए बैठे रहेंगे। पर इतना समझ लो कि सब्र का प्याला लबालब भर चुका है। कभी भी छलक सकता है।'

'अब ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ेगा तुम्हें।' दूसरी ओर से जगन सेठ की आवाज आई-'तुम्हें मालूम है। अभी कुछ देर पहले मेयर का फोन आया था मेरे पास। साले की धोती ढीली हो गई। समझौता करना चाहता है अब।'

'अच्छा ।'

जगन सेठ दूसरी ओर से अपनी उपलब्धि का वखान करते रहे कि कैसे वह वर्तमान मेयर का ऐसा शिकंजा कसेंगे कि वह उनकी शर्तों पर नाक रगड़ कर समझौता करने के लिए तैयार होगा। उसके बाद उस फारेस्ट आफिसर को ऐसे शिकंजे में कसा आएगा कि साला हाथ जोड़कर जूतियां चाटने पर मजबूर हो जाएगा। 'बस तुम थोड़े दिन और सब करो।' जगन सेठ ने उससे हा।

'कहा ना जगन सेठ, हम तो तुम्हारे हुक्म के गुलाम हैं। अब तक कहोगे सब किए बैठे रहेंगे।'

लेकिन कालिया ने जो कुछ कहा था वह करने के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं था। बपनी वास्तविक मनोभावनाएं जगन

सेठ पर व्यक्त करके वह बेकार की बहस में नहीं उलझना चाहता था। इसलिए फोन पर जो जगन संठ सुनना चाहता था दही सुनाता रहा।

लेकिन उसका वास्तविक इरादा उसके मस्तिष्क में पूरी तरह पुख्ता हो चुका था।

आज रात उस फारेस्ट आफिसर को निबटा देना है।

जगन सेठ बाद में बिगड़ेगा तो देख लिया जाएगा।

मार पीछे की पुकार किसने सुनी है।

लेकिन इस बारे में न भैरों से कोई बात करनी है न किस और से। काम होने से पहले अगर जगन सेठ तक खबर पहुंच गई तो गड़बड़ हो सकती है।

इसलिए जरूरी है कि कानों कान किसी को खबर न होने पाए। बस वह हरिया और रघुबीर। बस तीन आदमी।

लेकिन फारेस्ट आफिसर छोकरा है जरा कड़ा। उस पर और हरिया पर भारी रहा था वह। मगर तब और बात थी। इस बार जब कालिया उस पर झपटेगा तो साले को पलक झपकने का भरई मौका नहीं देगा।

उसे क्या करना है यह सब शीशे की तरह उसके दिमाग में साफ है।

'तू रघुबर को बुला कर ला।' उसने हरिया से कहा।

हरिया के जाने के बाद कालिया ने अलमारी खोलकर लोहे की बनी हुई एक अशुभ आकृति सी बाहर निकाली जिसमें एक दूसरे से जुड़े हुए चार लोहे के छल्ले से बने हुए थे। छल्ले एक ओर से सपाट थे लेकिन दूसरी ओर उन पर शेर के तेज नाखूलैं सरीखी लोहे की पैनी घुमावदार कीलें सी जुड़ी हुई थीं।

यह बधनया था।

कालिया का सबसे बड़ा खतरनाक हथियार। जिस पर उसका किसी पिस्तौल से भी ज्यादा भरोसा था।

इसे पहनकर अगर बन्द मुट्ठी से बार किया जाए तो कि भी

आदमी की गरदन की हड्डियां जबाड़े के पास के जोड़ टूटती चली जाएं। और अगर खुले पंजे से बार किया जाए आदमी की हड्डियों तक से मांस के लोथड़े नुचते चले जाएं।

हरिया और रघुबर के आने से पहले ही उसने उसे फिर से

अलमारी में रखते हुए कहा था-कुछ देर और आराम कर ले बेटे।

फिर हरिया और रघुबर को अपनी योजना समझाने लगा था वह।
 
उस घटना के बाद से दोनों भाई बहनों में से कोई भी एक दूसरे से नही बोला था। अपने-अपने कमरे में आकर पड़ गए

थे वे लोग।

बाहर उतरता हुआ रात का अन्धेरा बंगले में भी घिर आया था

पर किसी ने भी बत्ती जलाने की जरूरत नहीं समझी थी।

वह अपने पलंग पर चित्त पड़ा हुआ फटी-फटी आंखों से छत के अन्धेरों के घूरता हुआ सोच रहा था कि यह क्या हो गया। कैसी जगह आ गया वह जहां उसकी जिन्दगी में यह नर्क का अन्धेरा घुलता चला जा रहा है।

यहा आने से पहले कैसा था उनका छोटा सा परिवार। अभाव थे जिन्दगी की कशमकश थी लेकिन उसके बाद भी खुशियां थी उनके जीवन में।

लेकिन यहां आते ही उनकी खुशियां के फूल नियति के क्रूर हाथों द्वारा नोचकर मसल दिए गए।

अपनी दीदी की दिल से पूजा किया करता था वह। वह जानता था कि जमाने की कितनी सर्द-गर्म तेज हवाओं का सामना करके उसने उन लोगों को पाल पोस कर बड़ा किया है। अपने सभी अरमानों और खुशियों को कुर्बान करके उसे पड़ा लिखा कर शिक्षित किया ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

और आज अपने पैरों पर खड़े होते ही उसने अपनी दीदी की कुर्बानियों का बदला उसके मंह पर चौटा मार कर चुकाया।

लेकिन दीदीको भी यहां औते ही क्या हो गया?

लोग जिसके चरित्र खौर संयम की कसमें खाया करते थे, बह उस आवारा से जगतार पर छि:...|

'खाना बनाऊं?'

न जाने कब में साधना आ गई थी वहां। बचानक ही उसकी

आवाज सुनकर चौंक पड़ा था वह। फिर अनमाने स्वर में बोला-'नहीं।'

और कुछ नहीं कहा साधना ने। और दिनों की भांति यह नहीं पूछा कि क्यों नहीं खाएगा। बस खामोशी से मुड़ी और बाहर जाने को हुई।

'दीदी।' उसने पुकारकर रोका।

रुक गई साधना।

'बत्ती जला दो।'

स्विच दवा कर बत्ती जला दी साधना ने। उसने देखा कि

आंखें जरूर लाल-लाल और भारी थीं। लेकिन पश्चाताप का कहीं कोई निशान नहीं था। चेहरे पर पत्थर की सी खामोशी

और दृढ़ता थी जो उसने पहले भी कई ऐसे अवसरों पर देखीं थी जब वह दनिया भर के विरोधों का मुकाबला करने के लिए अपने आपको मानसिक रूप से दृढ़ प्रतिज्ञा कर लेती थी।

कांप गया था वह उस दृढता को देखकर।

'दीदी।' अजीब से कंपित स्वर में बोला वह-'आज जो कुछ

भी हुआ।'

'नहीं होना चाहिए था।'

.

.

.

'मैंने तुम पर हाथ उठाया?'

'उसका मुझे अफसोस है कि मैंने तुम्हें इतना दुख पहुंचाया जो तुम अपना आपा खो बैठे।' साधना ने सपाट से स्वर मे कहा।

'तुम्हें यह सब नहीं करना चाहिए था दीदी।'

'यह तो मैं नहीं जानती केशो कि मुझे यह सब करना चाहिए

था या नहीं। लेकिन इतना जरूर हूँ कि जिस रास्ते पर मैं आगे बढ़ चुकी हूं उससे अब वापिप्त नहीं लौटूंगी?'

'उस जगतार के लिए?'

'ही उसी के लिए।'

'कब से जानती हो उसे।'

'जिस रात बंगले पर हमला हुआ था तब पहली बार देखा था उसे।'

'ऐसा उस असभ्य लोफर में क्या दिख गया तुमको?'

'यह मैं भी नहीं जानती।'

'एक क्षण के लिए तुमने यह नहीं सोचा कि वह तुम्हें बोखा

भी दे सकता है।'

'शायद।'

'ओह।' उसने झुंझलाकर फोल्डिंग पलंग के लोहे बे पाईप पर हाथ मारा-'तुम इतनी समझदार होकर यह सब |

'मेरा ख्याल है कि इस विषय में अगर हम आगे बात न करे तो अच्छा है।'

'लेकिन दीदी उस आदमी के बारे में बिना कुछ जाने

समझे।'

'जितना कुछ मुझे जानना चाहिए वह मैं जान चुकी हूं।' 'क्या जान चुकी हो तुम?'

'वह चाहे एक अच्छा आदमी न हो लेकिन एक सच्चा आदमो जरूर है।'

उसने उलझनपूर्ण दृष्टि से साधना की ओर देखा।

'वह अपने बारे में सब कुछ बता चुका है।' साधना ने शून्यू में निगाहें जमाते हुए कहा-'जब अनजानी भावनाओं से बध मेरे कदम उसकी ओर बढ़े थे तभी उसने मुझे चेता दिया था कि मैं गलन दिशाओं में बढ़ रही हूं। वह एक पेशेवर अपराधी है। पुलिस उसके पीछे पड़ी है। उसी से बचने के लिए वह इन जंगलों में छुपने के लिए आया है।'

'इसके बावजूद भी तुम ।' 'हां, शायद यही मेरा भाग्य है या शायद एक और चुनौती कि मैं एक भटके हुए आदमी को सही रास्ते पर ला सकू।' 'कहीं ऐसा न हो दीदी कि तुम खुद जिन्दगी के रास्ते पर भटक जाओ।'

'कौन जानता है?' एक दीर्घ निःश्वास के साथ कहा साधना ने और फिर चुपचाप बाहर निकल गई।

दोबारा खाने के लिए नहीं पूछा उसने। पूछती भी तो उसका उत्तर इन्कार में ही होता।

जाने के बाद भी वह काफी देर तक सोचता रहा। जिन्दगी की धारा ने इस मोड़ पर आकर क्या अनोखी करवट ली है। तब जबकि वह सोच रहा षा कि यह नौकरी मिलने के बाद उनकी जिन्दगी में सुों की सरगम बजने लगेगी तब यह अचानक ही कौन से अशुभ दुखों की धुन बज उठी।

पेशेवर मुजरि पुलिस पीछे पड़ी है तो क्या पुलिस को खबर कर दे इसके बारे में पुलिस के दोनों पहरेदार भी आने बाले होगें पुलिस उसे पकड़कर ले जाएगी तो दीदी की जिन्दगी से निकल जाएगा यह मुजरिम ।

लेकिन फिर उसने एक लम्बी सांस के साथ निराशा से सिर हिलाया।

वह अपनी दीटी को जानता था। जगतार को जितना टससे दूर किया जाएगा दीदी की उसके प्रति निष्ठा और लगन उतनी ही मजबूत होती जाएगी।

पहरेदार लोग आ गये थे।

लेकिन आज उसकी इच्छा नहीं हुई उनसे बोलने और बतियाने की।

बंगले पर जिन सिपाहियों की ड्यूटी लगती थी उसका पता निकालकर रघुवर ने उन्हें अपने जल में उलझा भी लिया था।

एक काल्पनिक कहानी सुनाई थी उसने किसी बुढ़िया हारा अपने किराएदार के मकान से निकालने की कोशिश के बारे में। कहानी सनाते हए रघुबर बार-बार उनके सामने इस ढंग से झक रहा था कि जेब में रखा अंग्रेजी का पव्वा उन्हें बराबर नजर आता रहे।

'अंग्रेजी है।' एक सिपाही ने पूछा। 'अंग्रजी ही है चखोगे?' रघुबर ने पव्वे पर हाथ फेरते हुए

कहा।

'बस पव्वा लिए ही घूम रहे हो?'

'अरे हवलदार तुम हुषम करो तो अभी पूरी बोतल आ जाए

पर वो काम"।'

'अभी बात करने का टाईम नहीं है। ड्यूटी पर जाना है।' 'रात की ड्यूटी है।' 'हां, फारेस्ट बंगले पर।'

'कहो तो बोतल लेकर वहीं आ जाऊं। बात की बात हो जाएगी और रात भी गुलजार हो जाएगी।'

'क्या कहते हो?' सिपाही ने अपने साथी की ओर अर्थपूर्ण

दृष्टि से देखते हुए पूछा।

दोनों को ही बिचार बुरा नहीं लगा कि रात की बोरियतच भरी ड्यूटी में अगर कुछ रंग पानी हो जाए, जंगल में मंगल हो जाएगा और किसी को पता भी न चलेगा। दोनों सिपाहियों ने आपस में तय करके रघुबर को बता दिया कि वह माल-पानी का इन्तजाम करके जंगल के बंगले पर पहुंच जाए। लेकिन दस बजे के बाद। तब तक बंगले के वाशिन्दे आराम की नीद सो चुके होंगे। वही वे आराम के साथ उसकी वात सनकर तय करेंगे कि उस बुढ़िया के किराएदार को किस तरकीब से गोल करके बाहर फेंका जाए।

ठीक दस ब्जे एक झोले में सब सामान लिए हुए रघुबर वहां हाजिर था। वैसे कोई खतरे की बात नहीं थी लेकिन फिर भी सिपाहियो ने उसे एक झाड़ी के पीछे बैठ जाने के लिए कहा।

रघुबर अपने साथ सब इन्तजाम करके ले गया था एक टोकरी मैं। गिलास, व्हिस्की और नमकीन ही नहीं बल्कि सोडे की बोतलें भी।

झाड़ी के पीछे रघुबर ने अपना मयखाना चालू कर दिया।

एक सिपाही झाड़ियों के पीछे आया, गिलास खाली किय

और नमकीन चबाता हुआ वापिस लौट गया।

उसके बाद दूसरा आया। फिर पहला।

फिर दूसरा।

पहरे का पहरा दिया जा रहा था और रंग-पानी का रंग पानी जम रहा था।

'बड़ा तेज माल है यार।' एक सिपाही गिलास उठाता हुह बोला-'दोतीन पैग में ही सिर घुमाना शुरू कर दिया इस तो।'

'असली अंग्रेजी है हवलदार, असली अंग्रेजी।' रघुबर बोला 'इसकी यही तारीफ है कि नशा पूरा दे और अगले सुबह कि

भी न पकडे।'

'तुम भी तो लो।'

'मैं तो ले ही रहा हूं।' रघुबर ने नशे में लड़खड़ाने अभिनय किया-'तुम पियो छक कर।' दोनों सिपाही पहरेदारों में से किसी को नहीं मालूम था जिस नशे के कारण उन्होंने लड़खड़ाना शुरू कर दिया था वह

खाली अंग्रेजी ह्विस्की का ही नशा नहीं था बल्कि उसमें बेहोशी की दवाई भी मिली हुई थी।

उसने अपना असर दखाया तो एक तो अपना गिलास हाथ में थामें-थामें ही लुढ़क गया।

कुछ देर बाद झूमता-झामता दूसरा आया तो अपने बेहोश साथी को देखकर बोला-'इसे क्या हुआ?'

'शायद ज्यादा चढ़ गई है।' 'बस मैं और नहीं लेता।'

'अरे लो ना हवलदार। तुम्हारा हाजमा इतना कमजोर थोड़े ही है। अभी एक बोतल और चढ़ा जाओ तो भी पता न चले कि तुमने पी है।' सिपाही गिलास तो खाली कर गया मगर उसके साथ ही गिलास समेत लुढ़क गया।

रघुबर ने जब अच्छी तरह देख लिया कि दोनों पूरी तरह होश हो गए हैं तो एक ओर की झाड़ियों की तरफ उन्मुख होकर बोला-'आ जाओ उस्ताद काम हो गया।'

दूसरी झाड़ियों में मौके की इन्तजार में छुपा हरिया आवाज शुनते ही वहां पहुंच गया। उसने भी उन दोनों सिपाहियों को अच्छी तरह उलट-पलट-कर देखा। बय अच्छी तरह सन्तुरष्ट हो गया तो बोला-'अब नके हाथ-पैर बांध दिए जाएं।'

'क्या जरूरत है यार।' रघुबर बोला-'दोनों की हालत स वक्त मुर्दो से भी बदतर है। सुबह से पहले होश नहीं।'

'फिर भी जैसा भईया ने कहा है वैसा ही करना है।'

रस्सी से उन दोनों बेहोश सिपाहियों के हाथ पैर-बांध दिए है। उस काम से निबटने के बाद दोनों ने अच्छी तरह काम बट जाने की निश्चिन्तता के साब अपने हाथ झाड़े।

फिर हरिया बोला-'अब मैं बंगले पर नजर रखता हूर और

जाकर भइया को खबर कर दे। इन्तजार कर रहे होंगे।

'अब उस्ताद को तकलीफ देने की स्पा जरूरत है। मैदान साफ है। उस साले फारेस्ट आफिसर को अभी बंगले से बाहर निकालकर रेत देते हैं।'
 
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