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‘शाबाश! इसके बाद हम अग़ली कविता से इस खेल को आगे बढ़ाएंगे. उससे पहले कुक्कील तुम पूरी कविता को कक्षा को पढ़कर सुनाओे...'
‘जी!' कुक्कीम ने खड़े होते हुए कहा और कॉपी से कविता को सुनाने लगी-
गुटका खाकर थूकें लाला
मुंह है या फिर गंदा नाला
जमकर खाया पान मसाला
हुआ कैंसर पिटा दिवाला
काले धंधे जैसा काला
पानमसाला...पानमसाला
धोती-कुर्ता सने पीक से
मुंह में ग़टर छिपाए लाला
माथा पीट रही लालाइन.
अभी वक्त है संभलो लाला
आई अक्लत कसम फिर खाई
अब न छुएंगे पान मसाला.
‘यह पूरी कविता तैयार हुई...अब हम नई कविता पर काम करेंगे. क्योंे बच्चो , तैयार हो.'
‘जी! बच्चोंई ने अपना उत्साकह दिखाया. सहसा निराली खड़ी होकर एक लड़के की ओर इशारा करते हुए बोली-
‘गुरु जी, मैंने मलूका को कई बार पानमसाला खाते हुए देखा है. यह अपने पिताजी की जेब से पैसे चुराकर पानमसाला खरीदता है.' बद्री काका पहले से ही उस लड़के को बड़े ध्यान से देख रहे थे. जिस समय दूसरे बच्चे कविता ग़ढ़ने में उत्सा ह दिखा रहे थे, वह
गुमसुम और अपने आप में डूबा हुआ था.
‘क्यों मलूका, क्या निराली सच कह रही है?'
‘जी!' मलूका अपराधी की भांति सिर झुकाए खड़ा हो ग़या.
‘तो इस कविता से तुमने कोई सीख ली?'
‘मैं कसम खाता हूं कि आज के बाद गुटका और पानमसाला को हाथ तक नहीं लगाऊंगा.' मलूका ने वचन दिया. उस समय उसके चेहरे पर चमक थी. वह उसके पक्केन इरादे की ओर संकेत कर रही थी. बद्री काका समेत सभी विद्यार्थियों के चेहरे खिल उठे.
‘गुरु जी, निराली की अम्मा पानमसाला बेचती है. टोले के ज्याथदातर बच्चेी वहीं से खरीदते हैं.' एक बच्चेी ने निराली की ओर देखकर शिकायत की.
‘निराली की मां ही क्योंा, टोले में तो और भी कई दुकानें हैं, जहां पानमसाला और गुटका बेचे जाते हैं.' सदानंद ने निराली को संकट से उबारने के लिए उसका साथ दिया. कुछ पल विचार करने के पश्चाेत बद्री काका ने कहा-
‘जो बच्चेर गुटका और पानमसाला खाते हैं, वे तो दोषी हैं ही. वे दुकानदार भी कम दोषी नहीं हैं जो मामूली लाभ के लिए उनकी बिक्री करते हैं. दोष उन माता-पिता का भी है जो बच्चोंह को इनसे होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं देते या खुद भी इन व्योसनों के शिकार हैं.'
‘गुरु जी, मैं अपनी मां से कहूंगी कि गुटका और पानमसाला अपनी दुकान से न बेचें.' निराली ने पूरी कक्षा को आश्वाुसन दिया.
‘जैसे तेरी मां सभी काम तुझसे पूछकर करती है?' एक बच्चेा ने कटाक्ष किया, निराली सकुचा ग़ई. मग़र उसका इरादा और भी दृढ़ हो ग़या.
‘मां मेरी बात को कभी नहीं टालती. और यह बात तो मैं मनवाकर ही रहूंगी.' निराली ने जोर देकर बोली. उसके स्वदर की दृढ़ता और आत्मनविश्वांस देख सभी दंग़ रह ग़ए. खासकर टोपीलाल. वह कुछ देर तक निराली पर नजर जमाए रहा. फिर अचानक उसको कुछ याद आया-
‘मग़र टोले के बाकी दुकानदारों का क्याा होगा. उन बड़ों को कैसे रोका जाएगा, जो खुद इन गंदी आदतों के शिकार हैं.'
‘यह एक गंभीर समस्या है. इस पर हम आगे विचार करेंगे.' बद्री काका बोले.
‘गुरु जी अग़ली कविता शुरू करें?' एक लड़के ने कहा. इसपर बद्री काका मुस्कजरा दिए-
‘जरूर! लेकिन अब समय हो चुका है. हम सप्ता ह में एक दिन बालसभा के लिए तय रखेंगे. अग़ले सप्तारह आज ही के दिन ऐसी ही बालसभा होगी. उसके लिए मैं एक पंक्तित दे रहा हूं. उस पंक्तिख के आधार पर आपको पूरी कविता लिखनी है. जिस विद्यार्थी की कविता उस बालसभा में सबसे अधिक पसंद की जाएगी, उसको पुरस्काधर मिलेगा.
पंक्तिल है-
‘जी...!' बच्चोंो का स्व र गूंजा.
‘नशा करे दुर्दशा घरों की...!'
‘गुरुजी मैं इसे आगे बढ़ाऊं?' टोपीलाल ने हाथ उठाकर पूछा.
‘अभी नहीं, अग़ले सप्तााह, पूरी कविता सुनाना.' बद्री काका ने आश्वाधसन दिया. इसके बाद छुट्टी की घोषणा कर दी ग़ई. जाने से पहले उन्होंाने सभी बच्चोंू को अपनी ओर से उपहार देकर विदा किया.
मन में कुछ करने का, ग़ढ़ने का उत्साथह हो तो सृजन व्यरक्तिन के चरित्र की विशेषता बन जाता है.
सृजन की मौलिकता अनिवर्चनीय आनंद की सृष्टि़ करती है.
निराली ने उसी रात अपनी मां से गुटका और पानमसाला बेचने को मना कर दिया. मां पहले तो उसकी बात सुनती रही, फिर एकाएक उखड़ ग़ई-
‘मैं अपने सुख के लिए थोड़े ही बेचती हूं. लोग़ खरीदने आते हैं. ग्राहकों में कुछ बच्चेर भी होते हैं. मैं न दूं तो वे जिद करते हैं, कुछ के तो मां-बाप भी इसके लिए पैसे देते हैं. उन सबकी खुशी के लिए रखना ही पड़ता है.'
‘खुशी कैसी! इससे तो बच्चोंह का नुकसान ही होता है.' निराली ने तर्क किया.
‘यह तो उनके मां-बाप को समझाना चाहिए!'
‘कल से तुम ऐसे बच्चों को मना कर देना.' निराली ने दबाव डाला.
‘मुझे दो पैसे बचते हैं तो क्यों छोड़ूं! और जिनको लत है, वे बाज थोड़े ही आएंगे. मैं नहीं रखूंगी तो वे दूसरी दुकान से खरीदेंगे. फिर ये सब चीजें खाने के लिए ही तो उनके मां-बाप उन्हेंत पैसे देते हैं.'
‘कुछ भी हो, आगे से तुम यह पाप अपने सिर पर नहीं लोगी.' निराली आदेशात्मेक मुद्रा में थी. जैसे किसी बच्चेू को समझा रही हो. उसकी जिद के आगे मां को अंततः झुकना ही पड़ा. निराली को लगा कि अब वह कक्षा में सिर उठाकर प्रवेश कर सकेगी.
टोपीलाल समेत सभी बच्चों को प्रतीक्षा थी कि सप्ताोह जल्दीप पूरा हो. बालसभा का दिन आए. उन्हेंं लग़ता था कि उस दिन सबकुछ उलट-पलट जाता है. गुरुजी, गुरुजी नहीं रहते. न उस दिन उनका कहा हुआ सर्वोपरि होता है. बालसभा में तो जो भी नया कर दे, ग़ढ़ दे वही महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. गुरु जी समेत सब उसकी तारीफ करने लग़ जाते हैं.
टोले में उस बालसभा की चर्चा हर बच्चेद ने अपनी तरह से, अपनी जुबान में की. जिसका उन बच्चोंन पर ग़हरा असर पड़ा जो अभी तक पाठशाला जाने से बच रहे थे.
परिणाम यह हुआ कि अग़ले दिन से ही पाठशाला में नए विद्यार्थियों का आना आरंभ हो ग़या. बच्चों के माता-पिता पर भी असर पड़ा. वे खुद अपने बच्चोंह को लेकर बद्री काका के पास आने लगे-
‘गुरु जी, हमारी जिंदगी तो जैसे-तैसे कट ग़ई. अब इस बच्चेग का जीवन आपके हाथों में है. इसको संवारने की जिम्मेरदारी अब आपकी है.'
‘लेकिन इसके लिए पुस्तजकें, कॉपी, कलम, बस्ताब...आप देख ही रहे हैं कि मैं तो अधनंग़ फकीर हूं. मेरे पास आमदनी का कोई साधन तो है नहीं.' बद्री काका मुस्कलराकर कहते. उस समय उनका मुख्यख ध्येकय होता बच्चेन के माता-पिता को आजमाना, उसकी शिक्षा के प्रति गंभीरता को परखना. एक बालसभा इतनी असरकारक हो सकती है, इसकी उन्होंाने कल्प्ना भी नहीं की थी. उसकी सफलता ने उन्हें उन सब विचारों पर अमल करने का अवसर दिया था, जिनके बारे में वे अभी तक सिर्फ सोचते ही आए थे.
‘मेरे बच्चेत के लिए कॉपी, कलम और किताबों के ऊपर जो खर्च होगा, उसको मैं खुद उठाऊंगा.' बच्चे का पिता कहता.
‘हम दोनों मेहनत-मजदूरी करेंगे, लेकिन इसकी पढ़ाई में हीला न आने देंगे. आपकी फीस भी हम हर महीने भिजवाते रहेंगे.' बच्चेज की मां यदि साथ होती तो कुछ ऐसा ही आश्वा सन देती.
‘भिजवाना कैसा, मैं खुद देकर जाऊंगा...!' बच्चेत का पिता बीच में ही टोक देता.
‘फीस इतनी आवश्यतक नहीं है. अपनी ऋद्धा से पाठशाला के नाम जो भी तुम देना चाहो, उससे हमारा काम चल जाएगा. नकद न हो तो दाल-चावल, नमक-आटा कुछ भी, जो बच्चोंस के नाश्तेग के काम आ सके.'
जिस संस्थाा की ओर से बद्री काका काम कर रहे थे, उसके पास ऐसे कार्यक्रमों के लिए धन की पर्याप्तस व्यतवस्थाक थी. फिर भी यह मानते हुए कि मुफ्त में प्राप्त वस्तुस अक्स्र उपेक्षित मान ली जाती है, बद्री काका चाहते थे कि बच्चोंस के माता-पिता उनकी शिक्षा के लिए कुछ न कुछ अवश्यु खर्च करें. जिससे शिक्षा के प्रति उनकी गंभीरता बनी रहे. संस्थाम पर कम से कम आर्थिक बोझ पड़े. लोग़ स्वा.वलंबी बनें. इसलिए सप्ताभह या महीने के बाद उनकी पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चोंप के अभिभावक जो भी चीज लाते उसको वह खुशी-खुशी रख लेते थे.
भेंट में मिली हर वस्तुब का रिकार्ड रखा जाता. इसके लिए बद्री काका ने टोपीलाल को एक कॉपी दी हुई थी. जिसमें वस्तुम का नाम और उसकी मात्रा को चढ़ दिया जाता. उस कॉपी में निकाली ग़ई मात्रा भी दर्ज की जाती, उसे हर सप्तामह प्रौढ़ शिक्षा में आए अभिभावकों के सामने प्रस्तुएत किया जाता था.
अभी तक वे प्रायः उपेक्षित ही होते आए थे. उन्हेंव लग़ता था कि वे सिर्फ सुनने-सहने के लिए बने हैं. घर के बाहर उनकी राय किसी काम की नहीं है. इसलिए प्रारंभ में जब
बद्री काका ने चंदे का हिसाब-किताब बताना शुरू किया तब उन्हें बहुत विचित्र लगा था-
‘हिसाब-किताब के बारे में हम जानकर क्यात करेंगे?' एक दिन बद्री काका चंदे का हिसाब सामने रख रहे थे, तब एक मजदूर ने सकुचाते कहा.
‘आपका पैसा है, उसका हिसाब भी आप ही को रखना चाहिए.'
‘हम पढ़े-लिखें हों तब ना हिसाब रखें.'
‘इसीलिए तो मैं यहां आया हूंं कि आप पढ़-लिखें. ताकि जितना जरूरी है, उतना हिसाब तो रख लें.' इन बातों का बड़ों पर भले ही कोई प्रभाव न पड़े. पर बच्चे- उनसे खूब प्रेरणा लेते थे.
दूसरों को प्रेरित करना भी एक कला है. जिसके लिए विचार एवं कर्म दोनों ही स्तर पर श्रेष्ठा बनना पड़ता है. प्रायः महान व्यिक्तिकत्व ही यह कर पाते हैं. लेकिन प्रेरणा लेना भी सबके लिए संभव नहीं. न यह छोटी बात है, न ओछी. क्योंाकि इसी से विचार और कर्म की परंपरा को विस्तालर मिलता है.
कभी-कभी अतिसाधारण कहे जाने वाले लोग़ भी असाधारण रूप से प्रेरित कर जाते हैं.
वह दिन बद्री काका जीवन में अविस्मिरणीय बन ग़या. पाठशाला की छुट्टी के बाद वे विश्राम कर रहे थे. तभी सामने से आती एक औरत पर उनकी निगाह पड़ी. तेज कदमों से से वह उन्हींा की ओर बढ़ी आ रही थी. वे खड़े हो ग़ए. करीब आने पर वह औरत ठिठकी और बद्री काका के सामने घूंघट निकालकर खड़ी हो ग़ई. बद्री काका उसको पहचानने का प्रयास करने लगे-
‘कुक्कीन आपकी पाठशाला में पढ़ने आती है, मैं उसी की मां हूं.'
‘हां..हां, बहुत समझदार है तुम्हाररी बेटी...!'
‘सब आप ही का प्रताप है. कुक्की् के पिता तो रहे नहीं. मैं ठहरी नासमझ जो उसके ब्याीह की जल्दी कर रही थी. वह तो भला हो आपका और टोपीलाल का, जो मेरी आंखें खोल दीं. नहीं तो अब तक कुक्कीह ससुराल में अपनी किस्म त को रो रही होती. भग़वान आप दोनों को लंबी उम्र दे,'
‘नहीं-नहीं, उस मासूम को इतनी जल्दीन ब्या ह में लपेट देना उचित न होगा. पढ़ने में बहुत ही होशियार है, तुम्हाररी बेटी . मौका मिला तो बहुत दूर तक जाएगी.' बद्री काका बीच ही में बोल पड़े, ‘मैं अपनी पाठशाला के कुछ बच्चोंी का दाखिला बड़ी पाठशाला में कराने की सोच रहा हूं. कुक्कीं भी उनमें से एक है. मेरी कोशिश होगी कि इस टोले के बच्चों की पढ़ाई का सारा खर्च वहां भी सरकार ही उठाए.'
‘कुक्की के बापू ने बड़े प्याचर से उसका नाम कुमुदिनी रखा था. बहुत भला आदमी था वह. अपनी बेटी को लेकर उसके ढेर सारे अरमान थे. मेहनती तो इतना था कि
चौदह-पंद्रह घंटे लगातार काम पर डटा रहता. अकेला दो आदमियों की बराबरी कर लेता था. कभी किसी से ऊंचा बोल नहीं बोला, पर न जाने कैसे वह बुरे आदमियों की सोहबत में पड़ ग़या. जुआ और शराब उसकी आदत में शुमार हो ग़ए. उसी ने हमें तबाह किया. उसी शौक के कारण एक दिन उसको जान से हाथ धोना पड़ा.'
कहते-कहते वह हुलकने लगी. मानों वर्षों पुराने दर्द को पूरी तरह खोल देना चाहती हो. बद्री काका असमंजस थे. समझ ही नहीं पा रहे थे कि उसे किस तरह तसल्लीह दें. कैसे समझाएं. उनके लिए तो उसके आने का कारण भी पहेली बना हुआ था. मग़र कुक्कीि की अम्माे को होश कहां. वह तो भावावेश में बस बोले ही जा रही थी. अपने घर, अपने जीवन-संघर्ष से जुड़ी बातें-
‘पिछले महीने मुझे कर्ज उठाकर भात भरना पड़ा. इसीलिए पाठशाला को कुछ दे नहीं पाई. इस महीने की कमाई उस कर्ज को चुकाने में उठ ग़ई. आप मेरे पिता समान हैं. कुक्कीद को अपनी बच्चीक की तरह पढ़ा रहे हैं. आपका एहसान मैं न भी मानूं तो भी पाठशाला का खर्च तो खर्च की ही तरह चलेगा. सिर्फ दुआ मांग़ने से तो घर-भंडार भरते नहीं...भात देकर लौट रही थी तो मेरी ननद ने थोड़े-से तिल बांध दिए थे. उन्हीं् के लड्डू बनाकर लाई हूं. आप इन्हेंो मेरी ओर से नाश्तेल के समय बच्चों़ में बांट देना. बहुत एहसान होगा आपका.'
उसका मंतव्यच समझते ही बद्री काका की आंखें भर आईं. पहली बार उन्हें अपने प्रयास की सार्थकता पर, अपने कार्य ऊंचाई पर ग़र्व हुआ. पहली बार ही जाना कि ग़रीबी भले ही मेहनतकश को तोड़कर रख दे, वह एहसान से कभी नहीं मरता.
‘पाठशाला का नियम है कि बच्चों से मिलने वाली हर वस्तुं का रिकार्ड रखा जाता है. रिकार्ड रखने का काम टोपीलाल का है. इस समय वह तो यहां है नहीं. इसलिए नियमानुसार तुम्हाारी भेंट कल ही स्वीरकार की जानी चाहिए. लेकिन इस समय मैं तुम्हेंी लौटाकर तुम्हावरी भावनाओं की अवमानना नहीं कर सकता. तुम लड्डू गिनकर रख जाओ. कल सुबह मैं उन्हेंह रिकार्ड में चढ़वा लूंगा.'
कुक्कील की अम्माउ ने लड्डू गिन दिए. वह जाने लगी तो बद्री काका बोले-‘सार्वजनिक जीवन जीते हुए मुझे पचास से अधिक वर्ष बीत चुके हैं. इस अवधि में बापू और विनोबा की स्मृरति के अलावा जीवन में जो कुछ अमूल्यस और स्मअरणीय है, उसमें तुम्हापरा यह उपहार भी सम्मिरलित है. यह घटना मैं कभी भुला नहीं पाऊंगा.' कुक्की की अम्माठ बिना कुछ कहे आगे बढ़ ग़ई. बद्री काका धुंधली आंखों से उसको जाते हुए देखते रहे. उसके ओझल होते ही उनकी निगाह सामने पड़े लड्डुओं पर टिक ग़ई.
निश्छ ल मन से दी ग़ई भेंट अमूल्यर होती है.
ऐसी भेंट जिसे मिले वह सचमुच बहुत भाग्यभशाली होता है.
उस दिन कुक्कीस की अम्माे को जाते देख बद्री काका यही सोच रहे थे. कुक्कीे के पिता की मौत नशे की लत के कारण हुई थी. बस्तीी के कई घर नशे के कारण बरबाद हो चुके हैं. हर साल लाखों जिंदगानियां नशे के कारण उजड़ जाती हैं. नशा मनुष्यक के शरीर को खोखला करता है, दिमाग़ को दिवालिया बनाता है. परिवारों को तोड़कर रख देता है. महात्माम गांधी नशे के विरुद्ध थे. जब भी अवसर मिला उन्हों ने नशे के विरुद्ध लोगों को चेताया. उन्हेंा उससे दूर रहने की सलाह दी.
बापू के विचारों की प्रासंगिकता तो आज भी है. हर युग़ में जब तक असंतोष है, अन्याोय है-तब तक तो वह रहेगी ही. बद्री काका सोचते जा रहे थे. वे इस दिशा में कुछ करना चाहते थे. कुछ ऐसा जो सार्थक हो. जिसको पूरा करने से मन को तसल्लीस मिले. बालसभा की कविता प्रतियोगिता को नशे पर केंद्रित करने के पीछे भी उनका यही उद्देश्य था.
कविता का विषय जानबूझकर नशे को चुना था. उन्हें इस बात की प्रतीक्षा थी कि बालसभा में बच्चेन नशे के विरुद्ध खुद को कैसे अभिव्यथक्तक करते हैं. उनकी अभिव्यबक्तिष उनकी बस्तीक और उनके अपनों पर कितनी असरदार सिद्ध होती है! कैसे वे उसको उसको और असरदार बना सकते हैं! वे सोच रहे थे कि बच्चोंा को अपने अभियान से कैसे जोड़ा जाए, ताकि उन्हेंर यह अभियान अपना-सा, अपने ही अस्तिोत्वो की लड़ाई जान पड़े. मग़र उनकी पढ़ाई का जरा-भी हर्जा न हो.
सप्तााहांत में बालसभा का दिन भी आ ग़या. कुक्की की मां द्वारा भेंट किए ग़ए लड्डू उन्होंिने इस अवसर के लिए संभाल रखे थे. उस दिन सवेरे ही बच्चोंभ का पहुंचना आरंभ हो ग़या. बद्री काका ने उस दिन बस्ता लाने की छूट दी थी. सो अधिकांश बच्चेच खाली हाथ थे. काग़ज-कलम-बस्ता जैसे पाठशाला के तय उपकरणों से मुक्तिो का स्वाीभाविक एहसास उन सभी के उल्लाचस का कारण बना हुआ था.
‘मुझे उम्मीहद है कि पिछली बालसभा में दिया ग़या काम आप सभी ने पूरा कर लिया होगा?' बद्री काका ने शुरुआत करते हुए कहा. इसपर कई बच्चोंल के चेहरे चमक उठे. कुछ तनाव से ललियाने लगे.
‘जो पिछली बालसभा में दिया ग़या काम किसी कारणवश नहीं कर पाए हों, वे परेशान न हों, आज उन्हेंा भी अवसर मिलेगा कि वे आगे की प्रतियोगिता में खुद को साबित कर सकें. टोपीलाल, तुम हमें बताओ कि आज की बालसभा का विषय क्या है?'
‘समस्याव-पूर्ति, आपने हमें एक पंक्तिे दी थी, जिसपर पूरी कविता लिखकर लानी थी...'
‘तुमने कविता लिखी?'
‘जी हां!' टोपीलाल ने ग़र्व सहित बताया.
‘ठीक है, हम सब तुम्हानरी कविता सुनेंगे. लेकिन उससे पहले निराली हमें उस कविता-पंक्ति के बारे में याद दिलाएगी, क्योंम निराली?'
‘जी गुरुजी...पंक्तित है-नशा करे दुर्दशा घरों की.' निराली ने पिछली सभा की कार्रवाही अपनी कॉपी में लिख ली थी.
‘नशा करे दुर्दशा घरों की...इस पंक्तिु पर जो बच्चेक कविता लिखकर लाए हैं, वे अपने हाथ ऊपर कर लें.' केवल दो-तीन हाथ ही ऊपर उठे. इस बीच एक बच्चा् सिसकने लगा. बद्री काका चौंक ग़ए-
‘क्या- हुआ, कौन है?'
‘सदानंद है गुरुजी.' सदानंद के बराबर में बैठी कुक्कीप ने कहा.
‘रो क्यों रहा है?'
‘पिछले सप्ताहह जबसे आपने कविता की पंक्तिै दी थी, तभी से इसका जी बहुत उदास है. कहता है कि जैसे कविता की पंक्तिद की ओर ध्याान जाता है, उसको अपने घर की दुर्दशा याद आ जाती है.'
सभी को मालूम था कि सदानंद के पिता को शराब की बुरी लत है. इस कारण उसके घर में अक्सयर झग़ड़ा रहता है. यह याद आते ही बच्चोंर के उल्लातस को घनी उदासी ने ढक लिया. कुछ देर के लिए तो बद्री काका भी निरुत्तर हो ग़ए. लेकिन उन्हों ने जल्दीउ ही खुद को संभाल लिया-
‘सदानंद तो कविता पूरी कर चुका है, उसने हाथ उठाया था.' बद्री काका के स्वहर में आश्च्र्य था. फिर पल-भर शांत रहने के बाद बोले-‘धीरज रखो बेटे, यह समस्याउ सिर्फ तुम अकेले की नहीं है. कई बच्चोंर की, बल्किल पूरे समाज की और इस तरह हम सब की है. हम इसपर खुले मन से विचार करेंगे. संभव हुआ तो उसके निदान के लिए किसी नतीजे पर पहुंचेंगे भी. फिलहाल जो बच्चे कविता लिखकर लाए हैं, वे तैयार हो जाएं. क्योंर टोपीलाल, क्योंग न आज तुम्हीं से शुरुआत कर ली जाए?'
‘जी!' टोपीलाल खड़ा हो ग़या और जेब से काग़ज निकालकर सुनाने लगा-
छोटे मुंह से बात बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की.'
‘शाबाश!' कविता की प्रथम पंक्ति़ सुनते हुए बद्री काका ने मुंह से बरबस निकल पड़ा. टोपीलाल कविता पढ़ता ग़या-
छोटे मुंह से बात बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
पान, सुपारी, गुटका, बीड़ी,
सुरा बिगाड़ें दशा घरों की
चरस, अफीम और गांजे से
हालत खस्ता़ हुई घरों की
बरतन-भांडे सब बिक जाते
इज्ज त बंटाधार घरों की
कविता समाप्ता हुई तो बच्चोंक ने तालियां बजाईं. बद्री काका भी पीछे नहीं रहे. बल्किव वे देर तक, उत्सा ह के साथ तालियां बजाते रहे. उसके बाद उन्होंतने दूसरे बच्चेर से कविता सुनाने को कहा. उसकी कविता भी पसंद की ग़ई. उसके बाद जो बच्चेत कविता लिखकर लाए थे, सभी की कविताओं को बारी-बारी से सुना ग़या. अंत में बद्री काका ने सदानंद से अपनी कविता सुनाने को कहा.
सदानंद के खड़े होते ही बच्चेो अपने आप तालियां बजाने लगे. इस बार तालियों में पहले से कहीं ज्या दा जोश था. बाद में गुरुजी से आज्ञा लेकर सदानंद ने अपनी कविता शुरू की-
न छोटे, न शर्म बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
सदानंद के इतना कहते ही पूरी कक्षा तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट से गूंज उठी.
‘वाह-वाह!' बद्री काका के मुंह से निकला, ‘बहुत अच्छेउ! आगे पढ़ो बेटा. पढ़ते जाओ...शाबाश!'
सदानंद आगे सुनाने लगा-
न छोटे, न शर्म बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
कंगाली आ पसरे घर में
नीयत बिग़ड़े बड़े-बड़ों की
घर बीमारी से भर जाए
खुशहाली मिट जाए घरों की
रिश्तों में आ जाएं दरारें
इज्जतत होवे खाक बड़ों की
बच्चेो रोते फिरें ग़ली में
औरत भूखी मरें घरों की
कविता पूरी होते ही बच्चोंी ने दुगुने जोश के साथ तालियां बजाना शुरू किया. उसके बाद तो देर तक तालियां बजती रहीं. खुद बद्री काका भी तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट के बीच. आंखों में नमी छिपाए. कहीं खो-से ग़ए. सुध लौटी तो सीधे सदानंद के पास पहुंचकर उसकी पीठ थपथपाने लगे-
‘वाह...वाह! तुमने तो कमाल कर दिया. जब मैंने इस कार्यक्रम की योजना बनाई थी, तो मुझे इसकी कामयाबी पर इतना भरोसा नहीं था. तुम सबने मेरी उम्मीाद से कहीं बढ़कर कर दिखाया है. अब मुझे विश्वा स है कि मैं अपने लक्ष्ये की ओर आसानी से बढ़ सकता हूं...शाबाश, बच्चोद शाबाश!'
‘जी!' कुक्कीम ने खड़े होते हुए कहा और कॉपी से कविता को सुनाने लगी-
गुटका खाकर थूकें लाला
मुंह है या फिर गंदा नाला
जमकर खाया पान मसाला
हुआ कैंसर पिटा दिवाला
काले धंधे जैसा काला
पानमसाला...पानमसाला
धोती-कुर्ता सने पीक से
मुंह में ग़टर छिपाए लाला
माथा पीट रही लालाइन.
अभी वक्त है संभलो लाला
आई अक्लत कसम फिर खाई
अब न छुएंगे पान मसाला.
‘यह पूरी कविता तैयार हुई...अब हम नई कविता पर काम करेंगे. क्योंे बच्चो , तैयार हो.'
‘जी! बच्चोंई ने अपना उत्साकह दिखाया. सहसा निराली खड़ी होकर एक लड़के की ओर इशारा करते हुए बोली-
‘गुरु जी, मैंने मलूका को कई बार पानमसाला खाते हुए देखा है. यह अपने पिताजी की जेब से पैसे चुराकर पानमसाला खरीदता है.' बद्री काका पहले से ही उस लड़के को बड़े ध्यान से देख रहे थे. जिस समय दूसरे बच्चे कविता ग़ढ़ने में उत्सा ह दिखा रहे थे, वह
गुमसुम और अपने आप में डूबा हुआ था.
‘क्यों मलूका, क्या निराली सच कह रही है?'
‘जी!' मलूका अपराधी की भांति सिर झुकाए खड़ा हो ग़या.
‘तो इस कविता से तुमने कोई सीख ली?'
‘मैं कसम खाता हूं कि आज के बाद गुटका और पानमसाला को हाथ तक नहीं लगाऊंगा.' मलूका ने वचन दिया. उस समय उसके चेहरे पर चमक थी. वह उसके पक्केन इरादे की ओर संकेत कर रही थी. बद्री काका समेत सभी विद्यार्थियों के चेहरे खिल उठे.
‘गुरु जी, निराली की अम्मा पानमसाला बेचती है. टोले के ज्याथदातर बच्चेी वहीं से खरीदते हैं.' एक बच्चेी ने निराली की ओर देखकर शिकायत की.
‘निराली की मां ही क्योंा, टोले में तो और भी कई दुकानें हैं, जहां पानमसाला और गुटका बेचे जाते हैं.' सदानंद ने निराली को संकट से उबारने के लिए उसका साथ दिया. कुछ पल विचार करने के पश्चाेत बद्री काका ने कहा-
‘जो बच्चेर गुटका और पानमसाला खाते हैं, वे तो दोषी हैं ही. वे दुकानदार भी कम दोषी नहीं हैं जो मामूली लाभ के लिए उनकी बिक्री करते हैं. दोष उन माता-पिता का भी है जो बच्चोंह को इनसे होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं देते या खुद भी इन व्योसनों के शिकार हैं.'
‘गुरु जी, मैं अपनी मां से कहूंगी कि गुटका और पानमसाला अपनी दुकान से न बेचें.' निराली ने पूरी कक्षा को आश्वाुसन दिया.
‘जैसे तेरी मां सभी काम तुझसे पूछकर करती है?' एक बच्चेा ने कटाक्ष किया, निराली सकुचा ग़ई. मग़र उसका इरादा और भी दृढ़ हो ग़या.
‘मां मेरी बात को कभी नहीं टालती. और यह बात तो मैं मनवाकर ही रहूंगी.' निराली ने जोर देकर बोली. उसके स्वदर की दृढ़ता और आत्मनविश्वांस देख सभी दंग़ रह ग़ए. खासकर टोपीलाल. वह कुछ देर तक निराली पर नजर जमाए रहा. फिर अचानक उसको कुछ याद आया-
‘मग़र टोले के बाकी दुकानदारों का क्याा होगा. उन बड़ों को कैसे रोका जाएगा, जो खुद इन गंदी आदतों के शिकार हैं.'
‘यह एक गंभीर समस्या है. इस पर हम आगे विचार करेंगे.' बद्री काका बोले.
‘गुरु जी अग़ली कविता शुरू करें?' एक लड़के ने कहा. इसपर बद्री काका मुस्कजरा दिए-
‘जरूर! लेकिन अब समय हो चुका है. हम सप्ता ह में एक दिन बालसभा के लिए तय रखेंगे. अग़ले सप्तारह आज ही के दिन ऐसी ही बालसभा होगी. उसके लिए मैं एक पंक्तित दे रहा हूं. उस पंक्तिख के आधार पर आपको पूरी कविता लिखनी है. जिस विद्यार्थी की कविता उस बालसभा में सबसे अधिक पसंद की जाएगी, उसको पुरस्काधर मिलेगा.
पंक्तिल है-
‘जी...!' बच्चोंो का स्व र गूंजा.
‘नशा करे दुर्दशा घरों की...!'
‘गुरुजी मैं इसे आगे बढ़ाऊं?' टोपीलाल ने हाथ उठाकर पूछा.
‘अभी नहीं, अग़ले सप्तााह, पूरी कविता सुनाना.' बद्री काका ने आश्वाधसन दिया. इसके बाद छुट्टी की घोषणा कर दी ग़ई. जाने से पहले उन्होंाने सभी बच्चोंू को अपनी ओर से उपहार देकर विदा किया.
मन में कुछ करने का, ग़ढ़ने का उत्साथह हो तो सृजन व्यरक्तिन के चरित्र की विशेषता बन जाता है.
सृजन की मौलिकता अनिवर्चनीय आनंद की सृष्टि़ करती है.
निराली ने उसी रात अपनी मां से गुटका और पानमसाला बेचने को मना कर दिया. मां पहले तो उसकी बात सुनती रही, फिर एकाएक उखड़ ग़ई-
‘मैं अपने सुख के लिए थोड़े ही बेचती हूं. लोग़ खरीदने आते हैं. ग्राहकों में कुछ बच्चेर भी होते हैं. मैं न दूं तो वे जिद करते हैं, कुछ के तो मां-बाप भी इसके लिए पैसे देते हैं. उन सबकी खुशी के लिए रखना ही पड़ता है.'
‘खुशी कैसी! इससे तो बच्चोंह का नुकसान ही होता है.' निराली ने तर्क किया.
‘यह तो उनके मां-बाप को समझाना चाहिए!'
‘कल से तुम ऐसे बच्चों को मना कर देना.' निराली ने दबाव डाला.
‘मुझे दो पैसे बचते हैं तो क्यों छोड़ूं! और जिनको लत है, वे बाज थोड़े ही आएंगे. मैं नहीं रखूंगी तो वे दूसरी दुकान से खरीदेंगे. फिर ये सब चीजें खाने के लिए ही तो उनके मां-बाप उन्हेंत पैसे देते हैं.'
‘कुछ भी हो, आगे से तुम यह पाप अपने सिर पर नहीं लोगी.' निराली आदेशात्मेक मुद्रा में थी. जैसे किसी बच्चेू को समझा रही हो. उसकी जिद के आगे मां को अंततः झुकना ही पड़ा. निराली को लगा कि अब वह कक्षा में सिर उठाकर प्रवेश कर सकेगी.
टोपीलाल समेत सभी बच्चों को प्रतीक्षा थी कि सप्ताोह जल्दीप पूरा हो. बालसभा का दिन आए. उन्हेंं लग़ता था कि उस दिन सबकुछ उलट-पलट जाता है. गुरुजी, गुरुजी नहीं रहते. न उस दिन उनका कहा हुआ सर्वोपरि होता है. बालसभा में तो जो भी नया कर दे, ग़ढ़ दे वही महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. गुरु जी समेत सब उसकी तारीफ करने लग़ जाते हैं.
टोले में उस बालसभा की चर्चा हर बच्चेद ने अपनी तरह से, अपनी जुबान में की. जिसका उन बच्चोंन पर ग़हरा असर पड़ा जो अभी तक पाठशाला जाने से बच रहे थे.
परिणाम यह हुआ कि अग़ले दिन से ही पाठशाला में नए विद्यार्थियों का आना आरंभ हो ग़या. बच्चों के माता-पिता पर भी असर पड़ा. वे खुद अपने बच्चोंह को लेकर बद्री काका के पास आने लगे-
‘गुरु जी, हमारी जिंदगी तो जैसे-तैसे कट ग़ई. अब इस बच्चेग का जीवन आपके हाथों में है. इसको संवारने की जिम्मेरदारी अब आपकी है.'
‘लेकिन इसके लिए पुस्तजकें, कॉपी, कलम, बस्ताब...आप देख ही रहे हैं कि मैं तो अधनंग़ फकीर हूं. मेरे पास आमदनी का कोई साधन तो है नहीं.' बद्री काका मुस्कलराकर कहते. उस समय उनका मुख्यख ध्येकय होता बच्चेन के माता-पिता को आजमाना, उसकी शिक्षा के प्रति गंभीरता को परखना. एक बालसभा इतनी असरकारक हो सकती है, इसकी उन्होंाने कल्प्ना भी नहीं की थी. उसकी सफलता ने उन्हें उन सब विचारों पर अमल करने का अवसर दिया था, जिनके बारे में वे अभी तक सिर्फ सोचते ही आए थे.
‘मेरे बच्चेत के लिए कॉपी, कलम और किताबों के ऊपर जो खर्च होगा, उसको मैं खुद उठाऊंगा.' बच्चे का पिता कहता.
‘हम दोनों मेहनत-मजदूरी करेंगे, लेकिन इसकी पढ़ाई में हीला न आने देंगे. आपकी फीस भी हम हर महीने भिजवाते रहेंगे.' बच्चेज की मां यदि साथ होती तो कुछ ऐसा ही आश्वा सन देती.
‘भिजवाना कैसा, मैं खुद देकर जाऊंगा...!' बच्चेत का पिता बीच में ही टोक देता.
‘फीस इतनी आवश्यतक नहीं है. अपनी ऋद्धा से पाठशाला के नाम जो भी तुम देना चाहो, उससे हमारा काम चल जाएगा. नकद न हो तो दाल-चावल, नमक-आटा कुछ भी, जो बच्चोंस के नाश्तेग के काम आ सके.'
जिस संस्थाा की ओर से बद्री काका काम कर रहे थे, उसके पास ऐसे कार्यक्रमों के लिए धन की पर्याप्तस व्यतवस्थाक थी. फिर भी यह मानते हुए कि मुफ्त में प्राप्त वस्तुस अक्स्र उपेक्षित मान ली जाती है, बद्री काका चाहते थे कि बच्चोंस के माता-पिता उनकी शिक्षा के लिए कुछ न कुछ अवश्यु खर्च करें. जिससे शिक्षा के प्रति उनकी गंभीरता बनी रहे. संस्थाम पर कम से कम आर्थिक बोझ पड़े. लोग़ स्वा.वलंबी बनें. इसलिए सप्ताभह या महीने के बाद उनकी पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चोंप के अभिभावक जो भी चीज लाते उसको वह खुशी-खुशी रख लेते थे.
भेंट में मिली हर वस्तुब का रिकार्ड रखा जाता. इसके लिए बद्री काका ने टोपीलाल को एक कॉपी दी हुई थी. जिसमें वस्तुम का नाम और उसकी मात्रा को चढ़ दिया जाता. उस कॉपी में निकाली ग़ई मात्रा भी दर्ज की जाती, उसे हर सप्तामह प्रौढ़ शिक्षा में आए अभिभावकों के सामने प्रस्तुएत किया जाता था.
अभी तक वे प्रायः उपेक्षित ही होते आए थे. उन्हेंव लग़ता था कि वे सिर्फ सुनने-सहने के लिए बने हैं. घर के बाहर उनकी राय किसी काम की नहीं है. इसलिए प्रारंभ में जब
बद्री काका ने चंदे का हिसाब-किताब बताना शुरू किया तब उन्हें बहुत विचित्र लगा था-
‘हिसाब-किताब के बारे में हम जानकर क्यात करेंगे?' एक दिन बद्री काका चंदे का हिसाब सामने रख रहे थे, तब एक मजदूर ने सकुचाते कहा.
‘आपका पैसा है, उसका हिसाब भी आप ही को रखना चाहिए.'
‘हम पढ़े-लिखें हों तब ना हिसाब रखें.'
‘इसीलिए तो मैं यहां आया हूंं कि आप पढ़-लिखें. ताकि जितना जरूरी है, उतना हिसाब तो रख लें.' इन बातों का बड़ों पर भले ही कोई प्रभाव न पड़े. पर बच्चे- उनसे खूब प्रेरणा लेते थे.
दूसरों को प्रेरित करना भी एक कला है. जिसके लिए विचार एवं कर्म दोनों ही स्तर पर श्रेष्ठा बनना पड़ता है. प्रायः महान व्यिक्तिकत्व ही यह कर पाते हैं. लेकिन प्रेरणा लेना भी सबके लिए संभव नहीं. न यह छोटी बात है, न ओछी. क्योंाकि इसी से विचार और कर्म की परंपरा को विस्तालर मिलता है.
कभी-कभी अतिसाधारण कहे जाने वाले लोग़ भी असाधारण रूप से प्रेरित कर जाते हैं.
वह दिन बद्री काका जीवन में अविस्मिरणीय बन ग़या. पाठशाला की छुट्टी के बाद वे विश्राम कर रहे थे. तभी सामने से आती एक औरत पर उनकी निगाह पड़ी. तेज कदमों से से वह उन्हींा की ओर बढ़ी आ रही थी. वे खड़े हो ग़ए. करीब आने पर वह औरत ठिठकी और बद्री काका के सामने घूंघट निकालकर खड़ी हो ग़ई. बद्री काका उसको पहचानने का प्रयास करने लगे-
‘कुक्कीन आपकी पाठशाला में पढ़ने आती है, मैं उसी की मां हूं.'
‘हां..हां, बहुत समझदार है तुम्हाररी बेटी...!'
‘सब आप ही का प्रताप है. कुक्की् के पिता तो रहे नहीं. मैं ठहरी नासमझ जो उसके ब्याीह की जल्दी कर रही थी. वह तो भला हो आपका और टोपीलाल का, जो मेरी आंखें खोल दीं. नहीं तो अब तक कुक्कीह ससुराल में अपनी किस्म त को रो रही होती. भग़वान आप दोनों को लंबी उम्र दे,'
‘नहीं-नहीं, उस मासूम को इतनी जल्दीन ब्या ह में लपेट देना उचित न होगा. पढ़ने में बहुत ही होशियार है, तुम्हाररी बेटी . मौका मिला तो बहुत दूर तक जाएगी.' बद्री काका बीच ही में बोल पड़े, ‘मैं अपनी पाठशाला के कुछ बच्चोंी का दाखिला बड़ी पाठशाला में कराने की सोच रहा हूं. कुक्कीं भी उनमें से एक है. मेरी कोशिश होगी कि इस टोले के बच्चों की पढ़ाई का सारा खर्च वहां भी सरकार ही उठाए.'
‘कुक्की के बापू ने बड़े प्याचर से उसका नाम कुमुदिनी रखा था. बहुत भला आदमी था वह. अपनी बेटी को लेकर उसके ढेर सारे अरमान थे. मेहनती तो इतना था कि
चौदह-पंद्रह घंटे लगातार काम पर डटा रहता. अकेला दो आदमियों की बराबरी कर लेता था. कभी किसी से ऊंचा बोल नहीं बोला, पर न जाने कैसे वह बुरे आदमियों की सोहबत में पड़ ग़या. जुआ और शराब उसकी आदत में शुमार हो ग़ए. उसी ने हमें तबाह किया. उसी शौक के कारण एक दिन उसको जान से हाथ धोना पड़ा.'
कहते-कहते वह हुलकने लगी. मानों वर्षों पुराने दर्द को पूरी तरह खोल देना चाहती हो. बद्री काका असमंजस थे. समझ ही नहीं पा रहे थे कि उसे किस तरह तसल्लीह दें. कैसे समझाएं. उनके लिए तो उसके आने का कारण भी पहेली बना हुआ था. मग़र कुक्कीि की अम्माे को होश कहां. वह तो भावावेश में बस बोले ही जा रही थी. अपने घर, अपने जीवन-संघर्ष से जुड़ी बातें-
‘पिछले महीने मुझे कर्ज उठाकर भात भरना पड़ा. इसीलिए पाठशाला को कुछ दे नहीं पाई. इस महीने की कमाई उस कर्ज को चुकाने में उठ ग़ई. आप मेरे पिता समान हैं. कुक्कीद को अपनी बच्चीक की तरह पढ़ा रहे हैं. आपका एहसान मैं न भी मानूं तो भी पाठशाला का खर्च तो खर्च की ही तरह चलेगा. सिर्फ दुआ मांग़ने से तो घर-भंडार भरते नहीं...भात देकर लौट रही थी तो मेरी ननद ने थोड़े-से तिल बांध दिए थे. उन्हीं् के लड्डू बनाकर लाई हूं. आप इन्हेंो मेरी ओर से नाश्तेल के समय बच्चों़ में बांट देना. बहुत एहसान होगा आपका.'
उसका मंतव्यच समझते ही बद्री काका की आंखें भर आईं. पहली बार उन्हें अपने प्रयास की सार्थकता पर, अपने कार्य ऊंचाई पर ग़र्व हुआ. पहली बार ही जाना कि ग़रीबी भले ही मेहनतकश को तोड़कर रख दे, वह एहसान से कभी नहीं मरता.
‘पाठशाला का नियम है कि बच्चों से मिलने वाली हर वस्तुं का रिकार्ड रखा जाता है. रिकार्ड रखने का काम टोपीलाल का है. इस समय वह तो यहां है नहीं. इसलिए नियमानुसार तुम्हाारी भेंट कल ही स्वीरकार की जानी चाहिए. लेकिन इस समय मैं तुम्हेंी लौटाकर तुम्हावरी भावनाओं की अवमानना नहीं कर सकता. तुम लड्डू गिनकर रख जाओ. कल सुबह मैं उन्हेंह रिकार्ड में चढ़वा लूंगा.'
कुक्कील की अम्माउ ने लड्डू गिन दिए. वह जाने लगी तो बद्री काका बोले-‘सार्वजनिक जीवन जीते हुए मुझे पचास से अधिक वर्ष बीत चुके हैं. इस अवधि में बापू और विनोबा की स्मृरति के अलावा जीवन में जो कुछ अमूल्यस और स्मअरणीय है, उसमें तुम्हापरा यह उपहार भी सम्मिरलित है. यह घटना मैं कभी भुला नहीं पाऊंगा.' कुक्की की अम्माठ बिना कुछ कहे आगे बढ़ ग़ई. बद्री काका धुंधली आंखों से उसको जाते हुए देखते रहे. उसके ओझल होते ही उनकी निगाह सामने पड़े लड्डुओं पर टिक ग़ई.
निश्छ ल मन से दी ग़ई भेंट अमूल्यर होती है.
ऐसी भेंट जिसे मिले वह सचमुच बहुत भाग्यभशाली होता है.
उस दिन कुक्कीस की अम्माे को जाते देख बद्री काका यही सोच रहे थे. कुक्कीे के पिता की मौत नशे की लत के कारण हुई थी. बस्तीी के कई घर नशे के कारण बरबाद हो चुके हैं. हर साल लाखों जिंदगानियां नशे के कारण उजड़ जाती हैं. नशा मनुष्यक के शरीर को खोखला करता है, दिमाग़ को दिवालिया बनाता है. परिवारों को तोड़कर रख देता है. महात्माम गांधी नशे के विरुद्ध थे. जब भी अवसर मिला उन्हों ने नशे के विरुद्ध लोगों को चेताया. उन्हेंा उससे दूर रहने की सलाह दी.
बापू के विचारों की प्रासंगिकता तो आज भी है. हर युग़ में जब तक असंतोष है, अन्याोय है-तब तक तो वह रहेगी ही. बद्री काका सोचते जा रहे थे. वे इस दिशा में कुछ करना चाहते थे. कुछ ऐसा जो सार्थक हो. जिसको पूरा करने से मन को तसल्लीस मिले. बालसभा की कविता प्रतियोगिता को नशे पर केंद्रित करने के पीछे भी उनका यही उद्देश्य था.
कविता का विषय जानबूझकर नशे को चुना था. उन्हें इस बात की प्रतीक्षा थी कि बालसभा में बच्चेन नशे के विरुद्ध खुद को कैसे अभिव्यथक्तक करते हैं. उनकी अभिव्यबक्तिष उनकी बस्तीक और उनके अपनों पर कितनी असरदार सिद्ध होती है! कैसे वे उसको उसको और असरदार बना सकते हैं! वे सोच रहे थे कि बच्चोंा को अपने अभियान से कैसे जोड़ा जाए, ताकि उन्हेंर यह अभियान अपना-सा, अपने ही अस्तिोत्वो की लड़ाई जान पड़े. मग़र उनकी पढ़ाई का जरा-भी हर्जा न हो.
सप्तााहांत में बालसभा का दिन भी आ ग़या. कुक्की की मां द्वारा भेंट किए ग़ए लड्डू उन्होंिने इस अवसर के लिए संभाल रखे थे. उस दिन सवेरे ही बच्चोंभ का पहुंचना आरंभ हो ग़या. बद्री काका ने उस दिन बस्ता लाने की छूट दी थी. सो अधिकांश बच्चेच खाली हाथ थे. काग़ज-कलम-बस्ता जैसे पाठशाला के तय उपकरणों से मुक्तिो का स्वाीभाविक एहसास उन सभी के उल्लाचस का कारण बना हुआ था.
‘मुझे उम्मीहद है कि पिछली बालसभा में दिया ग़या काम आप सभी ने पूरा कर लिया होगा?' बद्री काका ने शुरुआत करते हुए कहा. इसपर कई बच्चोंल के चेहरे चमक उठे. कुछ तनाव से ललियाने लगे.
‘जो पिछली बालसभा में दिया ग़या काम किसी कारणवश नहीं कर पाए हों, वे परेशान न हों, आज उन्हेंा भी अवसर मिलेगा कि वे आगे की प्रतियोगिता में खुद को साबित कर सकें. टोपीलाल, तुम हमें बताओ कि आज की बालसभा का विषय क्या है?'
‘समस्याव-पूर्ति, आपने हमें एक पंक्तिे दी थी, जिसपर पूरी कविता लिखकर लानी थी...'
‘तुमने कविता लिखी?'
‘जी हां!' टोपीलाल ने ग़र्व सहित बताया.
‘ठीक है, हम सब तुम्हानरी कविता सुनेंगे. लेकिन उससे पहले निराली हमें उस कविता-पंक्ति के बारे में याद दिलाएगी, क्योंम निराली?'
‘जी गुरुजी...पंक्तित है-नशा करे दुर्दशा घरों की.' निराली ने पिछली सभा की कार्रवाही अपनी कॉपी में लिख ली थी.
‘नशा करे दुर्दशा घरों की...इस पंक्तिु पर जो बच्चेक कविता लिखकर लाए हैं, वे अपने हाथ ऊपर कर लें.' केवल दो-तीन हाथ ही ऊपर उठे. इस बीच एक बच्चा् सिसकने लगा. बद्री काका चौंक ग़ए-
‘क्या- हुआ, कौन है?'
‘सदानंद है गुरुजी.' सदानंद के बराबर में बैठी कुक्कीप ने कहा.
‘रो क्यों रहा है?'
‘पिछले सप्ताहह जबसे आपने कविता की पंक्तिै दी थी, तभी से इसका जी बहुत उदास है. कहता है कि जैसे कविता की पंक्तिद की ओर ध्याान जाता है, उसको अपने घर की दुर्दशा याद आ जाती है.'
सभी को मालूम था कि सदानंद के पिता को शराब की बुरी लत है. इस कारण उसके घर में अक्सयर झग़ड़ा रहता है. यह याद आते ही बच्चोंर के उल्लातस को घनी उदासी ने ढक लिया. कुछ देर के लिए तो बद्री काका भी निरुत्तर हो ग़ए. लेकिन उन्हों ने जल्दीउ ही खुद को संभाल लिया-
‘सदानंद तो कविता पूरी कर चुका है, उसने हाथ उठाया था.' बद्री काका के स्वहर में आश्च्र्य था. फिर पल-भर शांत रहने के बाद बोले-‘धीरज रखो बेटे, यह समस्याउ सिर्फ तुम अकेले की नहीं है. कई बच्चोंर की, बल्किल पूरे समाज की और इस तरह हम सब की है. हम इसपर खुले मन से विचार करेंगे. संभव हुआ तो उसके निदान के लिए किसी नतीजे पर पहुंचेंगे भी. फिलहाल जो बच्चे कविता लिखकर लाए हैं, वे तैयार हो जाएं. क्योंर टोपीलाल, क्योंग न आज तुम्हीं से शुरुआत कर ली जाए?'
‘जी!' टोपीलाल खड़ा हो ग़या और जेब से काग़ज निकालकर सुनाने लगा-
छोटे मुंह से बात बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की.'
‘शाबाश!' कविता की प्रथम पंक्ति़ सुनते हुए बद्री काका ने मुंह से बरबस निकल पड़ा. टोपीलाल कविता पढ़ता ग़या-
छोटे मुंह से बात बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
पान, सुपारी, गुटका, बीड़ी,
सुरा बिगाड़ें दशा घरों की
चरस, अफीम और गांजे से
हालत खस्ता़ हुई घरों की
बरतन-भांडे सब बिक जाते
इज्ज त बंटाधार घरों की
कविता समाप्ता हुई तो बच्चोंक ने तालियां बजाईं. बद्री काका भी पीछे नहीं रहे. बल्किव वे देर तक, उत्सा ह के साथ तालियां बजाते रहे. उसके बाद उन्होंतने दूसरे बच्चेर से कविता सुनाने को कहा. उसकी कविता भी पसंद की ग़ई. उसके बाद जो बच्चेत कविता लिखकर लाए थे, सभी की कविताओं को बारी-बारी से सुना ग़या. अंत में बद्री काका ने सदानंद से अपनी कविता सुनाने को कहा.
सदानंद के खड़े होते ही बच्चेो अपने आप तालियां बजाने लगे. इस बार तालियों में पहले से कहीं ज्या दा जोश था. बाद में गुरुजी से आज्ञा लेकर सदानंद ने अपनी कविता शुरू की-
न छोटे, न शर्म बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
सदानंद के इतना कहते ही पूरी कक्षा तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट से गूंज उठी.
‘वाह-वाह!' बद्री काका के मुंह से निकला, ‘बहुत अच्छेउ! आगे पढ़ो बेटा. पढ़ते जाओ...शाबाश!'
सदानंद आगे सुनाने लगा-
न छोटे, न शर्म बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
कंगाली आ पसरे घर में
नीयत बिग़ड़े बड़े-बड़ों की
घर बीमारी से भर जाए
खुशहाली मिट जाए घरों की
रिश्तों में आ जाएं दरारें
इज्जतत होवे खाक बड़ों की
बच्चेो रोते फिरें ग़ली में
औरत भूखी मरें घरों की
कविता पूरी होते ही बच्चोंी ने दुगुने जोश के साथ तालियां बजाना शुरू किया. उसके बाद तो देर तक तालियां बजती रहीं. खुद बद्री काका भी तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट के बीच. आंखों में नमी छिपाए. कहीं खो-से ग़ए. सुध लौटी तो सीधे सदानंद के पास पहुंचकर उसकी पीठ थपथपाने लगे-
‘वाह...वाह! तुमने तो कमाल कर दिया. जब मैंने इस कार्यक्रम की योजना बनाई थी, तो मुझे इसकी कामयाबी पर इतना भरोसा नहीं था. तुम सबने मेरी उम्मीाद से कहीं बढ़कर कर दिखाया है. अब मुझे विश्वा स है कि मैं अपने लक्ष्ये की ओर आसानी से बढ़ सकता हूं...शाबाश, बच्चोद शाबाश!'