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बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

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बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़

लेखक;ओमप्रकाश कश्यप

आज से ठीक चौदह साल पहले टोपीलाल का जन्मी हुआ. माता-पिता थे बेहद ग़रीब. अनपढ़, ईमानदार और भले. मेहनती और सूझबूझ वाले, मेहनत-मजदूरी करके पेट भरते. भला सोचते, भला ही करते. रोजगार की तलाश में गांव से शहर तक आए थे. शहर की सीमा पर एक होटल बन रहा था. हाथ का हुनर काम आया. दोनों को वहीं काम मिल ग़या. अपने श्रम-कौशल से उन्हेंट मान मिला; और सम्माभन भी. दिन बीतने लगे. एक दिन वे काम पर जुटे थे. होटल के कंगूरे की चिनाई का काम चल रहा था. तभी औरत के पेट में दर्द उठने लगा. पति ने सहारा दिया. वह उसको इमारत के एकांत स्थ्ल पर ले ग़या. थोड़ी देर बाद ही बच्चे की किलकारी हवा से लोरी गाने का आग्रह करने लगी. बेटे को ठीक-ठाक जन्मह देने के बाद मां ने उसके पिता से पूछा- ‘नाम क्याा रखोगे?'

उस समय पति के हाथ में एक टोपी थी. उससे वह माथे पर आए पसीना सुखाने के लिए हवा झल रहे थे. पत्नी् के एकाएक सवाल करने पर वे जवाब न दे सके. भीतर से छलकती खुशी को होंठों से दबाते हुए प्रश्नह-भरी निगाहों से टोपी हिलाने लगे.

‘समझ ग़ई, दूसरों से हटकर है, अच्छाल है.'

‘क्याह?'

‘टोपीलाल, है ना?'

‘हैं!' पुरुष चौंक पड़ा, बोला-‘तुम्हेंह पसंद है?'

‘तुम्हालरा दिया हुआ नाम भला नापसंद क्योंत हो.' अबोध शिशु को प्या'र से निहारते हुए मां मुस्कसरा दी.

इस प्रकार बातों-बातों में बच्चेय का नामकरण संस्का्र भी संपन्न हो ग़या. उसके जन्मप के समय एक और खास बात हुई. वह थी उसके मां को बहुत कम प्रसव पीड़ा. घर से बाहर प्रसव का सकुशल निपट जाना किसी चमत्कामर जैसा ही था. यही नहीं प्रसव का काम निपटाकर उसकी मां ने पिता को वापस काम पर भेज दिया था. उसके बाद तो वे पूरा काम समेटकर ही घर लौटे थे. इस बात की चर्चा टोले के लोग़ महीनों तक करते रहे.

टोपीलाल के पिता राजमिस्त्री थे. पति-पत्नीच दोनों साथ-साथ काम करने जाते. टोपीलाल के पिता नहीं चाहते थे कि उसकी मां काम करे. वह भी मजदूरी. इससे बाकी मजदूरों के आगे उनकी हेठी होगी, ऐसा उनको लग़ता था. इसलिए जब पहली बार उसकी मां ने काम पर साथ चलने कोे कहा तो उन्हों ने साफ मना कर दिया था.

‘इसमें शर्म कैसी?'

‘मेरी घरवाली होकर मजदूरों के साथ काम करो, मुझे अच्छा नहीं लगेगा.'

‘और जो पति-पत्नीा दोनों तुम्हाेरे लिए मजदूरी करते हैं, उनपर क्याो गुजरती होगी, कभी सोचा है? मुझसे पूरे दिन घर में बिना काम के नहीं बैठा जाता. तुम यदि अपने साथ काम पर नहीं रखना चाहते तो मैं दूसरी जग़ह काम की तलाश करूं.'

‘यह क्या बात हुई?'

उस दिन टोपीलाल की मां की ही चली. वह काम पर जाने लगी. उसके पिता नहीं चाहते थे कि वह ज्यासदा मेहनत करे. मिस्त्री होने के कारण वह चाहते थे कि कोई हल्काद-फुल्का काम दे दिया जाए. लेकिन टोपीलाल की मां बिना मान-गुमान के सबके बराबर मेहनत करती. मजदूर औरतों के साथ प्याथर से बोलती-बतियाती. जरूरत हो तो उनकी मदद भी करती.

बेटे के जन्मक के बाद टोपीलाल के पिता ने सोचा था कि चलो इसी बहाने वह कुछ दिन आराम कर लेगी. इसलिए बोले-

‘इस हालत में तुम्हाकरा कड़ी मेहनत करना क्याथ ठीक होगा?'

‘क्योंल जब मैं पहले जैसी स्वहस्था हूं तो पहले जैसा काम क्यों नहीं कर सकती?'

‘फिर भी लोग़ तो यही कहेंगे कि मैं बहुत कठोर हूं. बच्चेम के जन्मी के तीसरे ही दिन तुम्हें काम पर जोत दिया.'

‘मैं उन्हेंं बता दूंगी कि मैं अपनी मर्जी से काम करने आई हूं.'

‘ऐसी जिद किसलिए? फिर हमारे सामने कोई मजबूरी भी नहीं हैे. घर का खर्च तो मेरी कमाई से चल ही जाता है.'

‘इसलिए कि मैं मानती हूं कि जो कर सकता है उसको काम करना ही चाहिए. बिना मेहनत के खाने का किसी को अधिकार नहीं है.'

‘मुझे नहीं लग़ता कि इस हालत में तुम ईंट और गारे से भरी परात सिर पर उठा सकती हो?'

‘हां, यह तो मैं भी सोचती हूं; और तुम कहोगे तो उठाऊंगी भी नहीं.'

‘फिर वहां जाकर क्या करोगी?' टोपीलाल के पिता अचरज में थे.

‘मिस्त्रीगिरी! तुम्हागरे साथ इतने दिनों तक काम करते हुए मैं भी काफी कुछ सीख चुकी हूं. फिर एक बच्चे की मां हूं, अब तो मुझे भी तरक्की‍ पाने का अधिकार है, क्यों ?'

उसके बाद वही हुआ जो टोपीलाल की मां ने ठाना हुआ था. दो दिन के टोपीलाल को जमीन पर सुलाकर वह कन्नीब और वसूली लेकर पति के सामने बैठ ग़ई. मजदूरिनें उसकी हिम्मरत देख दंग़ रह ग़ईं. बाकी मिस्त्रियों ने मुंह चिढ़ाया. कहा कि कुछ देर की त्रियाहठ है, किंतु उसको सधे हाथों से ईंट पर ईंट चिनते हुए देख सबकी बोलती बंद हो ग़ई.

टोपीलाल के जन्मऔ के तीसरे ही दिन देश की शायद सबसे पहली महिला राजमिस्त्री का जन्मम हुआ.

एक औरत और राजमिस्त्री, लोगों ने इसे भी चमत्कासर ही माना.

सचमुच, चमत्काार ही तो था.

बीच की एक और घटना दिमाग़ चाट रही है.

होटल का काम पूरा हुआ तो टोपीलाल छठा वर्ष का पार कर चुका था. उसी के कमरों में लोट लगाते, सीढ़ियों पर धमा-चौकड़ी करते हुए वह बड़ा हो रहा था. हुनरमंद हाथों के परस से होटल की इमारत चमचमा रही थी. बाकी की कसर बिजली के लट्‌टुओं ने पूरी कर दी थी, जो जग़ह-जग़ह रंग़-बिरंगी आभा बिखेर रहे थे. जग़मगा रहे थे यहां-वहां. आखिरी दिन कारीग़रों और मजदूरों का हिसाब करने के लिए मालिक ने सबको जमा किया था. होटल पूरे शहर मेंं निराला था. ठीक उसके मालिक की कल्पकना के अनुरूप. सुरुचि एवं संपन्नहता का बेमिसाल नमूना. मालिक उनके काम से प्रसन्ना था. मजदूरी के अलावा सबको कुछ न कुछ भेंट में देने का इंतजाम भी उसने अपनी ओर से किया था. ताकि यादगार बनी रहे.

टोपीलाल का जन्मन उसी होटल में हुआ था. वह दुनिया का शायद पहला होटल था, जिसमें पति-पत्नीे दोनों ने राजमिस्त्री की कमान संभाली थी. यह बात भी मालिक की जानकारी में थी. टोपीलाल के लिए उसने खासतौर पर कपड़े बनवाए थे. मालिक उसे अपने लिए शुभ मान रहा था.

शाम का समय. मैदान में डेढ़-दो सौ की भीड़. पंडाल, कुर्सी और मेज को अस्था यी कार्यालय के रूप में सजाया ग़या था. मजदूरों के बच्चेड एक ओेर खेल रहे थे. कुछ होटल को हसरत-भरी निगाहों से देख रहे थे. उनकी अपनी ही मेहनत का कमाल, खून-पसीने से खड़ी हुई आलीशान इमारत. हुनरमंद हाथों की कारीग़री की बेमिसाल पेशकश. उसको देखकर कोई भी स्वनयं पर गुमान कर सकता था. वक्तम खुशी का था और शायद दुःख का, एक-दूसरे से बिछोह का भी था.

यूं तो टोले के अधिकांश मजदूर-मिस्त्री आपस में परिचित थे. परंतु जीवन-संघर्ष में हर बार कुछ न कुछ पीछे छूट जाते. उनकी भरपाई करने नए लोग़ शामिल हो जाते. वक्तम उन सबसे विदा लेने का था, जिनके साथ सुख-दुख-भरे इतने साल बिताए थे. पसीने की अदला-बदली की थी. दुख में आंसू बहाए, सुख में हिस्सेछदारी की थी. वर्षों से वे साथ-साथ काम करते आए थे. आगे काम की तलाश उनमें से न जाने किस-किस को, कहां-कहां ले जाए. इसके बाद फिर कभी मिलने का अवसर मिले भी या नहीं. ऐसी चिंताएं लोगों को सता रही थीं.

ऐसे वक्तक पर कुछ लोगों की आंखें भरी हुई थीं. तो कुछ उतनी देर के लिए दार्शनिक बन चुके थे. जिंदगी में मिलना और बिछुड़ना तो सत्यल सनातन है, यह कहकर वे मन को झूठी तसल्लीि देने की कोशिश कर रहे थे. कुछ यह सोचकर खिन्न् थे कि जिस इमारत को उन्होंतने अपने खून-पसीने और हाथों के हुनर से प्राणवंत बनाया, आज के बाद कोई उसमें शायद ही भीतर आने दे या कोई उनको पहचाने भी. उनके जीवन की यही त्रासदी थी. वे ईंट-गारे को जीवन देकर उसे इमारत में ढालते. कन्नीी और गुनिया लेकर उसका अंग़-अंग़ तराशते. कोरी मिट्‌टी में प्राण-प्रतिष्ठा करते. लेकिन काम पूरा होते ही उसमें रहने का अधिकार खो बैठते थे.

ऐसे लोग़ होटल की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे. यह सोचकर कि आगे कभी लौटे तो दरवाजे पर बड़े-बड़े दरबान खड़े दिखाई देंगे. उन जैसों को वे शायद ही भीतर आने दें. इसलिए विदाई बेला में वे अपने हाथों के कमाल को भीगी पलकों से, आखिरी बार जी भ्रैरकर देख लेना चाहते थे. सहेज लेना चाहते थे उसके रूपाकार, उससे निर्माण से जुड़ी स्मृदतियों को.

मजदूरी बांटने का काम प्रारंभ हो चुका था. मालिक एक-एक को आवाज देकर बुला रहा था.

‘टोपीलाल!' मुनीम की ओर से आवाज लगी. इसी के साथ तालियों की आवाज गूंज उठी. टोपीलाल के पिता उसे लेकर आगे बढ़ें, उससे पहले ही टोपीलाल स्व यं आगे बढ़ ग़या. एक पांच-छह साल के बच्चे को भरे विश्वा स के साथ आगे बढ़ते देख लोग़ दंग़ रह ग़ए. तालियों का वेग़ दुगुना हो ग़या.

‘नाम क्याे है?' नन्हें टोपीलाल से मालिक ने पूछा.

‘ट्‌...ट्‌...टोपीलाल!' नन्हीछ, हकलाती-सी जुबान से जवाब मिला.

‘क्याक टोंटीलाल?' मालिक बचपन में लौट ग़या. सबकी हंसी छूट ग़ई.

‘नईं, टोपीलाल...टोपीलाल!' टोपीलाल ने दोहराया.

‘तो टोपी कहां छोड़ आए?' मालिक ने मजाक किया. एक बार फिर मैदान हंसी से उछलने लगा.

‘मेरी जेब में रखी है.' टोपीलाल ने बिना सकुचाए जवाब दिया. कभी उसकी मां ने उसके लिए एक टोपी सिली थी. जिसको वह अक्सैर अपनी जेब में रखता था. उसने जेब से टोपी निकालकर तत्काबल पहन भी ली. टोपीलाल की हाजिरजवाबी पर एक बार फिर जोरदार तालियां बजीं. मालिक भी खुशी से नहा उठा. उसने अपने हाथों से टोपीलाल को कपड़े भेंट किए, जिनमें एक रेशम की टोपी भी थी. मालिक टोपीलाल को अपने हाथों से टोपी पहना ही रहा था कि अचानक वह परेशान हो उठा.

टोपीलाल वापस जाने लगा. तभी मालिक की ओर से आवाज आई--

‘ठहरो, वापस आओ बेटे!' टोपीलाल रुक ग़या.

‘जरा अपने कपड़ों की जेब तो देखो. मेरी घड़ी शायद उसमें गिर ग़ई है.' मालिक ने कहा.

मालिक की घड़ी की गुमशुदगी की खबर मिलते ही एकाएक हड़कंप मच ग़या. कर्मचारियों में अफरातफरी मच ग़ई. एक ने मालिक को खुश करने के लिए दौड़कर टोपीलाल को पकड़ लिया. आनन-फानन में उसकी तलाशी ली ग़ई. लेकिन घड़ी वहां नहीं थी. सभी परेशान. मालिक अपनी महंगी घड़ी को लेकर चिंतित था. उससे भी अधिक परेशान थे उसके कर्मचारी. हालांकि वे परेशानी का दिखावा ही अधिक कर रहे थे.

‘मैंने देखा, अभी कुछ देर पहले तक तो घड़ी साहब के हाथ में थी, बड़ी जल्दी छिपा दी!' एक कर्मचारी ने टोपीलाल को डांटा.

टोपीलाल चुपचाप खड़ा था. उसके माता-पिता को काटो तो खून नहीं. दोनों स्वीयं को अपमानित महसूस कर रहे थे. विदाई की बेला में यह कैसा अपशगुन. काम पूरा होने की जो खुशी थी, वह गायब हो चुकी थी. कर्मचारियों ने टोपीलाल को पकड़ रखा था.

‘मालिक इसके पास घड़ी भला कहां से आई? आपके दिए कपड़ों के सिवाय इसके पास कुछ और नहीं है.' टोपीलाल के पिता ने गिड़गिड़ाकर कहा. उसकी मां भी आगे आकर फरियाद करने लगी-

‘मेरा टोपीलाल चोर नहीं है मालिक.'

‘यह बहुत शैतान है, कुछ भी कर सकता है.' कर्मचारियों के बीच से आवाज आई. सबने देखा वह बिशंभर था. टोपीलाल के माता-पिता से ईर्ष्यास करने वाला. किसी को उसकी बात पर भरोसा न हुआ, लेकिन दूसरे कर्मचारियों को टोपीलाल को तंग़ करने का बहाना मिल ग़या.

मालिक परेशान था. उसका मूड खराब हो चुका था. घड़ी महंगी थी. पर मालिक की हैसियत के आगे कुछ भी नहीं. वह अपने लिए कभी भी दूसरी घड़ी खरीद सकता था. लेकिन सबके सामने से घड़ी का अनायास गायब हो जाना उसको परेशान कर रहा था. चोर का पता लग़ना भी जरूरी था. आखिर उसने सारे कर्मचारियों को एक ओर खड़ा हो जाने का आदेश दिया. फिर टोपीलाल को अपने पास बुलाया, प्या र से पूछा-

‘बता दो बेटे, मुझे अच्छीर तरह से याद है, तुम्हेंि बुलाने से पहले घड़ी मेरी कलाई पर बंधी थी.'

‘मुझे नहीं मालूम.' मालिक के पूछने पर टोपीलाल ने जवाब दिया. चोरी के इल्जा़म से वह घबरा ग़या था.

‘मालिक यह झूठ बोलकर चोरी का इल्जामम दूसरों पर डालना चाहता है.' एक कर्मचारी टोपीलाल पर गुर्राया.

‘तुम कैसे कह सकते हो?' बिना झिझके टोपीलाल ने कहा.

‘इसलिए कि घड़ी सबके सामने, अभी-अभी गायब हुई है. उस समय केवल तुम मालिक के पास थे.'

‘मालिक के पास तो उनके नौकर और कर्मचारी भी हैं. उनसे भी तो पता करना चाहिए. चोर हमारे टोले का नहीं है.'

‘फिर भी घड़ी की चोरी तो हुई है.'

‘तो यह तो मालिक और उसके कर्मचारी जानें.' टोपीलाल ने निडर होकर कहा.

‘कर्मचारी तो सभी पीछे हैं, फिर उनमें इतनी हिम्म त कहां कि मालिक की घड़ी की चोरी कर सकें.'

टोपीलाल के दिमाग़ में बार-बार कुछ खटक रहा था. कि जैसे कुछ याद करना चाहता हो. किंतु विचार दिमाग़ में टिकने से पहले ही हवा हो जाता था.

मालिक के आदेश पर टोपीलाल को एक ओर बिठा दिया ग़या. मजदूरी बांटने का काम रुक चुका था. बाकी मजदूर भी पेशोपेश में थे. कुछ इस बात को लेकर परेशान थे कि मालिक का मूड खराब होने के बाद अब ठीक-ठाक ईनाम नहीं मिल पाएगा. लेकिन एकाध के मन में छिपे संदेह की बात जाने दें तो, उनमें से कोई भी टोपीलाल को चोर मानने को तैयार नहीं था.

सहसा टोपीलाल उठकर खड़ा हो ग़या. सभी उसकी ओर देखने लगे. उसने कहा-

‘अग़र मैं चोर पकड़वा दूं तो आप मेरी मां और बापू को जाने देंगे?'

‘हम तुम्हेंो ईनाम भी देंगे.' मलिक ने खुश होकर कहा. उस समय टोपीलाल का दिमाग़ बहुत तेजी से सोच रहा था. उसको लगा कि घड़ी अग़र मालिक की कलाई से गायब हुई तो वह अवश्या ही खुलकर गिरनी चाहिए. पर गिरकर जाएगी कहां! नीचे! फर्श पर! लेकिन फर्श पर गिरती तो नजर में आ जाती! फिर कहां ग़ई? यकायक उसकी आंखें चमक उठीं.

‘मालिक घड़ी आपके उस नौकर के पास है, जिसकी आंखों के नीचे ग़हरा काला दाग़ है.' टोपीलाल ने रहस्यय से पर्दा हटाया. इसपर सभी चौंक पड़े.

‘चंदगी...! अभी तक तो वह यहीं था, अचानक कहां चला ग़या?' टोपीलाल की बताई पहचान पर मालिक के पीछे खड़े एक कर्मचारी के मुंह से निकला. सहसा सबकी आंखें चमक उठीं. चंदगी की खोज की जाने लगी.

‘मालिक पुलिस बुलाकर इसे पकड़वा दीजिए. यह आपका कीमती समय बरबाद कर रहा है.' इस बीच पीछे से दूसरे कर्मचारी की आवाज आई.

‘चुप रहो इतने सारे लोगों के सामने हमारी घड़ी गायब हुई है. उसका इल्जााम इस बच्चेे पर लगाने पर पुलिस क्याच हमारी बात मानेगी. उल्टेी हमारी ही हंसी होगी. तुम चंदगी को फौरन बुलाओ.' मालिक ने डांटा. इस पर कर्मचारी पीछे खडे़ आपस में खुसर-पुसर करने लगे.

कुछ देर के बाद चंदगी को खोज लिया ग़या. वह टोकरी को साफ करने के लिए उठाकर ले ग़या था. वह एक बार पहले भी चोरी के आरोप में पकड़ा जा चुका था. उस समय तो मालिक ने उसपर दया करते हुए छोड़ दिया था. टोपीलाल ने जैसे ही उससे घड़ी लौटाने को कहा, उसका चेहरा पीला पड़ ग़या. मालिक समेत सभी का ध्यालन उसकी ओर चला ग़या. मालिक ने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह घबरा ग़या और उसके पैरों पर गिर पड़ा. गिड़गिड़ाकर माफी मांग़ने लगा.

चोरी का भेद खुल चुका था. सभी टोपीलाल की बुद्धि पर हैरान थे. घड़ी चंदगी तक कैसे पहुंची, और टोपीलाल को उसके बारे में कैसे पता चला, यह एक रहस्या था.

‘वह तो बहुत पीछे खड़ा हुआ था, मेरे पास आया तक नहीं.' मालिक हैरान था.

‘आया था मालिक, टोकरी उठाने के लिए.'

मालिक को याद आया. चाय के खाली कप, रद्‌दी काग़ज वगैरह डालने के लिए एक डस्टीबिन का इंतजाम किया ग़या था. उसी को उठाने के लिए चंदगी आगे आया था.

‘तुम्हेंथ कैसे पता चला कि घड़ी डस्टंबिन में गिरी है, और चंदगी के पास है?' मालिक ने पूछा.

‘मेरे पापा चोर नहीं हैं, मैं भी चोर नहीं हूं.' टोपीलाल ने भोलेपन से कहा. घड़ी मिल जाने से टोपीलाल के पिता की हिम्महत वापस लौट आई थी. वे आगे आकर बोले-

‘मालिक मेहनतकश लोग़ ईमानदार से जीते, अपने पसीने की कमाई खाते हैं. उनमें इतनी हिम्मसत कहां कि आपकी महंगी घड़ी रख सकें. इतनी महंगी घड़ी को हमारे पास देखकर कोई भी चोरी का इल्जांम लगा लेगा. इसलिए यह काम आप ही के आदमियों का हो सकता है, इसका हमें विश्वाईस था. सबके सामने घड़ी की चोरी तो संभव न थी. इसीलिए संभावना यही थी कि वह अपने आप खुलकर गिर ग़ई हो. यही सोचते हुए इसे आपके नौकर द्वारा डस्ट बिन उठाने की घटना याद आ ग़ई. तब इसको यह अनुमान लगाते देर

न लगी कि जो कर्मचारी उसे लेकर ग़या है, घड़ी उसके पास हो सकती है, क्यों बेटा?'

टोपीलाल ने ‘हां' के पक्ष में अपनी ग़र्दन हिला दी.

‘शाबास!' मालिक के मुंह से अनायास निकला. छह साल की आयु में टोपीलाल को मिली यह पहली कामयाबी थी. इस घटना के बाद उसके चाहने वाले उसको जासूस टोपीलाल के नाम से पुकारने लगे. लोगों ने मान लिया कि बड़े सोच के लिए उम्र में बड़ा होना जरूरी नहीं है. असाधारण व्येक्तिेत्व साधारण वेश में भी सामने आ सकता है. -
 
आज जब हम यह कहानी आपको सुनाने जा रहे हैं तो टोपीलाल चौदह वर्ष का हो चुका है. इतने वर्ष भी एकाएक नहीं बीते. हालांकि टोपीलाल का प्रयास रहा कि हंसते-खेलते समय यूं ही उड़ जाए. उड़ता ही रहे, जैसे नीले आसमान में पतंग़ और होली के रंग़. उडे़ जैसे पंछी. कुलांचे भरे, जैसे जंग़ल में हिरन, उछले-खेले जैसे पानी में गोते खाती नीलमछरिया. तैरे ज्‍यों नदिया में रंग़-बिरंगी नाव, झील में बत्तखें.

हर रात वह ऐसे ही रंग़-बिरंगे सपने देखता. नए-नए अरमान सजाता. लेकिन जब भी वह अपने हमउम्र बच्चोंं को उनके हाथों में तख्तीत, बग़ल में बस्ता लटकाए देखता तो उसका मन बुझ-सा जाता. उसे लग़ता कि कुछ उसके हाथों से फिसलता जा रहा है, जो उसको फिर जिंदगी में कभी भी नहीं मिलने वाला. इतना सोचते ही उसका मन बुझ-सा जाता. आशा निराशा में ढल जाती.

एक बार उसके पिता को स्कू.ल के लिए नए कमरे बनाने का काम मिला. दिन में स्कू ल के एक हिस्सेन में चिनाई का काम चलता. दूसरे में बच्चेने पढ़ाई करते. उस समय टोपीलाल को न तो पतंग़ उड़ाने में मजा आता, न लुका-छिपी का खेल खेलने में. ऊपर से स्कूचल में पढ़ रहे बच्चे जब उसको हेठी नजर से देखते तो उसपर घड़ों पानी पड़ जाता. मन की सारी उमंग़ धराशायी हो जाती.

यूं तो अपने टोले के सभी बच्चोंर में टोपीलाल सबसे तेज और बुद्धिमान माना जाता. लोग़, उसकी तारीफ करते. जो काम दूसरे बच्चेच नहीं कर पाते थे, उसके लिए टोपीलाल को ही याद करते. टोपीलाल उनके विश्वाास की रक्षा भी करता. अपने काम से वह हरेक का दिल जीत लेता. किंतु जब वह छोटे-छोटे बच्चोंद को पढ़ते हुए देखता तो उसकी सारी खुशी हवा हो जाती. मन बुझ-सा जाता. उस समय उसका न दूसरों की मदद करने को मन करता, न खेल-कूद में ही आनंद आता.

पिता निश्चिं त थे. उन्हों ने जैसे पहले ही तय कर रखा था-

‘मेरा टोपीलाल बड़ा होकर हम सब राजमिस्त्रियों से आगे जाएगा. उसके हाथों को छूते ही कन्नी -वसूली नाचने लगेंगी. ईंटों में छुअन-भर से जान आ जाएगी. अभी तक दुनिया में सात अजूबे हैं. कोई आश्च-र्य नहीं अग़र आठवां अजूबा मेरे बेटे के बड़े होने का इंतजार

कर रहा हो.'

दूसरे मजदूरों की तरह टोपीलाल के पिता के सपने भी छोटे थे. पेट भरने और जिंदगी की मामूली सुविधाओं तक सिमटे हुए. उनके लिए टोपीलाल के पिता को पढ़ाई जरूरी नहीं लग़ती थी-

‘किताबों में आंख वे फोड़ें जिन्हेंक दफ्तईरों में जी-हुजूरी करनी हो. मेरा बेटा...' पिता के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर टोपीलाल का मन मग्नो हो जाता. पल-भर के लिए सपनों की ऊंची और कलंगीदार तस्वीुर उसके सामने होती. लेकिन स्कू ल में जब बच्चों की कक्षाएं लग़ रही होतीं, और माता-पिता काम पर होते तब उसको सबकुछ सूना और बेकार लग़ने लग़ता. मन होता कि उड़कर बाकी बच्चोंक के बीच पाठशाला में जा बैठे, शब्दोंस के साथ बतियाए, अक्षरों के साथ कानाबाती करे.

और इस तरह टोपीलाल का अनमनापन बढ़ता ही जा रहा था. पतंग़ उड़ाना, लुका-छिपी का खेल खेलना सब पीछे रह ग़या. उसका कल्पथनाशील मन जो कभी पंछी-सा निर्बंध आसमान में तैरता, निर्मल-पावन नदी-सा हहर-हहर हहराता, हिरन छौनों जैसा कुलांचे भरता था, वह उदासी से घिरने लगा. और तो और दूसरों के बताए काम में भी वह ग़लती करने लगा.

टोपीलाल बिग़ड़ता जा रहा है, अक्सीर यह लोग़ कहने लगे. मां से कोई बात छिप पाती है, एक दिन उसकी मां ने पूछ ही लिया. जवाब में टोपीलाल बोला-

‘मां सब कहते हैं कि मैं बहुत तेज हूं. लेकिन.'

‘आखिर बात क्याै है, बेटा?'ष्‍

‘क्या तेज-तर्रार होना ही सबकुछ होता है? उस दिन मैंने सुना, मास्ट रजी पढ़ा रहे थे कि हम जो जानते हैं उसको दूसरों तक पहुंचाना भी हमारा धर्म है. वे बता रहे थे कि ज्ञान बांटने से और भी बढ़ता है. परंतु जब किसी को ज्ञान समेटना ही न आए तब?'

मां बहुत दिनों से टोपीलाल के हरकतों पर नजर रखे हुए थी. उसकी बेचैनी की राई-रत्ती खबर रखती थी. बेटे के दिल की बात समझते मां को देर न लगी-

‘मैंने तेरे बापू से कहा था तुझे स्कूील भेजने को.'

‘सच! फिर बापू ने क्या् जवाब दिया था?' टोपीलाल की बांछे खिल ग़ईं.

‘उन्होंतने जो कहा वह ग़लत कहां है. हमारा कोई एक ठिकाना तो है नहीं!'

‘तो क्याे हुआ मां, जबतक हम यहां हैं तब तक तो...'

‘ठीक है, मैं कल मास्टहर जी से बात करके देखूंगी.'

टोपीलाल उछल पड़ा. वह हमेशा ही अपनी मां की सूझ-बूझ का कायल रहा था. कामयाबी की पूरी-पूरी उम्मीेद थी. उस रात उसने सपना देखा कि वह भी ड्रेस पहनकर स्कूकल जा रहा है. पुस्तीकों से बतिया रहा है. दूसरे बच्चों की तरह उसका नाम भी पाठशाला के रजिस्ट र पर चढ़ चुका है-

‘टोपीलाल, पाठ याद करके लाए?'

‘जी हां!'

‘तो सुनाओ?' कक्षा अध्या्पक का स्वढर उसके कानों में पड़ता है, और वह बिना एक भी पल गंवाए पूरा पाठ सुना देता है. अध्या'पक चकित हैं. पूरी कक्षा दांतों तले उंग़ली दबाए है.

‘देखा.' अध्याापक महोदय बाकी कक्षा को संबोधित करते हैं, ‘तुम सब कितने आलसी और कामचोर हो. टोपीलाल से सीखो...एक ही दिन में सारा पाठ याद कर दिया. धन्यउ हैं इसके माता-पिता.' टोपीलाल ऐसे सपने पूरे दिन देखता रहा. अग़ले दिन उन सब पर पानी फिर ग़या.

‘आधे से ज्या.दा सत्र निकल चुका है, मास्ट़रजी ने कहा है कि इस समय दाखिला नहीं हो सकता.' मां ने ऐसा बताया, मानो कहते हुए मनों बोझ से दबी जा रही हो.

‘मां तुम उनसे कहतीं कि मेरा बेटा होशियार है, वह बाकी बचे समय में ही पूरी तैयारी कर सकता है?'

‘उनका कहना था कि जिस कक्षा में तुम दाखिला लेना चाहते हो, उसके सभी बच्चेी तुमसे नौ-दस साल छोटे हैं. वे तुम्हाकरा मजाक उड़ाएंगे.'

‘कोई बात नहीं, मैं किसी का भी बुरा नहीं मानूंगा. अग़र कोई मुझे टोकेगा तो मैं उससे कहूंगा कि देखो मैं इस उम्र में भी शुरुआत कर सकता हूं. सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है.'

‘मैंने उनसे सब कहा था. वह एक-एक बात जो हमारे पक्ष में जाती हो. लेकिन उन्हों ने मेरी एक न सुनी.' मां का कलेजा फटा जा रहा था. टोपीलाल की निराशा सिर उठाने लगी. आंखों के आगे अंधेरा छा ग़या.

बात आई-ग़ई हो ग़ई. लेकिन टोपीलाल उदास रहने लगा. उसका खेलना छूट ग़या. वह जग़ह भी उसकी आंखों में ग़ढ़ने लगी. वह रोज सोचता कि स्कूिल का काम जल्दीत से जल्दील पूरा हो ताकि वह यहां से कहीं दूर जा सके.

नए कमरों की चिनाई का काम तेजी से चल रहा था. पिं्रसीपल साहब चाहते थे कि काम समय रहते पूरा कर लिया जाए. ताकि अग़ले साल से आगे की कक्षाओं की पढ़ाई शुरू की जा सके. स्कूरल में बच्चेी बढे़ंगे, इसके लिए अतिरिक्त पानी की भी जरूरत होगी. नग़र निग़म की सप्लाीई कुछ घंटों तक सीमित थी. बाकी समय हैंडपंप से काम चलाया जाता था, परंतु उसका पानी खारापन लिए हुए था.

पिं्रसीपल साहब नलकूप लग़वाना चाहते थे. लेकिन समस्या थी कि उसको लग़वाया कहां जाए. इससे पहले भी एक-दो जग़ह बोरिंग़ करा चुके थे. लेकिन कहीं का चोहा बहुत

नीचे मिलता, तो कहीं पर निसोत खारापन लिए हुए. हैंडपंप का खारा पानी होने के कारण बच्चे अब भी परेशान थे. संख्याल बढ़ते ही समस्याा विकराल हो जाने वाली थी. प्रिंसीपल साहब चाहते थे कि ट्‌यूबवैल ऐसी जग़ह लग़वाया जाए जहां पानी का -ोत भी अच्छाा हो; और उसमें भरपूर मिठास भी हो. किंतु धरती के ग़र्भ में ऐसे ठिकाने का पता लगाना एक भारी समस्यान थी.

‘साहब पुराने जमाने में ऐसे लोग़ थे, जिनके तलवे धरती की धड़कनों को पढ़ लिया करते थे. जो चलते-चलते जहां भी ठहर जाते, वहीं मीठी जलधार बहा देते. ऐसे परोपकारी लोगों ने ही कुएं-बाबड़ी बनवाए. उनका मीठा पानी आज भी जन्‍म-जन्मांीतर की बुझाने का सामर्थ्यर रखता है.'

‘ऐसे लोग़ अब कहां से लाऊं? प्रिंसीपल साहब बोले, ‘बजट पहले ही बढ़ चुका है. एक बोरिंग़ खराब हुआ तो दूसरा बोरिंग़ कराने की अनुमति शायद ही मिल पाए.' परेशानी उनकी पेशानी पर लिखी थी. कोई अनपढ़ भी उसको बांच सकता था. अध्या पक, मजदूर और कारीग़र सभी ग़र्दन झुकाए खड़े थे. संकट सबके सामने था, लेकिन उससे उबरने का मार्ग किसी को नहीं सूझ रहा था.

‘सर! आपके हिसाब से बोरिंग़ करना कहां ठीक रहेगा?' प्रिंसीपल साहब के ठीक पीछे से आवाज आई. उन्होंेने पलटकर देखा. एक लड़का पीछे खड़ा उनसे सवाल कर रहा था. उसके चेहरे पर आत्म विश्वासस था. आवाज में वह बल जो जीवन से ग़हरे जुड़ाव के बाद ही आ पाता है. उन्होंेने पहचानने का प्रयास किया, लेकिन नाकामयाब रहे. बस इतना तय कर पाए कि वह उनके स्कूेल के बच्चोंव में से नहीं है.

‘क्योंय?' एक अनजान बालक को जवाब देने में उन्हें अपनी हेठी महसूस हुई.

‘बस यूं ही कि अग़र सभी जग़ह पर मीठा पानी हो तो बोरिंग़ करना कहां पर ठीक रहेगा?'

‘इसमें सोचना...ट्‌यूबवेल कोई बीच मैदान में तो लग़वाएगा नहीं, उसे किसी कोने में ही होना चाहिए.' प्रिंसीपल साहब ने बताया.

‘कौन-सा कोना?' अग़ले सवाल पर प्रिंसीपल साहब तिलमिलाए. परंतु इतने लोगों के बीच जब वे स्व यं कुछ न सोच पा रहे हों, तो समस्या' के निदान के लिए एक बालक पर गुस्साि दिखाने का साहस न कर सके. उन्होंनने एक ओर संकेत कर दिया.

‘अग़र वहां भी खारा पानी निकलेे तो?'

गुस्सेे को दबाते हुए प्रिंसीपल साहब ने दूसरे कोने की ओर संकेत कर दिया.

‘इसके अलावा?'

प्रिंसीपल साहब झुंझला पड़े. फिर भी उन्हों ने अग़ले ठिकाने की ओर इशारा कर दिया. विद्यालय में सबके सामने, उनसे इतने सारे सवाल-जवाब करने वाला टोपीलाल था. उस समय उसके माता-पिता सहित सभी मजदूर-कारीग़र डरे हुए थे.

बरसात का मौसम गुजरे पखवाड़ा ही बीता था. जमीन में अब भी नमी थी. आम की गुठलियां जहां-जहां फेंकी ग़ई थीं. वहां-वहां आम के नन्हेा पौधे नजर आ रहे थे. स्कूठल के बच्चेज उन्हें़ उखाड़कर उनसे पपीहा बनाकर खेलते. टोपीलाल को भी पपीहा बजाने में आनंद आता था. उस समय टोपीलाल के हाथों में एक थैला था. थैले में भरी हुई थी गीली मिट्‌टी.

कुछ देर तक मैदान में इधर-उधर घूमता हुआ वह उन पौधों को देखता रहा. फिर उनमें से एक जैसे कई पौधे चुने. उन्हेंर सावधानीपूर्वक उखाड़कर थैले में रखी गीली मिट्‌टी में दबा लिया. ताकि पौधे मुरझाएं नहीं. उन पौधों को उसने बराबर हिस्सोंे में बांटा और उन स्थालनों पर रोप दिया, जहां प्रिंसीपल साहब नलकूप लग़वाना चाहते थे.

लोग़ तो अपने काम में लगे रहते. टोपीलाल रोज जाकर अपने पौधों को देख आता. चार-पांच दिनों में ही परिवर्तन साफ नजर आने लगा. एक जग़ह के पौधे पूरी तरह सूख चुके थे. दूसरे कोने में वे बचे रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे. जबकि एक कोने में लगे पौधे खिले-खिले थे, मानो वहीं पर उगे हों. यह देखकर टोपीलाल के चेहरे पर चमक आ ग़ई. अपनी खुशी को दबाए रखना उसके लिए कठिन हो ग़या. उसने उसी समय प्रिंसीपल के कमरे की ओर दौड़ लगा दी और उनके दरवाजे पर बैठे चपरासी की परवाह न करते हुए वह सीधा उनके कार्यालय में घुस ग़या.

‘मैंने पता लगा लिया साहब!' प्रिंसीपल साहब कुछ समझ पाएं, उससे पहले ही वह बोल उठा. उस समय उसकी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी. एक गंवार-से दिखने वाले लड़के को देखकर पिं्रसीपल साहब को गुस्सार आया.

‘मैंने पता लगा लिया.' टोपीलाल ने अपने शब्दोंन को दोहराया. जैसे इससे अधिक कुछ कहना उसको आता ही न हो. तब तक प्रिंसीपल साहब उसको पहचान चुके थे.

‘आराम से बताओ, क्यास कहना चाहते हो.'

‘आप उत्तर दिशा में ट्‌यूबवैल लग़वाइए, वहां पर मीठा पानी ही मिलेगा.'

‘यह तुम कैसे कह सकते हो?'

‘मैं आपको दिखाता हूं, आइए साहब.' कहने के साथ ही वह पलट ग़या. जैसे बहुत जल्दी में हो. प्रिंसीपल साहब और उनके कार्यालय में मौजूद बाकी सभी लोग़ उसके पीछे हो लिए.

‘मां ने एक बार एक कहानी सुनाई थी. मैंने सोचा कि क्योंह न उसी को आजमाया जाए. और अंतर एकदम साफ नजर आ रहा है. आप अपनी आंखों से देखते ही मान जाएंगे.' आगे-आगे चलता हुआ टोपीलाल कह रहा था.

अंततः टोपीलाल द्वारा बताए ग़ए स्थातन पर ही बोरिंग़ कराया ग़या. फिर जैसा उसने कहा था, वही हुआ. पानी इतना मीठा था, जैसे अमृत. ऊपर से इतना शीतल कि जन्म -जन्मांुतर की प्यािस बुझा सके. सभी प्रसन्न थे. प्रिंसीपल साहब की खुशी का तो

ठिकाना ही नहीं था.

आखिर वह दिन भी आया, जब स्कूथल की नई बिल्डिंहग़ तथा नलकूप का उद्‌घाटन था. उस दिन बाहर से आए अधिकारियों तथा बड़े-बड़े लोगों की उपस्थिूति में प्रिंसीपल साहब ने कहा था-

‘पीढ़ियों से कही-सुनी जाने वाली हमारी कहावतें और लोककथाएं यूं ही नहीं हैं. इनमें हमारे बुजुगोंर् का वर्षाें का अनुभव और ज्ञान छिपा हुआ है. ये हमारे पारंपरिक ज्ञान का अद्‌भुत भंडार हैं. किंतु बड़े दुःख की बात है कि नए को समेटने की आपाधापी में हम पुराने को भूलते जा रहे हैं. मैं इस लड़के का बहुत अहसानमंद हूं. इसने मुझे, बल्किस हम सब को हमारी ग़लतियों का एहसास कराया है.

मैं यहां उपस्थिवत अपने अधिकारियों से प्रार्थना करता हूं कि नियमों में ढील देकर भी इसे स्कूहल में दाखिल करने की अनुमति प्रदान करें. इस शर्त के साथ कि आगे जो भी कहानी या कहावत यह सुने, उसपर खुलकर प्रयोग़ करे. उसका पूरा खर्च यह स्कूतल उठाएगा.'

उनका भाषण समाप्त होते ही कार्यक्रम-स्थनल तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट से गूंजने लगा. टोपीलाल तथा उसके माता-पिता की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था. उनके साथ काम करने वाले बाकी मजदूर भी स्वरयं को गौरवान्विजत अनुभव कर रहे थे.

इस तरह टोपीलाल को स्कूतल में दाखिला मिल ग़या.

कहानी हो या पाठ, जो पढ़ने-सुनने के बाद उसको भली-भांति गुनते हैं, उनके लिए रास्ता बनाने मंजिलें खुद आगे आ जाती हैं.

यह तो अब की कहानी हुई. इससे बाद का हिस्साक भी कम मनोरंजक नहीं है. सुनने के साथ गुनना कितना जरूरी है, यह टोपीलाल ने तभी जाना था.

तो चलो उसी पर आते हैं-

टोपीलाल जब कुछ बड़ा हुआ तो टोली के बच्चोंा के साथ खेलने लगा. उस समय बाकी बच्चोंन के माता-पिता की अपेक्षा होती थी कि वह अपने से छोटे बच्चोंे का ख्याल रखे. सड़क पर वाहनों का जमघट रहता है. बच्चोंत को उधर जाने से रोके. जितना वह खुद पढ़ चुका है, उतना दूसरों को पढ़ाए, जो वह स्वंयं जानता है, उसके बारे में बाकी बच्चों को भी बताए.

इससे हालांकि टोपीलाल के अपने मनोरंजन में खलल पड़ता था. लेकिन जब टोली के बड़े लोग़ कह रहे हों; और उन्हेंा उसके माता-पिता का भी समर्थन प्राप्तल हो तो वह ज्यापदा कुछ कर ही नहीं सकता था. वह खुद को तो इतना समझदार मानता था कि शहर के किसी भी कोने में घूमकर वापस आ सके. किंतु बाकी बच्चोंी के साथ रहने से वह बंध-सा ग़या

था. इससे उसके लुका-छिपी के खेल में भी खलल पड़ा था. उस खेल में छोटे-बड़े सभी बच्चेस हिस्साइ लेते. धमाचौकड़ी के बीच, क्याी पता असावधानी में कोई बच्चा सड़क के उस पार चला जाए तो. कोई दुर्घटना हो ग़ई तो, सब उसी को दोष देंगे. किसी को बुराई का मौका टोपीलाल बिलकुल नहीं देना चाहता था. बच्चोंन के मामले में तो हरगिज नहीं.

टोपीलाल ने मनोरंजन का नया तरीका निकाला. उसने एक ही स्था न पर बैठकर खेले जाने वाले खेल खेलना शुरू कर दिया.

उन दिनों उनका समूह एक बहुमंजिला इमारत को पूरा में लगा था.उन्हीं दिनों टोपीलाल को सड़क पर एक ग़त्ता मिला. जिसपर एक ओर कुछ छपा हुआ था. शायद किसी बच्चें का गिर पड़ा हो. टोपीलाल ने वह उठा लिया. ग़त्ते के एक ओर अलग़-अलग़ रंग़ के चौकोर खाने बने थे. कुछ आड़े-तिरछे चित्र, रंग़-बिरंगी धारियां.

टोपीलाल कई बार बच्चों़ को ऐसे ही ग़त्ते के चारों कोनों पर बैठे देख चुका था. गौर से उसको देखते, ग़र्दन झुकाए गोटियों की चाल चलते हुए. इतना तो वह समझता ही था कि यह कोई खेल है. वह ग़त्त्ो पर टकटकी ग़ढ़ाए देर तक खेल को समझने का प्रयास करता रहा. घंटों तक, परंतु कुछ भी पल्लेप न पड़ा.

‘बिना मदद के इसको समझना मुश्कि ल है.' टोपीलाल ने माना. लेकिन मदद किससे ली जाए? जिन बच्चोंा के साथ वह खेलता था, वे सभी उससे छोटे थे. उनमें से कई तो टोपीलाल को अपना मार्गदर्शक मानते. बात-बात पर उसके पास मदद के लिए आते. संभव है कि बच्चों में से कोई इस खेल के बारे में जानता हो. लेकिन अपने से छोटे बच्चोंा से पूछकर वह अपनी हेठी नहीं करना चाहता था.

टोपीलाल को पहले ही इस बात का क्षोभ था कि जो बच्चेह स्कूकल जाते हैं, उन्हेंह उससे अधिक ज्ञान है. कुछ दिन के लिए स्कू‍ल जाकर उसने देख भी लिया था. जिन प्रश्नों का उत्तर देने में वह अटक जाता, उन्हें उससे छोटे बच्चेल आसानी से हल कर देते थे. वह दूसरे बच्चोंच के बराबर आने का भरसक प्रयास करता. रात-दिन पढ़ता, परिश्रम करता. परंतु घर में कभी पुस्तिकों का टोटा पड़ जाता तो कभी कॉपियों का. दिन में बच्चों की देखभाल करनी पड़ती, रात में बिल्‍डिंग़ में घुप्पो अंधेरा छा जाता. दिये की रोशनी में मच्छभर इतना परेशान करते कि पढ़ना हो ही नहीं पाता था. पढ़ाई में पिछड़ा तो पाठशाला से उसका मन भी ऊबने लगा-

‘मुझे उनके बराबर आने में समय लगेगा.' उसने स्व यं को समझाने की कोशिश की.

उस दिन के बाद वह डटकर मेहनत करने लगा. तभी स्कूवल का निर्माण कार्य पूरा हो जाने के कारण उसके माता-पिता समेत पूरा समूह वहां से रवाना होने की तैयारी करने लगा. भरे मन से टोपीलाल को भी स्कूमल से अलविदा कहना पड़ा. उसके बाद उनका समूह जहां ग़या, वहां से पाठशाला काफी दूर थी.

टोपीलाल को अपने माता-पिता से भी शिकायत थी. चाहता था उसके माता-पिता

अपने समूह से अलग़ हो, एक स्थाान पर टिककर कार्य करें. उसके भविष्य के बारे में सोचें. तभी उसको आगे पढ़ने का अवसर मिल सकता है. मां उसकी बात को समझ सकती है, यही सोचकर उसने अपना सुझाव मां के साथ रखा-

‘मां, बापू तो बाकी सब मिस्त्रियों से अच्छेा कारीग़र हैं!'

‘हां, हमारे समूह के कई मिस्त्री उनके सिखाए हुए हैं. वे उन्हेंो अपना गुरु मानते हैं.'

‘तुम भी कुछ कम नहीं हो, मां?' टोपीलाल ने अपनी बात मनवाने के उद्‌देश्यप से प्रशंसा की.

‘मुझे भी तो तेरे पिता ने ही सिखाया है!' कहते हुए उसकी मां मुस्ककरा दी, मानो उसका मंतव्य. समझ चुकी हो.

‘मां! तुम और बापू शहर में कहीं भी रहकर काम कर सकते हो. दोनों को आसानी से काम मिल जाएगा. संभव है इससे हमारी आमदनी भी बढ़ जाए. फिर हम अपना मकान भी बना सकते हैं.' वह कुछ और न समझ बैठे, इसलिए टोपीलाल ने अपना मंतव्यर साफ कर देना ही उचित समझा-

‘मां, हम लोग़ यदि एक ही स्थाान पर रहें तो मैं आसानी से पढ़-लिख सकूंगा.'

‘तू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने, यह तो मैं भी चाहती हूं. लेकिन अलग़ रहने की बात, इसके लिए तेरे बापू शायद ही तैयार होंगे.'

‘पर वे तो सदा ही मेरा भला चाहते हैं, क्यों ?'

‘सो तो है. वे कहते हैं कि हमारा एक निजी परिवार है, छोटा-सा, जिसमें सिर्फ हम तीनों शामिल हैं. इसके बाहर हमारा बड़ा परिवार भी है. उसमें हमारा पूरा समूह आता है, जिसमें पचास-साठ परिवार हैं. सबके सुख-दुःख से हमारा वास्तार है. नफा-नुकसान सबके साझे हैं.'

‘परंतु मां, वे हमारे सगे थोड़े ही हैं!' टोपीलाल ने तर्क करने का प्रयास किया. हालांकि वह जानता था कि उसकी मां साधारण स्त्रियों में से नहीं है, उसके पास हर तर्क की काट हो सकती है. और हुआ भी यही...

‘केवल सगा होना ही अपनत्व की कसौटी नहीं होती. एक देश, एक शहर, एक गांव, एक बस्तीस और एक जैसा व्य वसाय करने वालों में भी अपनापा होता है. इस समूह के साथ हम वर्षों से रहते आए हैं. सब एक-दूसरे की अच्छाेई और बुराइयों से भली-भांति परिचित हैं. सब एक-जैसा खाते-पहनते हैं. संकट में सब एक-दूसरे की मदद करते हैं. इसके अलावा एक बात और है, बेटा.' कहते हुए मां कुछ पल को रुकी, फिर जैसे निर्णय पर आती हुई बोली-

‘किसी भी अकेले इंसान की तरक्की का उस समय तक कोई मोल नहीं है, जब तक कि उसके अपने लोग़, संगी-साथी, भाई-बंधु पिछड़े हुए हों. पड़ोसी भूखा हो तो अपना पेट भरा होने में कोई बड़प्पसन नहीं है. आदमी को सबके भले में ही अपना भला देखना चाहिए.'

‘लेकिन समूह में तो बिशंभर जैसे लोग़ भी हैं मां, जो बापू से जलते हैं.' टोपीलाल ने फिर तर्क किया.

‘ऐसा नहीं बेटा! कहावत है कि घर में चार बर्तन एक कोने में पड़े हों, तो कभी न कभी जरूर खड़क उठते हैं. तुम्हाारे बिशंभर काका ऊपर से चाहे जैसे दिखते हों, दिल उनका बिलकुल साफ हैं. याद है पिछली बार जब तेरे पिता बीमार पड़े थे?'

उस घटना के बारे में टोपीलाल को ज्या दा याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ती. वह उसके दिमाग़ में सर्वाधिक डरावनी स्मृबति के रूप में दर्ज है. उसके पिता को तेज बुखार चढ़ा था. ग़र्मी के दिन थे. बुखार का इलाज चल ही रहा था कि हैजा ऊपर से सवार हो ग़या. मां उस समय काम पर, घर से बाहर थी. टोपीलाल घर पर अकेला. पिता की बिग़ड़ती हालत देखकर वह पड़ोस में मदद के लिए पहुंचा. उस समय बिशंवर काका ने भाग़दौड़ कर परिवार की जैसी मदद की थी, उसे वह कैसे भूल सकता है! भुला पाना संभव ही नहीं है.

बीती घटना को याद करने के साथ ही टोपीलाल के चेहरे पर उदासी झलक आई. उसकी मां ने फौरन ताड़ लिया. टोपीलाल को सीने से लगाकर, पीठ पर प्याकर से हाथ फिराने लगी- ‘घबरा मत! समूह में तुम्हािरे जैसे और भी कई बच्चेा हैं. मैं तुम्हा रे पिता से बात करूंगी कि काम की तलाश में बस्तीड से दूर न जाया करें. उसके बाद तुम सब अच्छीा तरह पढ़ सकोगे.'

मां के तकोंर् ने तो टोपीलाल को उलझा दिया था. किंतु निष्कंर्ष उम्मीमद जगाने वाला था. इसलिए उसकी उदासी छंटने लगी. उसी दिन से वह इस प्रतीक्षा में था, जब उसका समूह लंबे समय के लिए किसी ऐसे स्थालन पर ठिकाना करेगा, जहां वह अपनी पढ़ाई दुबारा आरंभ कर सके. वह मां से अत्येधिक प्रभावित भी था.

‘मां के पास हर समस्याअ का हल, हर तर्क का जवाब है.' ग़त्ते को हाथ में थामे टोपीलाल सोच रहा था.

और वह ग़लत भी नहीं था.
 
मां की उन दिनों अच्छेस राजमिस्त्री के रूप में पहचान थी. किसी इमारत में महीन नक्कारशी द्वारा जान डालनी हो तो टोपीलाल की मां को ही याद किया जाता. और वह सचमुच कोरी मिट्‌टी में प्राण पूर देती थी. ईंटें उसके स्‍पर्श से बोलने लग़तीं, दीवारें छुअन-भर से ग़र्वीली हो तन जातीं, कंगूरों में जान आ जाती, खूबसूरत सपना साकार होने लग़ता था.

‘तुम्हा री टक्कीर का राजमिस्त्री पूरे शहर में भी शायद ही कोई हो.' टोपीलाल के पिता मुक्तोकंठ से उसकी प्रशंसा करते.

‘सबकुछ आप ही का तो सिखाया हुआ है.'

‘गुरु तो गुड़ ही रहा, पर तू शक्क र बन ग़ई.' खुशी से उनका जी उमगाने लग़ता. टोपीलाल का मन भी बाग़-बाग़ हो जाता. जहां कहीं मां का जिक्र होता, वह सांस थामे सुनने लग़ता. मां की तारीफ सुनना उसको खूब भाता. वह सदैव ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में रहता.

जिस समय टोपीलाल अपनी मां के पास पहुंचा, वह सोने की तैयारी में थी. वैसे भी रात हो चुकी थी. दिन-भर की कड़ी मेहनत के बाद वह बहुत ही थक जाती थी. पर टोपीलाल को चैन कहां! टिमटिमाते दिये की झीनी रोशनी में उसने ग़त्ता मां के सामने रख दिया-

‘इसे तो मैंने वर्षों से नहीं छुआ. जाकर अपने पिता से पूछ.'

‘मुझे तो तुम्हीं् से सीखना है.' टोपीलाल ने जिद की.

‘ठीक है, चल गोटियां बिछा ले.'

टोपीलाल को बताया ग़या था कि यह खेल गोटियों से खेला जाता है. गोटियां न होने से वह निराश भी था. उसको ग़त्ता फेंकने वाले से शिकायत भी थी कि यदि उसने इस खेल से ऊबकर ग़त्ता फेंका है, तो गोटियों को भी साथ ही फेंक देना चाहिए था. ताकि किसी के काम आ सकें. किंतु यह शिकायत ज्यानदा देर न टिक सकी.

‘यह जरूर किसी बच्चे के थैले से फिसला होगा.' टोपीलाल ने सोचा था, ‘तब तो वह बालक बहुत परेशान होगा.'

टोपीलाल को बहुत दुःख पहुंचा था. जैसे उसने अपनी ही कोई कीमती चीज गुमा दी हो. पर नया खेल सीखने की ललक में वह दुःख ज्याहदा देर न टिक सका था.

‘मां, बिना गोटियों के क्याि तुम इस खेल को नहीं सिखा सकतीं?'

‘सिखा भी सकती हूं.' मां ने उत्तर दिया था, ‘लोग़ तो इसको सांप-सीढ़ी का खेल कहते हैं. परंतु असल में यह है तो जीवन और प्रकृति का खेल ही. जिन्हेंस इस खेल में हम गोटियां कहते हैं, जिंदगी के खेल में ये कुछ भी हो सकती हैं. यहां तक कि मैं और तुम भी. यहां से आगे समझने के लिए पासे ही जरूरत होगी. उसका काम भी ईंट के मामूली टुकड़े से चलाया जा सकता है.'

मां की बातों में ग़हरा रहस्यह छिपा था. लेकिन खेल के उत्सांह में डूबे टोपीलाल को ध्याेन रहा केवल ईंट के टुकड़े से पासा बनाना. वह उसी समय ईंट का प्रबंध कर लेना चाहता था, लेकिन मां ने टोक दिया-

‘कुछ भी सीखने के लिए धैर्य जरूरी है. कल मैं काम पर नहीं जा रही हूं, घर के

काम से निपटने के बाद...'

मां की बात मानने से पहले टोपीलाल ने कहानी की शर्त जड़ दी.

‘ठीक है, एक छोटी-सी कहानी सुनाती हूं. उसे यदि गुन लोगे तो कल इस खेल का मर्म समझने में आसानी होगी.' मां ने सहमति दी. टोपीलाल के लिए खेल केवल एक खेल था. कहानी सिर्फ एक कहानी. इससे ज्यामदा उनका कोई उद्‌देश्यै हो सकता है, उसको मालूम ही नहीं था. इसलिए कहानी सुनने के लिए वह अपनी मां से सट ग़या.

मां ने कहानी आरंभ कर दी-

एक राजा के दो बेटे थे. एक अच्छा था, दूसरा बुरा. एक दूसरों के काम आता. दूसरा सबके काम बिगाड़ देता. एक लोगों से प्याार करता, दूसरा उनको दुत्का रता. एक मीठे बोल बोलता, ममता की चलती-फिरती मूरत नजर आता, दूसरा लोगों के साथ गुस्सेन से पेश आता, उन्हेंब डराता. एक सचाई और ईमानदारी से काम निकालना चाहता, दूसरे का मकसद था, केवल खुद के भले की सोचना. मनमानी करना...लालच साधना. सच-झूठ जैसे भी संभव हो, वह सहज भाव से कहता-करता. एक सोच-विचारकर काम को पूरा करता. दूसरे को किसी भी तरह मंजिल तक पहुंचने की जल्दी रहती. उसके लिए हर तरीके को जायज मानता था. पहले को ‘कर भला सो हो भला' की नीति में विश्वाकस था. दूसरा ‘अंत भला सो सब भला' के चलन को पानी देता था.

माता-पिता हालांकि अपनी प्रत्येाक संतान को एकसमान प्या र करते हैं. लेकिन उन दोनों में से एक मां का लाडला था, दूसरा अपने पिता का.

‘मेरे बेटे में राजा बनने के सारे गुण हैं.' राजा जो दूसरे बेटे को चाहता था, एक दिन रानी को चिढ़ाने के लिए बोला.

‘तुम्हाेरा बेटा सिर्फ तानाशाह बन सकता है, मेरा बेटा तो आज भी लोगों के दिलों पर राज करता है.' रानी ने सहज भाव से कहा. लेकिन राजा तो राजा था, ग़र्व-गुमान से फूला हुआ. सुनते ही चिढ़ ग़या. और चिढ़ ग़या सो चढ़ ग़या-

‘ठीक है, तुम्हाकरा बेटा करता रहे लोगों के दिलों पर राज, ग़द्दी का स्वासमी तो मैं अपने बेटे को ही बनाऊंगा!' हठीले राजा ने अपना निर्णय सुनाया.

रानी नहीं जानती थी कि बात इतनी बढ़ जाएगी...मामूली झाड़ आसमान जा चढ़ेगा. जिसे वह चाहती थी, वह बड़ा बेटा था. नियम से राजा का असली उत्तराधिकारी. न चाहते हुए भी रानी ने अपनी भूल के लिए राजा से माफी मांगी. अपनी ग़लती का दंड अपने बड़े बेटे को न देने की प्रार्थना की. आखिर राजा पिघला-

‘आज की हमारी तकरार तो महज संयोग़ है. वरना छोटे बेटे को राजग़द्दी पर बिठाने का फैसला तो मैं कभी का कर चुका हूं. राज ताकत से चलता है. सचाई, ईमानदारी, और भलमनसाहत जैसे शब्दि ग्रंथों में ही शोभा देते हैं. असल में तो वे राजा को कमजोर बनाते हैं. उसकी महत्त्वाकांक्षाओं की राह में रोड़े हैं ये सब. लोग़ जिससे डरते हैं, उससे

प्यामर भी करते हैं. तुलसीदास जी ने स्वडयं रामचंद्रजी के मुख से कहलवाया है-‘भय बिनु होय न प्रीति.'

‘छोटा किसी भी तरह अपनी बात मनवाना जानता है. इसलिए उसमें मुझे चक्रवर्ती सम्राट के सभी गुण नजर आते हैं. मुझे पूरा विश्वा स है, कि वह पुरखों की इस विरासत को न केवल संभालकर रखेगा, बल्कि बढ़ाएगा भी.'

रानी को चुप हो जाना पड़ा. राजा ने मनमानी की. कुछ ही दिन बाद उसने छोटे बेटे को युवराज घोषित कर दिया. बड़ा बेटा निर्द्वंद्व रहा. रानी को लगा कि कहीं अन्याुय हुआ है. फिर भी वह चुप रही.

परिस्थि तियां यदि प्रतिकूल हों तो प्रतीक्षा करना भी नीति बन जाता है. और जब राजा अन्या.य करे तो उसका फल पूरे राज्यि को भोग़ना पड़ता है. आखिर यही हुआ भी.

राजा दिल का बुरा नहीं था. परंतु उसके दिल में दबी-छिपी उच्चाकांक्षाएँ उससे ग़लत निर्णय करा लेती थीं. ऐसा ही उस बार हुआ था.

युवराज बनते ही छोटे बेटे की मनमानियां और अत्यादचार और भी बढ़ ग़ए. राज्यत और राजा दोनों की मान-मर्यादा को ताक पर रखकर वह राजकार्य में हस्तयक्षेप करने लगा. प्रारंभ में तो राजा को सबकुछ भला लगा. लगा कि युवराज होने के कारण वह राजनीति में रुचि दिखा रहा है. लेकिन बहुत जल्दीर छोटे बेटे की हरकतें उसका जी दुखाने लगीं. युवराज को समझाने की राजा की सारी कोशिशें बेकार ग़ईं.

राजधानी के पार्श्वव में एक नदी बहती थी. नदी के दूसरे तट पर बसा था एक गांव. छोटा-सा, वहां के किसान मेहनती और भले थे. युवराज अक्सकर उस गांव से होकर गुजरता. एक दिन वह शिकार से लौटा और सीधे राजभवन में जा धमका. राजा उस समय राजकाज में व्यदस्तस था.

‘पिताजी, मैं एक बाग़ लग़वाना चाहता हूं, बहुत बड़ा-इतना कि किसी भी राजा के पास वैसा बाग़ न हो.' युवराज ने राज्यम की कार्रवाही में व्यगवधान डालते हुए कहा.

राजा ने ग़र्दन उठाई. युवराज की ओर देखकर उसने धैर्यपूर्वक कहा-‘हमारे राज्यव में बागों की कमी नहीं है. तरह-तरह के, एक से बढ़कर एक बाग़ हैं. जहां वृक्ष फलों से; लताएं फूलों से लदी रहती हैं. कोयल वहां गाती, मोर नाचते हैं. हमारे तालाबों में कमल-दलों से भरपूर नीलसरोवर हैं. जिनमें रंग़-बिरंगी मछलियाँ तैरती रहती हैं. फिर भी तुम एक और बाग़ लग़वाना चाहते हो तो युवराज होने के नाते तुम्हेंर इसका भी अधिकार है. अच्छीो-सी भूमि देखकर वहां बाग़ लग़वा लो.'

‘मैं चाहता हूं कि एक बहुत बड़ा बाग़ हो. जिसमें शिकार के लिए हिरन, शेर, चीता आदि भी हों. भूमि मैं तय कर चुका हूं, बस आपकी अनुमति की जरूरत है?'

‘कैसी अनुमति?'

‘जिस भूमि पर मैं बाग़ लगाना चाहता हूं, उसके बीच में एक गांव आता है, हमें

उसको हटाना होगा?' कहते हुए युवराज ने गांव का नाम और पता बता दिया. सुनते ही राजा चौंक पड़ा.

‘उस गांव के लोग़ तो बहुत भले हैं. संकट के समय वहां के निवासियों ने कई बार हमारी मदद की है. हम उन्हें कैसे उजाड़ सकते हैं?' राजा ने आहत मन से बेटे को समझाने का प्रयास किया.

‘कानून के हिसाब से राज्य की समस्त भूमि का स्वाेमी राजा होता. इसलिए राजा का अधिकार है कि वह अपनी भूमि के साथ जो जी चाहे करे. फिर हम किसी को उजाड़ कहां रहे हैं. गांव वालों को एक स्था न से हटाकर दूसरे ठिकाने पर बसा दिया जाएगा. इसका खर्च भी राज्य उठाएगा!'

‘यह नहीं हो सकता. गांव वाले जिस स्थाान पर बसे हैं, वह उनका अपना है. मैं तुम्हें गांव को उजाड़ने का आदेश नहीं दे सकता.' राजा ने कहा. युवराज पांव पटकता हुआ वहां से चला ग़या. उसके बाद राजा और युवराज में कई दिनों तक भेंट नहीं हुई. धीरे-धीरे दिन बीते ग़ए. बात आई-ग़ई होने लगी.

एक दिन राजा ने राज्यं-भ्रमण का निर्णय किया. रानी को बताया तो उसने भी साथ चलने की इच्छाल व्यंक्तब की.

‘हमें यात्रा से लौटने में महीनों लग़ सकते हैं. इस बीच राज्यन की देखभाल कौन करेगा?'

‘क्योंय, युवराज तो है!' राजा ने तत्कासल कहा.

‘जाने क्योंट मेरा मन घबरा रहा है. महाराज, क्याे ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपने उत्तराधिकारी को लेकर फिर से सोच-विचार कर लें?' रानी गिड़गिड़ाई.

‘यह तुम्हाचरा भ्रम है, फिर भी तुम यदि यही चाहती हो तो यात्रा से लौटने के बाद मैं इसपर अंतिम निर्णय लूंगा.' राजा ने रानी की बात मान ली. वस्तु तः वह स्व यं भी युवराज की मनमानी से तंग़ आ चुका था.

महीनों लंबी यात्रा के बाद राजा और रानी लौटे तो वातावरण कुछ बदला-बदला पाया. यात्रा की थकान मिटाने के लिए राजा सीधे राजभवन में चला ग़या. अग़ले दिन राजदरबार में लौटा तो वहां सैकड़ों फरियादियों को देखकर चौंक पड़ा. पता चला कि राजा की अनुपस्थिुति का फायदा उठाते हुए युवराज ने खुद को सम्राट घोषित कर दिया है. राजा के रूप में सबसे पहले उसने सेनापति को गांव खाली करने का आदेश दिया. सेनापति ने सैन्ययबल के साथ गांव पर धावा बोल दिया. चारों ओर त्राहि-त्राहि मच ग़ई. जिसने भी विरोध जताने का प्रयास किया, सैनिकों ने उसको जेल में डाल दिया.

‘महाराज, सैकड़ों साल से हमारे पुरखे वहां रहते आए हैं. फिर भी यदि युवराज को उस गांव की जमीन इतनी ही जरूरी थी तो हमें संभलने के लिए समय दिया होता. बदले में हमें ऐसी जग़ह दी जाती जो उपजाऊ हो, जहां हम सब अपने-अपने परिवार के साथ

सुखपूर्वक रह सकें. परंतु जिस स्थायन पर हमें बसने का आदेश दिया ग़या है, वहां की जमीन बंजर और ऊबड़-खाबड़ है. पानी का तो नामोनिशां नहीं है.' फरियादियों के मुखिया ने कहा. राजा ग़र्दन झुकाए सुनता रहा.

‘हुजूर, ऐसे तो हम भूखे-प्याथसे मर ही जाएंगे.'

‘क्यार तुमने युवराज को समझाया नहीं था?' राजा ने मंत्री की ओर देखा. उसको विश्वाीस था कि मंत्री पुराना है. प्रजा का हित देखेगा. लेकिन मंत्री का तो स्वगर ही बदला हुआ था, ‘महाराज, मैं तो इस सिंहासन का भक्तन हूं. मेरा काम है, सिंहासन पर विराजमान महाराज के कामों को आसान करना. आपके पीछे युवराज इस ग़द्दी के स्वांमी थे. उनकी खुशी गांव की जग़ह पर बाग़ लगाने में थी, तो मेरा भी फर्ज था कि यह काम जल्दीा से जल्दी पूरा हो. सुंदर से सुंदर बाग़ लगाया जाए, जिससे महाराज के मन को शांति मिले, और उनका नाम हो.'

राजा को गुस्सा़ आया. उसका मन हुआ कि मंत्री को सलाखों के पीछे डाल दिया जाए. उसने सेनापति की ओर देखा. सेनापति ने ग़र्दन झुका ली. राजा समझ ग़या कि उसके पीछे युवराज ने सभी को अपने बस में कर दिया है. राजा ने युवराज को दरबार में बुलाने का आदेश दिया. युवराज आया. सत्तामद से चूर. झूमता हुआ.

‘बेटा, कम से कम मेरे लौटने तक तो इंतजार किया होता?' राजा ने मर्माहत हो युवराज से कहा.

‘आप ही के कारण गांव वालों का सिर सातवें आसमान पर है. मैंने उन्हें चार दिन पहले गांव छोड़ने का आदेश दिया था. पर वे नहीं माने. मैं समझ ग़या कि बिना बल-प्रयोग़ के काम नहीं सधेगा. इसलिए उस समय राजा होने के नाते मैंने वही किया जो मुझे ठीक लगा.' युवराज के स्व र में न प्रायश्चिंत्तबोध था, न करुणा का भाव. थी तो सिर्फ निष्ठुेरता ...मनमानी करने की आदत, जिद और गुमान. और था अहंकार, जो अज्ञानी के हाथ में अनायास बड़ी ताकत आ जाने से पैदा होता है.

‘तुम बहुत कठोर हो, मैंने तुम्हेंी युवराज बनाकर ग़लती की है.'

‘युवराज नहीं, सम्राट कहें. अब मैं ही यहां का राजा हूं. आप बूढ़े हो चुके हैं. भलाई इसी में है कि यह सिंहासन मुझे सौंपकर आप पूजा-पाठ में अपना मन लगाएं...' राजा ने नजर उठाकर देखा. उसको लगा कि सिवाय फरियादियों के दरबार में एक भी उसके पक्ष में नहीं है. वह खुद को अशक्त एवं मजबूर महसूस करने लगा. बेबसी में आंखों से आंसू बह निकले. धीरे-धीरे वह उठा और बोझिल कदमों से राजमहल की ओर चल दिया.

छोटे राजकुमार ने ग़द्दी संभाल ली.

राजा को राजमहल में नजरबंद कर लिया ग़या.

और बड़ा राजकुमार!

राजा ने जब छोटे बेटे को युवराज बनाने की घोषणा की थी, तो बड़े राजकुमार के

दोस्तों ने उसको खूब उकसाया था. कहा था कि छोटा राजकुमार उसके अधिकार पर कब्जाल कर रहा है, कि वह चाहे तो छोटे राजकुमार को रोक सकता है, उसके दोस्तै उसके साथ हैं, कि दरबार में अपनी पैठ भी कम नहीं. कि उसके एक इशारे पर हजारों लोग़ मर-मिटने को भी तैयार हैं.'

‘क्याइ सभी दरबारी अपने साथ हैं?' बड़े राजकुमार ने पूछा था.

‘सब तो नहीं सेनापति और मंत्री समेत कुछ को छोटे राजकुमार ने खरीद रखा है. पर घबराने की बात नहीं, उनसे भी निपटा जा सकता है.'

‘निपटना यानी सिंहासन के लिए संघर्ष, यदि हम उसमें नाकाम रहे तो?'

‘राजग़द्दी के लिए संघर्ष छिड़ेगा तो बात महाराज तक जाएगी ही. वे भले ही आपके छोटे भाई को युवराज बनाने की घोषणा कर चुके हों, मग़र शास्त्रों में बड़े बेटे को ग़द्दी देने का विधान है. जनता भी आपके साथ है. ऐसे में आप यदि संघर्ष करेंगे तो आपका हक मार पाना संभव नहीं होगा. कम से कम आधा राज्यद तो मिलेगा ही.'

‘राज्यष का बंटवारा, उसके बाद?'

‘उसके बाद आप प्रजा पर राज्यआ करेंगे.'

‘प्रजा पर राज!'

‘प्रजा अग़र मुझे राजा के रूप में चाहेगी तो खुद राजा बना देगी!'

‘कोई किसी को कुछ नहीं बनाता, यहां जो बनना है, वह अपने आप बनना पड़ता है, जैसे छोटे राजकुमार ने ग़द्दी हथिया ली.'

‘मुझे इस तरह राजा नहीं बनना. प्रजा को यदि जरूरत हुई, तब जरूर सोचूंगा.'

‘तब करते रहिए इंतजार. छोटे राजकुमार स्वा र्थी हैं, महाराज की तरह एक दिन आपको भी कैद कर लिया जाएगा.' दोस्तोंं ने कहा. उनकी आवाज में व्यं ग्य था. बड़ा राजकुमार मुस्क रा कर रह ग़या. उसकी मुस्काान को दोस्तोंे ने कायरता माना. धीरे-धीरे वे उससे दूर हटते ग़ए.

बड़ा राजकुमार कुछ दिन स्थिमति पर विचार करता रहा. धीरे-धीरे वहां उसका मन ऊबने लगा. एक दिन मां से अनुमति लेकर वह घर से निकल ग़या. खुले जंग़ल में घूमते, पेड़, पर्वत, लता-गुल्मोंअ, पक्षियों, जानवरों, नदी-तलैया, हवा-धूप से बतियाते हुए उसके दिन बीतने लगे.

उधर छोटे राजकुमार के सपने बहुत बड़े थे. ग़द्दी पर सवार होते ही उसकी महत्त्वाकांक्षाओं को पंख लग़ ग़ए. उसने आसपास के छोटे राज्यों पर हमला करके उनपर अधिकार जमा लिया. छोटी-छोटी जीतों से उसकी महत्त्वाकांक्षाएं और भी भड़क उठीं. अब उसका इरादा अपने से बड़े राज्या को हड़पने का था. वहां का राजा था नीतिसेन. बुद्धिमान, बहादुर और दिलेर. प्रजा का सच्चाछ हमदर्द, सुख-दुःख का ख्याल रखने वाला.

मंत्री और सेनापति दोनों ने समझाया. बलवंत की ताकत के बारे में बताया भी. मंत्री

ने सलाह दी कि उसपर हमला करना आत्माघाती हो सकता है. सेनापति ने चेताया कि सैनिकों में विद्रोह भरा है, उन्हें इस समय युद्ध में ढकेल देना उचित नहीं. मग़र छोटा राजकुमार नीतिसेन के राज्यव पर हमला करने की जिद ठाने रहा. उसके आदेश पर सैन्यद तैयारियां होने लगीं. उनकी सूचना नीतिसेन तक जा पहुंची. खबर मिलते ही उसने चढ़ाई का आदेश दे दिया. छोटा राजकुमार हड़बड़ा ग़या. घबराहट में उसने सेनापति को याद किया-

‘महाराज इतनी जल्दी युद्ध छिड़ा तो हमारी पराजय निश्चि त है?' सेनापति बौखलाया.

‘हार तो दरवाजे पर खड़ी है, यह बताइए कि उससे निपटने की हमारी तैयारियां कैसी हैं?' छोटे राजकुमार ने सवाल किया.

‘सेना थकी हुई है, अपने से बड़ी सेना के हमले की खबर से ही उसका मनोबल गिर चुका है.'

‘तुम्हाकरा मतलब है कि मैं हार मान लूं.' छोटा राजकुमार झल्लािया.

‘पराजय को सामने देख संधि कर लेना तो कूटनीति है.' मंत्री ने कहा.

‘इससे तो मेरी सारी इज्जहत मिट्टी में मिल जाएगी...' छोटा राजकुमार परेशान हो उठा।

‘नीतिसेन जैसे बहादुर योद्धा के साथ संधि होने से तो आपका मान ही बढ़ेगा.' मंत्री ने पैंतरा बदला.

‘वह हमारी संधि को मानेगा?'

‘हम उसके आगे अपने खजाने का द्वार खोल देंगे.' स्वारर्थी मंत्री ने सलाह दी.

मंत्री और सेनापति के कहने पर छोटा राजकुमार समर्पण के लिए तैयार हो ग़या. बात प्रजा तक पहुंची तो लोग़ तिलमिला उठे. उन्हेंक यह अपने मान-सम्मा न पर धब्बा लगा. लोग़ मुंह दबाकर छोटे राजकुमार की आलोचना करने लगे.

उन दिनों बड़ा राजकुमार जंग़ल में झोंपड़ी डालकर रह रहा था. उसकी दाढ़ी बढ़ आई थी. जंग़ल में रहते हुए उसको वन-वनस्पातियों की पहचान हो ग़ई. कुछ पुरानी शिक्षा काम आई. जड़ी-बूटी देकर वह लोगों का उपचार करने लगा. इससे आसपास के लोग़ उसको जानने लगे थे. जरूरत के समय उसके पास सलाह के लिए भी चले आते थे. छोटे राजकुमार के समर्पण की चर्चा आरंभ हुई तो कुछ लोग़ फिर उसके पास सलाह करने पहुंचे.

‘महाराज आप ही मदद करें, हमारे राजा तो अपना मान-सम्माेन गिरवी रखने की तैयारी कर ही चुके हैं.'

‘इस समय मैं क्याद कर सकता हूं. नीतिसेन तो सीमा पर आ ही पहुंचा है. अब या तो युद्ध होगा; अथवा समर्पण.'

‘जब राजा और सेनापति युद्ध से पहले ही हार मान चुके हों, सेना का मनोबल गिरा

हुआ हो तो युद्ध की कोई संभावना ही नहीं बचती. इस स्थिसति में तो केवल समर्पण ही संभव है.'

‘राजा और सेनापति ने ही तो हार मानी है, पर राज्य तो प्रजा से होता है. क्या प्रजा भी हार मान चुकी है?' बड़े राजकुमार ने पूछा. यह सुनते ही वहां मौजूद लोगों के बीच सन्नाोटा व्या प ग़या.

‘महाराज प्रजा तो प्रजा है, उसका काम लड़ना थोड़े ही है.' मौजूद लोगों में से एक ने कहा.

‘ठीक कहते हो. प्रजा का काम लड़ना नहीं है. लड़ना सेना और सेनापति का काम है. लेकिन वे तो पहले ही हार मान चुके हैं, ऐसे में प्रजा क्याक हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहेगी? इंतजार करेगी कि कोई आए और उसके मान-सम्माुन की रक्षा करे, उसको इस संकट से बचाए. अग़र समय रहते कोई बचाने के लिए नहीं आया तो क्याम ग़र्दन झुकाकर चंद कायरों के फैसले को मान लेगी? अपने स्वासभिमान, अपने मान-सम्माान को यूं ही मिट जाने देगी? यदि नहीं तो बताएं कि प्रजा का ऐसे में क्याउ कर्तव्या है?' बड़े राजकुमार ने सवाल उछाला. लोग़ कानाफूसी करने लगे. अचानक उनके चेहरे पर तेज व्याोप ग़या.

‘हम समझ ग़ए महाराज. हमारी ग़लती यह है कि हम हमेशा दूसरों की ओर देखते आए हैं. अब हमें हमारी भूल समझ में आ ग़ई है. बलवंत की सेना चाहे जितनी बड़ी हो. हम उसको राज्यर के मान-सम्मामन से समझौता नहीं करने देंगे. मर जाएंगे, पर मान नहीं जाने देंगे, लेकिन...'

‘लेकिन क्याा?' बड़े राजकुमार ने कहा.

‘महाराज युद्ध हो या आंदोलन. उसके लिए कोई ऐसा तो चाहिए ही जो सबसे आगे रहकर नेतृत्वे की बाग़डोर संभाल सके.'

‘उसकी तुम फिक्र मत करो. इरादे यदि नेक और दिलों में सच्चा जोश हो तो जुलूस में उपस्थिबत हर व्यरक्तिम नेता होता है.'

अग़ले दिन नीतिसेन ने देखा कि सामने से हजारों की तादाद में भीड़ चली आ रही है.

‘महाराज हमें तो बताया ग़या था कि वह समर्पण की तैयारी कर रहा है, यहां तो बड़े हमले की तैयारी लग़ती है.' साथ खड़े सेनापति ने नीतिसेन से कहा.

‘लग़ता है कि उसकी मौत ही उसको मैदान की ओर खींचकर ला रही है. तुम सेना को तैयार रहने का हुक्मी दे दो.' नीतिसेन ने आदेश सुनाया। वह स्व यं भी युद्ध की तैयारियों में जुट ग़या.

उस समय तक प्रजा सामने आ पहुंची थी. नीतिसेन ने देखा तो दंग़ रह ग़या. भीड़ में स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चेा, बीमार-अपाहिज सब थे. कुछ के हाथ में लाठियां थीं, कुछ के हाथ में डंडे. कुछ के हाथ में दरांत, चाकू, कुछ अपाहिज ऐसे भी थे, जो बैशाखी के सहारे अपने

शरीर को संभालने का प्रयास कर रहे थे.

‘यह सब क्याा है? क्याी तुम्हाुरे राजा ने तुम्हें लड़ने भेजा है?' बलवंत ने जनसमूह का नेतृत्वि कर रहे युवक से पूछा से पूछा, जो स्वकयं बैशाखी के सहारे घिसटता हुआ वहां तक पहुंचा था.

‘हमें किसी ने नहीं भेजा. अपने राज्यन की मान-मर्यादा के लिए हम स्वायं लड़ने आए हैं. हम जान देंगे पर अपनी आजादी पर आंच नहीं आने देंगे.'

‘अग़र ऐसा है तो अपने राजा को समझाया होता, हम तो अपने राज्यि में शांतिपूर्वक रह रहे थे. वही हमारे विरुद्ध षड्‌यंत्र रच रहा था.'

‘तो आप राजा से निपटें. किंतु इस राज्यय को अपने राज्यत में मिलाने का सपना छोड़ दें.'

‘राज्य क्याे राजा से अलग़ होता है?'

‘राज्य का मान-सम्माेन सबसे ऊपर होता है. उसके लिए राजाओं की बलि चढ़ाई जा सकती है.'

‘महाराज! आप यदि आदेश दें तो हमारे सैनिक इन भिखमंगों को पलक झपकते धूल चटा दें.' नीतिसेन के सेनापति ने कहा.

‘नहीं, नीतिसेन इतना मूर्ख नहीं है, जो अपनी कीर्ति को इतनी आसानी से मिट जाने दे. मेरी सेना इन निहत्थेर लोगों से लड़कर इन्हेंी मार तो गिराएगी, मग़र इतिहास इन्हेंि ही नायक मानेगा. ये सब अमर हो जाएंगे, जबकि मैं हमेशा ही खलनायक माना जाऊंगा. इसलिए अपने सैनिकों से कहो कि वे हथियार नीचे कर लें. हमारी सेना निहत्थों पर वार नहीं करेगी.'

‘परंतु यहां का राजा जो हमारे विरुद्ध षड्‌यंत्र रच रहा था, क्याी उसको यूं ही छोड़ देंगे?'

‘हरगिज नहीं! तुम अपने आठ-दस सैनिकों को लेकर जाओ और राजा को बंदी बना लाओ?'

‘सिर्फ, आठ-दस!'

‘वे भी ज्या दा हैं, देखना तलवार उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.'

यही हुआ भी. छोटा राजकुमार गिरफ्ताठर कर लिया ग़या. नीतिसेन अपनी सेना सहित वापस लौट ग़या. छोटे राजकुमार के गिरफ्ताार होते ही प्रजा ने बुजुर्ग राजा को आजाद करा लिया. तब राजा को अपने बड़े बेटे की सुध आई. उसने अपने सैनिक बड़े बेटे की खोज में चारों तरफ फैला दिए. कुछ ही दिनों में लोगों ने साधु भेष में एक युवक को दरबार में प्रवेश करते देखा. कुछ ने उसे देखते ही पहचान लिया.

‘अरे, ये तो वही महाराज हैं, इन्हीं की प्रेरणा से तो हम अपने राज्य की इज्जंत बचाने में सफल हुए हैं.'

राजा को असलियत मालूम हुई तो बहुत प्रसन्नट हुआ. अपने व्येवहार पर खेद प्रकट करते हुए बोला-‘तुम्हाकरी मां ही ठीक कहती थी. मैं ग़लती पर था. अब तुम्हींन इस राज्य की बाग़डोर संभालो.'

‘आप अब भी ग़लती पर हैं महाराज. राज्य का मान-सम्माहन प्रजा के कारण सुरक्षित है. इसीलिए उचित होगा कि राज्यप की व्य.वस्था का भार प्रजा को ही सौंप दिया जाए.'

‘हमारे पूर्वज यहां सैकड़ों वर्ष से राज्यभ करते आए हैं.' राजा व्य थित था.

‘राजा वह जो राज्यक और प्रजा के मान-सम्मापन की रक्षा कर सके. उसके लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़े तो भी पीछे न रहे. इस राज्य‍ पर हमारा अधिकार उसी समय खत्मक हो चुका था, जब छोटे राजकुमार ने इसे नीतिसेन को सौंपने का निर्णय लिया था.'

‘क्याे परिवार के किसी एक सदस्यप के अपराध का दंड उसके पूरे परिवार को देना न्यााय है?'

‘एक राजा की ग़लती का दंड उसकी पीढ़ियों को भोग़ना ही पड़ता है.' बड़े राजकुमार ने कहा.

राजा ने सोचा. अचानक उसके चेहरे पर तेज छा ग़या, ‘शायद तुम्हीं ठीक कहते हो. इस राज्य का मान-सम्माुन प्रजा ने बचाया है. इसलिए अपना राजा चुनने का अधिकार प्रजा को ही है. लेकिन जब तक प्रजा अपना नया राजा नहीं चुन लेती, तब तक तो तुम इस राजग़द्दी को संभाल लो. मरने से पहले कम से कम मैं तो यह देख ही लूं कि बड़ा बेटा होने के नाते मैंने तुम्हेंर तुम्हाइरा अधिकार सौंपने में ग़लती नहीं की.'

बड़े राजकुमार ने बात मान ली. अग़ले ही दिन से राज्यर में नए राजा के चुनाव की तैयारियां होने लगीं.

कहानी लंबी थी. पर टोपीलाल बिना पलक झपके सुनता ग़या. कहानी पूूरी होते ही मां ने टोपीलाल की आंखों में झांका.

‘अन्याीय हड़बड़ी में रहता है, आपाधापी में वह ग़लती कर बैठता है; इसलिए कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता. जबकि न्यारय की यात्रा लंबी और जीत स्थाायी होती है. क्योंा यही कहना चाहती हो ना मां?' टोपीलाल ने मां की आंखों मेंं झांकते हुए कहा.

‘तू ठीक समझा. अब तू उस खेल का मतलब भी आसानी से समझ जाएगा?' मां ने कहा और टोपीलाल को अपने सीने से लगा लिया. अब नींद के आगोश में जाने की बारी थी.

उस रात टोपीलाल को ग़हरी नींद आई और सुहावने सपने भी.

अग़ले दिन सेे मां उसको सांप-सीढ़ी का खेल सिखाने लगी. पासे और गोटियों का काम

ईंट और पत्थसर की टिकुलियों से चलाया ग़या. काम के दौरान ही वह ईंट के एक छोटे टुकड़े को घिस लाई थी. उसकी लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई एक समान थीं. फिर कील से उसके हर पहलू पर एक से छह तक की गिनतियां लिख दी ग़ईं. टोपीलाल कौतूहल से मां को यह सब करते हुए देखता रहा.

‘मां, अपने बचपन में क्याप तुम भी ऐसे ही खेल खेला करती थीं?'

‘कभी-कभी, पर हमारे जमाने में ये ग़त्ता-वत्ता नहीं था. हम तो बस आंग़न में खड़िया या गेरू से खाने बनाकर खेलने बैठ जाते थे. गोटियां और पासे तब भी मैं ही बनाया करती थी.'

टोपीलाल को जो सिखाया ग़या था, वह उसने ध्यायन से ग्रहण किया. मां के काम पर चले जाने के बाद वह अकेला ही खेलता रहा. अपने दाएं और बाएं हाथ को उसने अलग़-अलग़ टीम बना दिया. बारी-बारी से दोनों हाथों से चाल चलता रहा. अपने इस सोच पर उसको गुमान भी हुआ. एक-दो दिनों में वह खेल में पारंग़त हो ग़या. अग़ले कुछ दिनों में उसने बाकी बच्चोंा को भी उस खेल में निपुण कर दिया. इससे बच्चोंए को नया खेल मिल ग़या. वे जमीन पर रेखाएं खींचकर काम चलाने लगे.
 
इस बीच एक बात टोपीलाल के दिमाग़ में लगातार करकती रही. खेल के उत्सांह नेे भी उसको मरने नहीं दिया. जब भी वह गोटियों और ग़त्त्ो पर बने चित्रों को देखता, उसको मां का कहा याद आ जाता. खेल सिखाने से पहले मां ने कहा था कि यह प्रकृति का खेल है. इसकी गोटियां कुछ हो सकती हैं. अपनी बात को स्प ष्ट करने के लिए मां ने एक कहानी भी सुनाई थी. टोपीलाल जानता था मां कोई भी बात यूं ही तो कहती नहीं.

‘मुझे मां से उसी दिन इस खेल का रहस्य जान लेना चाहिए था.' यह सोचते ही टोपीलाल के मन में ग्लापनिबोध उमड़ने लग़ता.

खेल जितना ही जरूरी है, खेल की भावना को समझना. उसके हर पहलू की बारीकी से जांच करना. यह सोचते हुए टोपीलाल ने मां की बातों की ग़हराई तक पहुंचने का भरसक प्रयास किया. मग़र बेकार. उस दिन टोपीलाल ने खेल पूरा किया तो उसका इरादा पक्का था.

शाम को जैसे ही मां घर के काम से निपटी, टोपीलाल उसके पास पहुंच ग़या.

‘मां, यह प्रकृति क्याट होती है?' उसने बात छेड़ी.

‘क्‍या तू सचमुच इससे अनजान है?'

‘जानता तो हूं...' टोपीलाल सकुचाया. जैसे उसकी चोरी पकड़ी ग़ई हो, ‘लेकिन प्रकृति का खेल मेरी समझ से बाहर है.'

मां मुस्कारा दी, ‘टोपीलाल, तू मेरे सोच से भी ज्यासदा चतुर है रे...ठीक है, खाना खा ले. आज सोने से पहले हम इस बारे बातचीत करेंगे...वह ग़त्ता तो है, न? उसको साथ रखना.'

ज्ञान आत्माच की जरूरत है. मन में सीखने की सच्ची ललक हो तो मस्तिाष्क़ उल्ला स से भर जाता है. मां के साथ सोने को चला तो टोपीलाल का मन पर उमंग़ सवार थी. दिये की मद्धिम रोशनी, सरसों के तेल की हल्कीत-हल्कीथ धूम्र-गंध, झींगुरों और तिलचट्‌टों की बेसुरी आवाज के बीच मां ने टोपीलाल को अपने सीने से सटा लिया-

‘अब तू कह, क्याा जानना चाहता है?' मां ने वात्सबल्यक उंडेला.

‘वही, जो मेरी मां चाहती है कि मुझे जानना चाहिए.'

‘हूं, तो सुन! हम सबकी जिंदगियां, इस संसार में जो कुछ भी घटता है या घटने वाला है, वह सब प्रकृति के सनातन खेल का हिस्सा है. प्रकृति विराट है. उसको समझने के लिए हमारी बुद्धि बहुत छोटी है. और जब हम उसको समझ नहीं पाते तो उसे तरह-तरह के नाम देने लग़ते हैं. अपनी समझ के अनुसार उसकी अलग़-अलग़ व्या ख्या करते हैं. कोई उसे किस्मसत कहता है, कोई भाग्यर-रेख. कोई कपाल-गाथा. पर मैं इसको खेल कहती हूं. कुदरत का खेल. सांप-सीढ़ी का खेल भी उसी की तरह है, बेटा.'

टोपीलाल ने अपना सारा ध्याान मां के शब्दोंभ पर एकाग्र कर लिया था. ताकि उसका एक-एक शब्दस, शब्दक का प्रत्ये क भाव, भाव में अंतर्निहित उसका स्वा भाविक स्फु रण, स्वकर का उतार-चढ़ाव सीधे दिमाग़ में उतरता चला जाए. पर मां की जिह्‌वा पर तो उस समय जैसे सरस्व ती विद्यमान थी. उसकी बातें लगातार जटिल होती जा रही थीं-

‘मैं कुछ समझा नहीं मां?' बात जब सिर के ऊपर से जाने लगी तो टोपीलाल ने टोकना ही उचित समझा.

‘बहुत आसान-सी बात है बेटा. हम जैसा करते हैं, वही पाते हैं. आम का पेड़ लगाओ तो आम का फल और उसकी शीतल छाया मिलती है. बबूल बोने से कांटे...और धूप. लूडो के खेल में जो पासा है, उसकी एक-एक चाल मानो हमारे कर्तव्यत हैं. हमारे अच्छे -बुरे संकल्पन. अच्छे कर्म हमें सीढ़ी बनकर सहारा देते हैं. वे हमें सीधे ऊपर ले जाते हैं. लक्ष्यक की ओर, जिसको इस खेल में घर बताया ग़या है.

दूसरी ओर बुरे कर्म हमें पीछे की ओर खींचते हैं, वे हमें नाग़ की तरह डंसते हैं, नाग़पाश बनकर हमारे कदमों की बेड़ी बन जाते हैं. वे हमारे विकास को अवरुद्ध कर, पतन का कारण बनते हैं. हमें आसमान से धरती पर ला पटकते हैं. हमारी एक चाल, एक ग़लत कदम हमें वापस उसी जग़ह पर ला सकता है, जहां से हमने अपनी यात्रा आरंभ की थी. यानी एक ग़लती पर उस समय तक का किया-धरा सब बराबर.'

‘पर मां पासे पर तो एक से छह तक अंक लिखे होते हैं. उनमें से कौन-सा अंक कब आता है, यह तो संयोग़ पर निर्भर है. इसमें हमारा कौशल, अच्छाि या बुरा कहां है?'

‘ठीक कहते हो तुम? पासे के एक से छह अंक में से किसी एक का आना, संयोग़ पर निर्भर है. वह अंक कहां ले जाएगा, हमें उठाएगा कि गिराएगा; यानी उसका फल भी हमारे हाथ में नहीं होता. ठीक ऐसे ही जैसे अपने किसी कार्य के परिणाम के बारे में हम

ठीक-ठीक कुछ भी नहीं बता पाते...'

‘तब तो यह जुआ ही हुआ, मां...और जुआ खेलना तो बुरी बात है, क्योंं?' टोपीलाल ने बीच में टोका.

‘जुए जैसा ही समझो. पर यह एकदम जुआ भी नहीं है. संभावनाओं के बीच कहीं न कहीं ठहराव, कुछ न कुछ पक्काुपन भी होता है. यह पक्कादपन यानी सुनिश्चिातता हमारे अनुभव और विवेक पर निर्भर करती है. लगातार अभ्याुस द्वारा इसे बढ़ाया भी जा सकता है. अपनी बुद्धि और अनुभव के दम पर आदमी पहले ही अनुमान लगा सकता है, कि उसके किसी काम का क्याा फल मिलने वाला है.'

‘सीढ़ियां और सांप, याने पुण्यक और पाप?'

‘हां, इन्हें आसान भाषा में पुण्यप और पाप भी कह सकते हैं. असल में ये हमारे विवेक और अज्ञान के प्रतीक हैं.'

‘मां तुमने यह सब कहां से सीखा है?' टोपीलाल का मन विस्मरय से भरा था.

‘आदमी अग़र अपना दिमाग़ खुला रखे तो ज्ञान उसके आसपास ही बिखरा होता है? जरूरत तो सही वक्तप पर सर्वोत्तम मोती चुनने और सहेजने की है.' मां ने बताया.

टोपीलाल का रोम-रोम प्रफुल्लि त हो उठा। भावावेश में उसने अपनी बांहें मां के ग़ले में डाल दीं. वह दिन-भर की थकी हुई थी. टोपीलाल के मन में और भी कई सवाल थे. लेकिन उसे याद आया कि असंयमी होना उचित नहीं. एक साथ ज्या दा जानने के चक्कनर में मां ने अभी-अभी जो बताया है, उसको भूल सकता है.

टोपीलाल मां के बताए एक-एक शब्दर को आत्मासात कर लेना चाहता था. इसलिए नींद का बहाना करने लगा. मां समझ ग़ई. बराबर की चारपाई पर टोपीलाल के पिता की सांसें बता रही थीं कि वे ग़हरी नींद में हैं. मां ने हाथ बढ़ाकर दीपक बुझा दिया.

ग़हराते अंधेरे के बीच दोनों नींद की प्रतीक्षा करने लगे. पर नींद तो खुद पलकों के दरवाजे से झांक रही थी. टोपीलाल को नींद की आतुरता भली लगी. उसने खुद को उसके हवाले कर दिया.

अग़ले दिन टोपीलाल जगा तो उसके मन में उत्सातह था. उमंग़ थी बीते दिन मां से जो सीखा था, उसको सभी बच्चोंल को बता देने की. लेकिन उसको दुःख था कि उसके आसपास जो बच्चेम रहते हैं, वे सभी छोटे-छोटे हैं. मां की बड़ी-बड़ी बातें उनके दिमाग़ में नहीं आ पाएंगी. फिर किसको बताया जाए? यह एक ऐसी समस्या- थी, जिसका उसके पास कोई समाधान नहीं था.

टोपीलाल यदि चाहता तो अपने टोले के बड़े आदमियों को भी लूडो के खेल के मायने समझा सकता था. वे गंभीरता से सुनते भी. पर वह जानता था कि काम से छूटने

के बाद वे सभी बहुत थके होते हैं. ऐसे में उनके आगे ज्ञान की बातें बघारना ग़लत होगा. हो सकता है, उन्हेंस मालूम भी हो. जैसे मां ने अपने अनुभव से जाना है, वैसे ही वे भी जानते हों. जो मां जानती है, संभवतः उससे भी ज्या‍दा.

‘ऊंह! मां से ज्याेदा तो वे हरगिज नहीं जान सकते.' टोपीलाल ने अपनी ही बात को काटा, ‘उनका अनुभव मां से बड़ा हो सकता है. पर अनुभव को सहेजने में मेरी मां किसी से भी आगे है. ज्ञान के अनंत महासाग़र से सही मोती चुनना और सहेजना, मां ने यूं तो नहीं कहा था.' सोचते-सोचते टोपीलाल को अपनी मां पर ग़र्व होने लगा.

उन दिनों टोपीलाल एक और परिवर्तन अपने बीच अनुभव कर रहा था. उसको लग़ता कि इन दिनों उसका दिमाग़ कुछ ज्यारदा ही उड़ने लगा है. बड़ी अजीब-अजीब-सी बातें सोचता है. कई बार बे सिर-पैर की भी. कभी लग़ता है कि वह आसमान पर उड़ रहा है. पक्षियों की तरह. पंख फैलाए. कभी विचार आता कि बादलों के नीले मैदान में चांद को फुटबाल बनाकर खेल रहा हो.

कभी-कभी सोचता कि दुश्मपन देश ने उसके शहर पर हमला कर दिया है. उसके विमान बम बरसाने के लिए शहर की ओर बढ़े चले आ रहे हैं. शहरवासी परेशान हैं. चीख-चिल्लाक रहे हैं. तब वह अपनी गुलेल निकालकर निशाना साधता है.

‘भड़ाक!' गुलेल से छूटा मामूली कंचा, एक विमान को धराशायी कर देता है. फिर वह दूसरा कंचा गुलेल पर चढ़ाता है और...

‘धड़ाम!' दूसरा विमान भी धरती पर गिरकर धूं-धूं जलने लग़ता है. दुश्महन हैरान है. वह हमला तेज कर देता है. आसमान में दर्जनों विमान एक साथ नजर आते हैं. सांय-सांय...शहर की ओर बढ़ते हुए!

‘जल्दी से बड़े कंचों का इंतजाम करो...!' वह बच्चोंय से कहता है.

‘बड़े कंचे तो मलोहरा की दुकान पर मिलेंगे?' बच्चे घबरा जाते हैं.

‘तो जाकर मलोहरा से मांगो...नहीं दे तो लूट लो.' लूटने की जरूरत नहीं पड़ती. मलोहरा कंचों की पूरी थैली लिए खुद हाजिर है. उसकी बहादुरी के आगे नतमस्त क-

‘ये लो, देश की खातिर पूरी दुकान हाजिर है...इन गुलेल पर चढ़ाकर दुश्महन के इन कनकौओं को धराशायी कर दो, हरामखोर जंगी सेना से टकराने का ख्बा.ब पाले हुए हैं।' अनपढ़ मलोहरा अपने देश के जहाजों को जंगी सेना और दुश्म,न देश के जहाजों को कनकौए कहता है.

वह जोश से भरा हुआ बड़े कंचे को गुलेल पर साधता है. कंचा हवा में सरसराता हुआ आगे बढ़ता है. उसकी तेज रफ्ताशर से आंधियां उठने लग़ती हैं. दुश्मंन के तीन विमान उस आंधी में फंसकर नीचे गिर जाते हैं. बिजली की-सी तेज रफ्ता र से कंचा एक विमान से टकराता है. वह हवा में ही टुकड़े-टुकड़े बिखर जाता है. पहले विमान से टकराने के बाद वही कंचा तुरंत पलटता है और दूसरे विमान को धूल चटा देता है. एक ही वार में

अपने पांच-पांच विमानों को जमीन पर लोटता देख दुश्म न घबरा जाता है. वह अपने विमानों को वापस बुलाकर जमीनी हमला शुरू कर देता है.

अब उसके दर्जनों टैंक देश को तबाह करने के लिए सीमा पर चढ़े चले आ रहे हैं. उनपर लगी तोपें दनदना रही हैं. तब वह उछलता है और दुश्मंन की तोपों से छूटे गोलों को फटने से पहले ही हवा में पकड़कर वापस दुश्म न-देश की तरफ फेंक देता है, एक के बाद एक...दुश्मफन के गोले उसी की धरती को तबाह कर रहे हैं. उसके पसीने छूट रहे हैं, वह हैरान है कि उसके गोले उसी को हताहत कर रहे हैं.

टैंक मिट्‌टी के खिलौनों की तरह टूटते जा रहे हैं. दुश्मैन की कमर टूट चुकी है. उसके सैनिकों के हौसले पस्तह हैं. वे हथियार डाल रहे हैं. लोगों के चेहरों पर चमक है. प्रकृति के कण-कण से विजय का उल्लाैस रिस रहा है. कंजूस मलोहरा को अपने कंचों के जाने का ग़म नहीं. वह खुश है. मग्नण होकर नांच रहा है.

अग़ले ही पल वह देखता है कि देश के राष्ट्रेपति उसको सम्मा.नित कर रहे हैं. शहर वाले उसको अपने कंधों पर उठाए हुए हैं.

एक बार उसने और भी विचित्र दिवास्व प्न‍ देखा. उसने देखा कि वसंत की शुरुआत में वह भरे-पूरे बाग़ में है. तितलियां और पशु-पक्षी उससे बतिया रहे हैं. उनकी बोली वह आसानी से समझ सकता है. तभी एक हरियल तोता उसके कंधे पर आकर बैठ जाता है-

‘तोपीलाल-तोपीलाल भूख लगी.' तोता कहता है.

‘मेरे साथ घर चलो. मां कल ही बाजार से हरी मिचेंर् लाई है, खूब खाना.'

‘मिर्च नहीं...आज तो नन्हीह अमियां खाने का मन है भइया!'

‘अभी से, अमियां तो कम से कम दो महीने बाद मिलेंगी. क्योंा दोस्तोर?' टोपीलाल सामने खड़े आम के वृक्ष से प्रश्नि करता है. आम का बूढ़ा पेड़ ग़र्दन हिलाता है-

‘मैं तो बूढ़ा हो चला हूं. दस-पांच दिन ज्यािदा भी लग़ सकते हैं फल आने में. जो जवान पेड़ हैं, वे तो दो महीने में फलने ही लगेंगे.'

‘पर मुझे तो आज ही खाने का मन है...कुछ करो न!' तोता खुशामद पर उतर आया. उसको रहम आने लग़ता है. वह मुस्कलराते हुए अपनी जेब में हाथ डालकर बांसुरी निकालता है. बांसुरी देख पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी के चेहरे खिल उठते हैं. हवा ठहर जाती है. तितलियां सांस रोककर बैठ जाती हैं.

अग़ले ही पल वह अपनी बांसुरी में फूंक मारता है. जैसे-जैसे बांसुरी की धुन आगे बढ़ती है, पेड़-पौधों का कायाकल्प होने लग़ता है. लताएं फूलों से लद जाती हैं. आम की डालियों पर बौर झलकने लग़ता है. अमराई-गंध जड़-चेतन को महकाने लग़ती है. न जाने कहां से भंवरे और तितलियां आकर उनपर मंडराने लग़ते हैं. उसके अग़ले ही पल और भी बड़ा चमत्कागर होता है. बौर के बीच नन्हीर-नन्हीं अमियां नजर आने लग़ती हैं.

‘धन्य वाद तोपीलाल भइया! मैं जानता था कि एक सिर्फ तुम्हीं हो जो यह कर सकते

हो।' कहता हुआ तोता फुर्र से उड़कर आम की डाल पर जा बैठता है. और चुनकर हरी-हरी अमियां खाने लग़ता है.

ऐसी ही न जाने कितनी कल्परनाएं, कितने सपने, कितनी उड़ानें टोपीलाल ने भरी हैं. अकेले-अकेले. उस समय वह भूख-प्या स सब भूल जाता है. यहां तक कि आपा भी बिसरा देता है।

एक बार की अनोखी बात. वह ऐसे ही सड़क पर घूम रहा था. उन दिनों उनका दल एक बहुमंजिला इमारत के निर्माण में लगा था. मालिक जल्दी कर रहा था. इसलिए मां और बापू जल्दीे ही काम पर निकल जाते. टोपीलाल घर में अकेला रह जाता. उस दिन घर में मन नहीं लगा तो वह सड़क पर आ ग़या. सड़क पर वाहन आ-जा रहे थे. अपनी ही धुन में मस्त‍. टोपीलाल सड़क के किनारे बने फुटपाथ पर आगे बढ़ने लगा. यकायक उसके दिमाग़ ने उड़ान भरी. कल्प‍ना ने कमान संभाली...आंखें बिंब सजाने लगीं.

टोपीलाल को लगा कि वह स्व‍यं एक साइकिल पर है, मग़र उसकी साइकिल कोई ऐसी-वैसी साइकिल नहीं है. जरूरत पड़ने पर वह हवा में उड़ लेती है. पानी पर फर्राटे भर सकती है. उस समय वह अपनी साइकिल पर धीरे-धीरे चला जा रहा था. अचानक शोर मचा. साइकिल के आगे चल रहा ट्रक चरमराया. साइकिल को भी बे्रक लगेे. अचानक वह हवा में उड़ने लगी. पलक झपकते ही साइकिल ट्रक के आगे थी. ट्रक के पीछे आ रही कार का चालक टोपीलाल की तरह फुर्तीला नहीं था. उसकी कार ट्रक से टकराई और उसका आगे का हिस्साे पिचक ग़या. यह देख टोपीलाल के चेहरे पर मुस्काउन तैर ग़ई...

‘ऐ, आंखें बंद करके चल रहा है क्याै?' किसी ने टोपीलाल को टोका तो उसका दिवास्वेप्नग भंग़ हुआ. उसके सामने एक लड़का बैठा हुआ था. जूतों पर पॉलिश करने के लिए छोटी-सी दुकान सजाए. टोपीलाल को अपनी भूल का एहसास हुआ. वह एक ओर हट ग़या.

‘यहां सभी मेहनत करके खाते हैं. और तो और मेरी मां भी काम पर जाती है. बाकी औरतों की तरह वह सिर्फ घर नहीं संभालती. इसलिए मुझे भी कुछ न कुछ करना ही चाहिए.' उस बच्चे. की ओर देखते हुए टोपीलाल ने सोचा. मग़र अग़ले ही पल उसको लगा कि काम करने से तो उसकी आजादी छिन जाएगी. फिर ये सुहावने दिवास्वभप्नग...यह आजादी...!

‘काम के लिए तो अभी मैं बहुत छोटा हूं. फिर मुझे पढ़ना भी तो है...!' टोपीलाल ने मन को समझाया और कुछ ही पहले दिमाग़ में आए विचार को बाहर कर दिया. पर क्याभ वह इस विचार को सचमुच बाहर कर पाया था।

मनुष्यि का दिमाग़ एक रहस्यामय अजायबघर की तरह होता है. जिसमें कुछ चीजें करीने

से सजी होती हैं तो ढेर सारी यत्र-तत्र बिखरी रहती हैं. यहां तक कि उसके संचालक को भी उनके बारे में ठीक से पता नहीं होता.

उस दिन वह बाकी बच्चों् के साथ खेल में मग्नय था कि सड़क के उस पार से एक लड़की को जाते देखा. हाथों में छोटी-सी पोटली उठाए वह बहुत तेजी से बढ़ती जा रही थी, मानो किसी काम को निकली हो और उसमें बहुत देर हो चुकी हो.

‘आज से पहले तो इसे कभी नहीं देखा.' टोपीलाल ने मन ही मन सोचा. उसी समय उसे सड़क के उस पार से चीखने की आवाज सुनाई दी. टोपीलाल ने चौंककर उसी ओर देखा. एक कुत्ता लड़की के हाथ से पोटली छीनकर भागा जा रहा था. टोपीलाल खेल छोड़कर फौरन उठ खड़ा हुआ. हाथ में पत्थार उठाकर वह तेजी से दौड़ा. सड़क पर वाहनों की भरमार थी. उसने पत्थरर से निशाना साधा. कुत्ता पोटली छोड़कर भाग़ खड़ा हुआ. टोपीलाल पोटली लेकर लड़की के पास पहुंचा. वह रोए जा रही थी. उसने लड़की को समझाने का प्रयास किया.

‘मां ठीक ही कहती है. मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर सकती.' लड़की सुबके जा रही थी.

‘कौन हो तुम, कहां रहती हो?' टोपीलाल ने सवाल किया. जवाब देने के बजाय लड़की ने एक ओर उंग़ली से इशारा कर दिया.

‘खाना किसके लिए ले जा रही थीं?'

‘मां के लिए, वहां सड़क किनारे गुमटी लगाती है.' लड़की ने एक ओर इशारा किया, फिर बताती चली ग़ई, ‘मां रोज सवेरे रोटी बनाकर ले आती थी. पर दिन होते-होते रोटियां अकड़ जाती हैं. उसके कमजोर दांतों से कटती ही नहीं. इसलिए मैंने सोचा कि मां को ग़र्म रोटियां बनाकर पहुंचा दिया करूंगी. मां कहती थी कि यह मुझसे नहीं होगा. आखिर वही हुआ जो मां ने कहा था. मैं कोई काम तरीके से कर ही नहीं सकती.'

लड़की फिर सुबकने लगी.

‘तुम्हा रे पिता जी क्याा करते हैं?'

‘नहीं हैं!'

‘क्या , मर ग़ए?' टोपीलाल के मुंह से निकला. परंतु अपनी ग़लती का एहसास उसको जल्दीह ही हो ग़या. ग्लाकनिबोध में उसने अपनी ग़र्दन झुका ली.

‘नहीं, मां को छोड़कर कहीं दूर चले ग़ए हैं.' लड़की का स्वहर सपाट था, जिसने टोपीलाल को विस्म य में डाल दिया.

‘तुम्हेंं भी छोड़ ग़ए?'

‘हां, मैं भी मां की तरह काली जो हूं '

‘ओह!' मारे दुःख के टोपीलाल का कलेजा फटा जा रहा था. आगे भी शब्दव मुंह से निकाल पाना मुश्किनल हो ग़या.

‘उठो, तुम्हाररी मां को भूख लगी होगी. घर से कुछ रोटियां ले लेते हैं.' रोटियों का नाम सुनकर लड़की के पैरों की जान वापस आ ग़ई. वापस आकर टोपीलाल अपनी मां के पास पहुंचा. उससे कुछ बातें कीं. फिर वापस आकर रोटियां लीं. चूल्हेु में आग़ ग़र्मा रही थी. जल्दीं-जल्दीा उन्हेंल ग़र्म किया. लड़की उसकी ओर चुपचाप देखती रही.

‘अरे! इतनी देर हो ग़ई. मैंने तुम्हागरा नाम तो पूछा ही नहीं.' दुबारा सड़क पर आते ही टोपीलाल ने लड़की से पूछा.

‘निराली, यही नाम है मेरा. लेकिन सिवाय मां के सब मुझे काली ही कहते हैं. मेरे रंग़ को देखते हुए उन्हें़ यही नाम ठीक लग़ता है.' लड़की ने बताया.
 
‘तुम सचमुच निराली हो. आज के बाद मैं तुम्हें इसी नाम से पुकारूंगा. और सुनो, मेरी मां बताया करती है आदमी अपनी ग़लतियों से भी सीखता है. वह कभी ग़लत नहीं कहती. एक दिन तो यह बात सचमुच सच भी हो ग़ई.' टोपीलाल ने कहा. लड़की को खुश रखने के लिए वह उसको बातों में उलझाए रखना चाहता था.

‘कैसे?' लड़की जो कुछ देर पहले तक अपने आंसू रोक नहीं पा रही थी, अब उसकी बातों का आनंद लेने लगी थी. टोपीलाल तो यही चाहता था. वह आगे बताने लगा-

‘अभी कुछ दिन पहले की बात है? मां और पिताजी तो काम पर चले जाते हैं. उनके बाद घर की सफाई का छोटा-मोटा काम मुझी को करना पड़ता है. उस दिन मैं झाड़ू लगा रहा था. खेल का समय हो चुका था. बच्चे घर के सामने इंतजार कर रहे थे. कुछ ऊबकर घर लौट चुके थे. सभी को जल्दीख थी. मैं भी जल्दीे-जल्दीत काम समेट लेना चाहता था.

सहसा पड़ोस से किसी के चीखने की आवाज आई. आवाज साफ नहीं थी. मुझे भी खेल को देर हो रही थी, इसलिए मैं अपने काम में लगा रहा. कुछ देर बाद ही बराबर के घर से रोने की आवाज आने लगी. मैंने लोगों को उस ओर दौड़कर जाते हुए देखा. झाड़ू फर्श पर पटककर मैं भी बाहर की ओर भागा.

मजदूर और कारीग़र जहां काम करते हैं, वहीं पर अपने लिए छोटी-छोटी झुग्गिहयां बना लेते हैं. बिना किसी भेदभाव के. मजदूरों और चिनाई मिस्त्रियों की झुग्गिपयां बराबर-बराबर बनी होतीं. हमारी झुग्गीत के बराबर में ही एक मजदूर की झुग्गीज थी. गांव से भाग़कर धंधे की तलाश में वह शहर पर आया था. जब कोई दूसरा काम नहीं मिला तो मजदूरी करने लगा.

मां बताया करती थी कि उनपर गांव के किसी महाजन का कर्ज है. उसे उतारने के लिए ही पति और पत्नीर दोनों मजदूरी करते थे. उनका दो साल का एक बेटा था. दिन में वह कुछ देर हमारे साथ खेलता. दोपहर के समय उसे नींद आने लग़ती तो उसकी मां बीच में आकर उसको सुला जाती. कुछ समय तक हम भी उसकी ओर से निश्चिंंत हो जाते थे.

उस दिन उसकी मां उसे सुलाकर ग़ई ही थी. इसलिए मैं उसकी ओर से बेफिक्र होकर अपने काम में लगा था. उसकी चीख को अनसुना करने के पीछे एक कारण यह भी था. लेकिन...' टोपीलाल चुप हो ग़या. मानो अपनी ग़लती पर अफसोस कर रहा हो.

‘आगे क्याप हुआ?' निराली जिज्ञासु बनी थी, चुप्पी उसको खलने लगी.

‘उस दिन उसकी मां बच्चे को सुलाने के बाद काम पर चली ग़ई थी. वह उसकी ओर से निश्चिं त थी. लेकिन न जाने कैसे बच्चेअ की नींद उचट ग़ई. वह उठकर चूल्हेम के पास चला ग़या. राख के नीचे आग़ दबी थी. बच्चा चिमटा उठाकर उसी से खेलने लगा. खेल-खेल में एक चिंगारी उछलकर बच्चे के कपड़ों पर आ गिरी. तपिश लग़ने से वह रोने लगा. आग़ की कुछ चिंगारियां उछलकर कपड़ों तक भी पहुंची थीं, जिनसे धुआं उठने लगा. उसे देख बाहर काम कर रहे किसी मजदूर का माथा ठनका. वह फौरन भीतर भागा. उसने फटाफट जाकर आग़ पर काबू किया. बच्चाम भी काफी झुलस ग़या था.'

‘इसमें तुम्हाररा क्याा दोष है?' निराली ने पूछा. उसे साथ चल रहा टोपीलाल इतना भला लग़ रहा था कि उसपर संदेह करना भी मुश्कि‍ल लग़ रहा था.

‘ग़लती कैसे नहीं थी, उस दिन अग़र मैं बच्चेन की पहली चीख सुनते ही उसके घर चला जाता तो संभव है कि उसको झुलसने से भी बचा लेता. मेरी ही ग़लती से...'

‘इसलिए मेरी चीख सुनते ही आज तुम फटाफट दौड़कर चले आए.'

‘आदमी अपनी ग़लती से भी सीखता है, मेरी मां बिलकुल सही कहती है?'

‘आदमी जब ग़लतियों से भी सीखता है तो जरा-सी भूल होने पर शर्म कैसी?' निराली ने निराला तर्क दिया.

‘कभी-कभी ग़लती सुधारने में बहुत देर हो जाती है.' दुःखी मन से टोपीलाल ने कहा.

‘अच्छाज उस ओर मुड़ जाओ. मेरी मां वहीं बैठती है.' और टोपीलाल बिना कुछ कहे जिधर निराली ने इशारा किया था, उसी ओर मुड़ ग़या.

अग़र मन साफ हो तो अच्छेओ मित्र राह चलते हुए भी मिल जाते हैं. काफी सोचने के बाद उस दिन निराली इसी नतीजे पर पहुंची. -

वह ग़लत थोड़े ही थी.

टोपीलाल के रूप में निराली को एक अच्छात दोस्तए मिला; और सच्चान हमदर्द भी. उम्र में वह टोपीलाल से एक-दो वर्ष कम ही होगी. किंतु टोपीलाल से मिलने से पहले वह गुमसुम और खोई-खोई रहती थी. चेहरे पर पीलापन छाया रहता. टोपीलाल के साथ रहकर उसकी उदासी छंटने लगी. जिसका असर उसके शरीर पर भी पड़ा. उसपर निखार आने लगा. एक दिन टोपीलाल से मिली तो बहुत प्रसन्नम लग़ रही थी. टोपीलाल उसकी ओर देखता ही रह ग़या.

‘मैंने एक फैसला किया है.'

‘कैसा फैसला?'

‘सोचती हूं कि कुछ काम करने लगूं. इससे मैं अपनी मां की और अधिक मदद कर सकती हूं.'

टोपीलाल को अच्छा लगा. उस यह सोचकर दुःख भी हुआ कि उसने स्वीयं कभी अपने माता-पिता की मदद करने के बारे में नहीं सोचा. कभी ऐसा कोई विचार तक दिमाग़ में नहीं आया. अग़र आया भी तो निकाल बाहर किया. निराली अपनी मां की मदद करना चाहती है, इसलिए वह उससे अच्छी है. जो बच्चेअ किसी भी प्रकार से दूसरों की मदद करना चाहते हैं, वे अच्छेी ही होते हैं.

‘काम क्याच करोगी?' टोपीलाल के प्रश्नै पर निराली ने मुंह लटका लिया. मानो सकुचा रही हो.

‘तुमने जवाब नहीं दिया?' टोपीलाल ने खुद को दोहराया.

‘हमारी बस्तीि की कई लड़कियां कबाड़ चुनने जाती हैं, सोचती हूं मैं भी उन्हींे के साथ जाने लगूं. काम बहुत अच्छाम नहीं है. आदमी तो आदमी कुत्ते भी दुतकारे बिना नहीं रहते. लेकिन यदि मैं मां की मदद करने की ठान ही लूं तो कोई भी काम मुझे बुरा नहीं लगेगा. फिर धीरे-धीरे आदत तो पड़ ही जाती है.' कहकर वह चुप हो ग़ई. टोपीलाल की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी. टोपीलाल खुद सोच में पड़ा था. निराली इतना ग़हरा सोच सकती है, उसे कतई उम्मीकद न थी.

‘कबाड़ बीनने के अलावा क्याम किसी और काम के बारे में भी सोचा है?' कुछ देर बाद टोपीलाल ने पूछा.

‘मुझे कोई और काम आता कहां है. मां ग़लत थोड़े ही कहती है कि मैं सिर्फ घर पर रहकर रोटियां तोड़ सकती हूं.'

‘मां के कहे का बुरा क्यों मानती हो, दिन-भर काम करते-करते वे बहुत थक जाती होंगी.'

‘काम तो तुम्हा री मां भी करती हैं. चिनाई का काम तो एक जग़ह बैठकर सौदा बेचने से कहीं ज्यातदा मेहनत का है.'

‘गुस्सा आने पर तो मां भी नाराज होती है. लेकिन उनके गुस्से का शिकार पिताजी को होना पड़ता है. मुझसे तो मां बहुत प्यामर करती है.' टोपीलाल की ग़र्दन अभिमान से तन ग़ई. मग़र निराली की उदासी और भी बढ़ ग़ई. टोपीलाल कुछ समझ न पाया. वह जान न सका कि अनजाने ही उसने निराली के दुःख को हरा कर दिया है. तो भी उसको लग़ रहा था कि उसने कुछ ग़लत कहा है.

‘काम तो कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता, लेकिन...' कहते-कहते टोपीलाल चुप हो ग़या.

‘क्यात तुम नहीं चाहते कि मैं कोई काम करूं?' निराली ने पूछा.

‘जरूर करना चाहिए. यदि मकसद नेक है तो इसमें कुछ भी बुराई नहीं है. परंतु मेरी मां कहा करती है कि हम बच्चोंू को बड़े-बड़े सपने देखने चाहिए. भले ही वे उस समय हकीकत में तब्दीाल ना हो पाएं.'

‘अग़र सच न हो पाएं तो ऐसे सपने देखने का लाभ ही क्यां?' निराली ने बीच ही मैं टोक दिया. टोपीलाल के पास जवाब एकदम तैयार था.

‘मां तो कहती है कि सपनों के अंकुराने से ही भविष्य् के फूल खिलते हैं. इसलिए आदमी को सपना देखने में कभी कंजूसी नहीं करनी चाहिए. हम ग़रीब सही, पर सपने देखने पर पाबंदी क्योंद हो, क्यों हम सपना देखने में भी मन को मारें?' टोपीलाल ने तर्क दिया. मां का नाम जुबान पर आते ही उसका आत्मदविश्वा स जोर मारने लगा, चेहरे की चमक सवाई हो ग़ई. ऐसा अक्ससर होता था. मां का जिक्र कहीं भी, किसी भी रूप में हो, टोपीलाल का रोम-रोम प्रफुल्लिोत हो जाता था.

‘सिर्फ सपने! बड़ी अजीब बात है. मेरी मां तो कहती है कि आदमी को पांव उतने ही पसारने चाहिए जितनी कि उसकी चादर हो.'

‘अरे! यही प्रश्ऩ तो मैंने अपनी मां से किया था, जब उन्होंंने बड़े से बड़ा सपना देखने को कहा था. तब जानती है उन्होंेने क्याी कहा?'

‘मैं कैसे बता सकती हूं!' निराली के चेहरे पर मासूमियत छा ग़ई.

‘तब मां ने कहा था कि ठीक है, आदमी को अपने पांव उतने ही पसारने चाहिए जितनी कि उसकी चादर है. मग़र यह सपना तो वह देख ही सकता है कि आने वाले दिनों में वह बड़ी चादर जरूर खरीद लेगा...फिर एक घर होगा, चारपाई होगी, जिसपर दिन-भर की मेहनत के बाद वह आराम से सो सकेगा. बच्चोंउ के अच्छेो भविष्या के लिए योजनाएं बना सकेगा.'

‘हां, चादर बड़ी करने का सपना देखना तो कोई गुनाह नहीं है.' निराली ने सहमति जताई.

‘पर मां के सामने मैंने इस बात को आसानी स्वीनकार नहीं किया था.'

‘क्योंं...?'

‘उस समय मेरा मन था कहानी सुनने का; और मां के पास हर स्थिाति को समझाने के लिए कहानी तैयार रहती है.'

‘तो कहानी सुनाई थी, उन्होंाने?'

‘हां!' कहते हुए टोपीलाल मुस्कंरा दिया.

‘कहानियां तो मुझे भी बहुत अच्छीम लग़ती हैं. चलो आज का काम यहीं पूरा करते हूं. वहां पेड़ की छाया में बैठते हैं. तुम मुझे वह कहानी सुनाओ?'

न जाने क्यों टोपीलाल को निराली का साथ अच्छा लग़ता था. उनकी जान-पहचान

तो कुछ ही दिनों की थी, मग़र लग़ता जैसे कि वह वर्षों पुरानी हो. इसलिए जब निराली ने कहानी सुनाने को कहा तो वह खुशी-खुशी तैयार हो ग़या. दोनों सड़क किनारे खडे़ जामुन के पेड़ के नीचे जा बैठे.

‘कहानियां कहना तो सिर्फ मां को आता है, मैं तो उसको बता ही सकता हूं. उसमें तुम्हें वह आनंद नहीं आएगा, जो मुझे मां के मुंह से सुनने में आता है.' टोपीलाल ने बताया. निराली बस मुस्कुंरा दी.

टोपीलाल ने सुनी-सुनाई कहानी आरंभ कर दी-

एक सेठ के दो लड़के थे. सेठ भला आदमी था. बेटे थे आज्ञाकारी. उसने आम आदमी का सादा-सरल जीवन जिया था. मृत्युल करीब आई तो उसने अपने दोनों बेटों को पास बुलाकर कहा, ‘इस छोटे-से गांव में रहकर मैंने अपनी मेहनत और सादे चलन के बाद जो बचाया है, उसको दो हिस्सोंब में बांट दिया है. आधा-आधा धन इन दो हांडियों में बंद है. मैं चाहता हूं कि इनमें से एक-एक को तुम दोनों मेरे जीते जी संभाल लो, ताकि बाद में तुम्हाररे बीच किसी भी प्रकार का झग़ड़ा न हो.'

इतना कहकर सेठ ने पलंग़ के नीचे रखी हांडियों पर से कपड़ा हटा दिया. वहां एक ही रंग़ और आकार की दो हांडियां रखी थीं. दोनों भाई उनमें से एक-एक उठाकर चलने लगे तो सेठ ने टोका-

‘मेरी आखिरी बात और सुन लो...अग़र मन भाए तो अमल करना, नहीं तो बिसरा देना.' दोनों बेटों के रुकने पर सेठ ने कहा-‘मेरे गुरुजी कहा करते हैं-नंगे पांव चलना, सपने बड़े देखना. इन शब्दोंब को मैं तो अपने जीवन में पूरी तरह से उतार नहीं पाया. तुम अग़र उतार सको तो मैं समझूंगा कि मेरी गुरुदक्षिणा मेरे बेटों ने चुका दी.'

दोनों बेटे पिता के इन शब्दोंम को मन ही मन दोहराते हुए वापस लौट आए. कुछ ही दिनों के बाद सेठ चल बसा. उसके बाद दोनों अपना-अपना धंधा संभालने लगे.

पिता के शब्दों का दोनों बेटों पर अलग़-अलग़ प्रभाव पड़ा था. बड़े बेटे ने पांव में जूतियां डालना छोड़ दिया था. पिता की बात पर अमल करने के लिए वह हमेशा नंगे पांव रहता. उसी तरह आता-जाता. शाम ढलते ही वह बिस्तकर पर चला जाता. फिर अग़ले दिन बांस-भर सूरज ऊपर चढ़ने के बाद ही आंखें खोलता. धीरे-धीरे उसका धंधा पिटने लगा. परेशानी और चिंता बढ़ी तो देह की आब घटने लगी. शरीर दिनोंदिन क्षीण पड़ने लगा. उधर छोटा बेटा मोटा पहनता, मोटा ही खाता. चुपचाप अपने काम में डूबा रहता. उसका धंधा बढ़ता ही जा रहा था.

बड़े की बीमारी जब लंबी खिंचने लगी तो उसकी पत्नीह ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने रोगी की नाड़ी की जांच की. कुछ समझ में नहीं आया तो पूछा-

‘नाड़ी तो ठीक ही लग़ती है, परेशानी क्याद है?'

‘मैं बहुत तकलीफ में हूं. खाना-पीना कुछ भी अच्छा् नहीं लग़ता. न भूख लग़ती

है, न प्या स. नींद न रात को ढंग़ की आती है, न दिन को?'

‘ऐसी कौन-सी चिंता खाए जा रही है, जहां तक मुझे मालूम है, मरने से पहले सेठजी तुम दोनों भाइयों के लिए ठीक-ठाक संपत्ति छोड़ ग़ए हैं.'

‘वह तो ठीक है पर...' बड़े लड़के ने हामी भरी. वैद्यजी उसके चेहरे पर नजर ग़ड़ाए हुए थे. यह देख वह आगे बताने लगा, ‘मरने से पहले बाबू जी ने कहा था-नंगे पांव रहना, सपने बड़े देखना. मैंने उसी दिन से जूतियां पहनना छोड़ दिया. रोज यह सोचकर सोता हूं कि आज की रात खूब बड़ा सपना देखूं. लेकिन क्याे करूं...अव्वेल तो नींद ही नहीं आती. और जब आती है, तो बहुत डरावने सपने आते हैं. भय से देह पसीना-पसीना हो जाती है. नींद बीच ही में टूट जाती है, और उसके बाद तो सो भी नहीं पाता. बड़ा बेटा होकर भी मैं पिताजी की आखिरी इच्छाब पूरी नहीं कर पा रहा हूं. बस यही चिंता मुझे खाए जा रही है. इसकी कोई दवा हो तो आप बताएं.'

अनुभवी वैद्य रोग़ की थाह तो पा ग़ए, लेकिन कहा कुछ नहीं. कहने से पहले वे खुद को परख लेना चाहते थे, ‘बेटा, मैं तो सीधा-सादा वैद्य हूं. वर्षों पहले बड़े वैद्यजी ने जो सिखाया था, उसी के सहारे लोगों के काया-कष्टत दूर करने का काम करता हूं. तुमने जो कहा, उसके बारे में तो बड़े वैद्यजी ने मुझे कुछ नहीं बताया था. पर मैं इतना जानता हूं कि तुम्हांरे पिता बहुत गुणी इंसान थे। उनकी बात का कोई न कोई सार तो जरूर होगा. मुझे विणज-व्यौापार का जरा-भी अनुभव होता तो कुछ उपचार सोचता. हां, कोशिश जरूर करूंगा. यदि कुछ समझ पाया तो आज से ठीक पंद्रहवें दिन हाजिर हो जाऊंगा. उस समय तक यदि किसी और से सलाह लेना चाहो तो तुम्हाारी मर्जी.'

इतना कहकर वैद्यजी वहां से प्रस्थाान कर ग़ए.

बाहर निकलकर उन्हों ने सोचा कि अब छोटे भाई को भी परख लिया जाए. व्यानपारी की बात का अर्थ कोई व्या पारी ही भली-भांति बूझ सकता है. सेठ के दो बेटे हैं. मरने से पहले उसने अपने छोटे बेटे से भी वही शब्द कहे होंगे. वैद्यजी को मालूम था कि छोटा बेटा दिनोंदिन तरक्कीै कर रहा है. इस बोध के साथ ही उनके चेहरे पर उत्साकह छा ग़या. मन में जिज्ञासा और कौतूूहल लिए वे सेठ के छोटे बेटे से मिलने चल दिए.

छोटा बेटा अपनी ग़द्दी पर ही विराजमान था. वैद्यजी को देखा तो उठकर खड़ा हो ग़या. स्वा ग़त किया, बिठाया. उस समय वह पांव में साधारण-सी जूतियां पहने हुए था. कपड़े भी स्व च्छय एवं साधारण थे. चेहरे पर भली मुस्का न थी. मन को खींचने वाली.

‘सेठजी के जाने के बाद अच्छीद तरक्कीव की है?' वैद्यजी ने बात आरंभ की.

‘जी नहीं, मुझे उनके जैसा बनने में तो अभी बहुत समय लगेगा.'

‘मैंने तो सुना है कि तुम्हा रा व्याोपार दूर-दूर तक फैला हुआ है?'

‘सो तो है, पर दुनिया बहुत बड़ी है. आकाश में भले ही मत उड़ो, पर आगे बढ़ने लिए धरती पर ही इतने कोने बाकी हैं, जहां तक, मुझे लग़ता है कि पिताजी का नाम जाना

ही चाहिए.'

‘सेठजी तो बहुत संतोषी जीव थे.' वैद्यजी ने हैरानी जताई.

‘जी हां, ईमानदारी से कमाना, खूब मेहनत करना और अपनी ही कमाई में संतोष रखना हमें उन्होंाने ही सिखाया था.' छोटे बेटे के स्वदर में विनम्रता थी, आंखों में आत्मंविश्वाबस. वैद्य जी के चेहरे पर मुस्कासन छा ग़ई. छोटे बेटे को कोई संदेह न हो, इसलिए वे उठकर प्रस्था न कर ग़ए. इसके बाद वे रोज उसके पास जाते. बातचीत करते और चुपचाप वापस लौट आते. हर बार वे देखते कि छोटे बेटे की कथनी और करनी में कोई भेद तो नहीं है.

पूरी तरह आश्वौस्त. होने के बाद, ठीक पंद्रहवें दिन वे बड़े बेटे के पास पहुंच ग़ए. इस बीच उसके चेहरे का पीलापन और भी बढ़ ग़या था. देह कमजोर होकर चारपाई से जा लगी थी. उस समय वह चारपाई पर पड़ा था. उसकी पत्नीभ सिरहाने बैठकर पंखा झल रही थी. वैद्य जी के पहुंचते ही वह रोने लगी. उसे ढाढ़स बँधाते हुए वैद्य जी बराबर में पड़ी चौकी पर बैठ ग़ए.

‘घबराओ मत, इनके उपचार के लिए मैंने बड़े वैद्य जी की पोथियों को छान मारा. और कुदरत का करिश्माद देखिए कि आज से पचास साल पहले ठीक ऐसा ही मामला बड़े वैद्य जी के सामने भी आया था. तब उन्होंरने मिश्री पाक द्वारा रोगी का उपचार किया था. तीसरे ही दिन वह रोगी दौड़ लगाने लगा था.'

‘मिश्री पाक?' बड़े बेटे की पत्नीह ने कहा, ‘इस बारे में मैंने कभी नहीं सुना.'

‘सुनती कैसे बेटी. बड़े वैद्य जी तो तेरे जन्मक से पंद्रह वर्ष पहले ही स्वीर्ग सिधार चुके थे. उनके बाद न तो किसी की निगाह में ऐसा विचित्र रोग़ आया, न कोई ऐसे उपचार के बारे में सोच ही पाया. पर एक समस्याे है, मिश्री पाक बनाने की विधि बहुत जटिल है, बेटी!'

‘आप कहें तो वैद्य जी. इस रोग़ से छुटकारा पाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.'

‘बताऊंगा? मैंने तुम्हाइरे छोटे भाई को भी बुलवाया है. वह बस आता ही होगा.'

उसी समय सेठ के छोटे बेटे ने प्रवेश किया. तब वैद्यजी ने बताने लगे, ‘मिश्री पाक बनाने के लिए परस्परर विपरीत दिशा में स्थिमत दो गांवों के कुओं का जल लाना होगा. शर्त यह है कि उन कुंओं से पहले किसी ने एक भी बूंद जल न लिया हो. मुझे तैयारी करने में पंद्रह दिन लगेंगे. उससे पहले तुम दोनों भाइयों को जल लेकर पहुंचना होगा.'

दोनों भाई जाने लगे तो वैद्य जी ने कहा, ‘एक बात और ध्यानन से सुनो, जल लाने के लिए तुम दोनों अलग़-अलग़ दिशा में प्रस्थाैन करोगे और जब तक निवासे कुंए का जल नहीं मिल जाता, तब तक आपस में कोई संपर्क नहीं रखोगे.'

‘मेरी समझ में आपकी कोई बात नहीं आ रही.' जाने से पहले छोटे भाई ने कहा,

‘लेकिन मेरी खुशी बड़े भइया को स्वेस्थी देखने में है. इसलिए जैसा आप चाहते हैं, वही होगा.'

इसके बाद बड़े भाई ने पूर्व की दिशा पकड़ी. छोटा भाई पश्चिलम की ओर चल पड़ा. पंद्रह दिन बाद हाजिर होने को कहकर वैद्यजी अपने घर की ओर प्रस्था न कर ग़ए.

ठीक पंद्रहवें दिन पहले बड़े भाई ने प्रवेश किया. उसकी हालत और भी बिग़ड़ चुकी थी. चेहरा धूप से काला पड़ चुका था. उसके अवसादग्रस्तभ चेहरे से कोई भी अनुमान लगा सकता था कि मौत उसके चेहरे पर नाच रही है. आते ही वह धम से चारपाई पर पड़ ग़या.

‘मिश्री पाक के लिए सारी सामग्री तैयार है...निवासे कुएं का जल मिला?' वैद्यजी ने प्रवेश करते हुए पूछा.

‘जाने दीजिए. मैं जानता हूं कि अब कुछ नहीं हो सकता. अब केवल मौत ही मुझे इस बीमारी से छुटकारा दिला सकती है.' यह सुनते ही उसकी पत्नीक की रुलाई फूट ग़ई.

‘निराश क्योंी होते हो, तुम्हाबरे रोग़ में मिश्री पाक रामवाण औषधि है. खाते ही चंगे हो जाओगे. तुम्हाचरा छोटा भाई भी आता ही होगा. तुम फटाफट जल दो ताकि मैं मिश्री पाक तैयार कर सकूं.'

‘कहा नहीं कि अब कुछ नहीं हो सकता,' बड़े बेटे के स्वपर में छिपी निराशा बोल उठी. निवासे कुंए का जल लेने के लिए मैं पूर्व दिशा में पूरे सौ कोस तक ग़या. एक-एक गांव छान मारा. मग़र कहीं भी ऐसा कुंआ नहीं मिला, जो निवासा हो, जिसके जल को पहले किसी ने प्रयोग़ न किया हो. इसलिए मैं मान चुका हूं कि अब मेरी मौत पक्कीआ है. वही मुझे इस लाइलाज बीमारी से मुक्तिे दिला सकती है.'

यह सुनकर बड़े की पत्नील जोर-जोर से रोने लगी. उसी समय सेठ के छोटे बेटे ने घर में कदम रखा. उसके सिर पर घड़ा था. देह सिर से पांव तक तर, चेहरे पर थकान के भाव थे, पर मंजिल तक पहुंचने का उल्लादस भी कम नहीं था-‘माफ करना वैद्य जी, मैं आ ही रहा था कि एक व्याेपारी टकरा ग़या. दिसावर में व्याहपार जमाने की बात करने लगा. उससे बात करने में थोड़ी देर हो ग़ई. मैं निवासे कुंए का जल ले आया हूं. कम हो तो चिंता मत करना. जितना कहोगे, और मंग़वा दूंगा.'

‘तुम कहां से ले आए? तुम्हाथरे बड़े भाई को तो सौ कोस तक एक भी निवासा कुंआ नहीं मिला.' वैद्य जी ने हैरानी जताई.

इसपर छोटा बेटा मुस्कमरा दिया, बोला-‘मैं जानता था कि अग़र कुंआ है तो वह निवासा क्योंी होगा. मुझसे पहले तो किसी न किसी ने उससे जल लिया ही होगा. इसलिए ऐसे कुंए की खोज में जाना ही बेकार था.'

‘फिर तुमने क्याउ किया?'

‘करना क्या था. पंद्रह दिनों तक व्याएपार से अलग़ रहना भी उचित नहीं था, इसलिए

मैंने पश्चिाम दिशा में जो भी पहला गांव पड़ा, वहीं कुंआ खुदवाना शुरू कर दिया. उसी गांव में टिककर अपना काम भी देखता रहा. आज सुबह जैसे ही पानी निकला, सबसे पहले आपके लिए ले आया.'

‘शाबाश बेटा! मैं जानता था कि तुम यही करोगे.' वैद्य जी बोले. उसके बाद वे बडे़ बेटे की ओर मुड़कर कहने लगे, ‘देखा, भाषा तो एक माध्याम होती है. जरूरी नहीं कि हम जो कहना चाहते हैं, उसको ठीक-ठीक शब्दोंे में व्याक्तल कर ही सकें. मन में छिपी बात को बाहर लाने में कभी-कभी भाषा भी पीछे रह जाती है. उस समय शब्दोंब का सीधा अर्थ न लेकर उनके निहितार्थ को पकड़ना पड़ता है. जो सिर्फ शब्दों के प्रकट अर्थ के फेर में रहते हैं, वे अक्स र नाकाम जाते हैं. मरने से पहले बड़े सेठजी ने जो तुमसे कहा था, उसका अभिप्राय...'

‘रहने दीजिए वैद्य जी, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो चुका है.' बड़े भाई ने कहा. उसके बाद वह संभलने लगा. कुछ दिनों के बाद उसका व्यबवसाय भी पटरी पर आने लगा.

‘कुछ समझीं...!' कहानी पूरी करने के बाद टोपीलाल ने निराली से पूछा.

‘और नहीं तो क्या धरती पर तुम्हीं अकेले समझदार हो.' कहकर निराली हंस दी, ‘बहुत देर हो चुकी है. अब मैं चलूंगी. मां घर पहुंचने ही वाली होगी.'

‘मैं भी चलता हूं. बस्तीग के बच्चे इधर-उधर भटक रहे होंगे. किसी को कुछ हो ग़या तो मां डांटेगी.' टोपीलाल चलने को हुआ. तभी पीछे से निराली ने टोक दिया-

‘सुनो!'

‘राह चलते को टोकना अच्छाे नहीं होता, बात क्याध है?' टोपीलाल ने नकली गुस्सेो का प्रदर्शन किया.

‘आज के बाद किसी से यह मत कहना कि तुम्हें कहानी सुनाना नहीं आता. तुम्हापरी मां बहुत बड़ी किस्साशगो होंगी. पर तुम भी कुछ कम नहीं हो. आगे मां जो भी कहानी सुनाए, वह मुझे जरूर सुनाना.'

‘कहानी को सुनना-कहना जितना आसान है, उसको गुनना उतना ही कठिन. कभी-कभी तो कई दिन, बल्किा महीनों निकल जाते हैं कहानी की ग़हराई तक पैठने में, फिर भी उससे पेश नहीं जाती. हर बार कुछ न कुछ छूट ही जाता है.'

कहकर टोपीलाल पलटा और तेज कदमों से अपने घर की ओर चल दिया.

कहानी सुनने से मुश्कितल होता है, कहानी को गुनना-क्याफ टोपीलाल ने ग़लत कहा था?

बिलकुल नहीं, टोपीलाल ने जो कहा, वह मां के मुंह से कई कहानियां सुनने और गुनने के बाद ही कहा था. उसको हमेशा लग़ता कि हर कहानी के पीछे एक कहानी होती है.
 
उस तक तभी पहुंचा जा सकता है, जब कहानी को गुनने की कला भी आती हो. पर आदमी चाहे कितना ही बुद्धिमान क्योंत न हो. कहानी को एक बार में गुनना कहां संभव हो पाता है! यह प्रक्रिया तो हर समय चलती रहती है. कभी मंद होती है, कभी तेज. कभी लगातार सोचने पर भी कोई परिणाम नहीं निकलता तो कभी भीतर से ज्ञान का -ोत अचानक फूट पड़ता है.

किसी कहानी को सुनने-गुनने के बाद आदमी को लग़ सकता है कि वह उसके बारे में पर्याप्तम बातें जान चुका है. लेकिन अग़ली बार जब भी वह कहानी से गुजरता है, वही कहानी उसको एक झटका दे सकती है, चौंका सकती है. कुछ इतना कि आदमी कह उठे-

‘अरे! इस बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था...यह तो एकदम अनूठी बात हुई, वाह!'

शब्दोंे को गुनना...खुद को उसके अर्थ से पूरी तरह परचाना...उसकी पर्तों को खोलना, उनकी तह तक जाना बड़ा ही कठिन, एक चुनौती की तरह होता है. निराली को कहानी सुनाने के बाद टोपीलाल वहां से उठा तो कुछ इसी प्रकार सोच रहा था. जब उसने मां मुंह से यह कहानी सुनी थी, तब भी इसने उसको प्रभावित किया था. कहानी के बाद बातों-बातों ने मां ने उसके बारे में समझाया भी था. उसका प्रभाव उसके दिलो-दिमाग़ पर अभी तक था.

आज, निराली को कहानी सुनाने के बाद उसको लगा कि आज से पहले उसने कहानी को सुना-भर था, गुन नहीं पाया था.

सेठ की कहानी का अभी तक उसके लिए यही संदेश था कि आदमी को बड़े से बड़ा सपना देखना चाहिए. ऊंची उड़ान भरने का मनोरथ पालना चाहिए. पर आज एक और पर्त खुली कि भाषा केवल एक माध्य म होती है. वह अपने शब्दोंक द्वारा सीधे-सीधे जो संदेश देना चाहती है, जरूरी नहीं कि उसका मकसद वही हो. वह एकदम अलग़ भी हो सकता है.

कि शब्द् प्यावज के छिलकों की भांति होते हैं. कभी हम उनके स्वांद का एक अंश जान पाते हैं, कभी उनकी गंध का कोई एक अंश. कभी उनके स्वा द और गंध के थोडे़-थोड़े अंश से हमारा परिचय हो जाता है. किसी भी क्षण में हम न प्या ज के स्वााद को पूरी तरह भोग़ पाते हैं, न उसकी गंध को. यही हमारी सीमा है. यही हमारी भाषा की भी सीमा है.उस समय बाकी का काम हमें अपने अनुभव और विवेक से चलाना पड़ता है.

कि शब्दोंश का मतलब निकालना केवल शब्दों पर नहीं, उन्हें सुनने-पढ़ने वाले पर भी निर्भर होता है. कि शब्दोंद में छिपा अर्थ तो अधूरा होता है. श्रोता और पाठक उसको पूरा करते हैं. अपनी-अपनी तरह से, अपने अनुभव और विवेक के अनुसार.

कभी-कभी टोपीलाल को लग़ता है कि उसकी मां उसको यूं ही उलझा देती है. कभी सोचता कि अनपढ़ मां के दिमाग़ में इतनी भारी-भरकम बातें कहां से आ जाती हैं!

‘जिंदगी के अनुभव से?' उसे याद आता है, मां ने एक बार यही कहा था. तो क्याी

ऐसा नहीं हो सकता कि कोई बात पढ़ते या सुनते ही उसके सभी अर्थ सीधे दिमाग़ में उतरते चले जाएं. सोचने-समझने में एक भी पल गंवाए बिना. गुनने की तो जरूरत ही न पड़े. कितना अच्छाक हो अग़र उसके पास यह शक्तिि आ जाए.

टोपीलाल फिर कल्प.ना में उड़ने लगा. चलते-चलते उसको लगा कि उसके पास एक ऐसी ताकत आ चुकी है, जिससे वह एक झटके में चीजों की ग़हराई में उतर सकता है. पलक झपकते बड़ी-बड़ी पहेलियां हल कर सकता है. मां और बापू हैरान हैं. मां की प्रसन्नेता का तो ठिकाना ही नहीं है. लोग़ उसके पास बड़ी-बड़ी पहेलियां लेकर आते हैं. जिन्हें वह चुटकी बजाते हल कर देता है.

टोपीलाल के पास चीजों को समझने की जादुई ताकत है, चारों ओर यह बात फैल जाती है. यह विचार ही टोपीलाल के चेहरे को उजास से भर देता है.

घर लौटा तो बापू सामने ही दिख ग़ए. चारपाई पर लेटे हुए. मां उस समय काम पर थी. पता चला कि तबियत खराब होने के कारण बापू ने आधे दिन की छुट्‌टी की है. टोपीलाल के दिमाग़ में विचारों का तांता लगा था. अपने पिता से वह कम ही बोलता था. कुछ कहना होता तो मां के माध्याम से कहलवा देता. पर उस समय वह सीधे उन्हींे के पास पहुंच ग़या-

‘बापू, अनुभव क्याथ होता है?' उसने दिमाग़ में चल रही उथल-पुथल का समाधान चाहते हुए कहा.

‘चल हट! न जाने कहां-कहां अपना दिमाग़ दौड़ाता रहता है...!' आशा के विपरीत बापू ने डपट दिया. टोपीलाल का मन बुझ-सा ग़या. वह जाने को हुआ कि पीछे से बापू की आवाज कान में पड़ी-

‘छोटी उम्र के बच्चोंभ के साथ रहकर तू अभी तक खुद को बच्चाा ही समझता है. जबकि तेरी उम्र के लड़के काम-धंधे में अपने मां-बाप का हाथ बंटाते हैं. खाली दिमाग़ शैतान का घर. कल से मेरे साथ चलना, कहीं हल्का -फुल्काप काम दिलवा दूंगा.'

जिस बहुमंजिला इमारत का निर्माण चल रहा था, उसका मालिक इमारत के चारों ओर पार्क बनवा रहा था. उसके लिए घास बिछाने और पेड़-पौधे लगाने का काम चल रहा था. टोपीलाल रोज देखता कि माली के साथ उसका बेटा भी पौधों की देखभाल करने, पानी लगाने के लिए आता है. उसको काम करते देखना उसको बुरा नहीं लग़ता.परंतु इस विचार के साथ उसका दिल बैठता चला ग़या. इसलिए नहीं कि वह काम से जी चुराता था. इसलिए कि जिंदगी को लेकर उसका सपना कुछ और ही था.

‘मैं तो पढ़ना चाहता हूं बापू!' टोपीलाल ने अनुभव किया कि उसकी भाषा में तल्खी. थी. इतना जोर देकर उसने बापू से कभी बात नहीं की थी. मां सुन लेती तो उसकी खूब खबर लेती. अपनी भाषा की ग़रमी से वह खुद ही घबरा ग़या; और बापू की प्रतिक्रिया जाने बिना बाहर निकल आया.

शाम हो चुकी थी. किंतु अंधेरा अभी दूर था. वह सीधा सड़क पर पहुंचा और निरुद्‌देश्य -सा एक ही दिशा में बढ़ने लगा. अपनी ही धुन में. बढ़ता ग़या, बढ़ता ही ग़या. आगे और आगे. स्ट्रीहट लाइटें जलीं तो उसको एहसास हुआ कि वह घर से काफी आगे आ चुका है. उसका मन घबराने लगा.

वापस मुड़ते समय टोपीलाल की निगाह पार्क के बीचों-बीच बनी एक मूर्ति पर पड़ी. उसको कुछ दिन पाठशाला जाने का अवसर मिला था. उस अवधि में उसने अक्षरों को जोड़ना सीखा था. अपने उसी बोध के सहारे टोपीलाल मूर्ति के नीचे खुदे अक्षरों को बांचने का प्रयास करने लगा.

‘ह..मा..रे...रा..ष्ट्रो..पति....डॉ. सर्वपल्लीक राधाकृष्णटन!' अपनी इस कोशिश पर वह स्वियं ही इतरा ग़या. मूर्ति भव्यह थी. कुछ देर तक वह अपलक उसको देखता रहा. फिर वापस लौट पड़ा। घर पहुंचा तो मां काम से लौट चुकी थी. संभव है, इतनी देर तक घर से बाहर रहने पर मां उसको डांटे. इसलिए भीतर कदम रखने से पहले उसके कदम ठिठक ग़ए. सहसा उसके कानों में पिता की आवाज पड़ी. वे उसकी मां से कह रहे थे-

‘लग़ता है कि वह नाराज है...!'

‘ऐसा क्यों़ लग़ता है तुम्हेंक?'

‘तबियत ठीक न होने के कारण मैं परेशान था. उसने मुझसे कुछ पूछा तो मैंने डांट दिया. सच तो यह है कि मैं अपनी कमजोरी छिपा नहीं पाता. जब भी वह मुझसे कोई प्रश्न करता है तो मुझे अपना अनपढ़ होना याद आ जाता है; तब मैं आपा खोकर झुंझला पड़ता हूं.'

‘टोपीलाल पढ़ना चाहता है, और आप जानते हैं कि इसमें कोई बुराई नहीं है.'

‘बुराई कौन कहता है. बल्कि मैं तो सच्चेई दिल से चाहता हूं कि वह पढ़े. वही क्यों बस्तीष के सारे बच्चे' पढ़ें. पढ़-लिखकर कामयाब इंसान बनें. पर मैं भी क्यात करूं. टोले के मिस्त्री और मजदूर, औरत और मर्द सभी मुझपर भरोसा करते हैं. हर फैसले के लिए मुझे आगे कर देते हैं. ऐसे में मुझे वही निर्णय लेना पड़ता है, जिसमें पूरे टोले का हित, सभी की मर्जी हो.

अब जैसे इसी इमारत के ठेके को लो. मैंने सोचा था कि इस बार किसी स्कूेल के निकट लंबा काम पकड़ूंगा. जहां हमारे बेटे की पढ़ाई का पक्का इंतजाम हो सके. उससे पहले ही इस बिल्डिं ग़ का मालिक प्र्रस्ताहव लेकर आ ग़या. मैंने टोले में बातचीत की तो सभी इस काम को पकड़ने की जिद करने लगे. दो-तीन वर्ष तक लगातार चलने वाले काम को वे लोग़ छोड़ना ही नहीं चाहते थे। मुझे मजबूर होकर उन्हींल की बात माननी पड़ी. ये बातें मैं टोपीलाल को कैसे समझाऊं!'

‘अपना टोपीलाल इतना नासमझ नहीं है...' बाहर खडे़ टोपीलाल ने सुना, मां कह रही थी. उसके बाद वहां एक पल भी खडे़ रहना उसको भारी पड़ने लगा. वह दौड़कर भीतर

ग़या और बापू की गोद में पड़ ग़या. बिना कुछ कहे बापू उसके बालों में हाथ फिराने लगे। मां ने खाना लगाया तो पिता-पुत्र ने एक ही थाली में साथ-साथ भोजन किया.

‘यदि भावना सच्चीे तथा उसका प्रवाह तीव्र हो तो संवाद के लिए शब्दोंह और वाक्योंे की जरूरत नहीं पड़ती; चुप्पीि की भी अपनी स्वातंत्र भाषा होती है.' बापू की गोदी में पड़े-पड़े टोपीलाल को एकदम नया बोध हुआ. -

हर नई जानकारी ज्ञान के अनगिनत दरवाजों को खोल जाती है.

टोपीलाल सोने चला तो एक और एहसास हुआ. उस रात उसको ग़हरी नींद आई. सुबह आंख खुलने से पहले उसने सपना देखा कि राष्ट्रतपति महोदय उसको अपने हाथों से पुस्तिक सौंप रहे हैं. उनकी कद-काठी हू-ब-हू वैसी ही थी, जैसी उसने मूर्ति में देखी थी. आंखें खुलीं तो सपने के प्रभाव से उसका शरीर खिला हुआ था. चेहरे पर चमक थी, मन में उमंग़. चाल में मस्तीं.

वह जल्दी, से जल्दीउ निराली से मिलना चाहता था. ताकि उसको अपने सपने के बारे में बता सके. बता सके कि उसके बापू उतने बुरे और लापरवाह नहीं हैं, जितना वह कहता आया है. कि बापू के बारे में वह अब तक जो सोचता था, जितनी बातें उनके बारे में बताईं हैं, वे कितनी ग़लत, कितनी झूठ हैं. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उसका दिमाग़ अभी कितना हल्का सोचता है. कि उसको पढ़ाई की कितनी जरूरत है. कि किसी भी बालक के लिए पढ़ाई कितनी जरूरी होती है. कि पुस्तचकें ही प्राणीमात्र को मनुष्यरता से परचाती हैं.

देर तक वह सड़क पर टकटकी बांधे देखता रहा. निराली नहीं आई. उसके दिमाग़ में तरह-तरह के सवाल उठने लगे. वह उठा और उस स्था न की ओर बढ़ ग़या, जहां निराली की मां अपनी गुमटी लगाती थी. वहां जाने के बाद पता चला कि उसकी मां की तबियत ठीक नहीं. आज नहीं आ सकी.

बोझिल कदमों से अनमना-सा वह वापस लौट आया. लौटते हुए फिर उसी पार्क के करीब से गुजरा. मूर्ति को देखकर फिर उसके कदम फिर ठिठक ग़ए. वह एकटक उसी की ओर देखने लगा. इतना डूब ग़या कि अपनी सुध ही न रही. सहसा सामने से एक वाहन आता हुआ दिखाई पड़ा. उससे बचने के लिए वह पीछे हटा ही था कि सहसा उससे कोई टकराया. वह संभल पाए कि...

साइकिल पर चिटि्‌ठयों, पत्रिकाओं का बंडल ले जाता हुआ डाकिया उससे टकराया था. इसके साथ ही उसकी चिटि्‌ठयां धूल चाटने लगीं. डाकिया नीचे उतरकर चिटि्‌ठयों को समेटने लगा. टोपीलाल का कोई दोष नहीं था. फिर भी खुद को बीच रास्तेन में खड़े होने का कुसूरवार मानते हुए वह चिटि्‌ठयों को समेटने में डाकिया की मदद करने लगा.

‘क्याु तुम्हेंम घर पर कोई काम नहीं है, जो सड़क पर निठल्लेे खड़े हुए हो?' डाकिया ने कहा, ‘इतनी सारी डाक बांटनी है. लोग़ इंतजार कर रहे होंगे.'

टोपीलाल ने डाकिये की बात पर कोई प्रतिक्रिया व्यजक्तं नहीं की. वह चुपचाप सड़क पर बिखरे पड़े पत्रों को समेटने में लगा रहा. जब भी कोई नया पत्र उसके हाथ में आता तो उसका दिल मखमली एहसास से भर जाता. आंखों में इंद्रधनुष की आभा उतर आती. उस काम में उसे खूब मजा आया.

‘सभी को डाकिये का इंतजार रहता है. मैं बड़ा होकर डाकिया ही बनूंगा.' टोपीलाल के दिमाग़ मेें आया. अपने सोच पर वह खुद ही मुस्कीरा दिया.

डाकिया को पत्र बांटने की जल्दीर थी. पत्रों को समेटकर वह जल्दीा-जल्दीा मंजिल की ओर बढ़ ग़या. टोपीलाल उसको साइकिल पर जाते हुए देखता रहा. फिर घर जाने की याद आई तो पलटा. सहसा जमीन पर गिरे पेन पर उसकी नजर पड़ी. वह चौंका. उसने डाकिया को अपना पेन ले जाने के लिए आवाज भी दी. किंतु तब तक वह एक ग़ली में मुड़ चुका था. टोपीलाल ने अनमने भाव से कलम उठा ली.

‘वह रोज इसी रास्तेक से गुजरता होगा...कल मुझे कलम लौटाने के लिए दुबारा यहीं आना पड़ेगा...' टोपीलाल ने वापस लौटते हुए सोचा.

‘मामूली कलम ही तो है, न लौटाऊं तो भी क्याे है!' अग़ले ही पल उसके दिमाग़ में आया. मग़र अपने इस स्वानर्थी सोच पर उसको आत्म ग्ला नि होने लगी.

‘चीजों को उनके मूल्य के बजाय उनकी उपयोगिता से आंकना चाहिए'-उसके मास्टहरजी ने एक बार कहा था. उनकी बात टोपीलाल को जंची थी. इसी कारण वह उसको आजतक याद है. तब टोपीलाल ने निर्णय लिया कि कल वह कलम लौटाने के लिए इस ठिकाने पर दुबारा आएगा.

‘कम से कम एक दिन तो यह कलम मेरे पास रहेगी ही.' टोपीलाल ने सोचा.

इस विचार के साथ उसका मन एक अजीब-सी ग़र्माहट से भर ग़या. उसके हाथ कलम को आजमाने के लिए मचल उठे. काग़ज के अभाव में कलम को हथेली पर चलाकर उसकी जांच की. उसको फर्राटेदार स्थिवति में चलते देख टोपीलाल को कुछ तसल्लीस हुई. लेकिन मन न भरा. घर लौटते समय रास्तेन में पड़े एक साफ-सुथरे काग़ज पर उसकी नजर पड़ी तो उसने उसको फौरन उठा लिया. टोपीलाल ने काग़ज पर पेन को आजमाना चाहा. मग़र उसके हाथ ठिठक ग़ए-

‘इस सुंदर काग़ज को इस तरह खराब करना ठीक नहीं है.' सोचते हुए उसने सड़क किनारे पड़ा काग़ज का दूसरा टुकड़ा उठाया. उसपर कलम को रग़ड़ा देखा. गोल-मोल रेखाओं ने उसको फिर आश्व स्तिि दी कि वह ठीक है.

अपने ठिकाने पर वापस पहुंचने तक टोपीलाल का मन इस सोच से भरा-भरा रहा कि अब उसके पास काग़ज और कलम है. कलम भले ही एक दिन के लिए हो, मग़र काग़ज

उसका अपना है. रास्तेक-भर वह काग़ज उसे मूर्ति के हाथ में लगी पुस्तककों याद दिलाता रहा. उसके एहसास ने टोपीलाल को इतना जकड़ा कि रास्तेे में एक-दो रद्दी काग़ज उसको दिखाई पड़े तो उसने उन्हें फौरन उठा लिया.

‘हर चीज अपने सदुपयोग़ की चाहत रखती है.' पंद्रह अग़स्तो के दिन भाषण देते हुए प्रिंसीपल साहब ने कहा था. उस पाठशाला में वह कुछ ही महीने पढ़ पाया था. क्यों कि इस बीच उसके पिता स्कू़ल का काम निपटा चुके थे. उन्हेंश अपने टोले के साथ दूसरी जग़ह काम मिला. नया स्था न स्कू‍ल से इतनी दूर था कि वहां पढ़ने जा ही नहीं सकता था. पढ़ाई बीच में छूटने पर वह कितना रोया था, उसको आज भी अच्छी‍ तरह याद है.

इस काग़ज-कलम का कैसे सही उपयोग़ हो? टोपीलाल अपनी बुद्धि को भरसक दौड़ाने लगा. इसी सोच में डूबा वह अपने ठिकाने पर लौटा. बाकी बच्चोंी को चुपचाप खेलता हुआ देख उसको तसल्लीु हुई. इमारत के लिए बनी पानी की टंकी के नीचे अपेक्षाकृत ठंडक रहती थी. वहां एकांत भी था. वह टंकी के लिए बने स्तं़भ का सहारा लेकर बैठ ग़या. कलम हाथ में थाम ली. अभ्यातस के लिए पहले पुराने काग़जों पर सही-सही अक्षर बनाने का प्रयास किया. दो-चार शब्दम लिखे. शब्दोंथ को वाक्यप में ढालने का अभ्यालस किया. इस कोशिश में पुराने सभी काग़ज समाप्तद हो ग़ए.

कुछ और काग़जों की खोज में वह दुबारा सड़क की ओर दौड़ पड़ा. फिर उठाए ग़ए काग़जों पर देर तक कलम साधने का अभ्याेस करता रहा. इस बीच सूरज सिर पर तना, ग़र्माया और फिर ठंडा होने लगा.

‘यह काग़ज अपने सदुपयोग़ की प्रतीक्षा में है.' साफ काग़ज को टकटकी बांधकर देखते समय टोपीलाल के मन में कौंधा. लेकिन सदुपयोग़ कैसे हो, इस बारे में वह कोई निर्णय न कर सका. देर तक वह उसी स्थासन पर बैठा रहा. दोस्तह उसको लिवाने आए तो उसने उनकी ओर कोई ध्याैन न दिया. वे सभी खेल में डूब ग़ए.

सहसा एक विचार उसके दिमाग़ में कौंधा. किंचित असमंजस के बीच उसने काग़ज सामने फैलाया. मस्तिंष्कम को एकाग्र किया. टूटे-फूटे अक्षरों के साथ कलम अपने आप आगे बढ़ने लगी-

‘श्रीमान जी!

मेरा नाम टोपीलाल है. मेरे पिता राजमिस्त्री हैं. वे बड़ी-बड़ी इमारतें बनाते हैं. जब तक इमारत का काम पूरा होता है, हम आमतौर पर उसमें रहते हैं. इमारत तैयार होने के बाद, उसको मालिक के हवाले कर हम नए ठिकाने की ओर बढ़ जाते हैं. एक और इमारत बनाने के लिए.

मां कभी-कभी मुझे एक ग़रीब बंजारे की कहानी सुनाया करती है. उसके पास कुछ भेड़ें थीं. वह बहुत ही ईमानदार था. और मेहनती भी. फिर भी अपने परिवार का पेट बड़ी मुश्कि ल से भर पाता था. वह खेती करना चाहता था. उसका यह सपना कभी फला नहीं.

क्यों कि उसको शाप लगा था, कहीं न टिकने का. कुछ ऐसी ही जिंदगी हमारी भी है.

पिता जी कहते हैं कि हमारा एक गांव भी है. पर मैंने उन्हें कभी गांव जाते नहीं देखा. बताते हैं कि वहां एक महाजन के पास हमारी जमीन गिरवी पड़ी है. हर साल वह कुछ न कुछ रुपये गांव भिजवाते रहते हैं, फिर भी कर्ज है कि पीछा ही नहीं छोड़ता. मैं पिता जी और मां को जमीन के बारे में बातचीत करते हुए सुनता हूं. जमीन न छुड़ा पाने के कारण पिता जी बहुत दुःखी रहते हैं.

मेरी मां भी राजमिस्त्री है. देश की शायद सबसे पहली महिला राजमिस्त्री. पिता मानते हैं कि उनके टोले में कोई भी काम के मामले में मां की बराबरी नहीं कर सकता. जब भी अच्छेम काम की जरूरत हो, उसके लिए या तो उन्हेंई खुद आगे आना पड़ता है, या फिर मां को. पिता जी मां की झूठी तारीफ नहीं करते. वह है ही ऐसी. बल्किु इससे भी कहीं ज्यामदा.

छिः छिः! मेरा लेख कितना गंदा है. मैं इसको सुधारना चाहता हूं. पर मेरे पास न काग़ज हैं, न कलम. यह काग़ज तोे बस भर ही चुका. कलम कल इसके मालिक को सौंप दी जाएगी. परसों बापू कह रहे थे कि वे मुझे पढ़ाना चाहते हैं. मैं उनकी मजबूरी जानता हूं. जिस इमारत को वे बनाने में जुटे हैं, वह दो साल में पूरी होगी. मुझे उस दिन का इंतजार है, इसलिए कि मैं पढ़ना चाहता हूं.

टोपीलाल

इन शब्दोंत को जोड़ने में टोपीलाल को करीब एक घंटा लग़ ग़या. एक-दो जग़ह काट-छांट भी करनी पड़ी. पर अंत में उसने अपने विचारों को काग़ज पर उतार ही दिया. तत्पलश्चामत उसने काग़ज को सहेजकर रख लिया. उस काग़ज का क्याक हो, वह सोच ही नहीं पाया. कुछ देर बाद वह वहां से उठा और घर की ओर चल दिया. रास्तेझ में उसको यह एहसास बना रहा कि वह हवा में तैर रहा है. मन-मयूर नाचता ही रहा.

रात को सोने चला तो भी बहुत प्रसन्नं था. मां ने कारण जानना चाहा तो वह मुस्कु रा दिया. काग़ज उसने मोड़कर तकिये के नीचे रख लिया. रात को एक बार आंखें खुलीं तो उसको हाथ से सहलाया. मन हुआ कि दीया जलाकर एक बार फिर अपनी लिखी इबारत पर नजर डाल ले-

‘मेहनती लोगों को नींद से जगाना पाप होता है'-मां और पिताजी की ओर देखकर उसके दिमाग़ में आया. उसने अपना इरादा बदल दिया.

अग़ले दिन जैसे ही मां और बापू काम के लिए रवाना हुए, वह डाकिया की कलम लौटाने के लिए निकल पड़ा. साथ में उसने वह काग़ज भी सहेज लिया, जिसपर पिछले दिन जतन से कुछ अक्षर उकेरे थे. रास्तेक में उसने रुक-रुककर कई बार उस पत्र को पढ़ा. सोचा कि आगे क्यार किया जाए. पर बेकार. दिमाग़ कोई निर्णय ले ही नहीं पा रहा था.

‘अरे! आज तू फिर यहां, कल की तरह क्याय आज भी मेरी डाक को गिरवाएगा?' साइकिल पर आते डाकिया ने उसको देखकर दूर ही से कहा.

‘आपका पेन!' बिना कुछ कहे टोपीलाल ने डाकिया का पेन उसकी ओर बढ़ा दिया.

‘अरे वाह! कल मैंने इसे काफी खोजा था. अब याद आया कि यह यहीं पर छूट ग़या था।' पेन देखकर वह बोला। सहसा उसकी आंखों में विस्माय-भाव उभरने लगे, ‘किंतु यह पेन तो बहुत मामूली है. मुश्किनल से तीन-चार रुपये का. माना कि मुझे इसके गुम होने पर भी अफसोस हुआ था. मग़र तुझे इसके लिए यहां आने की क्याम जरूरत थी!' टोपीलाल चुप। क्याा कहे, कुछ समझ ही नहीं पाया।

‘रहता कहां है?' डाकिया ने खुशी और संतोष-भरे शब्दों में पूछा. टोपीलाल ने चुप्पी् को सहेजते हुए अपने ठिकाने की ओर इशारा कर दिया.

‘हूं, अच्छीा बात है. हालांकि आजकल कुछ लोग़ इसे कतई आवश्यकक नहीं मानते. पर मुझे अब भी यही लग़ता है कि ईमानदार होना बहुत अच्छी बात है. मेरे पास समय होता तो इसपर और भी बातें करता. तुम जैसे बच्चोंम से बात करने में तो मुझे बहुत ही मजा आता है. लेकिन समय ही नहीं मिलता. काम ही ऐसा है. प्रतिदिन कई किलो डाक बांटता हूं. फिर भी हर दिन ढेर सारी डाक आ जाती है. इतनी फुर्सत भी नहीं कि किसी के साथ जी खोलकर बात कर सकूं. पर कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल, कभी न कभी तो इतना समय जरूर मिलेगा, जब हम दोनों अच्छेर दोस्तोंह की तरह बैठकर देर तक बतिया सकेंगे. अच्छाी, अब मैं चलता हूं. देर हुई तो गुर्राते सूरज का कोप चांद पर झेलना पड़ेगा. और आज तो जल्दरबाजी में मैं अपनी टोपी भी घर भूल आया हूं।'

डाकिया को मुड़ते देख टोपीलाल को अचानक कुछ सूझा-

‘जरा अपना पेन दिखाएंगे?'

‘अब क्याा है? मुझे पहले ही काफी देर हो चुकी है।' कहते हुए डाकिया ने पेन टोपीलाल की ओर बढ़ा दिया। पेन लेकर टोपीलाल सड़क किनारे घुटनों के बल बैठ ग़या। फिर डाकिया से नजरें बचाते हुए उसने जेब से काग़ज निकाला और उसपर झुक ग़या।

‘इन चिटि्‌ठयों में न जाने कितने जरूरी संदेश छिपे हों...इस तरह देर करना तो अपनी ड्‌यूटी के साथ नाइंसाफी होगी। मैं चलता हूं. पेन तुम्हादरे लिए जरूरी है तो रख लो।' कहते हुए डाकिया ने हैंडल संभाला। पैडल मारने ही जा रहा था कि टोपीलाल फिर सामने आ ग़या-

‘लीजिए!' कहते हुए उसने पेन आगे बढ़ाया। उस समय वह बुरी तरह सकुचाया हुआ था। डाकिया ने हाथ बढ़ाया। तत्क्षजण उसने अपना बायां हाथ आगे कर उसमें छिपाया हुआ काग़ज डाकिया को थमा दिया। उस समय उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। सांसें घुटी जा रही थीं। पल-पल खड़ा रहना भारी साधना लग़ रही थी।

‘यह क्याि है?' डाकिया ने काग़ज को हाथ में लेकर उल्टाा-पलटा. फिर काग़ज के

पीछे लिखे शब्दों को पढ़ा. टूटे-फूटे अक्षरों में वहां लिखा था-‘हमारे राष्ट्रमपति जी...'

‘क्याे मैं इसे श्रीमान्‌ राष्ट्र्पति महोदय के नाम तुम्हानरी ओर से चिट्‌ठी समझूं.' डाकिया ने ग़र्दन ऊपर उठाई. पर टोपीलाल वहां कहां? वह तो कभी का वहां से भाग़ छूटा था. हालांकि ऐसा कुछ नहीं था। परंतु उसको लगा कि डाकिया उसको आवाज देकर रोक रहा है। साइकिल पर बैठकर उसका पीछा कर रहा है। साइकिल के पैडल की आवाज उसके कानों में गूंजती रही। काफी देर तक वह भाग़ता ही रहा। पलटकर देखने की हिम्मैत ही न पड़ी.

अज्ञान डर का स्वाेभाविक उत्पे्ेररक है...बचपन की सरलता डर को भी रचनात्म क बनाने का सामर्थ्य रखती है।

सोच से बड़ा स्ववप्नव मन में भूचाल लाए बिना नहीं रहता।

टोपीलाल को घर पहुंचने के बाद भी चैन न मिला. तरह-तरह के विचार दिमाग़ में आने लगे. चौकन्नीड निगाह से वह बार-बार इधर-उधर देखता. जरा-सी आहट पर चौंक पड़ता. दिल जोर-जोर से धड़कने लग़ता. अपनी मूर्खता पर कभी हंसी आती, कभी तेज गुस्सा ...राष्ट्रपपति के नाम पर चिट्‌ठी और वह भी बिना डाक टिकट, बगैर लिफाफे के? पुलिस उसको पकड़ने के लिए आती ही होगी. कभी लग़ता कि पुलिस आ ही पहुंची है. वह घबराकर छिपने का ठिकाना ढूंढने लग़ता.

ऊपर से पत्र के अंत में वह राष्ट्रतपति जी को ‘नमस्तेष' लिखना भी ध्याीन न रहा. यह तो सरासर मूर्खता है. अपमान है उनका. राष्ट्र पति जी का पत्र पढ़ेंगे तो क्याभ सोचेंगे. कि कितना बेशऊर लड़का है. बड़ों के साथ व्यरवहार करना भी नहीं आता. माता-पिता ने उसे कुछ सिखाया कि नहीं.

ग़लती मेरी, पर बदनामी तो मां और बापू की ही होगी. मां को कितना बुरा लगेगा. और बापू, हो सकता है मुंह से कुछ न कहें, पर दुःख तो उन्हें भी होगा न! लोग़ दोष भी उन्हींि को देंगे. बेचारे ग़रीब, राजमिस्त्री जो ठहरे. हाथ के कितने हुनरमंद है, यह कौन जान पाएगा? पूरी दुनिया में उनकी बदनामी होगी, सिर्फ मेरी वजह से।

फिर काग़ज तो उसने यूं ही लिख मारा था. यह देखने के लिए कि उसको लिखना आता भी या नहीं. जब लिख रहा था तो कहां सोचा था कि उसे राष्ट्र पति जी को भिजवाएगा ही. ऐसा वह सोच भी कैसे सकता है। वह तो जेब में रखा था. डाकिया को देखकर न जाने क्याभ सूझा कि पत्र उसको थमा दिया. सचमुच बहुत बड़ी मूर्खता की है उसने.

बावजूद इसके इस समय उसको इतना घबराना भी नहीं चाहिए. यह समय घबराने का है भी नहीं। उसको हिम्मदत से काम लेना पड़ेगा। यह भी जरूरी नहीं है कि डाकिया बिना टिकट के उस पत्र को उसके ठिकाने तक पहुंचा ही दे. हो सकता है वह उसको

फाड़ ही डाले. जब बड़े आदमियों का पत्र समय पर नहीं पहुंचा पाता तो एक बच्चेस के पत्र के लिए उसको कहां फुर्सत होगी.

अग़र वह पत्र राष्ट्रिपति जी के हाथों तक पहुंच ही ग़या तो. क्याे वे उसको पढ़ेंगे? आखिर क्योंे नहीं पढ़ेंगे. उस दिन भाषण में प्रधानाचार्य जी बता रहे थे कि इस देश में सभी बराबर हैं. कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है. तब तो राष्ट्रंपति जी उस पत्र को जरूर पढ़ेंगे. हो सकता है उसका जवाब भी दें.

उनका जवाब आया तो अग़ले पत्र में लिखूंगा कि अपने टोले में मैं अकेला ही अनपढ़ नहीं हूं. बाकी बच्चे भी हैं. जो पढ़ना चाहते हैं. मेरी मां तो फिर भी बहुत समझदार हैं. पर सभी बच्चे तो मेरे जितने भाग्य़शाली नहीं हैं. उन्हेंी स्कूढल की बेहद जरूरत है. पत्र को पढ़ते-पढ़ते जब वे उसके अंत में पहुंचेंगे. हो सकता है कि टोपीलाल नाम को पढ़कर उन्हें हंसी भी आ जाए. जैसे उस दिन जब मैं पहली बार पाठशाला ग़या था तो कक्षा के सारे बच्चे मेरा नाम सुनकर हंस पड़े थे. उस दिन मास्टजरजी अग़र उन्हें डांटते नहीं तो वे हंसते ही रहते.

फिर भी राष्ट्रपपति जी को पत्र लिखने से पहले मुझे मां से जरूर पूछ लेना था. वह इतना तो बता ही देतीं कि इतने बड़े आदमी को नमस्ते में क्या लिखना चाहिए. चरणस्पथर्श या हाथ जोड़कर प्रणाम. या इससे भी अधिक कुछ हो सकता है! क्यात अब बात करके देखूं मां से! पर न जाने वह क्या सोचने लगे. हो सकता है कि विश्वाधस ही न करे कि मैं इतने बड़े आदमी को चिट्‌ठी लिख सकता हूं. या बुरी संभावनाएं उसको भी डरा दें.

ऊंह चिट्‌ठी! न लिफाफा, न डाक टिकट, न पूरा पता, न मजमून। एक मामूली कोरे काग़ज पर लिखे चंद अक्षरों को भला कौन चिट्‌ठी मानेगा. दिमाग़ खराब है मेरा.

पूरे दिन टोपीलाल बेचैन रहा. उल्टे़-सीधे विचार दिमाग़ को लगातार मथते रहे. उस रात उसका न तो भोजन में मन लगा, न ही मां की कहानी में. सोने की कोशिश की तो नींद छूमंतर हो ग़ई. जैसे पलकों पर पहरा बैठा दिया हो किसी ने. वह देर तक करवट बदलकर नींद आने का इंतजार करता रहा. मां ने कारण जानने की कोशिश की, परंतु उसने टाल दिया. बस डरे हुए बालक की तरह मां से चिपक ग़या.

ऐसी ही खींचातानी के बीच कब पलकें भारी हुइंर्, कब नींद ने मेहरबानी की, वह जान ही नहीं पाया. उस रात उसे सपने भी आए तो डरावने से. सुबह होने से पहले ही नींद अचानक टूट ग़ई. उसके बाद उसने सोने का प्रयास किया तो नींद आंखों को भुलावा देेती रही. छलावा बनकर छलती रही. जल्दीा सुबह हो, करवटें बदलते हुए देर तक वह यही सोचता रहा.
 
छोटा हो या बड़ा, जब कोई निःकलुष मन से किसी के बारे ग़हराई से सोचता है तो वह कभी न कभी अपने लक्ष्या को छू ही लेता है. -

उम्मी द के विपरीत आने वाली सुबह ताजगी से भरी थी.

माता-पिता के काम पर जाने के बाद टोपीलाल ने जल्दीत-जल्दीो काम निपटाया. फिर बाहर आ ग़या. उसको विश्वाहस था कि निराली उधर से जरूर गुजरेगी. कि सिर्फ उसी से वह अपने दिल की बात कह सकता है. उसको मालूम था कि निराली अब देर से आती है. मां की बीमारी के कारण घर का पूरा काम उसी को निपटाना पड़ता है.

निराली की मां अब भी अपनी गुमटी पर जाती. मां के काम पर निकल जाने के बाद जल्दीड-जल्दीि घर का काम समेटती. फिर कबाड़ बीनने का थैला लेकर निकल जाती. दो-ढाई घंटे तक सड़कों और ग़लियों की खाक छानती. रास्ते में ही कबाड़ को बेचकर घर लौटती. घर पहुंचकर जल्दीक-जल्दीं चूल्हाल सुलगाती. फिर छोटी-छोटी रोटियां सेंकती, उसके बाद घर का बाकी काम सहेजती है.

तब तक मां के लिए रोटी पहुंचाने का समय हो जाता. खाना लेकर सड़क पर पहुंचती. रास्तेा में टोपीलाल उसे मिल जाता था. दोनों साथ-साथ स्कूोल तक रोटियां पहुंचाने जाते. लौटते समय निराली कुछ देर के लिए टोपीलाल के पास रुकती. दोनों बाकी बच्चों् के साथ खेलते, ग़पशप करते. दोपहर बाद घर निराली वापस लौट आती. घर का काम समेटने. अपने धंधे के बारे में निराली ने मां को कुछ नहीं बताया था. और तो और टोपीलाल से भी छिपाकर रखा था. इस डर से कि कहीं वह मां से कह न दे.

लग़भग़ एक घंटे की प्रतीक्षा के बाद निराली दिखाई पड़ी. तेज कदमों से चलती हुई. टोपीलाल को देखकर उसने मुस्क़राने का प्रयास किया. वह आगे बढ़कर उसके रास्तेा में खड़ा हो ग़या-

‘आज बहुत देर कर दी?'

‘हां, लकड़ियां कुछ गीलीं थीं. खाना बनाने में ज्याादा समय लगा.' टोपीलाल को याद आया. बीती रात बूंदा-बांदी हुई थी. टोले में लोग़ ईंटें खड़ी करके उनके ऊपर पॉलिथीन डाल लेते थे. वह कम पड़े तो सीमेंट के खाली थैले और पुराने कपड़े सर पर छत का काम देते. यह व्य वस्थाप बारिश के समय धोखा देने लग़ती. उस समय लोग़ निर्माणाधीन बिल्डिंदग़ में ही ठिकाना ढूंढते. जग़ह कम पड़े तो एक ही बरामदे में पचासों भर जाते. गीली लकड़ियां जलते समय धुआं करतीं. मर्द तो घूमने के बहाने बाहर निकल जाते थे. पर औरतों और छोटे बच्चोंक के लिए वे क्षण बहुत ही कष्टंमय होते. उस समय कभी-कभी तो पूरी रात जाग़कर काटनी पड़ जाती थी. रात को याने बच्चेा रो पड़ें तो बाकी पूरी रात बारिश थमने की उम्मीीद में बितानी पड़ती.

‘मुझसे कह दिया होता, मैं चार रोटियां मां से सिंकवा लेता.' टोपीलाल ने निराली का दुःख बांटना चाहा.

‘कहती कब? बारिश तो रात आई थी. तेरी मम्मील तो सवेरे ही काम पर निकल जाती हैं.' कहकर निराली हंसी.

‘हां, मैं भी कभी-कभी एकदम मूर्खों जैसी बात कर देता हूं.' टोपीलाल ने अपना माथा ठोकते हुए कहा.

‘मैं तो रोज ही सुनती हूं.' निराली ने कहा और अपनी बात पर स्वंयं ही हंस दी, ‘अब रास्ताे छोड़. मां भूखी होगी.'

टोपीलाल को अपनी भूल का एहसास हुआ. वह साथ-साथ चलने लगा. उसके मन में अजीब-सी हलचल मची थी. चिट्‌ठी के बारे में निराली को बताए या नहीं, वह इसका फैसला कर ही नहीं पा रहा था.

उलझन में निराली भी थी. मित्रता में अधिक से अधिक पारदर्शिता जरूरी है, उसने कहीं सुना था. तभी से उसको लग़ रहा था कि अपने काम के बारे में टोपीलाल से छिपाकर वह ग़लती कर रही है,

‘एक बात बताऊं...' रास्ताम चलते हुए निराली ने कहा, ‘मैंने काम पर जाना शुरू कर दिया है.'

‘सभी को कोई न कोई काम तो करना ही पड़ता है.' टोपीलाल ने कहा. वह अपने ही सोच में डूबा हुआ था.

‘मां बता रही थी कि उसको आजकल मेरी शादी की बड़ी चिंता है.' टोपीलाल की उदासीनता से आहत निराली ने उसको दूसरा झटका देने की कोशिश की.

‘अभी से...!' निराली का यह प्रयास कारग़र सिद्ध हुआ. टोपीलाल एकाएक चौंक पड़ा. दिमाग़ में घूम रही बाकी बातें हवा हो ग़ईं.

‘हम लड़कियों को तो ब्यााह करना ही पड़ता है. साल दो साल इधर या उधर. मां कह रही थी कि उसका कोई भरोसा नहीं, किसी दिन आंखें मुंद ग़ईं तो...!'

‘तेने कुछ नहीं कहा...मना कर देती!'

‘क्योंक कर देती मना! मां ठीक ही तो कहती है. सवेरे-सवेरे पीठ पर बोरा डालकर निकलना. दिन-भर ग़ली-मुहल्लेस के आवारा कुत्तों से उलझना, लोगों की छींटाकशी सहना, भला कौन लड़की चाहेगी. शादी के बाद कम से कम यह तो करना नहीं पड़ेगा.' निराली ने कहा. वह सबकुछ बताया जिसे अभी तक छिपाए थी. टोपीलाल चुप. लगा कि उसका दिमाग़ घूम रहा हो. आवेश में कहे-सुने का होश ही नहीं रहा-

‘तुम सब पाग़ल हो...एकदम पाग़ल. इतनी कम उम्र में कोई ब्यापह किया जाता है. मैं लिखूंगा, राष्ट्रीपति जी को लिखूंगा...!'

टोपीलाल की बात सुनकर निराली हंसने लगी.

‘ये राष्ट्ररपति कौन हैं?' हंसी थमने के बाद निराली ने पूछा. उसके चेहरे पर मासूमियत थी. टोपीलाल को लगा कि अनायास ही चर्चा उस ओर मुड़ ग़ई है, जिस ओर वह लाना चाहता था. जिसके लिए वह बीती रात से परेशान था. इसलिए अपनी हैरानी जताते बोला-

‘अरे! तू इतनी-सी बात भी नहीं जानती...कभी बड़े पार्क की तरफ नहीं ग़ई?'

‘अक्स.र जाती रहती हूं...वहां ऐसा क्यां है?'

‘पार्क में जो मूर्ति लगी है, वह राष्‍ट्रपति जी की ही है. वे खुद राजधानी में रहते हैं. उनके हजारों नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ी, मोटर-बंग़ला हैं.'

‘धत! पाग़ल हुआ है क्या़! मेरी मां तो बताती है कि मूर्तियां उन्हीं की लगाई जाती हैं, जो मर चुके होते हैं.'

‘झूठ, मरे हुओं की मूर्तियां भला कोई क्योंय लग़वाएगा?'

‘उन्हेंच याद रखने के लिए. महान लोगों के प्रति एहसान जताने का दुनिया का यह भी एक तरीका है.' निराली ने ऐसे कहा, मानो लिखा हुआ बांच रही हो.

‘किसने बताया?'

‘मामा ने, वे बापू के साथ रह चुके थे. पिछले ही वर्ष उनकी मृत्युन हुई है.'

‘तब तो वे बहुत बड़े आदमी थे.' कहते समय टोपीलाल का ध्याृन फिर उस पार्क की ओर चला ग़या.

‘तो पार्क में जिनकी मूर्तियां लगी हैं, वे सभी मर चुके हैं.'

‘मां तो यही कहती है.'

‘क्यात, राष्ट्रंपति जी मर चुके हैं?'

टोपीलाल को एक बार फिर झटका लगा. दिमाग़ एकदम भन्ना् ग़या. उल्टेा-सीधे विचार भरमाने लगे. जैसे-तैसे उसने राष्ट्र पति जी को चिट्‌ठी लिखी है, क्या वह बेकार ही चली जाएगी. रात-भर उसने जो सपने देखे वह क्या यूं ही थे. उसको लगा कि जैसे उसके पैरों की ताकत किसी ने सोख ली हो. उसको खड़ा होना भारी लग़ने लगा. लगा कि किसी भी समय धरती पर जा गिरेगा.

निराली ने उसको कई बार टोका. माफी मांगी. बार-बार आश्वाासन दिया कि घर जाते ही मां से कह देगी कि अभी उसकी शादी की जल्दीी न करें. जब तक वह नहीं चाहेगा, मां से शादी की हामी भरेगी ही नहीं. मग़र उसके सभी प्रयास असफल रहे. टोपीलाल की चुप्पीब कायम रही. उसकी उदासी सलामत रही.

रोटी पहुंचाने के बाद वापसी में भी टोपीलाल का मौन उसके साथ रहा. निराली समझ ही नहीं पाई कि उसको कैसे मनाए. क्याट करे कि उसका मौन टूटे. और जब वह थक ग़ई तो उसने भी चुप्पीह साध ली. ठिकाना करीब आते ही टोपीलाल ने मुंह खोला-

‘मैं चलता हूं. अग़र तेरी मां तेरे ब्या ह की जल्दील कर रही है, तो इसी में तेरी भलाई है. इन बड़े आदमियों का कोई भरोसा नहीं, कभी भी चल बसते हैं. इनसे कोई उम्मीयद रखनी ही बेकार है.'

इसके बाद वह बिना कुछ कहे, निराली से अलग़ हो ग़या. उसका उत्साहह मर चुका था.

आने वाली रात टोपीलाल के जीवन की शायद सबसे उदास रात थी. उसका अपना दिमाग़ कोई भी फैसला करने में असमर्थ था. माथा घूम रहा था. झंझावातों के बीच यदि उम्मीअद बची रहे तो संकट जल्दीर टलता है, आने वाला समय अनुकूल हो जाता है.

अग़ला दिन आया. उदास-उदास. फिर कुछ और दिन बीते. टोपीलाल के मन में कोई उल्ला स न था. उस दिन हमेशा की तरह मां घर के काम में जुट ग़ई थी. रोटी बनाकर जैसे ही मां और बापू काम पर जाने को तैयार हुए, टोपीलाल उनके पास पहुंच ग़या-

‘बापू, तुम मुझे काम दिलवाना चाहते थे?'

‘क्योंन? ऐसी क्या जल्दी. है?' पिता को आश्चमर्य हुआ, ‘कहीं मां ने डांट तो नहीं दिया. पर वह तो कभी ऐसा नहीं करती.'

‘सभी बच्चेु काम करते हैं, मुझे भी काम करना चाहिए...' कहते समय टोपीलाल के मन में निराली की छवि कौंध रही थी. कंधे पर थैला लटकाए, ग़लियों से कबाड़ चुनती, कुत्तों और शैतान बच्चोंं से खुद को बचाती हुई.

‘और तेरी पढ़ाई...तू तो पढ़ना चाहता है न!'

टोपीलाल ने कोई जवाब नहीं दिया. ग़र्दन झुकाए पांव से जमीन कुरेदता रहा. तब तक मां रोटियां बांध चुकी थी. वह बाहर आई तो टोपीलाल एक तरफ हो ग़या.

‘काम के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है, अभी तो तेरे खेलने-खाने के दिन हैं.' टोपीलाल न जाने किस सोच में था. अपने स्थाईन पर अटल. तब उसके पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘चिंता मत कर. मैंने मालिक को मजदूर और कारीग़र बढ़ाने के लिए राजी कर लिया है. भग़वान ने चाहा तो यहां का काम सात-आठ महीने में पूरा हो जाएगा. उसके बाद हम ऐसी जग़ह काम करेंगे, जहां तेरी पढ़ाई चल सके.'

इस तरह का आश्वाोसन बापू कई बार पीछे भी दे चुके थे. इतनी बार कि टोपीलाल को उनकी बातों पर अविश्वाकस होने लगा था. फिर भी बापू का यह आश्वातसन उसको भला लग़ता. इससे एक उम्मीिद बंधती थी. परंतु उस समय बापू का आश्वा सन उसकी खास मदद नहीं कर सका.

वह बोझिल कदमों से धीरे-धीरे बाहर आया और बिल्डिंकग़ के उस छोर की ओर बढ़ ग़या, जहां बाकी बच्चेी उसके आग़मन की प्रतीक्षा कर रहे थे. वहां पहुंचकर उसने लूडो का खेल निकाला और साथी बच्चों के साथ प्रकृति के उस खेल को नए सिरे से समझने की कोशिश करने लगा. उसने खेल में खुद को लगाए रखने का प्रयास किया, लेकिन मन न लगा. अंततः वह उठा और एक साफ स्थाउन देखकर जमीन पर लेट ग़या.

साथी बच्चोंल को उसका व्यतवहार अजीब-सा लगा. वे खेल छोड़कर टोपीलाल के पास जमा होने लगे.

‘टोपी भइया आपकी तबियत तो ठीक है.' एक लड़के ने पास आकर पूछा.

‘मेरा भइया जब लेतता है तो मां कहती है कि उसको बुखार है, तोपी भइया को भी बुखार है.' एक और बच्चेक ने कहा. पल-भर में बच्चोंत के बीच बात फैल ग़ई. उसी समय एक मासूम-सी लड़की आगे आई. उसके हाथ में लाल मिर्चें थीं. बाकी बच्चोंब को पीछे ठेलने का प्रयास करती हुई, वह चिल्लापई-

‘हटो-हटो, मेरे पास लाल मिर्च हैं, मेरी मां बुखार होने पर घर में लाल मिर्च का धुआं करती है. उपला लाओ, आग़ जलाओ...लाल मिर्च का धुआं सूंघते ही बुखार फौरन छू-मंतर हो जाएगा.' बच्चीर की मासूमियत देख टोपीलाल हंस दिया. कुछ देर के लिए उसका सारा तनाव गायब हो ग़या. वह बच्चोंा के प्याकर और उनकी बातों में खो ग़या. इस बीच वह लड़की आगे आकर टोपीलाल पर झुक ग़ई-

‘चलो हटो, मुझे कुछ नहीं हुआ है.'

‘पर अभी-अभी तो तुम्हेंह बुखार था.' एक बच्चा बोला.

‘नहीं, मैं अब बिलकुल ठीक हूं.' टोपीलाल ने बैठने का प्रयास किया.

‘देखा, मिर्च का नाम सुनते ही बुखार दुम दबाकर भाग़ ग़या.' हाथ में मिर्च थामे उस लड़की ने कहा.

‘मैं इन ढकोसलों पर विश्वाचस नहीं करता. मां कहती है कि टोने-टोटके बकवास होते हैं.'

‘ठीक होने के बाद सब यही कहते हैं.' लड़की बोली. अभिमान झलकाते हुए. सभी बच्चे हंसने लगे. उसके बाद टोपीलाल ने लाख भरोसा दिलाने की कोशिश की कि उसे बुखार वगैरह कुछ भी नहीं था. मग़र एक ने भी उसकी बात पर भरोसा नहीं किया. सभी बच्चेे मानते रहे कि बुखार लाल मिर्च देखकर भागा है.

‘दीदी, लाल मिर्च से बुखार क्यों भाग़ जाता है?' एक बच्चे. ने आगे आकर पूछा. लड़की इस बारे में अनजान थी. वह बग़लें झांकने लगे या कोई बहाना बनाए, उससे पहले ही एक लड़का पीछे से चिल्लातया-

‘लाल मिर्च खाकर बुखार का मुंह जल जाता है, उसको पानी तो कोई पिलाता नहीं, इसलिए बेचारा नदी की ओर दौड़ लगा जाता है, क्योंन टोपीलाल भइया?'

‘यह तो बिन्नाज की मां ही बता पाएगी.' कहकर टोपीलाल ने उस लड़की की ओर इशारा किया, जो मिर्च लेकर आई थी. वह शरमाकर पीछे हट ग़ई.

‘अब तो आप ठीक हैं, चलिए हमारे साथ खेलिए.' कुछ बच्चेन घेरा तोड़कर आगे आए. निराली से मिलने का समय हो चुका था. मग़र टोपीलाल का जी कहीं जाने का न हुआ. इसलिए वह बच्चों के साथ बैठ ग़या. दिन आहिस्ताो-आहिस्ता बीत रहा था.

तभी बाहर खटका हुआ. टोपीलाल का ध्याान उस ओर चला ग़या. सामने निराली थी. टोपीलाल खेल छोड़कर खड़ा हो ग़या.

‘कब आई तू?' टोपीलाल ने सवाल दागा. स्वलर में शिकायत भरी थी. वह जवाब की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि निराली ने उसको चौंका दिया-

‘मैंने कबाड़ बीनना छोड़ दिया है.'

‘कब से?'

‘आज ही से. मैंने मां को अभी मेरी शादी न करने को भी मना लिया है.'

‘तो अब क्या़ करेगी?'

‘तू बता, क्याे करना चाहिए मुझे?' निराली ने उल्टार प्रश्न दाग़ दिया. टोपीलाल उसके लिए तैयार ही नहीं था. वह बग़लें झांकने लगा-

‘मैं क्याय बताऊं? जाकर अपनी मां से पूछ.'

‘मां से पूछूं तो क्यात वह काम करने देगी. कहेगी कि अग़र इतनी ही बड़ी बनती है तो ब्याषह कर ले.'

‘तो कर ले ब्याऊह, मेरा दिमाग़ क्यों चाटती है!' टोपीलाल गुस्साहया. परंतु अग़ले ही पल उसको लगा कि उससे ज्यातदती हुई है. इतने सारे बच्चों के सामने निराली के साथ उसका ऐसा व्य वहार ठीक नहीं. मन ही मन पछताता हुआ वह आगे बढ़ ग़या. निराली पीछे-पीछे चलती ग़ई.

‘तेरी मां को बुढ़ापे में अकेले काम करते देख मुझे अच्छास नहीं लग़ता. तेरी जग़ह अग़र कोई लड़का होता तो उन्हें आराम मिलता...' कहकर वह सोचने लगा.

‘तू तो मुझसे भी बड़ा है, क्या. तू अपनी मां को आराम पहुंचाता है. बल्कि तू तो घर का उतना काम भी नहीं करता, जितना कि मैं कर लेती हूं.' निराली के जी में आया कि टोपीलाल को खरा-खरा जवाब दे. किंतु वह उसको नाराज नहीं करना चाहती थी. इसलिए चुप्पीज साधे रही. कुछ देर पश्चाैत टोपीलाल ने ही पूछा-

‘तूने कभी यह नहीं बताया कि रहती कहां है?'

‘कल्लाकर बस्तीा में, किराये की झुग्गील है. पर तू यह सब जानकर क्या करेगा?'

‘कल्लाकर बस्तीा से तो स्कू ल बहुत दूर है, तेरी मां को पैदल आने-जाने में घंटों लग़ जाते होंगे?'

‘क्याा करें, जाना तो पड़ेगा ही.'

‘अग़र तू चाहे तो अपनी मां को लेकर यहां रह सकती है. दिन में मजदूरों और कारीग़रों को प्याास लग़ती है. एक जग़ह पानी भी लेकर बैठ जाएंगी तो मजदूरों की प्या स बुझेगी, बदले में मजदूर जो देंगे उससे तुम दोनों का काम चल जाएगा. मजदूर लोगों की अपनी भी छोटी-छोटी जरूरतें होती हैं, पानी न पिलाना चाहें तो उनके हिसाब की छोटी-मोटी चीजें भी रख सकती हैं. कम से कम किराया बचेगा और आने-जाने की परेशानी से भी मुक्तिन मिल जाएगी.' टोपीलाल को लगा कि उसने बहुत बड़ी सलाह दी है. गुरुता का एहसास उसको देर तक उल्लािसित करता रहा.

‘तुम्हाभरे टोले के लोग़ इसके लिए राजी होंगे?' निराली ने शंका प्रकट की.

‘वे मेरे बापू और मां का कहना नहीं टाल सकते. फिर तुम दोनों के आने पर तो उनको आराम ही मिलेगा. जिन चीजों के लिए उन्हेंे दूर जाना पड़ता है, वे उन्हींु दामों में बिलकुल करीब मिल जाया करेंगी.'

‘मैं मां से बात करूंगी? वह मान ग़ई तो...' निराली ने आश्वाोसन दिया.

‘अग़र मना करें तो कल ही मुझे बताना. मैं उन्हेंह जबरदस्तीे लिवा लाऊंगा.'

‘तू कौन होता है, मेरी मां के साथ जबरदस्तीउ करने वाला...' निराली ने बनावटी गुस्सेस के साथ कहा. टोपीलाल ऐसी प्रतिक्रिया के लिए तैयार न था. उसको तत्का्ल कोई जवाब न सूझा. कुछ देर तक निराली उसके मुंह की ओर देखती रही। फिर सहसा हंस पड़ी-

‘अरे! तू तो सचमुच बुरा मान ग़या, मैं तो बस मजाक कर रही थी. अच्छा कल मिलेंगे.' कहकर वह उल्टेो पांव भाग़ ग़ई. उसकी चाल में उमंग़ थी. पैरों में तेजी. लंबे बाल हवा में लहरा रहे थे। इतने दिनों बाद पहली बार टोपीलाल उसको खिला-खिला देख रहा था.

जीवन में वही दिन यादगार बनता है, जब कोई नया और भला काम होता है.

अच्छाम सोच बेहतर परिणाम भी लाता है.

चौथे दिन निराली अपनी मां के साथ टोले का हिस्साा बन ग़ईं. टोपीलाल खुश था. उसको अपनी उपलब्धिे पर ग़र्व था. निराली की मां ने गुमटी लगाना जारी रखा. पहले वे स्कूसल के बच्चोंा की जरूरत का सामान रखती थीं, अब मजदूरों के काम आने वाले चीजें बेचने लगीं. टोपीलाल के मजदूरों को पानी पिलाने के सुझाव पर उन्होंरने ध्याधन तो दिया, मग़र अपनी तरह से. एक मां की तरह टोपीलाल को समझाया भी था-

‘भग़वान ने धरती का तीन-चौथाई हिस्साए पानी से भरा है। ऐसे में प्या-से से पानी की कीमत वसूलना या वैसी उम्मीयद रखना भयंकर पाप, ई-वर को नाराज करना है.'

यह सोचकर कि टोपीलाल ने सीख गांठ बांध ली है, निराली की मां ने आगे कहा-‘जिंदगी में पुण्य कमाने का अवसर तो कभी मिला नहीं, अब पानी से पैसे कमाने का पाप तो मैं हरगिज अपने सिर नहीं लूंगी. पर तेरी बात भी टालूंगी नहीं.'

उसने उसी दिन दो नए घडे़ मंग़वा लिए. उन घड़ों में ताजा पानी रखकर अपनी गुमटी के सहारे रखने लगी. बगैर किसी लाभ-कामना के. न चाहते हुए इसका उसे व्या वसायिक लाभ भी हुआ. दिन में प्यारसे मजदूर पानी के बहाने उसके पास आते. उस समय सामने दुकान के रूप में फैली चीजों को देखकर उनका मन मचल उठता. इससे उसकी कमाई बढ़ने लगी. अपने खेल के बीच से फुर्सत निकालकर टोपीलाल निराली की

मां के पास बैठ जाता. दोनों देर तक बातें करते.

वह स्त्री पहले ही कम दयालु न थी. वहां आने के बाद उसकी भलमनसाहत और दयालुता बढ़ती ही जा रही थी. मजदूरों के बच्चोंी से उतना ही प्याकर करती जितना कि निराली से. उनके लिए टॉफियां, बिस्कुदट, नान-खटाई वगैरह बांटती ही रहती.

उसके आने से काम पर जाने वाली मजदूर औरतों को भी सहारा मिला था. उनके बच्चोंा को जब भी कोई समस्याई होती तो वे उसी के पास ले आतीं. उसके लंबे अनुभव का लाभ उठाने. बीमार होते तो वह रोग़ का उपचार बताती. भूखे होते तो खिला-पिलाकर चुप करने का प्रयास करती. कभी-कभी तो अपनी दुकानदारी का ख्याल छोड़कर भी वह उनके बच्चोंल की देखभाल करती.

बिल्डिंभग़ की चार मंजिलें तैयार हो चुकी थीं. तीन मंजिलों का निर्माण अभी बाकी था. टोपीलाल और उसके दोस्तोंभ की चौकड़ी अब तीसरी मंजिल की छत पर जमती. चारों तरफ से खुली होने के कारण वहां ठंडी हवा बहती. वातावरण ठंडा-सुहावना रहता. वहां खड़ा होने पर शहर का नजारा दूर-दूर तक एकदम साफ नजर आता था.

उस दिन टोपीलाल बच्चोंर के साथ खेल में मग्नव था. तभी नीचे दो आदमी दिखाई पडे़. उनमें से एक खाकी वर्दी में था. दूसरा सफेद कुर्ता-धोती पहने. धूप से बचने के लिए उसने एक सफेद टोपी अपने सिर पर रखी हुई थी. खाकी वर्दी वाला आदमी टोपीलाल को पहचाना-सा लगा. दोनों को नीचे पूछताछ करते देख टोपीलाल घबराया. उसका दिल जोर से धड़कने लगा.

अग़ले ही क्षण दोनों को ऊपर आते देखा. न जाने क्यों उन अजनबियों को देखकर टोपीलाल की घिग्गीि बंध ग़ई. मन में डरावने ख्याल आने लगे. अजीब-अजीब बातें मन को डराने लगीं. उन्हीं से घबराया हुआ वह खुद को छिपाने का प्रयास करने लगा. पचास-साठ मजदूर, कामगारों के रहते खुद को छिपाना आसान नहीं था. फिर भी बदहवास टोपीलाल अपने लिए ठिकाने की खोज करने लगा. उसी समय एक लड़का तेजी से ऊपर आया-

‘टोपीलाल..टोपीलाल...!'

‘क्योंा चिल्लाप रहा है?'

‘वे लोग़ तुझे नीचे बुला रहे हैं.'

‘वे कौन?'

‘मुझे क्या़ मालूम?'

‘किसलिए आए हैं?'

‘नहीं पूछा!'

‘घनचक्कूर, कम से कम नाम और पता तो पूछा ही होगा?'

‘मुझे नहीं मालूम. बता रहे हैं कि राजधानी से आए हैं.'

‘यह राजधानी क्या होती है?' किसी बच्चेो ने पूछा. किंतु राजधानी का जिक्र छिड़ते ही टोपीलाल को झटका लगा. राष्ट्रेपति जी के नाम लिखा हुआ पत्र अचानक याद आ ग़या. याद आया कि उसमें वह नमस्कारर लिखना तो भूल ही ग़या था. ऊपर से पत्र बिना डाक टिकट लगाए डाकिया को भी सौंप दिया था. यह आदमी राष्ट्रकपति जी के यहां से ही आया होगा. पुलिस भी साथ होगी. पहचान के लिए डाकिया साथ है. पर निराली तो बता रही थी कि राष्ट्र पति जी मर चुके हैं. चिट्‌ठी तो उन्हेंा मिली ही नहीं होगी...फिर पुलिस के आने का कारण?

टोपीलाल के दिमाग़ में विचारों का अंधड़ था. डर था और सघन आतंक भी. उसको कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वे लोग़ सीधे ऊपर ही आ रहे थे. इसीलिए खुद को बचाने का कोई अवसर भी नहीं था. टोपीलाल के दिल की धड़कनें बढ़ ग़ईं. लड़खड़ाते कदमों से वह आने वाले क्षणों की प्रतीक्षा करने लगा.

‘अच्छाढ होता कि मैं मां से किसी तरह भग़वान को मनाने का तरीका सीख लेता. इस समय वह काम आता.' भयभीत टोपीलाल के मन में कौंधा. तभी सफेद कपड़ों वाले आदमी को साथ लिए डाकिया छत पर पहुंच ग़या.

‘वो रहा टोपीलाल!' उनके साथ आ रहे लड़के ने इशारा करके बताया. टोपीलाल की सांस थमने लगी. भय से देह थरथरा उठी. अब छिपने का भी लाभ न था।

‘साहब, यही वह लड़का है, जिसने मेरा मामूली पेन भी अग़ले दिन लौटा दिया था. मुझे तो आज ही पता चला कि उस पेन को लौटाने के लिए यह यहां से मीलों दूर पैदल चलकर ग़या था. इतना ईमानदार और भला लड़का मैंने आज तक नहीं देखा.' डाकिया की आवाज टोपीलाल के कानों में पड़ी. दूर होने के कारण वह उसके शब्दोंे को समझने में नाकाम रहा. परंतु उसके चेहरे और हाव-भाव देख उसकी बेचैनी घटने लगी. हालांकि दिल में धुकधुकी अब भी मची हुई थी.

‘मुझे राष्ट्र पति जी ने भेजा है.' वह आदमी आगे बढ़ता हुआ बोला. उसके चेहरे पर मुस्कांन थी, ‘उन्हेंस तुम्हींा ने पत्र लिखा था, न!'

‘जी..वो तो बस यूं ही. मैं भूल ग़या था कि मेरी जेब खाली है. पर आप चिंता मत कीजिए, मां से कहकर मैं डाक टिकट के पैसे दिलवा दूंगा.' टोपीलाल ने किसी तरह कहा.

‘अरे हां, याद आया, तुम्हापरा वह पत्र बैरंग़ था...' डाकिया के साथ आया आदमी लगातार मुस्क रा रहा था.

‘पत्र में मैं नमस्तेा भी नहीं लिख पाया था. वह मेरा पहला खत था. मेरी मूर्खता थी कि बिना यह जाने कि पत्र कैसे लिखा जाता है, मैंने राष्ट्र पति जी को पत्र लिखा. पर पहली बार इतनी चूक तो माफ होनी चाहिए...'

‘चूक कैसी! राष्ट्रनपति जी तो तुमसे बहुत प्रसन्नर हैं. वे बच्चोंत से बेहद प्यािर करते हैं. उन्होंेने ही मुझे तुम्हा्रे पास भेजा है.'

‘मेरे पास क्योंा?' टोपीलाल के मुंह से सहसा निकला. उस आदमी की बातों में अजीब-सी कशिश थी. टोपीलाल ने महसूस किया कि वह उसकी ओर खिंचता जा रहा है. लेकिन मन में समाया हुआ डर अब भी उसके सहज होने में बाधक बना था.

‘लोग़ तो कहते हैं कि राष्ट्रतपति जी मर चुके हैं.'

‘छिः! वे हमारे महान राष्ट्रषपति जी हैं. हमारे देश के गौरव, मान-अभिमान सबकुछ.उनके लिए ऐसे कुवचन नहीं बोलते...'

‘फिर वे मूर्तियां जो पार्क में लगी हैं, निराली की मां कहती हैं कि जिनकी वे मूर्तियां हैं, वे सभी मर चुके हैं.'

‘तुम बहुत भोले हो. साथ में ग़लतफहमी का शिकार भी. राष्ट्रत की तरह राष्ट्र पति भी अमर होते हैं.'

‘फिर वे मूर्तियां?' टोपीलाल का कौतूहल जागा.

‘जो मूर्तियां तुमने देखीं वे उन महान व्यगक्तिायों की होंगी, जिनकी इस दुनिया में अब सिर्फ याद ही बाकी है. मुझे तुम्हाररे पास राष्ट्र पति महोदय ने ही भेजा है. अब कुछ दिन मैं तुम्हािरे साथ ही रहूंगा.'

‘हमारे साथ, कहां?'

‘यहीं इस इमारत में, जहां तुम्हायरे टोले के दूसरे लोग़ रहते हैं.'

‘पर मेरी मां तो काम पर जाती है. घर आते-आते बुरी तरह थक जाती है. आपके लिए खाना कौन पकाएगा?' टोपीलाल ने पूछा. वह जानता था कि दिन-भर चिनाई करने वाली मां घर आते-आते बुरी तरह टूट जाती है. ऊपर से घर का काम भी उसको देखना पड़ता है. किसी अजनबी के कारण वह मां पर बोझ नहीं बढ़ाना चाहता था.

‘हम ढेर सारी बातें करेंगे. फिलहाल तो मैं कुछ फल तुम्हावरे और इन बच्चोंा के लिए लाया हूं. लो अपने हाथों से तुम इन बच्चोंभ को बांट दो.' कहते हुए आदमी ने अपनी पोटली खोली. उसमें केले, आम, नींबू आदि तरह-तरह के फल थे. उनमें से कुछ फल निकालकर उसने टोपीलाल की ओर बढ़ाए. मग़र टोपीलाल अपने स्थाेन पर अडोल खड़ा रहा.

‘घबराओ मत, मैं यहां किसी पर बोझ बनने नहीं आया हूं. अपना खाना मैं खुद बनाऊंगा. मैं अपना बाकी काम भी खुद ही करूंगा. बापू के साथ रहकर मैंने यही सीखा है कि आदमी को अपना काम स्व यं ही करना चाहिए.'

टोपीलाल बापू का नाम पहले भी सुन चुका था. एक बार शहर से गुजरते हुए एक मूर्ति की ओर संकेत करके मां ने बताया भी था कि यह बापू की है. इससे अधिक बापू के बारे उसको कोई जानकारी न थी. जिस दिन मां ने मूर्ति दिखाई थी, उस दिन वह जरूर मां से उनके बारे में पूछना चाहता था. पर किसी तरह बात टल ग़ई. उसके बाद उसको भी याद नहीं रहा.
 
उस आदमी के जोर देने पर टोपीलाल ने केले ले लिए. उसके हाथ में केले आते

ही बच्चेन उनपर टूट पड़े. डाकिया जाने लगा तो टोपीलाल ने दौड़कर दो केले उसके हाथों में भी थमा दिए. इसपर डाकिया ने उसकी ओर प्या र से देखा-‘मुझे मालूम था कि तू यही करेगा. अच्छेि बच्चे हमेशा खुशियां लुटाते हैं.'

उसी समय टोपीलाल की निगाह निराली पर पड़ी जो दूर खड़ी उसको देख रही थी. बच्चोंर को केले देने के बाद वह निराली के पास पहुंचा-

‘मैं तो दो केले लूंगी?'

‘सभी बच्चोंक को एक-एक मिला है, तुम्हें दो क्यों दूं?' टोपीलाल ने बरजा.

‘तुमने डाकिया बाबू को भी तो दो केले दिए हैं?'

‘वे बड़े हैं. फिर वे उन केलों को खुद तो खाएंगे नहीं, अपने बच्चों को ले जाकर देंगे. अग़र मैं एक केला देता और बच्चेे दो हों तो उनकी मुश्किफल हो जाती न!'

‘मुझे एक केला अपनी मां के लिए चाहिए.'

‘केले सिर्फ बच्चों के लिए हैं...'

‘तुम्हेंर मां के लिए केले क्योंं चाहिए बेटा?' उनकी बात सुन रहा आदमी निराली के पास जाकर बोला. निराली चुप्पीम साधे रही.

‘शरमा मत बेटी! मेरा नाम बद्री नारायण है. पर बच्चे मुझे बद्री काका ही कहते आए हैं. तुम भी वही कह सकती होे.' बद्री काका ने कहा. उनके स्वणर में प्याबर उमड़ता हुआ देख निराली पिघल ग़ई. आंखों में नमी उतरने लगी.

‘मां ने आज सुबह से कुछ भी नहीं खाया. रात से ही उनको बुखार है.' निराली ने बताया.

‘अरे! तो पहले क्यों नहीं बताया. बुखार में केले के बजाय सेव ठीक रहता है. जो मेरे पास हैं. लो ये दोनों सेव तुम्हीं रख लो.' कहते हुए बद्री काका ने थैले से सेव निकालकर निराली के हाथों में थमा दिए.

‘तुम रहती कहां हो?'

‘वहां, नीचे जमीन पर!' बद्री काका के पूछने पर निराली ने इशारा किया.

‘तो चलो, सबसे पहले तुम्हाबरी मां से ही पहचान कर ली जाए.' बद्री काका ने अपना झोला उठा लिया. वे नीचे की ओर चले तो बच्चोंल का दल भी उनके साथ हो लिया. निराली की मां के पास पहुंचकर बद्री काका ने उनकी कलाई पकड़कर बुखार की जांच की. फिर थैले से निकालकर कुछ गोलियां निराली को थमा दीं, बोले-

‘इनमें से दो गोलियां अभी खिला दो. दो घंटे के बाद दो गोलियां और दे देना. शाम तक बुखार उतर जाएगा.' कहकर बद्री काका ने अपना झोला उठा लिया-

‘अब मैं नहाकर कुछ देर आराम करूंगा. हम लोग़ शाम को मिलेंगे. तब तक तुम्हाररा जो भी मन करे कर सकते हो. अरे हां, कोई बच्चाक मुझे बताएगा कि यहां लोग़ नहाते कहां हैं?'

बद्री काका के पूछने पर कई लड़के आगे आए. टोपीलाल जान-बूझकर पीछे खड़ा रहा. बद्री काका के निकल जाने के बाद वह निराली के करीब पहुंचा, बोला-‘अम्माू को ये गोलियां खाने मत देना.'

‘क्यों ?' निराली असमंजस में थी.

‘मां, कहती है कि अजनबी से कभी कोई चीज नहीं लेनी चाहिए. क्या‍ पता यह आदमी कौन है? कहां से आया है?' टोपीलाल फुसफुसाया. उस समय उसके दिमाग़ में ढेर सारी कुशंकाएं कौंध रही थीं.

‘उन्होंसने बताया तो कि राष्ट्रिपति महोदय ने ही यहां भेजा है.' निराली ने कहा.

‘राष्ट्रफपति जी यहां क्यों भेजेंगे? हो सकता है, यह उनका कोई जासूस हो.'

‘तो हमें क्याट करना चाहिए?'

‘मां इस समय एकदम सही सलाह देती. लेकिन अवसर ऐसा है कि मैं उससे बात भी नहीं कर सकता.'

‘फिर?'

फिर का उत्तर टोपीलाल के पास भी नहीं था. वह परेशान था. इसलिए भी कि वह स्वसयं कोई निर्णय नहीं कर पा रहा था. अभी तक उसको अपने दिमाग़ पर भरोसा रहा था. जरूरत के समय हर बार वह सही फैसला करता आया था. उसके कारण अनेक बार लोगों की प्रशंसा भी बटोरी थी. आज लग़ रहा था कि उसकी समझ उसको धोखा दे रही है. दिमाग़ बैठता जा रहा है. कारण उसकी समझ से बाहर था.

दूसरी परेशानी यह थी कि वह अपनी मां से भी मदद नहीं ले पा रहा था. उसको लग़ता था कि समस्या एं उसने खड़ी की हैं, इसलिए उनका निदान भी स्वमयं उसी को करना होगा. मां और बापू को वह बीच में हरगिज नहीं लाएगा.

नेकी सदैव पुण्यउ-लाभ देती है.

नहाने के बाद बद्री काका जमीन पर चादर बिछाकर लेट ग़ए. करीब एक घंटा आराम करने के वे बाद उठे. शाम हो चुकी थी. मजदूर और कारीग़र अपना काम समेटकर वापस लौटने लगे थे. इमारत में जग़ह-जग़ह चूल्हे जल रहे थे. छौंकने-बघारने की आवाजें आ रही थीं. भूखे बच्चेर मांओं के आगे बिलख रहे थे. वे उन्हें समझा और दुलार रही थीं. बिल्डिंूग़ के कोने-कोने में स्थिरत चूल्होंर से उठता हुआ धुआं उन स्थावनों पर जीवन की उपस्थिाति का संदेश दे रहा था.

जाग़ने के बाद बद्री काका बिल्डिं ग़ का एक चक्कतर लगा चुके थे. चारों मंजिलों पर घूमने के बाद वे उस कोने में पहुंचे, जहां बच्चेऔ खेल रहे थे. टोपीलाल भी वहीं था. अपनी उलझन से घिरा हुआ, एकाकी. बद्री काका के कंधे पर एक सूती चादर थी. वस्त्राख हाथ

से बुने कपड़े के थे.

बच्चोंे के पास बैठकर उन्होंाने चादर जमीन पर बिछा ली. फिर हाथ फैलाकर, मोहक मुस्कांन के साथ उन्हें आमंत्रित करते हुए बोले-

‘तुम में से कौन-कौन मुझसे दोस्तीह करना चाहेगा?' यह सुनकर बच्चोंा का खेल से ध्याुन हट ग़या. सब चौंककर बद्री काका की ओर देखने लगे.

‘जिन्हेंक मुझसे दोस्तीह करनी है, वे इस चादर पर आ जाएं.' उन्होंुने दोहराया. मग़र इस बार भी कोई बच्चाश उस चादर पर नहीं पहुंचा. उन्होंदने बच्चों की ओर देखा. वे अपने स्था.न पर गुमसुम-से खड़े थे. चेहरे पर डर और आशंका के भाव लिए हुए.

‘कोई बात नहीं, यदि तुम में से कोई भी मुझसे दोस्तीर नहीं करना चाहता तो तुम्हापरी मर्जी. पर मैं तो तुम सभी को अपना दोस्तत मान चुका हूं.'

‘आप यहां किसलिए आए हैं?' एक बच्चे. ने टोका.

‘आपको हमसे क्या काम है?' दूसरे बच्चेन ने जोड़ा.

‘हम आपको नहीं जानते...बस्ती् में कोेई भी आपको नहीं जानता।' सवालों की बौछार बढ़ती ही जा रही थी।

‘बताता हूं, बताता हूं.' अग़र एक साथ सारे बच्चेन सवाल करने लग़ जाएंगे तो मेरी चांद पर बचे-कुचे बाल भी नहीं रहेंगे.

‘कैसे?' बच्चोंा को बद्री काका की बात में मजा आया.

‘सीधा-सादा ग़णित है भई. तुम्हाजरा एक सवाल अग़र मेरा एक बाल भी ले उड़ा तो सुबह तक मैं पूरी तरह गंजा हो जाऊंगा.' इसपर कई बच्चेि हंस पड़े. बद्री काका को भी भला लगा.

‘आप तो पहले ही गंजे हैं, हमने आपको नहाते हुए देखा था, आपकी चांद पर एक भी बाल नहीं है?'

‘अरे..रे...! तुम सब तो बहुत तेज हो, आते ही मेरी कलई खोल दी.' बद्री काका ने दुःखी होने का नाटक किया, ‘इसकी भी एक दर्द-भरी कहानी है. बताओं कौन-कौन सुनना चाहेगा?

‘मैं...!' कई बच्चेी एक साथ बोल पड़े। केवल टोपीलाल चुप्पील साधे रहा। तिरछी नजरों से उसको देखते, मन ही मन मुस्क राते हुए बद्री काका ने कहना आरंभ किया-

‘एक बार हमारे बाल बहुत बढ़ ग़ए. हम नाई के पास उनकी छंटाई कराने पहुंचे. वह अपनी दुकान बंद करने जा रहा था. हमने उससे कहा, ‘भाई, कल हमें दावत में जाना है, जरा बालों की छंटाई तो कर दो.'

‘कल आइएगा श्रीमान. अब तो दुकान बंद करने का समय हो चुका है.' नाई ने जवाब दिया.

‘हमें जल्दीम है, सुबह मुंह-अंधेरे ही निकलना है. मैं पूरी मजदूरी दूंगा. तुम्हाकरी अपनी

दुकान है, थोड़ी देर बाद बंद कर लेना.' मैंने उसको फुसलाने की कोशिश की. लेकिन वह भी कम नहीं था, बोला-

‘बापू कहते हैं कि हर काम समय पर होना चाहिए. दुकान बंद करने का समय सात बजे का है, मैं एक मिनट भी ऊपर नहीं रुकने वाला.'

बापू समय के पाबंद हैं. यह बात पूरा देश जानता था. इसलिए उससे आगे कुछ कहने का कोई लाभ ही नहीं था.

‘पर मुझे तो मुंह-अंधेरे ही एक जग़ह जाना है. वहां इस जुल्फी स्टाथइल में तो जा नहीं सकता.' मैंने अपनी समस्याो रखी. हालांकि मैं यह कतई नहीं चाहता था कि वह मेरे लिए अपना अनुशासन भंग़ करे.

‘उसका भी इंतजाम है. ग़र्मी के दिन हैं, आप टोपी की जग़ह एक खद्‌दर का गीला तौलिया सिर पर रख लीजिए. उससे बाल दबे रहेंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा.'

मरता क्याद न करता. मैंने अग़ले दिन खद्‌दर के गीले तौलिये में बालों को लपेटा और चल दिया दावत खाने. घंटे-भर बाद ही जुकाम ने जकड़ लिया. छींकें आने लगीं. पहली छींक आई-‘आ...छी!' और मैं चौंक पड़ा। जी को जोर का धक्काी लगा।

‘अरे, यह क्याा हुआ! छींक के साथ बालों की पूरी एक बस्तीई धराशायी हो चुकी थी. दूसरी छींक आई तो वह दूसरे मुहल्लेा को ले उड़ी. इसके बाद तो छींकों के आने और केश-कुंजों के उजड़ने का सिलसिला चलता ही ग़या. मैंने सोचा कि गीले तौलिये से छींक आती है, तो क्यों न तौलिये को हटा ही लूं. लेकिन जब तौलिया हटाकर देखा तो बालों के मुहल्ले के मुहल्लेी हवा हो चुके थे. अब तो बिना तौलिया रह पाना संभव ही नहीं था. उधर ग़र्मी में सूखा तौलिया रखने से सिर तपने लगा था. सो तौलिया फिर से भिगोना पड़ा. शाम को जब मैं घर लौटा तो बालों की तीन-चौथाई फसल तबाह हो चुकी थी.

मैं दौड़ा-दौड़ा फिर नाई के पास पहुंचा. जाते ही उसपर चढ़ ग़या, ‘तुम्हातरी बताई ग़ई तरकीब से ही यह हाल हुआ है. अब बताओ तुम्हा रा क्याा हाल करूं?'

‘सिर्फ शुक्रिया अदा कीजिए जनाब! हर महीना नाई की दुकान पर आना पड़ता था. कभी दुकान खुली मिलती थी, कभी नहीं. बीस रुपये रिक्शेए वाले को देते थे, दो-तीन घंटे आने-जाने में खराब हो जाते थे. ऊपर से नाई का मेहनताना. जितनी देर उसके सामने रहो, उतनी देर ग़लत कैंची चल जाने का डर. मुफ्तब की सलाह पर सिर्फ एक शुक्रिया के बदले इन सारी परेशानियों से मुक्तिा मिल रही है. बिना अधेला खर्च किए और क्या. लेना चाहेंगे जनाब!' कहकर नाई महाशय हंस दिए. मैं और नाराज होऊं उससे पहले ही बोले-

‘आप तो बापू के भक्तक हैं...'

‘हूं पर इतना भी नहीं कि भक्तिु के नाम पर गंजा बन जाऊं...' मैंने रोष प्रकट किया. इसपर नाई मुस्किरा दिया-‘आप तो नाराज हो ग़ए. चलिए छोड़िए, इसी बात पर मैं एक किस्सा सुनाता हूं. एक बार बापू को जुकाम हुआ. किसी ने उन्हेंज खद्‌दर का रूमाल

थमा दिया. जुकाम तेज था. रूमाल से रग़ड़ते-रग़ड़ते नाक लाल हो ग़ई. शाम को जब घूमने निकले तो एक पत्रकार ने बापू से मजाक करते हुए पूछा-‘बापू, खादी के मोटे रूमाल से अग़र नाक को इसी तरह रग़ड़ते रहे तो यह दो-चार दिनों में गायब हो जाएगी.'

‘तब जानते हैं बापू ने क्याे कहा? खैर, आपने सुना है तो और यदि नहीं सुना है तो भी, मैं आपको बताए देता हूं. बापू ने उस पत्रकार से हंसते हुए कहा था, ‘अच्छा ही है कि गायब हो जाए, आए दिन के जुकाम से छुट्‌टी तो मिलेगी. न बांस रहेगा, न बांसुरी बजेगी.'

किस्साे सुनाने के बाद नाई मेरी ओर पलटा, ‘जनाब, आपके तो केवल बालों पर ही बीती, गांधी जी तो रोजमर्रा की मुश्किसल से बचने के लिए अपनी नाक भी गंवाने को तैयार थे.'

मैं बापू के नाम पर लोगों को उपदेश देता था. नाई ने मेरा हथियार मेरे ही ऊपर तान दिया था. मैं क्याी करता. चला आया चुपचाप. वह दिन है और आज का दिन. सिर की बगिया से उस दिन जो बहार रूठी, वह आज तक नहीं लौटी. लाख जतन किए, पर यह जंग़ल कभी आबाद न हो सका.'

बद्री काका ने बात समाप्तज की तो बच्चों के चेहरे खिले हुए थे. कई बच्चे. उनके करीब खिसक आए थे.

‘अब आप में से कोई है जो इस सदाबहार गंजे को अपना दोस्तख बनाना चाहेगा?' बद्री काका ने पूछा तो कई बच्चे चादर चढ़ ग़ए. वे उन्हेंा चारों ओर से घेरकर बैठ ग़ए. सहसा बद्री काका की निगाह निराली पर पड़ी. वह सबसे पीछे खड़ी थी. उदास और परेशान. बद्री काका को अनायास कुछ याद आया. वे उठकर निराली के पास पहुंचे और उसके सामने घुटनों के बल बैठकर बेहद प्याशर से पूछा-

‘बेटी, तुम्हा री मां का बुखार अब कैसा है?'

जवाब देने के बजाय निराली ने अपनी ग़र्दन झुका ली.

‘निराली की अम्माि बहुत बीमार है?' एक बच्चे. ने बताया.

यह सुनते ही बद्री काका उठकर खड़े हो ग़ए, ‘मैंने जो गोलियां दी थीं, उनसे बुखार तो उतर जाना चाहिए था. अग़र नहीं उतरा तो जरूर कोई वजह है. हो सकता है कि उन्हेंग अस्पसताल भी ले जाना पड़े. चलो पहले उन्हींस को चलकर देखते हैं.'

बाकी बच्चे भी बद्री काका के पीछे-पीछे चल पड़े.

निराली की मां जमीन पर चादर बिछाकर लेटी हुई थी. देह बुखार से तप रही थी. हालत दिन की अपेक्षा और भी खराब हो चुकी थी. यह देख बद्री काका के चेहरे पर चिंता की लकीरें बढ़ ग़ईं. उन्होंनने नाड़ी देखकर बुखार का अनुमान लगाया-

‘बुखार ज्या दा है, लेकिन इस हालत में इन्हें अस्परताल ले जाना भी उचित न होगा. अच्छाे होगा कि पहले पानी कि पट्‌टी लगाकर तापमान नीचे लाया जाए.'

बद्री काका ने निराली से एक चौड़े बरतन में पानी लाने को कहा. फिर कंधे से अंगोछा उतारा. उसको पानी में भिगोया और निराली की मां के माथे पर रखने लगे. निराली उनके पास ही खड़ी थी. कुछ दूरी पर टोपीलाल था. अपराधबोध से ग्रसित. बाकी बच्चेे भी वहीं मौजूद थे.

‘बच्चोस, इनकी फिक्र मत करो. कुछ देर में बुखार उतरने लगेगा. तब तक तुम सब अपने-अपने घर जाओ. हम लोग़ सुबह मिलेंगे. कुछ नई बातों के साथ.' बद्री काका के कहने पर कुछ बच्चेब जाने लगे. कुछ वहीं खडे़ रहे. माथे पर पानी की पट्‌टी रखकर बुखार का इलाज करना उनकी निगाह में किसी कौतूहल से कम न था. उनकी माएं बुखार आने पर अक्सोर पानी से दूर रहने की सलाह दिया करती थीं. उनकी निगाह में बद्री काका अनूठे थे। अनूठा था उनका बुखार के उपचार का तरीका।

लग़भग़ तीस मिनट तक माथे पर गीली पट्‌टी रखने के बाद बुखार कुछ हल्का पड़ा. कमजोर शरीर में मामूली हरकत हुई. बद्री काका के चेहरे पर संतोष झलकने लगा. वे उठकर खड़े हो ग़ए, ‘बापू का बताया बुखार के उपचार का यह तरीका एक बार फिर कारग़र सिद्ध हुआ. अब कोई चिंता की बात नहीं है. एक घंटे के बाद बुखार एकदम उतर जाएगा. तुम अग़र चाहो तो इन्हें कुछ दूध पिला सकती हो।'

सहसा उन्हेंउ कुछ ध्या न तो आया, पूछा-‘बेटी, तुम्हाहरे पास दूध तो होगा?'

निराली ग़र्दन झुकाए खड़ी रही. कोई जवाब न सूझा.

‘गुरुजी, दूध मैं अपने घर से ले आता हूं.' टोपीलाल ने उत्सा,हित होकर कहा. बिना सहमति की प्रतीक्षा किए वह तुरंत दौड़ भी ग़या. पांच-छह मिनट बाद लौटा तो उसके हाथों में गिलास था, दूध से भरा हुआ.

‘मां ने कहा है कि कच्चाप है, उबाल लेना.' टोपीलाल ने दूध से भरा गिलास निराली को थमाते हुए कहा. काफी देर बाद उसके चेहरे पर चमक दिखाई पड़ी थी. मानो किसी तनाव से बाहर निकलने की कोशिश में कामयाबी नजर आई हो.

निराली ने आग़ जलाकर दूध ग़र्म किया. तब तक बद्री काका अपने झोले से दो गोलियां और निकाल चुके थे. निराली दूध ग़र्म करके लाई तो उन्होंंने वे गोलियां उसकी मां के हाथों में थमा दीं.

‘अब इन्हेंस आराम करने दो. कुछ घंटों के बाद ये बिलकुल ठीक हो जाएंगी.' गोलियां खिलाने के बाद बद्री काका वहां से चल दिए. जाते-जाते जैसे कुछ याद आया हो, वे निराली की ओर मुड़े, ‘मैं बाहर सोने जा रहा हूं. रात में यदि कोई परेशानी दिखे तो फौरन जगा देना.'

निराली और टोपीलाल उन्हेंद छोड़ने बाहर तक आए. बच्चेे धीरे-धीरे अपने घर जाने लगे थे. भोजन का समय हो चुका था. जग़ह-जग़ह चूल्हेए जल रहे थे. कहीं दाल बघारी जा रही थी तो कहीं पर ग़र्म रोटियोंं से उठती गंध हवा को महका रही थी। भूख टोपीलाल

को भी सता रही थी. पर वह अपनी ही जग़ह पर अटल रहा.

‘क्याा तुम्हें भूख नहीं है?' टोपीलाल को अकेला देख बद्री काका ने प्रश्नब किया.

‘मैं आपसे अपनी एक भूल के लिए माफी चाहता हूं?' टोपीलाल का स्वलर पछतावे से भरा था.

‘भूल! भला तुमने ऐसा क्याा कर दिया?' बद्री काका ने टोपीलाल के चेहरे पर नजर जमाते हुए पूछा.

‘आपकी दी ग़ई गोलियां खिलाने को मैंने ही मना किया था, जिसके कारण निराली और उसकी मां के साथ-साथ आपको भी परेशान होना पड़ा.'

‘क्याप तुम नहीं चाहतेे कि निराली की मां जल्दीक ठीक हो?'

‘बिलकुल चाहता हूं. परंतु उस समय मुझे आपके ऊपर भरोसा ही नहीं था. मुझे लगा कि आप सरकार के जासूस हैं.'

‘मैंने तो पहले ही बता दिया था कि मुझे राष्ट्र पति जी ने तुम्हाहरे पास भेजा है.' बद्री काका ने हैरानी प्रकट की.

‘जी, मुझसे भारी भूल हुई है.'

‘भूल होना तो स्वारभाविक है, किंतु आदमी को चाहिए कि वह भूल को अपने स्व भाव का हिस्सा न बनने दे. जब भी ऐसा होता है, आदमी अपने आप से मुंह चुराने लग़ता है.और अपने आप से मुंह चुराना, भविष्य की ओर से मुंह फेर लेना भी है.'

टोपीलाल की आंखें जमीन में ग़ड़ी थीं.

नकारात्मकक सोच और अनावश्यीक डर सबसे पहले अपने ही व्याक्ति त्वप पर हमला करते हैं. ये आदमी को बहुत पीछे ले जाते हैं, उसके विवेक को खोखला कर देते हैं।
 
अपनी भूल के लिए तो टोपीलाल ने बद्री काका से माफी मांग़ ली. उन्होंएने माफ भी कर दिया था. पर टोपीलाल के मन को चैन कहां. अभी तक वह अपने ऊपर ग़र्व करता आया था. अपनी बुद्धि पर भी उसको गुमान था. उसी के कारण उसको लोगों की शाबाशी मिलती थी. परंतु अब उसे लग़ रहा था कि पिछले कुछ दिनों से उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया है. सोचने-समझने की शक्तिअ समाप्त़ हो चुकी है. वह सही फैसला कर ही नहीं पाता. आदमी को पहचानने में उससे भूल हो जाती है. ऐसा क्योंि हुआ? इसका ठीक-ठीक कारण तो वह नहीं जानता. पर कोई भी घटना अकारण तो होती नहीं. टोपीलाल उस कारण को जानना, उसकी तह तक पहुंचना चाहता था. पर व्य र्थ, उसका हर प्रयास निष्फटल था.

कहीं घमंड तो इसकी वजह नहीं है? मां कहती है कि घमंड अच्छे -खासे आदमी को ग़ड्‌ढे में ले जाता है. हो सकता है कि खेल-खेल में राष्ट्रापति महोदय को पत्र लिखने से

उसके मन में घमंड समा ग़या हो. ऐसा उसने कई बार सोचा है. हालांकि उस समय ऐसा कुछ नहीं था. बस काग़ज-कलम सामने देखकर उसने कुछ शब्दत काग़ज पर उकेर दिए थे. उनका सही-सही अर्थ भी वह नहीं जानता था. जैसा उस समय मन में आया वही लिख मारा था.

डाकिया की मेहरबानी हुई जो अनजाने में लिखा ग़या उसका पत्र सही ठिकाने पर जा लगा. तुक्काो तीर बन ग़या. ऐसे संयोग़ को लेकर गुमान कैसा! यह भी संभव है कि अनजाने डर ने उसकी सारी दिमागी ताकत को निचोड़ लिया हो. संभावनाएं तो अनेक हैं, पर असलियत तक पहुंचना...बेहद मुश्कितल.

इस बीच टोपीलाल ने एक बात और नोट की. पहले जब वह दूसरों के बारे में सोचता, सबके भले की कामना करता, सबसे हिल-मिलकर रहता था-तब उसके दिमाग़ में नए-नए विचार भी आते. मस्ति़ष्कत कल्पेनाओं की उड़ान में रहता था. कोई भी समस्याा हो, उसका निदान तुरंत सुझा देता. परंतु अब!

कुछ दिनों से तो अनजाना डर उसके दिलो-दिमाग़ में पैठा हुआ है. हर बच्चा. उसको अपना प्रतिद्वंद्वी, हर आदमी अपना दुश्मसन नजर आता है. संदेह मन से दूर ही नहीं होता.

टोपीलाल इस मसले पर मां से बात करना चाहता था. परंतु कई दिनों से वह देख रहा था कि मां और बापू देर तक काम करते हैं. बिल्डिंाग़ जल्दी पूरी करने के लिए उन्हेंच ओवरटाइम लगाना पड़ता है. मां घर लौटते ही खाना बनाने में जुट जाती है. बापू बाकी कारीग़रों के साथ बैठकर अग़ले दिन के काम की योजना बनाते हैं. जरूरत हो तो मालिक से बातचीत करते हैं. ऐसे में टोपीलाल की हिम्मगत कहां कि अपनी किसी समस्याि के लिए मां को परेशान करे! मन हल्का. करने के लिए उसके पास बैठे, बातचीत करे.

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इन दिनों उसकी अजीब हालत है. हमेशा गुम-सुम बना रहता है. जहां बैठ जाए वहां बैठा ही रह जाता है. दुनिया-जहान की सुध ही नहीं रहती. ऊपर से दिमाग़ है कि न जाने क्याे-क्याज अलाय-बलाय सोचता, अटकलें लगाता है. बेकार की बातें, जिनमें जरा-भी तारतम्य नहीं.

इस बीच यदि कुछ अच्छाब लग़ता है तो निराली का साथ. टोले के दर्जनों बच्चोंै में वह उसकी सबसे ग़हरी मित्र है. वही उसको सर्वाधिक पसंद भी है. जब तक निराली साथ रहे, तो उसका मन खिला-खिला रहता है. नहीं तो बुझ-सा जाता है. तभी तो उसने निराली को अपनी मां के साथ टोले में आकर रहने का कहा था. इसके लिए उसको अपनी मां और बापू दोनों ही को मनाना पड़ा था.

जिस दिन निराली और उसकी मां ने बस्तीा में कदम रखा, उस दिन वह बेहद प्रसन्नल था. लग़ता था कि बहुत बड़ी जीत हासिल हुई है। इन दिनों निराली की मां बीमार रहती है. उसको घर का सारा काम करना पड़ता है. टोपीलाल से बातचीत के लिए वह समय ही नहीं निकाल पाती.

‘क्यास सोच रहा है, टोपी?' बराबर में लेटी मां ने टोपीलाल को लगातार करवट बदलते देखा तो पूछ लिया. इसपर वह चौंक पड़ा. वह माने हुए था कि मां थकान के कारण नींद में है. पर आवाज से तो लगा कि वह उसकी हर एक सांस, हर एक धड़कन और उसकी हर एक ग़तिविधि पर नजर जमाए हुए है.

‘कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं!' मां से कभी, कुछ भी न छिपाने वाले टोपीलाल ने झूठ बोला. इसपर मन में कहीं कुछ कचोट भी हुई।

‘लग़ता है तेरी तबियत ठीक नहीं है. आज शाम ही से देख रही हूं कि तू परेशान है. निराली की मां तो ठीक है न!'

‘हां, बद्री काका ने बुखार की गोलियां दी हैं. कहा है कि सुबह तक पूरी तरह ठीक हो जाएंगी.'

‘निराली बहुत अच्छी लड़की है. बेचारी को छोटी-सी उम्र में ही कारण कष्टह भोग़ना पड़ रहा है. लेकिन तू परेशान क्योंि होता है. सुख-दुःख तो जिंदगी में लगे ही रहते हैं.' मां ने प्याोर जताया तो टोपीलाल से न रहा ग़या. उसका मन पसीज ग़या. मन की गांठे अपने आप खुलने लगीं. फिर तो प्रारंभ से अंत तक की सारी बातें, सभी गांठें उसने एक-एक कर मां के सामने खोलकर रख दीं. मां शांत मन से सुनती रही, गुनती रही. हौले-हौले तसल्लील भी देती रही।

टोपीलाल की बात समाप्त हुई तब उसने कहा-

‘बेटा, इस दुनिया में बुरे लोग़ भले ही ज्याुदा नजर आते हों, पर अच्छेी लोग़ भी कम नहीं हैं. ऐसे लोग़ सिर्फ अपनी आत्मा का कहा मानते हैं. कोई और उनके बारे में क्या सोचता है, वे इस बात की परवाह ही नहीं करते. इसलिए इस बात की चिंता छोड़ कि तेरी ग़लती से बद्री काका पर क्याआ प्रभाव पड़ेगा. वे क्याी सोचेंगे. बुरा मानेंगे या नादानी समझकर बिसार देंगे. अपना देख, लोगों पर विश्वातस करना सीख. दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव कर, जैसा तू उनसे अपने साथ चाहता है.'

‘दूसरों के साथ वैसा ही व्यावहार करो, जैसा तुम उनसे अपने लिए उम्मी द रखते हो.' टोपीलाल को आज एक नया गुरुमंत्र मिला. उसको लगा कि उसकी आंखों के आगे छाया अंधेरा छंट चुका है. भावनाएं गंगाजल-सी प्रवाहमान हैं. मस्तिाष्कल पुनः जाग्रत हो चुका है. वह हल्का. होकर नीलग़ग़न में उड़ान भरने को फिर से तैयार है. भावावेश में वह मां के सीने से लग़ ग़या-

‘मां, अग़र तुम पढ़-लिख जातीं तो स्कू ल में जरूर मास्ट रनी होतीं.'

‘नहीं रे! मैं औरत हूं. पढ़-लिखकर और चाहे जो भी बनती, पर पहले मैं मां ही होती.'

‘सचमुच!' कहते हुए टोपीलाल मां से चिपट ग़या. रात अपनी पींगे बढ़ाए जा रही थी. नींद का हिंडोला सज चुका था. उसे सपनों की सैर कराने, दूर तारों के उस पार ले

जाने के लिए.

लंबी से लंबी यात्रा का आनंद तभी तक है, जब तक कि पांव जमीन पर होने का एहसास हो.

अग़ले दिन टोपीलाल की आंखें मां के साथ ही खुल ग़ईं. वह उठ बैठा. मां चूल्हां सुलगाने की तैयारी करने लगी. उससे अनुमति लेकर वह अपने तंबुनुमा घर से बाहर निकला. फिर तेज कदमों से चलता हुआ सीधा उस स्था न पर पहुंचा, जहां बद्री काका को सोते हुए छोड़ा था. टोले के प्रायः सभी मर्द देर से उठते थे. औरतों को घर का काम निपटाना होता, वे मुंह-अंधेरे काम पर जुट जातीं. इसलिए इतने सवेरे बद्री काका को अपने स्थारन से गायब देखकर वह हैरान रह ग़या.

बिल्डिंहग़ में ही जीने की ओट में बद्री काका को देख वह उनकी ओर बढ़ ग़या. वे व्याथयाम कर रहे थे.

‘तुम! इतने सवेरे, क्याट रात को नींद नहीं आई?'

‘मैं तो बस आपसे मिलने चला आया...!' टोपीलाल ने उत्तर दिया.

‘ऐसी भी क्याप जल्दी थी?'

‘कल आप बता रहे थे कि आपको राष्ट्र पति जी ने भेजा है? तब तो आप हम बच्चों को पढ़ाने के लिए आए होंगे?'

‘ठीक समझे.' बद्री काका ने धोती बांधते हुए कहा, ‘मैं बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी पढ़ाऊंगा. सुबह की पारी में बच्चेी और शाम की पारी में बड़े. हर सप्ताेह में एक दिन बच्चोंो और बड़ों को साथ-साथ बिठाकर टेस्ट. लिया करूंगा...उसमें जो सबसे ज्या्दा अंक लाएगा, उसको पुरस्काएर भी मिलेगा.' बद्री काका ने बताया.

‘हमारे पास तो कॉपी-कलम-पुस्ताकें कुछ भी नहीं हैं...' टोपीलाल ने अपनी समस्याो बताई.

‘घबराओ मत, उनका इंतजाम हो जाएगा.'

‘सभी बच्चोंत के लिए...?'

‘हां, सभी बच्चोंं के लिए।'

‘बड़े तो कमाते हैं, न?'

‘उनके लिए भी किताब-कॉपी मुफ्तं मिला करेंगी.'

‘बड़ों के लिए भी...फिर तो बहुत रुपयों की जरूरत पड़ेगी.'

‘हमारे सिर पर राष्ट्र पति जी का आशीर्वाद है. फिर किस बात की चिंता.'

‘राष्ट्रिपति जी के पास क्या इतने रुपये हैं?'

‘राष्ट्रिपति जी को रुपये-पैसों की जरूरत नहीं पड़ती...उन्हें तो काम करने वाले

नाग़रिकों की जरूरत होती है. ऐसे लोग़ उनसे प्रेरणा लेकर अपने आप खिंचे चले आते हैं. और जब कारबां बनता है तो बाकी चीजें भी जुट ही जाती हैं.' बद्री काका की बात टोपीलाल के सिर के ऊपर से गुजर ग़ई. वह उनका मुंह देखने लगा-

‘चलो, वहां खुली हवा में बैठकर बात करते हैं, सुबह-सुबह शरीर को ताजी हवा मिले तो देह पूरे दिन खिली-खिली रहती है.' बद्री काका बोले और बिल्डिंैग़ के सामने खडे़ अशोक के वृक्ष की ओर बढ़ ग़ए. चलते-चलते टोपीलाल का हाथ न जाने कब उनके हाथों में चला ग़या, उसको पता ही न चला. टोपीलाल को यह एहसास सुखद लगा. वह देर तक उनके स्नेलहिल स्पिर्श को अनुभव करता रहा. बैठने के बाद बद्री काका फिर उसी विषय पर लौट आए-

‘मैं कह रहा था कि काम करने वाले नाग़रिक राष्ट्रकपति जी से मिलने अपने आप चले आते हैं. असल बात यह है कि ऊंचे सोच, लंबी देशसेवा तथा सर्वस्वग समर्पण के बाद ही कोई व्यरक्तिम राष्ट्रयपति के आसन तक पहुंच पाता है. ऐसे महापुरुष का जीवन तो आदर्श की स्व्यं मिसाल होता है. इसलिए उनका व्यिक्तिपत्व् लाखों लोगों को प्रेरणा देता है. उनसे प्रभावित लोग़ ऐसे कार्यों में खुशी-खुशी योग़दान देते हैं. मैं राष्ट्रसपति जी का बेहद आभारी हूं कि इस काम के लिए उन्हों ने हमारी संस्था् को चुना है.'

‘संस्थाल?'

‘संस्थाल माने एक मकसद, एक लक्ष्यस, एक अभियान और समझो तो एक चुनौती भी, जिसको पूरा करने के लिए मुझ जैसे अनेक लोग़, निःस्वा्र्थ-भाव से एकजुट हो जाते हैं. ऐसे लोगों की गिनती करोड़ों में है. वे पूरे देश में फैले हुए हैं.'

‘क्या सचमुच राष्ट्र पति जी को मेरी बिना टिकट लगी चिट्‌ठी मिली थी?'

‘हां, उस डाकिया की मेहरबानी से. तुम्‍हारी ईमानदारी से प्रभावित होकर उसने तुम्हाारे पत्र पर अपनी ओर से डाक टिकट चिपका दिए थे. साथ में एक छोटी-सी पर्ची भी लिख छोड़ी थी. तुम्हाकरे पत्र और उस पर्ची की छायाप्रतियां मेरे पास भी हैं. जानते हो उसमें डाकिया ने तुम्हाखरे बारे में क्याम लिखा है?'

‘मैं भला कैसे जानूंगा?'

‘अभी सुनाता हूं...' कहते हुए बद्री काका ने अपनी जॉकेट की जेब में हाथ डाला. पर्ची निकाली और पढ़ने लगे, ‘‘सुनो, उस भले आदमी ने लिखा है-

‘माननीय राष्ट्रभपति जी! जिस बच्चेी ने यह चिट्‌ठी मुझे सौंपी है, वह बहुत ही भोला है. यह भी नहीं जानता कि पत्र को डाक विभाग़ को सौंपने से पहले उसपर डाक टिकट लगाना आवश्य‌क होता है. पर वह बालक है बहुत ईमानदार. देखने पर यह भी लग़ता है कि उसके माता-पिता बहुत ग़रीब हैं. वे मेरे कार्यक्षेत्र के कहीं पास ही मेहनत-मजदूरी करते हैं. लड़के को मैंने कई बार सड़क पर भटकते देखा है. लग़ता है माता-पिता के काम पर चले जाने के बाद वह वक्तक बिताने के लिए इधर-उधर निकल जाता है.

बच्चाक ईमानदार है. एक मामूली कलम को लौटाने के लिए भी वह बहुत दूर चलकर आया था. वह दूसरों के दुःख को समझता है। दिल में परोपकार की भावना है. साथ में पढ़ने की ललक भी. ढंग़ का मौका मिले तो बहुत आगे तक जा सकता है। ये सब बातें उसके पत्र से जाहिर हो जाएंगी. यदि संभव हो तो उस बच्चेै की पढ़ने की इच्छाक पूरी करने के लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएं.

महोदय! मैं जानता हूं कि दूसरे का पत्र पढ़ना और उसके साथ अपनी और से कुछ जोड़ना अपराध है. पर मैं भी क्याय करता! अपनी चिट्‌ठी सौंपने से पहले उस बच्चेक ने मुझे कुछ भी नहीं बताया था. यहां तक कि अपना नाम भी नहीं. इसलिए बच्चेू का मकसद समझने के लिए मुझे उसका पत्र पढ़ना पड़ा. मैं उससे बहुत प्रभावित हूं. इसलिए मान्यकवर के सामने अपनी ओर से कुछ निवेदन करने का साहस जुटा पाया हूं...'

पर्ची पर लिखी इबारत पूरी पढ़ने के बाद बद्री काका ने उसको जेब के हवाले किया. फिर बोले-‘तुम्हाारी चिट्‌ठी ने राष्ट्रिपति महोदय को बहुत प्रभावित किया. उन्हों ने तत्कााल मुझे याद किया और मुझे यहां पहुंचने की जिम्मे्दारी सौंप दी. चलते समय राष्ट्रहपति जी ने जो कहा, वह मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा.'

‘ऐसा क्याम कहा था उन्हों ने?' टोपीलाल की जिज्ञासा बढ़ चुकी थी.

‘उन्होंयने कहा था-वहां टोपीलाल जैसे गुणवान बच्चेा और भी हो सकते हैं. धूल में छिपे हीरकणों जैसे. उन सभी को खोजकर, उनकी प्रतिभा को निखारने, उन्हेंग एक अच्छाह नाग़रिक बनाकर समाज के सामने लाने की जिम्मेयदारी मैं आपको सौंप रहा हूं. यह एक बड़ा दायित्वा है. पर मैं जानता हूं कि महात्माक गांधी और विनोबा भावे के सान्यिेय में रहकर आपको ऐसे कार्य साधने का अच्छाा-खासा अभ्याास हो चुका है.'

उस दायित्वप-भार से मैं खुद को धन्यछ समझने लगा था. फिर तो बिना पल गंवाए मैंने अपना झोला उठाया और तुम्हािरे पास चला आया. राष्ट्रदपति जी ने मुझसे कहा है कि मैं तुमसे मदद लूं. आगे जिधर भी कदम उठें, उधर हम दोनों साथ-साथ रहें.'

‘मेरी मदद! मैं आपकी भला क्‍या मदद कर सकता हूं?' मनोयोग़ से बद्री काका की बात सुन रहा टोपीलाल एकाएक चौंक पड़ा.

‘तुम्हींप मुझे बताओगे कि यहां कितने बच्चेक हैं जो पढ़ना चाहते हैं. उन सबको तुम मेरे पास लाओगे. जो बच्चेह पढ़ने से बचते हैं, उन्हेंझ तुम पढ़ाई-लिखाई की आवश्यनकता के बारे में बताओगे. जरूरत पड़े तो उन्हें मेरे पास भी ला सकते हो, ताकि मैं उन्हें पढ़ने के लिए तैयार कर सकूं. क्या तुम मुझे अपने माता-पिता से नहीं मिलवाओगे?'

‘मां और बापू से भी...?'

‘यह बताने के लिए कि उनका बेटा कितना समझदार है. मैं उनसे यह निवेदन भी करूंगा कि बच्चोंझ और बड़ों को शिक्षित बनाना, हम सबकी मिली-जुली जिम्मेहदारी है. इसलिए वे हमारा साथ दें. टोले के बड़े लोगों को भी अक्षर-ज्ञान के लिए आगे लाएं. तभी मेरे यहां

आने का उद्‌देश्यआ पूरा हो सकता है.'

टोपीलाल को वे सभी बातें एक सपना, हवाई उड़ान जैसी ऊंची कल्पयनाजन्या और अविश्वलसनीय लग़ रही थीं. मग़र जो था, वह उसकी आंखों के सामने था. जो कहा ग़या था, उसकी ध्ववनि उसके कानों में गूंज रही थी.

‘क्याद निराली भी मेरे साथ पढ़ेगी?'

‘सभी बच्चे एकसाथ पढ़ेंगे.'

‘उसकी तो मां बीमार रहती है! वह बेचारी तो आ ही नहीं पाएगी!' कहते-कहते टोपीलाल उदास हो ग़या.

‘यह चिंता तुम छोड़ दो. निराली की मां की हालत यदि जल्द ही न सुधरी तो हम उन्हेंल अस्पगताल भिजवा देंगे. जहां डॉक्टोर और नर्स उनकी देखभाल करेंगे. वहां से कुछ ही दिनों में स्व स्य्मते होकर वह घर लौट आएंगी। उसके बाद तो निराली के पास समय ही समय होगा, क्योंी?'

‘जी!' टोपीलाल बस यही कह सका. उसी समय उसकी मां की आवाज गूंजी. वह तत्काउल खड़ा हो ग़या-

‘अरे! बातों-बातों में मैं यह तो भूल ही ग़या कि मां और बापू के काम पर जाने का समय हो चुका है. दोनों मेरा इंतजार कर रहे होंगे...मैं जल्दी ही आऊंगा.'

टोपीलाल ने घर की ओर दौड़ लगा दी. उस दौड़ में आत्म'विश्वारस था. मन में थे अनगिनत सपने और आगे बढ़ने का अटूट संकल्पह. बद्री काका उसको जाते हुए देखते रहे. उसके बाद वेे अपने ठिकाने की ओर बढ़ ग़ए. उस समय उनके चेहरे पर अलौकिक मुस्का्न थी. दिल में विश्वा स और चेहरे पर था अभूतपूर्व तेज. खुद पर भरोसा और मन में दूसरों के कल्याकण की कामना हो तो ऐसा तेज स्वुतः आभासित होने लग़ता है.

सच्चेू कर्मयोगी का जीवन मिश्री का पहाड़ होता है, जो मिठास रखता है, मिठास बांटता है और मिठास जीता भी है.

नेकी हजार फसल देती है। सुंदरता और मिठास दोनों ही मामलों में मिश्री जैसी कोई मिसाल नहीं.

बद्री काका ने टोपीलाल से कहा था, पांच साल से ऊपर के बच्चोंस को बुलाकर लाने को. बस्तीह में ऐसे बीसियों बच्चेह थे. उनमें से कुछ से उसकी दोस्तील भी थी. बद्री काका के कहने पर एक-एक के पास टोपीलाल पहुंचा. हर एक को बद्री काका के आग़मन की खबर दी. उनके आने का उद्‌देश्या बताया. कहा भी कि वे उन्हेंि बिना फीस पढ़ना सिखाएंगे. कि आदमी के लिए कितना जरूरी है पढ़ना. इसके लिए उन्हेंर स्कूयल जाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. जहां हम हैं, वहीं स्कू़ल बन जाएगा.

और कॉपी-किताब के लिए तो जरा-भी परेशान न हों. माता-पिता को एक पाई भी खर्चने की जरूरत नहीं। बद्री काका ने हर चीज के इंतजाम का आश्वाासन दिया है. बिलकुल मुफ्त . यह कोई छोटी बात नहीं. इसलिए आज शाम को सभी बच्चेे दो घंटा पहले खेलना छोड़कर, सीधे बद्री काका के पास पहुंचें. उन्होंनने कहा है कि वे आज ही से पढ़ाई आरंभ करना चाहते हैं.

बच्चोंा ने उसकी बात को सुना. कुछ ने समय पर पहुंच जाने का आश्वािसन दिया. कुछ ने अच्छाा कहा। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंरने उसकी जमकर खिल्ली उड़ाई. कुछ ने तो पढ़ाई की उपयोगिता पर ही सवाल खड़े कर दिए. टोपीलाल ने सब सुना. मन में उम्मी़द लिए वह आगे बढ़ता ग़या.
 
उस दिन टोपीलाल बच्चोंल के अभिभावकों से भी मिला. बद्री काका एक-एक को समझाने उसके पास ग़ए तो वह उनके साथ रहा. कहा था कि बच्चों को पढ़ाएं. कि जरूरी नहीं है मजदूर का बेटा मजदूर, मिस्त्री का बेटा मिस्त्री ही बने. वह व्याथपारी, अधिकारी, डॉक्ट र, इंजीनियर या वकील कुछ भी बन सकता है. जो जिम्मेहदारी उनके माता-पिता उनके लिए नहीं उठा पाए, उसे अब वे अपने बच्चों के लिए उठाएं. उन्हेंय आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साीहित करें. उनमें संघर्ष की भावना जगाएं. ताकि पीढ़ियां बदलें, उनके संस्का र बदलें और मिल-जुलकर युग़ में बदलाव लाएं.

दिन बीता, पर कड़वे अनुभव के साथ. टोपीलाल के जीवन का शायद सबसे कड़वा अनुभव. अपने अनपढ़ होने का रोना रोने वाले माता-पिता में से एक ने भी अपने बच्चों को बद्री काका के पास जाने की अनुमति नहीं दी. कुछ तो पढ़ाई के नाम से ही जी चुराते दिखे. कुछ ने साफ मना कर दिया. कुछ ने हंसकर टाल दिया. कुछ ने कह दिया कि दूसरों को मनाओ. वे तो तैयार ही हैं. जबकि कुछ ने उसकी खिंचाई करने का प्रयास भी किया-

-पढ़-लिखकर भी क्याे करेंगे, मेहनत-मजदूरी...दूसरों की गुलामी! वह तो बिना पढ़े करते ही आए हैं.

-पढ़े-लिखे बेरोजगार सड़कों पर चप्पनल चटकाते घूमते हैं. काम मिल ही नहीं पाता.इससे तो अच्छा है कि बेरोजगार बनकर जियो. मजदूर बनकर कमा-खाओ.

-जब पढ़-लिखकर भी पसीना ही बहाना है, तो उसमें अपना समय क्योंी बरबाद किया जाए.

-पेट तो जमीन से भरता है, आसमान की ओर ताकते रहने से भला किसका गुजारा हुआ है!

-बुजुर्ग कहते आए हैं कि सब्र करो, संतोष धारण करो. उसी का फल मीठा निकलता है.

एक विधवा मजदूरिन के एक ही बेटी थी. मां दिन-भर ईंट और मसाला ढोती. बेटी घर पर अकेली रहती. टोपीलाल उसके पास भी ग़या. कहा कि अपनी बेटी को पढ़ने के

लिए बद्री काका के पास भेजे. पढ़-लिख जाएगी तो जिंदगी में काम आएगा. मजदूरिन अपना ही दुखड़ा रोने लगी-

‘बेटा, मैं तो चाहती हूं कि वह थोड़ा-बहुत पढ़ ले. लेकिन अग़र वह स्कूहल जाने लगी तो घर का काम कौन निपटाएगा. रोटी-दाल तो चलो मैं ही बना लेती हूं. परंतु झाड़ू-बुहार का काम, बकरी की देखभाल, इतना काम मुझ अकेली से कैसे सधेगा?'

‘कहीं दूर थोड़े ही जाना है. फिर दो घंटे की बात...मैंने कुक्कीू से बात की है. वह कह रही थी कि घर का सारा काम वह इसी तरह करती रहेगी, जैसे कि अब तक करती आई है. आपको जरा-भी परेशानी नहीं होगी.'

‘चलो मान लिया...कुक्कीह मेरी अच्छी बेटी है...वह मेहनती भी है. जितना हाथ वह अब तक बंटाती आई, उतना आगे भी बंटाती रहेगी. पर बेटा तुम एक बात नहीं समझते. हर लड़की को एक न एक दिन पराये घर जाना ही पड़ता है. वहां कोई हंसी न उड़ाए, इसलिए उसको घर का काम आना ही चाहिए. उसे सीखने की यही उम्र है. चौके-चूल्हेी का काम आ जाए तो अपना घर आसानी से संभाल लेगी. वरना ससुराल में सब यही कहेंगे कि बिना बाप की बेटी को मां से कुछ सिखाते न बना.'

‘कुक्कीी यदि पढ़-लिख जाएगी तो घर और भी जिम्मेलदारी से चला सकेगी.' टोपीलाल ने बात काटी. अपने से बड़ों से वह अधिक बोलता नहीं था. बात पसंद न हो तो सिर्फ चुप्पी साध लेता. मग़र उस समय कुक्कीक की मां को समझाने के लिए वह एक के बाद एक तर्क दिए जा रहा था. टोपीलाल को विश्वाीस था कि उसका आखिरी तर्क कुक्की की मां को अवश्यब ही निरुत्तर कर देगा. मग़र कुक्कीउ की मां के तरकश में अब भी कई तीर बाकी थे, जिनकी काट टोपीलाल के पास भी नहीं थी-

‘तू अभी नादान है. नहीं जानता कि बेटी के ब्याजह के समय मां-बाप को कितनी मुश्किालें उठानी पड़ती हैं. कुक्कीो का बाप होता तो मुझे चिंता न होती. वह खुद संभाल लेता. पर अब तो इसके हाथ पीले करने की जिम्मेकदारी मेरी ही है. लड़की अग़र पढ़ी-लिखी हो तो पढ़ा-लिखा लड़का भी तलाशना पड़ता है. उसके लिए ज्याीदा दहेज भी चाहिए. मैं विधवा मजदूर उतना दहेज कहां से जुटा पाऊंगी.'

टोपीलाल के पास इसका कोई जवाब न था. निरुत्तर हो वह वापस लौट आया. उसके बाद जिसके भी पास वह ग़या, उसके पास पढ़ाई से बचने के अनगिनत बहाने थे. न था तो सिर्फ पढ़ाई से जुड़ने का इरादा. पढ़-लिखकर कुछ बनने का संकल्प . उसके लिए यह हैरान और परेशान करने वाली स्थिरति थी. उसके अब तक के सोच के एकदम उलट.

हाल के वर्षों में उसने न जाने कितने अरमान अपनी शिक्षा को लेकर पाले थे. न जाने कितनी बार यह सपना देखा था कि एक दिन वह भी स्कूेल जाने लगेगा. कि वह पढ़-लिखकर एक कामयाब इंसान बनेगा. कि मां और बापू की तरह केवल मजदूरी या मिस्त्रीगीरी ही नहीं अपनाएगा. वे काम करेगा जो पढ़े-लिखे लोग़ करते हैं. कि बड़ा होकर

मां-बाप दोनों को सुख और सम्माीन का जीवन दे सकेगा.

जाने क्योंो, वह सोच बैठा था कि बस्तीा का प्रत्येजक बालक खुशी-खुशी पाठशाला जाने की सहमति दे देगा. उनके माता-पिता भी पढ़ने से क्यों् रोकेंगे? इससे उनको लाभ ही होगा. मग़र उस एक दिन में जो कुछ हुआ वह उसके सारे अरमानों पर पानी फेरने को काफी था.

दिन-भर की दौड़-धूप के बाद जब वह बद्री काका के पास पहुंचा तो बेहद थका हुआ था. पसीना उसके माथे पर था. चेहरा लटका हुआ, दिल में उदासी थी, आंखों में निराशा की स्या.ही. अरमान मरे-मरे थे.

‘अच्छा हुआ तुम आ ग़ए. मैं पढ़ाई आरंभ करने का सोच ही रहा था. आओ बैठो! आज हम पहला पाठ सीखने की कोशिश करेंगे.' टोपीलाल को अकेला देख अनुभव-पके बद्री काका को और कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी, मानो बिना बताए सबकुछ समझ ग़ए हों. उनके हाथ में पुस्त्क थी. आंखों पर मोटा चश्मात. सामने केवल टोपीलाल था और निराली. इसके बावजूद बद्री काका का पढ़ाने का अंदाज ऐसा था, जैसे पूरी कक्षा को पढ़ा रहे हों-

‘बच्चो ! मैं पहला पाठ शुरू करूं उससे पहले आपका यह जान लेना जरूरी है कि जीवन में केवल वही लोग़ तरक्की् करते हैं, जिन्हेंठ समय का सम्माीन करना आता है, जो उसकी उपयोगिता को महसूस करते हैं. उसके साथ-साथ चलते हैं. समय सुस्तै लोगों से कन्नीक काटकर आगे बढ़ जाता है. वह कभी फिसड्‌डी लोगों के फेर में नहीं पड़ता. इसलिए तुम आज यदि कुछ बनने का संकल्प लेने जा रहे हो, तो एक संकल्पस यह भी अवश्यक लेना कि हम अपना हर काम तय समय पर पूरा करेंगे. हमारे पास जितना समय है, उसके प्रत्येकक पल का सदुपयोग़ करेंगे. कभी लापरवाही नहीं करेंगे, न कभी आलस ही दिखाएंगे.'

‘काका, क्या यह नहीं हो सकता कि हम कल से पाठ आरंभ करें. मुझे उम्मीरद है कि कल से कुछ बच्चे़ जरूर आने लगेंगे.' टोपीलाल ने बीच में टोका. इसपर बद्री काका मुस्कुरा दिए.

‘जो बच्चे. कल आएंगे, उन्हेंं भी हम पढ़ाएंगे. पर आज आए बच्चों् के लिए जो पाठ जरूरी है, तुम उसी पर ध्या न दो.' इसके बाद वे एक घंटे तक पूरे मनोयोग़ से पढ़ाते रहे. इस बीच प्रश्नोलत्तर भी चलता रहा. टोपीलाल और निराली ने जो भी जानना चाहा, बद्री काका ने उसका स्नेपहपूर्वक जवाब दिया. समय कब बीता, उन दोनों को पता भी न चला.

‘बच्चो , आज का पाठ हम यहीं पर समाप्तन करते हैं. कल आप सब इसको दोहरा कर आना.' कहकर बद्री काका ने उस दिन की पढ़ाई का समापन किया. चलने लगे तो उन्होंउने टोपीलाल और निराली को कुछ पुस्तइकें, कॉपियां और पेंसिल वगैरह भेंट कीं-

‘इन्हेंक आखिरी मत समझना. होशियार बच्चोंउ को इस तरह के उपहार पाने की आदत

डाल लेनी चाहिए.'

टोपीलाल चलने लगा तो बद्री काका ने कंधे पर हाथ रखकर अनुराग़मय स्वकर में कहा-‘किसी अच्छे काम की शुरुआत भले ही एक आदमी द्वारा हो, मग़र लोग़ उसके साथ मिलते चले जाते हैं. धीरेे-धीरे पूरा कारवां बन जाता है. जबकि बुरे काम की शुरुआत यदि हजार लोग़ भी करें तो वह भीड़ एक-एक कर छंटती चली जाती है. अंत में एक या दो बचते हैं, जिन्हें समाज अपराधी मानकर धिक्कातरता, कानून दंडित करता है, समझे!'

‘जी...!'

‘क्याए?'

‘यही कि महान व्येक्तिं के पीछे पूरा कारवां होता है, जबकि पापी अक्सरर अकेला पड़ जाता है.'

‘शाबाश! मुझे लग़ता है कि अब मैं राष्ट्रहपति जी के विश्वािस की रक्षा कर सकूंगा।' कहते समय बद्री काका के चेहरे पर चमक आ ग़ई.

‘मेरे तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा...क्या‍ कल भी हम दोनों ही होंगे?' घर लौटते समय निराली ने पूछा.

‘संभव है, लेकिन सदा नहीं...' भरे विश्वारस के साथ टोपीलाल ने कहा, ‘पर हम दोनों तो होंगे ही.'

‘हां.' निराली ने स्वी कृति दी. वह जान चुकी थी कि अच्छेट कार्य के प्रति भरोसा समाज को अच्छाहई की तरफ ही ले जाता है.

उद्‌देश्य की पवित्रता आत्मंविश्वा स भी जगाती है.

विकास अपनेे साथ कुछ विकृतियां लाता है. उनसे बचना इंसान के बुद्धि-कौशल की कसौटी बन जाता है और उनपर नजर रखना समय की जरूरत.

एक सप्ता ह में ही टोपीलाल की उदासी छंट ग़ई. बद्री काका की कोशिशें रंग़ लाने लगी. दस दिन के भीतर ही खुली पाठशाला मेंं आने वाले बच्चोंी की संख्यां पंद्रह से ऊपर पहुंच चुकी थी. और तो और कुक्कीे भी पाठशाला आने लगी. उसकी मां खुद उसको पाठशाला छोड़कर ग़ई थी-

‘मेरे बुढ़ापे का बोझ यह बच्चीम क्यों सहे. इसे अब आप ही संभाले गुरु जी!'

बद्री काका सुनकर मुस्कु रा दिए थे।

पाठशाला का समय भी तय हो चुका था. बद्री काका सुबह चार बजे जाग़ जाते. व्या याम के पश्चा त वे थोड़ा दूध लेते. कुछ समय अध्य यन के लिए निकालते. बच्चोंे के आने का समय होता तो ईंटों के चूल्हेक पर खिचड़ी पकाने के लिए रख देते. आठ बजे तक सभी विद्यार्थी उपस्थिुत हो जाते. जो नहीं आ पाता, उसको बुलाने के लिए वे खुद उसके

घर जाते. सवा आठ बजे पढ़ाई आरंभ हो जाती.

इस बीच उनके सामान में भी वृद्धि हुई थी. लकड़ी की एक बड़ी पेटी मंग़वाई ग़ई थी. उसमें बच्चों को देने वाली पुस्तसकें तथा अन्य लेखन-सामग्री सुरक्षित रखी जाती. ठीक साढे़ दस बजे मध्याेह्‌न होता. उससे पहले ही पतीली में ग़र्माग़रम खिचड़ी परोसे जाने का इंतजार करने लग़ती. अपने विद्यार्थियों के साथ बद्री काका भी उसका सेवन करते. ग्यातरह बजे पढ़ाई दुबारा आरंभ हो जाती. जो आगे दो घंटों तक चलती. उसके बाद बच्चे घर जाते और बद्री काका भोजन करने के लिए बढ़ जाते.

बद्री काका को खुद खाना बनाते देख टोले के लोगों ने ही आग्रह किया था कि उनके लिए खाना बनवा दिया करेंगे. इस प्रस्ताेव पर बद्री काका एक शर्त पर राजी हुए थे. शर्त के अनुसार जो बच्चेब बद्री काका के पास पढ़ने आते थे, उनके घर बारी-बारी से आटा और जरूरी सामग्री सवेरे ही पहुंचा आते. दोपहर को वहां से पका-पकाया भोजन प्राप्त, हो जाता.

पाठशाला में शाम की पारी बड़ों के अक्षर-ज्ञान के लिए निर्धारित थी. शाम के पांच बजे चिनाई का काम बंद हो जाता. एक घंटा लोगों को उनके जरूरी कामों से मुक्तश होने के लिए मिलता. छह बजे प्रौढ़ पाठशाला आरंभ होती. विद्यार्थी जुटने लग़ते.

बड़ों की पाठशाला की हालत और भी खराब थी। दो सप्तासह बाद भी मुश्कि ल से पांच-छह विद्यार्थी हो पाए थे. बद्री काका इस प्रग़ति से असंतुष्ट। थे. परंतु निराश बिलकुल न थे. उनका दिमाग़ तेजी से सोच रहा था. और तब अपने प्रौढ़ विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए बद्री काका ने एक तरकीब निकाली.

शाम को ठीक छह बजे जैसे ही कुछ विद्यार्थी जमा होते, बद्री काका कोई न कोई किस्साप-कहानी छेड़ देते. किस्साा सुनाने का उनका ढंग़ निराला था. सुनाते समय उनके स्वरर का उतार-चढ़ाव ध्वहनि को संगीतमय बना देता. उसके आकर्षण से लोग़ खिंचे चले आते.

कुछ दिन बाद बद्री काका ने अनुभव किया कि उनके प्रौढ़ विद्यार्थियों में भी अच्छेत-खासे कलाकार छिपे हैं. कोई ढोला सुर से गाता है, तो किसी का ग़ला आल्हा पर सधा है. कुछ को दूसरों की हू-ब-हू नकल उतारने में महारत हासिल है. जब वे अपना कार्यक्रम प्रस्तुलत करते तो बच्चेा और बड़े हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते थे.

बद्री काका को तोड़ मिल ग़या. उनकी निराशा छंटने लगी. उन्हों ने व्यंवस्थाट में बदलाव किया. पाठशाला की शुरुआत किसी भजन, आल्हार या ढोले से होने लगी. जब तक वह समाप्तह होता, तब तक पचीस-तीस मजदूर जमा हो जाते. एक पूरी कक्षा की उपस्थियति. उसके बाद बद्री काका उन्हेंत अक्षर-ज्ञान कराना शुरू करते.

कुछ दिन यह व्यतवस्थाी कारग़र रही. फिर बद्री काका ने अनुभव किया कि कुछ लोग़ मनोरंजन कार्यक्रम समाप्तर होते ही उठ जाते हैं. पढ़ाई के काम में रुचि ही नहीं लेते. या मनोरंजन कार्यक्रम को लंबा खींचने का अनुरोध करते रहते हैं. इससे उनका उद्‌देश्यम पूरा

नहीं हो पाता. अतः मनोरंजन कार्यक्रम के समय में सुधार किया ग़या. पाठशाला की दैनिक शुरुआत तो उसी से होती. मग़र जैसे ही वह अपने शिखर पर पहुंचने को होता, बद्री काका उसको बीच ही मैं रुकवा देते.

‘अब कुछ देर के लिए हम पढ़ाई पर ध्यािन देंगे. घबराइए मत, यह पढ़ाई भी एक प्रकार का खेल ही है, दिमाग़ का खेल. अपने दिमाग़ में कुछ जरूरी चीजें, थोड़ा-सा ज्ञान भर लेने की कसरत. जो वक्तर पर काम आए. हमारी जिंदगी की राह को आसान करे, हमें समझाए कि हम यदि मनुष्यह हैं तो इसके क्याा मायने हैं...'

‘पर महाराज, गीत के दो-चार बोल और सुनने को मिल जाएं तो...गायक ने समां बांध रखा था, वाह!'

‘दो-चार नहीं पूरे आधा घंटे और सुनने को मिलेगा. फरमाइश होगी तो वह भी पूरी की जाएगी. लेकिन फिलहाल पढ़ाई...केवल पढ़ाई.' बद्री काका दृढ़ स्वगर में कहते और पुस्तीक निकालकर पढ़ाने को तैयार हो जाते. अनमने भाव से लोगों को भी पढ़ने का नाटक करना पड़ता.

और नाटक भी अकारथ तो जाता नहीं.

उस दिन बद्री काका ने दिनारंभ में पढ़ाई की शुरुआत की तो उनके बाल शिष्य उखड़े हुए थे-

‘हम आपसे नहीं पढ़ेंगे...आप पक्षपात करते हैं.' टोपीलाल जो दूसरे विद्यार्थियों का अगुआ बना हुआ था, बोला.

‘आप हमें निरा बच्चां समझते हैं...!' कुक्कीप ने भी साथ दिया. बद्री काका ने महसूस किया कि पूरी कक्षा टोपीलाल और कुक्कीम के साथ है. कारण उनकी समझ से परे था-

‘ऐसी क्याु बात है?'

‘आप ही सोचिए...हम आपसे क्यों नाराज हैं?' निराली ने बनावटी गुस्सेय में बोली.

‘बूढ़े आदमी की अक्ल. तो वैसे ही घास चरने चली जाती है.' बद्री काका ने कुछ ऐसे कहा कि पूरी कक्षा की हंसी छूट ग़ई.

‘आप अपने बड़े विद्यार्थियों को तो खूब कहानी-किस्सेक सुनाते हैं. आल्हा और भजन भी होते हैं...पर बच्चोंऔ के पीछे पड़े रहते हैं कि सिर्फ इन किताबों में सिर खपाते रहो. यह पक्षपात नहीं तो और क्याक है!' बद्री काका को अपनी ग़लती का एहसास हुआ.

‘सचमुच मुझसे भारी भूल हुई है. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. आगे से आपके साथ यह अन्या'य नहीं होगा, बल्किच हम आज ही से...' तभी किसी बच्चेा के रोने का स्वेर सुनाई पड़ा. बद्री काका कहते-कहते रुक ग़ए. सबका ध्यािन उस बच्चे की ओर चला ग़या.

‘अरे! यह तो सदानंद है...' एक बच्चे ने पहचाना. साथ ही कक्षा में चुप्पी छा ग़ई. बद्री काका पढ़ाना छोड़कर उस बच्चेर की ओर बढ़ ग़ए.

‘क्या‍ हुआ बेटे?' उन्होंझने सदानंद के सामने बैठ उसके आंसू पौंछते हुए कहा.

‘मैं भी पढ़ना चाहता हूं. लेकिन काका आने से मना करता है. आज मैंने जिद की तो उसने खूब पिटाई की...'

‘क्याभ नाम है तुम्हा.रे पिता का.'

‘जियानंद!' लड़के ने संक्षिप्ति-सा उत्तर दिया.

‘वे तुम्हेंन रोकते क्योंे हैं?' सदानंद चुप्पीह साधे रहा.

‘गुरुजी मैं बताऊं...' टोपीलाल उठकर बोला. बद्री काका ने उसकी ओर देखा. वह बताने लगा-‘सदानंद के पिता अच्छेु-खासे मिस्त्री हैं. टोले के दूसरे मिस्त्री उनके काम की तारीफ करते थे. लेकिन न जाने कब उन्हें शराब की लत ग़ई. उसके बाद से उनका काम से ध्याेन हटता चला ग़या. टोले में बदनाम भी होने लगे.

अब तो हालत यह है कि रोज शाम को पीने को न मिले तो वे उखड़ जाते हैं. लेकिन शराब खरीदने के लिए रुपये भी चाहिए. इसलिए शौक को पूरा करने के लिए उन्हें चोरी की लत और लग़ ग़ई. पिछले सप्ता ह उन्हेंं चिनाई का लोहा कबाड़ी को बेचते हुए पकड़ लिया ग़या. इसपर मालिक ने उन्हें काम पर आने की पाबंदी लगा दी थी.

बापू के कहने पर उन्हेंल काम पर तो रख लिया ग़या, लेकिन अब उनपर नजर रखी जाती है. उनकी मजदूरी भी उन्हेंे न मिलकर सदानंद की मां को मिलती है. इससे वे चिड़चिड़े हो ग़ए हैं. कल रात शराब के लिए रुपये न देने पर उन्होंहने सदानंद की अम्मा की पिटाई भी की थी.'

‘समझ ग़या...' टोले के लोगों की शराब की आदत बद्री काका से छिपी न थी. वे चाहते थे उस आदत को छुड़ाना. उसके लिए काम करना. मग़र बच्चों की पढ़ाई का काम उन्हेंद अधिक महत्त्वपूर्ण लग़ता था. उसके लिए दूसरे कार्यों को टालते जा रहे थे. अब उन्हें लगा कि उस दिशा में भी तत्काहल कार्य आरंभ करना होगा. नहीं तो बात हाथ से निकल भी सकती है.

‘तो तुम सचमुच पढ़ना चाहते हो बेटे?' उन्हों्ने सदानंद की पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा.

‘हां, पर मैं कुक्कीे के पास ही बैठूंगा.'

‘ठीक है, कुक्की. तुम्हाबरी खास दोस्ती है तो हम तुम्हेंक उसी के पास जग़ह देंगे. लेकिन हमारी भी एक शर्त है. तुम्हेंन यहां रोज आना पड़ेगा?'

‘काका मारेगा तो?'

‘काका को मैं समझा दूंगा. आगे से वे तुम्हेंा कुछ भी नहीं कहेंगे...' बद्री काका ने आश्वाहसन दिया. लड़का शांत हो ग़या. इसके बाद वे बच्चों की ओर मुड़े, जो मनोयोग़ से उनकी बातें सुन रहे थे-

‘सदानंद आज से ही हमारी कक्षा में बैठेगा और उसको कुक्कीख के बराबर में जग़ह दी जाएगी, क्यों कि कुक्कीव उसकी सबसे अच्छीे दोस्त् है, क्योंो कुक्की ?' कुक्कीद मुस्क,रा

दी. सदानंद की उदासी भी छंटने लगी. बच्चों् में थोड़ी खुसर-पुसर हुई. कुछ देर बाद बद्री काका ने आगे का मोर्चा संभाल लिया-

‘बच्चोभ! अपनी किताब, कॉपी बंद कर लो. अब हम एक नया खेल आरंभ करेंगे. इसे कहते हैं, खेल-खेल में कविता बनाना. मैं एक पंक्तिस दूंगा. उसमें हर बच्चां अपनी और से एक पंक्तिे जोड़ने का प्रयास करेगा. जिसकी पंक्तिम पसंद की जाएगी, वह कविता में जुड़ती चली जाएगी.

कविता पूरी होने पर हम उन सभी बच्चोंी को पुरस्कालर देंगे, जिनकी पंक्तिकयों से वह कविता बनी है. बोलो बच्चोस, क्याा तुम सब इस खेल के लिए तैयार हो? याद रहे कि सर्जनात्मेक होना, मनुष्ययता का अनिवार्य लक्षण है. जो नए ढंग़ से सोचते हैं, वही नया ग़ढ़ते हैं.'

‘हम सभी तैयार हैं?' बच्चोंह का समवेत स्वरर गूंजा.

‘पंक्ति यों को लिखेगा कौन? हाथ उठाकर बताइए!'

‘मैं...!' कई आवाजें एक साथ आईं.

‘कुक्की के दोस्तं ने आज ही से कक्षा में आना शुरू किया है, उसका लेख भी सुंदर है. इसलिए कविता को लिखने की जिम्मेीदारी कुक्कीे निभाएगी, क्योंे कुक्कीह?'

‘जी!' कुक्की ने कॉपी-कलम संभाली. बच्चेै सावधान होकर बैठ ग़ए.

सावधान होना, चेतना को जगाना और अपनी बिखरी हुई शक्तिभयों को एकजुट कर लेना है.

प्राणीमात्र के कल्यारण की इच्छार से किए ग़ए सृजन से बड़ी कोई साधना नहीं है.

शहर तरक्कीय पर था. जिन दिनों उस बिल्डिं ग़ का निर्माण-कार्य आरंभ हुआ, उन दिनों उसके बराबर में खाली मैदान था. मजदूरों के बच्चे. वहां खेलते. धमा-चौकड़ी मचाते. लोग़ अपने मवेशी चराने को ले वहां आते. मग़र कुछ महीनों के बाद उसके आसपास के भूखंडों पर निर्माण कार्य होने लगे. मजदूरों और मिस्त्रियों की संख्याम बढ़ने लगी.

धीरे-धीरे वहां सौ से अधिक परिवारों की अस्था्ई बस्तील बस ग़ई. इतने लोगों को देख छोटे दुकानदार, फेरीवाले उस ओर आने के लिए ललचाने लगे. इस बीच एक चालबाज ठेकेदार ने मैदान के सिरे पर देशी शराब का बेचने का ठेका लेकर वहां दुकान खुलवा दी. जहां ग़रीब मजदूर अपनी परिश्रम की कमाई का बड़ा हिस्साब बरबाद करने लगे.

शराब की दुकान खुलने के बाद आसपास के क्षेत्र में अपराध-दर भी बढ़ी थी. बद्री काका ने पुलिस से शराब के ठेके को वहां से हटवाने का अनुरोध भी किया था. मग़र शराब ठेकेदार के ऊंचे संपर्कों के कारण पुलिस उसपर हाथ डालने से कतरा रही थी. तब बद्री काका ने अदालत की शरण ली. मग़र कानून की पेचीदगियों का सहारा लेकर ठेकेदार

मुकदमे से बच निकला. दबाव बनाने के लिए अपने पैसे के दम पर उसने कुछ भीमकाय गुंडे भी खरीद लिए, जो उसके इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार होकर जाते थे.

ऐसे में ग़रीब मजदूरों को शराब के चंगुल से बचाने का एकमात्र रास्ताु था कि उन्हें उससे होने वाले नुकसान के बारे में बताया जाए. उनमें जाग़रूकता लाई जाए. उन्हेंत बौद्धिक रूप से इतना समर्थ बनाया जाए कि वे अपने भले-बुरे का निर्णय स्वंयं कर सकें. प्रौढ़ शिक्षा बद्री काका के इसी प्रयास का एक हिस्सा थी. पर लोग़ उसमें उतनी रुचि ही नहीं ले रहे थे.

बद्री काका उनकी मजबूरी भी समझते थे. दिन-भर जी-तोड़ परिश्रम के बाद उन्हेंर आराम की जरूरत पड़ती. इसलिए खाना खाकर वे सीधे चारपाई की ओर बढ़ जाते. ठेकेदार के आदमियों ने मजदूरों के दिमाग़ में चतुराईपूर्वक यह बात बिठानी शुरू कर दी थी कि शराब का नशा थकान से मुक्ति दिलाकर, पल-भर में उन्हेंई फिर तरोताजा कर सकता है। मजदूर भी उनके भुलावे में आते जा रहे थे। बद्री काका जानते थे कि इसे रोकने के लिए बड़े आंदोलन की जरूरत है. साथ में समय की भी. यह किस रूप में संभव हो, वे इसी दिशा में सोच रहे थे.

‘गुरुजी, कविता की पहली पंक्तिम क्याे होगी?' बद्री काका को चुप देख, टोपीलाल ने टोका.

‘अरे हां, मैं तो भूल ही ग़या, तुम बाल-कवियों के लिए कविता की पहली पंक्ति तो मुझी को देनी है.' बद्री काका ने कहा, ‘कविता की पहली पंक्तिू है...' बद्री काका एक पल के लिए रुक ग़ए.

‘क्याज....?' बच्चोंं का कौतूहल उनका जोश बन ग़या.

‘कविता की पहली पंक्ति. है-गुटका खाकर थूकें लाला. अब इस कविता को आप सब मिलकर आगे बढ़ाइए.

बच्चेा सोचने लगे. आपस में फुसफुसाने की आवाज भी हुई. सहसा टोपीलाल ने जोड़ा-‘मुंह है या कि गंदा नाला.'

‘इतनी जल्दीह, वाह! तुमने तो सचमुच कमाल कर दिया...अद्‌भुत! अब इससे आगे की पंक्तिि कौन बनाएगा?' बद्री काका ने हर्षातिरेक में कहा.

‘जमकर खाया पान मसाला-ठीक रहेगी गुरुजी? नए-नए आए लड़के सदानंद ने भी उस खेल में हिस्सेंदारी निभाते हुए कहा.

‘बिलकुल ठीक...अब बाकी बच्चोंस में से कोई इसको आगे बढ़ाए.'

‘मुंह में छाला, पेट में छाला.' एक बच्चेस ने जोड़ा जिसे बद्री काका ने हटा दिया-

‘चल सकता है, पर चलताऊ है. कोई बच्चा् इससे भी बेहतर जोड़कर दिखाएगा?'

‘जमकर खाया पानमसाला, हुआ कैंसर पिटा दिवाला.' इस बार कुक्कीी ने कमाल दिखाया.

‘काले धंधे जैसा काला...' बच्चों में कविता ग़ढ़ने की होड़ जैसी मच ग़ई.

‘पानमसाला...पानमसाला.'

‘धोती-कुर्ता सने पीक से...'

‘मुंह में ग़टर छिपाए लाला.'

‘शाबाश बच्चोप, तुम लोग़ तो जीनियस से भी बढ़कर हो.' बद्री काका सचमुच उत्साहहित थे. कविता ग़ढ़ने का उनका प्रयोग़ इतना सफल होगा, बच्चेो उसमें इस उत्सानह से भाग़ लेंगे, इसकी उन्होंकने कल्प ना भी नहीं की थी.

‘माथा पीट रही लालाइन.'

‘अभी वक्त है संभलो लाला.' टोपीलाल की पंक्ति को निराली ने पूरा किया.

‘आई अक्लत कसम फिर खाई.' बद्री काका ने कविता को समापन की ओर ले जाने के लिए नई पंक्तिय सुझाई. इसपर कुक्कीत ने झट से जोड़ दिया.

‘अब न छुएंगे पान मसाला.'
 
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