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"घबराओ मत पिताजी!” टुम्बकटू अजीब-से स्वर में बोल----" उसका प्रबंध भी हम करके आए हैं यानी कि हमारे इस सुंदर-सलोने जिस्म पर रबर का लिबास है !"
कांप उठा सिंगही ।।। कितना खतरनाक है ये कार्टून ।।
“वेरी गुड़ अक्सा" बिकास चहका----“तुमने तो वास्तव में कमाल कर दिया । अब जरा जल्दी से दादाजान को मुर्गाजान वना दो । मै जरा इस बेरहम को बता दूं जिंदगी क्या होती है?” उसका संकेत तुगलामा की तरफ़ था ।
"क्यो वे बूढे?” अचानक टुम्बकटू सिगंही के सिर पर चपंत जमाता हुअ बोला-----" बच्चा ठीक कह रहा है क्या?”
सिगंही का भयानक चेहृरा क्रोध से लाल हौ गया । वह्न कभी ऐसी विषम परिस्थिति में नहीं फ़सा था मगर उसकी समझ, में भी नहीं आ रहा था कि आखिर वह इस कार्टून का करे क्या?
कुछ सोचते हुए उसने वेहद फुर्ती के साथ कक्ष के द्धार की ओर जंप लगाई लेकिन तभी टुम्बकटू कह्र उठा--“अबे प्यारे धर्म बाप वूढ़ऊ तो साला दुमं दबाकर भागता है ।”
लेकिन विकास भला अब कहां सुनता? उसे तो वह दृश्य याद आ गया, जब तुगलामा ने उसके जिस्म पर हंटर बरसाए थे ।।
बस -वह भी तुगलामा की तरफ़ बढा ।
सड़ाक .सड़ाक .सड़ाकं ।
दनादन हंटर बरसाए चला गया विकास, जैसे पागल हो गया हो ।
हालाकि इस क्रिया में उसके बदन में पीड़ा की बड़ी तीव्र लहर दौडती थी लेकिन वह बरसता ही चला गया । तुगलामा किसी भैंसे की भांति डकराने लगा ।
इघर बिकास उसके जिस्म से गोश्त नोच रहा था, उधर टुम्बकटू सिगंही से कह रहा था ।
"देखो खूसट मियां, तुम्हारा यार कैसा डकरा रहा है!" सिंगहीँ का सारा शरीर क्रोध से कांप रहा था ।।
"सिगंही से टकराकर पछताओगे टुम्बकटू ।" सिगंही गुर्राया ।।
“तुमसे पहले भी कई बार कह का चुका हूं बड़े मियां कि अब तुम्हारे बस का यह रोग नहीं रह गया ।
टुम्बकटू आराम से अपनी अजीब-सी सिगरेट सुलगाता हुआ बोला…"अब तुम्हें संन्यास ले लेना चाहिए।"
उसी पल सिगंही ने सोचा कि टुम्बकटू असावधान है, विधुत गती से उसने टुम्बकटू पर जंप लगा दी । छलावे जैसी फुर्ती साथ टुम्बकटू ने एक घूंसा सिगंही के जबड़े पर मारा, लेकिन इस बार सिगंही भी पलटकर गिरा नहीं बल्कि उसने झट टुम्बकटू के गन्ने जैसै जिस्म को अपनी बांहों में कस लिया ।
सिगंही.......सिंगही हैं, जोंक कहा जाता है ।
विश्व का कोई भी व्यक्ति सिगंही की इस जोंक वालीं पकड़ से मुक्त नहीं हो सकता । टुम्बकटू का गन्ने जैसा जिस्म सिगंही की उसीं पकढ़ में आ चुका था ।
टुम्बकटू ने मचलनां चाहा मगर सिगंही की पकड़ शिकंजे की भांति सख्त थी । टुम्बकटू को लगा कि उसकी छोटी-छोटी हड्डियां अब कड़कड़ की आवाज के साथ टूट जाएंगी । सिगंही की पकड़ का कसाव बढता ही गया ।
अब टुम्बकटू को महसूस हुआ कि सिगंही की शारीरिक शक्ति गज़ब की हैं । उसने हजारों प्रयास किए किंतु सिगंही की पकड़ अडिग चट्टान वनी हुई थी । टुम्बकटू की श्वास क्रिया रुकने लगी ।
उसे अहसास हुआ कि अगर कुछ पल और ऐसी पकड़ रही तो यह खतरनाक व्यक्ति उसका अत कर देगा ।
ये विचार दिमाग में आते ही टुम्बकटू ने अजीब क्रिया शुरू कर दी । उसका जिस्म फूलता चला गया-किसी शेषनाग की भाँति, जैसे कोई शेषनाग अपना फ़न फूला ले ।। जैसे टुम्बकटू के जिस्म में पंप से हवा भरी जा रही हो । उसका जिस्म फूलता ही चला गया, फूलता
ही चला गया । गन्ने जैसा टुम्बकटू अब अच्छा हैल्पी आदमी नजर आने लगा ।
सिगंही टुम्बकटू की हरकत पर चौका अवश्य था ।ज्यों ज्यों टुम्बकटू का जिस्म फूलता जा रहा था, त्यों-त्यौ उसकी पकड़ सखा होती जा रहीं थी । हाथो का दायरा बढता जा रहा था ।।
तब, जबकि टुम्बकटू का जिस्म फूलकर काफी मोटा हो क्या किंतु सिगंही की पकड से किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं आया । एकदम जैसै किसी फुटबाल की हवा निकाल दी गई हो, ऐक ही झटके से आश्चर्यजनक ढंग से टुम्बकटू का जिस्म पिचककर साधारण अवस्था में आ गया ।
बस-----यहीं सिगंही मात खा गया ।
उसकी पकड़ यानी हाथों का दायरा टुम्बकटू के फैले हुए जिस्म के बराबर हो गया था जबकि टुम्बकटू ने एकदम अपना जिस्म पतला कर लिया । हाथो का दायरा एक पल के लिए टुम्बकटू के फूले हुए शरीर के बराबर रह गया । इसी एक पल में टुम्बकटू सिंगही के दायरे से गायब हो गया ।
" क्यों वे खूसट सारा दम निकालना चाहता… था ?" टुम्बकटू सिगंही पर हावी हो गया ।
उधर विकास ने मारते-मारते तुंगलामा की चमडी उघेड़ दी-पंद्रह मिनट बाद ।
तुंगलामा तो बेहोश फ़र्श पर पड़ा था । उसके जिस्म का सारा गोश्त उधड़ा हुआ था ।
सिंगही को टुम्बकटू ने कसकर रेशर्म की डोरी से बांध दिया था । वैसे भी बहोश पड़ा था ।
विकास ने टुम्बकटू की तरफ देखा और बोला-" जिओ लंबू अकल !! आज तुम ने सिद्ध कर दिया किं तुम इन सव हरामियों के सरदार हो ।"
“बचा लिया धर्म बाप, वरना चटनी वन जाती ।"
"लेकिन आप अचानक आ कैसे गए अंकल?"
"अवे हम हर जगह अचानक ही आते हैं ।” टुम्बकटू-एक, पैर पर खडा होता हुआ बोला…"तेरे आने के बाद अपन तो प्यारे
निंद्रारानी से मिलने चले गए थे । पता नहीँ, कितने, समय बाद तुम्हारे सेवक जाम्बू ने जगाया ।"
" लेकिन......!"
" लेकिन की पूंछ बीच में मत अड़ा वरना रेल की पटरी की तरह की लम्बी हो जाएगी !"
टुम्बकटू तपाक से बोला…"मैं जानता हूं तू ये पूछेगा कि उन्होंने हमें जगाया कैसे? तो प्यारे बापू जान बात यू है कि जागने पर तुम्हारे जाम्बू ने हमेँ बताया कि वह पहले भी हमे पूरे ग्रुप के साथ जगार्ने की चेष्टा कर चुका था, लेकिन हम जागे नहीं, जगा वह हमें इसलिए रहा था कि तुम्हारा ये बंदर की औलाद गायब हो गया था......
..........जब वहुत देर तक यह वापस-नहीं लौटा तो उन्होंने मुझे दुबारा जगाने की कोशिश की । इस चेष्टा मैं अचानक जाम्बू का हाथ मेरे स्विच पर लग गया । अगले ही पल मेरा चपत उसके कान पर पड़ा यानी कि हमं जग गए । तब उन्होंने बताया कि ये साला बंदर गायब है, हम फौरन समझ गए कि कहा चला गया होगा? उन्होंने हमें यह भी बताया के इस बूढे खूसट ने तुम्हें , मंगल सम्राटं बना दिया है । सो हम यहां के लिए तैयार हो गए । तुम्हारा बो साला जाम्बू भी हमारे साथ आने के लिए बच्चों की तरह जिद कर रहा था । बडी मुश्किल से समझाकर हम यहाँ आए । शेष समाचार कल इसी समय विविध भारती से सुनाए जाएंगे ।" टुम्बकटू के अंतिम शब्दों को सुनकर विकास के होंठो पर मुस्कान दौड गई ।
तभी धनुषटंकांर के जिस्म मेँ हरकत हुइ ।
कदाचित उसकी चेतना वापस लौट रही थी । अगले कुछ ही पलो पश्चात धनुषंटंकार _ उठकर खडा हो गया । ठीक इस प्रकार-जैसे उसे पिछली घटनाएं याद्र आ गई हों और लड़ने के लिए तैयार हो ।।
उसके खड़े होते ही टुम्बकटू बोला----" बस....बस बंदंर वेटे, धमा-चौकडी बंद हो गई ।”
धनुषटंकार ने कक्ष का जायजा लिया । स्थिति देखते ही बह समझ गया कि सफलता मिल गई है । वह फुर्ती के साथ उछला झट अपने पैर से जूता निकालकर, दो-दो जूते खीचकर सिगंही और तुंगलामा के बेहोश जिस्म में मारकर अपना क्रोध जाहिर किया ।
टुम्बकटू और विकास मुस्कराकर रह गए ।
तभी धनुषटंकार ने टुम्बकटू के दो तीन चुंबन लिए ।
कांप उठा सिंगही ।।। कितना खतरनाक है ये कार्टून ।।
“वेरी गुड़ अक्सा" बिकास चहका----“तुमने तो वास्तव में कमाल कर दिया । अब जरा जल्दी से दादाजान को मुर्गाजान वना दो । मै जरा इस बेरहम को बता दूं जिंदगी क्या होती है?” उसका संकेत तुगलामा की तरफ़ था ।
"क्यो वे बूढे?” अचानक टुम्बकटू सिगंही के सिर पर चपंत जमाता हुअ बोला-----" बच्चा ठीक कह रहा है क्या?”
सिगंही का भयानक चेहृरा क्रोध से लाल हौ गया । वह्न कभी ऐसी विषम परिस्थिति में नहीं फ़सा था मगर उसकी समझ, में भी नहीं आ रहा था कि आखिर वह इस कार्टून का करे क्या?
कुछ सोचते हुए उसने वेहद फुर्ती के साथ कक्ष के द्धार की ओर जंप लगाई लेकिन तभी टुम्बकटू कह्र उठा--“अबे प्यारे धर्म बाप वूढ़ऊ तो साला दुमं दबाकर भागता है ।”
लेकिन विकास भला अब कहां सुनता? उसे तो वह दृश्य याद आ गया, जब तुगलामा ने उसके जिस्म पर हंटर बरसाए थे ।।
बस -वह भी तुगलामा की तरफ़ बढा ।
सड़ाक .सड़ाक .सड़ाकं ।
दनादन हंटर बरसाए चला गया विकास, जैसे पागल हो गया हो ।
हालाकि इस क्रिया में उसके बदन में पीड़ा की बड़ी तीव्र लहर दौडती थी लेकिन वह बरसता ही चला गया । तुगलामा किसी भैंसे की भांति डकराने लगा ।
इघर बिकास उसके जिस्म से गोश्त नोच रहा था, उधर टुम्बकटू सिगंही से कह रहा था ।
"देखो खूसट मियां, तुम्हारा यार कैसा डकरा रहा है!" सिंगहीँ का सारा शरीर क्रोध से कांप रहा था ।।
"सिगंही से टकराकर पछताओगे टुम्बकटू ।" सिगंही गुर्राया ।।
“तुमसे पहले भी कई बार कह का चुका हूं बड़े मियां कि अब तुम्हारे बस का यह रोग नहीं रह गया ।
टुम्बकटू आराम से अपनी अजीब-सी सिगरेट सुलगाता हुआ बोला…"अब तुम्हें संन्यास ले लेना चाहिए।"
उसी पल सिगंही ने सोचा कि टुम्बकटू असावधान है, विधुत गती से उसने टुम्बकटू पर जंप लगा दी । छलावे जैसी फुर्ती साथ टुम्बकटू ने एक घूंसा सिगंही के जबड़े पर मारा, लेकिन इस बार सिगंही भी पलटकर गिरा नहीं बल्कि उसने झट टुम्बकटू के गन्ने जैसै जिस्म को अपनी बांहों में कस लिया ।
सिगंही.......सिंगही हैं, जोंक कहा जाता है ।
विश्व का कोई भी व्यक्ति सिगंही की इस जोंक वालीं पकड़ से मुक्त नहीं हो सकता । टुम्बकटू का गन्ने जैसा जिस्म सिगंही की उसीं पकढ़ में आ चुका था ।
टुम्बकटू ने मचलनां चाहा मगर सिगंही की पकड़ शिकंजे की भांति सख्त थी । टुम्बकटू को लगा कि उसकी छोटी-छोटी हड्डियां अब कड़कड़ की आवाज के साथ टूट जाएंगी । सिगंही की पकड़ का कसाव बढता ही गया ।
अब टुम्बकटू को महसूस हुआ कि सिगंही की शारीरिक शक्ति गज़ब की हैं । उसने हजारों प्रयास किए किंतु सिगंही की पकड़ अडिग चट्टान वनी हुई थी । टुम्बकटू की श्वास क्रिया रुकने लगी ।
उसे अहसास हुआ कि अगर कुछ पल और ऐसी पकड़ रही तो यह खतरनाक व्यक्ति उसका अत कर देगा ।
ये विचार दिमाग में आते ही टुम्बकटू ने अजीब क्रिया शुरू कर दी । उसका जिस्म फूलता चला गया-किसी शेषनाग की भाँति, जैसे कोई शेषनाग अपना फ़न फूला ले ।। जैसे टुम्बकटू के जिस्म में पंप से हवा भरी जा रही हो । उसका जिस्म फूलता ही चला गया, फूलता
ही चला गया । गन्ने जैसा टुम्बकटू अब अच्छा हैल्पी आदमी नजर आने लगा ।
सिगंही टुम्बकटू की हरकत पर चौका अवश्य था ।ज्यों ज्यों टुम्बकटू का जिस्म फूलता जा रहा था, त्यों-त्यौ उसकी पकड़ सखा होती जा रहीं थी । हाथो का दायरा बढता जा रहा था ।।
तब, जबकि टुम्बकटू का जिस्म फूलकर काफी मोटा हो क्या किंतु सिगंही की पकड से किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं आया । एकदम जैसै किसी फुटबाल की हवा निकाल दी गई हो, ऐक ही झटके से आश्चर्यजनक ढंग से टुम्बकटू का जिस्म पिचककर साधारण अवस्था में आ गया ।
बस-----यहीं सिगंही मात खा गया ।
उसकी पकड़ यानी हाथों का दायरा टुम्बकटू के फैले हुए जिस्म के बराबर हो गया था जबकि टुम्बकटू ने एकदम अपना जिस्म पतला कर लिया । हाथो का दायरा एक पल के लिए टुम्बकटू के फूले हुए शरीर के बराबर रह गया । इसी एक पल में टुम्बकटू सिंगही के दायरे से गायब हो गया ।
" क्यों वे खूसट सारा दम निकालना चाहता… था ?" टुम्बकटू सिगंही पर हावी हो गया ।
उधर विकास ने मारते-मारते तुंगलामा की चमडी उघेड़ दी-पंद्रह मिनट बाद ।
तुंगलामा तो बेहोश फ़र्श पर पड़ा था । उसके जिस्म का सारा गोश्त उधड़ा हुआ था ।
सिंगही को टुम्बकटू ने कसकर रेशर्म की डोरी से बांध दिया था । वैसे भी बहोश पड़ा था ।
विकास ने टुम्बकटू की तरफ देखा और बोला-" जिओ लंबू अकल !! आज तुम ने सिद्ध कर दिया किं तुम इन सव हरामियों के सरदार हो ।"
“बचा लिया धर्म बाप, वरना चटनी वन जाती ।"
"लेकिन आप अचानक आ कैसे गए अंकल?"
"अवे हम हर जगह अचानक ही आते हैं ।” टुम्बकटू-एक, पैर पर खडा होता हुआ बोला…"तेरे आने के बाद अपन तो प्यारे
निंद्रारानी से मिलने चले गए थे । पता नहीँ, कितने, समय बाद तुम्हारे सेवक जाम्बू ने जगाया ।"
" लेकिन......!"
" लेकिन की पूंछ बीच में मत अड़ा वरना रेल की पटरी की तरह की लम्बी हो जाएगी !"
टुम्बकटू तपाक से बोला…"मैं जानता हूं तू ये पूछेगा कि उन्होंने हमें जगाया कैसे? तो प्यारे बापू जान बात यू है कि जागने पर तुम्हारे जाम्बू ने हमेँ बताया कि वह पहले भी हमे पूरे ग्रुप के साथ जगार्ने की चेष्टा कर चुका था, लेकिन हम जागे नहीं, जगा वह हमें इसलिए रहा था कि तुम्हारा ये बंदर की औलाद गायब हो गया था......
..........जब वहुत देर तक यह वापस-नहीं लौटा तो उन्होंने मुझे दुबारा जगाने की कोशिश की । इस चेष्टा मैं अचानक जाम्बू का हाथ मेरे स्विच पर लग गया । अगले ही पल मेरा चपत उसके कान पर पड़ा यानी कि हमं जग गए । तब उन्होंने बताया कि ये साला बंदर गायब है, हम फौरन समझ गए कि कहा चला गया होगा? उन्होंने हमें यह भी बताया के इस बूढे खूसट ने तुम्हें , मंगल सम्राटं बना दिया है । सो हम यहां के लिए तैयार हो गए । तुम्हारा बो साला जाम्बू भी हमारे साथ आने के लिए बच्चों की तरह जिद कर रहा था । बडी मुश्किल से समझाकर हम यहाँ आए । शेष समाचार कल इसी समय विविध भारती से सुनाए जाएंगे ।" टुम्बकटू के अंतिम शब्दों को सुनकर विकास के होंठो पर मुस्कान दौड गई ।
तभी धनुषटंकांर के जिस्म मेँ हरकत हुइ ।
कदाचित उसकी चेतना वापस लौट रही थी । अगले कुछ ही पलो पश्चात धनुषंटंकार _ उठकर खडा हो गया । ठीक इस प्रकार-जैसे उसे पिछली घटनाएं याद्र आ गई हों और लड़ने के लिए तैयार हो ।।
उसके खड़े होते ही टुम्बकटू बोला----" बस....बस बंदंर वेटे, धमा-चौकडी बंद हो गई ।”
धनुषटंकार ने कक्ष का जायजा लिया । स्थिति देखते ही बह समझ गया कि सफलता मिल गई है । वह फुर्ती के साथ उछला झट अपने पैर से जूता निकालकर, दो-दो जूते खीचकर सिगंही और तुंगलामा के बेहोश जिस्म में मारकर अपना क्रोध जाहिर किया ।
टुम्बकटू और विकास मुस्कराकर रह गए ।
तभी धनुषटंकार ने टुम्बकटू के दो तीन चुंबन लिए ।