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धनुषटंकार पूजा को एक विशेष कक्ष में ले गया । कक्ष में पहुंचकर उसने दीवार पर लगा बटन दवा दिया । बटन दबाते ही फर्श पर थोड़ा-सा हिस्सा अपने स्थान से हटता चला गया । वहां लोहे की सीढ़ियाँ नजर आने लगी ।
पहले धनुषटंकार और उसके पीछे पूजा उतरते चले गए । सीढियां एक लंबी सी गेलरी मे जाकर समाप्त हुई ।
वे दोनो चुपचाप गैलरी मे बढ़ते रहे । गैलरी के दोनो और कुछ कक्ष वने हुए थे । धनुषटंकार ने अपने सूट की जेब में एक चाबी निकाली और कक्ष नंबर पांच का ताला खोलकर उसमें प्रविष्ट हो गया । वह कक्ष खाली था । धनुष्टंकार ने कोट की ऊपरी जेब से एक अजीब सी आकृति की चाबी और निकाली तथा फर्श पर एक कोने में बने नन्हें-से छिद्र में लगातार तीन बार दाई तरफ घुमाई । उसके घूमाते ही कक्ष के सामने की दीवार अपने स्थान से हट गई । पूजा को लेकर वह उसी में प्रविष्ट हो गया और उस कक्ष में पहुचकर धनुषटंकार ने वही चाबी बाईं ओर एक दीवारं के छेद में फंसाकर पुन: उसी प्रकार तीन बार घुमाई । इस वार उस कक्ष का फर्श हट गया एक बार उन्हें पुन: लोहे की सीढियां तयं करनी पड़ी । इस बार एक अन्य गैलरी में पहुच गए ।
यह गैलरी भी एकदम सूनी पडी थी ।
"बड़े लंबे तहखानों में कैद का रखा है ?" पूजा ने कहा ।
उत्तर में धनुषटंकार ने डायरी पर लिखा----" पूछो मत पूजा डार्लिग, एक-से-एक धुरंधर इंसान यहाँ कैद है । अगर कैद इतनी सुरक्षित न होती तो सिगंही जैसा आदमी भला अभी तक कैसे ठहर जाता?"
इस गैलरी के दोनों और कक्ष बने हुए थे लेकिन ये कक्ष अन्य कक्षों की अपेक्षा अधिक मजबूत थे----क्योंकि फौलाद के बने हुए थे ।
कक्ष के समीप पहुँचकर धनुष्टंकार ने अपनी जुराब से एक विशेष चाबी निकाली और कक्ष के फौलादी द्वार में वने एक छिद्र में डालकर पूरे पांच बार झटका दिया, तब वह भारी दरवाजा खुला ।
पूजा और धनुष्टंकार ने देखा ---- ठीक सामने
विजय बेहद मोटी जंजीरों मे कैद था । उसे फौलादी फर्श पर जंजीरों मे लिटाया गया था ।
प्रत्येक जंजीर का फौलादी सिरा कमरे के फ़र्श में गड़े मजबूत कुंदों तक गया था । बिजय केवल करवट इत्यादि लेने के लिए हिल सकता था ।
पूजा ने देखा…कमरा अंदर से ठीक किसी टंकी की भाति गोल था । दीवारे एकदम चमकदार थी, मानों स्टील की वनी हो । किसी भी दीवार में सरलता से अपना मुंह देखा जा सकता था ।
खोलने से पहले घनुषटंकार ने रिबॉंल्वर निकालकर पूजा की तरफ़ तान दिया था ताकि विजय को पूरी तरह दिखा सके कि उसे कैद करके लाया गया था ।
जंजीरों में जकड़े विजय ने करवट ली । उसकी ओर देखा एकदम बोला । "
" आओ ---- आओं , बंदर मियाँ क्या हाल है?"
'बंदर' शब्द सुनते ही धनुषटंकार ने बिजय को इस तरह घूरा जैसे खा जाएगा । लेकिन कदाचित इस बात का लिहाज कर गया कि विजय उसका स्वामी था वरना बंदर कहने वाले की कनपटी वह गर्म कर देता था । एक मिनट तक वह विजय घूरता रहा,
फिर रिवाल्बॅर के संकेत से उसने पूजा को फर्श पर कुछ कडो के बीच लेटने का संकेत किया ।
कडो में जंजीरों के टुकडे फसे हुए थे । पूजा उन कडो के बीच लेट गई ।
एक बटन दबाने से ये जंजीरे कडो के बीच पड़े इंसान को अपने में जकंड़ लेती थी ।
धनुषटंकार वह बटन दबाने के लिए जैसे ही मुड़ा उसी पल एक कमाल हुआ... पूजा ने जंजीर का एक दुकड़ा पूरी शक्ति के साथ विद्युत गति से घुमाकर धनुषटंकार के जिस्म पर मारा ।
पूजां से इस प्रकार की उम्मीद तो स्वप्न में भी नहीं थी, क्दाचित्त इसीलिए वह मात खा गया ।
झन्नाती हुई जंजीर उसके जिस्म पर पडी ।
उसके कंठ सेर एक कराहट सी निक्ली और दूसरी ओर पलट गया ।
रिवॉल्वर उसके हाथ से छूटकर कक्ष के फर्श पर गिर गया । पूजा के जिस्म में जैसे बिजंली भरं गई थी ।
बडी तेजी के साथ उसने जंप मारकर धनुषटंकार को दबोच लिया ।
बेचारा धनुषटंकार । उसे संभलने का अवसर भी नही मिला ।
पूजा तो इस समय जैसे भयानक शातिंर हो उठी थी ।
उसने धनुषटंकार को सिंरसे ऊंचा उठाया और पूरी शक्ति से फर्श पर दे मारा ।
धनुषटंकार के कंठ से एक चीख निकल गई । और इस प्रकार--पूजा ने एक बार भी तो धनुषटंकार को संभलने का अवसर नहीं दिया ।
उसने धनुषटंकार इतनी मार लगाई कि अंत में वह बेहोश होने के लिए बाध्य हो गया ।
जंजीरों में ज़कड़ा हुआ व्रिजय चमत्कृत सा यह सव कुछ देख रहा था।
धनुषटंकार से छुटकारा पाकर पूजा ने उसकी जेबों की तलांशी लेनी शुरू की ।
" वाह! ! पूजा देवी!" विजय वहां पडा-पड़ा प्रशंसनीय स्वर से बोला-“यानी कि क्या पैंतरे दिखाए हैं! जी चाहता है एक गर्मागर्म झकझकी सुना दु !" विजय अपने ही मे था !
पूजा तेजी के साथ उसकी तरफ़ घूमी, उसकी उन्हें लाल हो रही थी ।
चेहरे पर घृणात्मक भाव वे । वह विजय को बड़ी खूंखार निगाहों से घूरती हुई गुर्राई-“अभी तुमने देखा ही क्या है, कमाल तो अब देखना ।"
उसका इतना कहना था कि विजय के मस्तिष्क को एक तीव्र झटका लगा । बरबस ही उसके मुह से निकला--" अरे, .मम्मी!"
“तुमने ठीक पहचाना ।" पूजा बोली, जो वास्तव में जैक्सन ही थी-"पूजा का मेकअप करने अतिरिक्त मेरे पास कोई चारा नहीं था । मेकअप की तारीफ तुम्हें करनी होगी क्योंकि वो खतरनाक लडका भी नहीं पहचान सका ।”
" अजी लड़के साले को गोली मारो!" विजय बोला----" हम यानी उस लड़के के गुरु नहीं पहनाने । जब तुमने कमाल दिखाने शुरू किए हम यही सोचते रहे कि पूजा जैसी मासूम लड़की इतने खतरनाक खेलु कैसे जान गई? कसम खाल लंगोटे चाले की, हम तो तुम्हें उस समय पहचाने जब तुम हम पर भी गुर्राकर आई । उस समय तुम्हारी प्यारी-प्यारी आंखों ने हमें बता दिया कि तुम पूजा नहीं हमारी मम्मी हो !"
...................
कहने के एकदम बाद ही बडी अदा के साथ विजय ने बाई आंख दबा दी ।
जैक्सन के होंठों पर एक प्यारी मुस्कान नृत्य कर उठी, फिर बोली---" बोलो विजय, विकास का तख्ता पलटने में मेरा साथ दोगे?” यह प्रश्न करते समय जैक्सन ने बड़े ध्यान से विजय का चेहरा पढा ।
"अरे क्या बात करती हो मम्मी?" विजय चहका…"तख्ता नहीं, हम तो उसे ही पलटने के मूड में है । तुम हमे वहाँ तक ले चलो । वैसे बाई दी वे, तुम्हें लड़के के अपराधी बनने में क्या दिक्कत है? वह तुम्हारी मैंजोरिटी में आ रहा से तुम खुद ही उसे यहा तक लाई थी?" विजय ने प्रश्न किया ।।
" मै कितनी भी बड्री अपराधी सही मिस्टर विजय!" जैक्सन ने सफेद झूठ बोला-----" लेकिन न जाने क्यों इस मासूम से प्या र सा होगया है । वह तो अपना जीवनं बर्बाद करने पर तुला हुआ है , लेकिन मैं कभी ऐसा नहीं चाह सकती ।"
" वेऱी गुड मम्मी !" विजय पुन: चहका'-"यानी कि तुम्हारे विचार हमारे विचारों की केटली में आ मिले हैं ।"
" अब जैसा भी तुम समझे !”
"तो फिर जल्दी हमे आजाद करो ।"
" अलफांसे इत्यादि कहां हैं?" जैक्सन ने प्रश्न किया ।
" सब यहीं कैद किए गए हैं ।" विजय ने कहा…“ज़ल्दी से सामने वाली दीवार पर लगा नीचे से तीसरा बटन दबा दो, इन जजंरों का संबंध उसी से है । बटन दबाते ही हम आजाद हो जाएंगे ।"
जैक्सन ने वेसा ही किया और विजय आजाद होगया ।
पहले धनुषटंकार और उसके पीछे पूजा उतरते चले गए । सीढियां एक लंबी सी गेलरी मे जाकर समाप्त हुई ।
वे दोनो चुपचाप गैलरी मे बढ़ते रहे । गैलरी के दोनो और कुछ कक्ष वने हुए थे । धनुषटंकार ने अपने सूट की जेब में एक चाबी निकाली और कक्ष नंबर पांच का ताला खोलकर उसमें प्रविष्ट हो गया । वह कक्ष खाली था । धनुष्टंकार ने कोट की ऊपरी जेब से एक अजीब सी आकृति की चाबी और निकाली तथा फर्श पर एक कोने में बने नन्हें-से छिद्र में लगातार तीन बार दाई तरफ घुमाई । उसके घूमाते ही कक्ष के सामने की दीवार अपने स्थान से हट गई । पूजा को लेकर वह उसी में प्रविष्ट हो गया और उस कक्ष में पहुचकर धनुषटंकार ने वही चाबी बाईं ओर एक दीवारं के छेद में फंसाकर पुन: उसी प्रकार तीन बार घुमाई । इस वार उस कक्ष का फर्श हट गया एक बार उन्हें पुन: लोहे की सीढियां तयं करनी पड़ी । इस बार एक अन्य गैलरी में पहुच गए ।
यह गैलरी भी एकदम सूनी पडी थी ।
"बड़े लंबे तहखानों में कैद का रखा है ?" पूजा ने कहा ।
उत्तर में धनुषटंकार ने डायरी पर लिखा----" पूछो मत पूजा डार्लिग, एक-से-एक धुरंधर इंसान यहाँ कैद है । अगर कैद इतनी सुरक्षित न होती तो सिगंही जैसा आदमी भला अभी तक कैसे ठहर जाता?"
इस गैलरी के दोनों और कक्ष बने हुए थे लेकिन ये कक्ष अन्य कक्षों की अपेक्षा अधिक मजबूत थे----क्योंकि फौलाद के बने हुए थे ।
कक्ष के समीप पहुँचकर धनुष्टंकार ने अपनी जुराब से एक विशेष चाबी निकाली और कक्ष के फौलादी द्वार में वने एक छिद्र में डालकर पूरे पांच बार झटका दिया, तब वह भारी दरवाजा खुला ।
पूजा और धनुष्टंकार ने देखा ---- ठीक सामने
विजय बेहद मोटी जंजीरों मे कैद था । उसे फौलादी फर्श पर जंजीरों मे लिटाया गया था ।
प्रत्येक जंजीर का फौलादी सिरा कमरे के फ़र्श में गड़े मजबूत कुंदों तक गया था । बिजय केवल करवट इत्यादि लेने के लिए हिल सकता था ।
पूजा ने देखा…कमरा अंदर से ठीक किसी टंकी की भाति गोल था । दीवारे एकदम चमकदार थी, मानों स्टील की वनी हो । किसी भी दीवार में सरलता से अपना मुंह देखा जा सकता था ।
खोलने से पहले घनुषटंकार ने रिबॉंल्वर निकालकर पूजा की तरफ़ तान दिया था ताकि विजय को पूरी तरह दिखा सके कि उसे कैद करके लाया गया था ।
जंजीरों में जकड़े विजय ने करवट ली । उसकी ओर देखा एकदम बोला । "
" आओ ---- आओं , बंदर मियाँ क्या हाल है?"
'बंदर' शब्द सुनते ही धनुषटंकार ने बिजय को इस तरह घूरा जैसे खा जाएगा । लेकिन कदाचित इस बात का लिहाज कर गया कि विजय उसका स्वामी था वरना बंदर कहने वाले की कनपटी वह गर्म कर देता था । एक मिनट तक वह विजय घूरता रहा,
फिर रिवाल्बॅर के संकेत से उसने पूजा को फर्श पर कुछ कडो के बीच लेटने का संकेत किया ।
कडो में जंजीरों के टुकडे फसे हुए थे । पूजा उन कडो के बीच लेट गई ।
एक बटन दबाने से ये जंजीरे कडो के बीच पड़े इंसान को अपने में जकंड़ लेती थी ।
धनुषटंकार वह बटन दबाने के लिए जैसे ही मुड़ा उसी पल एक कमाल हुआ... पूजा ने जंजीर का एक दुकड़ा पूरी शक्ति के साथ विद्युत गति से घुमाकर धनुषटंकार के जिस्म पर मारा ।
पूजां से इस प्रकार की उम्मीद तो स्वप्न में भी नहीं थी, क्दाचित्त इसीलिए वह मात खा गया ।
झन्नाती हुई जंजीर उसके जिस्म पर पडी ।
उसके कंठ सेर एक कराहट सी निक्ली और दूसरी ओर पलट गया ।
रिवॉल्वर उसके हाथ से छूटकर कक्ष के फर्श पर गिर गया । पूजा के जिस्म में जैसे बिजंली भरं गई थी ।
बडी तेजी के साथ उसने जंप मारकर धनुषटंकार को दबोच लिया ।
बेचारा धनुषटंकार । उसे संभलने का अवसर भी नही मिला ।
पूजा तो इस समय जैसे भयानक शातिंर हो उठी थी ।
उसने धनुषटंकार को सिंरसे ऊंचा उठाया और पूरी शक्ति से फर्श पर दे मारा ।
धनुषटंकार के कंठ से एक चीख निकल गई । और इस प्रकार--पूजा ने एक बार भी तो धनुषटंकार को संभलने का अवसर नहीं दिया ।
उसने धनुषटंकार इतनी मार लगाई कि अंत में वह बेहोश होने के लिए बाध्य हो गया ।
जंजीरों में ज़कड़ा हुआ व्रिजय चमत्कृत सा यह सव कुछ देख रहा था।
धनुषटंकार से छुटकारा पाकर पूजा ने उसकी जेबों की तलांशी लेनी शुरू की ।
" वाह! ! पूजा देवी!" विजय वहां पडा-पड़ा प्रशंसनीय स्वर से बोला-“यानी कि क्या पैंतरे दिखाए हैं! जी चाहता है एक गर्मागर्म झकझकी सुना दु !" विजय अपने ही मे था !
पूजा तेजी के साथ उसकी तरफ़ घूमी, उसकी उन्हें लाल हो रही थी ।
चेहरे पर घृणात्मक भाव वे । वह विजय को बड़ी खूंखार निगाहों से घूरती हुई गुर्राई-“अभी तुमने देखा ही क्या है, कमाल तो अब देखना ।"
उसका इतना कहना था कि विजय के मस्तिष्क को एक तीव्र झटका लगा । बरबस ही उसके मुह से निकला--" अरे, .मम्मी!"
“तुमने ठीक पहचाना ।" पूजा बोली, जो वास्तव में जैक्सन ही थी-"पूजा का मेकअप करने अतिरिक्त मेरे पास कोई चारा नहीं था । मेकअप की तारीफ तुम्हें करनी होगी क्योंकि वो खतरनाक लडका भी नहीं पहचान सका ।”
" अजी लड़के साले को गोली मारो!" विजय बोला----" हम यानी उस लड़के के गुरु नहीं पहनाने । जब तुमने कमाल दिखाने शुरू किए हम यही सोचते रहे कि पूजा जैसी मासूम लड़की इतने खतरनाक खेलु कैसे जान गई? कसम खाल लंगोटे चाले की, हम तो तुम्हें उस समय पहचाने जब तुम हम पर भी गुर्राकर आई । उस समय तुम्हारी प्यारी-प्यारी आंखों ने हमें बता दिया कि तुम पूजा नहीं हमारी मम्मी हो !"
...................
कहने के एकदम बाद ही बडी अदा के साथ विजय ने बाई आंख दबा दी ।
जैक्सन के होंठों पर एक प्यारी मुस्कान नृत्य कर उठी, फिर बोली---" बोलो विजय, विकास का तख्ता पलटने में मेरा साथ दोगे?” यह प्रश्न करते समय जैक्सन ने बड़े ध्यान से विजय का चेहरा पढा ।
"अरे क्या बात करती हो मम्मी?" विजय चहका…"तख्ता नहीं, हम तो उसे ही पलटने के मूड में है । तुम हमे वहाँ तक ले चलो । वैसे बाई दी वे, तुम्हें लड़के के अपराधी बनने में क्या दिक्कत है? वह तुम्हारी मैंजोरिटी में आ रहा से तुम खुद ही उसे यहा तक लाई थी?" विजय ने प्रश्न किया ।।
" मै कितनी भी बड्री अपराधी सही मिस्टर विजय!" जैक्सन ने सफेद झूठ बोला-----" लेकिन न जाने क्यों इस मासूम से प्या र सा होगया है । वह तो अपना जीवनं बर्बाद करने पर तुला हुआ है , लेकिन मैं कभी ऐसा नहीं चाह सकती ।"
" वेऱी गुड मम्मी !" विजय पुन: चहका'-"यानी कि तुम्हारे विचार हमारे विचारों की केटली में आ मिले हैं ।"
" अब जैसा भी तुम समझे !”
"तो फिर जल्दी हमे आजाद करो ।"
" अलफांसे इत्यादि कहां हैं?" जैक्सन ने प्रश्न किया ।
" सब यहीं कैद किए गए हैं ।" विजय ने कहा…“ज़ल्दी से सामने वाली दीवार पर लगा नीचे से तीसरा बटन दबा दो, इन जजंरों का संबंध उसी से है । बटन दबाते ही हम आजाद हो जाएंगे ।"
जैक्सन ने वेसा ही किया और विजय आजाद होगया ।