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भैया का ख़याल मैं रखूँगी complete

थॅंक्स मिनी .......बिहारी एक ऐसा नौकर है जो अहसान फरामोश के साथ साथ दौलत का भूखा है
 


वीरेंदर अपना टूटा हुआ दिल लेकर कभी इस चौराहे तो कभी उस चौराहे गाड़ी घुमाता रहा. अंत मे उसने आशना को भुला देना ही ठीक समझा और शोरुम की तरफ चल पड़ा. जैसे ही वो शोरुम पहुँचा उसे पता लगा कि आशना उसका वेट करके अभी अभी निकली है. वीरेंदर के शरीर मे एक बार फिर से जान आ गई. घर पहुँचा तो बिहारी ने उसे बताया कि आशना कुछ देर पहले ही अपना समान लेकर निकल गई है. वीरेंदर ने बिहारी से कहा कि वो कुछ दिन के लिए बॅंगलॉर जा रहा है तो घर का ध्यान रखे. वीरेंदर वहाँ से टॅक्सी लेकर सीधा एरपोर्ट आ गया. एरपोर्ट पहुँच कर उसने आशना को वेटिंग लाउंज मे बैठा देखा तो खुशी से झूम उठा. वो आशना के बिल्कुल पीछे खड़ा था. उसका मन किया कि अभी जाकर आशना से अपने दिल की बात कह दे लेकिन वो आशना को सबके सामने रुसवा नहीं करना चाहता था.

उसने आशना से काफ़ी दूर जाकर आशना का नंबर. डाइयल किया लेकिन यह क्या"आशना का नंबर. फिर से स्विच ऑफ". उसे आशना पर काफ़ी गुस्सा आ रहा था. तभी उसकी नज़र आशना पर पड़ी वो फोन पर किसी से बात कर रही थी. यह देख कर वीरेंदर का गुस्सा और भी बढ़ गया. वो यह सोच कर गुस्से मे था कि आशना ने उसे ग़लत नंबर. क्यूँ दिया जो कि हमेशा स्विचऑफ ही रहता है. उसे लगा कि शायद आशना उसे इग्नोर कर रही है. वीरेंदर को यकीन होने लगा कि शायद आशना की ज़िंदगी मे कोई और है.

दरअसल उस वक़्त आशना अपनी फ्रेंड प्रिया को यह बता रही थी कि वो शाम तक पहुँच जाएगी और वो उसे लेने एरपोर्ट पर आ जाए. उसे तो पता भी नही था कि वीरेंदर उसे फोन कर रहा है और उसका नंबर. स्विचऑफ आ रहा है. खैर वीरेंदर अब दोराहे पर खड़ा था. क्या वो आशना के पीछे बॅंगलॉर तक जाए या नहीं. अगर आशना उसे इग्नोर कर रही है तो इसका साफ मतलब था कि वो उस से प्यार नहीं करती. वीरेंदर ने सोचा कि उसे बॅंगलॉर जाकर यह देखना चाहिए कि क्या आशना सच मे किसी और से प्यार करती है या नहीं.

वहीं आशना वेटिंग लाउंज मे बैठी यह सोच रही थी कि वीरेंदर आज सारा दिन गायब रहे है ऐसा क्यूँ. क्या उन्हे नहीं पता कि मुझे उनकी कितनी चिंता हो सकती है, मेरा नंबर. भी लिया लेकिन फिर भी एक बार फोन करके भी नही पूछा कि मैं कहाँ हूँ. फ्लाइट के टाइम के आधे घंटे पहले ही वीरेंदर एकॉनमी क्लास मे बैठ चुका था. आशना के लिए उसने बिज़्नेस क्लास की टिकेट बुक करवाई थी. आशना को यकीन था कि वीरेंदर उस से मिलने ज़रूर आएगा इस लिए वो अंत तक उसका वेट करती रही. लेकिन जब उसके नाम की फाइनल अनाउन्स्मेंट हुई तो वो भी अपनी फ़्लाइट की ओर चल दी. शाम को करीब 7:15 बजे दोनो बॅंगलॉर की धरती पर कदम रख चुके थे.

आशना, प्रिया के साथ एक टॅक्सी मे अपने फ्लॅट की तरफ जा रही थी और वीरेंदर दूसरी टॅक्सी से उसका पीछा करते हुए उनके फ्लॅट से थोड़ा पहले ही उतर गया. अंधेरा काफ़ी होने से आशना वीरेंदर को नहीं देख सकती थी लेकिन उसे लग रहा था कि वीरेंदर उसके आस पास ही कहीं है. प्रिया, आशना की खामोशी से परेशान थी. दोनो अपने फ्लॅट मे पहुँची जो कि उन्होने रेंट पर लिया था. 2बीएचके का यह फ्लॅट ज़्यादातर खाली ही रहता था क्यूंकी कभी आशना तो कभी प्रिया ड्यूटी पर होती. वीरेंदर ने उनके सामने वाली बिल्डिंग मे ग्राउंड फ्लोर पर एक रूम किराए पर ले लिया.आशना का फ्लॅट भी ग्राउंडफ्लॉर पर ही था. उनके फ्लॅट की सारी गतिविधियाँ वीरेंदर के रूम से देखी जा सकती थी. अंदर आते ही वीरेंदर ने एक चेर उस खिड़की की तरफ लगा दी जो कि उनके फ्लॅट के ठीक सामने खुलती थी. बॅंगलॉर मे वैसे तो मौसम ज़्यादा सर्द नहीं था लेकिन रात की ठंडी हवा से वीरेंदर फिर भी एक बार कांप उठा.

अंदर आते ही प्रिया ने सबसे पहला सवाल जो आशना से किया वो था " सबसे पहले यह बता वो कॉन खुशनसीब है जिसे तू अपना दिल दे आई है". आशना ने हैरानी से उसे देखा.

प्रिया: झूठ बोलेगी तो मार खाएगी मेरे से, मैं तुझे कब से जानती हूँ. तेरा उतरा हुआ चेहरा और आँखों मे किसी का इंतज़ार साफ बता रहा है कि तू अपना दिल किसी के पास छोड़ कर आई है. इतना सुनते ही आशना की आँखें झर झर कर बह गई और उसने प्रिया को सब कुछ बता दिया शुरू से लेकर अंत तक बस उस से यह नहीं बताया कि वीरेंदर उसका भाई है.

प्रिया: यार, इस मामले मे तो मैं तेरी हेल्प कर ही सकती हूँ, चल दे मुझे उसका नंबर. बोलती हूँ उसको अपनी अमानत ले जाए.

आशना: मैं उस का नंबर. नहीं जानती, मैने उसे अपना नंबर. भी दिया लेकिन उसने एक बार भी फोन नहीं किया.

प्रिया: नंबर. से याद आया, तूने अपना नंबर. चेंज किया कम से कम मुझे तो नया नंबरतो दे देती, पता है कितना परेशान थी मैं.

आशना: क्या मतलब?

प्रिया: अच्छा जी मेडम ने अपना नंबर. चेंज कर लिया और उन्हे याद ही नहीं.

आशना: लेकिन मैने तो नंबर. चेंज नहीं किया, मेरा नंबर. तो वोही है. अभी शाम को ही तो कॉल की थी ना तुझे.

प्रिया: बिल्कुल की थी और कल भी की थी पर नंबर. वो नहीं था जो कि आपका है.वो नंबर. तो कोई और ही था, तुम्हारा नंबर तो फीड है मेरे पास.

आशना:ऐसा कैसे हो सकता है?

प्रिया: अरे यार यकीन कर मेरा, तेरा वो नंबर. तो कितने दिनों से स्विचऑफ है. खुद चेक कर ले.

 


प्रिया ने आशना का पुराना नंबर. डाइयल कर के आशना को दिखाया तो आशना ने नंबर. ध्यान से देखा, नंबर. तो उसी का था लेकिन स्विचऑफ आ रहा था. आशना का पूरा शरीर कांप गया. उसने तो वीरेंदर को यही नंबर. दिया था. इसका मतलब उसका नंबर. किसी ने चेंज कर दिया लेकिन यह कैसे हो सकता है और कोई ऐसा क्यूँ करेगा.आशना ने अपने मोबाइल से प्रिया के नंबर. पर डाइयल किया तो अपना नंबर. देख कर उसका सिर चकराने लगा.

आशना: यह नंबर. मेरा नहीं है, पता नहीं किसने यह किया. तभी तो मैं सोच रही थी कि तुमने मुझे फोन क्यूँ नहीं किया इतने दिन तक.

प्रिया: यार मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा. मेरे ख़याल से तू नया नंबर. लेकर भूल गई है मेरी जान लेकिन आशना को तो कोई होश ही नही था. वो तो बस कुछ सोचे जा रही थी. वीरेंदर ने तो उसे काफ़ी बार फोन किया होगा लेकिन उसका नंबर. ही स्विच ऑफ था तो उनका कॉंटॅक्ट कैसे होता. शायद इसीलिए वीरेंदर जाते हुए उस से नहीं मिला. वीरेंदर के लिए उसके दिल मे गिले शिकवे एक दम सॉफ हो गये.

आशना: प्रिया लगता है कि कोई बहुत बड़ी चाल हमारे साथ खेली जा रही है.

प्रिया: यह फिल्मी डायलॉग मारने बंद कर और यह सोच कि यह नंबर. तूने कब चेंज किया. आशना जानती थी कि प्रिया उसका यकीन नहीं करेगी.

आशना: अच्छा चल छोड़ और कुछ खाने के लिए बना दे.

प्रिया:ऑल्वेज़ अट युवर सर्विस मेडम, बस कुछ देर इंतज़ा करो और यह कह कर किचन की तरफ चल दी. आशना सोच रही थी कि ऐसा कॉन हो सकता है जिसने यह किया हो लेकिन वो किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी.

 


वहीं वीरेंदर भी अपनी यादों से बाहर आया जब उसके दरवाज़े पर नॉक हुई. एक 15-16 साल का दिखने वाला लड़का वीरेंदर केलिए खाना लेकर आया था.

अंदर आते ही लड़के ने बोला: आपका ऑर्डर सर.

वीरेंदर रख दो, बाद मैं आकर बर्तन ले जाना. वीरेंदर को खिड़की के पास बैठा देख कर पहले तो वो लड़का कुछ कहने को हुआ लेकिन फिर चुप चाप चला गया.वीरेंदर वहीं खिड़की पर बैठा पिछले दिन से हुई घटनाओ के बारे मैं सोचने लगा. थोड़ी देर बाद उसे याद आया कि उसने तो कल शाम से कुछ खाया ही नहीं है. वीरेंदर ने ना चाहते हुए भी खाना खाया, वो मन मैं यही सोचे जा रहा था कि "वीरेंदर इतना कमज़ोर दिल नहीं कि एक लड़की के लिए खाना पीना छोड़ दे". खाना खाकर वो फिर से वहीं अपनी जगह बैठ गया.

रात के करीब 9:30 बज रहे थे, लेकिन बाज़ार की रौनक ऐसी थी कि यहाँ के लोगों को पता ही ना हो कि रात किसे कहते हैं. सड़क पर ज़्यादातर पैदल चलने वाले लोग ही थे, बीच बीच मे इक्का दुक्का गाड़ियाँ और बाइक्स भी नज़र आ रही थी. सब अपने आप मे ही मसरूफ़ थे और वीरेंदर इतनी भीड़ के बावजूद भी बिल्कुल अकेला, बिल्कुल तन्हा. वीरेंदर ने अपना फोन उठा कर एक बार फिर से आशना का नंबर. डाइयल किया लेकिन फिर से स्विचऑफ. वीरेंदर ने झल्ला कर फोन को बिस्तर पर पटक दिया.

वीरेंदर (अपने आप से): कोई फ़ायदा नहीं होगा यहाँ रुकने का, वो लड़की तुझसे फ्लर्ट करके चली गई और तू फिर भी उसके पीछे यहाँ तक आ गया. वीरेंदर ने डिसाइड किया कि वो यहाँ से जल्द ही निकल जाएगा. वीरेंदर ने एरपोर्ट फोन करके पूछा कि बांदलोरे की आगे फ्लाइट कब की है तो उसे मालूम हुआ कि सुबह 7:00 बजे की एक फ्लाइट है. वीरेंदर ने अपने लिए एक टिकेट बुक करवा दी और अपना क्रेडिट नंबर. बता कर पेमेंट कर दी. वीरेंदर जैसे ही खिड़की को बंद करने लगा तभी वो लड़का बर्तन उठाने आ गया.

लड़का: बाबू जी खिड़की बंद कर दीजिए मौसम काफ़ी ठंडा है और यहाँ मच्छर भी बहुत हैं. इतनी ठंड मैं भी मच्छर सिर्फ़ इसी एरिया मे ही मिलते हैं. साले रात भर सोने नहीं देते.

वीरेंदर: कोई बात नहीं मेरा खून बहुत कड़वा है, मुझे काटेंगे तो मर जाएँगे.

यह सुन कर वो लड़का हँसने लगा और बोला "साहब मेरे साथ भी ऐसा ही है, जो मच्छर मुझ पर हमला करता है सुबह तक अपनी जान गँवा चुका होता है. अब तो इनको मेरे से वाकफियत हो गई है, कोई मेरे पास फटकता ही नहीं.

वीरेंदर: क्या नाम है तुम्हारा.

लड़का: जी मोनू.

वीरेंदर: मोनू तुम यहाँ कब से काम कर रहे हो.

मोनू: मैं तो इस बिल्डिंग मैं सिर्फ़ खाना सप्लाइ करता हूँ, मेरे पिता जी का होटेल यहाँ पास मे ही है. दिन भर पढ़ता हूँ और रात को पिताजी का हाथ बँटाता हूँ.

वीरेंदर: कॉन सी क्लास मे हो.

मोनू: 11थ साइन्स.

वीरेंदर: वाह यह तो बहुत बढ़िया है कि तुम पढ़ाई भी करते हो और अपने पिता जी का हाथ भी बाँटते हो.

मोनू:अब एक दूसरे के सिवा हमारा है ही कॉन तो एक दूसरे की मदद करना तो हमारा फ़र्ज़ है.

वीरेंदर (गहरी सोच मे डूबते हुए): वो तो है.

मोनू: बाबू जी अगर बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?

वीरेंदर:हां पूछो.

मोनू: बाबू जी आप कहाँ के हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं.

वीरेंदर ने मोनू की तरफ देखा और बोला: मोनू मेरा नाम वीरेंदर शर्मा है और मैं देल्हिी से हूँ, यहाँ किसी काम से आया था.

मोनू: तो फिर आप खिड़की के पास ही क्यूँ बैठे हो जब से आए हो.

वीरेंदर उसके इस प्रश्न से हडबडा गया.

मोनू: सॉरी, बाबू जी ऐसे ही पूछ लिया. वो क्या है ना कि जब आप टॅक्सी से उतार कर किसी से छुप रहे थे तो मेरी नज़र आप पर पड़ी थी. आप उस वक्त हमारे होटेल के आगे ही खड़े थे. आप को देख कर लगता है कि आप एक अच्छे घर से हो तो फिर आप छुप क्यूँ रहे थे??

वीरेंदर मोनू के सवालो से परेशान हो गया.

वीरेंदर: तुम अपने काम से मतलब रखो और जाओ यहाँ से. सुबह 5:00 बजे चाइ ले आना तो तुम्हारा हिसाब कर दूँगा.

मोनू: माफ़ कीजिएगा बाबू जी लेकिन मैने पहले ही कहा था के बुरा मत मानना.

विरेडनेर: इट्स ओके, नाउ गो.

मोनू: ऐज यू विश मिस्टर. वीरेंदर जी.

मोनू जैसे ही जाने के लिए बर्तन उठाने लगा, वीरेंदर ने बोला: यार नाराज़ मत होना, मेरा मूड ही नहीं है बात के लिए.

मोनू के चेहरे पर स्माइल आ गई.

मोनू: मुझे तो पहले ही आप सब से अलग लगे थे, अब तो यकीन भी हो गया.

वीरेंदर: मतलब?

मोनू: रहने दीजिए, आप फिर नाराज़ हो जाएँगे.

वीरेंदर: अच्छा मेरे भाई बोल क्या कहना चाहता है तू, मैं नाराज़ नहीं होऊँगा.

मोनू: मुझे पता है कि आप आशना दीदी या प्रिया दीदी का पीछा कर रहे थे, मैने देख लिया था. (वीरेंदर यह सुनकर हैरान रह गया कि एक छोटा सा बच्चा उसपर नज़र रख रहा था).

वीरेंदर: तो क्या हुआ, मैने तुम्हारी दीदियो को कुछ बोला थोड़े ही.

मोनू: तभी तो मुझे लगा कि आप अलग हैं. आशना दीदी और प्रिया दीदी के लिए तो यह रोज़ की बात है. कितने ही आवारा लड़के उनके पीछे आते हैं, उनसे बात करने की कोशिश करते हैं लेकिन मूह उठाए चल देते हैं. कई बार तो वो हमारे होटेल पर बैठ कर चाइ वागेहरा पीते हैं और आशना-प्रिया दीदी के लिए गंदी गंदी बातें बोलते हैं.

वीरेंण्दर: तो क्या तुम्हारी दीदिया इतनी सुंदर हैं कि हमेशा उनके पीछे लड़कों की लाइन लगी रहती है.

मोनू: और नहीं तो क्या, वो दोनो तो बहुत ही सुंदर हैं तभी तो आप भी उनका पीछा करते हुए आ गये.

वीरेंदर के पास कोई जवाब नहीं था.

मोनू: लेकिन प्रिया दीदी की तो एंगेज्मेंट हो गई है, लड़का उनके साथ ही काम करता है और आशना दीदी तो बस पूछो ही मत.

वीरेंदर : क्यूँ??

मोनू: अगर रास्ते मे उनका कोई दोस्त भी पास से गुज़र जाए तो उन्हे पता ही नहीं लगता. कभी नज़र उठाकर किसी को देखती ही नहीं.

वीरेंदर: हो सकता है वो किसी को चाहती हो तो उसे किसी और को देखने की ज़रूरत ही क्या है.

मोनू: मैं आशना दीदी को अच्छे से जानता हूँ, अफेर होना तो दूर अगर कोई लड़का उन्हे रास्ते मे बुला भी ले तो उसकी बॅंड बज जाती है.

वीरेंदर: तब तो बड़ी ख़तरनाक है तेरी आशना दीदी.

 


मोनू हंसा और बोला: ख़तरनाक नहीं मगर हां उनके साथ जो कुछ बीता है उसे देख कर कोई नहीं कह सकता कि वो इस मुकाम तक पहुँच सकती है.

वीरेंदर: कॉन सा मुकाम भाई, हमे भी तो पता लगे कि तुम्हारी आशना दीदी किस खेत की मूली है.

मोनू: मेरी दीदी एयरहोस्टेस है.

वीरेंदर एक दम अपनी सीट से उछल पड़ा. वीरेंदर: क्या??????.

मोनू: क्यूँ??????आपको नहीं पता था क्या?

वीरेंदर: लेकिन्न्न्न्न्न...........

मोनू: अरे आप इतना चौंक क्यूँ गये?????? सच में आशना दीदी एक एयरहोस्टेस ही हैं . करीब करीब साल होने को है जब उन्होने ............एरलाइन्स जाय्न की थी और तब से वो प्रिया दीदी के साथ इसी फ्लॅट को शेयर कर रही हैं.

वीरेंदर का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया था. वीरेंदर को एक अंजानी आशंका ने घेर लिया.

वीरेंदर: और उनकी फॅमिली के बारे मे कुछ जानते हो????.

मोनू: ज़्यादा तो पता नहीं लेकिन इतना ज़रूर सुना है कि इनकी माँ तो बचपन मे ही चल बसी थी और छोटी सी ही उम्र मे इनके पिता जी और उनके भाई का पूरा परिवार किसी आक्सिडेंट में मारा गया था.

वीरेंदर धडाम से चेयर पर गिर पड़ा,उस का सर घूमने लगा, उसे सारी धरती हिलती हुई लगने लगी. उसका गला सूख गया था, वो खुली आँखों से बेहोश सा हो गया था. उसका दिल धड़क रह था लेकिन शरीर मे जान नही रही थी. मोनू उसे झिझोड़ता रहा मगर वीरेंदर तो जड़ बन चुका था. सारी रात उसकी एक ही जगह पर बैठे बैठे कट गई, उसे पता ही नहीं चला कि कब सुबह हुई और कब मोनू चाइ लेकर वापिस भी आ गया.

मोनू ने अंदर आते ही पूछा: अरे आप तो सुबह सुबह ही उठ गये.

वीरेंदर का ध्यान उसकी तरफ गया तो एक दम चौंका.

वीरेंदर: क्या?????, सुबह हो गई?

मोनू ने अजीब नज़रों से वीरेंदर को देखा और बोला: क्या बाबू जी सुबह सुबह मुझसे ही मज़ाक.

वीरेंदर को एहसास हुआ कि वो सारी रात एक ही जगह पर बैठा बैठा अपने ख्यालों में खो गया था, उसे तो पता ही नहीं लगा कि रात कब बीत गई और सुबह भी हो गई.

वीरेंदर ने मोनू से चाइ ली और बोला कि :तुम्हारे पैसे मैं कल दे दूँगा, आज मेरे जाने का प्रोग्राम कॅन्सल हो गया है.

मोनू: बाबू जी आप चाहे जब भी जाओ मगर अब तक का हिसाब कर दीजिए नहीं तो पिता जी सुबह सुबह भड़क उठेंगे.

वीरेंदर ने उसे पैसे दिए और मोनू ने जाते जाते उसे बताया कि अगर और कुछ चाहिए होगा तो किसी से भी "..........होटल" का पूछ लेना, मैं तो अब शाम को ही आउन्गा.

वीरेंदर: यार शाम को जल्दी आ जाना तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं.

मोनू: जी बाबू जी.

मोनू के जाने के बाद वीरेंदर फिर से सोच मे पड़ गया "आख़िर आशना ने ऐसा क्यूँ किया", उसे यह सब करने से क्या मिला होगा. उसने मेरे साथ ऐसा विश्वासघात क्यूँ किया. ऐसे ही ना जाने कितने ही सवाल वीरेंदर के दिमाग़ मे घूम रहे थे.

दूसरी तरफ आशना भी पूरी रात यही सोचती रही कि आख़िर उसका सिम किसने चेंज किया होगा. आख़िर किस इंसान को इस से फ़ायदा हो सकता है. उसे अपने सवालों का कोई जवाब नहीं मिल रहा था. उसने रात को ही अपनी पॅकिंग कर ली और सारा समान बाँध दिया था. पहले वो "शर्मा निवास" सिर्फ़ और सिर्फ़ वीरेंदर के लिए जाना चाहती थी मगर अब उसे एक और उद्देश्य से वहाँ जाना था और इस राज़ की जड तक पहुँचना था. उसका शक़ बार बार वीरेंदर की तरफ जाता क्यूंकी उसके मुताबिक बिहारी काका को शायद ही मोबाइल से बात भी करना आता हो लेकिन फिर वो यह ख़याल दिमाग़ से झटक देती और सोचती कि ऐसा करने से वीरेंदर को क्या मिलता. इन सब सवालो के जवाब जानने के लिए उसे "शर्मा निवास" ज़रूर जाना था.सारी रात आशना की आँखों में ही कट गई और उसे पता ही ना लगा एक दिन कब निकल गया.

प्रिया अपने रूम से बाहर आई और आशना को देखते हुए बोली: आज तो मेडम जी बड़ी जल्दी उठ गई, क्या वीरेंदर के ख़यालो ने सोने नहीं दिया???

आशना ने फीकी सी मुस्कान दी और बोली: खुद तो सारी रात सोती रही और मुझे खुद ही अपनी सारी पॅकिंग करनी पड़ी.

प्रिया: क्या यार इतनी जल्दी क्या है, कल चली जाना अपने ससुराल.

प्रिया के इस तरह छेड़ने से आशना शरमा गई.

प्रिया: कभी हमें भी मिलाना अपने उस राजकुमार से जिसने कुछ ही दिनों मे हमारी सबसे खूबसूरत और हसीन दोस्त तो हमसे छीन लिया.

आशना ने कोई जवाब नहीं दिया और बाथरूम मे घुस गई.

 


प्रिया: जल्दी करना, मोनू चाइ लेकर आने ही वाला होगा.

आशना: इन 15 मिनिट्स ओन्ली.

नहाने और तैयार होने के बाद आशना बाथरूम से बाहर आई तो प्रिया कहीं जाने के लिए तैयार हो रही थी.

आशना: तुमने तो आज छुट्टी ली थी तो सुबह सुबह कहाँ चल दी.

प्रिया: वो तुम्हारे जीजू का आज सुबह सुबह मूड बन गया है. यहाँ तो उसे बुला नहीं सकती थी तो उसने अपने फ्लॅट पर ही प्रोग्राम रखा है.

आशना: इतनी सुबह सुबह, यार कुछ तो शरम करो.

प्रिया: शरम क्यूँ, अरे दो महीने मे हम शादी करने वाले हैं तो अपने होने वाले पति के लिए मैं तो हमेशा अवेलबल रहूंगी.

आशना: जो तेरे मन मे आए कर, जब मुझे निकलना होगा मैं तुम्हे कॉल कर दूँगी.

प्रिया: ओके यह ले तेरे रिटर्न टिकेट आंड फोन करती रहना. इस बार नंबर. चेंज नही कर देना.

आशना: बाइ.

आशना ने देखा टेबल पर एक कप मे चाइ पड़ी है और एक कप प्रिया ने पी लया है. आशना ने झट से कप उठाया मगर चाइ तो ठंडी हो गई थी. आशना ने कप को उठा कर फिर से वहीं रख दिया और किचन मे अपने लिए चाइ बनाने चली गई. चाइ को कप मे डालकर वो अभी बैठी ही थी कि दरवाज़ा नॉक हुआ.

आशना: कम इन.

मोनू ने दरवाज़ा खोला और एक बड़ी सी स्माइल आशना को दी.

आशना: आओ मोनू भैया, आज तो सुबह सुबह ही बड़े खुश दिख रहे हो क्या बात है.

मोनू: इतने दिन बाद आपको देख रहा हूँ तो बड़ी खुशी हो रही है.

आशना: सुबह सुबह मस्का.... क्या बात है?.

मोनू: नहीं दीदी सच मे. मैने प्रिया दीदी से कई बार आपके लिए पूछा मगर उन्होने बताया कि आपका फोन हमेशा बंद ही रहता है.

आशना(मोनू से झूठ बोलते हुए): वो मेरा फोन ही खराब हो गया था.

सोनू ने आशना के हाथ मे बड़ा सा मोबाइल देखा तो बोला: वाउ दीदी आपने तो बहुत सुंदर और महंगा वाला मोबाइल लिया है.

आशना ने फोन उसे दिखाते हुए कहा "यह किसी ने मुझे गिफ्ट दिया है".

मोनू: काश हमे भी कोई ऐसा मोबाइल गिफ्ट कर दे हम तो बहुत ही खुश हो जाएँगे.

आशना: जब तुम बड़े हो जाओगे और अच्छी सी नौकरी करोगे तो तुम खुद ही खरीद लेना.

मोनू: तब तो मैं लूँगा ही मगर गिफ्ट का अपना ही मज़ा होता है, है ना दीदी?

मोनू की बात सुनकर आशना हंस पड़ी.

आशना: जब तू बड़ा हो जाएगा और तेरी शादी होगी तो मैं तुम्हे ऐसा ही एक मोबाइल गिफ्ट करूँगी.

मोनू की आँखें चमक उठी, मोनू: साची दीदी.

आशना : बिल्कुल, और है ही कॉन जो मुझे दीदी बोले.

मोनू ने जल्दी से चाइ के कप उठाए तो देखा कि आशना ने चाइ तो पी ही नहीं.

मोनू: दीदी आपकी चाइ तो ठंडी पड़ी है.

आशना: कोई बात नहीं, मैने अपने लिए चाइ बना ली है.

मोनू वहीं खड़ा रहा और आशना ने अपने कप से एक घूँट भरा.

आशना: ओह मैं तो भूल ही गई थी कि तुम्हे चाइ के पैसे भी देने हैं.

मोनू: अरे क्या बात करती हो दीदी, पहले कभी आपसे अड्वान्स मे पैसे लिए हैं क्या, मैं पैसे लेने के लिए नहीं खड़ा था.

आशना: तो फिर जनाब को कुछ और भी कहना है शायद.

मोनू: जी, वो दीदी, एक साहब कल रात को आपकी टॅक्सी का पीछा करते हुए आए थे.

आशना ने उसकी बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, उसे लगा कि शायद कोई आवारा होगा.

 


आशना: चल छोड़ और तू स्कूल जा, लेट हो रहा है ना तू.

मोनू: दीदी उन्होने ने सामने वाले होटेल मे ही ग्राउंड फ्लोर पर एक कमरा लिया है बिल्कुल आपके फ्लॅट के सामने और यह कह कर मोनू वहाँ से चल दिया.

आशना ने उसकी बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और चाइ पीती रही. अचानक उसे ध्यान आया कि उसे काफ़ी ज़ोरों से भूख लगी है. उसने फ्रीज़र मे देखा तो वहाँ उसे खाने को कुछ भी नही दिखा. आशना ने मोनू के होटेल मे ही नाश्ता करने की सोची. उसने झट से स्लीपर पहने और होटेल की तरफ चल दी. होटेल उसके फ्लॅट से बस दो मिनिट की ही दूरी पर था. वो होटेल पहुँची तो वहाँ काफ़ी भीड़ थी.

तकरीबन सारे टेबल्स फुल थे. मोनू के पिता जी ने आशना को देखा तो हाथ जोड़ कर नमस्ते किया और उन्होने एक कोने मे रखी दो चेयर्स और एक मेज़ की तरफ इशारा किया. आशना ने भी उनकी नमस्ते का जवाब मुस्कुरा कर दिया और फिर वो उस टेबल के पास रखी कुर्सी पर बैठ गई. आशना पहले भी कई बार यहाँ नाश्ता कर चुकी है. उसने मेनू की तरफ देखा तो वहाँ लिखे "आलू के परान्ठे" पर नज़र पड़ते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई और मन मे सोचने लगी "मिस्टर. वीरेंदर आपके लिए आलू के परान्ठे बनाने वाली का पर्मानेन्ट समाधान हो गया है". पता नहीं क्यूँ लेकिन आशना ने आज आलू के परान्ठे ऑर्डर में दिए.

थोड़ी देर बाद उसे काउंटर पर खड़े एक इंसान की आवाज़ आई " चाचा आलू की परान्ठे मिलेंगे क्या"? यह आवाज़ सुनते ही आशना का दिल धक धक कर उठा. यह आवाज़ तो उसने पहले भी सुनी है, उसने दिमाग़ पर ज़ोर दिया तो उसे याद आया कि यह आवाज़ तो वीरेंदर की है. आशना ने तेज़ी से उस आदमी की तरफ देखा तो वहाँ कोई और ही खड़ा था. आशना को काफ़ी मायूषी हुई और फिर अपने पर हँसी भी आई कि वीरेंदर यहाँ कैसे आ सकते हैं और अगर यहाँ आ भी गये तो वो यहाँ इस छोटे से होटेल मे खाना खाने थोड़े ही आएँगे. आशना ने नाश्ता किया और अपने फ्लॅट की तरफ चल दी. अपने फ्लॅट की तरफ जाते हुए उसे मोनू की बात याद आ गई कि जो आदमी कल शाम को पीछा कर रहा था वो सामने वाले होटेल मे ही ठहरा है. एक पल के लिए तो आशना के कदम उस होटेल की तरफ मूड गये लेकिन फिर कुछ सोच कर सड़क पार करके अपने फ्लॅट मे आ गई.

जब तक आशना जाने की तैयारी करती है, तब तक आइए आपको फिर से एक दिन पहले देल्ही वापिस लेकर चलती हूँ.

प्लेस: देल्ही (बीना'स हॉस्पिटल)

दिन: जिस दिन आशना और वीरेंदर बॅंगलॉर के लिए रवाना होने वाले थे.

सुबह होते ही बीना ने हॉस्पिटल का एक राउंड लगाया और पेशेंट्स को दवाइयाँ वागेहरा लिख कर उनसे फ्री हुई. करीब 11:30 बजे बीना ने इंटरकम पर रागिनी को अपने कॅबिन मे आने को कहा. रागिनी धड़कते दिल से बीना के कॅबिन मे आई.

बीना: सारी तैयारी हो गई.

रागिनी: जी मॅम. आप बताइए कब चलना है.

बीना: लंच के बाद मुझे जूनियर डॉक्टर्स के साथ एक ज़रूरी मीटिंग करनी है. तुम करीब 5:00 बजे मुझे कान्फरेन्स रूम के बाहर तैयार ही मिलना, वहीं से चले जाएँगे.

रागिनी: ओके मॅम.

रागिनी हॉस्पिटल के कॉंपाउंड के अंदर ही एक छोटे से रूम मे रहती थी. रागिनी अपनी रुटीन के बाद अपने रूम मे चली गई. आज रागिनी काफ़ी खुश भी थी और काफ़ी डरी हुई भी थी. उसका हमेशा से सपना रहा था कि वो किसी बड़े घर मे ब्याही जाए ताकि वो ज़िंदगी के सारे ऐश- ओ- आराम का मज़ा ले सके. ऐसा नहीं था कि रागिनी खुद एक ग़रीब परिवार से थी, उसका परिवार भी सुख सुविधाओं से संपन्न था पर एक राजपूताना लड़की होकर उसपर काफ़ी पाबंदियाँ थी और जैसे जैसे वो जवान होने लगी उसपर पाबंदियाँ बढ़ने लगी. देर रात तक टीवी मत देखो, उँची आवाज़ मे मत बोलो, ढंग के कपड़े पहनो. 18 बरस के होते ही उसे सिर्फ़ सलवार-सूट पहनने का आदेश सुना दिया गया था. उसके भैया और पिता जी ने सख़्त हिदायत दी थी कि रागिनी जब तक मैके मे है वो यही पहनेगी और किसी भी कमरे मे रात 9:00 बजे के बाद टीवी नहीं चलेगा. और भी ना जाने कितनी पाबंदियों के बीच रागिनी अपने घर मे रह रही थी. रागिनी हमेशा मन मे सोचती कि भगवान मुझे आगे जिस भी घर मे भेजोगे काश वहाँ यह सब ना करना पड़े. लंच करने के बाद रागिनी ने तैयार होना शुरू किया. करीब 5:00 बजे तक वो लाइट येल्लो कलर का ढीला सा सलवार सूट पहनकर और हल्का सा मेकप करके तैयार हो गई थी. कच्चा पीला रंग उसके गोरे रंग पर काफ़ी जच रहा था. वो शीशे में अपने आप को देख कर ही शरमा उठी थी.

करीब 5:15 बजे तक वो हॉस्पिटल के कान्फरेन्स रूम के बाहर पहुँच चुकी थी. डॉक्टर. बीना कोई 5:45 तक कान्फरेन्स रूम से बाहर निकली और रागिनी को देखते ही रागिनी को अपने पीछे आने का इशारा किया. रागिनी सर झुकाए बीना के पीछे चल दी और बाहर निकलते ही दोनो गाड़ी मे बैठ गई. बीना ने गाड़ी स्टार्ट की और "शर्मा निवास" की ओर चल दी. करीब 6:10 मिनिट तक वो दोनो शर्मा निवास के मेन गेट के सामने पहुँची. बीना ने गाड़ी से उतरते हुए मेन गेट खोला और गाड़ी अंदर घुसा दी. गाड़ी को एक साइड पर पार्क करके वो दोनो गाड़ी से उतरी और रागिनी ने उतरते ही चारो तरफ नज़र दौड़ाई तो इतनी भव्यता देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई. रागिनी ने अपने लिए जैसा ससुराल सोचा था यह तो उस से भी कई गुना ज़्यादा था. बीना ने रागिनी की हालत ताड़ ली थी और बोली.

बीना: रागिनी देखो तुम पर कोई ज़बरदस्ती नहीं है. अगर तुम्हे विराट अपने पति के रूप मे ठीक नहीं लगेगा तो तुम इनकार कर सकती हो.

रागिनी: मॅम, मुझे पता है कि आपने मेरे लिए जिसे भी चुना होगा काफ़ी सोच समझ कर ही चुना होगा.

 


बीना ने प्यार से मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली: बस एक बार विराट तुम्हे पसंद कर ले फिर तो जल्द ही तुम दोनो की शादी करवा दूँगी.

शादी की बात सुनते ही रागिनी के गाल लाल सुर्ख हो गये और होंठों पर एक हल्की से शर्मीली हँसी आ गई.

बीना ने मेन दरवाज़े पर लगी चैन से नॉक किया और बाहर लगे इंटरकम का रिसेवर उठा कर अपने कान से लगाते हुए कहा "मिस्टर. विराट डॉक्टर. बीना ईज़ हियर, आपसे आज सुबह ही बात हुई थी". बीना ने "ओके" कह कर रिसेवर रख दिया. रागिनी यह सब देख कर बहुत ज़्यादा हैरान थी. इतनी संपन्नता की उसने कभी उम्मीद ही नहीं की थी. वो डॉक्टर. बीना का मन ही मन शुक्रिया अदा कर रही थी जिसने उसके लिए इतना बड़ा घर चुना. थोड़ी देर के बाद बिहारी (विराट ) ने दरवाज़ा खोला.

विराट: आइए डॉक्टर. बीना, मैं तो भूल ही गया था कि आप आने वाली हैं.

बीना ने ध्यान से बिहारी की तरफ देखा. सामने खड़े इंसान को देख कर तो एक बार बीना भी हैरान हो गई. सामने बिहारी बिल्कुल क्लीन शेव मे एक बहुत ही बढ़िया पॅंट कोट मे खड़ा था. उसके ब्लॅक लेदर जूते भी एक दम चम चमा रहे थे. बिहारी के सफेद पड़ रहे बाल भी एक दम काले नज़र आ रहे थे और उसके बाल भी पहले के मुक़ाबले काफ़ी छोटे छोटे लग रहे थे (बीना समझ गई कि बिहारी ने अपनी एक बिज़्नेस मॅन इमेज बनाने के लिए बाल कटवा दिए हैं). सबसे बड़ी बात उसने आज पहली बार बिहारी के बालों को एक बहुत ही अच्छे तरीके से कोंब किए हुए देखा. एक बार तो बीना भी उसे पहचान नहीं पाई. रागिनी तो बिहारी को पहली नज़र मे देख कर ही खुश हो गई. इस ड्रेस अप मैं बिहारी कोई 29- 30 साल का गबरू जवान लग रहा था. बदन तो उसका पहले से ही घातीला था तो आज सूट बूट मे उसका यह रूप तो वाकई रागिनी जैसी लड़की को इंप्रेस करने के लिए काफ़ी था.

विराट: अंदर आइए ना डॉक्टर. बीना.

बीना: हां हां, इनसे मिलिए, यह हैं मिस रागिनी, मेरे क्लिनिक मे सबसे होनहार नर्स.

बिहारी ने रागिनी की तरफ देखा और फिर उसे हेलो बोला. रागिनी ने भी हाथ जोड़ कर उन्हे नमस्कार कहा.

सब लोग हाल मे रखे सोफा चेयर्स पर बैठ गये. रागिनी और बीना एक डबल सोफा पर बैठे और बिहारी उनके ठीक बिल्कुल सामने एक सोफे पर टाँग पर टाँग चढ़ा कर आराम से बैठ गया. बिहारी की हरकतें बीना को भी अचम्बित कर रही थी.

बिहारी: क्या लेंगी आप डॉक्टर. बीना, कुछ ठंडा या गरम.

बीना: अरे तकलीफ़ की कोई बात नहीं है

बिहारी ; आप बताइए तो सही.

बीना ने रागिनी की तरफ देखा और पूछा कॉफी चलेगी. रागिनी ने हां मैं सिर हिलाया. रागिनी को शरमाता देख बिहारी के लंड ने बवाल मचा दिया था. उसका लंड पॅंट फाड़ने को बेकरार था. बिहारी ने ज़िंदगी मे आज पहली बार पॅंट पहनी थी. हालाँकि यह ड्रेस उसपर काफ़ी जच रही थी मगर वो इसमे काफ़ी अनकंफर्टबल था.

बीना(बिहारी की तरफ देखते हुए): आप बैठिए मैं कॉफी बना कर लाती हूँ.

रागिनी ने बीना का हाथ पकड़ लिया और बोली कि आप लोग बैठ कर बातें कीजिए, मैं बना लाती हूँ.

बिहारी: चलिए हम आपको किचन के समान के बारे मे बताते हैं. रागिनी अकेले मे विराट से बात करने मे शरमा रही थी मगर इस बार तो वो फँस ही गई थी.

रागिनी: जी.

बिहारी अपनी सीट से उठा और किचन की ओर जाने लगा तो बीना की नज़र उसकी पॅंट में फूले हुए लंड पर पड़ी तो अनायास ही उसके मूह से निकला "कमीना". वैसे भी बंदर को जितने मर्ज़ी ज़ेवरो से लाद दो वो गुलाटी मारना नहीं छोड़ता ठीक उसी तरह बिहारी चाहे जितना मर्ज़ी सभ्य दिखने की कोशिश करे लेकिन उसका लंड उसकी औकात बता ही देता है.

बीना: विराट जी, रागिनी को किचन दिखा कर आप मेरे पास आईएगा, कुछ ज़रूरी बात करनी है.

बिहारी: जी डॉक्टर. बीना (मन मे तो उसके आया था "कुतिया तू मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी").

बिहारी ने रागिनी को किचन के बाहर छोड़ा और बीना का पास आ गया.

बिहारी: बोल कुतिया क्या काम है.

बीना: कुत्ते की तरह उसके आगे पीछे मत भाग, कच्ची कली है डर जाएगी.

बिहारी की आँखें यह सुनते ही चमक उठी.

बिहारी: तेरे मूह मे घी शक्कर, अगर यह सच मुच कच्ची कली निकली तो.

बीना: घी शक्कर कॉन माँगता है ज़ालिम बस जल्दी से अपना लोड्‍ा दे दे मेरे मूह मे. बिहारी ने पॅंट की ज़िप खोली और अपना फनफनाता लोड्‍ा बाहर निकाल दिया.

बीना: साले तूने कच्चा नहीं पहना क्या???

बिहारी: पहले कभी पहना है क्या जो आज पहनूगा.

बीना: लगता है चिड़िया ने दाना चुगना शुरू कर दिया है और यह कहते ही उसने बिहारी का लंड गॅप से मूह मे ले लिया.

बिहारी: उसे देख कर लगता तो मुझे भी यही है कि मुझे रईस आदमी समझ कर मेरी बीवी बनने को यह चिड़िया तैयार है. माल तो तूने बहुत तगड़ा चुना है. इतनी छोटी उम्र मे ही जवानी इस पर भी आशना की तरह टूट कर आई है. बीना ने अपने मूह से उसके लंड को निकाला और उसे चूम कर बोली तुझे साले आजकल आशना का भूत सवार हो गया है.

बिहारी ने बीना के सिर पर हाथ रखकर अपना लंड उसके मूह मे डालने की कोशिस की तो बीना ने मना कर दिया और बोली: आशना से ही करवाना यह सब.

बिहारी ने लंड पॅंट मे डालकर ज़िप बंद की और अपनी जगह पर बैठ गया.

बिहारी: तू साली आशना से इतना जलती क्यूँ है.

बीना: जलन तो होगी ना, जिस लोड्‍े को सबसे पहली बार मैने सुख दिया उसे अपनी चूत मे वो रांड़ लेगी.

बिहारी: तो तेरा भी तो नंबर. लगेगा.

बीना: यही सोच कर तो मन को मार के बैठी हूँ.

बिहारी: अच्छा उसे छोड़ लेकिन यह बता कि तू इसे यह कॉन सी ड्रेस मे लाई है. इतनी कूल है यह कि इसके बदन के कटाव दिख ही नहीं रहे.

बीना: तीखी मिर्ची है साले यह. इसके जिस्म के कटाव देखेगा तो वहीं पर तेरे लंड से धार निकल जाएगी. तेरा बस चले तो तू इसे कपड़े पहनने ही ना दे.

बिहारी: एक बार यह मेरे बिस्तर तक पहुँच जाए फिर देख इसके सारे कपड़े ही जला दूँगा.

बीना: लड़की प्यार मे धोखा खाई हुई है लेकिन है एकदम कोरी और सबसे बड़ी बात इसे अपने जिस्म के कहर का पता है इस लिए हमेशा काफ़ी ढीले कपड़े पहनती है ताकि लोगों की गंदी नज़र से बच सके.

बिहारी: लेकिन कुछ तो ढंग का पहनाकर लाती इसे, इसके बदन को याद करके मूठ ही मारता आज रात.

बीना: मूठ मारे तेरा दुश्मन.

मैं किस मर्ज़ की दवा हूँ. आती हूँ ना आज रात को तू चिंता क्यूँ करता है?

बिहारी: साली मेरी चिंता कर रही है या अपनी चूत के लिए जुगाड़?

बीना: कुछ भी समझ ले.

तभी उन्हे ट्रे के खनकने की आवाज़ आती है.

बीना: चिड़िया आने वाली है, अब चुप चाप बैठ जा और जो कुछ सिखाया था शुरू कर दे.

थोड़ी देर बाद रागिनी एक ट्रे मे तीन कप कॉफी और कुछ स्नॅक्स लेकर आ गई. उसने एक कप बीना को और एक कप बिहारी को दिया. दोनो को स्नॅक्स सर्व किए और अपना कप लेने के बाद वो बीना के साथ ही बैठ गई.

बिहारी: वाह कॉफी तो बहुत अच्छी बनी है.

बीना ने भी सिर हिलाकर हां मे हामी भारी. रागिनी अपनी तारीफ से मुस्कुरा दी.

बीना: मिस्टर. विराट, बताइए अब अपने क्या सोचा है.

बिहारी फिर से टाँग पर टाँग चढ़ाकर ऐसे बैठ गया जैसे कि वो किसी रियासत का राजकुमार हो और रागिनी को उसके सामने बेचने के लिए परोसा गया हो.

 
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