वीरेंदर ने एक बार उसे देखा और फिर दोबारा फाइल्स पर नज़रें गढ़ा दी. कुछ देर चुप रहने के बाद वीरेंदर बोला, काम की चिंता नहीं है मुझे. मेरा मेनेज़र सब संभाल रहा है. यह तो वो कुछ फाइल्स दे गया है जिसे साइन करना है ताकि डिसट्रिब्युटर्स को उनकी रुकी हुई पेमेंट दे सकें.
आशना: पर काम तो काम ही है ना, आप कुछ दिन सिर्फ़ आराम ही करेंगे और आपका सारा काम उसके बाद. इतना कह कर आशना ने फाइल्स उसके हाथ से ली और उन्हे मेज़ पर रख दिया.
वीरेंदर हैरानी से उसे देखता रहा. पहली बार उसने आशना के मासूम चेहरे को देखा तो देखता ही रह गया. आशना अपनी ही धुन मे कुछ बड़बड़ाये जा रही थी. फाइल्स को मेज़ पर रखने के बाद उसने वो दवाइयाँ निकाली जो वीरेंदर को दोपहर मे लेनी थी. उसने दवाइयाँ निकाली और जग से ग्लास मे पानी डाल कर वीरेंदर की तरफ़ मूडी. जैसे ही उसने वीरेंदर को देखा उसके कदम वहीं ठिठक गये.वीरेंदर एकटक उसे देखे जा रहा था. आशना एक दम शांत खड़ी हो गई. उसकी इस हरकत से वीरेंदर को होश आया, उसने जल्दी से अपनी नज़रें आशना के चेहरे से घुमाई और ग्लास पकड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाया.
आशना ने उसे ग्लास दिया और दवाइयाँ खिलाने लगी. वीरेंदर एक अच्छे बच्चे की तरह सारी दवाइयाँ खा गया.
आशना(मुस्कुराते हुए): शाबाश, रोज़ ऐसे ही अच्छे बच्चे की तरह दवाई खाओगे तो जल्दी ठीक हो जाओगे.
वीरेंदर: डॉक्टर. अगर आप इतनी डाँट खिलाने के बाद दवाइयाँ खिलाओगी तो मैं ठीक बेशक हो जाउ पर डर के मारे कमज़ोर ज़रूर हो जाउन्गा. इतना कह कर वीरेंदर हंस पड़ा और आशना के चेहरे पर भी स्माइल आ गई.
आशना: प्लीज़ आप मुझे आशना कहें, डॉक्टर. ना कहें. वीरेंदर ने उसकी तरफ सवालिया नज़रो से देखा तो आशना बोली. डॉक्टर. वर्ड थोड़ा फॉर्मल हो जाता है ना इसलिए.
वीरेंदर: जैसा तुम्हे ठीक लगे आशना.
अपना नाम वीरेंदर के होंठों से सुनकर आशना एक दम सिहर उठी.
आशना- अच्छा आप जल्दी से फाइल्स साइन कर लीजिए और अपने मेनेज़र को कह दीजिए कि वो अब कुछ दिन आपको आराम करने दें. वीरेंदर सिर्फ़ मुस्कुराया बोला कुछ नहीं. आशना अपने कमरे की तरफ चल दी. रास्ते मे उसने उपर से ही काका को आवाज़ लगा कर बता दिया कि वीरेंदर को दवाइयाँ दे दी हैं, एक घंटे के बाद खाना लगा दें.
अपने रूम मे आने के बाद आशना अपने बेड पर लेट गई और वीरेंदर के साथ होने वाली बातों को सोच कर रोमांचित होने लगी. बीच में उसे काका के साथ हुई किचन की भी बात याद आ गई तो वो और सिहर उठी. ना जाने क्यूँ दिल के किसी एक कोने मे वो उन बातों को सहेज कर रखने लगी. आशना का ध्यान भंग हुआ जब उसके दरवाज़व पर नॉक हुई. आशना ने घड़ी की तरफ देखा, खाने का टाइम हो गया था.
आशना: काका आप ख़ान लगाइए मैं आती हूँ.
काका: जी बिटिया.
कुछ देर बाद आशना नीचे पहुँची तो देखा काका खाना लगा रहे थे. आशना ने इधर उधर देखा और फिर काका से पूछा वीरेंदर नहीं आए नीचे.
काका: उन्होने कहा है कि वो उपर ही खाएँगे.
इतना सुनते ही आशना सीडीयाँ चढ़कर उपर पहुँची और बिना नॉक किए दरवाज़ खोल दिया. वीरेंदर वहाँ नहीं था. तभी उसे बाथरूम के अंदर से आवाज़ आई, काका आप खाना रख दो मैं अभी आता हूँ. आशना कुछ ना बोली, वो वहीं खड़ी रही. कुछ दो-तीन मिनिट के बाद बाथरूम का दरवाज़ा खुला और वीरेंदर सिर्फ़ लोवर मैं बाहर निकला. बाहर निकलते ही उसने आशना को देखा जो हैरानी से कभी उसकी बालों से भरी चौड़ी छाती देख रही थी तो कभी उसके चेहरे की तरफ. उसके बाल गीले थे शायद वो बाल धोके आया था. इतने दिन हॉस्पिटल रहने के बाद शायद उसे अपने सर से बदबू सी आ रही होगी. कुछ पलों तक दोनो एक दूसरे को देखते रहे उसके बाद पहली हरकत वीरेंदर ने की. वीरेंदेट ने अपने दोनो बाज़ू अपनी छाती पर रख कर उन्हे छुपाने की कोशिश की.
यह देख कर आशना की हसी छूट गई. वो फॉरन मूडी और कमरे से बाहर भागी. दरवाज़े पर पहुँच कर उसने धीरे से पीछे देखा और मुस्कुराते हुए बोली: क्या लड़कियो की तरह खड़े हो. जल्दी से कपड़े पहनो और नीचे आ जाओ, आज खाना नीचे ही मिलेगा. वीरेंदर ने अग्याकारी बच्चे की तरह हां में गर्दन हिलाई और लपक कर अलमारी खोली. आशना नीचे पहुँची तो उसके होंठों पर मुस्कान अभी भी थी जिसे देख कर बिहारी काका ने पूछा "क्यूँ देख लिया वीरेंदर बाबू को टॉपलेस. आशना ने हैरानी से काका को देखा जैसे पूछ रही हो उन्हे कैसे मालूम.
काका: यह तो मालिक की पुरानी आदत है, जब भी वो दोपहर को घर पर होते है, खाना खाने से पहले वो अपनी टी-शर्ट उतार देते हैं.
आशना: बाप रे, फिर तो रात के खाने में तो.......इतना कहना था कि दोनो खिलखिला कर हंस दिए. तभी वीरेंदर ने डाइनिंग हॉल में कदम रखा. दोनो एकदम चुप हो गये.
वीरेंदर अंदर आते ही: काका तुमने तो पता है ना, फिर तुमने इसे रोका क्यूँ नहीं.
काका: मुझे पता ही कब लगा यह कब उपर गई, मैं तो इसे बता रह था कि तुमने खाना उपर मँगवाया है, ये तो पलक झपकते ही उपर पहुँच गई.
वीरेंदर: आशना , आइ आम सॉरी.
आशना: आइ आम सॉरी, मुझे नॉक कर के आना चाहिए था.
बिहारी काका: चलो आप बैठ जाएँ मैं खाना परोस देता हूँ.
आशना: काका, तुम जाकर खाना खा लो आज इनको खाना मैं परोसुन्गि. काका चले गये तो वीरेंदर बोला: देखो डॉक्टर. बन कर आई थी और क्या क्या करना पड़ रहा है?
आशना: देखते जाओ अभी और क्या क्या करूँगी और हँस दी.
आशना ने दो प्लेट्स में खाना डाला और दोनो खाना खाने लगे. खाना कहते हुए बार बार दोनो की नज़रें मिल रही थी.आशना टाइट पिंक स्वेट शर्ट और ब्लॅक स्किन टाइट जीन्स में काफ़ी सेक्सी लग रही थी और वीरेंदर भी आशना से नज़रें चुराकर बार बार उसकी खूबसूरती का रस पी रहा था. आशना पूछना तो चाहती थी वीरेंदर से कि वो खाना इस डाइनिंग हॉल में ना ख़ाके अपने रूम मे क्यूँ ख़ाता है पर फिर उसे उसकी आदत (टी-शर्ट उतारकर खाना खाने की आदत) याद आ गई और उसने अपने दिमाग़ से वो सवाल झटक दिया. लेकिन आशना ने एक और सवाल वीरेंदर से कर दिया.
आशना: वीरेंदर जी बुरा मत मानीएगा पर यह टी-शर्ट उतार कर खाना खाने की आदत कुछ समझ नही आई और यह सवाल पूछ कर वो हँस दी.
वीरेंदर आशना के इस सवाल से झेंप गया और हड़बड़ाते हुए जवाब दिया "अक्सर जब मैं घर होता था और दोपहर का खाना खाने बैठता था तो खाना खाते खाते मुझे बड़ी बेचैनी सी होती थी, मेरा शरीर एकदम पसीने से नहा जाता, मेरा गला सूखने लगता तो फिर मैं अपनी कमीज़ या टी-शर्ट उतार फेंकता. बस अब आदत सी हो गई है. जब भी घर पर होता हूँ तो दोपहर को खाना ऐसे ही ख़ाता हूँ.
आशना: क्या आज भी ऐसा ही फील हो रहा है खाना खाते वक्त.
वीरेंदर: तुम तो पूरी जासूस की तरह पीछे पड़ गई हो. तुम्हे डॉक्टर. नहीं जासूस होना चाहिए.
आशना: वोही समझ लो पर अभी तक आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया.
वीरेंदर कुछ देर उसको देखता रहा फिर बोला ऐसा कभी कभी ही होता है और फिर तो मुझे उसके बाद कुछ होश ही नहीं रहता. उसके बाद तो कई घंटो तक मैं सोया ही रहता हूँ.
आशना (चिंता भरे स्वर में): क्या अपने कभी डॉक्टर. से कन्सल्ट नहीं किया?
वीरेंदर: डॉक्टर. आंटी को एक बार मैने अपनी बेचैनी के बारे मे बताया तो उन्होने चेकप किया और बताया कि सब नॉर्मल है बस थकान से ऐसा होता है.