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मजबूरी का फैसला complete

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StoryPublisher

Guest
साल : 1985

इस कहानी का आगाज आज से कई साल पहले साल 1985 में मंडी बहाउद्दीन के पास एक छोटे से गाँव में हुआ | उस गाँव में सब लोग ज्यादातर ज़मींदारी कर के अपनी गुज़र बसर करते थे |

इधर एक खानदान रहमत मोची का भी था | रहमत की उम्र 55 साल की थी | उसकी बीवी शरीफा बीवी की उम्र उस वक़्त अंदाज़न 50 साल की होगी | उनके 5 बच्चे थे | सब से बड़ी लड़की मुख़्तार बीवी थी , जिस की उम्र उस वक़्त 25 साल थी | उसके बाद अस्मत बीवी थी जिसकी उम्र 23 साल फिर रेहाना बीवी 21 साल फिर एक बेटा था जिस का नाम वकास हुसैन था और उसकी उम्र 19 साल और सब से आखिर में ज़ाकिया खानुम थी जिस की उम्र उस वक़्त अभी सिर्फ 16 साल की थी |

ज़ाकिया अपनी तीनो बड़ी बहनों से मुक्तलिफ़ और प्यारी थी आवो बेहद हसीं ना सही लेकिन वो पुर कशिश ज़रूर थी उसका जिस्म डबल पतला मगर गर्म और नशीला था |

जवां होते हुए सीने पर छोटे छोटे मम्मे थे | जिनकी नरमी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था | पतली सी कमर , भरपूर सुडोल जांघें और सबसे बड़ी बात उसकी मस्त करने वाली चाल थी | ज़ाकिया का कद ऊंचा था और उसके बाल काफी लम्बे थे | जोकि उसकी छोटी सी गांड तक आते थे |

ज़ाकिया और उसका भाई वकास हुसैन ही अपने घर में दो ऐसे इंसान थे जोकि कुछ पड़े लिखे थे | उसका भाई मेट्रिक पास कर चूका था , जब कि ज़ाकिया ने अपनी अभी मिडिल क्लास का इम्तिहान दिया था |

बाबा रहमत मोची का खानदान बहुत ही गरीब था | बाबा रहमत गाँव के लोगो के जूते और चप्पल सी कर अपनी रोज़ी रोटी चला रहा था | उनकी गुज़र बसर बहुत ही मुश्किल से हो रही थी | वो कभी कभी दिन में सिर्फ एक वक़्त ही खाना खाते | बाबा रहमत मोची की बेटियां जवान हो कर शादी की उम्र को पहुँच रही थी | उनकी शादी और दहेज़ के लिए होने वाले खर्च का सोच कर बाबा रहमत और उसकी बीवी शरीफा बीबी दोनों बहुत परेशान थे |

इसी गाँव में 42 साला ज़मिंदार चौधरी अकरम गुज्जर भी था | चौधरी अकरम के माँ बाप दोनों मर चुके थे | अकरम अपनी माँ बाप की इकलोती औलाद है उसने अभी तक शादी नहीं की थी | उसको जुआ खेलने और घस्ती औरतों को चोदने की लत लगी हुयी थी | जिस को पूरा करने के लिए वो अपनी जद्दी पुश्तेनी ज़मीन अहिस्ता अहिस्ता बेच रहा था | चौधरी अकरम ज्यादातर वक़त गाँव से बाहर बने अपने डेरे पर ही गुजारता था | रहमत मोची का बेटा वकास हुसैन , चौधरी अकरम गुज्जर के डेरे पर काम करता था |

 
आज दो दिन से वकास डेरे पर नहीं आया था | उसके यूं बगैर वजह बताए ना आने से चौधरी अकरम बहुत गुस्से में था और वो वकास का पता करने आज काफी दिनों बाद अपने डेरे से गाँव की तरफ चल पड़ा |

बाबा रहमत मोची के घर के बाहर पहुँच कर अकरम ने दरवाज़ा ख़ट खटाया |

बाबा रहमत ने थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खोला और पूछा , “कौन”?

अकरम : “बाबा रहमत मैं हूँ अकरम “.

बाबा रहमत: चौधरी आज तू किधर रास्ता भूल कर इधर आ निकला |

चौधरी अकरम : बाबा , वकास का पता करने आया हूँ आज दो दिन से डेरे पर नहीं आया |

बाबा रहमत: चोधरी साहब वकास को तो दो दिन से बुखार है और वोह अभी भी हकीम के पास दवाई लेने गया है |

चौधरी अकरम का गुस्सा बाबा रहमत की बात सुन कर थोडा ठंडा हुआ |

चौधरी अकरम : अच्छा बाबा, जब वकास बेहतर हो जाये तो उसे डेरे भेज देना | मैं चलता हूँ | इतना कह कर अकरम वापिस मुडने लगा |

बाबा रहमत : ना चोधरी अकरम तू आज पहली दफा हमारे घर आया है | मैं तुझे ऐसे नहीं जाने दूंगा | आ अंदर आजा , अंदर बैठ कर बातें करते हैं और तुझे चाय भी पिलाता हूँ .

चौधरी अकरम ने थोडी देर बाबा रहमत की दावत टालने की कोशिश की , मगर बाबा रहमत के इसरार पर चाय पीने के लिए मान गया |

चौधरी अकरम और बाबा रहमत साथ साथ चलते बाबा रहमत के घर दाखिल हुए | अकरम आज जिन्दगी में पहली बार बाबा रहमत के घर के अन्दर आया था |

रहमत मोची का घर कच्ची ईटों और गारे से बने हुए दो कमरों पर मुश्तिमल था उन दो कमरों के दरमियाँ एक छोटा सेहन भी था |

चौधरी अकरम सेहन में पड़ी एक चारपाई पर बैठ गया जो रस्सी से बनी हुयी थी |

उनके बैठते ही रहमत ने आवाज़ लगायी , “ज़ाकिया बेटी चाय तो पिलाना”|

 
ज़ाकिया सेहन के एक कोने में बने एक छोटे से लकड़ियों वाले चूल्हे के पास बैठी थी | वो हमेशा की तरह आज भी अपने घर के काम, काज में मसरूफ थी |

वो चाय दो प्यालों में डाल कर आहिस्ता आहिस्ता चलती हुई अपने बाप और चौधरी अकरम की तरफ आई | इतने में हवा थोड़ी तेज़ी से उडी |

चाय के प्याले दोनों हाथों में होने की वजह से ज़ाकिया अपने दुप्पटे को संभाल ना सकी और वो उसके सर से उड़ कर ज़मीन पर जा गिरा |

ज़ाकिया उस वक़्त कयामत ढा रही थी | दोप्पटे के बगैर उसके नर्म नर्म मखन जैसे 32 साइज़ के छोटे छोटे मम्मे उभरे हुए थे और उस का जोबन दिख रहा था |

ज़ाकिया की शलवार पुरानी और बार बार धोने की वजह से सुकर कर काफी छोटी हो चुकी थी और निचे से उसकी मस्त गोरी टांगों का नजारा भी साफ नज़र आ रहा था |

चौधरी अकरम , ज़ाकिया जैसी एक मासूम लड़की को जो वक़्त से पहले ही जवानी की देहलीज़ में कदम रख चुकी थी , बस देखता ही रह गया |

ज़ाकिया में कुछ ऐसी बात थी जो चौधरी अकरम गुज्जर जैसे 42 साल के आदमी को भी मदहोश कर गयी |

ज़ाकिया ने चाय का एक प्याला अपने बाप को दिया और दूसरा कांपते हाथों से चौधरी अकरम की तरफ बढ़ाया |

चौधरी अकरम ने महसूस किया कि इस कमसिन जवानी के हाथ उसे चाय पकडाते हुए काँप रहे हैं |

चौधरी अकरम का वास्ता हमेशा पकी उम्र की रंडी औरतों से पड़ा था जिन में जिझक और शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं होती है |

 
इसलिए चौधरी अकरम को ज़िन्दगी में पहली बार एक लड़की का इस तरह शर्माना और जिझकना बहुत अच्छा लगा |

चौधरी अकरम , ज़ाकिया को बड़ी गहरी नज़रों से देख रहा था | अकरम का यूँ देखना , ज़ाकिया को बड़ा ही नागवार गुज़रा |

वो उस को चाय का प्याला पकड़ा कर फोरन अपने ज़मीं पर गिरे हुआ दुपट्टे कि तरफ बड़ी | ज़ाकिया ने अपना दुपट्टा उठाया और तेज़ तेज़ कदमो से चलती घर के एक कमरे में चली गयी |

ज़ाकिया, चौधरी अकरम के दिल को पागल कर गयी थी उस का कमसिन मासूम हुसन चौधरी को बहुत भा गया था |

अकरम ,ज़ाकिया के दुबारा दीदार के लिए थोड़ी देर बैठ कर बाबा रेह्मत से इधर उधर की बातें करता रहा | मगर ज़ाकिया फिर बाहर नहीं आई |

अकरम ने मायूस हो कर बाबा रहमत से इजाज़त ली और अपने डेरे पर आ कर अपने बिस्तर पर लेट गया | शाम का अँधेरा गहरा हो गया था |

चौधरी अकरम अपनी चारपाई पर पड़ा कुछ सोच रहा था | अकरम की ज़िन्दगी में ऐसा मामला पहली बार पेश आया था |

वो सारा टाइम ज़ाकिया के बारे में सोचता रहा | ज़ाकिया का नर्म और नाज़ुक बदन उसके होश ओ हवास पर छाए हुए था |

उसे बार बार रह रह कर उस मोहनी सी गोरी गोरी गुडिया की याद आ रही थी और यही सोचते हुए वो भी इख्तिआर अपने लंड को खुजाने लगा |

इस बात के बावजूद कि उसकी और ज़ाकिया की उम्र में बहुत फरक था | मगर फिर भी ज़ाकिया को देखते ही अकरम ने जैसे अपने दिल में फैसला कर लिया था कि वो उसको किसी तरह हासिल करके रहेगा |

वो यह काम किस तरह और कैसे करे , उस बारे में सोचते सोचते गहरी नींद में चला गया |

 
उस दिन के बाद चौधरी अकरम बहाने से बाबा रहमत मोची के घर जाने लगा |

लेकिन उसको ज़ाकिया का दीदार फिर नसीब ना हुआ | क्योंकि जब भी वो ज़ाकिया के घर जाता, ज़ाकिया या तो घर ना होती या फिर उसके सामने ना आती |

अकरम को ज़ाकिया का दीदार ना पाकर सख्त बेचैनी महसूस होने लगी |

तो वो अक्सर आधी रात को अपने दिल और लंड के हाथो मजबूर हो कर ज़ाकिया के घर की दीवार के पास आ कर ज़ाकिया के घर में झाँकने लगता |

रातें अँधेरी भी बहुत थी और सख्त सर्दी भी थी , लेकिन फिर भी अकरम को ज़ाकिया के घर में झांकते हुए ठन्डे पसीने आ जाते थे |

ज़ाकिया का घर अंधेरे में डूबा हुआ होता था | अकरम का दिल चाहता कि अभी दीवार फलांग कर ज़ाकिया के घर चला जाए और उस लड़की को चोद कर रख दे, मगर उसमें ऐसा करने की कभी हिम्नत ना पड़ी |

अकरम अपने जुआ खेलने की आदत की वजह से अपने जायेदाद ज़मीन बेच कर खा चूका था | उस के पास अब सिर्फ डेरे वाली ज़मीन और गाँव में एक मकान रह गया था |

चौधरी अकरम के कुछ दोस्त अमेरिका में रहते थे |

अकरम ने उनसे अमेरिका के बारे में काफी कुछ सुन रखा था कि इधर लोग थोड़ी सी मेहनत कर के काफी पैसा कमाते हैं |

ज़ाकिया ने पता नहीं अकरम के दिल ओ दिमाग पर किया जादू सा कर दिया कि उसने जुआ खेलने और रंडी औरतों को चोदना बंद कर दिया |

वैसे भी अकरम के पास अपने बाप दादा की दी हुयी दौलत ख़त्म होने लगी थी तो उस ने अमेरिका चले जाने का इरादा कर लिया |

उसने एक दफा अमेरिका का वीसा हासिल करने की कोशिश की मगर उस का वीसा रिजेक्ट हो गया |

उस के बाद अकरम ने चौधरी ज़फर नाम के एक आदमी से बात की | चौधरी ज़फर फैसल्बाद का रहने वाला था |

चौधरी ज़फर एक इंसानी स्मगलर था और जाली पासपोर्ट पर बन्दे बाहर के मुल्कों में भेजता था | अकरम ने चौधरी ज़फर को अमेरिका जाने के लिए पैसे दिए |

ताकि वो गलत तरीके से अमेरिका जा सके |

 
एक दिन अकरम को चौधरी ज़फर के आदमी का फ़ोन आया वो फ़ौरन कराची पहुंचे | क्योंकि उस का अमेरिका जाने के लिए पासपोर्ट और टिकेट तैयार है |

अकरम ने जल्दी से वकास को बुलाया और डेरे की चाबियाँ उसके हवाले की और उसको जरूरी हिदायतें देकर खुद पहले कराची और फिर उधर से न्यू यॉर्क रवाना हो गया |

न्यू यॉर्क में कुछ अरसा फारिग रहने के बाद अकरम को एक गैस स्टेशन पर गाड़ियों में गैस डालने की नौकरी मिल गयी |

यूँ अपने गाँव का एक “चौधरी” परदेस में आ कर एक मामूली सी नौकरी पर लग गया |

उस वक़्त अमेरिका में President Reagon की हकुमत थी और Reagon ने गैरकानूनी इमिग्रेंट्स के लिए 1986 में एक लॉ पास किया था |

जिसके मुताबिक कोई भी आदमी जो 1982 से पहले अमेरिका में रह रहा था | अमेरिकन वर्क परमिट अप्लाई कर सकता था |

अकरम ने जैसे यह खबर सुनी तो उसने अपने एक दोस्त से राबता किया जोकि अमेंरिका की वेस्ट कोस्ट के एक एग्रीकल्चर सिटी बेकर्सफ़ील्ड में रहता था |

उस दोस्त ने एक घोड़े को $500.00 डॉलर में बेचकर अकरम के लिए कुछ पेपर्स खरीदे और इस तरह अकरम का अमेरिका का वर्क परमिट बन गया |

 
साल 1987

अमेरिका में रहते हुए अकरम का वकास से ख़त के ज़रिये राबता कायम रहा और अकरम को गाँव और थोडा बहुत वकास के घर वालों की खबर मिलती रही |

अमेरिका में जुआ , शराब और शबाब की फर्वानी होने के बावजूद अकरम ने इस तरह के किसी काम में दिलचस्पी नहीं ली |

बल्कि उसने इन दो सालों में गैस स्टेशन पर 16 से 18 घंटे रोजाना काम करके काफी डॉलर जमा कर लिए थे |

जब अकरम को वर्क परमिट मिल गया तो उसने दो महीने के लिए पाकिस्तान जाने का प्रोग्राम बनाया | अकरम को अभी US immigration से कंडीशनल वर्क परमिट मिला था और उसको अमेरिका से बाहर सफ़र करने के लिए इमीग्रेशन से इजाज़त लेनी होती थी |

अकरम ने इजाज़त के लिए अप्लाई किया तो उसको दो महीने में वापिस US एंटर होने की इजाज़त मिल गयी |

अकरम के माँ बाप तो काफी अरसा हुआ मर चुके थी | उस का कोई बहन भाई भी नहीं था और अकरम की अपने दुसरे रिश्तेदारों से वैसे भी खानदानी दुश्मनी थी | इसलिए उसके पकिस्तान वापिस आने की ना तो किसी को खबर थी और ना किसी को परवाह |

अकरम ने इस्लामाबाद एअरपोर्ट से टैक्सी रेंट की और अपने गाँव की तरफ चल पड़ा | रास्ते में रोड पर एक होटल से अकरम और टैक्सी ड्राईवर ने खाना खाया |

जब वो गाँव के बाहर बने अपने डेरे पंहुचा तो उस वक़्त तक रात काफी हो चुकी थी | रास्ता ना होने की वजह से टैक्सी डेरे पर नहीं जा सकती थी | इसलिए अकरम डेरे से कुछ फासले पर ही टैक्सी से उतरा | उस ने टैक्सी में से अपना समान निकाल कर टैक्सी वाले को किराया दे कर उस को फारिग कर दिया और खुद डेरे की तरफ पैदल चल पड़ा |

डेरे पर उस वक़्त कोई नहीं था और डेरे पर बने हुए कमरों को ताला लगा हुआ था | उन दो कमरों में से एक की चाभी अकरम के पास उसके सामान में थी | अकरम ने बैग ज़मीन पर रख कर उसमें से अपनी चाभी तलाश करने लगा |

कमरों के साथ ही जानवर बंधने वाला कमरा बना हुआ था | अकरम को उस जानवर बांधने वाले कमरे में से कुछ आवाजें आयीं |

अकरम आहिस्ता आहिस्ता चलता हुआ उस कमरे की तरफ बढ़ा | उस कमरे का दरवाज़ा थोडा टुटा हुआ था और कमरे में बल्ब की लाइट की वजह से कमरे के अन्दर का मंज़र बाहर से साफ नज़र आ रहा था | कमरे का अन्दर का मंज़र देख कर अकरम हैरान रह गया |

अन्दर वकास जो अब 21 साल का जवान हो गया था | उस का कद्द भी बहुत अच्छा निकल आया था वो एक गधी के पीछे अध नंगा खड़ा था |

उसने कमीज़ तो पहनी हुयी थी, मगर उसने अपनी कमीज़ का अगला हिस्सा उठाकर अपने दांतों में पकड़ा हुआ था और उसकी शलवार उसके क़दमों में गिरी पड़ी थी |

वकास ने एक हाथ से गधी की दुमं को एक साइड पर किया हुआ था और उस का पूरा लंड गधी की गांड में घुसा हुआ था |

वकास गधी को अपनी पूरी ताक़त से घस्से मार मार कर चोद रहा था |

अकरम ने वकास को इस हालत में देखा तो उस के मुंह पर मुस्कराहट दोड़ गयी | उसको अपनी जवानी का वो वक़त याद आ गया जब उसने भी अपने कुछ दोस्तों के साथ मिल कर अपनी गधी को चोदा था |

इतनी देर में कमरे के अन्दर वकास गधी को चोदता चोदता फारिग हो गया |

वकास ने गधी की गांड में से अपना लंड निकाला | अकरम की नज़र जब वकास के लोडे पर पड़ी तो हैरान रह गया |

वकास का अपना लंड भी किसी गधे के लंड की तरह काफी मोटा , ताज़ा और लम्बा था | वकास ने ज़मीन से अपनी शलवार उठाई और उससे ही अपने लंड को साफ किया और अपनी शलवार का नाडा बांध लिया |

यूँ ही वकास हांपता हुआ बाहर निकला | उसकी नज़र चौधरी अकरम पर पड़ी जो उसकी शलवार में अभी तक खड़े हुए लंड को देख कर हंस रहा था |

“च च च्च्च्च अकरम आप कब आए ” वकास ने हकलाते हुए कहा | उस की जुबान उस का साथ नहीं दे रही थी |

“उसी वक़्त जब तू “खोती”(Donkey) के साथ मोजें कर रहा था” अकरम ने जोर से हँसते हुए कहा और वकास ने शर्मिंदा से हो कर अपनी नज़रें झुका लीं |

अकरम ने वकास को ज्यादा शर्मिंदा करना मुनासिब ना समझा और उसको गले लगाते हुए कहा |

“कोई बात नहीं जवाना , गाँव में यह काम सब करते हैं और मैं भी अपनी जवानी में यह काम कर चूका हूँ” यह बात सुनकर वकास भी अकरम के साथ हंस पड़ा |

उसके बाद वकास ने अकरम के लिए कमरे का दरवाज़ा खोला और उसका सामान अन्दर रख दिया | थोड़ी देर बाद बैठ कर बातें करने के बाद अकरम ने वकास को अपने घर चले जाने को कहा और ताकीद की कि वो अपने घर में किसी को अकरम के आने का ना बताये |

अकरम बाबा रहमत और उसकी बाकी फॅमिली को सरप्राइज देना चाहता था |

वकास के जाने के बाद अकरम ने चारपाई सीधी की और लेट गया |

उसे आज दो साल बाद अपने गाँव में अपनी चारपाई पर लेट कर बहुत ख़ुशी और सकून हासिल हुआ और वो जल्द ही नींद की वादी में पहुँच गया |

 
सुबह दिन चड़े उसकी आँख खुली , नहा धो कर वो जल्दी से तैयार हुआ | उसने अपने अटेची केस में से बाबा रहमत , ज़ाकिया और उसके बाकी घर वालों के लिए हुए तोहफे निकाले और उसको एक छोटे बैग में डाल कर बाबा रहमत के घर की तरफ चल पड़ा |

इन दो सालों में गाँव में कुछ नहीं बदला था | हर चीज़ वैसे की वैसी ही थी | गाँव के कुत्ते और खोते उसी तरह गलियों में आवारा फिर रहे थे |

बच्चे उसी तरह अध नंगे गाँव के तलाब में भेंसो के साथ नहा रहे थे और कुछ गली में गुली डंडा खेल रहे थे |

रस्ते में गाँव के कुछ लोगो से अकरम की सलाम दुआ हुई | अकरम उनसे मिला और उन्होंने एक दुसरे का हाल चाल पुछा और वो इस तरह लोगों से मिलता मिलाता बाबा रहमत के दरवाजे पर पहुच गया |

अकरम ने दरवाज़े की कुण्डी खटखटाने से पहले सच्चे दिल से दुआ मांगी कि आज उसे ज़ाकिया का दीदार जरुर नसीब हो |

इससे पहले कि अकरम दरवाज़े की कुण्डी को हाथ लगाता | दरवाज़ा एक दम से अचानक खुला | यह सब कुछ एक दम और इतना अचानक हुआ कि अकरम अपनी तबज्जो कायम न रख सका और वो अन्दर की तरफ गिरने लगा |

इससे पहले कि वो अपने आप को संभालता एक लड़की जिसने अन्दर से दरवाज़ा खोला था | वो भी अपनी धुन में सामने से आकर अकरम से टकरा गयी |

लड़की के गाल अकरम के होंठो को छु गए और मम्मे भी सीने से टच कर गए |

अकरम और लड़की दोनों घबराकर एक दुसरे को देखने लगे | वो ज़ाकिया थी जो अब 18 साल की हो चुकी थी |

अकरम ज़ाकिया को देख कर दम बखुद रह गया |

उफफ्फ्फ्फ़ वो पहले से बहुत प्यारी लड़की हो गयी थी | उस का कमसिन कंवारा हुसन पहले से ज्यादा निखर गया था |

उसने पीले रंग के कमीज़ शलवार पहने हुई थी | जिस के निचे उसका काले रंग का ब्रज़िएर दिख रहा था | उसके मुम्मे पहले से थोड़े बड़े हो गए थे | उनका अब साइज़ शायद 34 हो गया था |

ज़ाकिया को देख कर ही अकरम का लोडा टाइट हो गया और वो सोचने लगा कि इसके मम्मे कितने सॉफ्ट होंगे और फुद्दी कितनी टाइट होगी, मज़ा आएगा इसे चोदने का |

ज़ाकिया ने अकरम को इस तरह बेताबी से खुद को घूरते हुए देखा तो वो शर्मा कर अन्दर भाग गयी |

इतने में दरवाज़ा फिर खुला | इस बार वकास था वकास अकरम को साथ लेकर घर के अंदर चला गया | घर के सेहन में तीन चारपाई पड़ी हुई थी | जिनमें से एक पर बाबा रहमत की बेटी रेहाना लेटी हुई थी और ज़ाकिया उसके पास खड़ी थी |

जबकि उसकी बडी बहन मुख़्तार बीबी , अपनी से छोटी बहन अस्मत बीबी की गोद में सर रख कर चारपाई पर लेटी हुई थी |

उन्होंने जब एक गैर मर्द को अपने भाई के साथ घर के अन्दर आते देखा , तो वो परदा करने की खातिर जल्दी से उठ कर एक कमरे में चली गयीं |

बाबा रहमत और उसकी बीवी सेहन में बैठे रात की बची हुई सुखी रोटी और रात का बची हुई बासी सब्जी के साथ सुबह का नास्ता कर रहे थे |

वो दो मियां बीवी अकरम को देखकर बहुत खुश हुए | बाबा रहमत ने फोरन उठ कर चौधरी अकरम को जफी डाली |

अकरम को बाबा रहमत के गंदे मैले कपड़ों से चमड़े के बू तो आई | मगर उसने उस बू को बर्दाश्त कर लिया |

एक दुसरे को मिलने और हाल चाल पूछने के बाद अकरम बाबा रहमत के पास चारपाई पर बैठ गया | अकरम ने घर के दरो दीवार पर निगाह डाली | घर की हर चीज़ की हालत दो साल पहले से बुरी नज़र आ रही थी |

गुरबत की झलक घर और घर वालों की हर चीज़ से टपक रही थी | अकरम घर का जायज़ा लेने में मसरूफ था कि बाबा रहमत की बीवी शरीफा बीबी बोली “ चौधरी तू इतने टाइम बाद हमारे घर आया है | मुझे समझ नहीं आ रही कि तेरी क्या खिदमत करूँ | तू जानता है कि हम गरीब लोग हैं और सिवाय खाली चाय के , तुझे कुछ पेश भी नहीं कर सकते” |

अकरम : “ मौसी आज नाश्ता मैंने आप ही के घर से करना है मगर आप किसी बात कि फिकर ना करें”

यह कहते हुए अकरम ने अपनी जेब से पैसे निकाले और वकास को देते हुए कहा “ जा तू भाग कर दिन्नो की दुकान से कुछ नाश्ते के लिए पकड़ ला“ |

अब्बा अरेहमत और उसकी बीवी अकरम को मन करते रहे मगर अकरम ने वकास को ज़बरदस्ती पैसे डे कर दुकान पर भेज दिया |
 
उसके जाने के बाद अकरम ने साथ लिया हुआ बैग शरीफा के हवाले किया |

शरीफा बीबी : ये क्या है अकरम ?

अकरम : मौसी अमेरिका से आप लोगो के लिए कुछ स्वेटर, जुते और कुछ और चीजें लाया हूँ |

रहमत मोची : चौधरी तुमने क्यों इतनी ज़हमत की |

अकरम : बाबा , लो इस में ज़हमत की क्या बात है | मौसी जाओ आप यह चीज़ें अंदर अपनी बच्चियों को दे दो |

शरीफा बीबी बैग उठाते हुए चारपाई से उतरी : अच्छा तुम लोग बातें करो मैं वकास के आने से पहले ताज़ा चाय बना दूँ |

जब शरीफा बीबी ने बैग अपनी बेटिओं को दिया | आज ज़िंदगी में पहली बार उनके लिए कोई कुछ लाया था | इस बात से उन सबको और खास तोर पर ज़ाकिया को बहुत ख़ुशी महसूस हुई |

कुछ देर बाद वकास नाश्ते का सामान लेकर घर आया | नाश्ते की चीज़ें माँ को देकर वकास फिर किसी काम के लिए घर से बाहर निकल गया |

नाश्ता करने के बाद अकरम ने बाबा रहमत और उसकी बीवी से पूछा ”बाबा रह्मत आपने अपनी किसी बच्ची की अभी तक शादी क्यों नहीं की ?

बाबा रहमत : अकरम , तीनो बड़ी बच्चियों की मंगनिया तो अपने रिश्तेदारों में हुई हैं | मगर शादी के लिए अभी तक दहेज़ का कोई बंदोबस्त नहीं हो सका |

चौधरी अकरम को ज़ाकिया को हासिल करने का एक तरीका समझ में आया और उसने फ़ौरन इस मोके का फायदा उठाने की कोशिश की |

अकरम : “बाबा रहमत अगर आप मुनासिब समझो तो दहेज़ का इन्तिज़ाम मैं कर देता हूँ”.

बाबा रहमत और उसकी बीवी अकरम की ऑफर सुन कर जैसे कुर्सी से उछल पड़े |

बाबा रहमत : “चौधरी , तुम इस वक़्त तो हमें पैसे दे दोगे, मगर तुमको पता है कि मैं सारी ज़िन्दगी भी लगा रहूँ तो तुम को तुम्हारा कर्जा नहीं लोटा सकता”|

चौधरी : मैं ये पैसा आप को कर्ज़ के तौर पर नहीं दे रहा |

“तो फिर तुम हमें पैसे किस शर्त पर दोगे” शरीफा बीबी ने चोंकते हुए पूछा |

“शर्त तो कुछ खास नहीं, बस आप ज़ाकिया का निकाह मुझ से कर दो और आप की बाकी बच्चियों का दहेज़ मैं आप को दे देता हूँ” चौधरी अकरम ने हिचकिचाते हुए कहा |

चौधरी अकरम की बात सुन कर बाबा रहमत और उसकी बीवी दोनों को जैसे सांप सूंघ गया |

थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद बाबा रहमत ने कहा ,“अकरम एक तो तुम्हारी और ज़ाकिया की उम्र में बड़ा फर्क है , दूसरा तुम चौधरी हो और हम ठहरे चमार लोग और फिर गाँव के लोग क्या कहेंगे ”.

चौधरी अकरम ने देखा कि उसकी ऑफर का बाबा रहमत जा उसकी बीवी ने गुस्सा नहीं किया था | जिस वजह से अकरम को थोडा तसली हुयी |

चौधरी : बाबा रह्मत, मुझे ज़ात पात और उम्र की परवाह नहीं आप लोग आपस में सलाह कर के मुझे जवाब दे दो | यह कहता हुआ अकरम उधर से उठकर बाहर निकल गया |

 
डेरे पर वापिस जाते उसकी मुलाकात वकास से हुई | अकरम ने वकास से भी अपनी ऑफर शेयर की |

वकास को अकरम की बात सुनकर गुस्सा तो बहुत आया | मगर उसे पता था कि गाँव के एक चमार की हैसियत से चुप रहने के सिवा वो अकरम का कुछ नहीं बिगाड़ सकता था |

वाकास की ख़ामोशी से अकरम समझ गया कि वकास को उसकी बात बुरी लगी है |

“वकास यार ,अगर तू अपने घर वालो को मेरी और अपनी बहन ज़ाकिया की शाद्दी के लिए राज़ी करले तो मैं तुम्हारी बहनों के दहेज़ के साथ तुमको भी अपने साथ अमेरिका बुला सकता हूँ ”

अकरम ने वकास को ज़ाकिया से शादी की खातिर एक नई ऑफर कर दी | वकास यह सुन कर दिल ही दिल में ख़ुशी से कूद पड़ा | मगर उसने अपनी ख़ुशी अपने चेहरे से ज़ाहिर ना होने दी |

“पर मैं अमेरिका कैसे जाऊंगा चौधरी?” वकास ने जल्दी से पूछा |

अकरम समझ गया कि उसका तीर निशाने पर लगा है | “ तुम बस अम्म्मा अब्बा को मनाओ , बाकी सब मुझ पर छोड़ दो” कहता हुआ अकरम वापिस अपने डेरे की तरफ रवाना हो गया |

घर वापिस आ कर वकास ने अपने माँ बाप से अकरम की दी हुई दूसरी ऑफर भी बता दी | इस बात को सुन कर बाबा रहमत का दिल अकरम को रिश्ते के लिए हाँ करने के लिए राज़ी होने लगा |

मगर उसके लिए असल मसला उसको अपनी बीवी और खास तौर पर अपनी कमसिन बेटी ज़ाकिया को राज़ी करना था |

उस रात घर में सब बच्चे सो गए तो बाबा रहमत और उसकी बीवी आपस में अकरम की ऑफर के मुतलक बातें कर रहे थे |

शरीफा बीबी : रहमू, अकरम हमारी बच्ची से उम्र में बहुत बड़ा है , इसलिए तो उसको ना कर दे |

बाबा रहमत : पागल ना बन , तुझे पता है मर्द और घोड़ा कभी बूढ़े नहीं होते और यह भी सोच कि ज़ाकिया के साथ साथ हमारी बाकी बच्चियों का घर भी बस जाएगा |

शरीफा बीबी : नहीं रहमत मेरा दिल नहीं मानता कि मैं अपनी सब से छोटी बेटी के साथ इतना जुलम करूँ , बस तू सुबह चौधरी को साफ इंकार कर दे |

बाबा रहमत ने अपनी बीवी को मनाने की काफी कोशिश की मगर वो ना मानी तो रहमत “अच्छा सुबह अकरम को ना का जवाब दे दूंगा” कहता हुआ सो गया |

ज़ाकिया साथ वाले कमरे में अभी सोई नहीं थी | उसने अपने माँ बाप की सब बातें सुन लीं |

सारी रात ज़ाकिया इस बात के बारे में सोचती रही | सुबह होने तक उसने अपने दिल में एक फैसला कर लिया |

ज़ाकिया सुबह अपनी बाकी बहनों से पहले उठ गई | वो अपनी माँ के पास गयी जो चूल्हे के पास बैठी रोटी पका रही थी |

ज़ाकिया: अम्मा मैंने तुम्हारी और अब्बा की सारी बातें रात को सुन ली हैं |

शरीफा बीबी : थोडा घबराते हुए ”क्या सुना है तुमने बेटी”

ज़ाकिया: अम्मा आप चौधरी अकरम को “हाँ ” कर दो |

शरीफा बीबी : बेटी तुझे पता है कि तू क्या कह रही है |

ज़ाकिया: हाँ अम्मा मुझे पता है कि मैं क्या कह रही हूँ |

शरीफा बीबी : तू अभी बच्ची है ज़ाकिया, और अकरम तुम्हारी बाप की उम्र का है , यह बात नहीं हो सकती पुत्तर |

ज़ाकिया: बस अम्मा मैंने फैसला कर लिया है तू अब्बा को भी बता दे |

शरीफा बीबी : पुत्तर मगर यह तुम्हारा फैसला गलत है |

ज़ाकिया: अम्मा यह एक “मज़बूरी का फैसला ” है लेकिन मेरे इस फैसले से मेरी बाकी बहनों और भाई की ज़िन्दगी बेहतर हो जाएगी |

ज़ाकिया ने अपनी अम्मा से कहा कि वो अकरम को यह शर्त बता दे कि ज़ाकिया और उसकी सब बहनों की शादी एक ही दिन होगी और अकरम वकास को अमेरिका भेजने के लिए पैसे भी किसी एजेंट को शादी से पहले देगा |

शरीफा बीबी यह बात सुनकर चुप हो गई | उसने दुपहर को रहमत से ज़ाकिया की शादी पर राज़ी होने की बात की |

उन दोनों ने आपस में मशवरा करके अकरम को हाँ में जवाब दे दिया और साथ ही ज़ाकिया की बताई हुई शर्त को भी बोल दिया |

अकरम इन सारी बातों पर राज़ी हो गया | उसने फ़ौरन ही दुसरे दिन प्रोफेसर नूर हुसैन को वकास का अमेरिका जाने का केस दिया और बाबा रहमत को बच्चियों के दहेज़ के लिए पैसे दे दिए |

गाँव में यह कह खबर जंगल की आग की तरह फ़ैल गयी कि चौधरी अकरम गाँव के एक मोची के घर शादी कर रहा है |

गाँव के चौधरी तो इससे पहले चमारों की बहन बेटियों को पसंद आने पर उठा कर चोद लेते थे |

इसलिए एक चौधरी का इस तरह बरात ले कर एक चमार के घर जाना गाँव के बाकी चौधरियों को हज़म नहीं हो रहा था |

 
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