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मधुरानी –कम्प्लीट हिन्दी नॉवल

गणेश ने फ़ैसला कर लिया की वह अब मधुरानी से कोई रिश्ता नहीं रखेगा. वह उठा और अपने घर जाने के लिए बॅग भरने लगा. लेकिन उसे अहसास हुआ की घर जाने की बात को लेकर वह उतना उत्साहित न था. वह समझ न पा रहा था की ऐसा क्यों था. आख़िर इतने दिनों बाद वह बीवी से मिलने जा रहा था फिर भी उससे मिलने को लेकर वह उत्साहित न था. शायद इस मधुरानी के चक्कर में वह इतना उलझ चुका था की उसे बीवी बच्चों का ख्याल न रहा .

लेकिन अब ऐसा कभी नहीं होगा अब इस मधुरानी का किस्सा ख़त्म .... बिल्कुल ही ख़त्म.... गणेश ने मन ही मन दोहराया.

पिछली दो रातों से गणेश की आँख न लग पाई थी सोमवार रात भी उसने उसी बेचैनी में काटी .

अच्छा हुआ जो समय रहते मुझे माधुरानी का सच पता चल गया...

लेकिन मैं अब भी न जाने क्यों बैचें हूँ? … गणेश परेशन हो उठा .

सुबह उठ कर गणेश नहाया धोया , दाढ़ी बनाई . बैग में से धुले हुए इस्त्री किए हुए कपड़े निकाल कर पहने और बैग बंद करी. सारजा बाई को उसने कल ही इत्तला कर दी थी . बैग ले कर वह घर से बाहर निकला और दरवाज़ा बंद कर ताला लगाया . ताला लगाते समय उसने यह सोच लिया की वह दुकान की ओर न देख कर सीधे बस स्टाप जाएगा.

ताला चढ़ा कर वह मुड़ा और बोझिल कदमों से चलने लगा लेकिन उसके कदम बरबस ही उसे माधुरानी की दुकान की ओर ले जाने लगे .

"कैसे हो गणेश बाबू.. दो रोज हो गये आपको देखे बगैर" मधुरानी उसे दुकान की ओर आते देख बोल उठी " कुछ जी ठीक ना था का?"

" हाँ ज़रा तबीयत ठीक न थी..."

"और ए बॅग उठाए तालुका जा रहे हो का?"

गणेश को अब अहसास हुआ की इसने मज़ाक में ही सही उसकी बीवी के बारे में अब तक कभी कोई पूछताछ न की थी.

" हाँ वहीं जा रहा था"

" ए अच्छा हुआ .... हमरी दुकान का भी काफ़ी समान ख़त्म हुई गवा है और आप तालुका जा रहे हो"

गणेश मौन खड़ा रहा.

" ए लीस्ट लीजियो हमने विलास से बनवाई रही ..."

उसने लिस्ट उसे थमाते हुए कहा , उसने लिस्ट अपनी जेब में रखी और चलने के लिए मुडा.

" ओ गणेश बाबू रुकिये तो ज़रा समान कैसे लावेंगे ? ए बड़ी थैली रखिए "

गणेश ने वह थैली लेने के लिए हाथ बढ़ाया . हाथों में थैली लेते हुए मधुरानी के नर्म मुलायम हाथों का स्पर्श पा कर वह रोमांचित हो उठा.

यही वो नर्म अहसास ... यही वह नाज़ुक सी छुअन....

उसकी सारी उदासी मानों गायब से हो गयी थी एक नया जोश उसकी रगों में दौड़ रहा था. उसने दूसरा हाथ थैली पकड़ने के लिए आगे बढ़ाया और मौका पा कर उसे छू लिया , उसने मधुरानी की आँखों में आँखें डाल कर देखा:

वही शोख नज़र...

वही मीठी मुस्कान ...

उसकी सारी उदासी दूर हो गयी. वह बड़े जोश में थैली उठाए बस स्टाप की ओर बढ़ा . गली में मुड़ते वक्त उसने मधुरानी की ओर देखा. वह अब भी उसकी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी. वो गली में मूड गया और तेज कदमों से बस स्टाप को ओर चल पड़ा. उसे अब पूरी तरह अहसास हो गया था की वह भी अब मधुरानी की कार्यकर्ता मक्खियों के झुण्ड में में शामिल हो गया था.

..................गणेश बाबू जब अपने खयालोंसे होश मे आए ....

उन्होने इर्द गिर्द देखा , हॉल लगभग खाली हो गया था. यानी कई लोग सरकार से मिल कर लौट चुके थे . गणेश बाबू का बेटा वीनू भी कहीं दिखाई न पड़ा. गणेश बाबू ने हॉल से बाहर आ कर देखा वीनू वहाँ भी न था

शायद उकता कर घर चला गया होगा..

आजकल लड़कों में कोई सब्र नहीं ..

नौकरी पाने के लिए न जाने कैसे- कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं , द्वारे द्वारे घूमना पड़ता है तब कहीं जा कर नौकरी मिलती है...

उन्होने सोचा इतने में किसी ने पुकारा

"गणेश बाबू गावंडे"

गणेश बाबू का चेहरा खुशी से चमक उठा. खुशी में अपने सामान की थैली लेने के लिए गणेश बाबू अपनी कुर्सी की ओर जाने लगे.

"गणेश बाबू गावंडे.. कौन हैं?" उनका नाम दोबारा पुकारा गया.

"मैं.. मैं.... गणेश बाबू गावंडे .." गणेश बाबू ने अपनी थैली संभालते हुए जल्दबाज़ी में दरवाज़े की ओर आते हुए कहा.

" अरे तो जवाब देने का क्या लेंगे जनाब..यहाँ आपका शुभ नाम चिल्ला चिल्ला कर मेरा हलक सूखा जा रहा है.." वह आदमी गणेश बाबू पर बरस उठा .

गणेश बाबू उसकी ओर देख कर एक खिसियानी हँसी हँसे.

" जाने कैसे कैसे नमूने मुँह उठा कर चले आते हैं यहाँ ... अब इन्ही को देखिए .. मुँह में दही जमा हुआ है इनके .. जवाब देना ज़रूरी नही समझते .. इन्हें लगता है मानों इन्हे सब पहचानते हैं ... खुद को न जाने क्या फिल्मी हीरो समझते हैं.." वह आदमी भुनभुनाते हुए दूसरे आदमी से कहने लगा.

गणेश बाबू ने डरते डरते अंदर जाने के लिए दरवाज़ा धकेला. उन्होने भीतर झाँक कर देखा . सामने ही एक मुलायम सोफे पर बैठी मधुरानी उन्हें दिखाई दी. जिसे लोग अदब से सरकार कहते थे वह मधुरानी ही थी . गाँव की एक मामूली दुकानदार से ... ग्राम पंचायत का चुनाव जीत कर सरपंच बनी ... फिर पंचायत समिति का चुनाव जीतते हुए ....आख़िरकार वह विधायक के पद तक आ पंहुची थी. उसके बगल में ही पाटिल बैठे थे .

उसकी इस उड़ान में यक़ीनन इन पाटिल साहब का ही हाथ होगा ... गणेश बाबू ने सोचा .

गणेश बाबु दरवाजे पर खड़े थे. लेकिन मधुरानी का ध्यान दरवाज़े की ओर न था. वह पाटिल जी से किसी मसले पर बातें कर रही थी . गणेश बाबू ने दरवाज़े को ज़रा और खोला और भीतर आ गये. लेकिन वह अंदर आए इसका ख्याल भी किसी को न था . वह दोनो अभी भी अपनी चर्चा में मग्न थे. गणेश बाबू पास ही एक कुर्सी के सामने जा कर उहापोह की स्थिति में खड़े रहे.

खुद से कैसे बैठूं किसी ने बैठने के लिए कहना चाहिए...

यूँ भी अबतक जो बेइज़्ज़ती हुई है वह कोई कम थोड़े ही है ?...

अंदर चिट्ठी भिजवाने के बावजूद भी मधुरानी ने इतनी देर इंतेजार करवाया...

गणेश बाबू ने सोचा.

मधुरानी ने हालत के मुताबिक खुद को ढाला था , इसका सबसे बड़ा सुबूत यानी उसकी भाषा जो शहर में रह कर साफ़ हो गयी थी. वहीं उनकी अपनी भाषा सुदूर गाँवों में काम कर गँवई हो गयी थी . उनका रहन सहन भी बदल गया था पॅंट शर्ट पहनना छोड़ अब वह शर्ट और पायजामा पहनने लगे थे.

इंसान को हमेशा तरक्की की राह चलना चाहिए .. जैसे मधुरानी चली ...मेरी तरह उल्टी दिशा में नहीं... उन्होने सोचा

उसके हाव भाव में यूँ तो कोई ख़ास फ़र्क नज़र नहीं आया. यूँ भी उसकी अदाएँ किसी रानी से कम न थी.

धीरे - धीरे पाटिल साहब और मधुरानी की चर्चा गर्म होते- होते फिर बहस में बदल गयी. मधुरानी अपनी बात ज़ोर दे कर मनवाना चाहती थी. लेकिन पाटिल जी थे की समझने को तैयार ही न थे , बहस गर्म होती जा रही थी. गणेश बाबू को महसूस हुआ की कहीं वे ग़लत समय पर तो न आ गये ? शायद थोड़ी देर और राह देख सकते थे. गणेश बाबू बाहर जाने को जैसे ही मुड़े तभी मधुरानी का ध्यान उनकी ओर गया.

"आइए गणेश बाबू विराजिये" मधुरानी ने थोड़ी देर अपनी चर्चासे बहार आते हुए कहा.

गणेश बाबू को मानो उसके साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आने लगे - उसकी वही चंचल शोख आँखें , वही शरारती मुस्कुराहट. उन्होने उसकी ओर देखा. यही चीज़ें आज भी कायम थी केवल समय के साथ चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आ गयी थी. उसने एक पल भी एहसास होने न दिया की कुछ देर पहले वह ताव ताव में बहस कर रही थी, यूँ तो अपने चेहरे के हाव भाव एक पल में बदलने की उसे महारत हासिल थी और गणेश बाबू इस बात से खूब वाकिफ़ थे.
 
गणेश बाबू सकुचाते हुए मधुरानी के सामने सोफे पर बैठ गये.

"बड़े दिनों बाद मिलना हुआ.." मधुरानी ने उलाहना देते हुए कहा.

गणेश बाबू हौले से मुस्कुराए.

"कहिए कैसे आना हुआ..?" मधुरानी ने पूछा

पाटिल जी ने पहचान दिखाना भी ज़रूरी न समझा. पाटिल जी गुस्से में तड़ से उठ बैठे और पैर पटकते हुए वहाँ से चले गये. मधुरानी चोर निगाहों से उनको जाते हुए देख रही थी.

" मधुरानी... मॅडम" सिर्फ़ मधुरानी कहना उचित न होगा ऐसा जानकार गणेश बाबू ने उनके नाम के आगे मॅडम जोड़ा. 'मॅडम' कहते हुए गणेश बाबू थोडा रुके .

मधुरानी ने कोई ऐतराज़ न जताया "हाँ… हाँ .. कहिए रुक क्यों गये?"

"मॅडम वह मेरे तबादले के बारे में कुछ कहना था.."

"याने तबादला कराना है या रुकवाना है..?"

"रुकवाना है.."

"ठीक है ... ठीक है...एक काग़ज़ पर आप अपना पद , वरिष्ठ का नाम और इलाक़ा इत्यादि बातें ज़रा विस्तार में लिखिए...बाकी हम देखते हैं.."

गणेश बाबू ने तुरंत अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला और मधुरानी के सामने रखते हुए बोला " यह रही अर्ज़ी मैने इसमे सब कुछ लिखा है"

"नहीं मेरे पास नहीं .. बाहर दरवाज़े के करीब हमारे सेक्रेटरी साहब बैठे हैं उन्हीं को दीजिए.."

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मॅडम.."

"अरे गणेश बाबू आप तो हमें शर्मिंदा कर रहे हैं" मधुरानी ने कहा.

"लेकिन काम तो हो जाएगा न मॅडम.."

"होगा होगा यक़ीनन होगा...फ़िक्र न करें.." मधुरानी ने जवाब दिया.

मधुरानी का इशारा समझ कर गणेशबाबू वहाँ से चलने को हुए.

गणेश बाबू कमरे से बाहर आए. गणेश बाबू के मन में मधुरानी के प्रति कृतज्ञता थी. उन्होंने महसूस किया की भीतर का गलिचा तो बाहर बिछे गलीचे से भी उम्दा और मुलायम है..उस.... पर चलते हुए उन्हें ऐसा अहसास हो रहा था मानों बादलों पर उड़ रहें हों. गणेश बाबू को उस बंगले में रखी कीमती चीज़ों और उम्दा गालीचे को देख कर मधुरानी की अमीरी का अहसास हो रहा था. गणेश बाबू के मन में एक ही पल जलन और दुसरे पल मधुरानी के प्रति अभिमान उमड़ आने का अहसास हुआ.

वाकई मधुरानी ने कम समय में काफ़ी तरक्की की है....

उसका मुझसे व्यवहार चाहे जैसा हो लेकिन उसने जो हासिल किया है उसके लिए उसे श्रेय देना ही होगा...

उन्होने अपने आप से कहा. इतने में सामने का दरवाज़ा खोल कर भरे पूरे शरीर का एक लंबा चौड़ा आदमी - सफेद लिबास में.. किसी नेता की भाँति चलते हुए अंदर आया.

अरे यह तो मधुकररावजी हैं ...

मधुकर बाबू गणेश बाबू के बगल से गुज़रने लगे लेकिन शायद उनका ध्यान कहीं और था या शायद उन्होने उनको देख कर भी अनदेखा कर दिया .

बाहर जो आदमी कह रहा था वह सब सच ही था. वाकई मधुरानी का आदमी भीड़ से अलग नज़र आता है. तभी मधुकर बाबू मधुरानी के कमरे का दरवाज़ा खोल बेधड़क भीतर चले गये.

यक़ीनन यह मधुरानी का ही आदमी होगा वरना यूँ बेख़टके अंदर कैसे चला गया?...

गणेश बाबू सामने दरवाज़े की तरफ चलने लगे . अचानक उन्हें कुछ याद आया और उनके पैरों मीं मानों ब्रेक लग गये.

अरे वीनू की नौकरी के बारे में कहना तो भूल ही गया ..

अब क्या करूँ?...

अभी मैं बाहर थोड़े ही न गया हूँ ..

वापस लौटता हूँ ..

लेकिन मैं बाहर निकला ही क्यों?...

अब क्या वापस हॉल में सारा दिन इंतेजार करना होगा ?...

वह वीनू पूरा घर सिर पर उठा लेगा..

गणेश बाबू तुरंत ही वापस मुड़े और मधुरानी के कमरे के बंद दरवाज़े के करीब आ कर रुक गये.

अब जाऊं या थोड़ी देर राह देखूं?..

दरवाज़ा थोड़ा खोल कर देखता हूँ...

गणेश बाबू ने हौले से ही दरवाज़े को धकेल कर थोडा टेढ़ा किया और भीतर झाँका . भीतर का दृश्य देख कर उनके तो होशो हवास ही उड़ गये . अभी-अभी अंदर आए मधुकर बाबू मधुरानी से सट कर बैठे थे और उसके माथे पर झूलते हुए बालों की लटों में अपनी उंगलियाँ फँसाए खेल रहे थे. गणेश बाबू ने तुरंत ही दरवाज़ा बंद करना चाहा, लेकिन शायद दरवाज़े में कुछ अटक सा गया था सो बंद न हुआ. दरवाज़े से अंदरूनी दृश्य साफ दिख रहा था और अंदर की आवाज़ें भी साफ साफ सुनाई दे रहीं थी.

"मधु ये यहाँ पर" मधुकर बाबू ने एक काग़ज़ और स्टंप पॅड मधुरानी के सामने रखते हुए कहा.

"यह क्या है..?"

"क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?.. क्या मैं तुम्हें धोखा दूँगा..? उस दिन जिस कारखाने को खरीदा था यह उसके काग़ज़ात हैं.."

"मेरा वह मतलब न था.. मेरे जानू" उसके गालों को अपने हाथों से खींचते वह बोली.

गणेश बाबू के पाँव काँपने लगे.

"नहीं .. नहीं अब मेरा यहाँ खड़े रहना ठीक नही......कहीं उन्होने मुझे यहाँ खड़ा देख लिया तो" लेकिन उनके पैर थे की वहाँ जम से गये थे.

मधुरानी ने मधुकर बाबू से स्टॅंप पॅड लिया और उसमें अपना अंगूठा दबा कर सामने रखे किसी काग़ज़ पर निशान लगाया.

गणेश बाबू को देख कर यकीन न हुआ , उन्हें आज यह पहली बार पता चला की मधुरानी अनपढ़ थी उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर था.

हद हो गयी...मधुरानी तो अपने राज़ को बनाए रखना खूब जानती है...

" उस पाटिल के पर निकल आए हैं.." मधुरानी ने मधुकर बाबू से कहा

" शायद उसे हमारे बारे में सब पता चल गया.." मधुकर बाबू आँखें मिचका कर हंसते हुए बोले.

" के मतलब ?.. पता चले तो पता चले कल मुए को .. हम का डरे हैं उससे ... का हम उसकी रखैल लागे हैं..? उसका जल्दी ही कोई इलाज करना पड़ेगा"

" उसकी परवाह मत करो.. मैने उसका इन्तेजाम कर लिया है"

"बात कुछ ज़्यादा ही बिगड़ गयी है...एक दो दिन में ही कोई कदम उठना पड़ेगा"

"एक दो दिन कहाँ?...कल का सूरज वह देख नहीं पाएगा"

" ... मेरा जानू" मधुरानी ने दोबारा उसके गाल मसले.

" तुम्हारी इसी मर्दानगी पर मैं फिदा हो गयी...पता है?" मधुरानी उसे सहलाते हुए बोली.

"जानती हो मुझे तुम्हारी कौन सी अदा बड़ी भाती है...?"

मधुरानी उसकी आँखों में देखती हुई धीरे से मुस्कुरा दी.

"तुम्हारी इन क़ातिल मतवाली नज़रों पर हम दिल लुटा बैठे हैं ... हाय! "

गणेश बाबू अब सम्हल गये थे वह घूम कर जाने के लिए मुड़े.

"कौन हैं वहाँ ?" पीछे से मधुरानी की आवाज़ आई गणेश बाबू के मानों पैरों पर ब्रेक से लग गये.

क्या करूँ..वापस जाऊं?… उनका दिल धड़कने लगा.

वह वापस चलकर मधुरानी के दरवाज़े की ओर आए . दरवाज़ा अब भी थोड़ा खुला हुआ था वह खोल कर गणेश बाबू अंदर आए उन्हें हैरत हुई कि वक्त आने पर वह ऐसी हिम्मत भी दिखा सकते हैं.

"मैं हूँ..." गणेश बाबू ने हौले से अंदर आते हुए कहा.
 
मधुरानी और मधुकर बाबू अब दूर दूर बैठे हुए थे. मधुकर बाबू अपने हाथों में काग़ज़ धरे उस काग़ज़ को पढ़ने का ढोंग कर अपने हाव भाव छिपा रहे थे तो मधुरानी के चेहरे पर वापिस वही शरारती मुस्कान खेल रही थी.

"क्या कुछ भूल गये..बाबूजी?" उसने अंजान बनते हुए कहा शायद वह गणेश बाबू के चेहरे के हाव भाव को पढ़ने की कोशिश कर रही थी.

गणेश बाबू इस सबसे अंजान बनते हुए बोले " वह.. म.. मेरे बेटे की नौकरी के ब..बारे में ब.. बतलाना तो मैं भूल ही गया"

"अच्छा .. अच्छा.. आइए बैठिए.." उसने गणेश बाबू को बैठने का इशारा किया.

उसने करीब बैठे मधुकर बाबू को नज़रों से न जाने कौन सा इशारा किया वह वहाँ से उठ कर चलते बने.

मधुरानी सोफे पर आराम से बैठती हुई बोली "गणेश ... यहाँ मेरे बगल में आ कर बैठिए"

गणेश बाबू मानों किसी कठपुतली की तरह उठे और उसके बगल में थोड़ा अंतर रख बैठ गये.

"आजकल वह पहले वाली बात नहीं रही... शायद बढ़ती उम्र का असर है तबीयत कुछ नासाज़ है" मधुरानी बोली.

गणेश बाबू कुछ न बोले

"देखो तो मेरी नब्ज़ टटोलो तो.." उसने अपना हाथ उनके आगे करते हुए कहा , ".. आज कल ब्लड प्रेशर की दिक्कत हो गयी मुझे"

गणेश बाबू ने काँपते हाथों से उसका हाथ अपने हाथों में लिया और उसकी नब्ज़ टटोलने लगे. मधुरानी का हाथ अब भी वैसा ही मुलायम था. उसके हाथों का स्पर्श वह भूले न थे.

"क्या पढ़ा -लिखा है आपका बेटा?"

"बी.कॉम. किया है"

"एक ही बेटा है"

"जी हाँ.."

"एक ही बेटा है...बढ़िया है...मुझे तो मालूम ही न था.."

गणेश बाबू नब्ज़ टटोल रहे थे. लेकिन बीच बीच में मधुरानी के बोलने से उन्हें वापस टटोलना पड़ रहा था.

"बेटे ने कहीं अर्ज़ी दी है?"

"हाँ .. नगर निगम में एक जगह खाली है.. क्लार्क की.. वहीं अप्लाइ किया है.."

"उसका नाम , जिस पद के लिए अर्ज़ी दी इत्यादि बातें विस्तार से एक काग़ज़ पर लिख दें" मधुरानी ने गणेश बाबू के हाथों से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा.

"हाँ मैं सब लिख कर लाया हूँ" गणेश बाबू जेब से काग़ज़ निकालते हुए बोले.

"मेरे सेक्रेटरी के पास अर्ज़ी दे दीजिए" मधुरानी फ़ोन के पास जाती बोली.

गणेश बाबू चलने की इजाज़त पाते हुए खड़े हो गये . मधुरानी फ़ोन का एक बटन दबाते हुए बोली.

"नारायण बाबू को फ़ोन लगाइए" उसने फ़ोन रख दिया.

"ठीक है... आता हूँ" गणेश बाबू बोले.

मधुरानी गणेश बाबू का हाथ हाथों में लेती हुई बोली "यूँ ही आते रहिएगा ....पुरानी यादें ताज़ा हो जाएँगी"

"हाँ हाँ .. क्यों नहीं? क्यों नहीं?" गणेश बाबू किसी तरह बोले.

"जिंदगी की इस दौड़ में इंसान पीछे छूट गयी बातों को जब याद कर रोता है तो गुज़रे ज़माने की कुछ मीठी यादें ही उसके जीने का एक मात्र सहारा होती हैं .." मधुरानी एकदम दार्शनिक अंदाज़ में बोली, उसने गणेश बाबू का हाथ छोड़ा.

गणेश बाबू मुड़ कर दरवाज़े की दिशा में चलने लगे. वह गणेश बाबू को दरवाज़े तक छोड़ने चल कर आई .

"ठीक है..." गणेश बाबू जाते जाते उसकी ओर देख मुस्कुरा कर बोले. वह गर्दन हिला कर मुस्कुरा उठी और दरवाज़ा बंद हो गया.

आज रात गणेश बाबू की मानों नींद उड़ सी गयी थी. वह करवट पे करवट बदले जा रहे थे. एक ओर जहाँ मधुरानी के नर्म मुलायम हाथों की छुअन से उनकी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं थी वहीं दूसरी ओर दरवाज़े की आड़ से देखे गयी मधुकर बाबू और मधुरानी की रंगरैलियाँ याद आ रहीं थी.

उनकी बीच कुछ बातें हुईं थी..

उनके बीच हुई बातों का एक एक लफ्ज़ उनके दिमाग़ में घूमने लगा

" उस पाटिल के पर निकल आए हैं.."

" शायद उसे हमारे बारे में सब पता चल गया.."

" के मतलब ?.. पता चले तो पता चले कलमुए को .. हम का डरे हैं उससे ... का हम उसकी रखैल लागे हैं..? उसका जल्दी ही कोई इलाज करना पड़ेगा"

यानी की पाटिल जी से भी मधुरानी के रिश्ते होंगे..? गणेश बाबू ने वह बातें याद कर सोचा. फिर दोबारा उनके संवाद उनके दिमाग़ में घूमने लगे.

" उसकी परवाह मत करो.. मैने उसका इन्तेजाम कर लिया है"

"बात कुछ ज़्यादा ही बिगड़ गयी है...एक दो दिन में ही कोई कदम उठना पड़ेगा"

"एक दो दिन कहाँ?...कल का सूरज वह देख नहीं पाएगा"

गणेश बाबू सोच में पड गये… मतलब वह पाटिल जी का कत्ल करेगा? नहीं नहीं... मधुरानी चाहे जैसी भी हो वह इस हद तक नहीं गिर सकती…

गणेश को मधुरानी की कही वह बातें याद आईं

"गणेश ... यहाँ मेरे बगल में आ कर बैठिए..."

उन्होने सोचा:

मधुरानी ने भले ही मुझे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया हो लेकिन आज भी शायद उस के दिल के किसी कोने में आज भी मेरे लिए कुछ जज्बाद होंगे....

..... या शायद वह अभी भी मुझे अपने जाल में फँसाना चाहती है?

लेकिन अब मुझे अपने जाल में फँसा कर भी वह क्या हासिल कर लेगी..

और अब मैं जवान थोड़े ही न रह गया हूँ ...

लेकिन प्यार की कोई उम्र नहीं होती ..

और मेरी उम्र हो गयी तो क्या? वह भी कौन सी जवान है?..

"आजकल वह पहले वाली बात नहीं रही... शायद बढ़ती उम्र का असर है तबीयत कुछ नासाज़ है"

कहीं इन लफ़्ज़ों में मधुरानी की बेबसी तो नज़र नहीं आती? ऐसे हालत में उसको भी किसी की कमी खलती होगी..

कहीं वो मुझमे अपने प्रेमी को तो नही खोजती?…

"देखो तो मेरी नब्ज़ टटोलो तो.."

गणेश के कानों में मधुरानी की बातें गूंजने लगी और उसके रोंगटे खड़े हो गये

उसके वह मुलायम हाथ और नर्म छुअन.
 
"यूँ ही आते रहिएगा ....पुरानी यादें ताज़ा हो जाएँगी" गणेश बाबू को वहाँ से लौटते समय मधुरानी के कहे वह लफ्ज़ याद आए.

उसने ऐसा कह कर कहीं मुझे कोई इशारा तो न किया ?..वरना वह ऐसे बिना किसी वजह से अपनेपन से तो पेश आने से रही.…

फिर यह कम्बख़्त मधुकरबाबू कहाँ से बीच में टपक पड़े?....

वह भी तो मधुरानी के साथ इश्क़ लड़ा रहा था और मधुरानी भी उसको रोक नहीं रही थी..

शायद वह उसके जिस्म से खेलता होगा या फिर उससे किसी राजनैतिक लाभ के लिए मधुरानी उसको अपने जाल में फँसा रही होगी...

लेकिन मेरे प्रति उसका मन साफ है ... सच्चा प्रेम. है ..

ऐसे दो मुंहें लोगों के बीच इंसान को सच्चे प्रेम की कमी खलती है "

करवट बदलते हुए कब सुबह हो गयी गणेश बाबू को पता ही न चला. उनकी बीवी की सुबह किचन में उठा पटक चालू हो गयी थी. लिहाज़ा अब नींद आने का सवाल न था. वह बिस्तर से उठे और कमरे में चहल-कदमी करने लगे. दरवाज़े पर दस्तक हुई तो वह चहल-कदमी बंद कर सामने के कमरे में आए. वहाँ उनका बेटा वीनू घोड़े बेच कर सो रहा था. गणेश बाबू ने उसको जलती निगाहों से देखा और किवाड़ खोल दिए , नीचे आज का अख़बार पड़ा था. गणेश बाबू ने वह अख़बार उठाया और दरवाज़ा बंद कर पन्ने पलटते हुए अंदर आ गए

अख़बार की हेड लाइन पढ़ कर उनके तोते उड़ गये.

"संपत राव पाटिल की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत!!"

हे भगवान ..कल ही तो वह मधुरानी के यहाँ दिखाई दिए थे.…

अचानक गणेश बाबू को याद आया कि उनकी मधुरानी से किसी बात को ले कर गर्मागर्म बहस हुई थी

फिर उन्हें मधुकर बाबू और मधुरानी के बीच हुई बातें याद आने लगीं

" उस पाटिल के पर निकल आए हैं.."

" शायद उसे हमारे बारे में सब पता चल गया.."

" के मतलब ?.. पता चले तो पता चले कलमुए को .. हम का डरे हैं उससे ... का हम उसकी रखैल लागे हैं..? उसका जल्दी ही कोई इलाज करना पड़ेगा"

" उसकी परवाह मत करो.. मैने उसका इन्तेजाम कर लिया है"

"बात कुछ ज़्यादा ही बिगड़ गयी है...एक दो दिन में ही कोई कदम उठना पड़ेगा"

"एक दो दिन कहाँ?...कल का सूरज वह देख नहीं पाएगा"

उनकी कही एक- एक बात मानों गणेश के सिर में हथौड़े की तरह बजने लगी.

हे.. भगवान...यानी मधुरानी ने ही पाटिल जी को मरवाया..या यह महज़ एक इत्तेफ़ाक था.....

नही यह इत्तेफ़ाक तो हरगिज़ नही हो सकता ..

शायद इसलिए मधुरानी मुझसे बड़ी नरमी से पेश आ रही थी ...

उसने यह जान लिया था की मैने उसकी बातें सुन ली हैं …

गणेश बाबू धम्म से बिस्तर पर बैठ गए. उनके दिमाग़ में तरह तरह की बातें आ रही थी , उन्हें मधुरानी का इतिहास याद आने लगा.

मधुरानी का पति पाटिल के हाथों दुर्घटना का शिकार हो गया था..

या शायद मधुरानी ने ही उसको पाटिल के हाथों मरवाया होगा..

फिर पाटिल का इस्तेमाल कर मधुरानी ने अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षाएँ पूरी कीं और फिर जब उसके पर निकल आए तो उसने पाटिल को भी मरवाया..

यानी उसका पति , पाटिल और अब मधुकर बाबू की उसने बलि चढ़ाई..?

हाँ.... बलि ही चढ़ाई .. जैसे मधुमक्खियों में रानी मक्खी , नर मक्खी के साथ संभोग के बाद उन्हें जान से मार डालती है वैसे ही उसने अपने पति और पाटिल जी को मार डाला..

और अब शायद मधुकर बाबू की बारी है..

और यह बात केवल मुझे मालूम है..

उनकी सारी बातें मैने सुनी है , क्या मुझे पुलिस को इत्तला करनी चाहिए? …

लेकिन मेरी कही बातों पर कौन यकीन करेगा और मधुरानी की ऊँची पंहुच है..

उससे पंगा लेना याने ख़ुदकुशी करने जैसा ही है"

गणेश बाबू दोबारा अख़बार में छपी खबर को बड़े गौर से पढ़ रहे थे.

"आज शाम सात बजे के आस पास संदीप राव पाटिल मधुरानी सावंत जी के बंगले से एक ज़रूरी बैठक में हिस्सा ले कर अपने गाँव लौट रहे थे. सफ़र के दौरान भोजन के लिए रात करीब आठ बजे वे रास्ते में एक ढाबे पर रुके .वहाँ उन्होने शराब पीकर भोजन किया और आगे बढ़े. सूत्रों के अनुसार सफ़र के दौरान नशे की हालत में गाड़ी चलाते हुए उनकी गाड़ी की टक्कर किसी ट्रक जैसे भारी गाड़ी से हुई, जिसमें उनकी घटनास्थल पर ही दर्दनाक मौत हो गयी. ट्रक ड्राइवर अपने ट्रक के साथ मौका-ए-वारदात से फरार है. पुलिस मामले की तहकीकात कर रही है"

गणेश बाबू दोबारा सोच में पड़ गये:

यक़ीनन यह एक बहुत बड़ी साज़िश है.... गणेश बाबू का दिमाग़ सोच सोच कर सुन्न हो गया था.

रात के करीब बारह बजे होंगे लेकिन गणेश बाबू छत पर चहल कदमी कर रहे थे. अचानक एक विचार उनके मन में आया.

पाटिल जी का कत्ल मधुरानी ने ही करवाया है और यह बात मधुरानी और मधुकर बाबू के अलावा सिर्फ़ मुझे मालूम है...

क्या इस बात का लाभ उठाया जा सकता है?....

क्यों नहीं?… यक़ीनन इस बात का फायदा उठाया जा सकता है...

मैं यह बात जानता हूँ ऐसा मान कर ही तो मधुरानी के व्यवहार में अचानक परिवर्तन आया..

बिना कुछ करे धरे मधुरानी ने नब्ज़ टटोलने के बहाने अपना हाथ मेरे हाथों मे दे दिया....

अगर मैं उसको ब्लॅकमेल करूँ तो?...

तो...तो... वह मेरी खातिर कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाएगी...
 
गणेश बाबू के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान खेलने लगी थी.

यूँ भी उसने मुझे वहाँ दोबारा आने का न्योता दिया है..

यानी की इतने दिन मैं उसकी कार्यकर्ता मक्खी था और अब उसकी नर मधुमक्खी बनने का मौका हाथ लगा है..

ले..लेकिन.. इसमे ख़तरा है...

इसमें जान भी गँवानी पड़ सकती है..

मधुरानी के मर्द की और पाटिल जी भी अपनी हवस के एवज़ में अपनी जान से हाथ धो बैठे ..

उन्हें मधुरानी की अदाएँ याद आने लगीं

उसकी वह चंचल शोख नज़र...

उसकी वह मदहोश कर देने वाली मुस्कुराहट...

उसका वह नर्म मुलायम स्पर्श.

जी करता है उसकी बाँहों में मर जाऊं....

जब एक नर मक्खी रानी मक्खी से संभोग करती है तो उसे बखूबी मालूम होता है की इसकी कीमत अपनी जान दे कर चुकानी है...

क्योंकि यूँ भी कई नर मधुमक्खियाँ इसी तरह मौत के घाट उतर चुकी होती हैं...

लेकिन केवल उस एक पल की खुशी पाने के लिए वह नर मक्खी रानी मक्खी से संभोग करने के लिए तैयार हो जाती है...

पूरी ज़िंदगी का मज़ा यदि उस एक पल में मिलता हो...

तो पूरी ज़िंदगी यूँ घुट घुट के जीने में क्या मतलब?...

यूँ भी मेरी ज़िंदगी में रखा क्या है?...

वह बेरोज़गार, बद दिमाग़ , बद तमीज़ कपूत जो मुफ़्त की रोटियाँ तोड़ता है ?...

और वह अनाड़ी झगड़ालू औरत जिसने जीना हराम कर रखा है..?

उनके लिए अपनी ज़िंदगी बर्बाद करने से तो अच्छा है की मैं अपनी जिंदगी मधुरानी के नाम कुर्बान कर दूं...

गणेश बाबू आज तड़के ही पाँच बजे उठ कर बड़े जोश में सैर पर निकल पड़े. रास्ते से गुज़रते वक्त उन्हें बगीचे में कसरत करते लोग दिखाई पड़े. वे भी बगीचे में गये और खुद भी कसरत करने लगे.

अब थोड़ा चुस्त तंदुरुस्त बनना पड़ेगा..

तोंद भी निकल आई है उसे भी कम करना पड़ेगा..

कसरत करते हुए वह जल्दी ही थक गये.

आदत नहीं हो तो ऐसा ही होगा...

कोई बात नहीं धीरे धीरे आदत हो जाएगी... उन्होने सोचा.

कसरत करते हुए उन्हें पसीना आ गया था और इसलिए सुबह की ठंडी हवा उन्हे और भी ठंडी लग रही थी.

कितना अच्छा लग रहा है ... तमाम बंधनों से आज़ाद...

लेकिन मैं कहीं ग़लत राह पर तो नही जा रहा?...

इतने साल जिसने मेरा साथ निभाया आख़िर उस बीवी को मैं कैसे छोड़ दूं?...

चाहे अब मुझे वो ज़रा भी पसंद नहीं लेकिन मैने कभी उससे प्यार किया है.....

लेकिन यह प्यार भी बड़ी अजीब चीज़ है...

जैसे किसी रेशम के कीड़े ने अपने इर्द गिर्द बनाया हुआ कवच ...

जहाँ वह सुरक्षित रहे...

लेकिन एक दिन ....जब वह रेशमी कीड़ा बाहर आता है... तो उस कवच की दाज्जियाँ उड़ा कर और फिर सारे बंधनों से आज़ाद.... इस फूल की पंखुड़ी से उस पंखुड़ी पर तितली बन उड़ता है....

उस सुबह दाढ़ी बना कर गणेश बाबू ने अपने बेटे वीनू को हुक्म सुनाया -

"जाओ जा कर अंदर से एक कटोरी ले आओ"

वीनू फटी फटी आँखों से अपने बाप को देख रहा था..

यूँ इस प्रकार उसके बाप ने कभी उसको कोई हुक्म न सुनाया था. उसने हैरत भरी निगाहों से उन पर नज़र डाली और उन्हें अनदेखा कर वह अपने काम में लग गया.लड़के ने हुक्म की तामील न की देखकर फिर उन्होने बीवी को हुक्म सुनाया -

"अरी भागवान अंदर से एक कटोरी लाओ"

थोड़ी देर गुज़र जाने पर भी जब कोई आवाज़ न हुई तो गणेश बाबू गुस्से से आग बबूला हो गये

" चीख चीख कर मेरा गला सूख गया के एक कटोरी भेज दो , बहरे हो गये क्या सब के सब?"

इसके साथ ही हुक्म की तामील हुई उनकी बीवी रसोई से भागी भागी स्टील की कटोरी लेकर आई और उनके सामने रखती हुई बड़बड़ा कर वापस जाने लगी.

" घर में कोई पुराना ब्रश है क्या" उन्होने बीवी से मुखातिब हो कर पूछा.

"ब्रश? कैसा ब्रश?"

"दाँतों का ब्रश और किसका"

"क्यों?"

"ज़्यादा सवाल मत पूछो , जो बात पूछी है उसका जवाब दो" गणेश बाबू दोबारा चिल्लाए.

"देखती हूँ मिलेगा तो ला कर दूँगी" रसोई से उनकी बीवी चीखी.

वीनू अपने बाप के सामने आ कर खड़ा हो गया और बरसा

"फिर शुरू हो गयी तुम्हारी चिल्ला चोट?"

"खामोश! बदतमीज़" गणेश बाबू उस पर बरस पड़े "बड़ों की इज़्ज़त कैसे की जाती है तेरी अम्मा ने न सिखाया तुझको ??? नालयक बड़ों से ज़बान लड़ता है?"

वीनू अपने पिता का यह रूप देख कर भौचक्का रह गया और वहाँ से चला गया

"ब्रश मिला क्या???" गणेश बाबू दुबारा चीखे

"नही मैं घर में पुरानी टूटी फूटी चीज़ें नही रखती" बीवी ने अंदर से चिल्ला कर जवाब दिया.

" फिर मैं जो ब्रश अभी इस्तेमाल करता हूँ वही ले कर आओ" गणेश बाबू ने फरमान सुनाया.

गणेश बाबू की बीवी न कुछ न कहते हुए उनका ब्रश उनके सामने ला पटका और उल्टे पाँव चली गयी.

थोड़ी देर बाद वीनू वापस अपने बाप के सामने आ पंहुचा और अपनी अम्मा को आवाज़ लगाई "अम्मा अरी ओ अम्मा "

"क्या हुआ रे नास्पीटे.. पहले तेरा बाप चिल्ला रहा था अब तू चिल्ला" अंदर से उसकी अम्मा चिल्ला कर बोली.

"अरी अम्मा जल्दी आओ ऐसे ही ... देखो देखो बापू क्या कर रहे हैं"

उसकी अम्मा तेज कदमों से चलती हुई आ कर उसके बगल में खड़ी हो गयी और जो गणेश को बाबू को देखा तो देखती ही रह गयी.

गणेश बाबू कटोरी में खिजाब लिए ब्रश से अपने सफेद बालों को रंग रहे थे.

" वाह ....क्या नज़ारा है" वीनू अपने बाप का मज़ाक उड़ाते हुए बोला.

"बुढऊ सठिया गया है....सच कहते हैं लोग , साठ साल का खूंसठ बुड्ढ़ा खुद को जवान ही समझता है" कहते हुए उनकी बीवी जाने को मुडी और पाँव पटकते हुए रसोई में गयी.

"अरी भागवान ...अभी तो सिर्फ पचास का ही हुआ हूँ ....साठ साल में अभी 10 साल बाकी हैं" गणेश बाबू अपनी मूछों को ताव देते हुए बोले.
 
बंगले के आगे गेट के सामने एक रिक्शा आ कर रुका. बालों में खिजाब लगाए गणेश बाबू खादी का कुर्ता - पयज़ामा पहने हुए नीचे उतरे. उन्होने कुर्ते की दाई जेब से पाँच का नोट निकाल कर रिक्शा वाले के हवाले किया और तेज़ कदमों से बंगले की तरफ बढ़ चले. इतने में पीछे से आवाज़ आई

"साहब"

उन्होने पलट कर देखा.

"साहब ए लीजिए एक रुपये ... किराया चार रुपये ही बनता है"

रिक्शा वाले ने एक रुपये का सिक्का देने के लिए हाथ आगे बढ़ाया.

"रहने दो" गणेश बाबू मना करते हुए बोले और बंगले के फाटक की दिशा में चल पड़े. आज वे आत्मविश्वास से लबरेज नज़र आ रहे थे .

बंगले के बरामदे में दाखिल होते हुए, आस पास जमी भीड़ को अनदेखा कर, वे सीधे बंगले में घुसे. हमेशा की तरह आज भी मधुरानी से मिलने कई लोग आए थे . बेधड़क काग़ज़ की पर्ची पर अपना नाम लिख वह पर्ची उन्होने दरवाज़े के पास बैठे चपरासी के हवाले की और अपनी बारी का इंतेजार करने लगे . हालाँकि आज एक भी कुर्सी खाली न थी लेकिन वहाँ बैठे 2-4 गाँव वालों ने उन्हें अपनी कुर्सी दे दी. गाँववाले उन्हें पहचानते न थे लेकिन शायद यह खादी के कपड़ों का ही जादू था जो आज लोग उन्हें इतनी इज़्ज़त दे रहे थे. उन्हें हर चीज़ काफ़ी बदली बदली सी लग रही थी. जल्दी ही उनका नाम पुकारा गया . अपना नाम सुनते ही वे बड़े आत्मविश्वास से दरवाज़े के अंदर दाखिल हुए . भीतर कॅबिन का दरवाज़ा धकेल कर वे अंदर आए . भीतर मधुरानी मानों उनकी ही राह देख रही थी.

"आइए गणेश" उसने मुस्कुराकर उनका स्वागत करते हुए कहा.

वे भी मुस्कुराते हुए उसके बगल में जा कर बेहिचक बैठ गये. अपने अंदर आए इस बदलाव से वह खुद हैरत में थे..

क्या एक चीज़ इंसान को इतना बदल सकती है?...

हां यक़ीनन आज वह मधुरानी के राज़ से वाकिफ़ थे ... और यही उनमें आए बदलाव की वजह थी.

कुछ पल यूँ ही चुप्पी में गुज़र गये. दोनो एकदुसरे का चेहरा पढ़ने में व्यस्त थे. आख़िरकार गणेश बाबू ने अपना मुँह खोला:

" पाटिल जी के बारे में जान कर बड़ा अफ़सोस हुआ..."

मधुरानी अपनी नज़रें चुराती हुई बोली " हाँ .. बहुत बुरा हुआ उनके साथ"

गणेश बाबू ने महसूस किया की वह आज नज़रें चुरा रही है .

"उनका लड़का भी सयाना है?" गणेश बाबू ने आगे कहा.

"हाँ अब पिता के बाद उसी के कंधों पर ज़िम्मेदारी आ पड़ी है" मधुरानी बोली

"सोचता हूँ उससे एक बार मिल लूँ" मधुरानी सुन कर चौंक उठी.

"म..मेरा मतलब है..उस से मिल कर उसका ढाँढस बँधाऊं" गणेश बाबू का तीर ठीक निशाने पर जा लगा था...

मधुरानी उनका मतलब जान गयी थी, बात बदलते हुए वह बोली

"चलिए न गणेश ज़रा उपर चल कर आरामसे बैठ कर बतियाते हैं.. सुबह से कई लोगों से मिल कर उकता गयी हूँ"

गणेश बाबू की बाँछें खिल गयी लेकिन इतमीनान से बोले:

"चलिए"

चलते चलते उन्होने मधुरानी की आँखों में देखा लेकिन शायद आज पहली बार वह बड़ी हिम्मत से उसकी आँखों में झाँक रहे थे. वह अब आगे आगे चलने लगी और गणेश बाबू उसके पीछे पीछे , वह सीधा दूसरी मंज़िल पर अपने शयनकक्ष में उनको ले गयी. उनके मन में लड्डू फुट रहे थे , इस पल का न जाने उन्हे कब से इंतेज़ार था. वह कमरे में दाखिल हुए. उन्होने देखा पूरा कमरा कीमती चीज़ों से सज़ा हुआ था . इतनी कीमती चीज़ें गणेश बाबू अपनी ज़िंदगी में पहली बार देख रहे थे . उन्होने मधुरानी का हाथ अपने हाथों में कस कर पकड़ लिया और अचानक ही उसे अपनी बाहों में भींच लिया . ना जाने आज उनमें इतना हौसला कहाँ से आ गया था. मधुरानी ने भी कोई विरोध नहीं किया मानों उनकी बाहों में आने के लिए वह मचल रही थी. और फिर दोनो एक दूसरे की बाँहों में खो गये.

धीरे धीरे गणेश बाबू का मधुरानी के बंगले पर आना जाना काफ़ी बढ़ गया था. उनका लिबास भी अब बदल गया था. वे हरदम खादी के कपड़ों में नज़र आते - ठीक किसी नेता के जैसे. रोज़ाना सुबह कसरत करने से वह चुस्त लगने लगे थे. घर पर भी उनकी पूछ बढ़ गयी थी. बेटा नौकरी दिलाने से खुश था तो बीवी इस बात से खुश थी की बुढ़ापे में ही सही पर देर आए दुरुस्त आए. मधुरानी की पंहुच से उनका तबादला रुक गया था और तो और आफ़िस में उनके वरिष्ठ सहकर्मी भी उनसे आदर से पेश आने लगे. अपने काम कराने के लिए वे गणेश बाबू के ज़रिए जुगाड़ लगवाते.

अब गणेश बाबू की गिनती मधुरानी के करीबी लोगों में होती थी. इसलिए रात दिन उनका उठना बैठना बंगले पर ही होता. कई कई दिन तो वह वहीं ठहर जाते. अब उन्हें उसकी बातें पता चलने लगी थी , काम के बहाने दौरे पर मधुरानी और मधुकर बाबू अक्सर शहर से बाहर जाया करते और रात किसी फार्म हाउस पर साथ बिताया करते. इस एक बात को छोड़ वह मधुरानी से बड़े प्रभावित थे. वे सोचा करते की उनके भी दिन आएँगे. उन्हें इसका ज़्यादा इंतेजार नहीं करना पड़ा. जल्दी ही वह वक्त भी आया कि जब मधुकर बाबू शहर से बाहर होते तो गणेश बाबू मधुरानी के साथ हम बिस्तर होते . कहावत है चपरासी के कान उपर के बयासी और नीचे के तिरासी.... और ऐसी बातें भला छुपती कहाँ हैं ? इस कान से उस कान होते हुए आख़िरकार इस बात की भनक मधुकर बाबू को हो ही गयी ...

एक दिन बिना किसी बात के मधुकर बाबू ने गणेश बाबू से झगड़ा मोल लिया और बात बढ़ते बढ़ते अछे खासे बखेडे में तब्दील हो गयी. अपने गणेश बाबू डरने वालों में से न थे उन्होने भी मधुकर बाबू को खूब हड़काया और उनके हर हमले का मुँहतोड़ जवाब दिया. हार कर मधुकर बाबू को पीछे हटना पड़ा. लेकिन इस खेल में गणेश बाबू अनाड़ी न थे. वे इस बात से अंजान न थे कि राजनीति में बंदा चार कदम आगे बढ़ने के लिए ही दो कदम पीछे हटता है . इन्ही मधुकर बाबू ने पाटिल जी के साथ जो किया उसके मद्देनज़र गणेश बाबू पर ख़तरा बढ़ गया था. अब गणेश बाबू को अहसास हुआ की नर मक्खी की ज़िंदगी कितनी कठिन होती है. उन्हें कदम कदम पर ख़तरे का अहसास होने लगा था. लेकिन वह इस सब से बिल्कुल न घबराते थे. डर को उन्होने तभी मात दे दी थी जब उन्होने मधुरानी का उस दिन शयनकक्ष में हाथ पकड़ा था.

एक दिन गणेश बाबू की मुलाकात बंगले पर किसी पुराने परिचित से हुई , हालाँकि गणेश बाबू ने उन्हें पहचाना न था. वहीं आदमी उनको पहचान कर करीब आया .

उसने कहा "नमस्ते गणेश बाबू...पहचाना?"

"जी ज़रूर ज़रूर.." गणेश बाबू अपनी याददाश्त पर ज़ोर डालते बोले .

बीते सालों में नौकरी के चलते कई लोगों से उनकी पहचान हुई थी सबका नाम थोड़े ही न याद रखते ? और अब तो बतौर कार्यकर्ता कई लोगों से रोज़ाना मिलना होता ऐसे में उनसे हंस बोल कर न मिलना भारी अशिष्टता होती.

वह आदमी हंस कर बोला " क्या गणेश बाबू आप तो छुपे रुस्तम निकले .....क्या उड़ान भरी है आपने यहाँ ... हमारी जिंदगी बतौर ग्रामसेवक गाँव के गाँव में गुज़र गयी"

अब कहीं जा कर गणेश बाबू के दिमाग़ की बत्ती जली . यह खराडे साहब थे जिन्होने उजनी गाँव का चार्ज गणेश बाबू को दिया था .

" मैने सोचा समाजसेवा में भी हाथ आज़मा लिए जाए" गणेश बाबू झेंप कर बोले.

" अरे बाबू जी वह बातें भी सबके किस्मत में कहाँ लिखी रहती है... वहाँ आफ़िस में मुझे पता चला आजकल आपके बड़े ठाठ हैं ....आफिसर लोग भी आपके नाम से ख़ौफ़ खाते हैं"

"आप जैसों की दुआ है बस" गणेश बाबू बोले.

"गणेश बाबू एक काम था आपसे" खराडे साहब बोले.

गणेश बाबू सावधान हो गये.

अच्छा तो जनाब इसलिए इधर का रास्ता भूले हैं...

"अजी बोलिए हमारे बस में होगा तो हम ज़रूर करेंगे" गणेश बाबू बोले.

" वह मामला ज़रा तबादले का था" खराडे साहब बोले.

"उसके अलावा कुछ और कहिए आजकल जिसे देखो वही तालुके के आस पास की जगह तबादले की सिफारिश करने आता है..सब लोग आएँगे तो फिर बात कैसे बनेगी..?" गणेश बाबू बोले.

"नही साहब मुझे तालुके के पास नहीं गाँव में तबादला चाहिए" खराडे साहब बोले.

गणेश बाबू चौंक कर बोले "गाँव में?" "सब तहसील या तालुके में तबादला चाहते हैं आप पहले आदमी होंगें जिसे गाँवमें तबादला चाहिए"

" हाँ साहब मुझे उजनी गाँवमें तबादला चाहिए.. वह मेरे गांवके करीब पड़ता है न" खराडे साहब समझाते बोले.

"अच्छा.. अच्छा... आजकल वहाँ कौन हैं" गणेश बाबू ने पूछा.

" हैं कोई साहब..देशमुख नाम है उनका" खराडे साहब बोले.

"क्या उन्हें वहाँ से तबादला चाहिए" गणेश बाबू ने सवाल किया.

"पता नही?"

"क्या साहब...पहले पता तो कर लीजिए , आपसी समझ से काम बनता हो तो यहाँ आपको एडीया घिसनी न पड़ेगी" गणेश बाबू बोले.

"मुझे खबर लगी थी कि देशमुख साहब का गाँव भी उजनी के करीब ही है.. लिहाज़ा वह वहाँ से हटने को तैयार न होंगे" खराडे साहब बोल पड़े.

"आख़िर बात बाहर आ ही गयी न... वह कहते हैं न की बैद्य और नेता से कोई बात छुपाना न चाहिए" गणेश बाबू उलाहना देते बोले.

" नही साहब वह बात नहीं...मैने सुना था उन्होने भी पाटिल साहब के ज़रिए जुगाड़ लगाई थी"

"पाटिल जी की जुगाड़?....उनकी जुगाड़ तो उपर लग गयी" गणेश ने मज़ाक में कहा.

"लेकिन वे मंत्री जी के ख़ास आदमी थे"

"उसकी आप परवाह मत करो.." गणेश बाबू बोले " और पूरी जानकारी एक काग़ज़ पर लिखकर मुझे दे दें ... मैं आपका काम करवाता हूँ"

"मतलब..? मंत्री जी से मिलने की ज़रूरत नहीं?" खराडे साहब बोले.

"आपको मुझ पर भरोसा नही तो उनसे जा कर मिलिए" गणेश बाबू सख्ती से बोले.

"न.. नहीं बाबू जी वह बात ना है..." खराडे साहब किसी पालतू कुत्ते की तरह पुंछ हिलाते गणेश बाबू के पीछे पीछे चलने लगे.

शाम के सात बजे थे . मधुरानी बालकनी में बैठ कर आराम फर्मा रही थी. तभी एक कार्यकर्ता उसके करीब आ खड़ा हुआ.

"क्या बात है" उसने पूछा.

"जी नीचे एक आदमी आपसे मिलना चाहता है " जवाब आया.

"मिलने का वक्त ख़त्म हो गया है.. और इस वक्त मैं किसी से नहीं मिलती" मधुरानी बोली.

"लेकिन वह जाने को तैयार नही है ...बहस कर रहा है...और तो और हाथा-पाई पर उतर आया है... माफ़ करिएगा बीबीजी लेकिन बस आपके नाम की रट लगाए हुए है .. मुझे मधी से मिलना है..मधी से मिलना है..." कार्यकर्ता ने कहा.

"मधी" यह नाम सुनकर वह मानो बीते दिनो में चली गयी. बहुत पहले उसे इस नाम से एक ही आदमी पुकारा करता था ...जब उसने जवानी में कदम रखा ही था. उसका अतीत उसकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह सरकता चला गया. ...
 
मधुरानी को अपने आप में खोया देख , कार्यकर्ता वहाँ से जाने को हुआ तभी उसे पीछे से मधुरानी की आवाज़ सुनाई दी.

"ठहरो"

वह रुक गया.

"उसे उपर भेज दो" उसने हुक्म सुनाया.

"जी अच्छा" कार्यकर्ता ने जवाब दिया और वह सीढ़ियाँ उतरने लगा.

मधुरानी को कुछ देर बाद पदचाप सुनाई दी, उसकी पीठ दरवाजे तरफ भले ही थी, वह अपना ध्यान दरवाज़े के तरफ ही लगाए थी . आने वाला उसके एकदम करीब आ खड़ा हुआ उसके सारे बदन पर मानो रोंगटे खड़े हो गये .

"मधी.." उसे आवाज़ सुनाई दी.

वही आवाज़ और वही कशिश....

उसने पलट कर देखा . उसके सामने उसका पहला और आखरी प्यार शंकर खड़ा था. समय के साथ उसका चेहरा- मोहरा बदल गया था ..कमज़ोर लग रहा था. इतनी देर खड़े होने से शायद वह थक गया था इसलिए कुर्सी पर बैठ गया .

"शंकर.." मधुरानी के होंठ बोल पड़े " और उसका अतीत उसकी आँखों के सामने आता गया.

....उनका वह कच्ची उमर का पहला प्यार...

....उसे याद आया वह वाक़या जब उसने शंकर को यह बताया की वह उसके बच्चे की माँ बनने वाली है...

....इसके बाद उसका गाँव से गायब हो जाना ...और उसका टकटकी लगाए उसकी राह देखना ...

.... जब उसके बापू को यह बात पता चली तो उसने उसके बालों का झोंटा पकड़ कर बेदर्दी से पीटना ...

...बापू ने कहीं से पैसों का इंतेजाम कर उसे शहर ले जा कर उसका गर्भपात कराया..

...गर्भपात कराने के खबर समाज में पता चलते ही लोगों का उससे नज़रें चुराना और पीठ पीछे बुराई करना.

....हार कर बापू ने उसका ब्याह उजनी गाँव के किसी दुकानदार से तय कर दिया.

.... उसकी वह पहली रात .. सुहागरात पति के साथ अंधेरे में मनाई ...और दिन के उजाले में उसने देखा जिसके साथ उसने रात बिताई वह उसका पति न हो कर गाँव के पाटिल बाबू थे...

....और फिर कई बार पाटिल का उसके साथ उसी के घर पर रातें गुज़ारना...

....उसका पति उसे छूता भी न था , शायद इसकी उसे इजाज़त न थी और फिर उसने अपने पति को अपनी पहली नर मधुमक्खी बनाने का प्रसंग ..

उसने अपने पति को अपनी मादक अदाओं से उकसाया.. फिर जब उसका पति उसके साथ संभोग कर रहा था तो पाटिल का वहाँ आना और आग-बबूला हो कर उसे जान से मार डालना...

.

...बाद में पाटिल ने उसकी लाश गाँव से दूर ले जा कर बीच रास्ते में फेंक दी और पुलिस के सामने यह कहलवाया कि शराब के नशे में वह उसकी जीप के नीचे आ गया ,और फिर पाटिल का मामले से बाइज़्ज़त बरी होना.

अतीत की भूली बिसरी यादें मानो किसी फिल्म के भाँति उसकी आँखों के सामने एक-एक कर गुज़र गयीं.

शंकर यूँ ही कुछ पल कुर्सी पर बैठा और एकदम उठ कर माधुरानी के पैरों में गिर पड़ा

"हमका माफ़ कर दे मधु ....मधु हमका माफ़ कर द्यो ....हम इसी जनम में अपने कु-कर्मों का फल भुगत रहा हूँ ....जब से गाँव छोड़ा तब से हम दर - दर की ठोकरें खा बेघर आवारा इधर-उधर घूम रहा हूँ ....आज चार दिन हो गये पेट में एक दाना तक न गया"

माधुरानी के मन में उसके प्रति सारी भावनाएँ बीती घटना के साथ ही मर गयीं थी , तब से ले कर आजतक उसने कभी भी अपने जज्बादोंके के आगे घुटने न टेके थे . शायद इस घटना से उसने यही सीख ली थी. मधुरानी ने उसके कंधो को सहारा दे कर उपर उठाया. उसने महसूस किया उसके कंधो पर हाथ रखते ही जसबादों को काबू कर पाना मुश्किल हो रहा था.. और फिर जज्बादोंका जो उफान आया, उसने उसे अपनी बाँहों में भर लिया.शायद वह उन अतीत के लम्हों को दोबारा जीना चाहती थी. जो उस घटना के बाद वह कभी जी न सकी थी.

लेकिन उसे एहसास हुआ की यूँ भावनाओं में बहना ठीक नहीं . यह भावनाएँ ही थी जो उसे कमज़ोर बना रही थी. लेकिन तरक्की की सीढ़ी चढ़ती हुई वह अगर आज इस मकाम पर आ पंहुची थी तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी की उसने अपनी भावनाओं को काबू में रखा और उन्हें कभी खुद पर हावी न होने दिया. यहाँ जजबादों में बहने की कोई गुंजाइश न थी और ना किसी कमज़ोरी की. उस से परे हट उसके कंधे को सहारा देते हुए वह उसे शयनकक्ष में ले जाने लगी. उसने फ़ैसला कर लिया था उसे कमज़ोरी का एहसास दिलाने वाले ज़स्बादों का आज वह गला ही घोंट देगी.

पौ फटने में देर थी. तड़के अंधेरे में माधुरानी के बंगले के परिसर में पुलिस की जीप और एक एंबुलेंस आकर रुकी. पुलिस की जीप में से एक महिला इनस्पेक्टर और कुछ हवालदार उतरे और सीधे बंगले में प्रवेश कर गये. वह दूसरी मंज़िल तक आ पंहुचे. अंदर हाल में माधुरानी बैठी उनकी राह देख रही थी. माधुरानी ने कीमती मखमली गाऊन पहना था. इनस्पेक्टर और हवलदार के आते ही वह उठ खड़ी हुई और उन्हें अपने शयनकक्ष में ले गयी. वहाँ का नज़ारा देख कर उन पुलिसवालों के रोंगटे खड़े हो गये. बिस्तर पर शंकर नग्न अवस्था में पेट के बल ऐसे लेटा था जैसे किसी हवस के भूखे वहशी दरिंदे ने उसके साथ पूरी रात ज़ोर ज़बरदस्ती की हो.

हवालदार ने शंकर के पास जा कर उसकी नब्ज़ जाँची , साँसे चल रहीं थी . हवलदार ने उसे पकड़ कर बिस्तर पर सीधा करने की कोशिश की तो वह दर्द से चिल्ला पड़ा .

"क्या हुआ इन्हें?" इनस्पेक्टर बोल पड़ी

"कुछ नही..कुछ नही...इनसे हमारी पुरानी पहचान है..कल जब ये आए तो इनकी तबीयत अचानक बिगड़ गयी , हमने इनसे कहा कि आज की रात यहीं ठहर जाएँ ..लेकिन आज सुबह जब देखा तो यह यहाँ इस हाल में मिले" माधुरानी ने जवाब दिया.

महिला इनस्पेक्टर माजरा समझ गयी और हवलदारों की मदद से उसे उठा कर अपने साथ नीचे ले जाने लगी. वह सीढ़ियों तक पंहुचे ही थे की माधुरानी ने आवाज़ दी

"इनस्पेक्टर साहिबा..."

महिला इनस्पेक्टर ने माधुरानी की ओर देखा और उनका इशारा समझ कर हवलदारों से कहा

"आप आगे बढ़िए ..मैं पीछे से आती हूँ" उन लोगों के नज़रों से ओझल होते ही माधुरानी उससे बोली

"बैठिए.."

दोनो आमने -सामने सोफे पर बैठ गये.

"सब ठीक तो है ना ?" माधुरानी ने उसकी आँखों में आँखें डाल कर पूछा.

"जी मॅडम" महिला इनस्पेक्टर ने जवाब दिया.

.

"तुम्हारा प्रमोशन इस साल ड्यू है?" माधुराने ने यूँ ही पूछ लिया.

"नहीं..अगले साल" उसने जवाब दिया.

"अच्छा..." माधुरानी बोली.

"ठीक है...इनको तुरंत किसी सरकारी हस्पताल में भर्ती करवाईए ...और इस बात का ख्याल रखिए क़ि मेरा नाम इसमे कहीं न आ पाए" माधुरानी ने हुक्म सुनाया.

"जी मॅडम..." महिला इनस्पेक्टर ने जवाब दिया.

"आप जानती हैं ..यह मीडीया वाले आज कल हम नेताओं के पीछे कैसे हाथ धो कर पड़े रहते हैं...निजी बातों को भी खबरें बना कर चटखारे ले ले कर जनता के सामने परोसते हैं ...फिर चाहे उनकी बात सरासर झूठी क्यों न हो" माधुरानी बोली.

"जी हाँ मॅडम...आपकी बात सही है " महिला इनस्पेक्टर ने कहा.

अब तक माधुरानी ने उससे बतियाते उसके हाव भाव से यह अंदाज़ा लगा लिया था कि वह राज़ कायम रख सकती है...वह उठ कर खड़ी हो गयी. उसके सामने बैठी महिला इनस्पेक्टर भी उठ कर खड़ी हो कर सीढ़ियों की तरफ जाते बोली

"ठीक है मॅडम...आप फ़िक्र न करें..मैं संभाल लूँगी"

उस दिन के बाद चार पाच दिन ही गुजर गए होंगे. मधुरानी अपनी पार्टी मीटिंग में व्यस्त थी . तभी मधूराणीका एक सहायक उसके कान में आकर खुस्फुसाया -

'' मॅडम आपके लिए . सरकारी अस्पताल से शिंदेंमॅडम का फोन है ...''

'' किसलिए ?...'' मधूराणी..

'' वह उस दिन भरती किया हुवा आदमी ... अभी अभी गुजर गया ... वह बोल रही थी ... '' वह सहाय्यक फिरसे उसके कान के पास फिर से धीरेसे खुस्फुसाया.

'' उसे कहना ...मै एक महत्वपूर्ण मीटिंग में हु ... और फिरसे इस सिलसिलेमे मुझे किसीकाभी फोन नहीं आना चाहिए ... ऐसे बता दो उसे '' मधूराणीने आदेश दिया .

'' जी मॅडम'' उसका सहाय्यक वहासे हटकर फोनकी तरफ चला गया .

चुनावों की घोषणा हो गयी थी और अब चुनावों की तारीख अधिक दूर न थी. लिहाज़ा चुनाव प्रचार का दौर शुरू हो गया था. इसी के चलते आज माधुरानी की चुनावी सभा का शहर में आयोजन था. चार पाँच लाख के करीब जनता आने वाली थी . माधुरानी ने मंच की व्यवस्था और मेहमानों की सुरक्षा का जिम्मा अपने नज़दीकी सहकारियों को सौंप रखा था . माधुरानी का चुनावी मॅनेज्मेंट बढ़िया था .. गणेश बाबू ने भी इस बात को कई दफे महसूस किया. माधुरानी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी गणेश बाबू के कंधो पर आन पड़ी थी. यूँ तो सुरक्षा में पुलिस लगी हुई थी लेकिन गणेश बाबू को उनके संपर्क में रह कर पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर नज़र रखनी थी . मधुकर बाबू जनता को लाने ले जाने का जिम्मा निभा रहे थे. उन्होने आस पास के गाँवों से जनता को लाने के लिए बस - ट्रक लगा रखे थे. गाँववाले भी खुश थे की मुफ़्त में तालुके की सैर कर आएँ.

सभा आमराई में रखी गयी थी असल में वहाँ एक बड़ा सा मैदान था . अभी वहा आम के बस दो चार पेड़ ही बचे होंगे , लेकिन किसी जमाने में वहाँ आम के पेड़ों का बगीचा था इसलिए लोग उस मैदान को आमराई के नाम से पुकारते थे. सभा का समय दोपहर का तय होने के कारण लाइटिंग करने का सवाल ही न था. मंच का काम जिन कार्यकर्ताओं को सौंपा गया था वे मंच खड़ा करते हुए देख रहे थे.

धीरे-धीरे लोगों की भीड़ वहाँ इकट्ठा होनी शुरू हुई . आस पास के गाँवों से ट्रक और बस भर-भर के लोग लाये जा रहे थे. शहर के लोग भी आना शुरू हो गये लेकिन उनकी संख्या मामूली थी. मंच पर लाउड स्पीकर की टेस्टिंग चल रही थी वे लोग माइक पर कुछ बड़बड़ा रहे थे. गाँव वाले लोग चारों तरफ इस नज़ारे का लुत्फ़ उठा रहे थे. इतनेमे एक आलीशान कार आ कर रुकी उसमें से गणेश बाबू , मधुकर बाबू और माधुरानी के अन्य नज़दीकी कार्यकर्ता उतरे.

मधुकर बाबू ने इधर-उधर देखते हुए कार्यकर्ताओं से पूछा :

"सब ठीक है न?"

पूछ कर तसल्ली कर ली और कार में बैठ कर चले गये. शायद अगली बार वह माधुरानी को ले कर वहाँ आने वाले थे.

पुलिस वालों की टुकड़ियाँ भीड़ में इधर उधर बिखर गयी . गणेश बाबू के ज़िम्मे अब बस एक ही काम बचा था - वह था उनके तले काम करने वाले लगभग सौ कार्यकर्ताओं को मंच के इर्द गिर्द फैलाना. जनता की सुरक्षा का जिम्मा पुलिस का था गणेश बाबू का नहीं . और माधुरानी की सुरक्षा में जो पुलिस वाले लगे थे उनके साथ साथ गणेश बाबू और उनके कार्यकर्ता तैनात थे.
 
उजनी गाँव के लोग जब ट्रक से आने लगे तो गणेश बाबू का ध्यान उस तरफ गया. उनमें से कई लोग गणेश बाबू के जान पहचान वाले निकले. गणेश बाबू उनसे मिलने उस ओर गये. गणेश बाबू की मुलाकात सदा से हुई. सदा से मिल कर उन्हें पुरानी बात याद आ गयी, जब उसने नशे में धुत्त हो कर उन्हें माँ-बहन की गालियाँ दी थीं. वह हंस पड़े. सदा दुबला पतला और बूढ़ा हो गया था. यूँ तो वह गणेश बाबू से उम्र में एक दो साल ही बड़ा होगा.

"क्यों सदा भाई क्या हाल चाल?" गणेश बाबू ने पूछा.

वह गणेश बाबू की ओर अचंभे से देखने लगा.

"गणेश बाबू?" वह खुशी से चहका.

"क्या तबीयत नासाज़ है?" गणेश बाबू ने उसकी ओर देखते कहा.

"आप भी बदल गये हैं बाबू जी...अच्छी सेहत बना ली है आपने...और ई का ? नेता-वेता बन गये हो का? " उसने कहा.

"और..? शराब पीना छोड़ दिया क्या?" गणेश बाबू ने मज़ाक मज़ाक में पूछा.

उसके चेहरे से सारी खुशी काफूर हो गयी.

"अब तो ऐसा लागे है की ई जिंदगी के साथ ही शराब छूटेगी" वह निराश हो कर बोला.

गणेश बाबू को यह सुनकर बुरा लगा.

"और कौन कौन आया है गाँव से?" उन्होने ट्रक से उतरते लोगों को देखकर कहा.

"कई लोग आए हैं बाबू जी.. हम सुने हैं और एक ट्रक आएगा लोगों को ले कर"

"सरपंच जी आएँगे क्या?" गणेश बाबू ने पूछा.

यह सुन उसके चेहरे की रंगत बदल गयी.

"सरपंच जी पाँच-छ: साल पहले गुज़र गये" उसने उदासी से कहा.

"कैसे?" गणेश बाबू आश्चर्य से कह उठे.

"उम्र हो चली थी...खैर चल बसे ई एक तरह से अच्छा ही हुआ....बहुत परेशानी में दिन काटे उन्होने...आँखों से उनको दिखता न था...पैरों ने साथ छोड़ दिया था...शौच इत्यादि भी वहीं के वहीं करते थे...बच्चों ने मुँह फेर लिया...अंतिम दिनो में हम ही उनकी देख रेख किए ...उ सरपंच जी ने हमका सीलिंग की ज़मीन बहाल की थी...उनके बच्चे उनको भूल सकते हैं हम कभी न भूलेंगे... उ सरपंच किसी को भी ज़मीन दे सकता था लेकिन उनने हमको ही दी.." सदा रुआंसा हो गया था.

गणेश बाबू को पहली बार उसकी शख्सियत के इस पहलू के दर्शन हो रहे थे. वे बड़े आदर से उसे देख रहे थे.

तभी गणेश बाबू के पैरों में कोई गिर पड़ा.

"राम.. राम साहब जी"

यह उनके उजनी के दिनों में साथ काम करने वाला आफ़िस का पांडु चपरासी था.

"अरे पांडु भैया... कैसे हो?" गणेश बाबू ने पूछा.

भले ही पांडु समय के साथ बूढ़ा और कमज़ोर हो चला था लेकिन इसके बावजूद उसने अपनी चापलूसी करने का स्वभाव न छोड़ा था.

"अब कौन ग्राम सेवक है?" गणेश बाबू ने पूछा

"अब कुछ पता न है साहब जी...आप जब से गये तब से काम में मज़ा न आता था..नये साहब खुद ही सारा पैसा लेते थे फिर हमारी शादी हो गयी और मैने नौकरी छोड़ दी...अब मेरा बीजों का कारोबार है गार्ड साहब की मदद से.

"बढ़िया है...मतलब हँसी खुशी से गुज़र रही है तुम्हारी ज़िंदगी" गणेश बाबू बोले.

"हाँ वैसे बढ़िया ही है ....लेकिन आपके समय गाँव में जो बातें थी अब ना हैं"

पूरा मैदान लोगों से खचाखच भरा हुआ था , कहीं पैर रखने की जगह न थी. अब तो बस मधुरानी की राह देखी जा रही थी. तयशुदा समय से 1 घंटे से उपर हो चुके थे ...दो-तीन बार उसके आने की अफवाह उड़ती तो कार्यकर्ता सक्रियता दिखाते ...या अफवाह उड़ाने का काम शायद कोई जान बूझ कर करता था. जो नेता जितनी देर से चुनावी सभा में आएगा उतनी ही बेसब्री से उसकी राह देखी जाएगी..वरना वहाँ इकट्ठा हुए लोग बेवजह हल्ला न मचाएँ .

तभी गणेश को दूसरे ट्रक से उतरते हुए उजनी गाँव के लोग दिखाई दिए. यह ट्रक देर से आया था क्योंकि अब तक सभा शुरू होने का वक्त हो चला था. वैसे भी गणेश बाबू का काम ख़त्म हो चला था . अब बस मधुरानी के आने का इंतेज़ार हो रहा था. वे उन लोगों के करीब गये. उनकी बबन मेकॅनिक से मुलाकात हुई जो उजनी में मोटर, पंखे और पंप सुधारा करता था. अब भी वह गाँव में वही काम कर रहा था . गाँव के लोग जिसे पगला कह कर बुलाता थे वह भी मिला . वाकई वह पगला ही था. सब लोग आपस में बैठ कर यही चर्चा कर रहे थे कि सभा कब शुरू होगी...उसी भीड़ में उन्हें माधुरानी के खेत संभालने वाले संभाज़िराव भी दिखाई दिए लेकिन वह वहाँ से खिसक गया . मारुति टेलर भी मिला लेकिन उससे कोई बात न हुई. गाँव के महड़ू , लोहा सिंह , भोला वग़ैरह दिखाई दिए जिनके साथ कभी वह क्रिकेट खेला करता था . उनसे मिल कर पता चला अब उनके बाल-बच्चे क्रिकेट खेला करते है . गाँव के नौजवान पहले ही सभा में आ चुके थे. उनका माधुरानी से क्रिकेट किट माँगने का इरादा था . उनसे बातें हुईं तो पता चला पिछले चुनाव में माधुरानी ने उनको क्रिकेट किट दिलाई थी . माधुरानी की यह बात अच्छी थी . बच्चों को क्रिकेट कीट दिलाई तो सारा गाँव खुश. दो तीन लड़के दिखाई दिए गणेश ने पूछा तो पता चला वे बॅंडू होटेल वाले के लड़के थे. माँ बाप अब भी वहाँ होटेल चलाते थे और यह आवारा गर्दी करते फिरते थे. कोई उनकी बुराई कर रहा था..उन लड़कों में एक 15-16 साल का लड़का भी था ... वह गूंगे का बेटा था. गणेश बाबू को गूंगे और गूंगी की याद हो आई.

गूंगी का आगे क्या हुआ..?

उसका ब्याह हुआ या नही?...

वह यह सब गाँव वालों से पूछने ही वाले थे कि उनके कार्यकर्ता ने उनके पास आ कर कान में फुसफुसाते हुए खबर दी "आज सभा में कुछ गड़बड़ी होने का अंदेशा है...मधुकर बाबू ने सतर्क रहने को कहा है.."

आख़िरकार माधुरानी की गाड़ी और उसकी गाड़ी के सामने सायरन बजाती हुई पुलिस की गाड़ी वहाँ आ खड़ी हुई. पूरी भीड़ में उत्साह की लहर दौड़ गयी. सब लोग उचक-उचक कर माधुरानी को देखना चाह रहे थे. मंच पर जाते समय कई लोगों ने वहाँ जा कर माधुरानी के गले में फूलों के हार पहनाए. किसको माला पहनाने का मौका देना है और किसको नहीं यह तय करने का काम गणेश बाबू का था सो उन्होने अच्छी तरह निभा दीया था . हार पहनाते समय कोई गड़बड़ न हुई थी.

जिनको हार पहनाने के लिए चुना गया था उनको गणेश बाबू और उनके आदमियों ने मंच के पास ही जहाँ से माधुरानी गुज़रने वाली थी वहाँ खड़ा कर दिया था . लोगों से फूल मालाएँ स्वीकार कर माधुरानी उसे लोगों की भीड़ में उछाल रही थी. लोग उसे पाने के लिए हो हल्ला मचाने लगे.

फिर भाषण शुरू हुआ. माधुरानी के साथ आए मंच पर बैठे नेता एक-एक कर भाषण झाड़ रहे थे. उन्हें यह अच्छा मौका मिला था . भाषण के दौरान किसी वाक्य पर माधुरानी के आदमी तालियाँ बजाते थे.उनकी देखा देखी जनता भी तालियाँ बजाती थी. उन कार्यकर्ताओं की मानों यह ज़िम्मेदारी थी और वे बीच बीच में इसी तरह तालियाँ जब बजाते तो जनता भी उनका साथ देती. भाषण पर भाषण हो रहे थे. माधुरानी का भाषण सब से आखरी में होना था.

गणेश बाबू को उन उकताऊ भाषण को सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्होने जमुहाई लेते हुई आस पास नज़रें दौड़ाई , एक कोने में उन्हें एक बूढ़ा बैठा हुआ दिखाई दिया. वह बूढ़ा उन्हें जाना पहचाना लग रहा था. उन्होने याददाश्त पर ज़ोर डाला लेकिन उन्हें याद न आया. उस आदमी का ध्यान भी उनकी ओर गया लेकिन उसने झटसे अपनी नज़रें दूसरी ओर फेर लीं. गणेश बाबू चलकर उस आदमी के पास गये. उस आदमी ने चोर निगाहों से उन्हें अपने पास आते हुए देखा. गणेश बाबू उसके बगल में आ कर बोले "आपको पहले भी कहीं देखा हुआ सा लग रहा है?"

"आप गणेश बाबू हैं ना?" उसने पूछा.

"हाँ लेकिन माफ़ कीजिए मैने आपको पहचाना नहीं"

"हम उजनी गाँव से आए हैं" उनको याद आया की यह तो गूंगी का बाप है ...पांडुरंग? ना ना .. पांडुरंग तो गूंगे का बापू था यह शायद रघुजी होंगे...

"हां..हां... याद आया" गणेश बाबू फट से बोल पड़े "सब कुशल मंगल है?"

"हां सब ठीक ही है..दो वखत की रोटी मिल जात है...और हम जैसे ग़रीब आदमी अधिक क्या चाहे?" उसने जवाब दिया.
 
गणेश बाबू को जो बात जानना चाह रहे वह उसके दिए हुए जवाब से जान न पाए थे. वे और खुल कर बोले

"आपकी बेटी कैसी है?"

"बेटी?" उसने सवालिया निगाहों से पूछा.

"मेरा मतलब...आपकी गूंगी से है" गणेश बाबू ने साफ कहा .

गणेश बाबू को गूंगी का नाम मालूम न था यूँ भी सारा गाँव उसे गूंगी कह कर ही पुकारता था. रघुजी ने अपनी नज़रे चुरा लीं और मंच की ओर देखने लगे. शायद वह अपनी भावनाएँ छुपाने की कोशिश कर रहे थे. गणेश बाबू ने सोचा

कहीं मैने ग़लत बात तो न कह दी...बेकार में दिल दुखा दिया...

"माफ़ करिएगा...मुझे कुछ पता न था इसलिए ऐसे ही पूछ लिया" गणेश बाबू रघुजी के कंधे पर हाथ रखते बोले.

उसने दोबारा पलट कर गणेश बाबू की ओर देखा इस बार उसकी आँखें भर आईं थी. वह मंच की ओर देखते बोला " साहब उसकी किस्मत ही फूटी थी..."

"क्यों क्या हुआ" गणेश बाबू ने पूछा.

"उस हरामजादे गूंगे के ब्याह के बाद हम लोगन ने उसके लिए दूसरा लड़का पसंद किया था..." बोलते वक्त उसकी आवाज़ भर्रा गयी थी. गूंगी का बाप बोलते समय थोड़ा रुका. गणेश बाबू भी कहानी जानना चाह रहे थे.

"उसका ब्याह भी तय हो गया था....हमने खेती बाड़ी बेच कर दहेज की रकम भी खड़ी कर ली थी...लेकिन" वह बोला.

गणेश बाबू के दिमाग़ में तरह तरह के विचार आने लगे थे .

लेकिन..? लेकिन..क्या हुआ? उस लड़के ने भी गूंगी को नकार दिया क्या?… गणेश बाबू ने सोचा

"लेकिन जैसे ही बेटी को पता चला उसने खाना पीना छोड़ दिया...15 दिन से उसने कुछ न खाया पिया..ब्याह के ठीक एक दिन पहले वह चल बसी... हमको छोड़ कर चली गयी...." वह बूढ़ा अपनी आँखों के आँसू पोंछते हुए बोला.

"क्या????" गणेश बाबू चौंक कर बोले..आगे उस बूढ़े से और सवाल पूछने की उनमें कोई हिम्मत न थी. वह बूढ़ा अब मंच की ओर देख रहा था अपनी बेटी की यादों को छुपाते हुए.

बेचारी गूंगी... वह गूंगे से सच्चा प्यार करती थी...लोगों को उनके बीच यूँ आना न चाहिए था..उन्हें क्या हक था?… गणेश बाबू ने सोचा.

उन्हें थपथपा कर भारी कदमों से वहाँ से चले गये. और वे कर भी क्या सकते थे.

अन्य नेताओं का भाषण होने के बाद मधुरानी भाषण देने के लिए खड़ी हुई. माइक्रोफोन के सामने जा कर उसने वहाँ उमड़ी भीड़ को निगाह भर कर देखा . चारों ओर शांति छा गयी. लोग उसको सुनने के लिए बेताब थे.

"भाइयों और बहनों..." उसने पॉज़ लिया. लोगों ने ज़ोरदार तालियाँ बजा कर उसका स्वागत किया. आख़िरकार उसने अपना भाषण शुरू किया.

करिश्मा शायद इसी को कहते हैं… गणेश बाबू ने सोचा.

मधुरानी का भाषण जो चला वह पौन घंटे तक चला. लोग मंत्रमुग्ध हो कर उसे सुन रहे थे. गणेश बाबू ने उसके भाषणों के बारे में आज तक केवल सुना ही था. आज वह शिद्दत से यह महसूस कर रहे थे की वाकई वह एक बेहतरीन वक्ता है.

अचानक "मधुरानी मुर्दाबाद...." भीड़ के एक कोने से किसी ने तेज आवाज़ में कहा ..

नारा सुन कर गणेश बाबू होश में आए. उन्होने पलट कर देखा वहाँ कुछ लोग लाल झंडा और लाठियाँ पकड़े दिखाई दिए.

वैसे इस बात का अंदेशा था की सभा में कुछ गड़बड़ होने वाली है...यह ज़रूर संपत राव पाटिल जी के बेटे दीपक का किया धारा है... गणेश ने सोचा.

संपत राव पाटिल की मौत के बाद उनके बेटे दीपक ने उनकी जगह ले ली थी. शायद उसे मालूम था की पाटिल जी का क़त्ल मधुरानी ने करवाया है. क्योंकि उनके बीच अनबन की खबरें बहुत पहले से जाहिर हो चुकीं थी. पाटिल जी आज होते तो वे ऐसा कदम कभी न उठाते लेकिन यह जोशीला नौजवान था.....गर्म खून था.

"मधुरानी मुर्दाबाद" नारे अब पूरी सभा में गूंजने लगे थे.

चारो ओर अफ़रा-तफ़री मच गयी. मधुरानी भाषण देते हुए एक पल रुकी उसने मधुकर बाबू और अन्य कार्यकर्ताओं की ओर एक नज़र डाली. मधुकर बाबू बड़े तैश में अपने आदमियों को लेकर उस कोने में बढ़ने लगे जहाँ नारेबाज़ी चल रही थी. इधर मधुरानी का भाषण जारी था.

मधुकर बाबू और उनके चालीस पचास आदमियों के जाने पर स्थिति बद से बदतर हो गयी. उन लोगों ने लाठियाँ निकाल लीं और उन्हें मधुरानी के समर्थकों पर चलाना शुरू कर दिया. भागा-दौड़ी शुरू हो गयी. मधुरानी को मजबूरन भाषण रोकना पड़ा.

एक पुलिस अधिकारी माइक्रोफोन के सामने खड़े हो कर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करने लगा . लेकिन अब भीड़ काबू के बाहर हो चुकी थी. वह लाल झंडे वाले और लाठीधारियों की संख्या देखते देखते बढ़ने लगी. मधुरानी के कार्यकर्तों के पास कोई हथियार न था वह पत्थर उठा उठा कर उन्हें मारने लगे. इधर लाल झंडे वाले लाठियाँ भंज रहे थे. एक कार्यकर्ता ने जो पत्थर ले कर मारने के लिए फेंका वो सीधे एक आम के पेड़पर लटके मधुमखियोंकी छत्ते से जा लगा..सारी मक्खियों ने वहाँ मौजूद भीड़ को निशाना बनाना शुरू किया.

मधुमक्खियों के कारण और भी भगदड़ मच गयी .. धक्कामुक्की बढ़ गयी...यह पूरा प्लान मधुरानी के विरोधियों का ही था. लेकिन हालात इस कदर बेकाबू हो जाएँगे किसी को अंदाज़ा न था. पुलिस अधिकारी ने वायरलेस पर संदेश भेज कर और मदद माँगी.

वह लाल झंडे वाले लोग अब मंच की दिशा की ओर बढ़ चले थे . लेकिन गणेश बाबू और उनके कार्यकर्ता उन्हें रोकने लगे. उन्हें मालूम था की एक बार यह लोग मंच तक पंहुच गये तो मधुरानी और उसके साथ मौजूद अन्य नेताओं की खैर नहीं. मधुरानी की जान को ख़तरा था इसलिए वह जी जान लगा कर लड़ रहे थे. मधुमक्खियों का छत्ता वहाँ से पास ही था. उन्होने वहाँ भी हमला बोल दिया था. गणेश बाबू और उनके लोगों को एक साथ दो चीज़ों से बचना पड़ रहा था , एक तो उन गुण्डों की लाठियों से और दूसरे उन मधुमक्खियों से. खुद गणेश बाबू का चेहरा भी डंक से सूज कर लाल हो गया था लेकिन उन्हें इसकी परवाह न थी.

चाहे जान चली जाए मधुरानी का बाल भी बांका नही होना चाहिए..आख़िरकार अब वही तो मेरे जीने का सहारा थी...

शायद मैं उस से प्यार करने लगा हूँ ... वरना क्या मैं उसके लिए जी जान लड़ा कर लड़ता?...

उनके साथ के कुछ कार्यकर्ता वहाँ से भाग खड़े हुए , लेकिन गणेश बाबू को न जाने आज क्या हो गया था इस उम्र में भी वह लाल झंडे वाले लोगों को मार रहे थे. अब उनके हाथों में भी एक लाठी आ गयी थी जिससे वह अब जी जान से लड़ रहे थे.

जब यह बमचक मची थी तो गणेश बाबू को मधुकर बाबू मंच की ओर जाते दिखे.

" गणेश बाबू एक भी लौंडा उपर नहीं पंहुच ना चाहिए … जान ले लो इन सालों की..मैं उपर मधुरानी की सुरक्षा की व्यवस्था देखता हूँ" मधुकर बाबु ने कहा.

अब तक मैदान में पुलिस बल आ चुका था. उन्होने आँसू गैंस के गुब्बारे छोड़े और लाठी चार्ज करने लगे. लेकिन भगदड़ कायम थी. पुलिस बल भी वहाँ जमे लोगों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए काफ़ी न था.

गणेश बाबू हमलावरों को मार भागने मे लगभग कामयाब हो गये थे इतने में उनके करीब तीन कार्यकर्ता आ पंहुचे. गणेश बाबू समझ गये की उन्हें कोई खबर बतानी है.. वहाँ का इंतेज़ाम दूसरे कार्यकर्ता को सौंप कर वह उन तीनों के साथ एक कोने में आ खड़े हुए.

"साहब बुरी खबर है" एक आदमी बोला.

"क्या हुआ..ज़रा खुल कर बताओ" गणेश बाबू का कलेजा मुँह को आ रहा था "कही माधुरानी को कुछ हो तो न गया" उन्होने सोचा.

"मधुकर बाबू आज आपका गेम बजाने की फिराक में हैं" दूसरा आदमी बोला.

"क्या?!!..तुम लोगों को कैसे पता चला?" गणेश बाबू ने हैरान हो कर पूछा.

उन्हें मालूम था की मधुकर बाबू कभी न कभी यह चाल चलेंगे. लेकिन वह वक्त इतनी जल्दी आएगा उन्हें ऐसी उम्मीद न थी.

"राजू ने अपने कानों से सुना ...मधुकर बाबू को काशीनाथ से कहते हुए " तीसरा बोला..

"क्या कहा उसने?" गणेश बाबू ने पूछा.

" आ..आज अच्छा मौका है....इस की बजा डालो आज ... मुझसे ज़बान लड़ाता है हरामज़ादा...उसे मालूम नहीं म्यान में एक ही तलवार रह सकती है.. - ऐसा काशीनाथ को बोला वह"

"ऐ ..सा..?" गणेश बाबू सोचते हुए बोले.

"अब क्या करें?" गणेश बाबू बोले.

"साहब जी आप बस हुक्म कीजिए" राजू बोला .
 
गणेश बाबू ने उसकी ओर देखा. उसका फ़ैसला हो चुका था. उसे आदेश देने पर वह जान की परवाह किए बगैर उसकी खातिर जी जान लड़ा देने वाला था. गणेश बाबू के जबड़े भींच गये थे.

"हाँ वह सही है..एक म्यान में एक ही तलवार रह सकती है.." गणेश बाबू अपनी सोने की चेन और अंगूठियाँ निकाल कर उनके हवाले करते हुए बोले.

" जी साहब जैसी आपकी आज्ञा...वैसे वह भी मंच के नीचे भीड़ में उतरा हैं … एक ही लाठी से उसका सिर फोड़ दूँगा" एक दूसरा बंदा बोला.

"जी साहब" बाकी दोनों ने भी हामी भर दी और फिर वह सब अपनी लाठियों को संभालते हुए मधुकर बाबू की दिशा में बढ़ चले.

अन्य जगहों पर चाहे हालत बेकाबू हो गये हों लेकिन गणेश बाबू और उनके साथी पूरी ताक़त से लोगों को मंच की ओर जाने से रोके हुए थे. उनकी लाठीधारियों के साथ मुठभेड़ अब भी जारी थी. रह रह कर गणेश बाबू का ध्यान उस दिशा में चला जाता जहाँ उन्होने उन तीनों को मधुकर बाबू का गेम बजाने भेजा था. वैसे उन पर उनका पूरा भरोसा था लेकिन काफ़ी देर होने पर भी जब वे न लौटे तो उन्हें चिंता हुई.

इतने में वह तीनो गणेश बाबू को अपनी ओर आते हुए दिखाई दिए ...तीनों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी...

यानी उन्होने सौंपा गया काम कर दिया... उन्होने सोचा.

अब उनके चेहरे पर भी मुस्कुराहट तैरने लगी . वे अब उनके मुँह से खुशख़बरी सुनना चाह रहे थे . इस दौरान वे तीनों उनके पीछे आ कर खड़े हो गये. वे पलटकर उनसे मुखातिब होने ही वाले थे की उन पर किसी ने पीछे से लाठी चलाई और वह लड़खड़ा कर नीचे गिर पड़े.

उन्होने पलटकर देखा तो उन तीनो में से ही एक बंदे ने पीछे से उनके सिर पर लाठी चलाई थी. उन्हें आश्चर्य हुवा था. वे थोडा सम्हलने को हुए थे की इतने में दूसरा ज़ोरदार वार उनके माथे पर हुआ ..इस बार यह वार उनके विश्वासपात्र राजू ने किया था.

.... अब तक गणेश बाबू को समझ आ गया कि उनके साथ धोखा हुआ है.

लेकिन क्यों? और कैसे?...

इसके बाद उनके शरीर पर लाठियों के अनगिनत वार किए गये . हमलावर वही तीन थे. उन तीनो ने लाठियाँ मार मार कर उन्हें अधमरा कर दिया था. तभी लाठीधारियों का एक बड़ा झुंड अपनी तरफ आते देख तीनों वहाँ से भाग खड़े हुए. नीचे पड़े खून से लथपथ कराहते हुए गणेश बाबू का ध्यान अचानक मंच के कोने में गया..चार पाँच कार्यकर्ता मधुरानी को उसकी गाड़ी तक पंहुचने में कामयाब हो गये थे , उन लोगों में मधुकर बाबू भी थे. वह लोग गाड़ी में झटसे बैठ गये. मधुकर बाबू और गणेश बाबू की नज़रें आपस में मिलीं . मधुकर बाबू उनकी ओर देख एक शैतानी हँसी हँसे. फिर मधुकर बाबू ने माधुरानी से बात करते हुए गणेश बाबू की ओर उंगली से इशारा किया.मधुरानी और गणेश बाबू की नज़रें मिली.

यानी..यानी...मुझ पर जो हमला हुआ वह मधुकर बाबू ने किया और वह भी माधुरानी की सहमति से?...

लेकिन क्यों...और कैसे??...

इतने में गणेश बाबू को मधुकरबाबू के गले में अपनी सोने की चेन दिखाई दी.

अच्छा तो ऐसा हुआ...

गणेश बाबू को सब समझ आया . गणेश बाबू को जो उन तीनो ने खबर दी इसमें भी मधुकर बाबू की चाल थी...उन्होने पहले उनको हमला करने के लिए उकसाया और जब गणेश बाबू ने उन तीनों को मधुकर बाबू का गेम बजाने भेजा तो उसने यह बात जा कर मधुरानी को बता दी और सुबूत के तौर पर उनकी चेन और अंगूठियाँ दिखा दी. और फिर जब मधुरानी को यह बात मालूम पड़ी की गणेश बाबू उनको बताए बगैर इतना बड़ा कदम उठा सकते हैं तो वे भरोसे के काबिल नही हैं. फिर मधुकरबाबू ने गणेश बाबू का गेम बजाने के लिए मधुरानी से इजाज़त माँगी - जो उसने दे दी. लेकिन गणेश बाबू के मन में एक झूठी आशा पल्लवित हुई.

अब वह भी मुझे यहाँ से ले जाने का इन्तेजाम कराएगी... वे जाने के लिए तैयार ही थे.

लेकिन यह क्या ? ... वह नज़र अब उनको पहचानती तक न थी , इतना बड़ा दंगा फ़साद होने के बावजूद उन नज़रों में डर भी न था.. दुख भी न था और न दया थी..उन नज़रों में थी एक महत्वकांक्षा..,,,.रास्ते में जो भी आए उसे पैरों तले निर्ममता से रौंदने की चाहत....

मधुरानी ने उन्हें देख कर अनदेखा कर दिया और ड्राईवर को वहाँ से ले चलने का आदेश दिया. उनकी गाड़ी देखते ही देखते नज़रों से ओझल हो गयी. गणेश बाबू देखते ही रह गये. गणेश बाबू को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ. अन्य कार्यकर्ता अब भी लाठीधारियों से लड़ रहे थे।… यह सोच कर की मधुरानी अब भी वहाँ मौजूद है. यानी इन सब लोगों को यूँ ही मरने के लिए छोड़ मधुरानी वहाँ से भाग खड़ी हुई थी.

गणेश बाबू अब नीचे पड़े हुए अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे. इतने में लोगों का बदहवास झुंड उस ओर आया ...वह संख्या में इतने ज़्यादा थे की गणेश बाबू बच ना सके . उस भगदड़ में गणेश बाबू को भीड़ ने बेदर्दी से अंजाने में पैरों तले कुचल डाला..उनकी दर्द भरी चीखें किसी को शोर गुल में सुनाई न दी.

लोगों की भीड़ अब जा चुकी थी लेकिन गणेश बाबू के शरीर का एक भी हिस्सा साबुत न बचा था. थोड़ा हिलाने पर भी उन्हें बहुत दर्द होता था. उन्होने उसी हाल में पड़े पड़े आस पास देखा मधुमक्खियाँ अब भी लोगों को डंस रही थी.....लोगों ने उनसे बचने के लिए उनमें से कई मक्खियों को मसल दिया था. लेकिन वह कार्यकर्ता मक्खियाँ थी..उनका काम अपनी रानी को बचाना था..

गणेश बाबू अब अपनी मौत की प्रतीक्षा करने लगे. अब मौत ही उन्हें इस जानलेवा दर्द से छुटकारा दिला सकती थी. अचानक उनकी नज़र आकाश में गयी उन्होने देखा उस छत्ते की रानी मक्खी अपने साथ कुछ नर मधुमक्खियों और कुछ कार्यकर्ता मक्खियों को ले पूर्व दिशा की ओर उड़ रही थी...... नयी जगह की खोज में....और वह जा रही है इस बात से बेख़बर उसके अन्य कार्यकर्ता अब भी लोगों को डंस रहे थे.......ठीक माधुरानी के कार्यकर्ताओं की तरह.....

गणेश बाबू ने आखरी बार इधर उधर देखा उनके साथी भी लाठी खा कर मर रहे थे तो कुछ अब भी लड़ रहे थे. गणेश बाबू ने सोचा:

इनमें से प्रत्येक आदमी एक कार्यकर्ता मक्खी की मौत मर रहा है....…

उन हालात में भी गणेश बाबू के चेहरे पर समाधान की एक झलक दिखने लगी. उन्हें इस बात की खुशी थी की उनके आस पास मधुरानी के कार्यकर्ता एक कार्यकर्ता मधु मक्खी की मौत मार रहे थे.…

लेकिन जो मौत उनको मिल रही थी वह मौत थी एक नर मधुमक्खी की....

- समाप्त -
 
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