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मधुरानी –कम्प्लीट हिन्दी नॉवल

'' जी ... आता हैजी '' उसने गर्वके साथ कहा.

'' अच्छा तो फिर इधर आकर इस पर्चीपर क्या लिखा है जरा पढके तो बता ... '' गणेश अबभी उस पर्चीको पढनेकी कोशीश करते हूए बोला.

उस देहाती लडकेने पहले गणेशके पास जानेके लिए कहांसे रास्ता है यह देखा. गणेशके सामने एकसे सटकर एक ऐसे तिन टेबल रखे हूए थे और गणेश बाए कोनेमें एकदम दिवारसे सटकर बैठा था. गणेशकी तरफ जानेका रस्ता वे तिन टेबल छोडकर एकदम दाए कोनमे था. फिर उस देहातीने गणेशके सामने रखा एक टेबल हटाकर उधर जानेकी कोशीश की. और फिर उसे क्या लगा पता नही एकदमसे अपनी उंची टांग टेबलके उस तरफ रखकर टेबलपरसे उधर चला गया. गणेश ने वह उसका तरीका देखा और हक्का बक्कासा होकर आश्चर्यसे उस लडके की तरफ देखने लगा.

'' अबे पगले हो क्या?'' गणेश गुस्सेसे चिल्लाया. लेकिन दुसरेही पल उस लडकेके चेहरेके भाव देखकर और उसका टेबल लांघनेका तरीका याद कर उसे उस लडकेकी हंसी आ रही थी.

'' अबे क्या येडे आदमी हो... वह उधरका रास्ता छोडकर... सिधे टेबल लांघकर इधर आगया तू...'' गणेश हसते हूए बोला.

उसे क्या बोला जाए? ... हंसे की उसे गुस्सा करे?... गणेशको कुछ सुझ नही रहा था.

तबतक वह लडका वह टेबल लांघकर गणेशके बगलमें खडे होकर उस परचीपर क्या लिखा है यह पढने लगा, '' खेत बोनेका परमान पत्र ''

गणेश बाजारमें दोनो तरफ लगे दुकानोंकी तरफ देखते हूए चल रहा था. सरपे मई महिनेकी धूप होते हूए लोग हरीभरी सब्जी, पके हुए आम, प्याज. लहसून लेकर बाजारमें दुकानें लगाकर बैठे थे. कोई तरकारीका दुकान लगाकर बैठे थे तो कोई सिर्फ धानके, जैसे गेहूं, ज्वार, चावल, ऐसे अलग अलग धानके दूकान लगाकर बैठे थे. आज जादा ना घुमते हूए गणेश सिधा बंडू हॉटेलवालेके टेंट के पास गया. बंडू गरमागरम भजिया, आलूवडे, दालवडे, मिर्च की भजिया, शेव, चिवडा, बुंदी , जलेबी ऐसे काफ़ी खानेकी चिजे उसके पास मिलती थी.

तलनेकी जायकेदार खुशबु, और गरम गरम तेल का मनको मोहनेवाला तडकेका आवाज, और सामने थालीमें रखे हूए कुछ पिले तो कुछ लाल ऐसी खानेकी चिजे. दुकानके सामनेसे गुजरा और उसके मुंहमे पाणी ना आया हो ऐसा बहुतही कम होता होगा. आलूवडेको वे लोग 'आलूबोंडा' कहते. बंडूके हॉटेलमें बना आलूबोंडा गणेशको खुब भाता था.

" आवो जी ... हमरे जैसा आलूबोंडा तुमको कही नाही मिलेगा... वो क्या है नाजी हमरा आलूबोंडा बनानेका तरीका बहुत अलग रही .... ' कहते हूए उसने आलूका बना हुवा गोला बेसनमें डूबोकर भट्टीपर रखे कडईके उबलते हूए गरम तेलमें छोडा. फिर दुसरा, तिसरा ... ऐसे आलूबडेसे कडई भरनेके बाद अपना बेसनसे भरा हुवा हाथ बगलमें रखे पाणीके बर्तनमें डूबोकर धोया. फिर गिले हाथसे पाणी की छीटे कडईमें आलूवडे तल रहे उबलते तेलमें छीडकी. 'तड् तड्' ऐसा आवाज हो गया. यह सब देखनेमेभी गणेशको बहुत मजा आता था. .

" बैठो ... साबजी ... बैठीयो तो ..."

गणेश दुकान के टेंटका कपडा उड ना जाए इसलिए रखे पत्थरपर बैठ गया. आलूवडे तलनेका इंतजार करते हूए वह उन तेलमें उबलते वडोंकी तरफ देखने लगा.

बंडू हॉटेलवालेके साथ दुकानमे उसकी बिवी उसे काममें हाथ बटाती थी. जब वह तलनेका काम करता था तब उसकी बिवी ग्राहक संभालती थी. और जब वह तलनेका काम करती तब बंडू ग्राहक संभालनेका काम करता . गणेशको किसीने कहा था की बंडू हॉटेलवालेने दो शादीया की थी. एक बिवी घर और उसके बच्चे संभालती थी तो दुसरी उसके साथ उसको हाथ बटानेके लीए उसके और उनके हॉटेलके साथ नगर डगर घुमती थी. ... कभी किसी मेलेमें, तो कभी दुसरे गांवके बाजारमें वे जाकर अपना दुकान लगाते थे. पंधरा दिन एक बिवी को लेकर घुमा की वह उसे घर और बच्चे संभालनेके लिए घर छोडता था और अगले पंधरा दिन दुसरे बिवीको लेकर घुमता था. अपने धंदेके अनुसार उसने अपना जिवन मानो ढाल लिया था. वैसे वह दुनियादारीके मामलेमे काफी होशीयार था. उसकी होशीयारी उसके दो शादिया करनेमें देखतेही बनती थी. दुसरी शादी करनेसे एक्स्ट्रा बिवी तो बिवी उपरसे बिना पगारकी नौकर भी उसे मिली थी.

अबतक बडे पुरे तलकर बन चुके थे. बंडू वे तले हूए वडे बाहर निकालकर एक थालीमें डालने लगा.

" दुसरे हॉटेलवाले ... ऐ ऐसे वडे खानेको परोसेंगे ... लेकिन ई तो आधाही काम हो गयाजी ... ."

वह बचे हूए वडे कडईसे थालीमें डालते हूए बोला.

" अब आगेका काम देकहियो ... इस वडे के कानके निचे ऐसे एक एक बजानेकी ... इस झारेसे .. ऐसे ... "

वह अपने हातमे थामा हुवा झारा हरएक वडेपर हल्केसे मारते हूए बोला.

जैसे जैसे वह उस झारेसे उन वडेको मारता था वैसे वैसे वे वडे टूटकर खुलते थे.

" और फिर इस खुले हूए वडोंको फिरसे तेलमें डालियो ... ऐसे ..."

फिरसे वे खुले हूए वडे तेलमें छोडते हूए वह बोला.

" अजी ई है आलूबोंडे बनानेकी असली ढंग... ये हम .... हमरे बापसे ... हमरा बाप ... उसके बाप से ... और उसका बाप ... उसके बापसे ... ऐसे पिढीयोंसे हम सिखत रहत ... ."

यह बंडूकी बकबक हर बार वडे खानेको आनेके बाद गणेशकोही नही तो वडे खानेको आए सारे ग्राहकोंको सुननी पडती. लेकिन सारे लोग ये इतने अच्छे जायकेदार वडे खानेके लालचमें सुन लेते थे. वह फिरसे तेलमें छोडे हूए वडे झारेसे हिला रहा था. बिच बिचमें यूंही बगलमें रखे पाणीके पतेलेमें हात डूबोकर पाणीकी कुछ छिंटे उस उबल रहे तेलके कडईमें छिडकता था. उससे वह 'तड् .. तड्' ऐसा आवाज बार बार आता था. और वह वैसा 'तड् .. तड्' आवाज करकी मानो उसे आदतही हो गई थी. शायद बाहर इतने तपते धुपमें... तपते भट्टीके सामने उतनेही उत्साहके साथ .. हमेशा काम करते रहनेका रहस्य शायद उस 'तड्.. तड्' होनेवाले आवाजमेंही छिपा हो ऐसा गणेशको हमेशा लगता था.

पेट पूजा होने के उपरांत गणेश ने बाज़ार के मैदान के कोने में स्थित , महादेव के मंदिर में जाने का निश्चय किया. वह महादेवीजी का मंदिर देखने में भले ही प्राचीन था परन्तु काफी बड़ा था . मंदिर के आस पास का क्षेत्र भी बड़ा और फूलो व फलो के सघन वृक्षों से घिरा था . इसमें एक विशाल नीम का वृक्ष भी था . गर्मियो में शीतल छाया के लिए इस वृक्ष का बहुत उपयोग होता था . और आज तो बाज़ार का दिन और उसमे भी गर्मियों की लू बरसाती कड़ी धुप , इस वृक्ष के नीचे काफी लोगो की भीड़ जमा हो गयी, कुछ थके हारे लोगों ने तो नींद की झपकी भी ली. मंदिर के प्रवेश द्वार के एकदम सामने एक सार्वजानिक कुआ था. गाँव के अनेक लोग उस कुए से जल भरते थे. मंदिर के तरफ जाते-जाते गणेश को कोने पर एक पान की टपरी दिखाई दी. वह उस पान की टपरी पर ही रुक गया और उस पानवाले को उसने एक बनारसी पान बनाने का आदेश दिया. पान टपरी के पास काफी लोग जमा थे, कोई व्यक्ति बिडी मांग रहा था , तो कोई सिगरेट तो किसी को तम्बाकू की छोटी पुडिया चाहिए थी. पानवाले ने ग्राहकों को निपटाया, और गणेश का बनारसी पान बनाने के लिए हाथ में लिया, गणेश वहीँ उसके सामने खड़ा रहा. पान बनने तक क्या किया जाये ये सोचते हुए गणेश ने सामने की ओर देखा तो उसे पान टपरी के बाजु में ही, मंदिर की दिवार से लगकर, कुछ बच्चे कांच के कंचो का खेल जोरशोर से खेलते दिखाई दिये. गणेश उनकी तरफ बढा. जाते-जाते उसने पान वाले को, पान तैयार होने के बाद, आवाज देने को कहा. कंचे खेलने वाले चार- पाँच बच्चे थे. उनमे से एक बच्चा दिवार से लगभग, दस ग्यारह फूट पर रखे पत्थर के पास गया. उसके हाथ में कम से कम १५-२० कंचे थे. उसने उस पत्थर के पास खड़े रहकर कंचो को दिवार की दिशा में धीरे से फेका. दिवार के पास ही, जमीं में, कंचे के आकार का एक गढ्ढा था. वह गोटिया जैसे ही गढ्ढे की दिशा में लुड़कने लगी , बाकि के बच्चो की सांस ऊपर नीचे होने लगी. क्योकि यदि एक भी गोटी उस खड्डे में गिरती है तो वह बच्चा सभी की सभी कंचे जीत जायेगा. काफी सारी गोटिया उस खड्डे के एकदम नजदीक जाकर घूम रही थी, पर एक भी उस गढ्ढे में नहीं गिरी. फिर उन्ही बच्चे में से एक ने किस गोली को मारना है, यह उस गोटिया फेकने वाले बच्चे को बताया. उस बच्चे ने, हाथ में एक गोटी लेकर, थोड़ी सी एक आँख बंद करके , उस गोटी को लक्ष्य किया और उस गोटी को हाथ में रखी गोटी से फेककर मारा. एकदम से सभी बल्लू बल्लू करके चिल्लाने लगे. उसके द्वारा मारी हुई गोटी, किसी दूसरी ही गोटी को लगी थी. गोटी मारने वाले के चेहरे पर निराशा छा गयी, उसने निराश चेहरे से अपनी निकर की जेब में हाथ डालकर कंचे निकाले और उसमे से तीन कंचे गिनकर खेल में डाल दिए. अब अगला बच्चा खेल खेलने के लिए तैयार हो गया. गणेश को यह सब देखकर आनंद आ रहा था. वह अपनी बचपन की यादो में खो गया. बचपन में वह बच्चो के साथ ऐसे ही कंचे खेलता थाई.अचानक पीछे से आयी आवाज से गणेश होश में आया.
 
"पान होई गया साब" पान वाला चिल्लाया था.

उसने उसके पास से पान लिया, पैसे दिए और वह पान मूह में ठूस लिया, फिर उसे एक सिगरेट देने को कहा. सिगरेट जलाकर, पान खाते-खाते गणेश, पेट भरे होने की तृप्त आत्मा के साथ, धीरे धीरे मंदिर के प्रवेश द्वार की तरफ बढने लगा. मंदिर में दो ही द्वार थे. मुख्य द्वार से अन्दर प्रवेश करने के बाद एक बड़ा हॉल था. हॉल में से अहाते की तरफ जाने पर, अहाते के बाहर एक पत्थर का बड़ा सा नंदी रखा था. जिसके पीठ और कंधे पर चढ़कर, गाँव के छोटे-छोटे बच्चे खेलते रहते थे. मंदिर में दो ही द्वार होने के कारण हॉल में काफी आड़ रहती थी. मंदिर के, हॉल के कोने में, आड़ में हमेशा ही ताश के एक दो खेल चलते रहते, और बाजार के दिन तो रहते ही रहते , साथ में, बंडू के होटल के गरम गरम मिर्ची के भजिये का भी बड़े स्वाद के साथ आनंद लिया जाता.

वैसे ताश के खेल रोज ही खेले जाते. गणेश को ताश खेलने में कभी भी रूचि नहीं थी, पर यदि समय न कट रहा हो तो गणेश हमेशा ही अपने आफिस में से उठकर इस मंदिर में आ जाता था. वहा खड़े रहकर उन ताश के पत्तो को खेलते देखना गणेश को सुहाता था.

कभी-कभी तो गणेश को आश्चर्य होता था की गावों में रहने वाले बच्चे इतना कठिन रमी का खेल इतनी आसानी से कैसे खेल लेते है. मतलब इन ग्रामीण बच्चो में भी सर्वसामान्य लोगो की तरह दिमाग होता है , लेकिन वे शायद इसका उपयोग काफी बार गलत या निरर्थक रस्ते के लिए करते है. गणेश मंदिर में ताश के खेल को देखने में तल्लीन था.

तभी कोई दौड़ता हुआ आया-

"ए चलो रे....... उधर बाजार में तमाशा (गोची) होई गवा. "

ताश का खेल आधे में ही रूक गया. सभी ने खेल में लगाये अपने अपने पैसे बाँट कर वापस ले लिए. एक ने ताश का बण्डल जेब में ठूस लिया.

"क्या हुई गवा " किसी ने तो भी चिंतित स्वर में पुछा.

"अबे जल्दी चलियो ......... उहा जाकर ही देख लियो ......... ईहाँ क्या चिल्लावे है ....... और ईहाँ टेम कोनो है. " वो बोला और जैसे हवा की तरह आया था वैसे ही हवा की तरह दरवाजे से बाहर निकल गया. सभी उसके पीछे दोड़ने लगे. गणेश की भी उत्सुकता बढने लगी.

क्या हुआ होगा.........

वह उनके पीछे दोड़कर तो नहीं........... पर जितनी जल्दी हो सके उतने तेज कदमो से चलने लगा.

बाजार में एक स्थान पर बहुत सारी संख्या में लोग जमा थे. मंदिर में ताश खेलने वाले सभी लोग वहा आक़र रूक गए. गणेश भी भीड़ में घुसकर, एड़ी के बल पर, अपने पैर्रो को उचा करके, क्या हुआ ये देखने लगा. भीड़ के बीच में चल रहे द्रश्य को देखकर, गणेश को अपना दिल बैठता हुआ सा महसूस हुआ, उसके हाथ पैर ठन्डे पड़ गए, चेहरा एकदम सफ़ेद हो गया. वहाँ पर मधुरानी एक गवार से दिखने वाले व्यक्ति को अपनी अस्सल कोल्हापुरी चप्पल से बुरी तरह पीट रही थी. वह व्यक्ति अपने दोनों हाथो से उसके मार से बचने का प्रयत्न कर रहा था और उसे जो शर्मिंदगी महसूस हो रही थी वह भी छिपाने का प्रयत्न कर रहा था. जो व्यक्ति मार खा रहा था, वह शायद इन ताश खेलने वालो में से किसी एक का मित्र था. क्योकि इनमे से एक बीच में आया-

"क्या हुई गवा " उसने पुछा.

मधुरानी अत्यंत आवेश और गुस्से में थी. उसी आवेश में उसने, जो बीच में आया उसे भी दो तीन चप्पले जड़ दी.

"मरद - औरत के झगड़े और रास्ते में हो रहे झगड़े के बीच नाहीं पड़ना चाहिए............. ई कहने वाले जूठ नाहीं कहते" बाजु में खड़े एक वृद्ध ने सुझाव दिया।

"मधुबाई..........." वह कहने का प्रयत्न करने लगा.

"मधुबाई......... क्या हुई गवा .... तनिक बताओ तो " बीच में पड़े व्यक्ति ने मार खाकर बड़े ही कातर स्वर में पुछा.

"मरे, ............ की समझता है.… मुर्दे....... भीड़ में से जाते जाते चिमटी ली मरे ने.............. उस चंडाल से कहियो घर जाकर उसकी माँ बहन की चिमटी लेइयो ........."

बीच में पड़ने वाला क्या कहे, उसे समज नहीं आया, फिर भी वह बोला.........

" किहा चिमटी लीयो मधुबाई"

"मरे, अब तुझे की खोलके बताऊ ......... और ई मधुबाई , मधुबाई क्या लगा रखा रहे ....... में क्या तुझे तमाशे में नाचने वाली बाई नजर आवे है "

"वैसा नाहीं मधुबा..... मधु ..... बहन " उसने कहा.

" बहन " उसके मुँह से बहुत मुश्किल से निकला था.

गणेश ने मधुरानी का ऐसा चंडी अवतार पहले कभी नहीं देखा था. उसने मन ही मन में मधुरानी की जो कल्पना की थी उसकी छबी मलिन पड़ गयी. वह एकदम निराश, हताश दिखाई देने लगा.

चार पाच दिनसे गणेश मधुराणी की दुकान की तरफ फटकाभी नही - वैसी उसकी हिम्मत ही ना बनी. एक दो बार खिडकीसे बाहर झांककर देखते वक्त मधुराणीसे नजर मिली थी ... बस उतनीही. तब भी उसे वह बडी बडी आंखोसे उसकी तरफ़ देख रही मिली थी. कभी उसे उन आखोमें

' वह मुझसे ऐसा क्यो बर्ताव करता है? ' ऐसा ऐतराज और गुस्सा दिखता तो कभी जुदाई का गम दिखाई देता. कभी ' मेरी कुछ गल्ती हो तो मुझे माफ़ करदो' ऐसी बिनती दिखती थी.

उसे इस बातका अचरज था की मधुराणी आंखोकी भाषा से इतना सबकुछ कैसे बोल पाती है.... या फिर यह सारे उसनेही अपनी सुविधा की हिसाबसे लगाए मतलब... थे ?

बाहर कुछ गडबड सुनाई दे रही थी इसलिए गणेशने खिडकीसे झांककर देखा.

" ए पांड्या ... जल्दी आई गवा ... उधर एक गेसींग मिल गया है रे " खिडकीके बाहर किसी लडकेने मानो ऐलान कर दिया और वह नदीकी तरफ़ दौड पडा.

उसके पिछे और दो चार लडके दौड पडे. और चबुतरे पर बैठे बुजुर्ग लोग असमंजससे इधर उधर देखने लगे. गणेशका ध्यान मधुराणीकी तरफ़ गया. वह गल्लेपर बैठकर एक लडकेसे गुफ़्तगु कर रही थी. वह लडका नदीकी तरफ़ हाथसे इशारे कर उसे कुछ बोल रहा था. अब वह लडका भी नदीकी तरफ़ दौड पडा. तभी गणेशकी मधुराणीसे नजर मिली. उसने उसे एक मिठीसी स्माईल दी. गणेशके चेहरेपरभी स्माईल झलकने लगी . लेकिन फ़िर अचानक उसे मधुराणीका वह बाजारमें दिखा चंडीका अवतार याद आ गया. झटसे वह खिडकीसे बाजु हट गया.

शामको आसमानमे सुरज डुबनेसे फ़ैली लाली दिख रही थी. नदी के इस तरफ़, गावके बगलमें एक गन्ने का खेत था. वहां एक जगह गणेशको लोगोंकी भिड दिखाई दी तो गणेश भिडकी तरफ़ निकल पडा. अभीभी काफ़ी ग्रामस्थ उस भिडकी तरफ़ दौड रहे थे. गणेशभी अब जल्दी जल्दी चलने लगा.
 
अबतो अंधेरा होनेको आया था. इसलिए कुछ लोग लालटेन लेकरभी आ रहे थे. गणेश जब भिडके पास पहुंच गया तब सारे लोग एकदम शांत होगए. कुछ लोग गणेशकी तरफ़ एकटक देखने लगे. तो कुछ लोग भिड्के बिचोबिच देखने लगे. भिडके बिचोबिच वह गुंगा और गुंगी गर्दन झुकाकर खडे थे. तभी गणेशने देखा की एक आदमी आवेशसे उस भिडमें घुस गया और उस गुंगीको पिटने लगा.

" रांड ... हमरेही घर जनमनी थी तोहार ... "

बह उस गुंगीको बेदम मारने लगा. गुंगी जोरजोरसे चिल्लाने लगी. वह चिल्ला रही थी की रो रही थी, समझना मुश्कील था, और भीड का भी उससे कुछ लेना देना नही दिख रहा था. उसपर वह गुंगा गुस्सेसे आग बबुला होकर उस आदमी की तरफ़ लपक पडा. तभी भिडमेंसे दो चार ताकदवर लोगोंने उसे पकड कर रोक लिया.

" ... गावमें मुंह दिखायने लायक नाही रखा तुने... अबही तुमको बहुत बेदम मारुंगा ... और मारते मारते मरही जाए तो बहुतही अच्छा होईगा... तुमरा काला मुंह देखनेसे तो जेलमें जानाही अच्छा होइगा. "

गणेशको अब माजरा क्या है ... थोडा थोडा समझमें आने लगा था. गुंगेने और गुंगीने यहां खेतमें कुछ तो प्रेमप्रताप किया होगा. और उसे मारनेवाला उसका बाप होगा.

गुंगीका बाप - एक तरफ उसका मुंह चल रहा था तो दुसरी तरफ़ उसके हाथ और लात. अब गुंगी निचे जमीनपर गीर गई थी और उसका बाप उसे हाथ और लात दोनोंसे मार रहा था. पहले पहले गणेशको उसका बाप जो कर रहा था वह सही लग रहा था. हर एक हाथ लात की मारसे उसके दिलको एक सुकुनसा महसुस हो रहा था.

सचमुछ उसने उसके बापको गांवमें मुह दिखानेके लिए भी जगह नही छोडी थी....

मै अगर उसके बापके जगह होता तो उसकी जानही लेता ...

गुंगीतो गुंगी उपरसे काफ़ी कारनामेवाली दिखती है ...

दुसरा कोई नही मिला तो उसने बराबर एक गुंगाही ढुंढा ....

अब उसके बापको उसके शादीका काफ़ी मुश्कील होगा ... .

हां कोई बुढा, बेवडा करेगा उससे शादी और उपरसे काफ़ी दहेजभी लेगा...

कुछ क्षण गणेशको वह उस गुंगीका मानो बापही हो ऐसी अनुभूती होती रही.

लेकिन जल्दीही जो हो रहा था वह उसके मन को खटकने लगा. जो हो रहा है वह कोई ठिक नही हो रहा है ऐसा उसे लगने लगा. गणेश अब एक इन्सानियत के नाते सोचने लगा.

होगया होगा बेचारीको उस गुंगेसे प्यार...

उसकाभी शायद इसपर प्रेम होगा ...

अच्छे लोगोंनेही प्यार करने का क्या ठेका ले रखा है... ? ...

क्या ऐसा कही लिखकर रखा है ?...

वे भी हमारे तुम्हारे जैसे ही ना...

उनकीभी भावनाएं हमारे जैसीही ...

उनकीभी हमारे तुम्हारे जैसीही जरुरते ...

सिर्फ फ़र्क यह है की वे गुंगे है ...

और उनका गुंगा होना क्या उनका चुनाव था ...

बेचारोके किस्मत का एक हिस्सा था ...

अचानक गणेश जोशमें आने लगा. उसे गुंगीका बाप जो उसे मार रहा था और वह तडप रही थी - देखा नही जा रहा था. उस गुंगीकी चिखे... और गुस्सेसे भरा चिल्लाना उससे देखा नही जा रहा था.

"रुको... ये क्या कर रहे हो आप लोग ? ... क्या बेचारीको जानसे मारोगे ?..."

एक आवाज आया. गुंगीका बापभी थोडी देरके लीए स्थंभीत हो गया. सब लोग कुछ क्षणके लिए शांत हो गए. गणेशको अपने आपपरही भरोसा नही हो रहा था की वह आवाज उसका खुद का था. गुंगीका बाप अब गणेशको जादा तवज्जो ना देते हूए फिरसे गुंगी को पिटने लगा.

" भाईसाब ... ये क्या कर रहे हो ... मर जाएगी बेचारी "

" बेचारी ?" उसके बापने रुककर बुरासा मुंह बनाकर कहा.

उसका बाप उसे फिरसे पिटने लगा.

अब गणेशभी उन्हे रोकनेके लिए आगे बढ गया.

" बाबूजी ... इस झमेलेमे मत पड़ियो ... नाही ही तो बादमा बहुत पछतावेंगे . .. "

" ईहा सरकार जिस कामके लिए भेज रहत ... उही चुपचाप करियो ... इ गाव के झमेलेमें मत पडियो "

"ई कोय तुमरी तालूकेकी जगा ना होवे ... उहा चलता होयगा ई सब... ईहा नाही चलेगा... "

" ऐसी घटना हमरे गांव मा कभी ना होवे है ... ई पहली बार होएगी ... "

" हम जब बच्चे रहत थे तब एक बार पाटीलके लौंडी को चमारके लौंडे के साथ पकडा रहत . ... पाटीलव उसके टूकडे टूकडे करके कुत्तेको डाला रहा उस वखत . .. " एक बुढा बता रहा था.

" फिरंगी पुलीस आवत रही उस वखत ... पुछताछ कराइ वासते ..."

गणेशने उस बुढेकी तरफ़ देखा. मानो वह अपनी मुक जबानमें उसे पुछ रहा था, ' तो फ़िर?... आगे क्या हुवा ? '

" पुलीस पुछ-पुछ कर थक गई रहत ... वोतो पाटील को कोई लडकी रहत उही साबीत ना कर पावे ... खुनकी बात तो बहुत दूर "

गणेश अचंभीत होकर उस बुढेकी तरफ़ देखने लगा.

सचमुछ ऐसा हुवा होगा क्या ?....

" लेकीन चाचाजी वह बहुत पुरानी बात होगई... अब दुनिया काफ़ी आगे बढ चुकी है ..." गणेश उस बुढे को समझानेकी कोशीश करने लगा.

" भाईसाब ... दुनिया आगे बढ गई इसका ये मतलब नही की गन्नेके के खेतका सहारा लेकर एकदुसरेके उपर चढ जावो ..." एक तिरछी टोपीवाला आदमी बोला.

उस गंभीर वातावरणमेंभी हंसी की हल्की लहर दौड गई. हंसनेवाले खांसकर जवाने लडके थे.

वह सब सुनकर गुंगीका बाप और जादा चिढ गया और पागलसा हो गया. उसने गुस्सेके जोशमे नजदीक पडा हुवा एक बडासा पत्थर दोनो हाथोसे जोर लगाकर उपर उठाया. पत्थर काफ़ी भारी होने से उसे कष्ट हो रहा था. अब उसने वह पत्थर अपने सरके उपरतक उठाया था. और बेदर्दीसे वह पत्थर वह गुंगीके सरपर मारनेही वाला था उतनेमें ...

अब उसने वह पत्थर अपने सरके उपरतक उठाया था. और बेदर्दीसे वह पत्थर गुंगीके सरपर मारनेही वाला था उतनेमें ...

" रुको " एक रौबदार आवाज गुंजा .

सारे लोग स्तब्ध होकर पिछे मुडकर देखने लगे. गुंगीके बापने वह पत्थर चुपचाप एक तरफ फ़ेंक दिया. गणेशनेभी पिछे मुडकर देखा. पिछे गांवका सरपंच खडा था. गणेशने पहले कई बार सरपंचका सात्वीक रुप देखा था. लेकिन आज पहली बार इस तरहके प्रसंगसे खंबीरतासे निबटते हूए गणेशका सरपंचके इस अलग रुपसे परिचय हुवा था.

" रघू ... ई तुम्ररी लडकी है ... इका मतलब ये नाही की तुम कानुन हाथमें लेय लो " सरपंच गुंगीके पास जाकर खडे होते हूए बोला. वहा खडे होकर उसने अपनी पैनी नजर एकबार चारो तरफ़ दौडाई . मानो वे आखोंकी जबांसे वहा उपस्थीत लोगोंसे संवाद साध रहे हो.

इतने लोग यहां पर होते हूए ऐसा जघन्य अपराध कैसे हो सकता है ?....

तुम सब लोगोंकी क्या मती मारी गई ?....

लडकीके बापका मै समझ सकता हूं ...

उसके सर पर गुस्सेका भूत सवार था... .

लेकिन तुम लोग ?...

मानो सरपंच हरएकसे सवाल कर रहा था. उनके शरीरको भेदकर निकलती नजरसे नजर मिलानेकी किसीकी हिम्मत नही बन रही थी. सारे लोगोंने अपनी नजरे निचे झुकाई थी.

" गुंगेका बाप कहां है ? " सरपंचने भिडसे सवाल पुछा.

भिडमें थोडी हलचल दिखाई दी. जहा गुंगेको कुछ जवान लडकोने पकडकर जकड रखा था, वहां पिछेसे एक देहाती सामने आया... डरते हूए ही.

" इहा आओ ... ऐसे सामने... " सरपंचने उसे एक तरफ़, सामने आनेका इशारा किया.

" और तुम... गुंगीका बाप ... रघु... इहा आओ ... ऐसे... तनिक उके बगलमाँ खडे हो जाओ " सरपंचने गुंगीके बापको आदेश दिया.
 
वह गुंगेके बापके बगलमें जाके खडा हो गया. गुंगीका बाप हीन दीन अवस्थामें खडा था. उसने एकबार अपने बगलमें ख़डे गुंगेके बापकी तरफ़ देखा लेकिन उसने उसकी उपस्थितीका ऐहसास दिखानेकीभी जरुरत नही समझी. वह अक्कड और हेकडीके साथ बेफ़िक्रसा खडा था.

" ए ... गुंगेको छोड दियो . ... " सरपंचने अगला आदेश दिया.

गुंगेको पकडे जवानोने उसे छोड दिया.

" उको ईहां खडा करो... उके बापके बगलमाँ .... " सरपंचने उन जवानोंमेसे एक जवानको फ़र्माया.

बह युवक गुंगोको पकडकर उसके बापके बगलमें ले गया.

" तूम तुमरी बेटीको इहा लाकर खडा करीयो " सरपंचने लडकीके पिताको आदेश दिया.

लडकीका बाप धीरे धीरे लडकीके पास गया. गुंगी अभीभी जमिनपर पडी अपना मुंह छुपाकर रो रही थी. उसका बाप उसके पास जाकर खडा हो गया. वह कुछ क्षण हिचकिचाया. उसे समझ नही आ रहा था की मै अब उसे किस हकसे उठाऊ. उसने झुककर उसके कंधेको पकडकर उठाया. वह दर्दसे कराहती हुई उठ गई. उसकी और उसके बापकी एक क्षण के लिए नजरे मिल गई और वह अपने पितासे लिपटकर रोने लग गई. उसके बापकेभी आखोंमे आंसू आगए और अनजानेमें उसका धीरज भरा हाथ उसे सहलाने लगा. वह दृश्य देखकर गणेशका दिलभी भर आया था.

" उको इहा लेकर आओ ...ऐसन " सरपंचने उसे टोकते हूए फ़िरसे आदेश दिया.

रघूने गुंगीको अपनेसे अलग किया और उसके कंधेको पकडकर सामने लेकर गया. वह उसके पहले जगहपर खडा होगया और बगलमें उसने अपने बेटीको खडा किया. गुंगी गर्दन झुकाकर खडी हो गई. इतनी बडी भिडसे आंखे मिलानेकी शायद उसकी हिम्मत नही बन रही थी.

गणेशने पहली बार उस गुंगीको इतने करीबसे देखा था. वह खुबसुरत थी. रंगभी गोरा था. शरीर भी सुडौल था. लेकिन इतने सौदर्यमें एक ही बाधा थी की वह गुंगी थी. अगर उसके गुंगेपन के बारेमें पता नही हो तो कोईभी पहली नजरमें उसे प्रेम कर बैठे ऐसा उसका रुप था.

" अब सारे लोगन ... मेरी बात सुनियो ... " सरपंचने सबको आदेश दिया.

गुंगीका बाप सरपंचकी तरफ़ देखने लगा. गुंगेका बापभी ना चाहकरभी सरपंच की तरफ़ देखने लगा. गुंगी बेचारी अबभी अपनी गर्दन झुकाए खडी थी. और गुंगा कभी सरपंचकी तरफ़ तो कभी गुंगीकी तरफ़ देख रहा था. उसकी गुंगीकी तरफ़ देखनेवाली नजरमें उसको उसके बारेमें लगने वाली चिंता और संवेदना दिख रही थी. बेचारा शायद सचमुछ उससे प्यार करता था. वह गुंगा होकरभी उसकी हर हरकतसे उसका गुंगीके प्रती प्रेम व्यक्त हो रहा था. शायद वह बोल पाता तो बोलकरभी इस तरह व्यक्त नही कर पाता. फिरभी उसके मुक भावनाओंको शायद गुंगीसे जादा कोई नही समझ पाता.

" तुम लोगन को अपनी इज्जत प्यारी रही ? ..." सरपंचाने लोगोंसे सवाल किया.

सिर्फ़ गुंगीके पिताने सरपंचकी तरफ़ आगतिकतासे देखा. गुंगेका बाप सरपंचसे नजरे चुरानेकी कोशीश कर रहा था.

" तुम लोगन को अपने गावकी इज्जत प्यारी रही ? " सरपंचने इसबार गुंगेके पिताकी तरफ़ रुख करते हूए गंभिरतासे पुछा.

गुंगेके पिताने किसी तरह हिचकिचाते हूए सरपंचके नजरसे नजर मिलाई.

" तो फ़िर सुनियो पंचायतका फैसला… मै इहा इसी वक्त कर देता हूं ..."

सारे लोग सरपंच आगे क्या कहता है यह सुननेके लिए बेताब थे.

" इ दोनो की जल्द से जल्द पहला मुहूर्त देखाइके शादी कर डालियो ..."

सारे लोगोंने आश्चर्यसे सरपंचकी तरफ़ देखा.

अरे यह हमारे दिमागमें क्यो नही आया ? .... शायद उनको ऐसा लगा होगा .

सारे लोगोंके नजरोंमे हामी दिखने लगी थी.

" काहे रघू तुम्हे कबूल रही ?" सरपंचने गुंगीके पितासे पुछा.

" जी ... महाराज ... लडकेके बापने हमका सहारा दियो तो बडे उपकार होंईगे हमरे उपर .." गुंगीका बाप गुंगेके बापकी तरफ़ बडी आशासे देखता हुवा बोला.

गुंगेके बापने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही की. वह सिर्फ़ गहरी सोचमें डूबे जैस दिखने लगा खा.

" काहे पांडूरंग तुमको कबूल रही ?" सरपंचने गुंगेके बापसे पुछा.

" जी सरकार ... जोबी आपकी मर्जी " गुंगेका बाप हडबडाकर बोला.

सारे भिडमें जमे लोगोंके चेहरेपर खुशी झलकने लगी थी. गणेश कौतुहलके साथ सरपंचकी तरफ़ देखने लगा.

इसे कहते है नेतृत्व ...

सचमुछ ... सरपंचजी ... आज मान गए आपको ...

सरपंचने एक चुटकीमें सबको पसंद आएगा ऐसा न्याय और फ़ैसला देकर इतनी बडी समस्या सुलझाई थी.

" अरे फ़िर एक दुसरेका मुंह काहे ताक रहे .... चलो शुरु होई जाओ और कामपर लग जाओ ... हमें जल्द से जल्द शहनाई बजानी है का नाही ? " सरपंचभी खुशीशे बोल उठा और गांव की दिशामें तेजीसे चल पडा. सारे लोगभी अब खुशीसे सरपंचे पिछे पिछे चल पडे.
 
कुछ उत्साही जवान लडके खुशीके मारे आवेशके साथ घोषणाए देने लगे.

"सरपंच.."

"जिंदाबाद"

"सरपंच'

"जिंदाबाद"

गणेश जितना हो सके उतना मधुराणीके दूकानपर जाना टालने लगा था. लेकिन आज उसकी मजबुरी थी. क्योंकी उसे कुछ सामान खरीदना था और गावमें दुसरा दुकान जो था वहभी बंद था. दुसरा दुकान हर शुक्रवारको बंद रहता था. हर शुक्रवारको उस दुकानदारके शरीरमें गजानन महाराज प्रवेश करता है ऐसा लोग कहते थे.

लेकिन गजानन महाराजका दिन तो गुरुवार....

फ़िर गुरुवार के बजाय...

शुक्रवारको कैसे गजानन महाराज उसके शरीरमें प्रवेश करते है ....

गणेशने उस बात पर काफ़ी रिसर्च करनेकी कोशीश की. काफ़ी लोगोंसे इस सवालका जवाब ढुंढनेकी कोशीश की. लेकिन किसीके जवाबसे गणेशका समाधान नही हूवा. लेकिन एक दिन ऐसेही सोचते हूए गणेशको उसका जवाब मिल गया. गुरुवार साप्ताहिक बाजार का दिन था. उस दिन खरीदारीके लिए आस पडोसके देहातके लोग उजनीमें आते थे. उनकी पुरे हफ़्तेमें जितनी कमाई नही होती होगी उससे कई जादा कमाई उस एक दिनमें होती थी. मतलब गुरवारका दिन दुकान बंद रखना कतई उसके हितमें नही था. इसलिए शायद एड्जेस्टमेंट के तौरपर गजानन महाराज उसके शरीमें गुरवार के बजाए शुक्रवारके दिन प्रवेश करते होंगे. गणेश मनही मन मुस्कुराने लगा.

सामान लेनेके लिए थैली लेकर गणेश बाहर निकल पडा और उसने अपने दरवाजेको ताला लगाया. मधूराणीसे अपनी नजरे टालते हूए वह उसके दुकानमें गया. वह क्या चाहिए यह बताने वाला था इतनेमें वहा एक 3-4 सालका लडका दौडते हूए आगया.

" मासी एक चॉकलेत देइयो ..." एक सिक्का सामने लकडीके पेटीपर रखते हूए वह अपनी तोतली बोलीमें बोला.

मधुराणीने तुरंत उसे उठाकर अपने पास लिया,

" मासीके बछडे ...किते दिनसे आए रहत ... इते दिन कहा था बबुआ .." मधुराणीने उसे अपने पास लेते हूए तिरछी नजरोंसे गणेशकी तरफ़ देखते हूए कहा.

" जावो ... मै किस्से बात नाही करत .... " मधुराणीने इतराते हूए लडकेसे कहा. बिचबिचमें वह तिरछी नजरोंसे गणेशकी तरफ़ देखती.

" मासी चॉकलेत ..." वह बच्चा फ़िरसे बोल उठा.

" देती रे मेरे... लाल ... " मधुराणीने तिरछी नजरसे गणेशकी तरफ़ देखते हूए उस बच्चेको लगातार दो तिन बार चुमा.

मधुराणीने उस लडके को छोड दिया और चॉकलेट निकालकर उसके हाथमें थमा दिया. चॉकलेट हातमें आतेही वह लडका तुरंत दौड पडा.

" ऐसे आवत रहो मेरे बछ्डे .. " मधुराणी जोरसे बोली.

दौडते हूए उस लडकेने मधुराणीकी तरफ़ देखा और वह मुस्कुरा दिया.

" बडा प्यारा बच्चा है जी " मधुराणीने गणेशसे कहा.

मधुराणी गणेशसेही बात कर रही थी इसलिए गणेशको एकदमसे क्या बोला जाए कुछ सुझ नही रहा था.

" हां ना... बच्चे मतलब भगवानके यहांके फ़ुल होते है " गणेश किसी तरहसे बोल पडा.

" भगवानको मानत हो ?" मधुराणीने गणेशसे पुछा.

" वैसे मानताभी हूं ... और नहीभी " गणेशने कहा.

" कभीबी किसी एक छोर को पकड़े रहियो ... दुइयो छोर पे होनेकी कोसीस करियो तो बडी मुस्कील होवे है ... " मधुराणी गणेशके आखोंमे आखे डालकर बोली.

उसके बोलनेमें हलकीसी तकरार महसुस की जा सकती थी. गणेश उसके बोलको समझनेकी कोशीश करने लगा.

" छोडो जान दो... बहुत दिनवा के बाद दिखाई दिए रहे ... कुछ लेनेके लिए आए रहे या फिर ऐसेही " मधुराणीने एकदमसे अपना मूड बदलकर ताना मारा.

" वैसे नही ... मतलब थोडा सामान लेनेका था.... " गणेश हिचकिचाते हूए बोला.

" तो भी मै बोलू... आज बाबू सुरजवा पश्चिमसे कैसे निकल पडा " मधुराणीने फ़िरसे ताना मारा.

" नही वैसे नही ... " गणेश अपना पक्ष मजबुत करनेके उद्देश से कहने लगा.

" आज शुक्रवारको उधरका दुकान बंद होवेगा इसलिए आए होगे " मधुराणीने अपनी नाराजगी जताते हूए कहा.

गणेशको क्या कहा जाए कुछ समझमें नही आ रहा था.

गणेशका बुझसा गया चेहरा देखकर मधुराणी खिलखिलाते हूए बोली.

" तुम तो एकदम नाराज होये जी .... मै तो बस मजाक कर रही थी बाबूजी "

मधुराणी इतने जल्दी जल्दी अपने भाव कैसे बदल पाती है इस बातका गणेशको आश्चर्य था. कही वहभी तो नही गडबडा गई की कैसी प्रतिक्रिया दी जाए.

लेकिन एक बात तो पक्की थी की मेरा रुखा बर्ताव उसे कतई पसंद नही आया था...

गणेशका एकदमसे दिल भर आया. मानो उसका उसके प्रति प्रेम उमडने लगा था और किसी प्रेमीने ठूकराए प्रेमीकाके जैसी उसकी अवस्था लगने लगी थी. अपने दिलका दर्द छिपानेके लिएही शायद वह इतने जल्दी जल्दी अपने भाव बदल रही थी. उसे लगा तुरंत आगे जाकर उसे अपने बाहोमें भर लूं. उसे सहलाऊं... और उसके दिलका दर्द कम करनेकी कोशीश करुं.

शायद मेरा बर्ताव उससे कुछ जादाही रुखा था...

मुझे उसे इस तरहसे एकदम तोडकर नही बर्ताव नही करना चाहिए था. ....

उसपर जी जानसे मरनेवाला उसका सखा इस दुनियामें नही रहा... .

इसलिए शायद वह मुझमें उसका सखा ढुंढनेकी कोशीश कर रही होगी...

लेकिन मै कैसे उसके पतीकी जगह ले सकता हूं.?... .

मेरीभी कुछ मर्यादाएं है...

फ़िरभी अपनी मर्यादाओंमे रहके जितना हो सकता है उतना उसके लिए करनेमें क्या हर्ज है ...

तबतक मधुराणीने गणेशका सामान निकालकर उसके सामने रख दिया.

" ई लो अपना सामान " मधुराणीने कहा.

" लेकिन मैनेतो क्या क्या निकालना है कुछ बोलाही नही ... "

" बाबूजी ... मै क्या आपको एक दो दिनसे जान रही ... तुमको कब क्या चाहिए हो ... मई सब जानत रही ... "

सचमुछ उसे जो चाहिए बराबर वही सामान उसने निकाला था ...

कितनी बारीकियोंसे वह मुझे जानने लगी है ...

यहांतक की साबुन कौनसी लगती है ...

चाय कौनसी लगती है ...

और कितनी लगती है ...

सचमुछ वह मुझसे प्यार तो नही करने लगी ...
 
शायद हां ...

नहीतो मेरी इतनी छोटी छोटी चिजोंपर वो भला क्यो ध्यान देती...

उधर दिमागमें विचारोंका सैलाब चल रहा था और बाहरी तौर पर वह अपने थैलीमें अपना सामान भरने लगा था. एक हाथसे थैली पकडकर दुसरे हाथसे सामान भरनेमें उसे दिक्कत हो रही थी.

" लाओ जी मै पकडाए देती हू थैली " कहते हूए मधुराणीने अपने दोनो हाथोसे थैली पकड ली.

थैलीका एक तरफ़का हिस्सा गणेशने पहलेसेही पकडा हूवा था. उस हिस्सेको मधुराणीने इस तरहसे पकडा की गणेशका हाथभी उसके हाथमे आ जाएं. अचानक मधुराणीने उसका हाथ अपने हाथमें लेनेसे गणेश हडबडा गया. उसने हडबडाहटमें अपना हाथ झटसे पिछे खिंच लिया. लेकिन अगलेही क्षण उसे अपने गल्तीका अहसास होगया.

मै भी कितना पागल ... अपना हाथ पिछे खिंच लिया ...

कितना अच्छा मौका था. ...

दैव देता है और कर्म ले जाता है ... लोग झुट नही कहते ...

मुझे थैलीका दुसरा हिस्सा फिरसे पकडना चाहिए ...

वह थैलीका मधुराणीका हाथ रखा हुवा हिस्सा पकडनेके लिए मन मन निश्चय करने लगा था. लेकिन उसकी हिम्मत नही बन रही थी.

गणेशकी वह हडबडाहट देखकर मुस्कुराते हूए मधुराणी बोली , " बाबूजी आपतो एकदम वो ही हो ... आपके बिवी का न जाने कैसा होवे रहे "

अरे क्या कर रहा है ? ...

वह तो सिधा तुम्हारे मर्दानगीपर घांव कर रही है ...

गणेशने पक्का निश्चय कर मधुराणीका हाथ रखा हुवा हिस्सा पकडनेकी चेष्टा की. लेकिन तबतक थैलीमें पुरा सामान डालना हो गया था.

" अब और कुछ डालना है ... थैलीमें " गणेशने उसका थैलीके साथ पकडा हुवा हाथ देखकर मजाकमें कहा.

" नही .. बस इतनाही " कहकर गणेशने फिरसे अपना हाथ पिछे खिंच लिया.

मधुराणी नटखटसी फिरसे मुस्कुराने लगी. गणेश शर्माकर लाल लाल हो गया था. उसे अपना खुदकाही गुस्सा आ रहा था. की वह ठिकसे इतने बडे मौके का फायदा नही ले पा रहा था. इसलिए उसका चेहरा औरही लाल हो गया था. उस अवस्थामें उसने झटसे थैली उठाई और तेजीसे अपने कमरेकी तरफ़ निकल पडा.

कमरेका ताला खोलकर अंदर जानेसे पहले उसने एकबार पलटकर मधुराणीकी तरफ़ देखा. वह अबभी उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही थी. न जाने क्यो उसे क्या लग रहा था - कही वह यह तो नही सोच रही की , '' कितना बेवकुफ़ है ... कैसा होगा इसका.'

वह झटसे कमरेंमें घुस गया. दरवाजा बंद करनेके लिए पलटनेकीभी उसकी हिम्मत नही बनी. कमरेमें आतेही सिधा वह बाथरुममें चला गया. लोटेसे मटकेका ठंडा पाणी निकालकर चेहरेपर छिडका.

क्या कर रहा है तू ...

वेवकुफ़ के जैसा ...

वह सिग्नलपे सिग्नल दे रही है ....

और तूम हो की बस ढक्कनके जैसे कुछ नही कर रहे हो ....

नही कुछतो करना चाहिए ...

गणेशने अपना जबडा कस लिया.

मैने अपने आपपर बहुत संयम रखनेका प्रयत्न किया. ...

लेकिन मधुराणी तुम ही हो की जो मेरे प्रयत्नको यश मिलने देना नही चाहती ...

अब मै हार गया हूं ...

पुरी तरह हार गया हूं ...

अब इसके आगे जो भी होगा उसके लिए मै जिम्मेदार नही होऊंगा ...

उसके लिए मधुराणी तुम ही पुरी तरहसे जिम्मेदार होगी ...

ऐसा विचार मनमें आते ही गणेशको हल्का हल्का महसूस होने लगा था. उसके अंदरके अपराधके भाव पुरी तरहसे नष्ट हो गए थे.

पाटिलकी हवेली पर हमेशा चहल-पहल का माहौल बना रहता था , दरअसल यह एक पुरानी हवेली थी जो छोटी पहाड़ी पर बनी हुई थी . इसके चारों ओर एक दीवार बनी हुई थी और पहरे के लिए चार पाँच जगह इसी दीवार पर सुरक्षा चौकियाँ बनी हुई थी, जिसमें चौकीदार पहरा दिया करते थे . आज कल वह चौकियाँ खाली रहतीं थी , क्योंकि अब वैसी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं थी . आज हवेली में खास बैठक बुलाई गयी थी . एक एक कर गाँव वाले आने लगे . पाटिलकी हवेली से बुलावा गाँववालों के लिए बड़ी इज़्ज़त की बात होती थी . हालाँकि बैठक में गिने-चुने गाँववालों को ही बुलाया गया था. लेकिन बैठक में क्या चर्चा होती है इस बात को जानने कई गाँव वालों ने आस पास ही डेरा जमाया हुआ था , जिसे जहाँ जगह मिली वह वहीं बैठ गया .

बैठक में हिस्सा लेने वाला शख्स बड़ी शान से सीना चौड़ा कर उस जमावड़े को बड़ी हिकारत से देखते हुए हुए हवेली के अंदर जा रहा था . बैठक के दौरान हवेली से बाहर किसी वजह से जो भी आदमी आता था उससे 'ताज़ा हाल' जानने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था और वह बाहर आया हुआ आदमी ना - नुकुर करते भाव खाते हुए लोगों को अंदर की खबर देता था .

गणेश जैसे ही हवेली के करीब पंहुचा उसने घड़ी में देख कर इस बात की तसल्ली करना चाही कि कहीं उसे देर तो नहीं हो गयी , उसने देखा तय समय को ५ मिनट बाकी थे . जैसे ही उसका ध्यान आस पास के जमावड़े की ओर गया उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा . उसने सोचा -

मेरे यहाँ आने से पहले ही यहाँ बैठक तो शुरू नहीं हो गयी ...

लेकिन बैठक को तो वक्त है...

या बैठक शुरू होने के पहले ही कुछ हो गया .....

गणेश ने सरसरी निगाह से लोगों के जमावड़े का जायज़ा लिया. सबकी कौतूहल भरी आँखें उसी को देख रहीं थी .

अब भीतर जा कर ही बात पता चलेगी....उसने खुद से मन ही मन कहा .

गणेश ने जल्दबाज़ी में हवेली की ओर कदम बढ़ाए , लेकिन भीतर जाने के लिए दो-तीन रास्ते थे. वह ठिठक गया .अब इनमें से किस रास्ते से भीतर जाया जाए ? वह इस बात को सोचते हुए उसने आस पास नज़रें दौड़ाई , तभी पाटिल साहब का नौकर उसे दिखाई दिया .

" यहाँ इस तरफ ..." उस नौकर ने एक जगह इशारा करते हुए कहा.

गणेश उसके पीछे पीछे चल दिया , गणेश उसकी ओर देख कर मुस्कुराया . गणेश पहली बार इस हवेली में आया था. हालाँकि उसकी और पाटिल साहब की कई दफ़ा मुलाकात हो चुकी थी लेकिन वे सभी या तो आफ़िस में या गाँव के किसी आयोजन में हुई थी .वह नौकर घुमावदार रास्ते से होता हुआ गणेश को हवेली के उपरी हिस्से में ले गया , उपर आलीशान बैठक थी जहाँ गाँव के २-४ रसूखदार लोग बैठे हुए थे . गणेश को आते देख उनमें दुआ सलाम हुई .पाटिल और सरपंच का आना अभी बाकी था .

गणेश बैठक के एक कोने में जा कर बैठ गया . बाकी लोग बाग बीड़ी , पान, चिलम , तंबाखू का मज़ा लेने में मशगूल थे और साथ ही साथ खेती किसानी की बातें हो रहीं थी . गणेश का उन लोगों में जा कर बात करने का जी नहीं हुआ, इसलिए एक तरफ वह अकेला ही बैठा रहा . उसके बगल में ही दूसरे कोने में एक बूढ़ा गाँववाला बैठा हुआ था . उस गाँववाले ने कमीज़ के नीचे हाथ डाल कर कुछ टटोला और बनियान के भीतर बनी ख़ुफ़िया जेब से खाकी कपड़े की छोटी से गठरी बाहर निकाली. उसने गठरी की गाँठ हौले से खोली. बड़े आराम से चिलम की सफाई की . चिलम के पिछवाड़े एक छोटी गोली जैसी कोई चीज़ थी , उसने वह चीज़ बाहर निकाली और उसे साफ किया और वापिस चिलम के पिछवाड़े डाल दिया. शायद वह चीज़ चिलम पीते हुए तंबाखू को मुँह के अंदर जाने से रोकने का काम करती थी , इसलिए उसे पिछवाड़े डाला जाता होगा. इसके बाद उसने उस गठरी से कपड़े की एक और छोटी गठरी निकाली . गणेश उस बूढ़े की हरकतों पर बारीकी से नज़रें जमाए हुए था . उसने उस छोटी गठरी की गाँठ खोली उसमें मौजूद तंबाखू को उसने चिलम में दबा कर भर दिया . अब वह दोबारा गठरी में कुछ ढूँढने लगा. उसने उसमें से एक सफेद पत्थर का टुकड़ा निकाला उसे गाँव वाले 'चकमक पत्थर' कहते थे. और चकमक पत्थर के टुकड़े खेतों में या झरने के किनारे बालू में बहुतायत में मिलते थे . उस पत्थर को वैसे ही हाथ में पकड़े हुए गठरी से उसने कोई की-चेन जैसी चीज़ बाहर निकाली उस चीज़ के एक सिरे पर असल में लोहे की एक छोटी मोटी पट्टी थी और दूसरे सिरे पर उस पट्टी से बँधी हुई रेशमी चीज़ थी. उस रेशमी चीज़ को बीचों बीच काट कर एक छोटी सी डिबिया बनाई गयी थी , उस डिबिया में रूई रखी गयी थी . गणेश ने कभी किसी से इस बारे में पूछा था तो उसे बताया गया वह रूई कपास के बीजों के बजाए किसी जंगली पौधे के बीजों से बनाई गयी थी, जिसे वह लोग 'कफ' कह कर पुकारते थे . उस बूढ़े ने उस रेशमी डिबिया से थोड़ा कफ निकाल कर सफेद पत्थर के सिरे पर उसे लगाया और उस छोटी लोहे की पट्टी से उस पत्थर को जोरों से घिस कर , कफ जलाने ले किए वह चिंगारी पैदा करने लगा. दो तीन बार की गयी असफल कोशिशों के बाद चौथी बार उस कफ ने आग पकड़ ली . उसने वह जलता हुआ कफ चिलम के मुंहाने रखा और उसके पिछवाड़े एक छोटे से कपड़े की चिंदी ठूंस कर वह चिलम पीने लगा , जैसे जैसे वह जोरों से कश लेता था चिलम के मुंहाने पर उसे तंबाखू अंगारों की तरह लाल दिखता था . दो तीन लंबे कश ले कर बड़ी शान से वह बूढ़ा मुँह से धुआँ छोड़ रहा था .

उसे अहसास हुआ की गणेश उसे काफ़ी देर से अपलक देखे जा रहा है अगली दफे दो चार लंबे कश ले कर धुआँ छोड़ते हुए उसने चिलम वाला हाथ गणेश की ओर बढ़ा कर बोला " पीवेगा ?"

गणेश ने अजीब सा मुँह बना कर हाथ के इशारे से मना किया.

" नाही? .... अरे बबुआ का नसा है इसका ...बहुत बढ़िया .... उ बीड़ी , सिगरेट मा कौनो दम नाही ... एक कस ले के तो देख"

बूढ़े ने दोबारा मिन्नत की.

"मुझे नही चाहिए ... " कहते हुए गणेश ने अपनी नज़रें उस बूढ़ें से हटा कर दूसरी ओर कर लीं .
 
गणेशकी नज़र बाहर खुले में बालकनी की तरफ गयी . वह उठ कर बालकनी में आ गया उसने आस पास देखा , यह हवेली गाँव की सबसे उँचाई पर स्थित थी , लिहाजा गाँव के सभी घर उँचाई से खिलौनों की भाँति दिख रहे थे. उन घरों के आस पास खेतों की हरियाली आँखों बड़ी ठंडक दे रही थी. और उस हरियाली के बीचों बीच सर्पिले घुमावदार मोड़ ले कर झरना कल कल करता बह रहा था . चारों ओर उँचे उँचे पहाड़ और टीले के बीच में बसे हुए गाँव की उस कुदरती खूबसूरती को वह निहार रहा था .

लोगों में मची हलचल से वह अपनी सोच से बाहर आया , उसने पीछे मुड़ कर देखा . उस दीवानखाने में भारी भीड़ जमा हो गयी थी लेकिन अभी भी पाटिल साहब और सरपंच का कोई अता - पता न था . वह वापिस दीवानखाने में आया , उसकी जगह अभी भी खाली थी वह वहाँ जा कर बैठ गया. तभी गाँव के स्कूल मास्टर मते गुरु जी का आना हुआ , लोगों ने उनका अभिवादन किया , उन्होने बैठने से पहले पूरे दीवानखाने का जायज़ा लिया और कोने में बैठे हुए गणेश की ओर रुख़ कर लिया . इंसानी फ़ितरत भी बड़ी अजीब होती है, इतनी भीड़ में भी अपने बैठने लायक आरामदायक जगह तलाश कर ही लेता है . उन्होने सोचा....

कोने में बैठा हुआ गणेश भी सरकारी मुलाज़िम है और मैं भी सरकारी मुलाज़िम हूँ , हम दोनो की खूब जमेगी ...

उन्होने गणेश को नमस्ते की और उसके बगल में आ कर बैठ गये.

"और गणेश जी सब कुशल मंगल ? बड़े दिनो बाद मुलाकात हुई" उन्होने बैठे हुए गणेश को थपकी देते हुए कहा .

" जी हाँ ... हमारा आपके स्कूल की तरफ आना नहीं होता और आपका हमारे दफ़्तर में .... फिर ऐसे खास मौकों पर ही हमारी मुलाकात होती है " गणेश ने जवाब देते हुए कहा .

" जी , यह भी खूब कही आपने " मास्टर जी ने कहा.

तभी सरपंच का आगमन हुआ और दोबारा दुआ सलाम का दौर चल निकला . कुछ लोग उनका हाल चाल पूछने उनकी ओर चल पड़े .

" आ गये सब के सब ? " सरपंच जी ने जानना चाहा . उन्होने ऐसा कर लोगों को अपने आने की खबर दी .

" करीब करीब सब आ गये , सिर्फ़ पाटिल साहब का आना बाकी है.... में यूँ गया और यूँ उनको ले कर आया" उनका हाल चाल पूछने आया एक आदमी बोला .

उसकी और गौर न कर सरपंच साहब बैठक के बीचों बीच आए और रसूखदार लोगों में जा कर बैठ गये .

" शामराव जी सब ख़ैरियत ?" सरपंच ने शामराव के बगल में बैठते हुए पूछा.

" का कहें हुजूर .... अब के बरस बड़ी हिम्मत कर बुआई करा है अब देखे हमरा किस्मत में का गुल खिलना लिखा है " शामराव ने जवाब दिया .

" अरे कौनो चिंता का बात नाही अपने बड़ा काम किया आपको तो इनाम मिलना चाहिए सरकार से ... हौसला रखिए सरकारी अमले के पास ज़रूर कोई योजना होगी" सरपंच ने शामराव को तसल्ली देते हुए कहा और गणेश की ओर मुखातिब होते हुए बोले " अरे गणेश जी कोई नयी योजना है का? "

" हाँ हैं न , इस बारे में विस्तार से बात करने के लिए मैं एक बैठक बुलाना चाहता हूँ " गणेश ने जवाब दिया.

" अरे तो भई जल्दी करो.... कब लेओगे ?.... बताओ?" सरपंच ने लगेहाथ पूछ ही लिया.

" जब भी आप कहें" गणेश ने कहा.

"फिर ई शुक्रवार का दिन कैसा रहेगा ?" सरपंच ने पूछा " क्यों शामराव जी ?"

" हाँ हुजूर चलेगा" शामराव ने जवाब दिया .

" मुझे मंजूर हैं , मैं नोटिस तैयार कर चपरासी के ज़रिए सब तक पंहुचाता हूँ ..." गणेश बोला.

" अरे चपरासी का कौनो ज़रूरत नाही ... सब इधर ही मौजूद हैं .... आप तो बस वखत बताओ" सरपंच ने कहा.

"सुबह दस बजे कैसा रहेगा" गणेश ने सरपंच से पूछा .

" चलेगा ..... क्यों गाँववालों ?" सरपंच ने बैठक में मौजूद अन्य गाँववालों की राय जानना चाही .

" हाँ.. हाँ... चलेगा.. चलेगा" भीड़ में दो चार लोग बोले .

" हाँ तो गणेश जी .. ई तय रहा .. शुक्रवार के रोज सुबह दस बजे " सरपंच ने फ़ैसला सुनाया.

गणेश ने सहमति से गर्दन हिलाई . गणेश को सरपंच जी की हाथों हाथ फ़ैसला करने की अदा बड़ी भाती थी . उसे भला क्या खबर थी कि सरपंच की इसी आदत के चलते गाँव के कई लोगों को मायूसी होती थी , उनकी अक्सर यह शिकायत होती थी कि उनकी राय सरपंच कभी नहीं लेता , और उनकी तरफ से सारे फ़ैसले खुद ही लेता था .

अचानक गणेश को अहसास हुआ कि लोगों की बातचीत की आवाज़ें थम सी गयी .उस वक्त वह बगल में बैठे मास्टर जी से बतिया रहा था . उसने वजह जानने के लिए पीछे मुड़ कर देखा और यह देख कर हैरत में पड़ गया कि बैठक में मौजूद सारे लोग दरवाज़े की ओर एकटक देखे जा रहे थे . लोगों की देखा देखी उसने भी दरवाज़े पर नज़र डाली और वह यह देख कर सन्न रह गया .... चौखट पर मधुरानी खड़ी थी . वह आज सज धज कर आई थी .

वह यहाँ क्यों आई ? क्या वजह हो सकती है ? .....

वह उसी को निहार रही थी.

गणेश को काटो तो खून नहीं . वह सोचने लगा ....

कहीं यह बला मेरे पीछे तो यहाँ तक नहीं पंहुच गयी?

इधर मधुरानी ने चौखट पर खड़े खड़े ही लोगों पर एक नज़र डाली . सरपंच जी को देखते ही उसने उन्हें राम-राम की. एक बार फिर उसने चारों ओर नज़र धूमाई और इस बार उसकी नज़र गणेश पर आ कर ठहर गयीं . गणेश उसको देख मुस्कुराया . वह गणेश की ओर धीरे धीरे बढ़ने लगी . वह जैसे जैसे पास आती जा रही थी गणेश के दिल की धड़कनें तेज़ होती जा रहीं थी. उसे पसीने छूट रहे थे .

" अरी इहा आओ मधुरानी " सरपंच जी ने उसको पास बैठने के लिए पुकारा .

" ना जी इहा कोने मा ही ठीक है" उसने जवाब दिया.

अब कहीं जा कर गणेश की जान में जान आई.

"यानी की वह इसी बैठक में हिस्सा लेने आई थी. मैं भी न जाने क्या सोच रहा था " गणेश ने मन ही मन कहा.
 
गणेश की आँखों के सामने वह दृश्य तैर गया जब बीच बाज़ार एक लफंगें के चिकोटी काटने पर मधुरानी ने उसकी चप्पल से जम कर धुनाई करी थी .

मधुरानी गणेश के एकदम करीब आ कर पालथी मार कर बैठ गयी थी . यह देख गणेश सोचने लगा - यहाँ जगह की कमी के चलते वह यूँ इस तरह मेरे पास आ मुझे छूते हुए बैठी है .... नहीं वह अगर चाहती तो लोगों को तोड़ा खिसकने के लिए कह कर अपने बैठने के लिए जगह आराम से बनवा सकती थी ... लेकिन उसे तो मास्टर साहब और मेरे बीच ही बैठना था .. ज़रा देखूं तो क्या उसका पालथी मास्टर जी को भी छू रही है ? लेकिन यह क्या मास्टर जी से तो वह थोड़े फ़ासले पर बैठी है लेकिन मुझ से तो चिपक कर बैठी है...

गणेश को उसके नर्म जिस्म की छुअन बड़ी अच्छी लग रही थी . वह जानबूझ कर वैसे ही बैठा रहा. बीच बीच में वह चोर निगाहों से आस पास नज़र दल कर यह जानने की कोशिश करता कि कहीं कोई उन्हें देख तो नही रहा . लेकिन मधुरानी तो अपने चेहरे पर मुस्कान लिए ऐसे बैठी थी की शायद ही किसी को गणेश पर शक हो .

यह देख कर उसने चैन की सांस लीं उसने गौर किया कि आस पास के लोग चोर निगाहों से मधुरानी को ही निहार रहे थे कुछ तो इतने बेशरम थे कि खुल्लम खुल्ला उसके बदन को ताक रहे थे .

इधर सरपंच जी का पाटिल साहब की राह देखते देखते बुरा हाल हो गया था " पाटिल साहब अभी तक नहीं आए ? " उन्होने बेसब्री छुपाते हुए कहा.

" पाटिल जी पूजा कर रहे हैं " उनका एक चमचा बोल पड़ा.

"इतनी देर पूजा पाठ ? .... भई किसकी पूजा कर रहे हैं ? हम भी तो सुनें ?" सरपंच जी ने ताना मारा.

लोगों में हँसी की लहर दौड़ गयी.

" जा भैया अंदर जा , ज़रा बतला दे , सब गाँव वाले काफ़ी देर से उनकी राह देख रहे हैं उनसे कहना ज़रा जल्दी करें " सरपंच ने उस चमचे को हुक्म सुनाया.

वह अपनी टोपी पहनते हुए और लंबे लंबे ड़ग भरता दरवाज़े के बाहर निकल गया.

बड़ी देर हो गयी वह बंदा पाटिल जी को बुलाने गया लेकिन वापस नहीं लौटा , सरपंच जी की बेसब्री देख कर एक और आदमी पाटिल जी को संदेसा देने बाहर गया वह भी गायब हो गया . अब लोगों में बातचीत बंद हो गयी , कुछ लोग बेसब्री से इधर उधर चहल कदमी करने लगे . कुछ लोग बीड़ी चिलम सुलगा कर कश लेने लगे कुछ तंबाखू हथेलियों में रगड़ने लगे . सरपंच जी का सब्र अब टूटने लगा था वह बाहर दालान में चल कर आए मगर फिर भी कई लोग अब भी दीवान खाने में मौजूद थे , कुछ वहीं पैर फैला कर बैठ गये.

गणेश वहाँ से हिलने को तैयार नहीं था वह अब भी मधुरानी की नर्म मुलायम छुअन के मज़े ले रहा था . उसने देखा इक्का दुक्का लोग उठ कर बाहर टहलने जा रहे हैं , उसने सोचा उसे भी तोड़ा बाहर घूम आना चाहिए वरना यूँ इस हाल में कोई देखेगा तो ग़लतफहमी हो जाएगी , वह उठने लगा.

" ओ रे गनेस जी किधर जात हो ? आपको भी सिग़िरेट की तलब लगी है का ? " मधुरानी ने उससे पूछा .

गणेश हार कर वैसे ही नीचे बैठ गया तभी लोगों का हुजूम बाहर से अंदर आ गया .

"लगता है पाटिल साहब आ गये " गणेश बोला

" हाँ जी कितनी देर इंतेजार करवाया " मधुरानी परेशान होते हुए बोली .

फिर गणेश की ओर देखते हुए बोली " पर ई अच्छा हुआ आप बैठक में मिल गये वरना मैं कभी की चली जाती " गणेश उसकी ओर देख मुस्कुराया .

बाहर से आए सब लोग जब अपनी अपनी जगह बैठ गये तो आख़िर में पाटिल जी अंदर आए . अंदर आते ही सब को देख उन्होने नमस्ते की फिर बैठक के बीचोंबीच आ कर बाहर खड़े सरपंच जी को पुकारा "राम राम सरपंच जी अंदर आइए , अब बैठक शुरू करते हैं "

सरपंच जी मुड़ कर अंदर आए और उनकी नमस्ते का जवाब दिया थोड़े झुंझलाते हुए वह पाटिल साहब की बगल में आ कर बैठ गये.

" बैठक शुरू की जाए..." मानों पाटिल जी सरपंच की आज्ञा ले रहे हों , सरपंच जी ने पाटिल जी की ओर देख कर गर्दन हिलाई.

बैठक में आए लोगों का जायज़ा लेते लेते उनकी दृष्टि कोने में बैठी मधुरानी पर टिक गयीं

"मधुरानी अरी यहाँ सामने आ कर बैठ " पाटिल जी ने उसे सामने आ कर बैठने को कहा.

"मैने तो आते ही साथ उससे सामने बैठने को कहा था ... लेकिन..." अपनी बात अधूरी छोड़ कर सरपंच जी मधुरानी की ओर देखते बोले.

मधुरानी ने वहाँ बैठे बैठे ही हाथ से उनको इशारा किया कि वह ठीक ठाक बैठी है और बैठक शुरू की जाए .

फिर सभा में नज़र डालते अचानक ही पाटिल जी को कुछ याद आया " ओ गाँववालों ई बार इलेक्सन में दूई सीट महिला के लिए हैं , ई सोच कर हमने मधुरानी को बुलवा भेजा , कम से कम एक सीट का तो फ़ैसला होना चाहिए " पाटिल जी बोले

गणेश को पाटिल साहब की बातों पर गौर कर रहा था , पाटिल जी किसी चालाक राजनेता की तरह बातें बनाने में माहिर थे , पिछले बार जब उसकी उनसे मुलाकात हुई तो उसने जाना की वह बड़ी साफ हिन्दी बोलते थे और बड़े पढ़े लिखे जान पड़ते थे , फिर यहाँ गँवई हिन्दी बोलने की क्या तुक ? शायद लोगों से अपनापन जताने की चाल हो.

" फिर बैठक शुरू करते हैं . " पाटिल जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा .

" गूंगी का बापू किधर है? " ... "और उस गुँगे का बाप ??" उन दोनो को खोजते हुए पाटिल जी की नज़र कोने में सिमट कर बैठे हुए लोगों में गयी " रे आप लोगन वहाँ काहे बैठे रहे ? इक इस कोने में तो दूजा दूजे कोने मैं , बात का है भई ?" पाटिल साहब ने मजाकिया अंदाज़ में कहा .

लोगों में क़हक़हे लगने लगे.

" अरे यहाँ आइए दोनों के दोनो " पाटिल साहब ने उन्हें सामने बुलाया .

पाटिल जी ने फिर से अपनी नज़रें बैठक में घुमाई और इस बार मास्टर जी और उनके बगल में बैठे गणेश को संबोधित कर बोले " अरे मास्टरजी आप तनिक आगे आइए , गनेस बाबू आप भी , पंडित जी थोडा आगे सरकिये " .

हार कर अब गणेश को वहाँ से उठना ही पड़ा. उसने मधुरानी की तरफ कनखियों से देखा, उसके होंठों पर शरारती मुस्कान थी , गणेश आगे जा कर पाटिल जी के साथ बैठ गया.

"तो सरपंच जी पहले क्या किया जाए ?" पाटिल जी ने सरपंच जी की ओर मुड़ कर पूछा .

" जी अब तो दोनो के बापू तय कर चुके हैं , क्यों भाइयों?" सरपंच जी पांडूरंगराव और रघु की ओर देख कर बोले .

दोनो ने अपनी गर्दन सहमति में हिला दी.

" फिर ब्याह का मुहूरत तय करना चाहिए " सरपंच जी बोले.

" पहले लेन देन का तो तय कर लो" बीच में एक बोल उठा .

"वो भी करेंगे पहले मुहूरत तो तय कर लो" सरपंच जी उसकी बात काटते बोले.

पाटिल जी पंडित की ओर मुखातिब हो कर बोले " अरे पंडित जी ज़रा देख कर बताओ शुभ मुहूरत कौन सा है? "

पंडित जी पंचांग के पन्ने पलटने लगे, फिर कुछ देख कर बोले "तुलसी विवाह के बाद शुभ मुहूरत २६ तारीख को आता है"

"कौन से रोज ?" सरपंच जी पूछे .

"बृहस्पतिवार" पंडित जी जे जवाब दिया .

"यानी के साप्ताहिक बाजार वाले रोज" एक गाँव वाला बोला.

"पंडित जी , दूसरा मुहूरत देखो कोई " सरपंच जी बोले.

गाँव में बृहस्पतिवार के दिन बाजार का था , लोगों की खरीददारी के लिए यह दिन तय था . यदि इस दिन ब्याह होता तो कई लोग बाग शामिल न हो पाते .

पंडितजीने थोड़ी देर और पांचांग के पन्ने उल्टे पुल्टे किए और बोले "अगला मुहूरत उसी महीने की २८ तारीख को आता है .. शनिवार के रोज"

"ठीक है , ब्याह २८ को करना तय कर लो , क्यों भाइयों " सरपंच जी पांडु और रघु की ओर देखते बोले.

गूंगों के बापुओं ने चुपचाप गर्दन हिला दी.
 
"२८ तारीख को बात हो गयी पक्की" पाटिल जी ने फ़ैसला सुनते हुए कहा .

" अब लेनदेन की बातें हो जाएँ " एक बंदा उतावला हो कर बोला . शायद उसे गूंगे के बाप ने पहले ही साध रखा था .

पाटिल जी ने पांडुरंग राव को पूछा " क्यों भैया का चाहते हो? "

पांडुरंग राव ने बदहवासी से पाटिल जी को देखा .

तभी गणेश ने देखा पाटिल जीने सबकी नज़रें बचा कर गाँव के डॉक्टर साहब को आँख मार कर इशारा किया .

डाक्टर साहब भी कुछ कहने के उठ खड़े हुए " एक मिनट , ज़रा ठहरिए " सबकी निगाहें डाक्टर साहब की और घूम गयीं वह काफ़ी शर्मीले थे और ऐसी बैठकों में खास बोलना पसंद नहीं करते थे , लेकिन लोग यह जानने को बेकरार हो उठे थे की डाक्टर साहब क्या कहते हैं.

" देखिए ..... ऐसा है , गूंगे और गूंगी की शादी में एक दिक्कत है " डाक्टर साहब गला साफ कर बोले.

"दिक्कत? कैसन दिक्कत? " दो चार लोग हैरत से बोले.

डाक्टर साहब और गंभीर हो गये. लड़की के बाप की यह देख कर हालत पाली हो गयी.

"ज़रा खुल कर बताइए डाक्टर जी " सरपंच जी ने बेताबी से कहा.

दो तीन मिनट यहीं गुजर गये .

"अरे डाक्टर जी कुछ बोलो तो सही " पाटिल जी बेसब्री से बोले "मुँह में दही जमा है क्या?"

" हैं जी ??? म..म..मैं सोच रहा था य.. यहाँ बोलना ठीक रहेगा?" डाक्टर अपना पसीना पोछते हुए बोला .

" अरे ओ डाक्टर , सीधे सीधे बताता काहे नहीं है.... का दिक्कत है ?" गूंगी का मामा कड़क कर बोला.

उसे गूंगी के बाप ने समझा बुझा कर चुप कराया . डाक्टर इधर बेबसी से पाटिल जी की ओर देख रहा था , उसके पसीने छूट रहे थे "अरे बताओ डाक्टर जी घबराईए मत , मैं हूँ न ?" पाटिल ने कहा.

हिम्मत जुटा कर डाक्टर बोला " जी ऐसा है की गूंगा और गूंगी की शादी होती है तो उनके बच्चे भी गूंगे पैदा होंगे , म म मेरा मतलब इस बात की गुंजाइश ज़्यादा है "

बैठक में सबको साँप सूंघ गया .

"उससे कौनो फरक नाही पड़े है" एक आदमी बोला.

"कैसे नाही पड़े है ? एक आदमी पांडुरंग राव के बगल से उठते बोला. शायद वह उनका रिश्तेदार था " इहा इक गूंगे लड़के को पालते पालते ससुरा खून पानी बन गया , अब ब्याह हुआ तो दो गूंगा जोड़ा , और बच्चे भी गुंगे पैदा हुए तो गूंगों की फौज , इन सबको क्या आप संभालेंगे ?"

"उनको हम संभालेंगे , आप उसकी चिंता नाही करो" गूंगी का मामा उठ कर बोला.

"अरे हमार वंश का होगा ? हमरा पोता भी गूंगा ??? ना.. ना... ई हांका मंजूर नाही" दूसरा रिश्तेदार बोला.

"अरे भाई दोनो पार्टी के लोग थोड़ा सब्र करो बैठ जाओ" सरपंच बीच बचाव करते हुए बोले.

"अरे ओ सरपंच !! तू संभालेगा उन गूंगों को ? " लड़के का मामा बोला .

"अरे भाई उसका भी कोई रास्ता निकाल लेंगे , मैं अकेला क्या कर सकता हूँ , पूरे गाँव वालों की मदद चाहिए " सरपंच जी उसको समझाते हुए बोले.

"मतलब ए ही होगा ....की वो गूंगे गाँव की सड़कों पर हाथ फैला कर भीख माँगे हैं.... और आप गाँव वाले उनको भीख देंगे " लड़के का मामा कड़क कर बोला फिर पांडुरंग जी का हाथ पकड़ कर बोला " चलिए जी , यह ब्याह अब न होवे है . अपने बेटे को और भी अच्छे रिश्ते आवे रहे हैं और ई गूंगी से ब्याह रचा कर उसकी जिंदगी खराब नहीं करनी "

" अरे थोड़ा ठंडे दिमाग़ से सोचो भाई , यूँ गुस्सा ना करो अपने बेटे का तो ख्याल करो " गणेश ने बीच बचाव किया .

" आपसे मतलब ? कौन हो जी आप? " लड़के के मामा ने गणेश पर भड़क कर कहा .

" हमारे गाँव के बड़े साहब हैं" एक आदमी ने बताया.

" देखो साहब जी ....अपने काम से काम रखो.... हमारे मामले में टाँग न अड़ाओ , वरना अच्छा नहीं होगा " मामा कड़क कर बोला.

गणेश मन मार कर रह गया .

"चलो जी आप चिंता न करो , हमारे लड़के का ब्याह मैं कराऊंगा वह भी किसी अच्छा छोकरी से , गूंगी बाहरी से नहीं " मामा पांडुरंग जी का हाथ पकड़ कर बोला.

" अरे और आप के छोकरे ने हमारी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी , उसका का होगा ? " लड़की के मामा ने मोर्चा संभाल लिया.

" हमको उससे कौनो मतलब नाही , तुमसे लड़की संभाली नही जात है , हमारी का ग़लती? तुम्हारी लड़की है ही कुलच्छनी , हमार लड़के पर डोरे डाल कर उसको अपने जाल में फाँस लिया , कलमुंही जाए भाड़ में " लड़के के मामा दरवाज़े से तेज आवाज़ में बोला.

" हरामज़ादे मैं तेरी ज़बान खींच लूँगा " लड़की की तरफ से एक गाँव वाला उठ खड़ा हुआ .

" माधरज़ाद साला ससुर का नाती" लड़की का मामा गुस्से से चीखा " अरे ओ सुदामा , पकड़ इस कुत्ते को , आज इस हरामी की माँ बहन एक करता हूँ " कहते हुए वह लड़के वालों की तरफ लपका .

चारों ओर अफ़रा तफ़री मच गयी. लड़की वाले और लड़के वाले आपस में उँची आवाज़ में चिल्ला चोट करने लगे. कुछ हाथापाई पर उतारू हो गए , चारो और लात घूँसे चल रहे थे , खूब गाली गलौज हो रही थी.

तभी एक तेज रौबदार आवाज़ गूँजी " खामोश!!!! " " सुअर के बच्चों !!!" "हरामज़ादो , यह क्या रंडी बाजार बना रखा है" "निकल जाओ इस घर से , बाहर जा कर जो करना है करो" पाटिल साहब गुस्से में ज़ोर ज़ोर से बोल रहे थे.

पूरी बैठक में खामोशी छा गयी.

" रामू!!!!!" " कहाँ मर गया ससुरा? "

"जी मालिक?" हवेली का एक कारींदा दौड़ा दौड़ा आया , पाटिल जी ने झगड़ने वालों की ओर इशारा कर कहा "उठा कर बाहर फेंक दो इन मधर ज़ाद को"

रामू और उसके साथियों ने तुरंत हुक्म की तामील की वह उन लोगों को धक्के दे कर बाहर निकालने लगे .

गणेश , मधुरानी और अन्य लोग बड़ी हैरत से यह ड्रामा देखे जा रहे थे . बैठक में सबको जैसे साँप सूंघ गया था , केवल बाहर जाने वालों की चप्पल चटखने की आवाज़ आ रही थी .

" माफी चाहता हूँ ..... आप सब आराम से बैठिए " पाटिल जी ने कहा "आज कल तो भलाई का जमाना ही नही रहा"

सरपंच जी भी अब बाहर जाने लगे.

"अरे सरपंच जी तनिक ठहरिए , थोड़ा जलपान करिए फिर बैठक बर्खास्त करते हैं " पाटिल जी बोले।

" आप सब लोग भी बैठिए.... और चाय वाय पी कर जाइए वरना आप लोग कल चर्चा करेंगे कि पाटिल जी ने चाय तक को नहीं पूछा "

अब तक दोनो पार्टी के लोग नीचे पहुँच चुके थे और नीचे से झगड़ने की ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें उपर तक आ रहीं थी.

गणेश जब मधुरानी की दुकान के सामने से गुजरा तो वहाँ ख़ासी भीड़ थी . कल बैठक में हुई बमचक के बाद से वह काफ़ी बेचैन था. लिहाज़ा मधुरानी से बात कर अपनी बेचैनी से छुटकारा पाना चाहता था. मगर लोगों की भीड़ देख कर उससे मिल पाना मुमकिन नहीं था. गणेश ने भीड़ में गर्दन उठा कर मधुरानी की ओर देखा , उनकी नज़रें मिलते ही वह अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराई.

मानों उसकी आँखें उससे कह रही हों ....मेरी मजबूरी को समझो...इन लोगों के होते हुए मै तुमसे कैसे मिल सकती हूँ"

गणेश बेचैनी से उसकी दुकान की तीन चार चक्कर लगा आया, फिर हार कर एक जगह खड़े हो कर सोचने लगा.…

यहाँ चहल कदमी करने से कुछ हासिल नहीं होगा , उल्टा अगर किसी को शक हो गया तो बेकार की मुसीबत गले पड़ जाएगी …

उसने भीड़ में गर्दन उठा कर मधुरानी की ओर देखा और हाथ से "बाद में आने" का इशारा किया . उसकी भी

अपनी आँखों से मूक सहमति पा कर उसने वहाँ से कदम बढ़ाए .

अचानक उसे अजीब सी आवाज़ सुनाई दी " जफ्र आफ़र मैफ़र तुंफ्र राफ्र देफ्र" वह ठिठक कर वहीं बीच रास्ते ठहर गया.

यह तो शायद मधुरानी का ख़ुफ़िया संदेसा है , क्या कह रही थी वह… पिछली बार... उसने अपनी याददाश्त पर ज़ोर डाल कर याद करने की कोशिश की ....अरे हाँ वह फालतू की " फ्र , फ्री" हटाने की बात कर रही थी , क्या मतलब हो सकता है इसका ??? ज से जल्दी ?? आ से आना ?? म से मैं , तु तुम , रा से राह दे से देखना ???"

उसके दिमाग़ में यह बात कौंधी ...."जल्दी आना , मैं तुम्हारी राह देखूँगी" ....
 
अरे वह शायद मुझ ही से बातें कर रही थी , मगर किसी को शक न हो इसलिए अपनी ख़ुफ़िया ज़बान में बोली.... उसने दूर मुड़ कर देखा , मधुरानी उसी को देखती हुई शरारत से मुस्कुरा रही थी , हाय वह उसकी मदहोश करने वाली शराबी आँखें , और दिल पर छुरियाँ चलाने वाली नशीली नज़र , मानों वह अपने आशिक को करीब बुला रहीं हों , गणेश भी उसकी ओर देख मुस्कुराया और अपने कमरे की तरफ बढ़ा.

रास्ते में उसे वही गूंगी लड़की लोटा ले कर खेतों की तरफ जाती दिखाई दी , उसने आस पास देखा उस गूंगे लड़के का कहीं अता पता न था . लेकिन यह उसकी नज़रों से न बच सका क़ि आस पास के लोग भूखी नज़रों से गूंगी के जिस्म को ताके जा रहे थे . उड़ते उड़ते उस तक यह बात पंहुची थी कि उस गूंगे लड़के को उसके घरवालों ने एक कमरे में क़ैद कर रखा था, और सुबह शाम पहरे पर एक क़ारींदा बैठा रखा था. शायद इसलिए वह गूंगी लड़की भी उदास सी लग रही थी , भारी कदमों से वह अपने कमरे में लौट आया.

वहाँ से लौट कर वह बिस्तर पर लेटा और उसकी आँख लग गयी .

अचानक उसकी नींद टूट गयी - दरवाज़ा पर खटखट हुई , वह चौंक कर उठ खड़ा हुआ ....भला इस समय कौन आया होगा ?.... उसने आगे बढ़ कर खिड़की से झाँक कर पता करना चाहा , बाहर अंधेरा छा गया था , उसने मधुरानी के दुकान की तरफ देखा , दुकान में अब कोई ग्राहक न था , मधुरानी भी दुकान में न थी .

शायद यह मधुरानी ही होगी....

वह जल्दी से दरवाज़े के करीब आया और होंठों पर मुस्कान लिए उसने दरवाज़ा खोला . लेकिन यह क्या ? दरवाज़े पर मधुरानी न थी , यह सारजाबाई थी जो खाना ले कर आई थी . चुपचाप उन्होने अंदर आ कर भोजन की थाली रख दी और सुबह की जूठी थाली ले कर चली गयी . अंदर आ कर उसने सोचा "दुकान खुली छोड़ कर मधुरानी न जाने कहाँ गयी होगी" .

गणेश बाहर आया और उसकी नज़रें मधुरानी को इधर उधर खोजने लगीं , उस दिखाई दिया अंधेरी गली के कोने में खड़ी मधुरानी किसी औरत से धीमे धीमे बातें कर रही थी. उस दूसरी औरत ने हाथों में लोटा पकड़ रखा था . अचानक उस औरत की नज़र गणेश की तरफ गयी और ज़रा तेज आवाज़ में अपनी बात ख़त्म करते हुए बोली "अबकी बार मोडे को बड़े डाक्टर को दिखाएँगे ऐसे मेरा मर्द बोला " और जाते जाते बोली " बाद मा बताऊंगी"

उस को जाता देख मधुरानी भी अपनी दुकान की ओर चल पड़ी और रास्ते में गणेश को देख पूछा " तब के वखत आए रहे ?" , गणेश ने बाहर से कमरे का दरवाज़ा बंद किया और वह भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा.

"हे भगवान , कैसे बदमिज़ाज लोग हैं यह , बेकार बखेड़ा खड़ा कर दिया इन गाँववालों ने " गणेश मधुरानी से बतियाते हुए बोला " अच्छी ख़ासी चर्चा चल रही थी सब गुड गोबर कर दिया "

" सादी ब्याह के मामलों में ऐसा ही होवे है बाबू तुम न जानत रहे , कौन मुआ किस बात को ले कब आड़े आ जाए कौनो खबर न रहे " मधु रानी जवाब देते हुए बोली.

कुछ सोच कर गणेश बोला " कुछ भी हो , मुझे तो इसमें उस पाटिल का ही हाथ नज़र आता है "

"उ कैसे ? " मधुरानी ने पूछा.

" तुम भूल गई ? सरपंच जी ने उनको चर्चा करने पर राज़ी किया था , मुझे लगता है पाटिल जी को यह नागवार गुजरा "

" ना ना बाबूजी ... पाटिल भला आदमी है उ बात होती तो उसने अपनी हवेली में उनको बुलावा न भेजा होता " मधुरानी की बात सुन गणेश एक पल सोच में पड़ गया .

इसे पाटिल जी से इतनी हमदर्दी क्यों ? .....

आख़िर इसी पाटिल की जीप तले आकर इसके मर्द ने अपनी जान गँवाई थी .और फिर भी यह उसी की तरफ़दारी करती है , क्या वजह हो सकती है? अब यूँ तो पाटिल के बुलाने पर भी इसको वहाँ जाना नहीं चाहिए था.... हुम्म! इसी से पूछता हूँ ... लेकिन क्या यह वाकई मायने रखता है? .....

फिर वह मधुरानी को जवाब देते हुए बोला " अरे इसी बला को तो राजनीति कहते हैं "

तुनक कर वह बोल उठी " ई राजनीति हमें न मालूम है बाबू ....हम तो बस इतना जानत रहे कि उ पाटिल बाबू मक्कार ना है , दिल का सरीफ़ होवे है , हम कहे देते है .... हमको आदमी की परख करना आवे है , आपको न परखा हमने ? " शरारत से उसकी आँखो में आँखें डालते हुए वह बोली.

"तुम औरतों तो पैदाइशी भोली भली होती हो , खैर मैने पाटिल जी को डाक्टर साहब को इशारा करते हुए देखा है"

गणेश उसकी नज़रें टाल कर बोला.

"जाने दो न बाबू जी उ मुए पाटिल को , काहे उसकी बातें करत हो" वह उठकर उसकी ओर खिसक कर बैठ गई .

"जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ ... अब उस बेचारी गूंगी लड़की का क्या होगा ? अपनी नासमझी और ज़िद के चलते उसके अरमानों का बेदर्दी से कत्ल किया इन लोगों ने . उस लड़की के साथ बहुत ग़लत हुआ कम से कम यह देखकर तुम्हें कुछ तो विरोध करना चाहिए था , लेकिन तुम भी चुप रह गयीं , तुमसे मुझे यह उम्मीद न थी " गणेश झुंझला कर बोला.

उसने मधु रानी की तरफ देखा , यह बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत एक पल में बदल गयी . गणेश को महसूस हुआ कि बेकार ही उसने उससे गुस्से में इतनी कड़ी बात कर दी .

"साहब जी" वह संजीदा आवाज़ में दूर कहीं देखते हुए बोली " ई दुनिया में कई सही गलत बातें होत हैं ...ई सब किस्मत का खेल है जो भाग में लिखा है... सो होवे है उ भाग के आगे हमारा तुम्हारा कोई बस न चले है" फिर वह रुककर बोली "आप भी तो उहाँ बोले थे , कौनो फायदा हुआ उ लोगों के सामने मुँह खोल कर ? उल्टा पूरा गाँव के सामने बेइज़्ज़ती हो गयी"

यह सुन कर गणेश सकपका गया.

मधु रानी संभल कर बोली " उ लोगन के सामने मैं भी बोली रही तो मुझे भी डपट देते कि औरतों - लुगाइयो को बीच में बोलना न चाहिए " वह अपनी रौ में बोली चली जा रही थी .

गणेश बीच में बोल उठा " न न मेरा वह मतलब न था " गणेश उसके सामने सफाई देते हुए बोला .

लेकिन उसकी बात को बीच में काटते हुए मधुरानी बोल पड़ी "आप सोचत रहे कि उनका ब्याह हो जाता तो अच्छा रहता , आप लोगन के लगने से कौनो फ़र्क पड़े है ? मुझे भी लागे है कि आपके संग मेरा ब्याह हो जावे तो कितना अच्छा हो "

गणेश का मुँह खुला का खुला रह गया वह ऐसे चौंक उठा मानों उसे बिजली का झटका लगा हो. वह फटी फटी आँखों से मधु रानी को अपलक देखता ही रह गया .

बात को आगे बढ़ाते हुए उसने कहा "लेकिन मेरा ऐसन सोचने से का होवे है बाबू जी ? .... ई तो किस्मत की बात होवे है"

हे भगवान ! यह मुझ पर डोरे डाल रही है ? क्या यह मेरे गले पड़ने की सोच रही है?..... गणेश सोच में पड़ गया .... बडी चालू चीज़ है यह , मुझे फाँसने की कोशिश कर रही है.… गणेश के पसीने छूट गये .

"बाबूजी" मधुरानी की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी.
 
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