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Guest
गणेश ने फ़ैसला कर लिया की वह अब मधुरानी से कोई रिश्ता नहीं रखेगा. वह उठा और अपने घर जाने के लिए बॅग भरने लगा. लेकिन उसे अहसास हुआ की घर जाने की बात को लेकर वह उतना उत्साहित न था. वह समझ न पा रहा था की ऐसा क्यों था. आख़िर इतने दिनों बाद वह बीवी से मिलने जा रहा था फिर भी उससे मिलने को लेकर वह उत्साहित न था. शायद इस मधुरानी के चक्कर में वह इतना उलझ चुका था की उसे बीवी बच्चों का ख्याल न रहा .
लेकिन अब ऐसा कभी नहीं होगा अब इस मधुरानी का किस्सा ख़त्म .... बिल्कुल ही ख़त्म.... गणेश ने मन ही मन दोहराया.
पिछली दो रातों से गणेश की आँख न लग पाई थी सोमवार रात भी उसने उसी बेचैनी में काटी .
अच्छा हुआ जो समय रहते मुझे माधुरानी का सच पता चल गया...
लेकिन मैं अब भी न जाने क्यों बैचें हूँ? … गणेश परेशन हो उठा .
सुबह उठ कर गणेश नहाया धोया , दाढ़ी बनाई . बैग में से धुले हुए इस्त्री किए हुए कपड़े निकाल कर पहने और बैग बंद करी. सारजा बाई को उसने कल ही इत्तला कर दी थी . बैग ले कर वह घर से बाहर निकला और दरवाज़ा बंद कर ताला लगाया . ताला लगाते समय उसने यह सोच लिया की वह दुकान की ओर न देख कर सीधे बस स्टाप जाएगा.
ताला चढ़ा कर वह मुड़ा और बोझिल कदमों से चलने लगा लेकिन उसके कदम बरबस ही उसे माधुरानी की दुकान की ओर ले जाने लगे .
"कैसे हो गणेश बाबू.. दो रोज हो गये आपको देखे बगैर" मधुरानी उसे दुकान की ओर आते देख बोल उठी " कुछ जी ठीक ना था का?"
" हाँ ज़रा तबीयत ठीक न थी..."
"और ए बॅग उठाए तालुका जा रहे हो का?"
गणेश को अब अहसास हुआ की इसने मज़ाक में ही सही उसकी बीवी के बारे में अब तक कभी कोई पूछताछ न की थी.
" हाँ वहीं जा रहा था"
" ए अच्छा हुआ .... हमरी दुकान का भी काफ़ी समान ख़त्म हुई गवा है और आप तालुका जा रहे हो"
गणेश मौन खड़ा रहा.
" ए लीस्ट लीजियो हमने विलास से बनवाई रही ..."
उसने लिस्ट उसे थमाते हुए कहा , उसने लिस्ट अपनी जेब में रखी और चलने के लिए मुडा.
" ओ गणेश बाबू रुकिये तो ज़रा समान कैसे लावेंगे ? ए बड़ी थैली रखिए "
गणेश ने वह थैली लेने के लिए हाथ बढ़ाया . हाथों में थैली लेते हुए मधुरानी के नर्म मुलायम हाथों का स्पर्श पा कर वह रोमांचित हो उठा.
यही वो नर्म अहसास ... यही वह नाज़ुक सी छुअन....
उसकी सारी उदासी मानों गायब से हो गयी थी एक नया जोश उसकी रगों में दौड़ रहा था. उसने दूसरा हाथ थैली पकड़ने के लिए आगे बढ़ाया और मौका पा कर उसे छू लिया , उसने मधुरानी की आँखों में आँखें डाल कर देखा:
वही शोख नज़र...
वही मीठी मुस्कान ...
उसकी सारी उदासी दूर हो गयी. वह बड़े जोश में थैली उठाए बस स्टाप की ओर बढ़ा . गली में मुड़ते वक्त उसने मधुरानी की ओर देखा. वह अब भी उसकी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी. वो गली में मूड गया और तेज कदमों से बस स्टाप को ओर चल पड़ा. उसे अब पूरी तरह अहसास हो गया था की वह भी अब मधुरानी की कार्यकर्ता मक्खियों के झुण्ड में में शामिल हो गया था.
..................गणेश बाबू जब अपने खयालोंसे होश मे आए ....
उन्होने इर्द गिर्द देखा , हॉल लगभग खाली हो गया था. यानी कई लोग सरकार से मिल कर लौट चुके थे . गणेश बाबू का बेटा वीनू भी कहीं दिखाई न पड़ा. गणेश बाबू ने हॉल से बाहर आ कर देखा वीनू वहाँ भी न था
शायद उकता कर घर चला गया होगा..
आजकल लड़कों में कोई सब्र नहीं ..
नौकरी पाने के लिए न जाने कैसे- कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं , द्वारे द्वारे घूमना पड़ता है तब कहीं जा कर नौकरी मिलती है...
उन्होने सोचा इतने में किसी ने पुकारा
"गणेश बाबू गावंडे"
गणेश बाबू का चेहरा खुशी से चमक उठा. खुशी में अपने सामान की थैली लेने के लिए गणेश बाबू अपनी कुर्सी की ओर जाने लगे.
"गणेश बाबू गावंडे.. कौन हैं?" उनका नाम दोबारा पुकारा गया.
"मैं.. मैं.... गणेश बाबू गावंडे .." गणेश बाबू ने अपनी थैली संभालते हुए जल्दबाज़ी में दरवाज़े की ओर आते हुए कहा.
" अरे तो जवाब देने का क्या लेंगे जनाब..यहाँ आपका शुभ नाम चिल्ला चिल्ला कर मेरा हलक सूखा जा रहा है.." वह आदमी गणेश बाबू पर बरस उठा .
गणेश बाबू उसकी ओर देख कर एक खिसियानी हँसी हँसे.
" जाने कैसे कैसे नमूने मुँह उठा कर चले आते हैं यहाँ ... अब इन्ही को देखिए .. मुँह में दही जमा हुआ है इनके .. जवाब देना ज़रूरी नही समझते .. इन्हें लगता है मानों इन्हे सब पहचानते हैं ... खुद को न जाने क्या फिल्मी हीरो समझते हैं.." वह आदमी भुनभुनाते हुए दूसरे आदमी से कहने लगा.
गणेश बाबू ने डरते डरते अंदर जाने के लिए दरवाज़ा धकेला. उन्होने भीतर झाँक कर देखा . सामने ही एक मुलायम सोफे पर बैठी मधुरानी उन्हें दिखाई दी. जिसे लोग अदब से सरकार कहते थे वह मधुरानी ही थी . गाँव की एक मामूली दुकानदार से ... ग्राम पंचायत का चुनाव जीत कर सरपंच बनी ... फिर पंचायत समिति का चुनाव जीतते हुए ....आख़िरकार वह विधायक के पद तक आ पंहुची थी. उसके बगल में ही पाटिल बैठे थे .
उसकी इस उड़ान में यक़ीनन इन पाटिल साहब का ही हाथ होगा ... गणेश बाबू ने सोचा .
गणेश बाबु दरवाजे पर खड़े थे. लेकिन मधुरानी का ध्यान दरवाज़े की ओर न था. वह पाटिल जी से किसी मसले पर बातें कर रही थी . गणेश बाबू ने दरवाज़े को ज़रा और खोला और भीतर आ गये. लेकिन वह अंदर आए इसका ख्याल भी किसी को न था . वह दोनो अभी भी अपनी चर्चा में मग्न थे. गणेश बाबू पास ही एक कुर्सी के सामने जा कर उहापोह की स्थिति में खड़े रहे.
खुद से कैसे बैठूं किसी ने बैठने के लिए कहना चाहिए...
यूँ भी अबतक जो बेइज़्ज़ती हुई है वह कोई कम थोड़े ही है ?...
अंदर चिट्ठी भिजवाने के बावजूद भी मधुरानी ने इतनी देर इंतेजार करवाया...
गणेश बाबू ने सोचा.
मधुरानी ने हालत के मुताबिक खुद को ढाला था , इसका सबसे बड़ा सुबूत यानी उसकी भाषा जो शहर में रह कर साफ़ हो गयी थी. वहीं उनकी अपनी भाषा सुदूर गाँवों में काम कर गँवई हो गयी थी . उनका रहन सहन भी बदल गया था पॅंट शर्ट पहनना छोड़ अब वह शर्ट और पायजामा पहनने लगे थे.
इंसान को हमेशा तरक्की की राह चलना चाहिए .. जैसे मधुरानी चली ...मेरी तरह उल्टी दिशा में नहीं... उन्होने सोचा
उसके हाव भाव में यूँ तो कोई ख़ास फ़र्क नज़र नहीं आया. यूँ भी उसकी अदाएँ किसी रानी से कम न थी.
धीरे - धीरे पाटिल साहब और मधुरानी की चर्चा गर्म होते- होते फिर बहस में बदल गयी. मधुरानी अपनी बात ज़ोर दे कर मनवाना चाहती थी. लेकिन पाटिल जी थे की समझने को तैयार ही न थे , बहस गर्म होती जा रही थी. गणेश बाबू को महसूस हुआ की कहीं वे ग़लत समय पर तो न आ गये ? शायद थोड़ी देर और राह देख सकते थे. गणेश बाबू बाहर जाने को जैसे ही मुड़े तभी मधुरानी का ध्यान उनकी ओर गया.
"आइए गणेश बाबू विराजिये" मधुरानी ने थोड़ी देर अपनी चर्चासे बहार आते हुए कहा.
गणेश बाबू को मानो उसके साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आने लगे - उसकी वही चंचल शोख आँखें , वही शरारती मुस्कुराहट. उन्होने उसकी ओर देखा. यही चीज़ें आज भी कायम थी केवल समय के साथ चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आ गयी थी. उसने एक पल भी एहसास होने न दिया की कुछ देर पहले वह ताव ताव में बहस कर रही थी, यूँ तो अपने चेहरे के हाव भाव एक पल में बदलने की उसे महारत हासिल थी और गणेश बाबू इस बात से खूब वाकिफ़ थे.
लेकिन अब ऐसा कभी नहीं होगा अब इस मधुरानी का किस्सा ख़त्म .... बिल्कुल ही ख़त्म.... गणेश ने मन ही मन दोहराया.
पिछली दो रातों से गणेश की आँख न लग पाई थी सोमवार रात भी उसने उसी बेचैनी में काटी .
अच्छा हुआ जो समय रहते मुझे माधुरानी का सच पता चल गया...
लेकिन मैं अब भी न जाने क्यों बैचें हूँ? … गणेश परेशन हो उठा .
सुबह उठ कर गणेश नहाया धोया , दाढ़ी बनाई . बैग में से धुले हुए इस्त्री किए हुए कपड़े निकाल कर पहने और बैग बंद करी. सारजा बाई को उसने कल ही इत्तला कर दी थी . बैग ले कर वह घर से बाहर निकला और दरवाज़ा बंद कर ताला लगाया . ताला लगाते समय उसने यह सोच लिया की वह दुकान की ओर न देख कर सीधे बस स्टाप जाएगा.
ताला चढ़ा कर वह मुड़ा और बोझिल कदमों से चलने लगा लेकिन उसके कदम बरबस ही उसे माधुरानी की दुकान की ओर ले जाने लगे .
"कैसे हो गणेश बाबू.. दो रोज हो गये आपको देखे बगैर" मधुरानी उसे दुकान की ओर आते देख बोल उठी " कुछ जी ठीक ना था का?"
" हाँ ज़रा तबीयत ठीक न थी..."
"और ए बॅग उठाए तालुका जा रहे हो का?"
गणेश को अब अहसास हुआ की इसने मज़ाक में ही सही उसकी बीवी के बारे में अब तक कभी कोई पूछताछ न की थी.
" हाँ वहीं जा रहा था"
" ए अच्छा हुआ .... हमरी दुकान का भी काफ़ी समान ख़त्म हुई गवा है और आप तालुका जा रहे हो"
गणेश मौन खड़ा रहा.
" ए लीस्ट लीजियो हमने विलास से बनवाई रही ..."
उसने लिस्ट उसे थमाते हुए कहा , उसने लिस्ट अपनी जेब में रखी और चलने के लिए मुडा.
" ओ गणेश बाबू रुकिये तो ज़रा समान कैसे लावेंगे ? ए बड़ी थैली रखिए "
गणेश ने वह थैली लेने के लिए हाथ बढ़ाया . हाथों में थैली लेते हुए मधुरानी के नर्म मुलायम हाथों का स्पर्श पा कर वह रोमांचित हो उठा.
यही वो नर्म अहसास ... यही वह नाज़ुक सी छुअन....
उसकी सारी उदासी मानों गायब से हो गयी थी एक नया जोश उसकी रगों में दौड़ रहा था. उसने दूसरा हाथ थैली पकड़ने के लिए आगे बढ़ाया और मौका पा कर उसे छू लिया , उसने मधुरानी की आँखों में आँखें डाल कर देखा:
वही शोख नज़र...
वही मीठी मुस्कान ...
उसकी सारी उदासी दूर हो गयी. वह बड़े जोश में थैली उठाए बस स्टाप की ओर बढ़ा . गली में मुड़ते वक्त उसने मधुरानी की ओर देखा. वह अब भी उसकी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी. वो गली में मूड गया और तेज कदमों से बस स्टाप को ओर चल पड़ा. उसे अब पूरी तरह अहसास हो गया था की वह भी अब मधुरानी की कार्यकर्ता मक्खियों के झुण्ड में में शामिल हो गया था.
..................गणेश बाबू जब अपने खयालोंसे होश मे आए ....
उन्होने इर्द गिर्द देखा , हॉल लगभग खाली हो गया था. यानी कई लोग सरकार से मिल कर लौट चुके थे . गणेश बाबू का बेटा वीनू भी कहीं दिखाई न पड़ा. गणेश बाबू ने हॉल से बाहर आ कर देखा वीनू वहाँ भी न था
शायद उकता कर घर चला गया होगा..
आजकल लड़कों में कोई सब्र नहीं ..
नौकरी पाने के लिए न जाने कैसे- कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं , द्वारे द्वारे घूमना पड़ता है तब कहीं जा कर नौकरी मिलती है...
उन्होने सोचा इतने में किसी ने पुकारा
"गणेश बाबू गावंडे"
गणेश बाबू का चेहरा खुशी से चमक उठा. खुशी में अपने सामान की थैली लेने के लिए गणेश बाबू अपनी कुर्सी की ओर जाने लगे.
"गणेश बाबू गावंडे.. कौन हैं?" उनका नाम दोबारा पुकारा गया.
"मैं.. मैं.... गणेश बाबू गावंडे .." गणेश बाबू ने अपनी थैली संभालते हुए जल्दबाज़ी में दरवाज़े की ओर आते हुए कहा.
" अरे तो जवाब देने का क्या लेंगे जनाब..यहाँ आपका शुभ नाम चिल्ला चिल्ला कर मेरा हलक सूखा जा रहा है.." वह आदमी गणेश बाबू पर बरस उठा .
गणेश बाबू उसकी ओर देख कर एक खिसियानी हँसी हँसे.
" जाने कैसे कैसे नमूने मुँह उठा कर चले आते हैं यहाँ ... अब इन्ही को देखिए .. मुँह में दही जमा हुआ है इनके .. जवाब देना ज़रूरी नही समझते .. इन्हें लगता है मानों इन्हे सब पहचानते हैं ... खुद को न जाने क्या फिल्मी हीरो समझते हैं.." वह आदमी भुनभुनाते हुए दूसरे आदमी से कहने लगा.
गणेश बाबू ने डरते डरते अंदर जाने के लिए दरवाज़ा धकेला. उन्होने भीतर झाँक कर देखा . सामने ही एक मुलायम सोफे पर बैठी मधुरानी उन्हें दिखाई दी. जिसे लोग अदब से सरकार कहते थे वह मधुरानी ही थी . गाँव की एक मामूली दुकानदार से ... ग्राम पंचायत का चुनाव जीत कर सरपंच बनी ... फिर पंचायत समिति का चुनाव जीतते हुए ....आख़िरकार वह विधायक के पद तक आ पंहुची थी. उसके बगल में ही पाटिल बैठे थे .
उसकी इस उड़ान में यक़ीनन इन पाटिल साहब का ही हाथ होगा ... गणेश बाबू ने सोचा .
गणेश बाबु दरवाजे पर खड़े थे. लेकिन मधुरानी का ध्यान दरवाज़े की ओर न था. वह पाटिल जी से किसी मसले पर बातें कर रही थी . गणेश बाबू ने दरवाज़े को ज़रा और खोला और भीतर आ गये. लेकिन वह अंदर आए इसका ख्याल भी किसी को न था . वह दोनो अभी भी अपनी चर्चा में मग्न थे. गणेश बाबू पास ही एक कुर्सी के सामने जा कर उहापोह की स्थिति में खड़े रहे.
खुद से कैसे बैठूं किसी ने बैठने के लिए कहना चाहिए...
यूँ भी अबतक जो बेइज़्ज़ती हुई है वह कोई कम थोड़े ही है ?...
अंदर चिट्ठी भिजवाने के बावजूद भी मधुरानी ने इतनी देर इंतेजार करवाया...
गणेश बाबू ने सोचा.
मधुरानी ने हालत के मुताबिक खुद को ढाला था , इसका सबसे बड़ा सुबूत यानी उसकी भाषा जो शहर में रह कर साफ़ हो गयी थी. वहीं उनकी अपनी भाषा सुदूर गाँवों में काम कर गँवई हो गयी थी . उनका रहन सहन भी बदल गया था पॅंट शर्ट पहनना छोड़ अब वह शर्ट और पायजामा पहनने लगे थे.
इंसान को हमेशा तरक्की की राह चलना चाहिए .. जैसे मधुरानी चली ...मेरी तरह उल्टी दिशा में नहीं... उन्होने सोचा
उसके हाव भाव में यूँ तो कोई ख़ास फ़र्क नज़र नहीं आया. यूँ भी उसकी अदाएँ किसी रानी से कम न थी.
धीरे - धीरे पाटिल साहब और मधुरानी की चर्चा गर्म होते- होते फिर बहस में बदल गयी. मधुरानी अपनी बात ज़ोर दे कर मनवाना चाहती थी. लेकिन पाटिल जी थे की समझने को तैयार ही न थे , बहस गर्म होती जा रही थी. गणेश बाबू को महसूस हुआ की कहीं वे ग़लत समय पर तो न आ गये ? शायद थोड़ी देर और राह देख सकते थे. गणेश बाबू बाहर जाने को जैसे ही मुड़े तभी मधुरानी का ध्यान उनकी ओर गया.
"आइए गणेश बाबू विराजिये" मधुरानी ने थोड़ी देर अपनी चर्चासे बहार आते हुए कहा.
गणेश बाबू को मानो उसके साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आने लगे - उसकी वही चंचल शोख आँखें , वही शरारती मुस्कुराहट. उन्होने उसकी ओर देखा. यही चीज़ें आज भी कायम थी केवल समय के साथ चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आ गयी थी. उसने एक पल भी एहसास होने न दिया की कुछ देर पहले वह ताव ताव में बहस कर रही थी, यूँ तो अपने चेहरे के हाव भाव एक पल में बदलने की उसे महारत हासिल थी और गणेश बाबू इस बात से खूब वाकिफ़ थे.