S
StoryPublisher
Guest
'' जी ... आता हैजी '' उसने गर्वके साथ कहा.
'' अच्छा तो फिर इधर आकर इस पर्चीपर क्या लिखा है जरा पढके तो बता ... '' गणेश अबभी उस पर्चीको पढनेकी कोशीश करते हूए बोला.
उस देहाती लडकेने पहले गणेशके पास जानेके लिए कहांसे रास्ता है यह देखा. गणेशके सामने एकसे सटकर एक ऐसे तिन टेबल रखे हूए थे और गणेश बाए कोनेमें एकदम दिवारसे सटकर बैठा था. गणेशकी तरफ जानेका रस्ता वे तिन टेबल छोडकर एकदम दाए कोनमे था. फिर उस देहातीने गणेशके सामने रखा एक टेबल हटाकर उधर जानेकी कोशीश की. और फिर उसे क्या लगा पता नही एकदमसे अपनी उंची टांग टेबलके उस तरफ रखकर टेबलपरसे उधर चला गया. गणेश ने वह उसका तरीका देखा और हक्का बक्कासा होकर आश्चर्यसे उस लडके की तरफ देखने लगा.
'' अबे पगले हो क्या?'' गणेश गुस्सेसे चिल्लाया. लेकिन दुसरेही पल उस लडकेके चेहरेके भाव देखकर और उसका टेबल लांघनेका तरीका याद कर उसे उस लडकेकी हंसी आ रही थी.
'' अबे क्या येडे आदमी हो... वह उधरका रास्ता छोडकर... सिधे टेबल लांघकर इधर आगया तू...'' गणेश हसते हूए बोला.
उसे क्या बोला जाए? ... हंसे की उसे गुस्सा करे?... गणेशको कुछ सुझ नही रहा था.
तबतक वह लडका वह टेबल लांघकर गणेशके बगलमें खडे होकर उस परचीपर क्या लिखा है यह पढने लगा, '' खेत बोनेका परमान पत्र ''
गणेश बाजारमें दोनो तरफ लगे दुकानोंकी तरफ देखते हूए चल रहा था. सरपे मई महिनेकी धूप होते हूए लोग हरीभरी सब्जी, पके हुए आम, प्याज. लहसून लेकर बाजारमें दुकानें लगाकर बैठे थे. कोई तरकारीका दुकान लगाकर बैठे थे तो कोई सिर्फ धानके, जैसे गेहूं, ज्वार, चावल, ऐसे अलग अलग धानके दूकान लगाकर बैठे थे. आज जादा ना घुमते हूए गणेश सिधा बंडू हॉटेलवालेके टेंट के पास गया. बंडू गरमागरम भजिया, आलूवडे, दालवडे, मिर्च की भजिया, शेव, चिवडा, बुंदी , जलेबी ऐसे काफ़ी खानेकी चिजे उसके पास मिलती थी.
तलनेकी जायकेदार खुशबु, और गरम गरम तेल का मनको मोहनेवाला तडकेका आवाज, और सामने थालीमें रखे हूए कुछ पिले तो कुछ लाल ऐसी खानेकी चिजे. दुकानके सामनेसे गुजरा और उसके मुंहमे पाणी ना आया हो ऐसा बहुतही कम होता होगा. आलूवडेको वे लोग 'आलूबोंडा' कहते. बंडूके हॉटेलमें बना आलूबोंडा गणेशको खुब भाता था.
" आवो जी ... हमरे जैसा आलूबोंडा तुमको कही नाही मिलेगा... वो क्या है नाजी हमरा आलूबोंडा बनानेका तरीका बहुत अलग रही .... ' कहते हूए उसने आलूका बना हुवा गोला बेसनमें डूबोकर भट्टीपर रखे कडईके उबलते हूए गरम तेलमें छोडा. फिर दुसरा, तिसरा ... ऐसे आलूबडेसे कडई भरनेके बाद अपना बेसनसे भरा हुवा हाथ बगलमें रखे पाणीके बर्तनमें डूबोकर धोया. फिर गिले हाथसे पाणी की छीटे कडईमें आलूवडे तल रहे उबलते तेलमें छीडकी. 'तड् तड्' ऐसा आवाज हो गया. यह सब देखनेमेभी गणेशको बहुत मजा आता था. .
" बैठो ... साबजी ... बैठीयो तो ..."
गणेश दुकान के टेंटका कपडा उड ना जाए इसलिए रखे पत्थरपर बैठ गया. आलूवडे तलनेका इंतजार करते हूए वह उन तेलमें उबलते वडोंकी तरफ देखने लगा.
बंडू हॉटेलवालेके साथ दुकानमे उसकी बिवी उसे काममें हाथ बटाती थी. जब वह तलनेका काम करता था तब उसकी बिवी ग्राहक संभालती थी. और जब वह तलनेका काम करती तब बंडू ग्राहक संभालनेका काम करता . गणेशको किसीने कहा था की बंडू हॉटेलवालेने दो शादीया की थी. एक बिवी घर और उसके बच्चे संभालती थी तो दुसरी उसके साथ उसको हाथ बटानेके लीए उसके और उनके हॉटेलके साथ नगर डगर घुमती थी. ... कभी किसी मेलेमें, तो कभी दुसरे गांवके बाजारमें वे जाकर अपना दुकान लगाते थे. पंधरा दिन एक बिवी को लेकर घुमा की वह उसे घर और बच्चे संभालनेके लिए घर छोडता था और अगले पंधरा दिन दुसरे बिवीको लेकर घुमता था. अपने धंदेके अनुसार उसने अपना जिवन मानो ढाल लिया था. वैसे वह दुनियादारीके मामलेमे काफी होशीयार था. उसकी होशीयारी उसके दो शादिया करनेमें देखतेही बनती थी. दुसरी शादी करनेसे एक्स्ट्रा बिवी तो बिवी उपरसे बिना पगारकी नौकर भी उसे मिली थी.
अबतक बडे पुरे तलकर बन चुके थे. बंडू वे तले हूए वडे बाहर निकालकर एक थालीमें डालने लगा.
" दुसरे हॉटेलवाले ... ऐ ऐसे वडे खानेको परोसेंगे ... लेकिन ई तो आधाही काम हो गयाजी ... ."
वह बचे हूए वडे कडईसे थालीमें डालते हूए बोला.
" अब आगेका काम देकहियो ... इस वडे के कानके निचे ऐसे एक एक बजानेकी ... इस झारेसे .. ऐसे ... "
वह अपने हातमे थामा हुवा झारा हरएक वडेपर हल्केसे मारते हूए बोला.
जैसे जैसे वह उस झारेसे उन वडेको मारता था वैसे वैसे वे वडे टूटकर खुलते थे.
" और फिर इस खुले हूए वडोंको फिरसे तेलमें डालियो ... ऐसे ..."
फिरसे वे खुले हूए वडे तेलमें छोडते हूए वह बोला.
" अजी ई है आलूबोंडे बनानेकी असली ढंग... ये हम .... हमरे बापसे ... हमरा बाप ... उसके बाप से ... और उसका बाप ... उसके बापसे ... ऐसे पिढीयोंसे हम सिखत रहत ... ."
यह बंडूकी बकबक हर बार वडे खानेको आनेके बाद गणेशकोही नही तो वडे खानेको आए सारे ग्राहकोंको सुननी पडती. लेकिन सारे लोग ये इतने अच्छे जायकेदार वडे खानेके लालचमें सुन लेते थे. वह फिरसे तेलमें छोडे हूए वडे झारेसे हिला रहा था. बिच बिचमें यूंही बगलमें रखे पाणीके पतेलेमें हात डूबोकर पाणीकी कुछ छिंटे उस उबल रहे तेलके कडईमें छिडकता था. उससे वह 'तड् .. तड्' ऐसा आवाज बार बार आता था. और वह वैसा 'तड् .. तड्' आवाज करकी मानो उसे आदतही हो गई थी. शायद बाहर इतने तपते धुपमें... तपते भट्टीके सामने उतनेही उत्साहके साथ .. हमेशा काम करते रहनेका रहस्य शायद उस 'तड्.. तड्' होनेवाले आवाजमेंही छिपा हो ऐसा गणेशको हमेशा लगता था.
पेट पूजा होने के उपरांत गणेश ने बाज़ार के मैदान के कोने में स्थित , महादेव के मंदिर में जाने का निश्चय किया. वह महादेवीजी का मंदिर देखने में भले ही प्राचीन था परन्तु काफी बड़ा था . मंदिर के आस पास का क्षेत्र भी बड़ा और फूलो व फलो के सघन वृक्षों से घिरा था . इसमें एक विशाल नीम का वृक्ष भी था . गर्मियो में शीतल छाया के लिए इस वृक्ष का बहुत उपयोग होता था . और आज तो बाज़ार का दिन और उसमे भी गर्मियों की लू बरसाती कड़ी धुप , इस वृक्ष के नीचे काफी लोगो की भीड़ जमा हो गयी, कुछ थके हारे लोगों ने तो नींद की झपकी भी ली. मंदिर के प्रवेश द्वार के एकदम सामने एक सार्वजानिक कुआ था. गाँव के अनेक लोग उस कुए से जल भरते थे. मंदिर के तरफ जाते-जाते गणेश को कोने पर एक पान की टपरी दिखाई दी. वह उस पान की टपरी पर ही रुक गया और उस पानवाले को उसने एक बनारसी पान बनाने का आदेश दिया. पान टपरी के पास काफी लोग जमा थे, कोई व्यक्ति बिडी मांग रहा था , तो कोई सिगरेट तो किसी को तम्बाकू की छोटी पुडिया चाहिए थी. पानवाले ने ग्राहकों को निपटाया, और गणेश का बनारसी पान बनाने के लिए हाथ में लिया, गणेश वहीँ उसके सामने खड़ा रहा. पान बनने तक क्या किया जाये ये सोचते हुए गणेश ने सामने की ओर देखा तो उसे पान टपरी के बाजु में ही, मंदिर की दिवार से लगकर, कुछ बच्चे कांच के कंचो का खेल जोरशोर से खेलते दिखाई दिये. गणेश उनकी तरफ बढा. जाते-जाते उसने पान वाले को, पान तैयार होने के बाद, आवाज देने को कहा. कंचे खेलने वाले चार- पाँच बच्चे थे. उनमे से एक बच्चा दिवार से लगभग, दस ग्यारह फूट पर रखे पत्थर के पास गया. उसके हाथ में कम से कम १५-२० कंचे थे. उसने उस पत्थर के पास खड़े रहकर कंचो को दिवार की दिशा में धीरे से फेका. दिवार के पास ही, जमीं में, कंचे के आकार का एक गढ्ढा था. वह गोटिया जैसे ही गढ्ढे की दिशा में लुड़कने लगी , बाकि के बच्चो की सांस ऊपर नीचे होने लगी. क्योकि यदि एक भी गोटी उस खड्डे में गिरती है तो वह बच्चा सभी की सभी कंचे जीत जायेगा. काफी सारी गोटिया उस खड्डे के एकदम नजदीक जाकर घूम रही थी, पर एक भी उस गढ्ढे में नहीं गिरी. फिर उन्ही बच्चे में से एक ने किस गोली को मारना है, यह उस गोटिया फेकने वाले बच्चे को बताया. उस बच्चे ने, हाथ में एक गोटी लेकर, थोड़ी सी एक आँख बंद करके , उस गोटी को लक्ष्य किया और उस गोटी को हाथ में रखी गोटी से फेककर मारा. एकदम से सभी बल्लू बल्लू करके चिल्लाने लगे. उसके द्वारा मारी हुई गोटी, किसी दूसरी ही गोटी को लगी थी. गोटी मारने वाले के चेहरे पर निराशा छा गयी, उसने निराश चेहरे से अपनी निकर की जेब में हाथ डालकर कंचे निकाले और उसमे से तीन कंचे गिनकर खेल में डाल दिए. अब अगला बच्चा खेल खेलने के लिए तैयार हो गया. गणेश को यह सब देखकर आनंद आ रहा था. वह अपनी बचपन की यादो में खो गया. बचपन में वह बच्चो के साथ ऐसे ही कंचे खेलता थाई.अचानक पीछे से आयी आवाज से गणेश होश में आया.
'' अच्छा तो फिर इधर आकर इस पर्चीपर क्या लिखा है जरा पढके तो बता ... '' गणेश अबभी उस पर्चीको पढनेकी कोशीश करते हूए बोला.
उस देहाती लडकेने पहले गणेशके पास जानेके लिए कहांसे रास्ता है यह देखा. गणेशके सामने एकसे सटकर एक ऐसे तिन टेबल रखे हूए थे और गणेश बाए कोनेमें एकदम दिवारसे सटकर बैठा था. गणेशकी तरफ जानेका रस्ता वे तिन टेबल छोडकर एकदम दाए कोनमे था. फिर उस देहातीने गणेशके सामने रखा एक टेबल हटाकर उधर जानेकी कोशीश की. और फिर उसे क्या लगा पता नही एकदमसे अपनी उंची टांग टेबलके उस तरफ रखकर टेबलपरसे उधर चला गया. गणेश ने वह उसका तरीका देखा और हक्का बक्कासा होकर आश्चर्यसे उस लडके की तरफ देखने लगा.
'' अबे पगले हो क्या?'' गणेश गुस्सेसे चिल्लाया. लेकिन दुसरेही पल उस लडकेके चेहरेके भाव देखकर और उसका टेबल लांघनेका तरीका याद कर उसे उस लडकेकी हंसी आ रही थी.
'' अबे क्या येडे आदमी हो... वह उधरका रास्ता छोडकर... सिधे टेबल लांघकर इधर आगया तू...'' गणेश हसते हूए बोला.
उसे क्या बोला जाए? ... हंसे की उसे गुस्सा करे?... गणेशको कुछ सुझ नही रहा था.
तबतक वह लडका वह टेबल लांघकर गणेशके बगलमें खडे होकर उस परचीपर क्या लिखा है यह पढने लगा, '' खेत बोनेका परमान पत्र ''
गणेश बाजारमें दोनो तरफ लगे दुकानोंकी तरफ देखते हूए चल रहा था. सरपे मई महिनेकी धूप होते हूए लोग हरीभरी सब्जी, पके हुए आम, प्याज. लहसून लेकर बाजारमें दुकानें लगाकर बैठे थे. कोई तरकारीका दुकान लगाकर बैठे थे तो कोई सिर्फ धानके, जैसे गेहूं, ज्वार, चावल, ऐसे अलग अलग धानके दूकान लगाकर बैठे थे. आज जादा ना घुमते हूए गणेश सिधा बंडू हॉटेलवालेके टेंट के पास गया. बंडू गरमागरम भजिया, आलूवडे, दालवडे, मिर्च की भजिया, शेव, चिवडा, बुंदी , जलेबी ऐसे काफ़ी खानेकी चिजे उसके पास मिलती थी.
तलनेकी जायकेदार खुशबु, और गरम गरम तेल का मनको मोहनेवाला तडकेका आवाज, और सामने थालीमें रखे हूए कुछ पिले तो कुछ लाल ऐसी खानेकी चिजे. दुकानके सामनेसे गुजरा और उसके मुंहमे पाणी ना आया हो ऐसा बहुतही कम होता होगा. आलूवडेको वे लोग 'आलूबोंडा' कहते. बंडूके हॉटेलमें बना आलूबोंडा गणेशको खुब भाता था.
" आवो जी ... हमरे जैसा आलूबोंडा तुमको कही नाही मिलेगा... वो क्या है नाजी हमरा आलूबोंडा बनानेका तरीका बहुत अलग रही .... ' कहते हूए उसने आलूका बना हुवा गोला बेसनमें डूबोकर भट्टीपर रखे कडईके उबलते हूए गरम तेलमें छोडा. फिर दुसरा, तिसरा ... ऐसे आलूबडेसे कडई भरनेके बाद अपना बेसनसे भरा हुवा हाथ बगलमें रखे पाणीके बर्तनमें डूबोकर धोया. फिर गिले हाथसे पाणी की छीटे कडईमें आलूवडे तल रहे उबलते तेलमें छीडकी. 'तड् तड्' ऐसा आवाज हो गया. यह सब देखनेमेभी गणेशको बहुत मजा आता था. .
" बैठो ... साबजी ... बैठीयो तो ..."
गणेश दुकान के टेंटका कपडा उड ना जाए इसलिए रखे पत्थरपर बैठ गया. आलूवडे तलनेका इंतजार करते हूए वह उन तेलमें उबलते वडोंकी तरफ देखने लगा.
बंडू हॉटेलवालेके साथ दुकानमे उसकी बिवी उसे काममें हाथ बटाती थी. जब वह तलनेका काम करता था तब उसकी बिवी ग्राहक संभालती थी. और जब वह तलनेका काम करती तब बंडू ग्राहक संभालनेका काम करता . गणेशको किसीने कहा था की बंडू हॉटेलवालेने दो शादीया की थी. एक बिवी घर और उसके बच्चे संभालती थी तो दुसरी उसके साथ उसको हाथ बटानेके लीए उसके और उनके हॉटेलके साथ नगर डगर घुमती थी. ... कभी किसी मेलेमें, तो कभी दुसरे गांवके बाजारमें वे जाकर अपना दुकान लगाते थे. पंधरा दिन एक बिवी को लेकर घुमा की वह उसे घर और बच्चे संभालनेके लिए घर छोडता था और अगले पंधरा दिन दुसरे बिवीको लेकर घुमता था. अपने धंदेके अनुसार उसने अपना जिवन मानो ढाल लिया था. वैसे वह दुनियादारीके मामलेमे काफी होशीयार था. उसकी होशीयारी उसके दो शादिया करनेमें देखतेही बनती थी. दुसरी शादी करनेसे एक्स्ट्रा बिवी तो बिवी उपरसे बिना पगारकी नौकर भी उसे मिली थी.
अबतक बडे पुरे तलकर बन चुके थे. बंडू वे तले हूए वडे बाहर निकालकर एक थालीमें डालने लगा.
" दुसरे हॉटेलवाले ... ऐ ऐसे वडे खानेको परोसेंगे ... लेकिन ई तो आधाही काम हो गयाजी ... ."
वह बचे हूए वडे कडईसे थालीमें डालते हूए बोला.
" अब आगेका काम देकहियो ... इस वडे के कानके निचे ऐसे एक एक बजानेकी ... इस झारेसे .. ऐसे ... "
वह अपने हातमे थामा हुवा झारा हरएक वडेपर हल्केसे मारते हूए बोला.
जैसे जैसे वह उस झारेसे उन वडेको मारता था वैसे वैसे वे वडे टूटकर खुलते थे.
" और फिर इस खुले हूए वडोंको फिरसे तेलमें डालियो ... ऐसे ..."
फिरसे वे खुले हूए वडे तेलमें छोडते हूए वह बोला.
" अजी ई है आलूबोंडे बनानेकी असली ढंग... ये हम .... हमरे बापसे ... हमरा बाप ... उसके बाप से ... और उसका बाप ... उसके बापसे ... ऐसे पिढीयोंसे हम सिखत रहत ... ."
यह बंडूकी बकबक हर बार वडे खानेको आनेके बाद गणेशकोही नही तो वडे खानेको आए सारे ग्राहकोंको सुननी पडती. लेकिन सारे लोग ये इतने अच्छे जायकेदार वडे खानेके लालचमें सुन लेते थे. वह फिरसे तेलमें छोडे हूए वडे झारेसे हिला रहा था. बिच बिचमें यूंही बगलमें रखे पाणीके पतेलेमें हात डूबोकर पाणीकी कुछ छिंटे उस उबल रहे तेलके कडईमें छिडकता था. उससे वह 'तड् .. तड्' ऐसा आवाज बार बार आता था. और वह वैसा 'तड् .. तड्' आवाज करकी मानो उसे आदतही हो गई थी. शायद बाहर इतने तपते धुपमें... तपते भट्टीके सामने उतनेही उत्साहके साथ .. हमेशा काम करते रहनेका रहस्य शायद उस 'तड्.. तड्' होनेवाले आवाजमेंही छिपा हो ऐसा गणेशको हमेशा लगता था.
पेट पूजा होने के उपरांत गणेश ने बाज़ार के मैदान के कोने में स्थित , महादेव के मंदिर में जाने का निश्चय किया. वह महादेवीजी का मंदिर देखने में भले ही प्राचीन था परन्तु काफी बड़ा था . मंदिर के आस पास का क्षेत्र भी बड़ा और फूलो व फलो के सघन वृक्षों से घिरा था . इसमें एक विशाल नीम का वृक्ष भी था . गर्मियो में शीतल छाया के लिए इस वृक्ष का बहुत उपयोग होता था . और आज तो बाज़ार का दिन और उसमे भी गर्मियों की लू बरसाती कड़ी धुप , इस वृक्ष के नीचे काफी लोगो की भीड़ जमा हो गयी, कुछ थके हारे लोगों ने तो नींद की झपकी भी ली. मंदिर के प्रवेश द्वार के एकदम सामने एक सार्वजानिक कुआ था. गाँव के अनेक लोग उस कुए से जल भरते थे. मंदिर के तरफ जाते-जाते गणेश को कोने पर एक पान की टपरी दिखाई दी. वह उस पान की टपरी पर ही रुक गया और उस पानवाले को उसने एक बनारसी पान बनाने का आदेश दिया. पान टपरी के पास काफी लोग जमा थे, कोई व्यक्ति बिडी मांग रहा था , तो कोई सिगरेट तो किसी को तम्बाकू की छोटी पुडिया चाहिए थी. पानवाले ने ग्राहकों को निपटाया, और गणेश का बनारसी पान बनाने के लिए हाथ में लिया, गणेश वहीँ उसके सामने खड़ा रहा. पान बनने तक क्या किया जाये ये सोचते हुए गणेश ने सामने की ओर देखा तो उसे पान टपरी के बाजु में ही, मंदिर की दिवार से लगकर, कुछ बच्चे कांच के कंचो का खेल जोरशोर से खेलते दिखाई दिये. गणेश उनकी तरफ बढा. जाते-जाते उसने पान वाले को, पान तैयार होने के बाद, आवाज देने को कहा. कंचे खेलने वाले चार- पाँच बच्चे थे. उनमे से एक बच्चा दिवार से लगभग, दस ग्यारह फूट पर रखे पत्थर के पास गया. उसके हाथ में कम से कम १५-२० कंचे थे. उसने उस पत्थर के पास खड़े रहकर कंचो को दिवार की दिशा में धीरे से फेका. दिवार के पास ही, जमीं में, कंचे के आकार का एक गढ्ढा था. वह गोटिया जैसे ही गढ्ढे की दिशा में लुड़कने लगी , बाकि के बच्चो की सांस ऊपर नीचे होने लगी. क्योकि यदि एक भी गोटी उस खड्डे में गिरती है तो वह बच्चा सभी की सभी कंचे जीत जायेगा. काफी सारी गोटिया उस खड्डे के एकदम नजदीक जाकर घूम रही थी, पर एक भी उस गढ्ढे में नहीं गिरी. फिर उन्ही बच्चे में से एक ने किस गोली को मारना है, यह उस गोटिया फेकने वाले बच्चे को बताया. उस बच्चे ने, हाथ में एक गोटी लेकर, थोड़ी सी एक आँख बंद करके , उस गोटी को लक्ष्य किया और उस गोटी को हाथ में रखी गोटी से फेककर मारा. एकदम से सभी बल्लू बल्लू करके चिल्लाने लगे. उसके द्वारा मारी हुई गोटी, किसी दूसरी ही गोटी को लगी थी. गोटी मारने वाले के चेहरे पर निराशा छा गयी, उसने निराश चेहरे से अपनी निकर की जेब में हाथ डालकर कंचे निकाले और उसमे से तीन कंचे गिनकर खेल में डाल दिए. अब अगला बच्चा खेल खेलने के लिए तैयार हो गया. गणेश को यह सब देखकर आनंद आ रहा था. वह अपनी बचपन की यादो में खो गया. बचपन में वह बच्चो के साथ ऐसे ही कंचे खेलता थाई.अचानक पीछे से आयी आवाज से गणेश होश में आया.