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Guest
" अ.... हाँ ???" रुमाल से अपनी गर्दन और और चेहरे पर पसीने की बूँदें पोछते हुए उसने मधुरानी से कहा "कुछ ? कहा मुझसे?"
उसकी सकपकाहट देख कर मधुरानी की हँसी छूट गयी "बाबू जी" वह मुस्कुराते हुए बोली "तोहार तो पसीने छूटे है" मुस्कुराना जारी रखते हुए उसने आगे कहा " घबडाओं ना बाबूजी , हमार कोई ऐसा वैसा इरादा ना है , एक औरत का घर बार उजाड़ कर हम अपना घर ना बसाना चाहे . आपने का सोचा ?? "
"न..न.. नहीं" खिसियानी हँसी हंसते हुए गणेश बोला , अब भी रुमाल से उसका पसीना पोंछना जारी था.
गणेश की इस हालत के मज़े लेती हुई मधुरानी ठहाका मार कर हँसने लगी " आईने में खुद की सकल देखों बाबूजी , का चेहरा होई गवा है "
आख़िर क्या चाहती है यह औरत ? ....इस पिछड़े हुए गाँव में रहने के बावजूद कितने आज़ाद ख्यालात क़ी है यह .... गणेश मन ही मन विचार करने लगा
"बाबू जी" मधुरानी आगे बोली " आप एही सोचत रहोगे कि कैसी कलमुंही औरत होवे है , इसके ख़सम को उ पाटिल ने अपनी गाड़ी से कुचला , ई की माँग उजाड़ दि फिर भी उ पाटिल की तरफ़दारी करती है"
हद हो गयी यह तो.... गणेश चौंक गया ....इसे कैसे पता मैं क्या सोच रहा हूँ ?.... कहीं यह कोई टोना टोटका तो नहीं करती?.... शायद नहीं , हो- न- हो यह मेरे मन की बात ताड़ गयी , या शायद यह महज एक इत्तेफ़ाक हो....
"मेरा ख़सम बेवड़ा था , दिन-रात सराब के नसे में धुत्त रहता था उ ही हालत में उ ससुरा उ पाटिल जी की गाड़ी के नीचे आया रहा , ई बात में उ पाटिल जी का क्या कसूर ? और ई बात को लेकर हम काहे पाटिल जी से दुस्मनि मोल ले? अब ई तो एही हुआ के पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा लेना" मधुरानी ने कहा .
गणेश टकटकी लगाए उसकी ओर देख रहा था ....इसकी सोच सही है... अगर इसने पाटिल साहब से पंगा लिया होता तो वह इसका इस गाँव में जीना हराम कर देता.... गणेश वापिस सोच में डूब गया .
"बाबूजी" अबकी बार उसकी बाँहों को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से उसे हिलाते हुए मधुरानी बोल उठी "आपको ई बीच बीच में खोने की न जाने कैसी अजीब बीमारी होवे है"
उसके नर्म , मुलायम हाथों की छुअन से उसके सारे बदन में रोंगटे खड़े हो गये वह फिर अपनी सोच में डूब गया.
अब इसकी बातें कुछ कुछ समझ में आने लगी है , शायद यह भी मेरे जसबातों को समझती है....
वह उसकी खूबसूरती को अपनी आँखों से निहार रहा था , उसे ताक रहा था मानों उसके चेहरे का नूर अपनी आँखों से पी जाना चाहता हो.
आज बृहस्पतिवार था , बृहस्पतिवार को गाँव में साप्ताहिक हाट - बाजार लगा करती थी . सुबह सवेरे ही गणेश आफ़िस जा कर आया , आज कुछ खास काम भी नहीं था, लिहाज़ा उकता कर वह बाजार की तरफ चल दिया . सब्ज़ी तरकारी वालों की दुकानों के सामने घूमते हुए वह कपड़े वालों की कतार में चला आया. कपड़े वालों की दुकानों में छोटे बच्चों से ले कर बड़े बूढ़े और महिलाओं के धोती साड़ियाँ कुर्ते करीने से सजाए गये थे . उन्हीं के बीच उसे बंजारा लोगों की वह खास पोशाक भी नज़र आई , एक तरफ चोगा और टोपी लटके हुए थे , उस अजीब सी रंग बिरंगी पोशाक को देख कर उसे बड़ा मज़ा आ रहा था . दुपहर का वक्त हो चला था , बाजार में आस पास के गाँवों से आने वाले ग्राहकों की भीड़ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी , दुकानों के बीचों बीच रास्ते पर भीड़ इतनी बढ़ गयी थी की पाँव रखने की जगह न थी, फिर भी उन सबके बीच किसी प्रकार गणेश अपने रास्ते चल रहा था , अब वह पूरी तरह उकता चुका था . उसने सोचा एक बार गाँव की तरफ घूम आए ...
उसके पाँव बरबस ही मधुरानी की दुकान की तरफ बढ़ चले , बाजार की भीड़ भाड़ से बचते बचाते वह पानी की टंकी की ओर बढ़ चला जहाँ बड के पेड़ की अच्छी ख़ासी ठंडी छाँव थी. एकपल उसने इस पेड़ तले सुसताने की सोची लेकिन दूसरे ही पल उसने वह विचार त्याग दिया और उसने मधु रानी की दुकान की ओर अपने कदम बढ़ाए .
दूर से ही उसकी दुकान के इर्द गिर्द लोगों का जमावड़ा देख उसे हैरत हुई. वह मन मसोस कर रह गया, अब इस भीड़ के रहते उससे बातचीत मुमकिन न थी. उसने दो चार मिनट वहीं चहलकदमी कर गुज़ारे, वह सोच रहा था कि वापिस बाजार जाया जाए या थोड़ी देर कमरे में सुस्ताया जाए. लेकिन उसे मधु रानी से मिलने की प्रबल इच्छा हुई, लिहाज़ा उन लोगों की भीड़ में रास्ता निकालते हुए वह गल्ले के करीब जा पंहुचा .
" ओ शामू ज़रा देख तो उ औरत धोती में गुड का डला छिपायात रही , जा जा जल्दी जा उ भिखमंगी चोरनी को पकड़ ला " मधु रानी की तेज नज़रों से वह चोरनी बच न पाई थी.
" ई करम जले गाँव वाले चोरी चकारि से बाज न आवे है" वह गुस्से से गाँववालों को कोसते हुए बड़बड़ा रही थी.
" अरे जल्दी जा नास्पीटे , तोरा सत्यानाश जाए कलमुंहे जा जल्दी जा उसको पकड़" वह चीखी.
उस नौकर ने इधर उधर नज़रे दौड़ाई और वह चोरनी उसकी नज़रों से न बच पाई , नौकर को अपनी तरफ आता देख वह भीड़ से निकल दूसरी ओर भागने लगी . गणेश मधुरानी के करीब खड़ा हो तमाशा देख रहा था . उधर मधुरानी थी जो सुध बुध खो बैठी थी, उसका सारा ध्यान उस चोरनी पर लगा था
" अरे जल्दी जा कलमुंहें पकड़ उ कर्मजली को देख देख कैसन भाग रही है उ कुतिया" मधुरानी उत्तेजित हो कर चिल्लाए जा रही थी .
" ए री ज़रा ई बोतल में तेल तो डाल " उस भीड़ में किसी ने बोतल उठा कर उसका ध्यान अपनी ओर खींचा.
" ए री मधुरानी ज़रा नोन की थैली निकाल तो " एक औरत उससे बोली.
गणेश ने १० रु. का नोट निकाल कर कहा "मुझे एक गोल्ड फ्लेक "
"अरे तनिक ठहरो , इधर ई चोर लोग पूरा दुकान पे हाथ साफ करत रहे और आप लोगन को थोडा वक्त रुकने की फ़ुर्सत नाही" मधुरानी गणेश पर झुंझला कर जैसे फट पड़ी .
उसको जब अहसास हुआ कि वह गणेश है तो आवाज़ में नर्मी लाते हुए बोली " बाबूजी ए आप हैं हम समझे कोई और आवे है"
" न.. न.. कोई बात नहीं पहले तुम अपना काम देख लो , कोई जल्दी नहीं है " गणेश ने जवाब दिया.
" अरे बाबू तोके जल्दी ना है पर हमको तो है ना " एक औरत भीड़ में बोल उठी .
उस औरत की ओर गुस्से से देखती हुई मधुरानी तेज आवाज़ में बोल उठी " ए री बड़ी जल्दी है ना तुझे ? जा किसी और दुकान पर चली जा , हमर दुकान का नौकर उ चोरनी के पीछे गया है , हम जो गल्ले से उठ कर तुझे जो समान दिए रहे तो उ चोर लोग पूरा दुकान पर हाथ साफ कर लिए"
वह औरत चुप हो गयी . मधुरानी की बात अपनी जगह सही थी.
" बाबू जी तनिक ठहरिए उ शाम के आते ही आपको सिगरेट दिए रहे " मधुरानी गणेश की ओर मुखातिब हुई.
इतने में शाम उस चोरनी को पकड़ कर मधुरानी के सामने ले आया.
"हरामजादे" वह औरत शाम से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली "हमरा हाथ जोड़ बेसरम , कीड़े पड़े तोहार हाथ में , तेरा सत्यानास जाए"
"मैं न छोड़ूं तोहार हाथ , म्हारी दीदी ने तुमको गुड चुराते देखा होवे है" लड़का बोला.
"ए कलमुंही , हम ई गुड के पैसे दिए हैं" चोरनी उल्टा मधुरानी पर बरसी .
"पैसे दिए रहे तूने ? हैं ? बड़ी आई पैसे देने वाली कुतिया " अपनी साडी कमर में खोंस कर मधुरानी आगे बढ़ी .
" ए शामू ज़रा ग्राहकों को देख तो , हम अभी इसको ठीक किए देते हैं"
" जी दीदी जी" कह कर शामू ग्राहकों को समान तौलने लगा .
इतने में चोरनी कह उठी "हराम की जनी ग़ाली मत दे कहे देती हूँ"
उसकी सकपकाहट देख कर मधुरानी की हँसी छूट गयी "बाबू जी" वह मुस्कुराते हुए बोली "तोहार तो पसीने छूटे है" मुस्कुराना जारी रखते हुए उसने आगे कहा " घबडाओं ना बाबूजी , हमार कोई ऐसा वैसा इरादा ना है , एक औरत का घर बार उजाड़ कर हम अपना घर ना बसाना चाहे . आपने का सोचा ?? "
"न..न.. नहीं" खिसियानी हँसी हंसते हुए गणेश बोला , अब भी रुमाल से उसका पसीना पोंछना जारी था.
गणेश की इस हालत के मज़े लेती हुई मधुरानी ठहाका मार कर हँसने लगी " आईने में खुद की सकल देखों बाबूजी , का चेहरा होई गवा है "
आख़िर क्या चाहती है यह औरत ? ....इस पिछड़े हुए गाँव में रहने के बावजूद कितने आज़ाद ख्यालात क़ी है यह .... गणेश मन ही मन विचार करने लगा
"बाबू जी" मधुरानी आगे बोली " आप एही सोचत रहोगे कि कैसी कलमुंही औरत होवे है , इसके ख़सम को उ पाटिल ने अपनी गाड़ी से कुचला , ई की माँग उजाड़ दि फिर भी उ पाटिल की तरफ़दारी करती है"
हद हो गयी यह तो.... गणेश चौंक गया ....इसे कैसे पता मैं क्या सोच रहा हूँ ?.... कहीं यह कोई टोना टोटका तो नहीं करती?.... शायद नहीं , हो- न- हो यह मेरे मन की बात ताड़ गयी , या शायद यह महज एक इत्तेफ़ाक हो....
"मेरा ख़सम बेवड़ा था , दिन-रात सराब के नसे में धुत्त रहता था उ ही हालत में उ ससुरा उ पाटिल जी की गाड़ी के नीचे आया रहा , ई बात में उ पाटिल जी का क्या कसूर ? और ई बात को लेकर हम काहे पाटिल जी से दुस्मनि मोल ले? अब ई तो एही हुआ के पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा लेना" मधुरानी ने कहा .
गणेश टकटकी लगाए उसकी ओर देख रहा था ....इसकी सोच सही है... अगर इसने पाटिल साहब से पंगा लिया होता तो वह इसका इस गाँव में जीना हराम कर देता.... गणेश वापिस सोच में डूब गया .
"बाबूजी" अबकी बार उसकी बाँहों को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से उसे हिलाते हुए मधुरानी बोल उठी "आपको ई बीच बीच में खोने की न जाने कैसी अजीब बीमारी होवे है"
उसके नर्म , मुलायम हाथों की छुअन से उसके सारे बदन में रोंगटे खड़े हो गये वह फिर अपनी सोच में डूब गया.
अब इसकी बातें कुछ कुछ समझ में आने लगी है , शायद यह भी मेरे जसबातों को समझती है....
वह उसकी खूबसूरती को अपनी आँखों से निहार रहा था , उसे ताक रहा था मानों उसके चेहरे का नूर अपनी आँखों से पी जाना चाहता हो.
आज बृहस्पतिवार था , बृहस्पतिवार को गाँव में साप्ताहिक हाट - बाजार लगा करती थी . सुबह सवेरे ही गणेश आफ़िस जा कर आया , आज कुछ खास काम भी नहीं था, लिहाज़ा उकता कर वह बाजार की तरफ चल दिया . सब्ज़ी तरकारी वालों की दुकानों के सामने घूमते हुए वह कपड़े वालों की कतार में चला आया. कपड़े वालों की दुकानों में छोटे बच्चों से ले कर बड़े बूढ़े और महिलाओं के धोती साड़ियाँ कुर्ते करीने से सजाए गये थे . उन्हीं के बीच उसे बंजारा लोगों की वह खास पोशाक भी नज़र आई , एक तरफ चोगा और टोपी लटके हुए थे , उस अजीब सी रंग बिरंगी पोशाक को देख कर उसे बड़ा मज़ा आ रहा था . दुपहर का वक्त हो चला था , बाजार में आस पास के गाँवों से आने वाले ग्राहकों की भीड़ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी , दुकानों के बीचों बीच रास्ते पर भीड़ इतनी बढ़ गयी थी की पाँव रखने की जगह न थी, फिर भी उन सबके बीच किसी प्रकार गणेश अपने रास्ते चल रहा था , अब वह पूरी तरह उकता चुका था . उसने सोचा एक बार गाँव की तरफ घूम आए ...
उसके पाँव बरबस ही मधुरानी की दुकान की तरफ बढ़ चले , बाजार की भीड़ भाड़ से बचते बचाते वह पानी की टंकी की ओर बढ़ चला जहाँ बड के पेड़ की अच्छी ख़ासी ठंडी छाँव थी. एकपल उसने इस पेड़ तले सुसताने की सोची लेकिन दूसरे ही पल उसने वह विचार त्याग दिया और उसने मधु रानी की दुकान की ओर अपने कदम बढ़ाए .
दूर से ही उसकी दुकान के इर्द गिर्द लोगों का जमावड़ा देख उसे हैरत हुई. वह मन मसोस कर रह गया, अब इस भीड़ के रहते उससे बातचीत मुमकिन न थी. उसने दो चार मिनट वहीं चहलकदमी कर गुज़ारे, वह सोच रहा था कि वापिस बाजार जाया जाए या थोड़ी देर कमरे में सुस्ताया जाए. लेकिन उसे मधु रानी से मिलने की प्रबल इच्छा हुई, लिहाज़ा उन लोगों की भीड़ में रास्ता निकालते हुए वह गल्ले के करीब जा पंहुचा .
" ओ शामू ज़रा देख तो उ औरत धोती में गुड का डला छिपायात रही , जा जा जल्दी जा उ भिखमंगी चोरनी को पकड़ ला " मधु रानी की तेज नज़रों से वह चोरनी बच न पाई थी.
" ई करम जले गाँव वाले चोरी चकारि से बाज न आवे है" वह गुस्से से गाँववालों को कोसते हुए बड़बड़ा रही थी.
" अरे जल्दी जा नास्पीटे , तोरा सत्यानाश जाए कलमुंहे जा जल्दी जा उसको पकड़" वह चीखी.
उस नौकर ने इधर उधर नज़रे दौड़ाई और वह चोरनी उसकी नज़रों से न बच पाई , नौकर को अपनी तरफ आता देख वह भीड़ से निकल दूसरी ओर भागने लगी . गणेश मधुरानी के करीब खड़ा हो तमाशा देख रहा था . उधर मधुरानी थी जो सुध बुध खो बैठी थी, उसका सारा ध्यान उस चोरनी पर लगा था
" अरे जल्दी जा कलमुंहें पकड़ उ कर्मजली को देख देख कैसन भाग रही है उ कुतिया" मधुरानी उत्तेजित हो कर चिल्लाए जा रही थी .
" ए री ज़रा ई बोतल में तेल तो डाल " उस भीड़ में किसी ने बोतल उठा कर उसका ध्यान अपनी ओर खींचा.
" ए री मधुरानी ज़रा नोन की थैली निकाल तो " एक औरत उससे बोली.
गणेश ने १० रु. का नोट निकाल कर कहा "मुझे एक गोल्ड फ्लेक "
"अरे तनिक ठहरो , इधर ई चोर लोग पूरा दुकान पे हाथ साफ करत रहे और आप लोगन को थोडा वक्त रुकने की फ़ुर्सत नाही" मधुरानी गणेश पर झुंझला कर जैसे फट पड़ी .
उसको जब अहसास हुआ कि वह गणेश है तो आवाज़ में नर्मी लाते हुए बोली " बाबूजी ए आप हैं हम समझे कोई और आवे है"
" न.. न.. कोई बात नहीं पहले तुम अपना काम देख लो , कोई जल्दी नहीं है " गणेश ने जवाब दिया.
" अरे बाबू तोके जल्दी ना है पर हमको तो है ना " एक औरत भीड़ में बोल उठी .
उस औरत की ओर गुस्से से देखती हुई मधुरानी तेज आवाज़ में बोल उठी " ए री बड़ी जल्दी है ना तुझे ? जा किसी और दुकान पर चली जा , हमर दुकान का नौकर उ चोरनी के पीछे गया है , हम जो गल्ले से उठ कर तुझे जो समान दिए रहे तो उ चोर लोग पूरा दुकान पर हाथ साफ कर लिए"
वह औरत चुप हो गयी . मधुरानी की बात अपनी जगह सही थी.
" बाबू जी तनिक ठहरिए उ शाम के आते ही आपको सिगरेट दिए रहे " मधुरानी गणेश की ओर मुखातिब हुई.
इतने में शाम उस चोरनी को पकड़ कर मधुरानी के सामने ले आया.
"हरामजादे" वह औरत शाम से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली "हमरा हाथ जोड़ बेसरम , कीड़े पड़े तोहार हाथ में , तेरा सत्यानास जाए"
"मैं न छोड़ूं तोहार हाथ , म्हारी दीदी ने तुमको गुड चुराते देखा होवे है" लड़का बोला.
"ए कलमुंही , हम ई गुड के पैसे दिए हैं" चोरनी उल्टा मधुरानी पर बरसी .
"पैसे दिए रहे तूने ? हैं ? बड़ी आई पैसे देने वाली कुतिया " अपनी साडी कमर में खोंस कर मधुरानी आगे बढ़ी .
" ए शामू ज़रा ग्राहकों को देख तो , हम अभी इसको ठीक किए देते हैं"
" जी दीदी जी" कह कर शामू ग्राहकों को समान तौलने लगा .
इतने में चोरनी कह उठी "हराम की जनी ग़ाली मत दे कहे देती हूँ"