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मस्ती एक्सप्रेस_Masti Express COMPLETE

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अब शिशिर की बारी थी।

शिशिर ने कहा- राजू राजी पति पत्नी थे। राजी की बहन की शादी थी। काफी पहले से दोनों को वहां जाना पड़ा। राजी का भरा पूरा परिवार था। नजदीक के मेहमान भी आ गये थे। घर में अच्छी खासी रौनक हो गई थी। ऐसे में सब औरतों को एक कमरे में और मर्दों को दूसरे कमरों में सोना पड़ता था। राजू राजी मजा नहीं ले पा रहे थे। उन्होंने एक तरीका निकाला।

राजी ने कहा- “मैं हीरे की अंगूठी पहनकर सोया करूंगी। अंगूठी रात के अंधेरे में चमकेगी। जब तुम्हारी तबीयत हो तब देर रात में आ जाया करो और बगैर आवाज किये मेरी खोलकर अपनी प्यास बुझा लिया करो। लेकिन ध्यान रहे चुपचाप करना क्योंकी अगल बगल में और औरतें सोई होंगी…”

राजू ने कहा- “काम बन गया…” आये दिन जाता और तबीयत से मज़े उड़ाता।

राजी उसकी बेजा हरकत पर आवाज भी नहीं उठा सकती थी। उन्होंने अपने इस प्लान का कोडनाम रखा था ‘परांठे खाना’, राजी या राजू एक दूसरे से शरारत करने के लिये कहते ‘रात को दो परांठे खाये’।

एक सुबह राजू खुश था। राजी को देखा तो बोला- “पहले तो तुमने कल रात बड़ी आना-कानी की फिर बड़े मज़े लेकर दो परांठे खाये…”

राजी बोली- “नहीं तो… मेरी तो कल से अंगूठी ही नहीं मिल रही है…”

सामने से इठलाती हुई मोहिनी भाभी आकर बोलीं- “बीवी जी अपनी यह अंगूठी लो, कल बाथरूम में रखी छोड़ आईं थीं…” फिर बोलीं- “मेरी अंगीठी गरम थी तो सोचा कि दो परांठे मैं भी सेंक लूं…”

फिर मक्कारी से राजू की तरफ देखती हुईं- “क्यों लाला जी परांठे ठीक सिके थे?”


शिशिर का जोक सुनकर सब की नजरें बचाकर मदभरी आँखों से मुँह बिचकाकर मैंने अपनी आशक्ति जता दी। शिशिर से सेक्स की बातें सुनती थी तो ‘तमाशे’ याद आ जाते थे और मेरी चूत में खुजली होने लगती थी, और उसकी मेरी तरफ वह आत्मियता। उसे मैं अपना समझने लगी थी। मैं पके आम की तरह उसकी झोली में गिरने को तैयार थी। लेकिन शिशिर था कि दूरी ही बनाये हुये था। आज तो मौका देखकर हँसी के बहाने दो बार मैं उसके ऊपर गिर चुकी थी।

इस बार मेरी हरकत का उसके ऊपर असर हुआ।

उसी दिन अकेला पाकर जोक का माध्यम इश्तेमाल करता हुआ शिशिर बोला- “ओ भाभी अपनी अंगीठी पर मुझे भी परांठे खिलाओ न…”

मनचाही बात सुनकर मैं शोख अदा से बोली- “मैंने कब मना किया है जब चाहे खालो…”

शिशिर- “लेकिन मैं जूठा नहीं खाता…”

मैं- “जूठी तो हो ही गई हूँ देवर जी…”

शिशिर- “मेरा मतलब वह नहीं है भाभी… 24 घंटे तक कम से कम जुठराई नहीं होनी चाहिये…”

मैं- “आजकल यह मुश्किल है। होली का समय है राकेश छोड़ते ही नहीं। अच्छा देखती हूँ…”


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दोस्तों,

आज महफिल का मज़ा लें।

अगली पोस्ट में होली के रंग देखिये।


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होली के रंग



फाग का दिन… सेक्स भरा माहौल, पूरी मस्ती वाला दिन। सुबह से दोपहर तक रंग गुलाल से होली चहेतियों के साथ। मौका मिलते ही चहेती पर जितना हाथ साफ कर सके किया। फिर नहा-धो कर घर-घर जाकर गुझिया पपड़ियां। शाम को एक जगह जमावड़ा जहां भांग की तरंग में खुलकर तानाकसी, छेड़-छाड़, खुले आम सेक्स की बातें। रात तक पति पत्नी दोनों ही आनंद में होते और जम कर मस्त-मस्त चुदाई करते। यह है होली का मदभरा त्योहार।

कालोनी में औरतें अपना ग्रुप बना लेतीं थीं और आदमी लोग अलग इकट्ठे हो जाते थे। फिर बेझिझक दोनों अलग से होली खेलते रहते थे, फागें और अश्लील गाने गाते रहते थे और मनमानी हरकतें करते रहते थे। मालूम पड़ा था कि औरतें ऐसे गाने गातीं थीं और ऐसी-ऐसी हरकतें करतीं थीं कि आदमी भी दांतों तले उंगली दबा लें। औरतों की लीडर एक मिसेज़ वर्मा थीं, बिहार की। मिस्टर वर्मा थुलथुल थे और अपनी इंजीनियरी के रोबदाब में रहते थे। मिसेज़ वर्मा चुस्त थीं, बिहार का सांवला रंग और प्रौढ़ अवस्था में भी छरहरी देह, आगे को उभरे हुये जोबन और पीछे को उभरे हुये कूल्हे। सब मिला के बड़ी सेक्सी फीगर और उतनी ही सेक्सी उनकी बातें। उनको देखे बिना अंदाजा भी नहीं हो सकता कि औरत में कितना सेक्स भरा हो सकता है और उसको वह कितने खुलेआम प्रदर्शित कर सकती है।

औरतों और आदमियों के अलग इकट्ठे होने के पहले मिसेज़ मलहोत्रा ने अपने पिछवाड़े आपस में होली खेलने का प्रोग्राम बनाया। उनके यहां एक पूरानी नाद थी जिसमें उन लोगों ने पानी भरकर रंग मिला दिया। जैसे-जैसे लोग आते गये उनको रंग से सराबोर कर दिया गया और गुलाल से चेहरा मला दिया गया। लिहाज़ का पर्दा उठ गया था। आदमी लोग भाभियों को यानि कि दूसरों की बीवियों को पकड़-पकड़कर रंग मल रहे थे।

कुमुद अपने को बचाये हुये दूर खड़ी थी। उसने नई धानी साड़ी पहन रखी थी जो शिशिर के कहने पर नहीं बदली थी। काफी खूबसूरत लग रही थी। राकेश का मन उसके ऊपर था। वह गुलाल लेकर उसकी ओर बढ़ा। कुमुद भागी, राकेश उसके पीछे भागा।

दीवाल के पास राकेश ने उसे पकड़ लिया। गुलाल से बचने के लिये कुमुद मुँह यहां वहां कर रही थी। राकेश ने कस के उसको चिपका लिया, यहां तक कि उसकी चूचियों का दबाव वह महसूस कर रहा था। रानों से रानें चिपक गई थीं। उसने तबीयत से कुमुद के गालों पर मुँह से मुँह रगड़कर अपना गुलाल छुड़ाया। मुट्ठी का गुलाल उसके दोनों उभारों पर मला और नीचे हाथ डालकर टांगों के बीच गुलाल का हाथ रगड़ दिया। गुलाल की लाली में उसकी शर्म की लाली छुप गई। दूर से लोगों ने सब कुछ नहीं देखा। न जाने क्यों कुमुद को राकेश पर गुस्सा नहीं आ रहा था बल्की इस सब से उसके मन में मिठास भर गई थी।

सुनीता ने बहैसियत भाभी के शिशिर को खूब गुलाल मला लेकिन सबसे घाटे में वही रही। क्योंकी उसके और शिशिर के मन में जो था, सबके देखते कुछ न कर पाये। मिसेज़ अग्रवाल वापिस जाने लगीं क्योंकी गाँव से उनकी भौजी आई हुई थीं, जिनको वह घर में छोड़कर आई थीं।

सबने कहा कि भौजी को यहीं ले आओ। मिसेज़ मलहोत्रा मिसेज़ अग्रवाल को पकड़कर ले गईं और वह लपक कर भौजी को खींच लाये। भौजी अच्छी जवान थीं, गदराया शरीर था, चेहरे पर लुनाई थी, मांसल थीं लेकिन मोटापा नहीं था, मेहनती देह थी, हाथों पैरों में बल था, सीने पर भी अच्छा मांस था। भौजी ने अग्रवाल जी को देखा तो घूँघट खींच लिया और उनकी तरफ पीठ करके खड़ी हो गईं।

मलहोत्रा ने अग्रवाल को उकसाया- “पलट दो घूँघट… अपनी सलहज के संग होली नहीं खेलोगे?”

भौजी सिर हिलाती रही पर अग्रवाल ने उनका घूँघट उघाड़ दिया और यह कहते हुये- “भौजी हमसे होली नहीं खेलोगी?” और उनके दोनों गालों पर ढेर सा गुलाल मल दिया। मलहोत्रा ने उन्हें रंग से भिगो दिया।

भौजी बोलीं- “बस हो गई होली?”

वह उस क्षेत्र की थीं जहां औरतें कोड़ामार होली खेलतीं हैं। पानी में भिगो-भिगोकर आदमियों पर कोड़े मारती है। भौजी ने अग्रवाल को उठा लिया और सीधा ले जाकर नांद में गिराती हुई बोलीं- “लाला जी होली का मजा तो लो…”

सब लोगों में खुशी भर गई।


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कुमुद दौड़ी-दौड़ी आई और भौजी के कान में राकेश की तरफ इशारा करती हुई बोली- “भौजी उनको घसीटो…”

भौजी और कुमुद दोनों ने दौड़कर राकेश को पकड़कर नांद में गिरा दिया। उसके बाद तो सब की बारी आ गई। आदमी लोग भी पीछे रहने वाले नहीं थे। सुनीता, कुमुद, मिसेज़ अग्रवाल, मिसेज़ मलहोत्रा सब पानी में तरबतर हो गईं। कपड़े उनके बदन से चिपक गये थे। उभारों पर साड़ी चिपकी थी, चूतड़ों की दरार में साड़ी फँस गई थी, रानों से पेटीकोट साड़ी चिपक गये थे जिससे टांगों की आकृति और गहराई दिख रही थी। सब कपड़ों में भी नंगी थीं।

सब ललचाई नजरों से देख रहे थे। फिर गुलाल मलने का दौर चला। सबने सब औरतों के अंग छुये। उनको चिपका कर उनके बदन की आग ली। जिनकी आपस में रजामंदी थी उन्होंने लण्ड चूत पर भी हाथ फेरे। कुमुद ने राकेश का लण्ड साहला दिया। सुनीता ने अपनी रानें एकदम सटाकर शिशिर के लण्ड पर अपनी चूत दबा दी। मिसेज़ अग्रवाल और मिसेज़ मलहोत्रा ने तो सबके लण्ड का लुफ्त लिया। पूरे चेहरे रंग गुलाल में सन गये। वह भूतनियों जैसी लग रही थीं।

अग्रवाल और मलहोत्रा ने भौजी को पकड़कर नांद में धकेला तो भौजी अग्रवाल को भी अपने संग खींच ले गईं। उनकी साड़ी उघड़ गई थी और उन्होंने अपनी दोनों टांगें अग्रवाल की कमर के ऊपर बाँधकर उनको पानी में जकड़ रखा था। उन्होंने न तो चड्ढी पहन रखी थी न ही अंगिया। अगर अग्रवाल भी चड्ढी न पहने होते तो उनका लण्ड भौजी की चूत में घुस गया होता। अग्रवाल जब पानी से निकले तो उनका लण्ड तना हुआ था जिससे पैंट में टेंट बन गया था।

मिसेज़ अग्रवाल ने उसको देखा, सबने देखा। वास्तव में सभी आदमियों की यही हालत हो रही थी। गीले पैंटों से उनके लण्ड सर उठा रहे थे जिनको वह बड़ी मुश्किल से पैंट में हाथ डालकर दबा पा रहे थे।

भौजी जब पानी से निकलीं तो उनकी चूचियां तन गई थीं, गीले ब्लाउज़ से दो नुकीली चोंचें निकल रही थीं। साड़ी ऊपर तक चिपक गई थी, दो पुष्ट जांघें दिख रही थीं। वह बड़ी मादक दिख रही थीं। दोंनों हाथों में गुलाल भर के वह अग्रवाल से चिपक गईं उनको तबीयत से गुलाल मला।

मुश्कुराकर आँख नचाकर बोलीं- “लाला फिर खेलियो होली…”

अकेला मिलने पर वह अग्रवाल से बोलीं- “लाला तुम को शरम नईं आवत अपना खूंटा हमरी ऊके मुँह पे लगा दिये। तुमारे सारे से हम का कहैं तुमने तो हमें खराब कर दियो…”

अग्रवाल- “कहो तो हम माफी मांग लेहैं पर का करें भौजी तुम हो ही ऐसी कि हमहूं वो काबू में नई रहे…”

भौजी इतरा के- “सबर रखो ननदी से अच्छी हम थोड़े ही हैं…”

अग्रवाल- “तुमारे से उनका का मुकाबला। भौजी जब मुँह पर रख ही लियो तो भीतर भी ले लो न…”

भौजी आँखें दिखाते हुये- “लाला तुम बहुत बदमाश हो मैं ननदी से कहूँगी…”

अग्रवाल- “भौजी आप जो चाहो करो, हम तो दिल की बात कह दई…”

भौजी मस्ती से आँख नचाकर बोलीं- “रात में जबई मौका मिले आ जइयो, तुमरी इच्छा पूरी कर देंहैं…”


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औरतों की होली



इस बीच औरतों का ग्रुप जमा हो गया था तो औरतें उधर चली गईं। कुछ औरतें बातचीत से, हाव-भाव से हरकतों से बेकाबू हो रही थीं, फूहड़ से फूहड़ बातें कर रही थीं। बदन खोल-खोलकर के दिखा रही थीं। इन सबमें आगे मिसेज़ वर्मा थी। वह एक बहुत बड़ा डिल्डो लिये थीं। हरकतों से ऊपर से अपने में लगा कर दिखाती थीं। किसी औरत से चिपक जाती थीं, उसको चूमने लगती थीं, ऊपर से डिल्डो लगाने लगती थीं।

ढोलक पर थाप पड़ने लगी। कोई स्वांग भर रहा था, कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था। मिसेज़ वर्मा की मंडली ने सामूहिक गाना शुरू किया-


“झड़ते हैं जिसके लिये चूत को याद करके,

ढूँढ़ लाया हूँ वही लण्ड मैं तेरे लिये,

बुर में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे न कहीं,

पड़ा रहेगा यूँ ही झांटों के बाल तले,

झड़ते हैं जिसके लिये रोज ही उठ-उठ के।

लण्ड मोटा है मेरा चूत पे फिसले न कहीं,

कसके ले लेना इसे चूत उठा-उठाकर के,

लगाये जायेगा यही धक्के धकाधक से,

झड़ते हैं जिसके लिये मूठ मल-मल के,


मिसेज़ वर्मा ने शेर सुनाना चालू किया:

दिला तो दिया है तुझे पर एक शर्त लगाई है,

लेनी है वो चीज़ जो तूने टांगों में छिपाई है।


और उन्होंने टांगों के बीच में हाथ कर लिया। फिर…

बेदर्द जामाना क्या जाने क्या चीज़ जुदाई होती है,

मैं चूत पकड़कर बैठी हूँ घर-घर में चुदाई होती है।


चूत को उन्होंने मुट्ठी में जकड़ लिया। फिर…

मुड़कर जरा इधर भी देख जालिम, कि तमन्ना हम भी रखते हैं

लण्ड तेरे पास है तो क्या, चूत तो हम भी रखते हैं।


यह कहते हुये उन्होंने साड़ी ऊपर उठा दी, नीचे कुछ भी नहीं पहने थीं।

शेर कहे शायरी कहे या कहे कोई खयाल,

बीवी उसकी चूत उठाये चोदे उसका यार।


यह कहकर टांगें फैलाकर उन्होंने ऐसी हरकत की जैसे चुदवा रही हों।

अचानक भौजी ने जोर से कहा- “ऐसी गरम हो रई है तो खोल के सड़क पे खड़ी हो जा कोई लगा देगो…”

मिसेज़ वर्मा को ऐसी उम्मीद नहीं थी, उन्होंने चौंक कर भौजी को देखा और बोलीं- “लगता है तुम सड़क पर ही लगवाती होगी, तेरा आदमी नामर्द होगा…”

भौजी ने जावाब दिया- “मेरा आदमी तेरी जैसी चार को एक साथ करे और तेरा आदमी तेरी भी भूख न मिटा पाये…”

मिसेज़ वर्मा भौजी के पास आ गईं बोली- “तू कितनों का एक साथ ले सकती है? ला देखूं क्या छिपाया है?” यह कहते हुये उन्होंने धक्का देकर भौजी को चित्त गिरा दिया और आदमी की तरह उन पर पसर गईं।

भौजी ने चट से पलटी खाकर मिसेज़ वर्मा को अपने नीचे कर लिया। एक हाथ से उनकी दोनों कलाइयां जकड़ लीं।

मिसेज़ वर्मा ने छुड़ाने की बड़ी कोशिश की पर भौजी की मजबूत जकड़ से न छूट सकीं।

मिसेज़ वर्मा की साड़ी पलटते हुये भौजी ने कहा- “बछिया जैसी गरमा रही है, ले मैं लगाती हूँ बैल का तेरे में…” अपने दोनों घुटने फँसाकर भौजी ने मिसेज़ वर्मा की टांगें चौड़ा दी। चूत मुँह खोले सामने थी। अच्छा खासा बड़ा सा छेद था, भोसड़ी हो गई थी। लगता था खूब इश्तेमाल की गई थी। भोसड़ी गीली हो रही थी। गुलाबी नरम गहराइयों में पानी और गाढ़ी सी सफेदी चमक रही थी। मालूम होता था हाल में ही लण्ड का रस चखा था जो थोड़ा अंदर रह गया था। पानी बाहर रिस रहा था। सब लोग गौर लगाकर मज़े लेकर देख रहे थे। भौजी ने सुपर साइज़ का डिल्डो उठा लिया।


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मिसेज़ वर्मा घिघिया उठीं- “इसे मत करो मैं नहीं ले पाऊँगी सही में मैं नहीं ले सकती इसे प्लीज़्ज़…”

भौजी बोली- “लेगी कैसे नई? इतना डलवाने के लिये शोर जो मचाबे है…” उन्होंने डिल्डो को चूत के छेद में घुसेड़ा तो बड़ी मुश्किल से अंदर गया। उन्होंने घुमा करके और भीतर करना चाहा।

तो मिसेज़ वर्मा तड़पने लगीं। वह सिर यहां वहां पटक रही थीं और बोले जा रही थीं- “मत करो प्लीज़्ज़…”

भौजी ने जोर लगाके डिल्डो को आधा अंदर कर ही दिया।

मिसेज़ वर्मा के मुँह से एक चीख निकली। अब भौजी डिल्डो को आगे पीछे कर रही थीं साथ ही चूत की घुंडी पर अंगूठा फेरती जा रही थीं। धीरे-धीरे मिसेज़ वर्मा को मजा आने लगा। वह आनंद में भर कर ‘सी सी’ करने लगीं थीं। बोले जा रही थीं “घुसेड़ दो उसको और अंदर लगाओ जोर कस के…” लेकिन डिल्डो उनके अंदर उससे ज्यादा और नहीं घुस सकता था।

वह भौजी को अपने ऊपर खींचना चाहती थीं आदमी जैसा कस के प्यार पाने के लिये।

भौजी ने कहा- “लो अब कौन इनको संभालेगा?”

और मिसेज़ वर्मा की एक सहेली चूत खोल के उनके ऊपर लेट गई। सेर को सवा सेर मिल गया था।


होली की महफिल

होली की शाम को सब लोग नहा-धोकर शिशिर के यहां इकट्ठे हुये। मलहोत्रा परिवार न आ सका, उनके यहां मेहमान आ गये थे। कुमुद ने सेब, पापड़ी, गुझिया, भांग की बरफी और भांग मिली ठंडाई का इंतेजाम कर रखा था। होली के माहौल का असर था ऊपर से भांग का शुरूर, सब बहक रहे थे। राकेश ने सुझाया कि सब लोग अपने-अपने पहले सेक्स का अनुभव सुनायें।

सब एक साथ बोले- हाँ सब लोग अपनी अपनी बीती बतायें। सबसे पहले मेजबान शिशिर से कहा गया कि वह अपना अनुभव बाताये।


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होली की महफिल

होली की शाम को सब लोग नहा-धोकर शिशिर के यहां इकट्ठे हुये। मलहोत्रा परिवार न आ सका, उनके यहां मेहमान आ गये थे। कुमुद ने सेब, पापड़ी, गुझिया, भांग की बरफी और भांग मिली ठंडाई का इंतेजाम कर रखा था। होली के माहौल का असर था ऊपर से भांग का शुरूर, सब बहक रहे थे। राकेश ने सुझाया कि सब लोग अपने-अपने पहले सेक्स का अनुभव सुनायें।

सब एक साथ बोले- हाँ सब लोग अपनी अपनी बीती बतायें। सबसे पहले मेजबान शिशिर से कहा गया कि वह अपना अनुभव बाताये।


***** ***** शिशिर की कहानी

होली का दिन था। मैं इंटरमीडियेट मैं रहा हूँगा। मेरी भाभी मुहल्ले में होली खेलकर आईं। वह बड़ी खुश थीं, कुछ गुनगुना रही थीं। मैं यह बता दूं कि भाभी मेरे से छः-सात साल बड़ी थीं, मेरे से बड़ा लाड़ करतीं थीं, जिसमें सेक्स बिल्कुल नहीं था। जब वह ब्याह के आईं तो मैं दस साल का रहा हूँगा। वह बिल्कुल भीग गईं थीं, साड़ी बदन से चिपक गई थी। उनके उभार और कमर की गोलाइयां पूरी तरह उभर आईं थीं। मेरी भाभी में बहुत ग्रेस था। अच्छी उंचाई की आकर्षक मुखछबि थी और शादी के छः-सात सालों में बदन बड़ी समानता से सुडौल हो गया था।

आते ही वह बाथरूम में चली गईं। बाथरूम में दो दरवाजे थे, एक उनके कमरे की तरफ खुलता था एक मेरे कमरे की ओर जो अक्सर बंद रहता था क्योंकी मैं नीचे का बाथरूम इश्तेमाल करता था। लेकिन इस समय मेरी तरफ का दरवाजा खुला हुआ था।

उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया क्योंकी होली के लिये मुझे अपने दोस्त के यहां जाना था और दूसरे दिन वापिस आना था। लेकिन मेरा प्रोग्राम ऐन मौके पर कैंसिल हो गया था। मैं यहीं होली खेलकर वापिस आ गया था और उसी बाथरूम में नहा धो लिया था। गलती से अपनी तरफ का दरवाजा खुला छूट गया था। मैं कमरे मैं आराम से लेटा हुआ था जहां से बाथरूम का नजारा साफ नजर आ रहा था।

भाभी ने सबसे पहले अपनी साड़ी उतार के फेंक दी फिर पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर अपनी पैंटी खींच ली। वह रंग से तर हो रही की जैसे उसपर ही निशाना लगाकर रंग फेंका गया हो। जैसे-जैसे वह ब्लाउज़ के बटन खोल रही थीं मेरी सांसें गरम होती जा रही थीं। ब्लाउज़ उनके शरीर से फिसलकर नीचे गिर गया। वह मेरे सामने केवल ब्रेजियर और पेटीकोट में खड़ी थीं। ब्रेजियर उनके सीने से चिपक गई थी बादामी शहतूत से चूचुक और उनके घेरे साफ नजर आ रहे थे। पेटीकोट आगे से उनकी रानों से बुरी तरह चिपक गया था और चूतड़ों के बीच में दरार अ फँस गया था। सामने झांट के बाल नजर आ रहे थे। उत्तेजित होकर मेरा लण्ड एकदम खड़ा हो गया।

उन्होंने पीछे हाथ करके जैसे ही हुक खोलकर ब्रेजियर अलग की कि स्प्रिंग की तरह दो सफेद गेंदें सामने आ गईं। बहुत ही मतवाले भरे हुये जोबन थे। भाभी ने अपना हाथ पेटीकोट के नाड़े की तरफ बढ़ाया तो मेरा लण्ड और ऊपर होकर हिलने लगा। उन्होंने एक झटके में नाड़ा खींचा और पेटीकोट नीचे गिर गया। माई गोड मेरे सामने भाभी पूरी नंगी खड़ी थीं। बड़े-बड़े उभार, बादामी फूले-फूले चूचुक, चिकनी सुडौल जांघें, भरे-भरे उभार लिये चूतड़ों की गोलाइयां और जांघों के ऊपर तराशे हुये बादामी बाल। मैंने अपना लण्ड पकड़कर लिया नहीं तो वह हिल-हिल के बुरा हाल कर देता।

भाभी की जांघों और चूतड़ों पर रंग के धब्बे लगे हुये थे। चूत के बाल भी रंग में चिपक गये थे। उन्होंने साबुन से मलकर रंग को छुड़ाया। इसके बाद उन्होंने जो कुछ किया मैं उठ के खड़ा हो गया।

भाभी ने साबुन का ढेर सारा झाग बनाया और अपनी टांगें चौड़ी करके उंगली से साबुन का झाग अपनी चूत के अंदर बाहर करने लगीं। मेरे सामने उनकी चूत का मुँह खुला हुआ था। छेद के ऊपर फांकों के बीच की और अंदर की साबुन मिली लाल गहराई मेरे सामने थी। लगता था वह रात के लिये तैयारी कर रही थीं। मेरे से न रहा गया और मैं दरबाजे के सामने जा खड़ा हुआ, लण्ड एकदम तना हुआ।

भाभी ने मुझे देखा और उनके मुँह से चीख निकली- “उई माँ…” फिर एक हाथ से उन्होंने अपनी चूत ढंक ली और दूसरे से अपनी चूचियां छिपाते हुये बोलीं- “ऐसे क्या देखते हो जाओ न…” फिर खुद ही भागकर अपने कमरे में चली गईं।

मैं बहुत गरम हो चुका था। उत्तेजना मैं मेरा लण्ड फड़फड़ा रहा था। आँखों के सामने भाभी का नंगा बदन नाच रहा था। मैं बाथरूम में घुस गया। पैंट उतारकर लण्ड को कस-कस के झटके दिये जि कि गाढ़ा गाढ़ा सफेद पदार्थ काफी देर तक उगलता रहा। भाभी की पैंटी उठा के उससे पोंछा। पता नहीं भाभी ने यह सब देखा या नहीं।

शाम को भाभी मिलीं तो शर्म से लाल हो रही थीं। आँखें नहीं मिला रही थीं।

हिम्मत करके मैंने उनसे से कहा- “भाभी, आप अंदर से भी उतनी सुंदर है जितनी बाहर से…”

भाभी बोलीं- “तुम बहुत बेशरम हो गये हो, जल्दी तुम्हारी शादी करना पड़ेगी…”

उसके बाद बहुत दिनों तक वह मुझसे शर्माती रही। मैं भी उनसे बहुत दिनों तक सहज न हो पाया।

सुनीता सोच रही की कि शिशिर उसमें अपनी भाभी को देखता है और इसीलिये शुरू से उसको ताकता है और भाभी-भाभी कहता है। जैसे अपनी भाभी के सामने न बढ़ा उसी तरह उसके आगे भी नहीं बढ़ता है। सुनीता ने निश्चय कर लिया कि इसका यह बैरियार तोड़ना ही पड़ेगा।


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कुमुद की कहानी

मेजबान के रूप में अगली बारी कुमुद की थी। कुमुद ने पहले सेक्स वाली बातें महफिल में नहीं सुनाई थीं। पहले तो झिझकी लेकिन फिर कहने लगी:

“होली मनाने मेरी दीदी मैके आई थीं। उनकी शादी को एक साल से कम हुआ था। होली वाले दिन जीजाजी भी आ गये। जीजाजी बड़े खुले और मजाकिया किश्म के हैं। मेरी भाभियों ने उनसे छेड़खानी की, गंदे मजाक किये। जिनका उन्होंने तुरंत बढ़कर जवाब दिया, उनके संग होली खेली जिसमें मर्यादा को ध्यान में रखते हुये उन्होंने एक दूसरे के अंग छुये। मेरे साथ भी जीजाजी ने होली खेली लेकिन उस समय वह मर्यादा भूल गये। रंग लगाने के बहाने उन्होंने मेरे दोंनों उरोजों को मसला और हाथ बढ़ाकर चूत के ऊपर भी रगड़ दिया…” यह कहकर कुमुद ने सबेरे की होली को निशाना बना करके दबी आँखों से राकेश की ओर देखा।

कुमुद ने कहना चालू रखा- “मेरी दीदी ने देख करके भी अनदेखी कर दी। भाभियां हँसती रही। मेरे ऊपर कुछ शुरूर आ गया। रंग बाजी खतम हुई तो कहा गया कि सब लोग नहा धोकर तैयार हो जाओ क्योंकि जीजाजी के चाचा जी ने सबको बुलाया है जो उसी शहर में रहते थे।

एक भाभी ने ताना कसा कि मेरी ननद यानी दीदी के संग तो होली मनाई ही नहीं है।

तो वह मुश्कुराके बोले अभी मनाऊँगा।

मैं नहाने के लिये गुसलखाने में घुस गई। कपड़े उतार के नीचे की ओर देखा जहां जीजाजी ने हाथ लगाया था तो सिहरन हो आई। मैंने वहां पानी की तेज धार छोड़ दी। साबुन उठाने के लिये ताक पर हाथ बढ़ाया और ऊपर देखा जहां से छत साफ नजर आती थी। वहां जीजाजी दीदी को पकड़े हुये थे। छत की सीढ़ियों का दरवाजा उन्होंने बंद कर रखा था।

दीदी रंग से सराबोर हो रही थीं। दीदी अपने को छुड़ा के भागीं। जीजाजी ने छत की मुड़ेर पर दीदी को पकड़ लिया और सामने से चिपका लिया। दीदी मुड़ेर पर झुकतीं गईं और जीजाजी उनकी चूचियों को चूमने लगे। दीदी ने उनके सिर के ऊपर हाथ रखकर और जोर से सिर चूचियों पर दबा लिया और दूसरे हाथ से जीजाजी का लण्ड टटोलने लगीं। जीजाजी को जैसे करेंट लग गया हो। वह दीदी से अलग हो गये और पेटीकोट समेत उनकी साड़ी उलट दी।

गीले अंडरवेर को नीचे खींच कर उतार लिया फिर उंगली में घुमाते हुये नीचे सड़क पर फेंक दिया। अपने हाथ से पैंट के बटन खोलने लगे। इस बीच दीदी अपने ब्लाउज़ के बटन खोल चुकी थीं और उन्होंने ब्रेजियर के हुक खोलकर उसको अलग कर दिया। उनके भरे जोबन मुँह बाये खड़े थे। मुझे नहीं मालूम था कि उनकी गोलाइयां इतनी बड़ी थीं। जीजाजी ने अपनी पैंट गिरा दी। उनका मोटा लण्ड एकदम तनकर में खड़ा था। उस बीच मैंने साबुन घिस-घिस के बहुत सारा झाग बनाया, तभी जीजाजी का लण्ड सामने दिखा तो अपने आप मेरा हाथ चूत के छेद पर चला गया और मैंने सारा का सारा झाग चूत में घुसेड़ लिया।

दीदी ने अपने आप टांगें चौड़ा दीं। वह चूत का मुँह फैलाये मुड़ेर से टिकी झुकी हुई थीं, पीठ मुड़ेर पर पसरी हुई थी। दीदी का सिर मुड़ेर से बाहर निकला हुआ था। साड़क पर जाने वाला कोई भी ऊपर देखे तो उनकी पोजशिान को देख सकता था लेकिन इस समय उनको इसकी फिक्र नहीं थी। जीजाजी ने खड़े-खड़े ही लण्ड को हाथ से पकड़कर उनकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे अंदर डालना चालू किया। दीदी की चूत उसको लीलती गई। दीदी ने कस करके दोनों बाहें जीजाजी की पीठ पर बाँध लीं। पहले तो जीजाजी धीरे-धीरे आगे-पीछे करते रहे फिर उन्होंने धकाधक-धकाधक चालू कर दी। दीदी भी चूत उठा-उठाकर के झेल रही थीं।

इस बीच पता नहीं कब मैं गुसलखाने में रखी कपड़े डालने की रैक से टिक गई थी और उसकी खूंटी की घुंडी को अपनी चूत में घुसेड़ लिया था। जब जीजाजी धकाधक लगा रहे थे तो मैं भी खूंटी पर उसी लय से आगे पीछे हो रही थी। मैं मज़े में पूरी तरह डूबी थी कि दरवाजा खटखटाने से होश में आई।

बड़ी भाभी कह रही थी- अब निकलोगी भी बाहर या नहाती ही रहोगी सबको तैयार होना है।

मैंने जल्दी से अपनी सफाई की और बाहर निकल आई। जीजाजी अभी भी दीदी को लगाये जा रहे थे।

उसी दिन शाम को जीजाजी के चाचा जी के यहां मेरी शिशिर से मुलाकात हुई। वास्तव में हम लोगों को मिलाने के लिये ही यह आयोजन किया गया था। कहानी खत्म होने पर बड़े कामुक तरीके से राकेश ने कुमुद को देखा।


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राकेश की कहानी

अब बारी राकेश की थी। उसने कहा:

मेरी शादी की तैयारियां हो रही थीं। कालेज के मेरे दोस्त जमा हो गये थे। शादी के कामों में नाइन का काफी रोल होता है, बहुत सारे नेगों में नाइन का अहम काम होता है। भाभी ने उबटन की रश्म की तो मेरे को हल्दी बेसन और चंदन से अच्छी तरह उबटन लगाने के लिये नाइन बैठी। कलावती उसका नाम था। कलावती दुबली पतली थी, सांवला रंग था, बड़ी बड़ी आँखों वाले उसके चेहरे में बेहद आकर्षण था। कामकाजी शरीर एकदम चुस्त और छरहरा था कहीं भी बेकार की चर्बी नहीं थी। उसके लंबे बदन की कशिश किसी को भी बाँध लेती थी। वह एकदम जवान थी।

उबटन लगाते हुये जब मेरे दोस्तों ने देखा तो कइयों का दिल उस पर आ गया। शाम को जब हम सब लोग बैठे तो रमेश ने जो शादीशुदा था कहा- “वह नाइन की लेना चाहता है…”

उसके बाद तो एक-एक करके सब शादीशुदा और कुँवारे दोस्तों ने अपनी मंशा जता दी कि वह कलावती को चोदना चाहते हैं। डर था कि नाइन कहीं उनकी बात सुनकर भड़क न उठे और जंजाल खड़ा कर दे।

रमेश बोला- “मैं रह नहीं सकता मैं नाइन से बात करूंगा…”

मेरे को बड़ा डर लगा कि कहीं बवंडर न उठ खड़ा हो। रमेश ने समझाया कि तुम मत घबड़ाओ मैं सीधे पूछ लूंगा, वो नहीं चाहेगी तो बात खतम।

नाइन को एक नौकरानी के जरिये यह कहकर बुलाया गया कि दूल्हे राजा बुलाते हैं। मैं और सब दोस्त अंदर के दूसरे कमरे में बैठ गये। केवल रमेश उस कमरे में रहा। कलावती आई तो मुझे पूछने लगी।

रमेश बड़ी नम्रता से बोला- “कलावती दूल्हे राजा तुमसे शर्मा रहे हैं। मुझसे कहा है कि तुमसे बात करूं। देखो कलावती मेरी बात तुम्हें अच्छी न लगे तो नाराज न होना। मैं दूल्हेराजा की तरफ से तुमसे माफी मांग लूंगा लेकिन बात आगे मत बढ़ाना…”

कलावती सहम गई- “आप क्या बात करते हैं, बाबूजी बोलिये क्या है?”

रमेश- “कलावती तुम बहुत अच्छी हो तुम्हारा घरवाला बहुत ही भाग्यवान है। बात यह है कि तुमने हम लोगों का दिल जीत लिया है। हम लोग चाहते हैं कि तुम हमें शुख दे दो कि हम हमेशा तुम्हें याद करते रहें…”

कलावती कुछ समझी कुछ नहीं, बोली- “मैं क्या सेवा कर सकती हूँ?”

रमेश को सीधा कहना पड़ा- “हम लोग तुमको भोगना चाहते हैं…”

मेरा दिल धकधक कर रहा था।

कलावती के चेहरे पर लाजभरी खुशी दौड़ गई। मस्ताकर बोली- “सबसे पहले दूल्हेराजा को करना होगा। अपनी दुल्हन से पहले मेरे साथ सुहागरात मनांयें। उनसे सोने का गहना लूंगी, फिर तुम सब लोगों की तबीयत खुश कर दूंगी…”

शर्त बड़ी टेढ़ी थी। शादी शुरू हो गई थी नेग हो रहे थे। मैं सुनीता के लिये बेकरार था। कलावती से संभोग नहीं कर सकता था। उसको बहुत समझाया ज्यादा पैसे का लालच दिया लेकिन वह टस से मस न हुई। यहां मेरे दोस्त मेरे ऊपर दबाव डाल रहे थे, वह कलावती को चोदने को उतावले थे। कहने लगे कि नाम के लिये डाल देना बस। उतने सारे दोस्तों का मन रखने के लिये मुझे उनकी बात मानना पड़ी।

तय हुआ कि बारात उठने के पहले जब मुझे तैयार होने के लिये एक कमरे में अकेला छोड़ दिया जायेगा तब कलावती चुपचाप कमरे में आ जायेगी। नाइन होने से उसका आना जाना आसान था। शादी के बाद जब मैं सुनीता के साथ रात रंगीन कर कहा हूँगा, उस समय मेरे दोस्त भी कलावती के संग आनंद मनायेंगे।

जब कलावती कमरे में आई तो मैं उसे देखता ही रह गया। लगता है उसने अपना भी उबटन कर डाला था। चेहरे पर गजब की लुनाई थी। बहुत कीमती न सही लेकिन उसने एक अच्छी साड़ी और राजस्थानी चोली पहन रखी थी जो उसके ऊपर खूब फब रही थी। आते ही उसने मेरे पैर छुये।

मैंने यह कहते हुये कि ये क्या करती हो, अपने से चिपका लिया। उसकी कमनीय देह बेला की लता सी मेरे से चिपक गई। उसका बदन मेरे वदन के उतार चढ़ाव में फिट हो गया था। मेरी रानों में उसकी जांघें समा गईं थीं। लण्ड के ऊपर चूत फिट हो गई थी। सीने पर उसके सख्त स्तनों और चूचुकों की चुभन महसूस कर रहा था। वह और भी चिपकती हुई खड़ी रही। जल्दी से निपटने के लिये मैंने चूत छूने के लिये साड़ी में हाथ डालना चाहा।

तो वह बोली- “राजाजी इत्ते बेसब्र न हो। लो इनसे खेलो…” हाथ पीछे करके उसने चोली की डोरी खींच दी। नीचे उसने कुछ भी नहीं पहन रखा था।

लपक कर मैंने दोनों गोलाइयों को मुट्ठी में दबा लिया। उसकी छातियां छोटी पर सख्त थीं। छातियों को मसलते ही कलावती ‘आह आह’ कर उठी। मैंने सिर झुका कर उसकी बाईं चूची मुँह में ले करके धीरे से दांतों से दबा ली।

कलावती जोर-जोर से ‘उइईईईई‘ कर उठी। जल्दी ही वह गरम हो गई थी। उससे अब रहा न गया तो लण्ड को पकड़ के हिलाते हुये बोली- “इसे निकालो न…”

मैंने पाजामा और अंडरवेर का नाड़ा खोलकर नीचे गिरा दिया।

उसने मेरा तना हुआ लण्ड देखा तो मुँह से निकल गया- “उई दैय्या… इत्ता बड़ा हथियार है… मेरी लिल्ली मैं कैसे घुसेगा?”

मैंने कहा- “तो फिर अपनी लिल्ली दिखाओ न…” और उसके पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया तो साड़ी समेत पेटीकोट नीचे गिर गया।

जैसे ही वह नंगी हुई भाग के बिस्तर पर लेट गई। मैं भी पूरा नंगा होकर उसके ऊपर जा गिरा। कलावती ने मेरे से पूछा- “राजाजी, तुमने पहले किसी को चोदा है?”

मैंने झूठ बोला- “नहीं तो…”

कलावती का चेहरा चमक उठा- “ओ मइया… मैं ही इसका पहला रस लूंगी। मैं ही आपकी सही औरत बनूंगी…” फिर बोली- “इसका प्रसाद चखना होगा…”

मेरे को पलटा कर वह दोनों टांगों के बीच बैठ गई। दोनों हाथों से लण्ड को छूकर हाथ माथे पर लगा लिये जैसे यह भी कोई पूजा की चीज़ हो। दांईं मुट्ठी में लण्ड को बंद करके उसके मालिश के अभ्यस्थ हाथों ने मुट्ठी पूरे लण्ड पर इस तरह आगे पीछे की कि मैं हवा में तैरने लगा। फिर अगले हिस्से की खाल हटाकर सुपाड़ा उसने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी। मेरा लण्ड फड़फड़ाने लगा। फिर वो पूरे लण्ड को चचोरने लगी।

मैं बेकाबू हो गया। चूतड़ उठा-उठाकर लण्ड उसके मुँह में ही पेलने लगा।

मेरे से उसने कहा- “जब झड़ो तो रुकना नहीं। ज्यादा से ज्यादा आने देना…” इसके बाद उसने जो लय चालू की कि मेरे चूतड़ हवा में ही उठे रह गये और बढ़-बढ़ के धकाधक धक्के मारने लगे।

कलावती भी मुँह से पसंदगी जता रही थी- “उऊं ऊं ऊं ऊं…”

मेरे से रुका न गया। लण्ड ने एक झटका दिया और जैसे ही वीर्य उगलना चालू किया तो उसने फिर सुपाड़े को दांतों में थाम लिया और निकलते हुये रस को पीती गई।

जब लण्ड ठंडा हो गया तो आखिरी बार चाटती हुई बोली- “अपने मर्द के अलावा बस मैंने तुम्हारा प्रसाद लिया है। उनका भी बस चखा भर था। आपके किसी भी दोस्त का नहीं चखूंगी…”

मैंने खींच करके उसको अपने सीने से चिपका लिया।

कलावती ने मेरे सीने की चूचुक को मुँह में ले लिया और हाथ नीचे ले जाकर मेरे लण्ड के ऊपर ढक लिया। सीने से चिपके-चिपके ही वह धीरे-धीरे मेरी चूचुक चूसने लगी और बड़े अच्छे तरीके से लण्ड सहलाने लगी। मेरा लण्ड बढ़ता ही गया और थोड़ी ही देर में पत्थर की तरह सख्त हो गया।

कलावती- “लो अपनी सुहागरात मना लो…” कहकर पलट कर चित्त लेट गई। फिर बोली- “मैं बाताती हूँ, कल अपनी दुल्हन की सील कैसे तोड़ोगे?”

टांगें चौड़ा करके उनके बीच में मुझे घुटनों के बल बैठा लिया। फिर अपनी टांगें मेरे दोनों कंधों पर रख लिये। उसके चूतड़ हवा में उठ गये थे। मेरे सीधे सामने चूत का मुँह खुल गया था। छेद अंदर तक दिख रहा था। अंदर तक चूत गीली थी और पानी रिसकर रानों पर फैल रहा था।

कलावती ने अपनी मुट्ठी से लण्ड पकड़कर चूत के मुँह से सटा दिया और बोली- “इसे धीरे-धीरे घुसेड़ दो…”

मैंने जोर लगाया। उसकी चूत टाइट थी पर मेरा पूरा लण्ड आसानी से उसमें चला गया। चूत की पकड़ में उसको बहुत आनंद मिल रहा था।

कलावती कहने लगी- “राजाजी, हमारी इसमें तो आराम से चला गया लेकिन कल ऐसा नहीं कर पाओगे। दुल्हन की फुद्दी में घुसेगा नहीं और फिसलकर ऊपर खिसक जायेगा। और जब घुसने लगेगा तो दुल्हन अपनी फुद्दी पीछे हटाती जायेगी क्योंकी उनको दर्द होगा। इस आसान में तुम दुल्हन पर पूरा काबू रख सकते हो। अगर टांगें कस के जकड़ लोगे तो वह पीछे नहीं हट पायेगी। रुक-रुक करके डालना लेकिन वह मना करें, चीखें भी तो मत रुकना, पूरा अंदर कर ही देना…”

मैं इस बीच धीरे-धीरे अंदर बाहर कर रहा था।

कलावती कहने लगी- “मेरी इसको तो कूटो न कसके कि इसकी सारी गरमी निकल जाये…”

मैंने लण्ड को बाहर तक निकाला और झटके से पूरा अंदर कर दिया।

कलावती के मुँह से निकला- “हाय राजा क्या लौड़ा है… अंदर तक हिला दिया और लगाओ कस के…”

उसके मुँह से खुला-खुला सुनकर मैं और उत्तेजित हो गया। पिस्टन की तरह धकम-पेल करने लगा। बड़ी दूर तक बाहर निकालता और खड़ाक से अंदर कर देता।

उसने कस के बांहों से मेरी पीठ को जकड़ रखा था। हर चोट पर वो पीठ में नाखून गड़ा देती और जोर से चिल्लाती- “ओ रज्जा फाड़ दो इसको छोड़ना नहीं…” उसकी जबान गंदी से गंदी होती जा रही थी- “रज्जा इसकी भोसड़ी बना दो आज, बड़ा सताती है मुझे…”

मेरे को उसकी गंदी बातें बुरी नहीं लग रही थीं बल्की मैं आनंदित हो रहा था और अपनी चोटें बढ़ाता जा रहा था।

अचानक उसने कसके चूत चिपका दी- “ओ ओ ओ रज्ज्जा मैं… मैं तो झ्झड़ गईईई…” और अपने दांत मेरे सीने में गड़ा दिये। मैंने भी लण्ड अंदर रहते हुये ही उसकी क्लिटोरिस के ऊपर लण्ड की जड़ को कस के रगड़ा और सारा का सारा वीर्य छोड़ दिया।

काफी देर तक हम लोग वैसे ही पड़े रहे। फिर वह उठी। उकड़ू हो करके उसने अपना सिर मेरे पैरों पर रखा दिया। मैंने उठकर के एक सोने का हार उसके गाले में डाल दिया।

वह बोली- “राजाजी मेरे को भूल मत जाना। मैं भी आपकी औरत की तरह हूँ। सुहागरात आपने मेरे साथ मनाई है…” और वह कपड़े पहनकर चली गई।

कहां तो मैं जल्दी निपटना चाहता था और कहां एक घंटे से ऊपर उसके साथ हो गया।

कुमुद अपना क्षोभ न छुपा सकी, कहा- “हाउ इनसेंसिटिव… बेचारी सुनीता…”


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***** ***** To be contd... ...

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