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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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"नीलकंठ की कोई नई बात?” ___

“नहीं अभी तक तो वो दोबारा मिन्नो में नहीं आया। तुम्हें बताने को मेरे पास कुछ है।"

"कहो।"

“तवेरा मुझसे ब्याह करने को तैयार है। सफर के दौरान उसने ये बात मुझसे कही।"

"ये तो अच्छी खबर है।"

“तवेरा से नई बात मुझे पता चली। तवेरा ने देवा-मिन्नो को इस बात के लिए तैयार कर लिया है कि वो जथूरा तक पहुंचकर जथूरा को खत्म कर दें। इसके लिए उसने देवा-मिन्नो को कीमती पत्थरों का बोरा देने और उन्हें उनकी दुनिया में पहुंचाने का वादा किया है। तवेरा कहती है कि देवा-मिन्नो बहुत लालची हैं।" यंत्र से गरुड़ की महीन आवाज निकली।

“असम्भव।" सोबरा के होंठों से निकला।

"क्या मतलब?”

“न तो तवेरा ऐसी है न ही देवा-मिन्नो।"

"ये बात मुझे तवेरा ने स्वयं कही है।"

“कुछ तो गड़बड़ है गरुड़।"

"कैसी गड़बड़?"

"मुझे पूरा यकीन है कि तवेरा अपने पिता को बहुत चाहती है। वो ऐसा कभी नहीं चाहेगी और देवा-मिन्नो भी ऐसे नहीं हैं कि कीमती पत्थरों के लालच में जथूरा की जान लेने को तैयार हो जाएं।” सोबरा ने सोच-भरे स्वर में कहा।

“तवेरा ने ये बातें मुझसे कही है। वो झूठ क्यों कहेगी।"

“तुमने तवेरा के सामने कोई बेवकूफी तो नहीं कर दी।"

"कैसी बेवकफी?"

"कि वो पहचान गई हो कि तुम मुझे खबरें दे रहे हो।"

"क्या तुम्हें लगता है कि मैं ऐसा करूंगा?"

“तवेरा के साथ, करीबी क्षणों में तुमने ये सब उगल दिया हो कि तुम मुझे खबरें देते हो।"

“गलत बात मत कहो। क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?" गरुड़ का नाराजगी-भरा स्वर यंत्र से निकला।

“भरोसा है, परंतु ये सब बहुत अजीब हो रहा है।"

"तुम ये ही सब तो चाहते थे।"

“परंतु मैं जथूरा की मौत नहीं चाहता। उसे कैद रखने से उसकी तकलीफ ज्यादा बढ़ेगी।"

“ये मेरी नहीं, तवेरा, देवा-मिन्नो की योजना है।" सोबरा के चेहरे पर सोचें दौड़ रही थीं। वो बोला।

"तुम तवेरा के पास ही रहने की चेष्टा करो।"

“वो मेरे पास ही है। सिर्फ मुझ पर ही भरोसा कर रही है। वो मुझे चाहने लगी है। जब जथूरा मर जाएगा तो तवेरा मुझसे शादी कर लेगी। तब जथरा की हर चीज का मालिक मैं बन जाऊंगा। उसके बाद तुम जैसे कहोगे, जथुरा की नगरियों का मैं वैसा ही करूंगा। यानी कि करूंगा मैं, परंतु हुक्म तुम्हारा होगा।"

“मुझे तुमसे यही आशा है गरुड़ । तुम मेरे बेटे की तरह हो। मेरे बाद सब कुछ तुम्हारा ही तो है।"

“तुमने मुझसे वादा कर रखा है कि अपने अंतिम वक्त में तुम अपनी सारी शक्तियां, नगरी, सब कुछ मुझे दोगे।"

“मैं अभी भी अपने वादे पर कायम हूं और कायम ही रहूंगा।"

“अब मैं बाद में बात करूंगा।"

"ठीक है।" बातचीत समाप्त हो गई।

सोबरा ने यंत्र का बटन दबाकर वापस जेब में रखा और बड़बड़ा उठा।

'गलत हो रहा है। बहुत कुछ गलत हो रहा है।' सोबरा बेचैनी-भरे अंदाज में कमर पर हाथ बांधे टहलने लगा। पेशानी पर बल नजर आ रहे थे। होंठ भिंचे हुए थे। यही वो वक्त था, जब मनीराम ने भीतर प्रवेश करते हुए कहा।

"आज आप महल से बाहर नहीं निकले। खबर आई है कि कोटरा जाति वाले लोग आपसे कुछ कहना चाहते हैं। वो सुबह से ही आपके आने के इंतजार में अपने गांव में इकट्ठे हुए पड़े हैं।"

सोबरा आगे बढ़कर कुर्सी पर जा बैठा। तभी मनीराम, सोबरा के माथे पर बल देखकर बोला।

“आप कुछ परेशान लग रहे हैं।"

"बात ही ऐसी है मनीराम।" सोबरा ने उसे देखा।

"मैं भी तो जानूं।”

“उलझन ही उलझन है। कुछ भी समझ नहीं आ रहा। असम्भव बातें सामने आ रही हैं। गरुड़ ने खबर दी है कि तवेरा अपने पिता जथूरा की मौत चाहती है, ताकि हर चीज की मालकिन बन सके।"

“तवेरा ऐसी नहीं है।"

“गरुड़ कहता है कि तवेरा ने कीमती पत्थर की बोरी और देवा-मिन्नो को उनकी दुनिया में पहुंचा देने की एवज में, जथूरा को खत्म करा देने का सौदा किया है। देवा-मिन्नो तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश करके, जथूरा को तलाश करके उसे मार देंगे।"

मनीराम के चेहरे पर असहमति के भाव दिखने लगे।

"आपका मतलब देवा-मिन्नो जथुरा को आजाद कराने नहीं, उसे खत्म करने तिलिस्मी पहाड़ी पर जा रहे हैं।"

“गरुड़ ने ऐसी ही खबर दी।” सोबरा बोला। मनीराम गम्भीर नजर आने लगा।

"मुझे लगता है जैसे आपके खिलाफ चाल खेली जा रही है।"
 
"कैसी चाल?"

“या तो गरुड़ आपके साथ चाल खेल रहा है। वो आपको झूठी खबरें दे रहा...।"

“गरुड़ ऐसा क्यों करेगा?"

“हो सकता है तवेरा ने अपना प्यार दिखाकर गरुड़ को अपनी तरफ कर लिया हो।"

“सम्भव है।” सोबरा का चेहरा सख्त हुआ।

"दूसरी बात ये भी हो सकती है कि गरुड़ का राज खुल गया हो। तवेरा उसे धोखे में रखकर गलत खबरें दे रही हो। ___

“गरुड़ सच कहता क्यों नहीं हो सकता?" सोबरा ने सरल स्वर में कहा। ___

क्योंकि आज तक तवेरा ने ऐसा कोई काम नहीं किया कि हम सोचें, वो जथूरा की हर चीज की मालिक बनने की ख्वाहिश रखती है। जथूरा के सारे काम आज भी पोतेबाबा ही देखता है। फिर अचानक तवेरा क्यों बदल गई?"

“वो गरुड़ से ब्याह करने की सोच रही है।"

“ये बात है तो जथुरा या पोतेबाबा को क्यों एतराज होगा।" मनीराम ने सोच-भरे स्वर में कहा—“उधर देवा-मिन्नो के ग्रह ऐसे हैं कि पूर्वजन्म में आकर, वो कोई भी गलत काम नहीं करेंगे।"

"मैं भी यही सोचता हूं कि वो जथूरा की जान नहीं ले सकते।” सोबरा ने उलझन-भरे स्वर में कहा—“अब हमारे मन में शंका तो भर गई कि गरुड़ हमें गलत खबर दे रहा है या गरुड़ को ही तवेरा गलत कह रही हैं। तीसरी बात ये है कि क्या पता गरुड़ का कहना सही हो। हम ही गलत सोच रहे हों।" ___

"सच में उलझन वाली बात है।" मनीराम बोला___

"हमारा मोहरा, गरुड़ तो अब बेकार हो गया। क्योंकि वो जो भी खबर देगा, उसे लेकर हम शंका में रहेंगे कि वो सच कह रहा है या झूठ।”

- "हां, अब हम गरुड़ नाम के मोहरे की बात का पूरा भरोसा नहीं कर सकेंगे।” सोबरा ने सोच-भरे स्वर में कहा— “मेरे खयाल में मुझे इस बारे में महाकाली से बात करनी चाहिए। उसकी राय लेनी चाहिए।"

मनीराम ने कुछ नहीं कहा।

सोबरा एक हाथ ऊंचा करके होंठों-ही-होंठों में कुछ बड़बड़ाया तो उसी पल चमकता बिंदु वहां नजर आने लगा।

“बोल सोबरा।” महाकाली की आवाज उभरी।

"मैं खुद को भारी उलझन में फंसा महसूस कर रहा हूं।"

"अब क्या हो गया?"

सोबरा ने गरुड़ से वास्ता रखती सारी बात बताई। फिर बोला।

"मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि गरुड़ मेरे साथ कोई खेल खेल रहा है या गरुड़ के साथ तवेरा खेल खेल रही है। या फिर सब ठीक है, मुझे खामखाह ही उलझन हो रही है।"

"ये तेरा मामला है सोबरा।" "लेकिन अब तेरे से भी वास्ता रखता है। क्योंकि जथूरा तेरी कैद

“ये जथूरा का नहीं, गरुड़ से वास्ता रखता मामला है।"

"तू कैसी बातें कर रही है महाकाली।"

"मेरी बातों में बुराई ही क्या है।"

“मैं चाहता हूं तू अपनी शक्तियों को इस्तेमाल करके गरुड़ के मन की बात जाने और मुझे बताए।" ।

“मैं ऐसे छोटे काम नहीं करूंगी।” महाकाली की आवाज आई।

"तुझ पर मेरा एहसान है।”

“उसी की वजह से ही, तेरे कहने पर जथूरा को अपनी कैद में रखा है। वरना ऐसे काम मैं नहीं करती।"

“तू बहुत बदल रही है महाकाली।"

“गलत मत कह। तू अपनी समस्याएं मेरे सामने रख रहा है। जबकि तेरी बातों में मेरी दिलचस्पी नहीं है।"

"मैंने तो सोचा था कि हमारे सम्बंध अच्छे हैं।”

“सम्बंध अच्छे ही हैं, परंतु मैं तेरे जरा-जरा से काम नहीं कर सकती।”

सोबरा ने गहरी सांस ली फिर बोला। “देवा-मिन्नो जथूरा को मार देना चाहते हैं।"

“वो कुछ नहीं कर सकते। जथूरा तक पहुंचने से पहले ही मर जाएंगे। मेरे बिछाए जाल से बचेंगे नहीं।" ___

“लेकिन मुझे कैसे मालूम हो कि गरुड़ मेरे साथ कोई चालाकी नहीं कर रहा।" ___

“ये तेरी समस्या है। तू जान। तेरी बातों में मैं नहीं पड़ना चाहती। तवेरा की तो मुझे ज्यादा परवाह नहीं थी, परंतु अब नीलकंठ भी इस मामले में आ गया है। वो मेरा गुरुभाई है और मिन्नो की खातिर मुझसे झगड़ा करने को तैयार है।"

__ “तू नीलकंठ से डरती है?"

“नहीं। लेकिन समस्या तो खड़ी कर ही सकता है। इस मामले में आकर उसने मेरा काम बढ़ा दिया है।"

"मैंने तो तेरे से गरुड़ की बात करने के लिए बुलाया था।"

"वो मेरा मामला नहीं।"

अगले ही पल वो चमकता बिंदु गायब हो गया।

“महाकाली ने तो स्पष्ट ही मना कर दिया कि वो इस मामले में नहीं आएगी। चाहती तो गरुड़ के मन को टटोल सकती थी।"

“मुझे ही कुछ करना होगा मनीराम।” सोबरा ने कठोर स्वर में कहा।

“आप क्या करेंगे।"

"गरुड़ को कोई ऐसा काम करने को कहूंगा कि काम भी हो जाएगा और उसकी परीक्षा भी हो जाएगी। मुझे उस पर सिर्फ इतना ही शक है कि वो कहीं तवेरा से सच्चा प्यार करने लग गया हो और मुझे धोखा देने पर आ गया हो।" - “तो आप ऐसा क्या काम करने को कहेंगे गरुड़ को?” मनीराम ने पूछा।

"सोचना पड़ेगा। अभी मेरे पास काफी वक्त है। तब तक कोई बात तो मेरे दिमाग में आ जाएगी।" __

“बेहतर होगा कि महाकाली को एक बार फिर अपनी बात के लिए मनाने की चेष्टा करें।"

“एक बार इंकार कर चुकी है तो दोबारा वो नहीं मानेगी। मुझे ही कुछ करना होगा।"

“महल के बाहर चलेंगे आप?" ।

"नहीं।” सोबरा ने इंकार में सिर हिलाया- "मुझे सोचने दो।"

"मेरे मन में अभी आया कि कहीं गरुड़ सच्चा ही न हो। हम यूं ही उसके खिलाफ सोच रहे हों।” मनीराम कह उठा।

“यही तो पता लगाना है।"
 
शाम के चार बज रहे थे। सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम की तरफ सरक रहा था।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा पेड़ की छाया में हरी-भरी घास पर लेटे थे। उनके चेहरों से स्पष्ट जाहिर हो रहा था कि गहरी नींद लेने के पश्चात, वो जागे हैं।

मोमो जिन्न चंद कदमों की दूरी पर टहल रहा था।

“ये साला नींद नहीं लेता।" सपन चड्ढा कह उठा।

"जिन्न को नींद की जरूरत नहीं होती।"

“इसी ने तो कहा था, तूने नहीं सुना क्या।" सपन चड्ढा ने दूर-दूर तक नजर घुमाई। हर तरफ खामोशी ही दिखी।

"क्या खयाल है लक्ष्मण, भाग ले यहां से?"

"ये कमीना मौका नहीं देगा।” लक्ष्मण दास ने मोमो जिन्न को देखा।

"कोई बढ़िया-सा मौका ढूंढ लेते हैं।"

"मेरे खयाल में हमें अलग-अलग दिशाओं में भागना चाहिए। तब ये हम दोनों में से एक को ही पकड़ सकेगा।



"फिर तो हम अलग हो जाएंगे। हमें इकट्ठे ही रहना है।"

"करें तो क्या करें?"

“मुझे भूख लग रही है।"

“मेरा भी यही हाल है। इसे कहेंगे तो बोलेगा, तुम इंसानों की पेट की समस्या...।"

तभी सपन चड्ढा ने ऊंचे स्वर में कहा।

"हमें भख लगी है।" । “तुम इंसानों की यही समस्या है, जब देखो खाने को ढूंढते, रहते हो।"

'साले तेरा भी तो ये ही हाल था, जब तेरे में इंसानी इच्छाएं आ गई थीं।' लक्ष्मण दास बड़बड़ाया।

"हमें भूख लगी है।" सपन चड्ढा ने पुनः कहा।

“यहां फल वाले वृक्ष बहुत हैं। अपना पेट भर सकते हो।” मोमो जिन्न ने कहा।

"हमें फल नहीं चाहिए।"

“परांठे चाहिए। जब से तेरा साथ मिला है, हम परांठे खाने भूल गए हैं।” सपन चड्ढा ने कहा। __

“परांठे बहुत बेकार के होते हैं।"

“तू तो बारह-बारह खा जाता था।"

“खबरदार जो जिन्न से ऐसी बात कही।” मोमो जिन्न तेज स्वर में बोला। ___

“जिन्न परांठे खा सकता है, परंतु परांठे की बात नहीं सुन सकता।"

“चुप रहो। वो मेरा बुरा वक्त था, जब मुझमें इंसानी इच्छाएं आ गई थीं।" ____

“बुरा वक्त तो हमारा था, जो तेरे को खिलाने के लिए, हमें भागदौड़ करनी पड़ रही थी।"

“बस करो। उठो और फल खा लो।” मोमो जिन्न हाथ हिलाकर बोला।

दोनों उठ खड़े हुए।

“तुम्हारा पेट नहीं है कि तुम्हें भूख लगे।” सपन चड्ढा बोला।

"जिन्न को भूख नहीं लगती।" ।

“तुम्हारा वो भी नहीं है कि तुम्हें औरत की जरूरत पड़े। तुमने ही बताया था।"

“नहीं है वो...।"

"तो तुम भागदौड़ क्यों करते हो। तुम्हारी कोई जरूरतें तो हैं नहीं। एक ही कपड़ा तुम पहने रहते हो। आराम किया करो तुम।"

"जिन्न के जीवन का उद्देश्य सेवा करना या कराना होता है।"

“अब तुम क्या कह रहे हो?"

“तुम दोनों से सेवा करा रहा हूं और जथूरा की सेवा कर रहा हूं

“बकवास।" लक्ष्मण दास मुंह बना के बोला।

“मैंने तो सुना है जिन्न खाने-पीने का सामान पलों में हाजिर कर देते हैं।" ____

“वो मेरे जैसे जिन्न नहीं होते। वो बूढ़े और बेकार हो चुके जिन्न होते हैं, जो साधारण इंसानों में अपनी अकड़ दिखाने पहुंच जाते हैं। वो इस तरह दिल लगाकर अपना जीवन बिताते हैं। क्योंकि जिन्न को फुर्सत में बैठना मना है। उसे सिखाया जाता है कि कुछ न कुछ करते रहो। असली जिन्न वो होता है जो न तो खाता है, न खिलाता है।"
 
“मतलब कि तुम चाहो तो हमारे लिए परांठों का इंतजाम कर सकते हो।

"मुझसे आशा मत रखो। मैं वैसा जिन्न नहीं हूं।"

“छोड़ लक्ष्मण ये बेकार का जिन्न है। खुद रबड़ी-जलेबियां खाता है और हमें परांठे खिलाने से भी परहेज करता है।"

"चल फल खाएं।” दोनों पेड़ों को देखते हुए वहां से आगे बढ़ गए। "भागने का मौका देख।" लक्ष्मण दास बोला।

“वो ही देख रहा हूं।"

"दोनों एक ही तरफ भागेंगे। हम दोनों को इकट्ठे रहना है।"

“ये साला जिन्न भागता कैसे है, क्या ये हमें पकड़ लेगा?"

“मैंने इसे भागते हुए नहीं देखा।” लक्ष्मण दास ने कहा-“कहीं ये तेज न दौड़ता हो।”

“एक बार भागकर देखते हैं।"

तभी पीछे से मोमो जिन्न की आवाज आई। "मैं तुम्हारी बातें सुन रहा हूं।"

दोनों पलटे। सपन चड्ढा बोला। “झूठ । इतनी दूर से तुम हमारी बातें कैसे सुन सकते हो।"

“जब तुम लोग नींद में थे तो मैंने तुम दोनों के कानों में सैंसर डाल दिए थे। उससे तम लोगों की बातें सुन रहा हूं।"

दोनों ने अपने कानों में उंगलियां घुमाई।।

“वो सैंसर ऐसे नहीं हैं कि अपने कानों से तुम निकाल सको। तुम जो भी बात करोगे या तुम लोगों के पास कोई दूसरा बात करेगा तो मुझे सब सुनाई देगा। बेशक मैं कितनी भी दूर रहूं।" मोमो जिन्न ने कहा।

____ “कमाल है। जिन्न होकर ये सैंसर का इस्तेमाल करता है। हमारे जमाने में तो जिन्न दूर रहकर यूं ही बात सुन लिया करते थे।"

“अब जमाना बदल गया है। जिन्न वैसे नहीं रहे।"

"ये हमें पागल कर देगा। सपन।"

"कहीं खुद न पागल हो जाए।”

"भागने की कोशिश करना बेकार है। भागे तो तुम्हें पकड़ने के लिए मुझे भागना नहीं पड़ेगा। मेरी छोड़ी शक्तियां तुम लोगों को पलटने पर मजबूर कर देंगी। तुम लोग भाग नहीं सकते।” मोमो जिन्न शांत स्वर में बोला।

"सुना।" "हरामी ने सब इंतजाम कर रखे हैं।"

"हमने इस पर कितने एहसान किए और ये हमारे साथ कैसा व्यवहार कर रहा,,, ।"

“क्या इसमें इंसानी इच्छाएं फिर नहीं आ सकतीं?"

"क्या पता आ जाएं। तब मैं इससे गिन-गिन कर बदले लूंगा।"

"बेकार की बातें मत करो। जाकर फल खा लो।"

“तुम हमें यहां लेकर क्यों बैठे हो?"

"देवा-मिन्नो आने वाले हैं यहां। हमें उनके साथ आगे बढ़ना

“किधर?" ____

“महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी की तरफ। जथूरा के सेवकों ने मुझे आदेश दिया है कि यहां देवा-मिन्नो का इंतजार करूं, वो यहीं से निकलेंगे। समय हो चुका है, वो कभी भी हम तक पहुंच सकते हैं।” मोमो जिन्न ने कहा।

"जल्दी से फल खा ले सपन। कहीं भूखे ही न रह जाएं।"

देवराज चौहान और मोना चौधरी का काफिला घोड़ों पर मध्यम गति से आगे बढ़ रहा था। सबसे आगे रातुला था, जो कि रास्ता बताने के लिए आगे था। धुप में सबके चेहरे तप रहे थे। दोपहर को घंटे-भर के लिए पेड़ों की छांव में आराम करने के लिए रुके थे. उसके बाद वे फिर चल पड़े थे।
 
शाम के पांच बजने जैसा वक्त था।

सूर्य पश्चिम की तरफ सरक चुका था। धूप अब तीखी और सुनहरी हो गई थी।

देवराज चौहान घोड़े को रातुला के करीब ले आया।

"कितना रास्ता है अभी?" देवराज चौहान ने पूछा।

“ज्यादा नहीं बचा रास्ता। रात होने तक हम महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी पर पहुंच जाएंगे।” रातुला ने कहा। ___

“तिलिस्मी पहाड़ी के बारे में कुछ बताओ।"

“मैं ज्यादा नहीं जानता। पहले कभी तिलिस्मी पहाड़ी पर गया नहीं। परंतु वहां खतरे हैं, ये जानता हूं।"

"कैसे खतरे हैं?"

“महाकाली द्वारा बिछा रखे तिलिस्मी खतरे। जिनका खुलासा मैं नहीं जानता। वहां हम सबको बहुत सतर्क रहना होगा। मौत कदम-कदम पर बिछा रखी होगी महाकाली ने। वो कभी नहीं चाहेगी कि तुम जथूरा तक पहुंचो।" ।

"कितनी अजीब बात है मेरे और मोना चौधरी के नाम का उसने तिलिस्म बांधा और वो ही हमें वहां तक पहुंचने से रोक रही है। गलत चाल है महाकाली की। पहले वो आने का बुलावा देती है और खुद ही दरवाजे बंद कर लेती है।"

"वो विद्वान है।"

“परंतु मुझे उसमें चालाकी महसूस होती है।”

"वो जैसी भी है गुणी है।"

“तुम उसकी तारीफ कर रहे हो रातुला।"

“नहीं। मैं तो ये बता रहा हूं कि उसे कम मत आंको। उसकी बुराई भी न करो। उसने कभी कोई गलत काम नहीं किया। वो अपनी शक्तियों के नशे में कभी चूर नहीं हुई। परंतु जथूरा को कैद में रखने का गलत काम जरूर किया है उसने। ये काम भी उसने सोबरा के किसी एहसान तले दबे होने की वजह से किया है।" रातुला शांत स्वर में बोला।

“तुम्हें यकीन है कि उसने इस बात के इंतजाम किए होंगे कि हम जथूरा तक न पहुंचे।" ____

“पक्का यकीन है। महाकाली हार मानने वाली नहीं। वो जथूरा को आजाद नहीं करना चाहती।"

“ये तुम कैसे कह सकते हो?"

"उसने अगर जथूरा को आजाद करना होता तो अब तक कर चुकी होती।” रातुला ने घोड़ा दौड़ाते हुए कहा—“मैं तो वहां नहीं था तब, पता चला कि नीलकंठ मिन्नो की तरफ से इस मामले में आ गया है?"

"हां।"

"नीलकंठ से बात करने महाकाली आई?"

"हां।"

“तब तुमने नीलकंठ और महाकाली की बात से क्या अंदाजा लगाया?" __

“यही कि दोनों में से कोई भी पीछे नहीं हटेगा।” देवराज चौहान ने कहा। ____

“फिर तुम कैसे सोच सकते हो कि महाकाली, जथूरा तक पहुंचने

का रास्ता आसानी से दे देगी।"

देवराज चौहान कुछ न बोला।

“महाकाली जिद्दी है। वो कभी हारी नहीं। जीतना उसकी आदत है।" रातुला ने कहा।

"नीलकंठ महाकाली से नहीं जीत पाएगा?" देवराज चौहान ने रातला पर नजर मारी।

“मुझे नहीं लगता कि नीलकंठ महाकाली को पार कर लेगा।"

“मतलब कि तुम सबको यकीन है कि विजय महाकाली की रहेगी।”

"शायद ऐसा ही है।"

"तो फिर तुम, तवेरा, कमला रानी, मखानी, गरुड़ क्यों साथ चल पड़े?"

"क्योंकि तुम लोग हमारे मेहमान हो। तुम हमारी खातिर मौत के मुंह में जा रहे हो, तो हमारा फर्ज बनता है कि तुम्हारे साथ रहें।"

"बेशक जान चली जाए।"

"कुछ भी समझ लो।” रातुला शांत भाव से मुस्करा पड़ा।

"पोतेबाबा साथ क्यों नहीं आया?"

“नगरी को संभालने वाला भी तो वहां कोई चाहिए। बिना लगाम के नगरी कैसे चलेगी?" रातला बोला__

“अभी रास्ते में हमें मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा मिलेंगे।"

"रास्ते में?"

"हां। वो हमारे आने का इंतजार कर रहे हैं।"

“वो भी हमारे साथ रहेंगे?"

"ऐसा ही हुक्म है पोतेबाबा का।"

“उनकी क्या जरूरत है। हम लोगों की संख्या पहले ही बहुत हो चुकी है।” *

“उनकी जरूरत पड़ेगी, तभी तो पोतेबाबा ने उन्हें साथ रखने का हुक्म दिया है।"

“पोतेबाबा को कैसे पता कि उनकी जरूरत पड़ेगी?” देवराज चौहान ने पूछा। ___

“उसके पास भविष्य में झांकने वाली मशीनें हैं। उनसे पता चलता है उसे कि आगे कैसा वक्त आने वाला है।" ___

"फिर तो उसे ये भी पता चला गया होगा कि हम जिस काम के लिए निकले हैं, उसका अंजाम क्या होगा।"

“ये पता नहीं चल सकता उसे।"

“क्यों?"

"क्योंकि बीच में महाकाली के मायावी रास्ते हैं। तिलिस्मी पहाड़ी है। भविष्य में झांकने वाली मशीनें, तिलिस्मी-मायावी चीजों के बारे में नहीं बता सकतीं। जथूरा के सेवक दिन-रात इसी काम में लगे हुए हैं कि भविष्य में झांकने वाली मशीनों की कमियां दूर करके, उनके द्वारा मायावी चीजों में भी झांका जा सके।” रातुला ने बताया।

"बहुत-अजीब सी है जथूरा की दुनिया।”

“जथूरा ने बहुत मेहनत की अपनी नगरिया बसाने में। वो सच में मेहनती है।"

घोड़ों पर काफिला दौडता जा रहा था।

गरुड़ ने सोबरा से बात करने वाला यंत्र अपने कपड़ों में छिपा रखा था और दोपहर को पड़ाव से चलने के बाद कई बार, यंत्र के बजने की आवाज आई। स्पष्ट था कि सोबरा उससे बात करना चाहता है।

परंतु काफिले के बीच गरुड़ बात नहीं कर सकता था। तभी तवेरा अपना घोड़ा गरुड़ के पास ले आई। गरुड़ उसे देखकर मुस्कराया।
 
“मैं उस वक्त के बारे में सोच रही हूं जब हम ब्याह करके इकट्ठे रहेंगे।” तवेरा ने प्यार से कहा। ।

“ये सुनकर ही मुझे मीठी गुदगुदी होती है। नशा-सा भर आता है दिल-दिमाग में।” गुरुड़ भी मुस्कराया।

“मैं तो यही कामना करती हूं कि देवा-मिन्नो, पिताजी को खत्म कर दें।" ___

"मेरे खयाल में तो जथूरा को इसी तरह कैद में ही रहने देना चाहिए।"

“बात तो तुम्हारी सही है, परंतु देवा-मिन्नो ने पोतेबाबा को दिखाने के लिए भी तो कुछ करना है।"

"बाद में हम पोतेबाबा को काम से हटा देंगे तवेरा।"

"क्यों काम कौन देखेगा?"

"मैं देखूगा।”

“तुम काम देखोगे तो हमें प्यार करने का वक्त ही नहीं मिलेगा। व्यस्त रहोगे तुम। पोतेबाबा को हटाना ठीक नहीं होगा।"

"जैसा तुम ठीक समझो तवेरा।"

"क्या ये ठीक नहीं होगा कि हम दोनों महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी से पहले ही रुक जाएं। बाकी सबको जाने दें।" __

“ये ठीक नहीं होगा। मैंने तुमसे पहले भी कहा है कि दिखावा करना है मुझे कि मैं, पिताजी को कैद से छुड़ाने देवा-मिन्नो के साथ गई हूं। तुम फिक्र मत करो। तुम्हारी जान को कुछ नहीं होगा।" तवेरा बोली।

"मुझे तुम्हारी भी चिंता है।"

“मैं सुरक्षित रहूंगी। वापस महल में जाकर हमें ब्याह करना है गरुड़।"

"तुम कितनी अच्छी हो।”

बांकेलाल राठौर की निगाह कमला रानी पर पड़ी तो कमला रानी को अपनी तरफ देखते पाया।

दोनों की नजरें मिलीं। बांके का हाथ अपनी मूंछ पर पहुंच गया। कमला रानी मुस्करा पड़ी फिर मुंह फेर लिया। “छोरे, आगो दोनों तरफो लगो हो।" बांकेलाल राठौर कह उठा।

"बाप, तेरे बस का कुछ नेई होईला।"

"ईब के हो जायो सबो कुछ छोरे।"

"अपने को क्यों थोखा देईला। तेरे को प्यार-व्यार सूट नेई करेला।"

“अंम थारे को दिखा दयो।" तभी कमला रानी अपना घोड़ा बांकेलाल राठौर के पास ले आई। “छोरे मामलो आगे बढ़ो हो।” पास आकर कमला रानी ने मुस्कराकर बांके को देखा। बांके का हाथ पुनः मूंछ पर पहुंच गया।

"तुम्हारी मूंछे बहुत अच्छी हैं।” कमला रानी ने कहा।

“गुरदासपुरो वाली को भी बोत पसंदो हौवे।"

“गुरदासपुरो वाली?"

“वां पे म्हारे जान रहो हो।"

"कोई लडकी?"

“ईब तो चार को जन दयो हो उसो ने। दूसरो सांग ब्याह कर लयो हो।”

"तम्हारे साथ नेई किया?"

“नेई । उसका बाप राजी न हौवो हो। म्हारे को मनो कर दयो शादी से। पर वो तो म्हारे संग घरों से भागने को तैयार होवो थी, मन्ने ही मनो कर दयो।” बांकेलाल राठौर ने गहरी सांस लेकर कहा।

'इसके बस का कुछ नेई होईला। रुस्तम राव बड़बड़ा उठा।

“तुमने क्यों मना कर दिया। भाग जाते।” कमला रानी ने कहा।

“अंम उसो को लेके भाग जातो तो, उसे के बाप का दिल दुखता। इसो वास्ते अंम नेई भागे।" ।

"और उसका ब्याह किसी और के साथ हो गया?"

“ठीक बोल्लो हो?"

"तुम कैसे मर्द हो।"

"अंम बोत बढ़ियो मर्दो हौवे, तंम देखो नेई म्हारी मर्दानगी।"

“मैंने कहां देखी है।"

“यो म्हारी मूंछे थारे को दिखे न?"

"मूंछों को तुम मर्दानगी कहते हो।"

"अंम गलत बोल्लो का?"

"औरत को मूंछों की मर्दानगी नहीं चाहिए। दूसरी मर्दानगी चाहिए।"

“दूसरो मर्दानगी—वो कैसी हौवे?"

"लगता है तुम औरतों को मूंछों से ही ठंडा करते हो।” कमला रानी ने मुंह बनाया।

"मूंछों में बोत पॉवर होवे।"

“समझ गई।"

"का समझो हो तंम।”

“उसके बाप ने अपनी बेटी की शादी तुम्हारे साथ क्यों नहीं की।” कमला रानी ने कहा।

“काये को नेई की?"

“तुम्हारी मूंछों की वजह से। मूंछ कटवाई होती तो वो चार बच्चे तुम्हारे पैदा किए होते।”

“थारा मतलब यो मूंछ म्हारी जिंदगी का विलेन हौवे?"

"तंम को मूंछों की वैल्यो न पतो हौवे। मर्द वो ही, जिसो की म्हारे जैसो मूंछ हौवे।"

'की बात ही करेला। रुस्तम राव बड़बड़ा उठा—'आगे-पीछे की बात न करेला। पैंचर होईला इसका।'

तभी मखानी अपने घोड़े को कमला रानी के पास ले आया। मखानी के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे।

“तू इसके साथ बातें क्यों कर रही है?” मखानी ने उखड़े स्वर में कहा। ___ “इसकी मूंछ मुझे अच्छी लगी तो बात करने चली आई।” कमला रानी ने कहा।

मखानी ने बांकेलाल राठौर को देखा।

"हां"

बांके का हाथ मूंछ पर पहुंच गया।

"मुझे अच्छा नहीं लगता कि तुम इससे बातें करो।” मखानी बोला।

"जलता है।"

“हां, यही समझ ले।” कमला रानी हंस पड़ी।

"मों में ये ही बात तो बुरी है। खुद कहीं भी मुंह मारे, औरत को छिपाकर रखते हैं।”

"तु उससे बात मत कर।"

“मैं कुछ भी करूं, मेरी मर्जी ।” कमला रानी ने मुंह बनाकर कहा।

“यो तंम ठीको कहो हो।” बांकेलाल राठौर कह उठा।।

"भाड़ में जा साले मुच्छड़।” मखानी ने कहा और घोड़ा आगे बढ़ा ले गया।

कमला रानी भी घोड़ा आगे बढ़ाकर मखानी के पास जा पहुंची।

“तम देखो हो छोरे।” बांके ने रुस्तम से कहा—“म्हारी मूछों की पॉवरो।”

“बाप तुम्हारी मूंछों की पॉवरो में कुछ नहीं रखेला।"

"का मतलबो थारा?"

“उधर, मखानी की पूंछ में पॉवर होईला।” रुस्तम राव ने मुंह बनाकर कहा।

बांकेलाल राठौर ने साथ-साथ घोड़े दौड़ाते कमला रानी और मखानी को देखा।

“अंम नेई समझो थारी बात।"

"तेरी मूंछों में पॉवर होईला तो, कमला रानी तेरे साथ होईला बाप। पर कमला रानी को मखानी की पूंछ में पॉवर दिखेला, तम्भी तो वो मखानी के बगल में घोड़ा दौड़ाईला।”

बांकेलाल राठौर ने कुछ नहीं कहा।

“वो तेरे पास आईला । तेरे से बात करेला और उसे अपनी मूंछे दिखाईला। तभ्भी तो वो तेरे पास नेई रुकेला बाप ।"

"तो छोरे अंम का दिखावो उसो को।"

“पूंछ।”

"वो तो म्हारे पास न होवे।

"बाप तू ओल्ड मॉडल ही रहेला। तेरी मूंछ ने तेरे को पैंचर रखेला अभ्भी तक।"

L

रातुला के कहने पर सबने घोड़ों की रफ्तार धीमी कर दी।

"यहां कहीं हमें मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा मिलेंगे।” रातुला ने ऊंचे स्वर में कहा।

मध्यम गति से घोड़े दौड़ाते सबकी नजरें दूर-दूर तक जाने लगीं।

"तवेरा।” गरुड़ पास आकर धीमे स्वर में बोला—“मोमो जिन्न की क्या जरूरत थी?"

“ये पोतेबाबा का फैसला है।" तवेरा ने कुछ नहीं कहा। फिर कुछ आगे जाने पर मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा उन्हें मिल गए। सब उनके पास पहुंचकर रुक गए।

मोमो जिन्न ने मुस्कराकर सबका स्वागत किया और तवेरा के पास पहुंचा। __ “जथूरा की बेटी तवेरा के सामने मोमो जिन्न सिर झुकाता है।" मोमो जिन्न बोला। ___

“खुश हो?” तवेरा ने पूछा।

“जथूरा की सेवा में रहकर कोई भी दुखी नहीं रह सकता।” मोमो जिन्न ने आभार-भरे स्वर में कहा।

उसके बाद मोमो जिन्न रातुला के पास पहुंचा।

"मेरे लिए क्या हुक्म है?" मोमो जिन्न ने पूछा।

"तुम्हें हमारे साथ महाकाली की पहाड़ी पर जाना है।" रातुला बोला।

"ये हुक्म मुझे मिल चुका है। कोई नया हुक्म नहीं है?"

“नहीं। नए हुक्म तुम्हें जथूरा के सेवक कंट्रोल रूम से ही देंगे।"
 
"ठीक है। हम चलने को तैयार हैं।” मोमो जिन्न बोला।

लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा की निगाह मखानी, कमला रानी पर पड़ी तो दोनों हड़बड़ा उठे। कमला रानी और मखानी क्रोध-भरी नजरों से दोनों को देख रहे थे।

“वो दोनों हमें घूर रहे हैं।" सपन चड्ढा कह उठा। __

"हमने उन्हें जान से मार दिया था। ये हमें नहीं छोड़ेंगे।"

"इनसे बचककर रहना।"

"वो देख मखानी हमारे पास आ रहा है।" मखानी घोड़े को धीमे से आगे बढ़ाता उनके पास आ पहुंचा।

“तुम दोनों ने मुझे और कमला रानी को जान से मार दिया था।”

"मोमो जिन्न।” लक्ष्मण दास घबराकर ऊंचे स्वर में बोला—“ये हमें मार रहा है।"

तभी रातुला ऊंचे स्वर में कह उठा।

“मखानी। दूर हो जाओ इनसे। इन्होंने जो किया पोतेबाबा के इशारे पर किया था।"

"इन्होंने हमें मारा।" मखानी तेज स्वर में बोला।

“पोतेबाबा का ऐसा ही हुक्म था।” तभी शौहरी की आवाज मखानी के कानों में पड़ी।

“तू झगड़ने से बाज आ जा। मत भूल तू कालचक्र का अंश

1

___ “इन्होंने हमें मारा।"

"ऐसा ही होना था तब। वो सब कुछ तो पोतेबाबा की चाल का हिस्सा था। देवा-मिन्नो को जथरा की जमीन पर लाने के लिए।"

मखानी के होंठ भिंचे रहे।

"इन्हें कुछ मत कहना। कालचक्र का ये ही हुक्म है।" मखानी ने उखड़े अंदाज से अपना घोड़ा पीछे ले लिया।

“बच गए सपन।”

"जब तक ये साथ रहेंगे। डर लगा रहेगा कि ये हम पर हमला न कर दें।"

"हम सतर्क रहेंगे।" तभी गरुड़ घोड़े से उतरता कह उठा।

"मैं पेड़ की ओट में होकर आता हूं।" इसके साथ ही वो दूर होता चला गया।

तवेरा गरुड़ को जाते देखती रही। गरुड़ एक पेड़ की ओट में होकर, उसकी नजरों से छिप गया।

गरुड़ ने फुर्ती से अपने कपड़ों में छिपा यंत्र निकाला और उसके द्वारा सोबरा से बात की।

“क्या बात है, तुम यंत्र पर मुझसे बात करना चाहते हो?" गरुड़ ने कहा। __

“हां। मैं कब से बात करने की कोशिश कर रहा था।"

"तब मैं उन लोगों के साथ था। जल्दी कहो। मेरे पास वक्त कम है।"

“मैंने योजना बदल दी है।"

"क्या मतलब?"

“तुम्हें तवेरा की जान लेनी होगी।"

गरुड़ हैरानी से उछल पड़ा।

"क्या कह रहे हो?" उसके होंठों से निकला।

"ये मेरी नई योजना है।”

“परंतु तवेरा मेरे से ब्याह करने को तैयार है। वो...।"

“योजना बदल दी गई है। अब तुम्हें नई योजना पर काम करना है गरुड़। तवेरा को मार दो।"

“मुझे बताओ, तुम्हारी योजना क्या है?"

“तवेरा की जान लो। उसके बाद तुम्हें नई योजना भी बता दूंगा।" यंत्र से सोबरा की पतली-सी आवाज निकल रही थी।

गरुड़ के चेहरे पर परेशानी-ही-परेशानी नाच रही थी।

"मेरे खयाल में सोबरा ये ठीक नहीं हो रहा।” गरुड़ बोला।

“क्या तुम्हें तवेरा की जान लेने से इंकार है?"

“न...नहीं। अचानक ही तुम्हारे मुंह से तवेरा को मारने के बारे में सुना तो हैरान रह गया।"

“तवेरा की जान लेकर मुझे बताओ।" इसके साथ ही बातचीत समाप्त हो गई।

गरुड़ ने यंत्र को कपड़ों में छिपाया और पेड़ के पीछे से बाहर आकर आगे बढ़ गया।

वापस आने पर तवेरा ने उसके चेहरे पर चिंता देखी तो वो कह उठी।

“पेड़ के पीछे क्या था?"

"कुछ भी नहीं।" गरुड़ ने उसे देखकर मुस्कराने की चेष्टा की।

“जब तुम पेड़ के पीछे गए थे तो सामान्य थे, वापस आए तो चिंतित लग रहे हो।”

"यूं ही। घोड़ों की सवारी करने पर, पेट में कुछ दर्द-सा होने लगा है।

तवेरा मुस्कराई । गरुड़ को देखती रही।

"चला जाए अब।” मोना चौधरी ऊंचे स्वर में कह उठी। परंतु लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा के पास घोड़े नहीं थे।

"तुम सब जाओ।" मोमो जिन्न बोला—“हम सब तुम लोगों के पीछे-पीछे महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी पर पहुंच रहे हैं।"

काफिला पुनः आगे बढ़ गया। __ मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा के साथ पैदल ही आगे बढ़ने लगा।

"तुम कैसे जिन्न हो।” सपन चड्ढा बोला।

"क्यों, मुझे क्या हुआ है?”

"हमने तो जो जिन्न देखे है वो उड़कर, लोगों को साथ लेकर, फौरन मनचाही जगह पर पहुंच जाते हैं।"

“कहां देखे हैं तुमने ऐसे जिन्न?"

"फिल्मों में।”

“वो नकली हैं। असली जिन्न ये काम तभी करता है, जब उसे ऐसा करने का हुक्म मिलता है।"

“तुम्हें कौन हुक्म देगा?"

“जथूरा के सेवक।"

"तो वो हुक्म क्यों नहीं दे रहे?"

"इस बात की जरूरत न समझी जा रही होगी। चुपचाप पैदल चलते रहो मेरे साथ ।”

'ये साला तो हमारी जान ले के ही रहेगा। लक्ष्मण दास बड़बड़ा उठा।

"जिन्न को गाली देते हो।" मोमो जिन्न ने कठोर स्वर में कहा—“तमीज से पेश आओ। मुझे बदतमीजी जरा भी पसंद नहीं।"

दिन-भर दौड़ते रहने के बाद घोड़ागाड़ी की रफ्तार कम होने लगी थी। सूर्य पश्चिम की तरफ झुकना आरम्भ हो गया था। धूप

और भी तीखी होने लगी थी।

“अभी कितना सफर बाकी है?" जगमोहन ने पूछा।

“दिन के खत्म होते-होते हमारा सफर पूरा हो जाएगा।” खोतड़ा ने कहा।

“तुम्हारे यहां कुछ खिलाने का रिवाज नहीं है?"

"भूख लगी है?"

“तुम्हें खुद ही ये बात सोचनी चाहिए। जब से हम निकले हैं, कुछ भी खाया नहीं।"
 
“ठीक है। मैं अभी तुम्हारे खाने का इंतजाम कर देता हूं।" कहने के साथ ही खोतड़ा ने जेब से यंत्र निकाला और बटन दबाकर बात की तो दूसरी तरफ यंत्र से औरत की महीन आवाज सुनाई दी।

"क्या बात है खोतड़ा?"

"मेहमानों को भूख लगी है। वे कुछ खाना चाहते हैं।" खोतड़ा ने यंत्र में कहा। ____

“समझ गई।” औरत की आवाज यंत्र से निकली—“तुम लोग आगे आओ, कुछ ही देर में मैं खाने के साथ मिल जाऊंगी।"

“मैं इस वक्त हरे आम के बाग के पास से निकल रहा हूं।"

“यंत्र से मैं तुम्हारी स्थिति पहले ही जान चुकी हूं।"

"ठीक है।” खोतड़ा ने कहा और यंत्र बंद करके अपने कपड़ों में रख लिया। __

“ये क्या है, जिससे तुम बात करते हो।”

"ये बातचीत का यंत्र है। सोबरा ने इन्हें बनाया है और ढेर सारे यंत्र महाकाली को उपहार में दिए हैं।"

“यंत्र से, यंत्र के साथ बातचीत कैसे होती है?"

"सोबरा ने एक मशीन आसमान में छोड़ रखी है। उसी मशीन से इन यंत्रों को संकेत मिलते हैं और बात होती है।" ___

“कब से ये यंत्र काम कर रहे हैं?"

"सौ साल से ज्यादा हो गए।"

“जथूरा व सोबरा ने बहुत तरक्की कर रखी है।” जगमोहन ने गहरी सांस लेकर कहा और सोहनलाल को देखा।

सोहनलाल ने नानिया का हाथ पकड़ रखा था। चेहरों पर सफर की थकान थी।

“भूख लग रही है।" नानिया बोली।

“खोतड़ा ने खाने का इंतजाम कर दिया है। कुछ ही देर में हमें भोजन मिल जाएगा।"

नानिया ने सोहनलाल से कहा।

“मैं तो उस वक्त का बेसब्री से इंतजार कर रही हूं जब हम तुम्हारी दुनिया में पहुंचेंगे सोहनलाल ।”

“क्या पता वो वक्त आए ही नहीं।"

"क्यों?"

"महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी पर हम बच ही नहीं सके।" सोहनलाल ने कहा।

"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वहां पर तुम जाओ ही नहीं।"

“ऐसा नहीं हो सकता। मुझे वहां जाना ही है।”

“वहां हमारे कई लोग खतरे में पड़ने वाले हैं।” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा।

“तो उनके लिए हम क्या कर सकते हैं। हमारे पास कोई विद्या तो है नहीं।"

"मुसीबत के उस वक्त में उनके साथ रहना है।"

“ये भला क्या बात हुई?"

“तुम मुसीबत में पड़ जाओ और मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊं तो तुम्हें कैसा लगेगा?"

-

"मुझे भी बुरा लगेगा। वो सब मेरी पुरानी पहचान के हैं। ये जानकर कि वो खतरे में कूदने जा रहे हैं। मैं चैन से नहीं बैठ सकता। अगर उन्हें बचा नहीं सकता तो बचाने का ढोंग तो कर सकता हूं।"

“ये क्या बात हुई।" सोहनलाल का चेहरा गम्भीर रहा। बोला कुछ नहीं। जगमोहन ने गहरी सांस लेकर मुंह फेर लिया। तभी घोड़ागाड़ी दौड़ाता खोतड़ा कह उठा।

“तुम लोगों को मायूस नहीं होना चाहिए। तुम लोग अपने साथ-साथ दूसरों को भी बचा सकते हो।"

"कैसे?" नानिया बोली।

“तुम लोग पीछे की तरफ से तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश कर रहे हो। वहां से प्रवेश द्वार तक पहुंचने में तम लोगों को कोई रुकावट नहीं आएगी। बेखौफ आगे बढ़ सकते हो। रुकावटें तो उनके लिए हैं, जो प्रवेश द्वार से भीतर आकर, आगे बढ़ना चाहेंगे। तुम लोग देवा-मिन्नो को समझाकर, उन्हें वापस लेते हुए बाहर निकल जाओ। बच जाओगे।"

“महाकाली जथूरा को आजाद क्यों नहीं कर देती।"

"इसका जवाब मेरे पास नहीं है।"

"तुम सिर्फ दूसरों को शिक्षा देने के लिए हो। देवा-मिन्नो जथूरा को आजाद कराने आ रहे हैं।"

“महाकाली ऐसा नहीं होने देगी।” खोतड़ा ने कहा।

“मतलब कि देवराज चौहान-मोना चौधरी महाकाली की बात माने। महाकाली उनकी बात नहीं मानेगी।” । ___

“तुम महाकाली को क्या समझते हो। वो बहुत ऊंचे ओहदे पर है जग्ग।"

“परंतु वो जथूरा को कैद करने का मामूली काम कर रही है।"

"अवश्य महाकाली के सामने, ऐसा करने की वजह होगी।”

"सोबरा के एहसान तले दबकर वो ये काम कर रही है।" जगमोहन बोला।

“मैं नहीं मानता।" खोतड़ा ने इंकार में सिर हिलाया।

“क्या नहीं मानते?"

“सोबरा के एहसान में दबकर, महाकाली जथूरा को कैद में रखने वाली नहीं । महाकाली आजाद है।" खोतड़ा बोला।

"तो?"

"कोई और ही बात है, जिसकी वजह से महाकाली ने जथूरा को कैद में रखा हुआ है।" ___

“और क्या बात होगी?" ___

"मुझे पता होता तो तब भी न बताता। जो बात महाकाली ने तुम्हें नहीं कही, वो मैं कैसे कह सकता हूं।” खोतड़ा का स्वर गम्भीर था—“लो, हमारा पड़ाव आ गया। यहां खाने-पीने-नहाने को सब कुछ मिलेगा।"

तीनों की निगाह सामने की तरफ उठी। जंगल के बीचोबीच एक खूबसूरत मकान बना उन्हें दिखा।

मकान के प्रवेश दरवाजे पर बूढ़ी औरत स्वागत के लिए खड़ी थी। उनके करीब आने पर वो मुस्कराई और पीछे हटती हुई कह उठी।

"मेरे मकान में जग्गू, गुलचंद और नानिया का स्वागत है।”

“मेरा स्वागत नहीं करोगी?" खोतड़ा मुस्कराया।

"तुम्हारा तो पहले करूंगी, क्योंकि मेहमानों को तुम ही मेरे दरवाजे पर लाए हो।" वो मुस्कराई।

वो सब मकान के भीतर पहुंच गए। मकान को खूबसूरती से सजाया गया था।

"तुम यहीं रहती हो?" नानिया ने पूछा।

“हां, ये मकान ही मेरा सब कुछ है।” वो बोली।

“सुनसान जगह पर तुम कैसे रह लेती हो मौसी?" नानिया ने उसे देखा। ___

मैं सुनसान जगह पर नहीं, इस मकान में रहती हूं।” वो बोली।

“ये क्या मतलब हुआ?”

“पहले नहा-धो लो। खाना खा लो। क्या तुम लोग रात को भी यहीं रुकोगे?"

नानिया ने खोतड़ा को देखा।

खोतड़ा कह उठा।

“नहीं। हमारे पास वक्त कम है। हमें तुरंत महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के पीछे वाले द्वार पर पहुंचना है।"

“समझ गई। सब समझ गई।" फिर वो तीनों से बोली-“तुम तीनों नहाकर खाना खा लो। पीछे बाथरूम है। सबके लिए अलग-अलग नहाने की जगह है। चलो मैं दिखा देती हूं।"

वो तीनों को मकान के पीछे कहीं छोड़कर आ गई।

"क्यों खोतड़ा।” उसने आते ही कहा—“तिलिस्मी पहाड़ी के पीछे वाले रास्ते से इन्हें भीतर प्रवेश करना है?"

“हां।”

"ऐसा क्यों?"

"देवा-मिन्नो के बारे में तो तुमने सुना ही होगा।”

"हां। वो जथूरा को कैद से आजाद कराने के लिए तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश करने वाले हैं।"

“ये तीनों देवा-मिन्नो के साथी हैं और सोबरा चाहता है कि ये तिलिस्मी पहाड़ी में प्रवेश करके देवा-मिन्नो को समझाएं और उन्हें वापस जाने को तैयार कर लें।"

“ये तीनों इस काम के लिए राजी हैं?"

“अभी इनके मन की बात नहीं पता।"

“आज तक तिलिस्मी पहाड़ी में जिसने प्रवेश किया, वो बाहर नहीं आ सका खोतड़ा।"

“महाकाली ने जथूरा की कैद के लिए सब इंतजाम कर रखे हैं।"

“वो नहाकर आने वाले होंगे। तुम खाना लगा दो।” खोतड़ा ने कहा।

बढी औरत कमरे की खाली जगह को देखकर कछ बडबडाई तो उसी पल वहां टेबल और कुर्सी नजर आने लगी। चंद पल बीते कि वहां बर्तनों में तरह-तरह के व्यंजनों का ढेर लग गया। वातावरण खुशबू से महक उठा।

खोतडा मस्करा पड़ा।

बूढी औरत ने खोतडा से कहा। "मैं अपनी बेटी की शादी करने की सोच रही हूं। तुझ जैसा कोई मर्द ढूंढ़ रही हूं।" ___

“हां, मैंने देखा था, दया अब जवान हो गई है।” खोतड़ा ने कहा।

“तू करेगा उससे ब्याह?" ।

"मेरे पास काम बहुत होते हैं। उसे वक्त नहीं दे पाऊंगा। किसी और से कर दे उसका ब्याह।" __

“पहले भी तूने यही कहकर मुझे टाल दिया था। दया बहुत अच्छी लड़की है।”

"मैं सोचकर बताऊंगा।”
 
“आना कभी, दया से मिलना। बात करना। तेरा मन बदल जाएगा।"

कुछ देर बाद तीनों नहा-धोकर वहां आ पहुंचे।

टेबल पर लगे खाने को देखकर उनकी भूख और बढ़ गई। तीनों कुर्सियों पर बैठे और खाने में व्यस्त हो गए।

"तू नहीं खाएगा खोतड़ा?" बूढ़ी औरत ने पूछा।

"मैं दया के हाथ का खाना खाने आऊंगा।"

“कह दूंगी दया से।” बुढ़िया मुस्कराई—“वो खुश होगी सुनकर।"

खाना खाने के बाद सोहनलाल ने बुढ़िया से कहा। “तुम खाना बहुत अच्छा बनाती हो।"

“महाकाली का आशीर्वाद है, वरना मैं तो कुछ भी नहीं।” बुढ़िया ने कहा।

“मौसी, मैं तुमसे खाना बनाना सीलूंगी।" नानिया ने कहा।

“सोहनलाल को खुश रखना चाहती हो, बढ़िया खाना बनाकर।"

"तुम्हें कैसे पता कि मैं ये सोच रही थी।"

“सब महाकाली का आशीर्वाद है, वरना मैं तो कुछ भी नहीं।"

“तुम मुझे खाना बनाना सिखाओगी?"

“जरूर । परंतु उसके लिए जरूरी है कि तुम जिंदा लौट आओ तिलिस्मी पहाड़ी से।"

"तुम्हें लगता है कि हम नहीं लौट पाएंगे?" जगमोहन बोला।

“आज तक जो भीतर गया, वो वापस नहीं लौट सका। तुम तीनों बचे रहना चाहते हो तो देवा-मिन्नो को समझाकर बाहर ले जाना। तभी तुम सब बच सकते हो। बुढ़िया ने कहा।

जगमोहन ने गहरी सांस ली। तभी खोतड़ा तीनों से बोला।

“अब हमें चलना चाहिए।" बुढ़िया खोतड़ा से कह उठी।

“दया के हाथ का खाना खाना भूल मत जाना।"

"नहीं भूलूंगा । मैं तुम्हें यंत्र पर खबर दे दूंगा कि कब आऊंगा मैं।"

“जल्दी आना दया तेरे को पसंद करती है।"

खोतड़ा ने सिर हिलाया और तीनों को लेकर मकान से बाहर निकला।

“याद रखना।” बुढ़िया उन तीनों से कह उठी—“मौत से बचना चाहते हो तो देवा-मिन्नो को तिलिस्मी पहाड़ी से बाहर ले जाना।"

खोतड़ा ने घोडागाड़ी आगे बढ़ा दी।

"कह तो ऐसे रही है जैसे हमारी सगी हो। हमारी चिंता करती हो।"

"वो सबकी ही चिंता करती है।” खोतड़ा बोला।

"है कौन—वो?"

“महाकाली की सेविका।"

नानिया ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा तो चौंक पड़ी। पीछे कोई मकान न दिखा।

“मकान कहां गया?" नानिया के होंठों से निकला—“अभी तो । था पीछे।”

“वो चली गई।” खोतड़ा ने बग्गी दौड़ाते कहा।

"कहां?"

"अपने रास्ते। वो मायावी मकान था। वहां की सब चीजें मायावी थीं। ये सारा इंतजाम तुम लोगों को खाना खिलाने के लिए किया गया था। उसके बाद वो मकान को अपनी मुट्ठी में बंद करके वापस चली गई।"

"अजीब बात है।” सोहनलाल ने कहा।

“ऐसी मायावी चीजों से हमारा वास्ता तब भी पड़ चुका है, जब हम पहले पूर्वजन्म में प्रवेश करते रहे हैं।” जगमोहन ने कहा

"ये सब नया नहीं है हमारे लिए। विद्या से ऐसी ताकतें हासिल की जा सकती हैं।" __

“मैंने मायावी चीजो के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है।” नानिया ने कहा।

जगमोहन खोतड़ा से बोला।

"देवा-मिन्नो कहां पर होंगे? कुछ पता है तुम्हें?"

"वो शाम ढलने तक, तिलिस्मी पहाड़ी के पास पहुंच जाएंगे।" खोतड़ा ने बताया।

“और हम?"

"हम भी शाम ढलने पर तिलिस्मी पहाड़ी के पीछे पहुंच जाएंगे।"

“आगे और पीछे में फासला कितना है?" जगमोहन ने सोच-भरे स्वर में पूछा।

“मीलों लम्बा। एक सिरा उत्तर में है तो दूसरा दक्षिण में ।"

"तो क्या तिलिस्मी पहाड़ी मीलों लम्बी है?"

"हां"

खोतड़ा तेजी से बग्गी दौड़ाए जा रहा था।

"जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिली।

"मुसीबत ही मुसीबत है हर तरफ।” सोहनलाल बोला।

“पूर्वजन्म में प्रवेश कर आने का मतलब ही खतरा और अजीबोगरीब हादसों में फंसना है।" ।

"तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर क्या होगा?" नानिया ने पूछा।

"तिलिस्म में लिपटे अजीबोगरीब खतरे। जान आफत में।" घोड़ा गाड़ी तेजी से दौड़ी जा रही थी।

घोड़ों पर सवार उन सबका काफिला आगे बढ़ता जा रहा था। रफ्तार मध्यम थी।

सबसे आगे रातुला था। अब कभी बंजर जमीन आ जाती तो कभी पेड़ों जैसी जगह।

सूर्य पश्चिम में छिप चुका था। शाम का ठंडा मौसम महसूस हो रहा था। तवेरा ने गरुड़ को देखा और कह उठी। "क्या बात है गरुड़? तुम चुप-चुप से हो।"

“न... नहीं। ऐसा तो कुछ नहीं।"

"कुछ तो है। जब पड़ाव में तुम पेड़ के पीछे गए और फिर बाहर आए तो तुम परेशान थे। वो ही परेशानी अब भी है।"

गरुड़ ने तवेरा को देखा। कहा कुछ नहीं। तवेरा अपना घोड़ा गरुड़ के पास ले आई।

“गरुड़।”

“हां।"

"मैं तुम्हें परख रही हूं कि तुम अपनी दिल की बात मुझे बताते हो या नहीं। अपना जीवन साथी मैं उसी को बनाऊंगी जो मेरे सामने खुली किताब की तरह हो। मुझे वो लोग पसंद नहीं जो मन में कुछ और होंठों पर कुछ रखें।”

गरुड़ चुप रहा।

“क्या तुम मेरे से ब्याह नहीं करना चाहते?" तवेरा ने पुनः कहा।

"करना चाहता हूं। मैं सच में तुम्हें प्यार करने लगा हूं।"

"तो मुझे बताओ कि तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?" तवेरा ने पूछा।

गरुड़ के होंठ भिंच गए। “मैं बहुत परेशान हूं।"

"जानती हूं।"

"मैं तुमसे प्यार करता हूं तवेरा।"

“साबित करके दिखाओ। अभी तक तुमने ऐसी कोई बात नहीं की कि मुझे लगे कि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो।"

“तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं?

“भरोसे वाली बात करो तो भरोसा होगा।"

"मैं तुमसे सच्चा प्यार करने लगा हूं।"

“मैंने तुम्हें अपने मन की बात बताई कि मैं पिता की आजादी नहीं चाहती। देवा-मिन्नो पिताजी को मार देंगे। परंतु तुम अपने मन की बात बताने में क्यों हिचक रहे हो। बताओ तुम्हें किस बात की चिंता है।"

गरुड़ कुछ देर खामोश रहा फिर धीमे स्वर में बोला। “तुम थोड़ा पीछे हट जाओ इनसे । मैंने तुम्हें कुछ बताना है।" तवेरा ने अपना घोड़ा धीमा करना शुरू कर दिया।

मखानी रह-रहकर तवेरा और गरुड को ही देख रहा था और सोच रहा था कि गरुड़ की किस्मत कितनी अच्छी है, जो इसे तवेरा जैसी युवती मिली।

तभी उसने तवेरा को घोड़ा धीमा करते देखा। गरुड़ का घोड़ा भी धीमा हो रहा था। 'ये दोनों कोई गड़बड़ तो नहीं करना चाहते अकेले में।' मखानी बड़बड़ा उठा।

मखानी ने कमला रानी को देखा। कमला रानी का ध्यान दूसरी तरफ था। “मखानी।” तभी शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।

"शौहरी।” मखानी बड़बड़ाया।

"क्या बात है तू तवेरा और गरुड़ को ही देखे जा रहा है।”

“तुझे क्यों जलन होती है।" मखानी ने मुंह बनाया।

“मुझे संकेत मिल रहे हैं कि कुछ गलत होने वाला है तवेरा के साथ।

"क्या गलत?"
 
“ये तो मैं नहीं जानता।"

"तवेरा और गरुड़ के घोड़े सबसे पीछे हो गए हैं।" मखानी के होंठों से निकला।

"मेरी ताकतें मुझे संकेत दे रही हैं कि गरुड़ कुछ गलत करने वाला है।"

"तो मैं क्या करूं?" ___

"तू भी पीछे हो जा। उन पर नजर रख। उनके पास रहने की कोशिश कर । गलत होने लगे तो उसे रोक।"

"ठीक है।"

मखानी ने अपने घोड़े की रफ्तार कम कर दी। काफिले में वो थोड़ा पीछे होने लगा।

तवेरा और गरुड़ के घोड़े काफिले में सबसे पीछे आ गए। तवेरा अपने घोड़े को गरुड़ के घोड़े के पास ले आई। उनके आगे सब घोड़े मध्यम रफ्तार में दौड़े जा रहे थे।

“बता गरुड़, क्या कहना चाहता है?" तवेरा बोली।

“तवेरा।” गरुड़ गम्भीर था—“कभी-कभी ऐसे काम भी करने पड़ते हैं, जिन्हें करने को मन नहीं चाहता।"

"तो?

“मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं तुम्हारी जान ले लूंगा तो?"

"तो मैं कहूंगी, मजाक मत करो।” तवेरा मुस्करा पड़ी।

“परंतु ये सच है।” तवेरा ने गरुड़ पर निगाह मारी। गरुड़ ने अपने जूते में फंसी जहरीली सुई निकाली। “मुझे आदेश मिला है कि मैं तुम्हारी जान ले लूं।"

“सोबरा ने आदेश दिया?" तवेरा शांत स्वर में कह उठी।

"ओह ।” गरुड़ चौंका—“तुम जानती हो?"

"मैं सब कुछ जानती हूं कि तुम यहां की खबरें सोबरा को देते रहते हो।"

"किससे जाना?” गरुड़ पर आश्चर्य दिखा।

"ये मत पूछो।” तवेरा सतर्क थी—“तुम ऐसा क्यों कर रहे हो गरुड़?"

“क्योंकि सोबरा मुझे अपनी हर चीज का मालिक बनाएगा।"

"उसने कहा और तुमने मान लिया।”

"मुझे बातों के जाल में मत उलझाओ।” गरुड़ के हाथ में अभी भी जहरीली सुई थिरक रही थी।

“सोबरा मुझे क्यों मारना चाहता है?"

"ये उसने नहीं बताया, परंतु बताएगा।"

"तो अब तुम मुझे मारने वाले हो।"

"हां—मैं..."

“मुझे मारकर तुम कैसे बच जाओगे गरुड़। यहां और लोग भी तो हैं।"

"किसी को नहीं पता चलेगा कि तुम कैसे मरी। जहरीली सुई पलों में तुम्हारी जान ले लेगी। फिर...।"

तवेरा को मुस्कराते पाकर, गरुड़ ठिठका और माथे पर बल डालकर बोला।

“तुम्हें मौत का डर नहीं, जो मुस्करा रही हो।"

“मैंने अपने मंत्र की शक्तियों से सुई के जहर को अपने लिए पानी बना दिया है।"

- “नहीं।” गरुड़ चौंका। _

“अब तुम मुझे नहीं मार सकते।” तवेरा कठोर स्वर में बोली—“बल्कि तुम मरने वाले हो अब।"

गरुड़ का चेहरा खतरनाक भावों से भर उठा। "मैं नहीं मर...।"

तब तक पास आ चुके मखानी ने अपना घोड़ा छोड़ते हुए गरुड़ के घोड़े पर छलांग लगा दी।

मखानी ने सब बातें सुन ली थीं। गरुड़ को मखानी की हरकत का आभास न हुआ।

परंतु तवेरा ने मखानी की पास आने की हरकत महसूस कर ली थी। ___

मखानी ने गरुड़ का वो हाथ पकड़ा, जिसमें जहर वाली सुई थी

और उसके हाथ में दबी सई को गरुड़ की टांग की तरफ मोड़ दिया। सई गरुड़ की टांग में धंस गई।

गरुड की आंखें भय से फैल गईं। उसने मखानी को देखा फिर तवेरा को। तवेरा के चेहरे पर जहर-भरी मुस्कान थिरक रही थी।

“शाबाश मखानी।" शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी—“तूने तो कमाल कर दिया।"

"मैं पहले भी कई बार कमाल कर चुका हूं-भूल गया तू।”

इसी पल गरुड़ के शरीर को झटका लगा और वो घोड़े से नीचे जा गिरा।

काफिला फौरन रुक गया।

मखानी पीछे रह चुके अपने घोड़े के पास पहुंचा और उछलकर उसकी पीठ पर जा बैठा।

तभी कमला रानी घोड़े पर उसके पास पहुंची। "तू ठीक तो है मखानी?"

"बिल्कुल ठीक हूं।"

“क्या हुआ?"

“गरुड़, जहर वाली सुई से तवेरा की जान लेना चाहता था। मैंने वो ही सुई उसकी टांग में लगा दी।"

“अच्छा किया।" दोनों काफिले के पास आ गए।

रातुला तुरंत तवेरा के पास आ पहुंचा।

“गरुड़ को क्या हुआ तवेरा?"

“मुझे मारना चाहता था, परंतु मखानी ने इसे मार दिया।” तवेरा बोली।

“ऐसा क्यों करना चाहता था गरुड़?"

“सोबरा ने इसे ऐसा करने को कहा था।” तवेरा बोली- "मुझे मारने से पहले गरुड़ ने ये बात मुझे इसलिए बता दी कि वो मुझ पर जहरीली सुई को फेंकने जा रहा था। जिससे मैं फौरन मर जाती। परंतु मुझे वक्त मिल गया और मैंने मंत्र पढ़कर अपने लिए जहर को पानी में बदल दिया। तभी मखानी बीच में आ गया।"

"गरुड़ सच में बहुत बुरा था।” रातुला कह उठा—“शुक्र है कि तुम बच गईं।" –

“मैंने तो बचना ही था रातुला। क्योंकि मैं पहले ही भांप चुकी थी कि गरुड़ कुछ गलत करने वाला है।" ___

“गरुड़ ऐसा क्यों कर रहा था?" ___

“मरने से पहले बता दिया इसने कि सोबरा ने इसे अपना सब कुछ देने का लालच दिया है।"

"बेवकूफ। सोबरा की बातों में आ गया।" रातुला कह उठा।

गरुड़ की लाश और उसका घोड़ा वहीं रह गया। सब पुनः आगे बढ़ गए। __

“हमारे सफर की पहली मुसीबत गरुड़ था।" महाजन पारसनाथ से बोला।

"मुसीबतें तो अभी आनी हैं।” पारसनाथ मुस्करा पड़ा।

कमला रानी, मखानी से कह उठी। “तू सच में शेर है। आज तूने साबित कर दिया।"

"तेरे को अब पता चला, मैं तो कब से शेर था।" मखानी ने दांत फाड़े।

कुछ देर बाद मखानी अपना घोड़ा, तवेरा के घोड़े के पास ले आया।

मध्यम गति से काफिला बढ़ा जा रहा था।

"मैंने तुम्हारी जान बचाई है।" मखानी बोला।

“शुक्रिया।” तवेरा ने मुस्कराकर कहा।

“शुक्रिया से काम नहीं चलेगा। तुम्हें मेरा ध्यान रखना होगा।” मखानी ने दांत फाड़े।

"कैसा ध्यान?"

“वैसा ही, जैसा रखा जाता है।” कहकर मखानी ने आंख दबाई—“तुम्हें मेरा एहसान उतार देना चाहिए।"

“मैं जथूरा की बेटी हूं।"

"तो?"

“तुम कालचक्र के हिस्से हो। कालचक्र मेरे पिता के अधीन है। इस तरह तुम मेरे नौकर हुए।"

__ “नौकर तो गरुड़ भी था। फिर उसके साथ क्यों हंस-हंस के...”

"वो सब एक चाल थी। उस चाल का नतीजा, गरुड़ की मौत पर आकर खत्म हुआ।"

"तो मुझे तुमसे कुछ नहीं मिलेगा?"

"कुछ नहीं।" तवेरा ने मुस्कराकर सिर हिलाया।

"आशा रखू?" मखानी ने आखिरी कोशिश की।

“वो देखो, कमला रानी तुम्हें चांटा मारने वाली नजरों से देख रही है।”

मखानी ने उधर देखा। घोड़ा दौड़ाती कमला रानी उसे गुस्से से बार-बार देखे जा रही थी। ___

“मैं आशा करता हूं कि तुम मेरा एहसान उतार दोगी।” कहकर मखानी ने घोड़ा आगे दौड़ा दिया।

मखानी घोडे को कमला रानी के पास ले आया।

"क्या बातें कर रहे थे उससे?"

"कुछ नहीं, हाल-चाल पूछ रहा था।” मखानी ने दांत फाड़े।

"कभी मेरा हाल-चाल पूछा है जो उसका... ।” कमला रानी ने कहना चाहा।

“तुम्हारा पूछ के क्या करूंगा। सब कुछ जानता हूं। उसका कुछ नहीं जानता, इसलिए... ।”

"तू सीधा हो जा नहीं तो...।" । __

“नाराज मत हो। मेरे सारे प्रोग्राम तेरे साथ ही तो बनते हैं। त ही तो मेरे दिल की रानी है कमला रानी।"

"कमीना। हर समय मेरे पीछे पड़ा रहता है।"
 
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