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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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“मैं जथूरा की परवाह नहीं करता।”

जाता हूं, अब जो होगा, उसका जिम्मेवार तू ही होगा।” उसके बाद पोतेबाबा की आवाज नहीं आई।

जगमोहन की नजरें वहां नजर आ रहे व्यक्तियों के चेहरों पर फिर रही थीं, वो उस व्यक्ति को ढूंढ़ रहा था, जिसका चेहरा उसके मस्तिष्क ने देखी थी। जिसके लिए वो यहां आया था। तभी उसकी निगाह बार काउंटर के पीछे वाली दीवार पर पड़ी, जहां पर बड़ी सी वो ही वाल क्लॉक लगी हुई थी, जो उसके मस्तिष्क ने पहले ही देखी थी। उस घड़ी पर इस वक्त 11.15 हो रहे थे। अजीब बातें हो रहीं थीं उसके साथ।

अदृश्य पोतेबाबा जाने कैसी रहस्यमय ताकत था, धुएं में जिसकी आकृति नजर आने लगती थी। वो उस पर नजर रख रहा था। वो यहां आया तो पोतेबाबा भी उसके पास आ पहुंचा। वो चाहता था कि वो इन कामों में दखल न दे। होने वाले हादसे को रोकने की चेष्टा न करे।

जथूरा! ये सब उसकी पूर्वजन्म की दुनिया में से थे।

जगमोहन ये सोचकर सिहर-सा उठा कि क्या ये सब बातें पुनः उसके पूर्वजन्म में जाने की तैयारी के लिए हो रही हैं? परंतु वो अकेला तो कभी नहीं गया, पूर्वजन्म में । हमेशा देवराज चौहान के साथ गया। मोना चौधरी भी तब पूर्व जन्म के रास्तों पर ही मिलती थी। बाकी लोग भी तो होते थे। फिर इस बार वो ही क्यों? इसका जवाब जगमोहन के पास नहीं था। जगमोहन ने पुनः घड़ी को देखा। 11.20 हो चुके थे। उसे घड़ी में तब 11.30 का हुआ वक्त दिखा था। परेशान-से जगमोहन ने हर तरफ निगाहें घुमाईं। अगले ही पल जगमोहन का दिल धड़का। आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ।

वो ही व्यक्ति जिसे उसका मस्तिष्क पहले देख चुका था, आ रहा था इस तरफ।

जगमोहन उसे देखता रह गया। उस व्यक्ति के चेहरे पर गम्भीरता और क्रोध नजर आ रहा था। वो उसके पास वाले स्टूल पर आ बैठा और हजार का नोट बार टैंडर की तरफ बढ़ाता बोला।

“लार्ज पैग, बढ़िया ब्रांड का ।”

जगमोहन ने महसूस किया कि उसने पहले भी पी रखी है। | इस वक्त जगमोहन का दिमाग तेजी से काम कर रहा था। ये व्यक्ति अब यहां से सीधा अपने घर जाएगा और अपनी पत्नी और बच्चे को शूट कर देगा।

लेकिन जगमोहन इस हादसे को होने से रोकना चाहता था। उस औरत और बच्चे की जिंदगी बचाना चाहता था।

हैलो ।” एकाएक जगमोहन ने कहा।

उस व्यक्ति ने जगमोहन को देखा।

“आपका पैग।”

उस व्यक्ति ने नजरें घुमाईं तो बार मैन को तैयार गिलास रखते पाया। उसने गिलास उठाया और एक ही सांस में खत्म करके पुनः बार मैन से कह उठा।

“एक और।” साथ ही उसने हजार का नोट खाली गिलास के | नीचे रख दिया।

। “लोग मुझे पालकी वाला के नाम से जानते हैं।” जगमोहन बोला–“मैं भविष्यज्ञाता हूं

।”

“तो?” उसने बेमन से कहा।

“मैं लोगों के चेहरों का हाल देखकर, उनका भविष्य और भूतकाल बता सकता हूं।”

बकवास है।” नशे में उसकी आवाज भारी हो रही थी।

“आजमा लो।” जगमोहन सतर्कता से उससे बात कर रहा था।

कैसे?”

मैं तुम्हारे बारे में कई बातें बता सकता हूं।” ।

 
उसके चेहरे पर उपहास से भरी मुस्कान उभरी। बोला।

बताओ।” “तुम्हारा पैग आ गया।”

उसने गर्दन घुमाकर देखा। पैग को थामा। अपनी तरफ सरकाया फिर बोला।

“मुझे हैरानी है कि तुम जैसा ढोंगी इस नाइट क्लब में कैसे आ गया।” ।

“तुम्हारे पास रिवॉल्वर है।” जगमोहन बोला।

उसकी आंखें सिकुड़ीं।

तुम्हारे इरादे खतरनाक हैं।” उसका चेहरा कठोर हो गया।

“तुम अपनी पत्नी और बच्चे को मारकर बहुत बड़ी गलती करने जा रहे हो ।”

वो चिहुंक पड़ा।

क्या-क्या बोला तुमने?” उसके होंठों से फटा-फटा सा स्वर निकला।

“तुम फैसला कर चुके हो कि तुम घर जाकर पत्नी और बच्चे को शूट कर दोगे। क्योंकि तुम्हें अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक है। लेकिन सच बात तो ये है कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारी वफादार है। वो बच्चा तुम्हारा ही है। तुम वहम के शिकार हो।”

उसकी हालत देखने वाली थी।

“तुम...तुम ये सब कैसे जानते हो कि मैं क्या करने वाला हूँ? मैंने ये बात किसी को नहीं बताई।” ।

“मैं पालकी वाला हूं। लोगों का चेहरा देखकर उनके मन की बात जान लेता हूं कि वो भविष्य में क्या करने वाला है। अगर तुमने अपनी पत्नी और बच्चे को मारा तो अपनी गलती पर बहुत पछताओगे। तुम्हारी सारी उम्र जेल में बीतेगी। जहां तुम पागल हो जाओगे।”

नहीं ।” उसके होंठों से निकला।

ये सच है।” जगमोहन गम्भीर था।

मेरी पत्नी धोखेबाज है।” उसके होंठों से निकला।

वहम है तुम्हारा।”

उसने किसी से दोस्ती कर रखी है वो...।”

वो उसका दोस्त नहीं, भाई बना हुआ है। तुम्हें जलाने के लिए वो ऐसा करती है खुद जबकि वो बहुत अच्छी है। तुम उसे वक्त दिया करो। ब्याह कर लेने का मतलब ये तो नहीं कि औरत को घर में लाकर पटक दो और खुद बाहर रहो। उसका ध्यान कौन रखेगा?”

“तुम सच कह रहे हो कि वो ठीक औरत है?" उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कहा।

सौ प्रतिशत ।” “वो बच्चा ...।” “तुम्हारा ही है। तुम ही उसके बाप हो ।”

ओह!” उसने आँखें बंद कर ली । वो परेशान दिखने लगा था।

जगमोहन की गम्भीर निगाह उसके चेहरे पर ही थी।

“संभल जा ।” जगमोहन के कानों में पोतेबाबा का स्वर गुंजा—“आग से मत खेल जग्गू।”

जगमोहन ने इन शब्दों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया।

 
“जथूरा का खेल जो खराब करता है, वो जिंदा नहीं रहता और जथूरा तेरी जान नहीं लेना चाहता। तेरा एहसान है उस पर। लेकिन वो इस बात को कभी सहन नहीं करेगा कि तू उसके बनाए खेल को खराब करे।”

मैं जथूरा से नहीं डरता।” जगमोहन कह उठा। उस व्यक्ति ने आंखें खोलकर जगमोहन से कहा।

क्या कहा तुमने?” तुमसे नहीं कहा।” तो किससे कहा?” “मेरे आसपास मृत आत्माएं मंडराती रहती हैं। कभी-कभार उनसे बात हो जाती है। ये तुम्हारे काम की बात नहीं है।”

“म...मैं अब क्या करूं?”

अब तो तेरे को खुश हो जाना चाहिए कि तेरी बीवी अच्छी औरत है। बच्चा भी तेरा है। क्या अभी तक तेरा मन साफ नहीं हुआ?” । “हो गया है। मैं...मैं उन्हें नहीं मारूंगा। ओह, मैं कितनी बड़ी भूल करने जा रहा था!” वो दुखी मन से कह उठा।

“घर जा। अपनी दुनिया फिर से शुरू कर। तेरे को हर तरफ | अच्छा ही अच्छा नजर आएगा।”

वो तुरंत स्टूल से उतर गया। भरे गिलास को उसने हाथ भी नहीं लगाया।

“पास में रिवॉल्वर मत रखा कर। वरना कभी तू क्रोध में बहुत बड़ी भूल कर बैठेगा।” “ठ...ठीक है।”

ला रिवॉल्वर मुझे दे।” । उसने बेहिचक रिवॉल्वर निकाली और जगमोहन को थमा दी। जगमोहन ने रिवॉल्वर अपनी जेब में रख ली।।

“जा। अपनी गृहस्थी में रम जा।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

वो पलटा और तेजी से बाहर जाने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

जगमोहन ने चैन की लम्बी सांस ली।

इस बार उसने ठीक ढंग से मामला संभाल लिया था।

“तो तूने जथूरा से झगड़ा मोल ले ही लिया जग्गू। मेरे समझाने पर भी नहीं समझा।”

“भाड़ में जा तू और तेरा जथूरा।” जगमोहन ने कहा और स्टूल से उतरकर बाहर की तरफ बढ़ गया।

“अब तू बुरा भुगतेगा।” पोतेबाबा की आवाज पुनः कानों में पड़ी—“जथूरा जान चुका होगा कि तूने क्या गुल खिलाया है।”

जगमोहन पोतेबाबा की किसी भी बात का जवाब नहीं दे रहा था।



 
जगमोहन बंगले पर पहुंचा। रात को एक बज रहा था। देवराज चौहान नहीं आया था।

उसने भीतर प्रवेश करके लाइट जलाई और देवराज चौहान को फोन किया।

कहां हो?” बात होते ही जगमोहन ने पूछा।

“मैं दिल्ली में हूं।” देवराज चौहान की आवाज कानों में पड़ी—“एक-दो दिन बाद लौटुंगा ।”

ऐसा क्या काम पड़ गया जो...।”

“आने पर बताऊंगा।” इसके साथ ही उधर से देवराज चौहान ने फोन बंद कर दिया था।

जगमोहन ने रिसीवर वापस रख दिया।

यही सोचा कि किसी काम में व्यस्त हो गया होगा देवराज चौहान।

खैर मन-ही-मन जगमोहन को तसल्ली थी कि उसने दो लोगों को मरने से बचा लिया। मन-ही-मन फैसला किया कि कल बोरीवली जाकर उस फ्लैट में देखेगा कि वहां सब ठीक तो रहा?

डिनर वो ले आया था। सोने से पहले कॉफी पीने का मन था तो वो किचन में जा पहुंचा।

तब जगमोहन कॉफी बना रहा था कि पोतेबाबा की आवाज कानों में पड़ी।

“बहुत खुश हो रहा होगा तू कि जथूरा का काम खराब कर दिया।

“खुश हूं, जथूरा का काम खराब करने के लिए नहीं, बल्कि दो लोगों की जान बचाने के लिए।”

“एक ही बात है, परंतु उन दो लोगों को मरने से बचाकर तेरे को क्या मिला?”

मन की शांति ।”

मन की शांति? जग्गू अब तो जथूरा तेरे जीवन में अशांति पैदा करने जा रहा है।”

मैं तेरी बातों की परवाह नहीं करता।”

“तू परवाह करेगा। बहुत जल्द करेगा। जब तू बर्बाद होने जा रहा होगा, तब तुझे मेरी बातें याद आएंगी।”

“मैं तेरी बातों से डरने वाला नहीं। तू डरपोक है, मैं जानता हूं

अच्छा, जो मैं नहीं जानता मेरे बारे में, वो बात तूने जान ली, हैरानी है।” । ।

“तू हिम्मत वाला होता तो सामने आकर मेरे से बात करता। यूं अदृश्य होकर नहीं ।” ।

इससे समझ गया कि मैं डरपोक हूं?”

“बहुत बड़ा डरपोक ।”

 
दो पलों की खामोशी के बाद पोतेबाबा की आवाज पुनः कानों में पड़ी।

“तू शायद मेरी अहमियत को कम आंक रहा है, क्योंकि मैं बार-बार तेरे पास आ रहा हूं।”

जगमोहन चुप रहा।।

“हादसों के देवता महान जथूरा का मैं सबसे खास सेवक, सलाहकार और नजदीकी हूं। ये रुतबा हमारी दुनिया में बहुत बड़ा माना जाता है। राजसी ठाट हैं मेरे। समझ रहा है जग्गू?”

सुन रहा हूं।

” मैं किसी के पास जाऊं, ये बात ही अपने आप में बड़ी बात है।

” फिर तो तेरे को मेरे पास नहीं आना चाहिए था।”

जथूरा ने मना किया था कि किसी और को भेज दे पोतेबाबा। लेकिन मैंने स्वयं तेरे पास आना ठीक समझा।”

“क्यों?”

“क्योंकि तू पहले दर्जे का मक्कार और झूठा है। दूसरा कोई तुझे नहीं संभाल सकता।”

* “तो तूने मुझे संभाल लिया?”

“संभाल ही रहा हूं। बेशक सख्ती ही क्यों न करनी पड़े, तुझे संभाल लूंगा।”

तूने बताया जथूरा हादसों का देवता है?”

“हां। तुम्हारी दुनिया में सब हादसे जथूरा के तैयार किए ही तो होते हैं।”

“तो मेरे लिए जथूरा को एक हादसा तैयार कर देना चाहिए कि जिसमें फंसकर मैं मर जाऊं।”

“यकीनन ऐसा ही किया जाएगा। परंतु जथूरा को तेरा एहसान याद है।” ।

तो?" जगमोहन ने कॉफी का प्याला थामा और किचन के बाहर आ गया।

वो तेरी जान नहीं लेना चाहता।”

फिर तो फंस गया जथूरा।”

उसने कसम नहीं खा रखी। तू न माना तो फिर उसे तेरी जान लेनी पड़ेगी।” ।

जगमोहन ड्राइंग रूम में सोफे पर जा बैठा। चूंट भरा।

जथूरा ने खासतौर से मुझे तेरे पास भेजा है कि तेरे को समझाऊं कि उसके रास्ते में मत आ ।” ।

मैं अपना कर्म कर रहा हूं। किसी के रास्ते में नहीं आ रहा।

” तेरे कर्म हमारे लिए बुरे हैं। मान जा जग्गू।”

मैं तेरी परवाह नहीं करता पोतेबाबा। अच्छा होगा, कि तू दोबारा मेरे पास न आए।”

मैं जथूरा का सेवक हूं। वो कहेगा तो मैं तेरे पास सौ बार आऊंगा।”

जगमोहन ने कॉफी का घूट भरा।।

“तुझे दौलत से बहुत प्यार है है न?”

तो?"

तू कहे तो मैं तेरे को ऐसे कीमती पत्थर ला दूं जिन्हें बेचकर तू दौलत का बहुत बड़ा भंडार खड़ा कर ले ।” |

 
“ये सब तू इसलिए कर रहा है कि मेरा दिमाग, भविष्य की घटनाओं को, जो पहले ही देख लेता है, उन्हें मैं रोकने की चेष्टा न करूं। लोगों का बुरा हो जाने दें। खामखाह के एक्सीडेंट में लोगों को मरने दें।”

“हां। तु ठीक समझा।”

‘’ मेरे बारे में तू गलत सोच रहा है। दौलत पाने के लिए मैं इतना भी कमीना नहीं कि...।”

‘’ तू जिस तरह से दौलत इकट्ठी कर रहा है, देवा भी तेरे साथ रहता है। वो क्या मैं जानता नहीं?”

उन कामों में कमीनापन तो नहीं करते हम।”

मुझे तेरे से कुछ नहीं चाहिए पोतेबाबा ।” जगमोहन गुस्से से बोला-“तू चला जा यहां से।”

मैं तेरे को समझाने...।”

तू समझ गया होगा कि मैं तेरी बात नहीं मानने वाला। मेरे को समझाना तेरे बस का है भी नहीं।” ।

“बहुत बुरा भुगतेगा तू ।” पोतेबाबा के स्वर में चेतावनी के भाव आ गए।

“कुएं में जाकर गिर तू।” जगमोहन ने कहा और कप रखकर, सोफे पर ही लेट गया।

अगले दिन जगमोहन की आंख खुली तो सुबह के नौ बज रहे थे। कुछ पल वो आंखें खोले, कल की बीती घटनाओं के बारे में सोचने लगा, फिर उठा और किचन में जाकर कॉफी बनाई और सोफे पर बैठकर घूट भरने लगा। दिमाग में तरह-तरह के विचार घूम रहे थे। सोचें तेजी से दौड़ रही थीं। " अब वो पोतेबाबा के बारे में सोचने लग गया था। | पोतेबाबा जो भी था, खतरनाक था। जो नजर नहीं आता था और कभी भी उसके आस-पास मंडराता हो सकता था। उसकी हर हरकत को देख सकता था और उसे पता भी नहीं चल सकता। सिर्फ धुएं में उसकी आकृति चमकने लगती थी। उसकी मौजूदगी का स्पष्ट है मैं उसकी आकृत और उसे पता भीकता था। उसकी जगमोहन ने लाख सोचा, परंतु जथूरा के बारे में कुछ भी याद नहीं आया। ये सब उसके पूर्वजन्म के लोग थे। जिनके बारे में सीधे-सीधे कुछ भी याद नहीं आ सकता था। | जथूरा हादसों का देवता था।

इस दुनिया में होने वाले हर बुरे एक्सीडेंट को वो ही तैयार करता था। वो अपनी दुनिया में बैठा इस दुनिया के लोगों को मौत के मुंह में पहुंचा रहा था।

ये गलत बात थी। जथूरा को ऐसा नहीं करना चाहिए। मासूम लोगों की जान नहीं लेनी चाहिए उसे।

लेकिन उसे कैसे पहले ही पता चल जाता था कि कहां पर क्या हादसा होने वाला है?

पोतेबाबा कहता है कि कोई ऐसी शक्ति ये सब बातें उसके मस्तिष्क में डाल रही है, जो जथूरा के खिलाफ है। परंतु वो शक्ति उसे क्यों इस्तेमाल कर रही है, इस मामले में?

सोचों का कोई अंत नहीं था।

जगमोहन को लग रहा था कि इन सब बातों से वो पूरी तरह अंजान है कि ये सब क्या हो रहा है?

वो तो बार-बार ये ही सोचता कि क्या ये सब बातें, पूर्वजन्म की यात्रा की शुरुआत तो नहीं? | देवराज चौहान की जरूरत महसूस कर रहा था वो। परंतु देवराज चौहान दिल्ली में कहीं व्यस्त था और अब उसने ये ही तय किया कि देवराज चौहान को फोन पर कुछ नहीं बताएगा। उसकी बातें सुनकर देवराज चौहान खामखाह परेशान होगा और जो काम कर रहा है, कहीं उसमें न भटक जाए। देवराज चौहान जब वापस आएगा, तभी उसे ये सब बातें बताएगा।

 
जगमोहन ने कॉफी समाप्त की और उठ खड़ा हुआ। | वो सबसे पहले बोरीवली के उस फ्लैट पर जाकर देखना चाहता

था कि सब ठीक रहा या नहीं।

जगमोहन नहा-धोकर तैयार हुआ। ब्रेड का नाश्ता किया फिर कार पर बोरीवली के लिए चल दिया। | पचास मिनट के सफर के पश्चात जगमोहन बोरीवली के उन फ्लैटों के पास पहुंचा। कार रोकी और 146 नम्बर फ्लैट तलाश करके सीढ़ियां चढ़ने लगा। दूसरी मंजिल पर 146 नम्बर फ्लैट के दरवाजे पर ठिठका। वहां शांति छाई थी। उसने कॉलबेल पर उंगली रखी तो भीतर कहीं बेल बजने का स्वर सुनाई दिया।

मन-ही-मन जगमोहन सोच रहा था कि सब ठीक हो। एकाएक दरवाजा खुला।।

जगमोहन ने चैन की सांस ली। क्योंकि दरवाजा खोलने वाली युवती वो ही थी, जिसे उसके मस्तिष्क ने देखा था।

“कहिए?” युवती ने उसे देखा। तभी पीछे से मर्द की आवाज आई।

कौन है रानी?”

जगमोहन ने पहचाना कि ये रात वाले आदमी की ही आवाज थी। यानी कि सब ठीक था। उसकी कोशिश सफल रहीं।

तभी वो व्यक्ति दरवाजे पर आया। उसने छोटे से बच्चे को उठा रखा था। जगमोहन को देखते ही वो चौंका।

अ...आप!”

जगमोहन मुस्करा पड़ा।

“ओह, भीतर आइए—मैं...”

मैं यहीं देखने आया था कि क्या सब ठीक है? वो देख लिया, मुझे रोकना मत। मैं व्यस्त हूं। अभी जाना है।”

उस आदमी के होंठों से कुछ न निकला वो अवाक-सा जगमोहन को देख रहा था।

“कौन है ये?” युवती ने उस आदमी को देखा।

जगमोहन पलटा और नीचे जाने के लिए सीढ़ियां उतरने लगा। कुछ ही पलों में वो नीचे खड़ी अपनी कार में आ बैठा था। ‘मैंने जथूरा का एक हादसा बेकार कर दिया। दो की जानें बचा लीं । जगमोहन बड़बड़ा उठा।

। “तुम आग से खेल रहे हो।” कानों में पोतेबाबा की आवाज पड़ी।

तुम फिर आ गए?”

बहुत खुश हो कि जथूरा का एक हादसा बेकार कर दिया।

तुम कब से कार में हो?”

*अभी आया हूं, जब तुम ऊपर गए।” पोतेबाबा की आवाज कानों में पड़ी।

“तुम अचानक मुझ तक कैसे आ जाते हो?” जगमोहन ने पूछा।

" “मैं अचानक नहीं आता। मैं भी तुम्हारी तरह इंसान हूं। हवा नहीं। मुझे भी भीतर-बाहर जाने के लिए दरवाजे का इस्तेमाल करना पड़ता है। खास बात सिर्फ ये है कि मैं अदृश्य हूं।”

जगमोहन के होंठ सिकुड़े। “मतलब कि इंसानी शरीर तुम्हारे साथ है।”

क्यों नहीं, मैं इंसान हूं तो, शरीर मेरे साथ क्यों नहीं होगा। दवा खाकर मैं अदृश्य हुआ पड़ा हूं।”

उसी पल जगमोहन नै बगल वाली सीट की तरफ हाथ बढ़ाया। जगमोहन का हाथ किसी की बांह से टकराया। परंतु वो बांह उसे नजर नहीं आ रही थी। जगमोहन पूरा शरीर टटोलने लगा।

ये क्या कर रहे हो?” पोतेबाबा की आवाज कानों में पड़ी।

बांह-कंधा, सिर, चेहरा, दाढ़ी, सब चीजों का एहसास हुआ जगमोहन को।

 
तभी पोतेबाबा उसका हाथ झटकता कह उठा।

हाथ पीछे रखो। मुझे अच्छा नहीं लगता कि कोई इस तरह मेरे शरीर को हाथ लगाए ।”

*औरतों का स्पर्श तो तुम्हें पसंद होगा।” जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहा।

बहुत पसंद है। जानते हो मेरी उम्र क्या है?

” क्या?”

350 बरस ।” होगी।”

लेकिन तुम्हारी दुनिया की औरतें मुझे ज्यादा पसंद हैं। ऐसी दो औरतों को मैं ले जा चुका हूं। जो अब मेरे साथ रहती हैं।”

तुम इस दुनिया से दो औरतों को अपनी दुनिया में ले गए?” जगमोहन के माथे पर बल पड़े।

“हां।”

ये तुमने गलत काम...।” ।

“मैंने जबर्दस्ती नहीं की। वे दोनों औरतें स्वेच्छा से मेरे साथ गईं।” पोतेबाबा ने कहा।

“मैं नहीं मानता कि वो औरतें अपनी इच्छा से... ।”

“मैं झूठ नहीं बोलता। क्यों बोलूंगा? तुमसे डरता नहीं मैं। वे दोनों औरतें सहेलियां थीं और बुरे हादसे का शिकार होने वाली थीं। मैंने उन्हें देखा तो वे मुझे अच्छी लगीं। तब मैं उनसे मिला और उन्हें बताया कि वो दोनों जल्द ही मरने वाली हैं। आने वाले वक्त की उन्हें तस्वीर भी दिखा दी, जिसमें वे मर रही थीं। मैंने उन्हें समझाया कि अगर वो मेरा साथ स्वीकार कर लेती हैं और मेरे साथ मेरी दुनिया में जाकर, मेरी सेवा करेंगी तो वे बच सकती हैं। इस तरह वे तैयार हो गईं।”

“जथूरा से नहीं पूछा?”

जथूरा की इजाजत से ही मैं उन औरतों को लेकर गया था।”

तुमने पहले उन औरतों को भयभीत किया फिर उन्हें अपने साथ चलने पर तैयार कर लिया।”

परंतु मैंने जबर्दस्ती नहीं की।” ।

घटिया हो तुम।”

“अभी तुम मुझे जानते नहीं, वरना...”

“मैं पसंद नहीं करता कि तुम मेरे पास आते रहो।”

मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ सकता।

” क्यों?।

जथूरा ने तुम्हारी जिम्मेवारी मुझ पर सौंपी है कि तुम्हें समझा-बुझाकर रास्ते पर लाऊ ।”

“तुम्हारी कही कोई बात भी मुझे स्वीकार नहीं ।”

“तुम्हें जथूरा की बातें स्वीकार करनी होंगी।”

“तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?"

पोतेबाबा की आवाज नहीं आई।

उल्लू का पट्ठा।” जगमोहन ने कहा और कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दीं। चेहरे पर उखड़ापन था।

जथूरा आने वाले बुरे वक्त को टालना चाहता है, इसलिए तुम्हें इस रास्ते से हटाना चाहता है।”

बुरा वक्त?” कार चलाते जगमोहन के होंठों से निकला।

“बहुत बुरा वक्त। अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो बुरी । घटनाओं का दौर शुरू हो जाएगा।”

 
बुरी घटनाएं—किसके लिए?” तुम्हारे लिए भी और जथूरा के लिए भी। हम सब के लिए।” “तुम्हारा मतलब कि मेरा दिमाग जथूरा के बुरे हादसों को पहले ही देख लेता है, तो मैं उन हादसों के बारे में कुछ न करूं। बिल्ली को देखकर आंखें बंद कर लें तो, आने वाला बुरा वक्त थम जाएगा।”

हां। ठीक कहा तुमने ।”

“वो बुरा वक्त कैसा होगा?”

“ये मैं नहीं बता सकता।”

“या तुम्हें पता ही नहीं है उस बुरे वक्त के बारे में?”

पता है। कुछ-कुछ पता है।” पोतेबाबा की आवाज में गम्भीरता थी—“इसी कारण तुम्हें समझाने के लिए मारा-मारा फिर रहा हूं। जथूरा चाहता है कि तुम्हें, उसके काम न बिगाड़ने दें।”

फिर तो तुम्हारे हाथ मायूसीं लगेगी। मैं तुम्हारी बातें समझने वाला नहीं।” ।

क्यों जिद करते हो, मैं तुम्हें बहुत बड़ी दौलत...।” ।

यही वो पल थे कि जगमोहन को अपने मस्तिष्क में बिजलियां-सी कौंधती महसूस हुईं।

“आं।” जगमोहन के होंठों से निकला।

क्या हुआ?”

जगमोहन ने फौरन कार को सड़क के किनारे ले जा रोका।

अगले ही पल होंट भींचे जगमोहन ने सिर को कार के स्टेयरिंग पर रख दिया। मस्तिष्क झनझना रहा था उसका। आंखें बंद हो चुकी थीं। और फिर उसके मस्तिष्क में तस्वीरें उभरने लगीं।

एयरपोर्ट का दृश्य उसके मस्तिष्क में चमका ।। रोशनियों से एयरपोर्ट जगमगा रहा था।

दीवार पर उसे डिजिटल बोर्ड पर आज की तारीख और 4 बजे का वक्त दिखा। लोगों की भीड़ थी।

तभी एकाएक पुलिस और काले कपड़ों में कमांडोज़ नजर आने लगे। वो दस-बारह कमांडोज थे, जिन्होंने गनें थाम रखीं थीं। वे सब भीतर से आते एक रास्ते पर खड़े हो गए। पुलिस वहां से लोगों को पीछे हटाने लगी थी।

फिर जगमोहन के मस्तिष्क में कमांडो जैसे काले कपड़ों में एक व्यक्ति दिखा जो भीड़ से अलग खड़ा था। उसकी निगाह इसी तरफ थी और हाथ में मीडियम साइज का सूटकेस थाम रखा था।

तभी उस रास्ते से छः लोगों से घिरे प्रधानमंत्री आते दिखे। छः में से चार प्रधानमंत्री के पर्सनल कमांडोज थे और बाकी के दो उनके सहायक थे। ज्यों ही प्रधानमंत्री उस रास्ते से बाहर आए, वहां मौजूद कमांडोज ने उन्हें अपने घेरे में ले लिया और वे सब बाहर की तरफ बढ़ रहे थे।

पुलिस इस दौरान लोगों को पीछे रख रहीं थी।

कमांडो जैसे काले कपड़े पहने व्यक्ति ने फुर्ती से अपना सूटकेस खोला। उसमें गन रखी थी। उसने गुन निकाली और तेजी से आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री को घेरे चल रहे कमांडोज में शामिल हो गया। किसी का भी ध्यान उस पर नहीं था। वो गन थामे कमांडो के बीच में से रास्ता बनाते जरा-जरा करके आगे बढ़ने लगा।

कमांडोजयुक्त प्रधानमंत्री का काफिला, तेजी से बाहरी गेट की तरफ बढ़ रहा था। | वो व्यक्ति प्रधानमंत्री के भीतरी सुरक्षा घेरे तक आ पहुंचा था। तब तक प्रधानमंत्रीजी बाहरी गेट तक आ पहुंचे थे। सामने सिक्योरिटी से लदी प्रधानमंत्री के कार्यालय की कार खड़ी थी। जिसका दरवाजा खुल चुका था। प्रधानमंत्रीजी आगे बढ़कर उसमें बैठने ही वाले थे कि उस व्यक्ति ने उसी पल गन सीधी की और गोलियां चलाने लगा। सारी जगह गोलियों की तड़-तड़ से गूंज उठी। प्रधानमंत्री का शरीर गोलियों से भर गया। वे नीचे जा गिरे।

| जगमोहन गहरी-गहरी सांसें लेने लगा था।

 
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