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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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अब उसका दिमाग शांत हो गया था। मस्तिष्क में बिजलियां चमकनी बंद हो गई थीं।

कई पलों तक जगमोहन स्टेयरिंग पर सिर रखे रहा। फिर उसने सिर उठाया। सीधा बैठा।

चेहरा पसीने से भरा हुआ था। अभी भी वह लम्बी सांसें ले रहा था। खुली आंखों के सामने वो सब कुछ तैर रहा था, जो उसके मस्तिष्क ने अभी-अभी देखा था।

प्रधानमंत्री की हत्या होने जा रही थी।

जबकि देश का प्रधानमंत्री एक अच्छा और शरीफ इंसान था। जनता में मशहूर था।

ये नहीं होना चाहिए। जगमोहन ने रूमाल निकालकर अपना पसीने से भरा चेहरा पोंछा।

क्या हुआ?” पोतेबाबा की गम्भीर आवाज कानों में पड़ी।

“तुम?” जगमोहन ने बगल वाली सीट की तरफ देखा–“तुम अभी गए नहीं?" ।

नहीं, मैं तुम्हारे पास ही बैठा था। क्या हुआ था तुम्हें अभी?”

जगमोहन दो पल चुप रहकर बोला।

तुम देश के प्रधानमंत्री को हादसे में मारने जा रहे हो?”

“हम नहीं मार रहे, वो तो हादसा होगा। तुम ये क्यों सोचते हो कि हम लोगों की जान लेते हैं?”

लेकिन वो हादसा जथूरा ने ही रचा है।”

“ठीक समझे ।”

प्रधानमंत्री शरीफ है, उसकी जान मत लो।”

तभी तो जथूरा उसकी जान लेने के लिए हादसा रच चुका है कि वो शरीफ है। वो शरीफ मरेगा तो कोई दूसरा प्रधानमंत्री बनेगा। षड्यंत्र भी होंगे और जथूरा को नए हादसे रचने का और भी मौका मिलेगा।” पोतेबाबा की आवाज कानों में पड़ी। ।

“तो तुम नहीं मानोगे?”

“मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है। मैं तो तुम्हारे पास हूं। हादसे तो उस दुनिया में बैठा जथूरा रच रहा है।”

कैसे रचे जाते हैं हादसे?” “जथूरा सोचता है और अपने शिष्यों को बताता है कि कौन-सा हादसा कैसे रचना है। मैं वहां होता हूं तो जथूरा की इस काम में पूरी सहायता करता हूं। वैसे जथूरा के विद्वानों की जमात हादसों के तरीकों को सोचती है। विद्या ग्रहण किए हजारों शिष्य हैं जथूरा के जो आदेश के मुताबिक हादसों को रचते हैं। फिर रचे जा चुके हादसों का माप-तौल अनुभवी लोगों द्वारा किया जाता है कि हादसे को ठीक से रचा गया है या नहीं। अगर रचे हादसे में कोई कमी होती है तो उसे पुनः दुरस्त करने के लिए वापस भेज दिया जाता है। जो हादसा ठीक होता है उसे तुम्हारी दुनिया में उन नामों पर भेज दिया जाता है, जिसके लिए हादसा तैयार किया जाता है।”

“कैसे भेजा जाता है?"

“बहुत ही आसान है। जैसे तुम्हारी दुनिया के लोग मोबाइल फोन से एस.एम.एस. भेजते हैं, कुछ ऐसा ही सिस्टम हमारे पास है, परंतु उस तकनीक को हम गुप्त रखते हैं ताकि कोई हमारी वो तकनीक खराब न कर दे।”

“तुम लोगों ने बहुत तरक्की कर रखी है।”

“बहुत ज्यादा। तुम्हारी दुनिया से बड़े विद्वान हमारी दुनिया में हैं।”

“मैं पूर्वजन्म की दुनिया में कई बार जा चुका हूं।” जगमोहन गम्भीर स्वर में बोला।

खबर है मुझे ।” अब नहीं जाना चाहता।” क्योंकि वहां बड़े-बड़े खतरे होते हैं?”

“हां, वे ख़तरे हमारी दुनिया के लोगों पर भारी पड़ते हैं।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।

तुम पूर्वजन्म का सफर न करो, यही मैं चाहता हूं, ये ही जथूरा चाहता है।”

क्या मतलब?” ।

“जथूरा के हादसों में दखल दोगे तो तुम्हें पूर्वजन्म का सफर करना पड़ सकता है।”

 
जगमोहन की गर्दन घूमी और सीट की तरफ देखा। वो ख़ाली थी। जगमोहन के होंठ भिंच गए।

कोई चाहता है कि तुम पूर्वजन्म का सफर करो। तभी तो वो जथूरा के हादसों का तुम्हें पूर्वाभास करा रहा है।”

वो क्यों मुझे पूर्वजन्म में भेजना चाहता है?”

ये तो वो ही जाने ।”

कौन है वो?”

“मैं नहीं जानता, परंतु वो शक्ति जो भी है, जथूरा की दुश्मन ही होगी। तभी तो तुम्हें जथूरा के खिलाफ भड़का रही है।”

मुझे तुम्हारी बात पर भरोसा नहीं।”

मैं झूठ नहीं बोलता जग्गू।”

“नहीं, मैं तुम्हारा यकीन नहीं कर सकता ।”

“एक बार करके देखो।”

“क्या?

सिर्फ एक बार तुम जथूरा के खेल में दखल मत दो। उसके बाद सब कुछ ठीक होता चला जाएगा।”

तुम्हारा मतलब है कि मैं प्रधानमंत्री की हत्या होने दें।

“हां, यही मेरा मतलब है। एक बार भी तुम खामोश बैठे रह गए तो उस शक्ति का चक्र टूट जाएगा। वो कमजोर होती चली जाएगी, फिर तुम्हें पूर्वजन्म का सफर भी नहीं करना पड़ेगा।”

और जथूरा के हादसे इसी प्रकार चलते रहेंगे।”

“हां। जैसे दुनिया चल रही है, वैसे ही चलती रहेगी।”

जगमोहन के चेहरे पर कड़वे भाव उभरे।

पोतेबाबा।”

हां ।”

“तेरे को किसी ने ये नहीं कहा कि तू बहुत बड़ा कमीना है?” जगमोहन ने तीखे में कहा।

“ऐसा मुझे किसी ने नहीं कहा।”

तो मैं कहता हूँ। अपनी जात पहचान ले ।”

“तू मेरी बेइज्जती कर रहा है जग्गू।” पोतेबाबा ने नाराजगी से कहा।

“अभी बहुत इज्जत से बात कर रहा हूं। मेरी कार से बाहर | निकला जा।”

मेरी बात...।” ।

“सुना नहीं तूने...मेरी कार से बाहर निकल जा।” जगमोहन गला फाड़कर चीखा।।

फिर दरवाजा खुला। लगा जैसे कोई बाहर निकला हो और दरवाजा बंद हो गया।

जगमोहन ने उस खाली सीट पर हाथ घुमाया। सब ठीक था। पोतेबाबा वास्तव में बाहर निकल गया था।

“अब एक बात और कान खोलकर सुन ले।” जगमोहन ने गुस्से से कार की खिड़की से बाहर देखा।

क्या?” कार के बाहर से पोतेबाबा की आवाज आई। दोबारा मेरी कार में बैठा तो बहुत मारूंगा।”

तू पागल है जग्गू। मैं जो कह रहा हूं तेरे भले के लिए ही कह रहा हूं।"

“तू मेरा तो क्या, किसी का भी भला नहीं कर सकता।” जगमोहन ने दांत भींचकर कहा और कार आगे बढ़ा दी।

| उखड़ा हुआ था जगमोहन्। पोतेबाबा से। जथुरा से और इन होने वाले हादसों से।

 
एकाएक उसने गहरी सांस ली और कार की रफ्तार कम कर दी। क्रोध की वजह से, अनजाने में कार की स्पीड तेज हो गई थी। फिर एकाएक ही सड़क के किनारे पेड़ की छाया में कार रोक दी ।।

घड़ी में वक्त देखा। दिन का एक बज रहा था। उसका दिमाग पुनः तेजी से काम करने लगा।

सिर्फ तीन घंटे बाद, ठीक चार बजे एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री की हत्या हो जाएगी।

ये हादसा जथूरा ने तैयार किया है। जाने किसे माध्यम बनाया है, अपना हादसा पूर्ण करने के लिए।

जो भी प्रधानमंत्री की जान लेने जा रहा है, उसे रोकना होगा। प्रधानमंत्री को बचाना होगा। वे अच्छे इंसान हैं। उनकी मौत से देश को नुकसान होगा। लेकिन कैसे?

जगमोहन को कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था। प्रधानमंत्री के मामले में दखल देना, मजाक नहीं था। जगमोहन ने कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

जल्दी ही वो एक बाजार में पहुंचा। कार से निकलकर उसने पब्लिक बूथ की तलाश की।

“डायरेक्ट्री देना।” जगमोहन फोन बूथ पर बैठे व्यक्ति से बोला।

क्या?"

फोन डायरेक्ट्री।”

वो कहां से आ गई? पांच सालों से तो फोन वालों ने डायरेक्ट्री ही नहीं छापी।”

“नहीं छापी?”

नहीं ।”

पुरानी डायरेक्ट्री होगी?

” वो भी नहीं है।” ।

“तुम्हें प्रधानमंत्री कार्यालय का फोन नम्बर पता है?”

क्या?” उसने अजीब-सी नजरों से जगमोहन को देखा। प्रधानमंत्री कार्यालय का फोन नम्बर ।”

तो आप फोन डायरेक्ट्री में प्रधानमंत्री कार्यालय का नम्बर तलाश करना चाहते थे?"

“हां । ।

“आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पी.एम. आफिस का नम्बर फोन डायरेक्ट्री में नहीं होता।”

ओह, मेरा दिमाग खराब हो गया है।” जगमोहन ने कहा और बाहर आ गया।

मन ही मन बहुत परेशान था जगमोहन।। वो प्रधानमंत्री की हत्या किए जाने की सूचना देना चाहता था। लेकिन उसे प्रधानमंत्री कार्यालय का फोन नम्बर नहीं पता था।

जगमोहन अपनी कार की तरफ बढ़ा कि तभी उसकी निगाह कुछ दूर हवलदार पर पड़ी।

जगमोहन तेजी से चलता उसके पास जा पहुंचा। “सुनिए सर ।” हवलदार ने पलटकर जगमोहन को देखा। जगमोहन पास आया उसके।

“आधे घंटे में मेरी ड्यूटी खत्म होने वाली है।” हवलदार बोला—“लफड़े वाली बात हो तो दूसरे से कहो।” ।

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैं आपसे प्रधानमंत्री कार्यालय का नम्बर पूछना चाहता हूं।”

पी.एम. आफिस का फोन नम्बर?" हवलदार ने अजीब-से स्वर में कहा।

हां वो ही।”

क्यों?”

काम है।”

क्या काम है—मुझे बता।” ।

“तुम्हारे जानने लायक नहीं है।”

समझा।” हवलदार ने पैनी नजरों से उसे घूरा–“तुम वहां फोन करके धमकी देना चाहते हो।”

धमकी?”

“यहीं कि पी.एम. हाउस में बम रखा है, जो कि फटने वाला है। ऐसे बोगस कॉल पहले भी आ चुके हैं वहां। वो तुमने किए?”

 
जगमोहन उखड़ गया।

मैंने किए होते तो तुमसे नम्बर न मांगता फिरता ।”

तो अब पहली बार, धमकी भरा फोन करने जा रहे हो... तभी...।”

दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा ।” जगमोहन झल्लाया।

क्या तुमने ऑन ड्यूटी पुलिस वाले को पागल कहा?” उसने आगे बढ़कर जगमोहन की बांह पकड़ी—“चल थाने में ।”

हाथ छोड़-पांच सौ दूंगा।” जगमोहन बोला।

पांच सौ? ठीक है दे।”

बांह तो छोड़।” हवलदार ने बांह छोड़ी।

जगमोहन ने जेब से पांच सौ का नोट निकाला और उसे देते हुए कहा।

बता प्रधानमंत्री कार्यालय का फोन नम्बर?”

इस पांच सौ के बदले तेरे को सलाह दे रहा हूँ।” उसने नोट अपनी जेब में रखते हुए कहा-“मेरे ख़याल में शायद ही किसी पुलिस वाले को प्रधानमंत्री कार्यालय का नम्बर पता होगा और जिसे पता होगा वो इस तरह तेरे को नहीं मिलने वाला।” ।

“तो कैसे मिलेगा?”

“नहीं मिलेगा। ये ही तो समझाना चाहता हूं। मेरे को समझ नहीं आता कि आखिर तेरे को पी.एम. ऑफिस में काम क्या है?”

तेरे को तो पांच सौं मिल गए?" जगमोहन ने चिढ़कर कहा।

हां ।” वो मुस्कराया।

“मजे कर।” जगमोहन ने कहा और पलटकर अपनी कार की तरफ बढ़ गया।

…..,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

एयरपोर्ट। 3.30 बजे ।।

जगमोहन वहां मौजूद था। वो फैसला कर चुका था कि उसे क्या करना है। अभी तक सब ठीक नजर आ रहा था। कोई कमांडो या फालतू की पुलिस न दिखाई दे रही थीं।

यात्रियों का आना-जाना और एनाउंसर की आवाजें गूंज रही थीं।।

कई यात्री फर्श पर कपड़ा फैलाकर बैठे, खाना खा रहे थे। रेलवे स्टेशन जैसा माहौल महसूस होता कभी-कभी। दो बच्चे एक खाली डिब्बा एक-दूसरे पर फेंकते खेल रहे थे। कभी-कभार प्लेन के इंजन के चीखने की आवाज कानों में पड़ जाती थी। कुछ काउंटरों पर लोग कतारों में भी खड़े दिखे।

जगमोहन की निगाह दीवार पर गई, जहां डिजीटल घड़ी लगी थी।

इस घड़ी को उसका मस्तिष्क पहले भी देख चुका था। घड़ी में अब 3.40 हो रहे थे। प्रधानमंत्री की हत्या होने में सिर्फ बीस मिनट बाकी थे।

जगमोहन का दिल इस विचार के साथ जोरों से धड़का। वहां मौजूद लोगों पर निगाह मारी, जो कि होने वाले इस हादसे से बेखबर थे। अगर हादसा हो गया तो एयरपोर्ट पुलिस छावनी में बदल जाना था। | जगमोहन ने उस तरफ देखा जहां उसके मस्तिष्क ने प्रधानमंत्री का हत्यारा खड़ा देखा था।

वहां इस वक्त कोई नहीं खड़ा था। वक्त आ सकता जा रहा था। 3.50 बज गए।

तभी जगमोहन ने पंद्रह-बीस पुलिस वालों को भीतर प्रवेश करते देखा।

देखते ही देखते वो उस रास्ते से लोगों को हटाने लगे, जहां से प्रधानमंत्री को निकलना था।

जगमोहन सतर्क हो गया। प्रधानमंत्री की हत्या का वक्त करीब आता जा रहा था।

 
उसी पल उसने काले कपड़े पहने दस-बारह कमांडो द्वार से भीतर प्रवेश करते देखे। सबके हाथों में गर्ने थमी हुई थीं। वे सतर्क और खूखार जैसे लग रहे थे। | कमांडोज उस रास्ते पर खड़े होने लगे, जहां से होकर प्रधानमंत्री को आगे जाना था।

जगमोहन की निगाह घड़ी पर गई। 3.55 होने वाले थे।

जगमोहन की निगाह उधर घूमी जहां प्रधानमंत्री का हत्यारा खड़ा देख चुका था उसका मस्तिष्क।

थम गईं नजरें जुगमोहन की। | काले कपड़ों में उसे वहां वो ही हत्यारा दिखा, जिसे उसका मस्तिष्क देख चुका था। उसके पांवों के पास ही मीडियम साइज का सूटकेस रखा था। जगमोहन जानता था कि उसी सूटकेस में गन है।

जगमोहन फुर्ती से पास के पब्लिक फोन बूथ में घुस गया और रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाने लगा। सिक्का उसने पहले ही भीतर डाल दिया था। ये नम्बर एयरपोर्ट के सुरक्षा स्टाफ के चीफ मिस्टर कौल का था।

बेल हुई, फिर आवाज आई।

मिस्टर कौल?"

यस ।”

तुम एयरपोर्ट की सुरक्षा के चीफ हो?” जगमोहन ने जल्दी से कहा।

हां ।”

अभी प्रधानमंत्री का प्लेन आया होगा। वो बाहर आ रहे हैं।”

“हां, लेकिन तुम...।”

“मेरी सुनो, बीच में मत बोलो, ठीक चार बजे प्रधानमंत्री की हत्या होने वाली है।”

क्या कहा?”

“मैं तुम्हें एक मौका दे रहा हूं कि हत्यारे को पकड़ सको, तैयार हो?" ।

ह..हां ।” कहां हो तुम?"

वहां जहां से प्रधानमंत्री को निकलना है। कमांडोज के बीच...।”

 
जगमोहन की निगाह फोन बूथ से बाहर, कमांडोज की तरफ घूमने लगी। । तभी उसे पचपन बरस का एक व्यक्ति दिखा जो फोन कान पर लगाए, कमांडोज के पास ही टहल रहा था। तभी उसके कानों में आवाज़ पड़ी।

“तुम खामोश क्यों हो गए?”

तुमने नीली कमीज पहन रखी है।”

“हां...मैंने...ओह तुम मुझे देख रहे हो?”

हां। मेरी बात ध्यान से सुनो।” जगमोहन ने हत्यारे की तरफ नजर मारी-“तुम वहां से पीछे की तरफ घूमो ।” ।

वो घूमा।।

“गुड ।” जगमोहन कह उठा–“अब ठीक सामने दूर तक देखो।”

| जगमोहन ने उसे ऐसा करते भी देखा।

“ठीक है, अब अपनी नजर को थोड़ा-सा बाएं घुमाओ । आराम से और तब तक घुमाते रहो, जब तक कि तुम्हें काले कपड़े पहने एक आदमी न दिख जाए। उसके पांवों के पास एक सूटकेस...।”

हां—दिख गया है मुझे वो।” “वो ही प्रधानमंत्री की हत्या करने वाला है। उस सूटकेस में गन है। प्रधानमंत्री के आते ही वो सूटकेस से गन निकालेगा और आगे बढ़कर वो कमांडोज में मिक्स हो जाएगा। क्योंकि उसके कपड़े कमांडोज जैसे ही हैं और फिर वो पास जाकर प्रधानमंत्री की हत्या कर देगा। उसके इरादे पक्के हैं और वो पीछे हटने वाला नहीं ।”

तुम...तुम कौन हो और तुम्हें कैसे...?”

“बेवकूफ दो-तीन मिनट का वक्त रह गया है प्रधानमंत्री की हत्या होने में। कुछ करो ।”

क्या?” वो घबरा गया दिखता था।

“ये भी क्या मैं बताऊं?" जगमोहन झल्लाया—“उसे रोको गोली मारो। बेशक पहले मारो या तब मारो जब वो प्रधानमंत्री की हत्या करने के लिए गन का इस्तेमाल करने जा रहा हो। मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया है कि वो प्रधानमंत्री का हत्यारा बनने जा रहा हैं।” कहने के साथ ही जगमोहन ने रिसीवर वापस रखा और फोन बूथ से बाहर निकलकर एक तरफ तमाशबीन की तरह खड़ा हो गया। उसने सोच रखा था कि सिक्योरिटी चीफ कौल कुछ न कर सका तो वो अपने रिवॉल्वर का इस्तेमाल करके हत्यारे को रोकेगा। परंतु जथूरा के रचे हादसे को पूरा नहीं होने देगा।

कमांडोज जैसे कपड़े पहने वो व्यक्ति गन थामे कमांडोज में आ मिला। सबका ध्यान प्रधानमंत्री पर था, जो कि सुरक्षा घेरे में, बाहर की तरफ बढ़ रहे थे, साथ ही वो लोगों को देखते हाथ भी हिला रहे थे।

सिक्योरिटी चीफ कौल की निगाह उस नकली कमांडो पर थी, जो कमांडोज की भीड़ में शामिल होकर, उनका ही हिस्सा बन गया था। कौल चीख-चीखकर बता देना चाहता था सबको कि वो प्रधानमंत्री की हत्या करने जा रहा है।

परंतु इसमें खतरा था। उस हत्यारे के हाथ में गन थीं। | अपना भेद खुलते ही उसने घबराकर फायरिंग शुरू कर देनी थी। निर्दोषों का खून बहने लगता। कौल देख रहा था कि वो हत्यारा कमांडोज को पार करता, प्रधानमंत्री तक पहुंचने की चेष्टा कर रहा था। | कौल ने रिवॉल्वर निकाल ली। वो हत्यारे के करीब रहने का प्रयत्न कर रहा था। इस वक्त उसे सिर्फ वो ही व्यक्ति याद रहा था। दुनिया को जैसे भूल चुका था। कौल चाहता तो आसानी से अभी उसे शूट कर सकता था, परंतु वो ये भी नहीं चाहता था कि वो कोई गलती कर बैठे। क्या पता उसे फोन करने वाला कोई बोगस इंसान हो। जिस पर शक कर रहा है कि वो हत्यारा है, वो हत्यारा न हो। कौल के दिमाग में बहुत कुछ दौड़ रहा था।

प्रधानमंत्री का कमांडोज से भरा काफिला बाहर निकलने वाले शीशे के दरवाजे पर जा पहुंचा। | कौल ने देखा वो व्यक्ति अब प्रधानमंत्री के काफी पास जा पहुंचा है।

प्रधानमंत्रीजी सामने खड़ी कार की तरफ बढ़ने लगे। जिसके दरवाजे खोले जा चुके थे।

कदम-कदम पर सिक्योरिटी थी।

अगले ही पल कौल को अपने शरीर में चींटियां-सी रेंगती महसूस हुईं। उसने उस व्यक्ति को गन सीधी करते देखा। कौल ने प्रधानमंत्री पर निगाह मारी, जो कि कार तक पहुंच चुके थे। | कौल समझ गया कि वो व्यक्ति प्रधानमंत्री पर गोलियां चलाने जा रहा है।

वो प्रधानमंत्री की तरफ गन को उठाकर सीधी कर चुका था।

न...ऽऽ...ऽ...हीं..।” कौल गला फाड़कर चीखा। उसने रिवॉल्वर वाला हाथ सीधा किया।

 
कौल के चीखने पर वहां हड़कंप मच गया। परंतु वो व्यक्ति जैसे अपना काम पूरा कर देना चाहता था। इससे पहले कि वो गोलियां चला पाता प्रधानमंत्री पर। कौल एक-के-बाद एक ट्रेगर दबाता चला गया।

पहली गोली उस हत्यारे के सिर में लगी, बाकी तीन गोलियां उनकी पीठ में जा धंसी थीं।

गोलियों की आवाज के साथ ही हर कोई सन्न रह गया था। किसी को समझने का मौका नहीं मिला कि क्या हुआ है।

तब तक तीन कमांडो कौल की तरफ झपटे। एक ने उसके रिवॉल्वर वाले हाथ पर गन मारी तो रिवॉल्वर नीचे जा गिरी। दो ने उसे जकड़ लिया।

| कौल गहरी-गहरी सांसें ले रहा था। कॉप-सा रहा था।

वो हत्यारा छाती के बल नीचे पड़ा था। गन उसकी छाती के नीचे दबी थी। वो मर चुका था। उसका खून आस-पास के फर्श पर फैलता जा रहा था। कौल ने गहरी सांसें लेकर कहा।

“छोड़ो मुझे। मैं एयरपोर्ट सिक्योरिटी का चीफ हूं। वो आदमी प्रधानमंत्रीजी को शूट करने जा रहा था।”

वो हमारा आदमी था।” एक कमांडो ने कठोर स्वर में कहा।

वो तुम लोगों में से नहीं है। पहचानो उसे। उसके कपड़ों की वजह से तुम लोग भी धोखा खा गए।”

दो कमांडो उस मरे हुए व्यक्ति की तरफ बढ़े। उसे सीधा करके उसका चेहरा देखा गया। फौरन ही ये स्पष्ट हो गया कि मरने वाला बाहरी व्यक्ति था। कौल को छोड़ दिया गया।

प्रधानमंत्रीजी इस हादसे के बाद एक पल के लिए वहां न रुके थे। वे जा चुके थे।

| कुछ दूर भीड़ में खड़े जगमोहन के चेहरे पर मुस्कान नाच रही थी।

जगमोहन अपनी कार में बैठा और वापस चल पड़ा। मन-ही-मन खुश था कि उसने प्रधानमंत्री की हत्या जैसा, बड़ा हादसा होने से बचा लिया वरना देश-भर में दुख की लहर दौड़ जाती। बहुत नुकसान होता देश का। अब उसे ये सब करना अच्छा लगने लगा था। आज पहली बार वो महसूस कर रहा था कि लोगों का भला करके मन को कितनी शांति मिलती है। आज उसे सच्ची खुशी हासिल हुई थी। । रास्ते में उसने मार्किट में कार रोकी और धूप के दो बड़े पैकिट ले लिए।बंगले पर पहुंचा। देवराज चौहान अभी तक नहीं लौटा था।

जगमोहन ने सबसे पहले धूप को ड्राइंगरूम-बेडरूम, किचन में सुलगा दिया। बंगले में धूप का खुशबूदार धुआं फैलने लगा। ये सब काम करके हटा और फ्रिज से ब्रेड-बटर निकालकर टोस्ट तैयार किए और खाते हुए किचन में जा पहुंचा और कॉफी तैयार करने लगा। | कॉफी का मग थामे वो ड्राइंग रूम में पहुंचा तो ठिठक गया। चेहरे पर तीखी मुस्कान आ ठहरी ।।

सोफे पर पोतेबाबा बैठा था।

वो अदृश्य था, परंतु धूप के धुएं में उसकी आकृति स्पष्ट दिखाई दे रही थी।

सिर के बाल पीछे को जाते। सफेद फैली दाढ़ी छाती तक जाती। गले में मालाएं। कानों में कुंडल। धूप का धुआं जब कम होता तो आकृति धुंधला जातीं, वरना आकृति स्पष्ट नजर आती ।।

“स्वागत है पोतेबाबा।” जगमोहन ने व्यंग-भरे स्वर में कहा और सोफा चेयर पर बैठकर कॉफी का घूट भरा।।

पोतेबाबा गम्भीर निगाहों से जगमोहन को देखता रहा।

पहले मैंने कहा था कि तुम्हारा, मेरे पास आना मुझे अच्छा नहीं लगता।” जगमोहन मुस्कराया—“लेकिन अब ऐसा नहीं है। तुम्हारा आना मुझे अच्छा लगने लगा है। कम-से-कम देख तो सकता हूं कि तुम्हारा उतरा हुआ चेहरा कैसा लगता है।”

 
मैंने सोचा था जग्गू कि तुम मेरा कहना मान जाआगे।” इतनी बड़ी गलत बात तुमने कैसे सोच ली?” “इसी में हम सबका भला है।” पोतेबाबा के होंठ हिलते दिखाई दिए ।

मेरा जो मन करेगा, मैं वो ही करूंगा।” पोतेबाबा उसे देखता रहा। धुएं में उसकी बनती-बिगड़ती आकृति दिखती रही।

तू सच में बहुत बड़ा मक्कार है।” एक बात बता पोतेबाबा।”

क्या?” ।

किसी को कैसे मालूम हो जाता है कि जथूरा ने कौन-सा हादसा रचा है और वो मेरे मस्तिष्क में डाल देता है?”

किसी ने हमारे हादसे तैयार करने वाले सिस्टम पर अपनी तार डाल दी है। जिसकी वजह से वो जान लेता है कि जथूरा कौन-सा हादसा इस दुनिया में भेजने जा रहा है।” पोतेबाबा ने कहा।

“फिर तो तुम्हें मेरे पास नहीं आना चाहिए था। तुम्हें वो तार ढूंढकर निकाल फेंकनी चाहिए तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।”

ये असम्भव जैसी बात है।”

क्यों?”

सिस्टम पर हमने अपनी आवश्यकता के अनुसार सैकड़ों तारें डाल रखी हैं। सैकड़ों तारों में से उस बहुरूपी तार को तलाश करना आसान नहीं है। फिर भी हमारे लोग दिन-रात उस तार को तलाश करने की चेष्टा कर रहे हैं।”

जगमोहन ने कॉफी का घूट भरा।

“तू बता जग्गू, तू कैसे मेरी बात मानेगा?” पोतेबाबा गम्भीर था।

कैसे भी नहीं।” “मानेगा तो जरूर ।”

भूल है तेरी, जो ऐसा सोचता है।” जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा।।

जगमोहन ने पोतेबाबा की आकृति को मुस्कराते देखा।

तू अभी जथुरा की ताकत को पहचानता ही कहां है। उस ताकत के आगे तेरा वजूद चींटी जैसा है।” पोतेबाबा ने कहा।

। “अगर ऐसा होता तो तुम लोग मुझसे अपनी बात मनवा चुके होते।”

“हमारी भी कुछ सीमाएं हैं। हम इस दुनिया के लोगों को शक्तियों के दम पर ही, अपनी मनमानी कर सकते हैं। परंतु तेरे साथ तो हम इस वक्त कुछ भी गलत नहीं कर सकते। क्योंकि तेरे को उस शक्ति का आशीर्वाद मिल चुका है, जो तेरे को इस्तेमाल कर रही है।”

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।

तेरे ऊपर हमारी शक्तियां असर नहीं करेंगी। जब तू हमारी दुनिया में आएगा, तब तुझ पर हमारी शक्तियां चल सकेंगी।”

फिर तो तुम लोग मजबूर हो गए, मुझे कुछ न कहने को ।

” इतने भी मजबूर नहीं हुए, जितने कि तुम सोच रहे हो।”

तो क्या करोगे मेरा?”

“तू नहीं तो देवा तो है।”

देवराज चौहान ।” जुगमोहन के होंठों से निकला–माथे पर बल पड़े-“क्या कहना चाहता है तू?”

“जथूरा एक हादसा तैयार कर रहा है, जो देवा के साथ होगा। तू देवा को कैसे बचा पाएगा?”

“कमीने—हरामी ।” जगमोहन कॉफी का प्याला फेंकते हुए पोतेबाबा की आकृति पर झपट पड़ा।

जगमोहन को लगा जैसे किसी शरीर से जा टकराया हो। जगमोहन ने पोतेबाबा की आकृति की गर्दन दोनों हाथों से पकड़ ली।।

“मैं तेरे को अभी खत्म कर....”

तभी जगमोहन ने पोतेबाबा का हाथ अपने सिर पर महसूस किया।

जगमोहन को लगा पोतेबाबा अंगूठे से उसकी कनपटी दबा रहा हो।

दर्द की तीव्र लहर उसके सिर में दौड़ी और वो बेहोश होता चला गया।

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सपन चड्ढा ने कॉल बेल पर उंगली रखते हुए दबाई । भीतर बेल बजने की आवाज गूंजी, जो बाहर तक सुनाई दी।

सपन चड्ढा ने इस वक्त कीमती सूट पहन रखा था। उसकी कार सामने ही खड़ी थी। हाथों की उंगलियों में सोने की, हीरे के नगों वाली अंगूठियां पहनी, चमक रही थीं। गले में सोने की मोटी-सी चैन थी।

तभी दरवाजा खुला और राधा दिखी। उसके हाथ में बेलन था। गालों पर दाएं-बाएं से आती बालों की लट झूल रही थी। माथे पर सूखे आटे की लकीर लगी दिखाई दे रही थी।

“क्या है?” राधा ने डंडा मारने वाले ढंग में पूछा।

न...नमस्कार।” सपन चड्ढा ने दोनों हाथ जोड़े।

“नमस्कार-नमस्कार, देख तू पहले ही सुन ले, नीलू कहीं नहीं जाएगा। वो बोत बिजी है।” राधा बेलन वाला हाथ हिलाकर कह उठी–“मैं आलू के परांठे बना रही हूं और उसे बोत जोरों की भूख लगी है।”

मैंने उससे बात करनी है।” उसे ले के तो नहीं जाएगा?

” नहीं, सिर्फ बात...।” तभी पीछे से नीलू महाजन की आवाज आई।

कौन है राधा?”

खुद ही देख लो। तुम्हें पूछ रहा है कोई। मेरा बनाया आलू का परांठा खाए बिना तुम जाना नहीं ।” राधा ने पलटते हुए कहा

और भीतर चली गई। तभी दरवाजे पर महाजन दिखा।

सपन चड्ढा ने मुस्कराकर उसे देखा।

कहो।” महाजन बोला।

मेरा नाम सपन चड्ढा है।” वो जेब से कार्ड निकालकर महाजन की तरफ बढ़ाता बोला—“मेरा शीशा बनाने का बिजनेस

महाजन ने कार्ड लिया, देखा फिर सपन चड्ढा के चेहरे पर निगाह टिक गई।

आगे बोलो।”

“तुम नीलू महाजन हो। इसलिए पूछ रहा हूं कि मैंने तुम्हें पहले नहीं देखा ।”

“हां ।” महाजन के होंठ सिकुड़े।

“मोना चौधरी से मुझे काम है।”

क्या?”

काम उसी को बताऊंगा। मुझसे किसी ने कहा कि तुम मोना चौधरी की खास पहचान वाले हो ।”

किसने कहा?”

उसने अपना नाम बताने को मना किया है, इसी शर्त पर उसने मुझे तुम्हारा पता बताया।”

* “तुम मोना चौधरी से बात करना चाहते हो?” महाजन बोला।

सपन चड्ढा ने फौरन हां में सिर हिलाया।

“तो काम मुझे बताना पड़ेगा। उसके बाद ही मोना चौधरी तय करेगी कि तुमसे मिलना है कि नहीं।” ।

तभी पीछे से राधा की आवाज आई।। “नीलू, परांठा तैयार है। खा ले ठंडा हो जाएगा। उसे भी ले आ। कोई गरीब खाना खा लेगा, तो दुआ देगा।”

बोलो क्या काम है मोना चौधरी से?” महाजन बोला।

एक को खत्म कराना है।”

“किसे?"

ये बात तो मैं सिर्फ मोना चौधरी को ही बताऊंगा। इस काम के तीन करोड़ दे सकता हूं।”

 
“तीन करोड़ एक कत्ल के?” महाजन ने गहरी सांस ली।

लेकिन ये काम जल्दी का है। नहीं तो वो मुझे मार देगा।” सपने चड्ढा कह उठा।

तुम्हारा कार्ड मैंने ले लिया है। काम करने का। बेबी का मन हुआ तो आज तुमसे मिल लेगी।”

“मैं सारा दिन अपने बंगले पर रहकर ही, मोना चौधरी का इंतजार करूंगा।”

ये जरूरी नहीं कि वो तुमसे, तुम्हारे बंगले पर ही मिले।”

वो जहां कहेगी, मैं वहीं आ जाऊंगा।”

“ठीक है, तुम जाओ।”

कोशिश करना कि मोना चौधरी मेरा काम करने को तैयार हो जाए। मैं तुम्हें पांच लाख दूंगा।”

बेबी को काम के लिए राजी करने के?”

महाजन ने दरवाजा बंद कर लिया।

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सपन चड्ढा वहां से हटा और कार में आ बैठा। कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दीं।

क्या तीर मार के आया है?" पीछे वाली सीट पर बैठे चार फीट के मोमो जिन्न ने पूछा।

जैसा तूने कहा था, वो ही बात कर आया हूं नीलू महाजन से।”

तो मुंह लटका के क्यों बोलता है, खुश होकर कह।”

मैं तुम्हारे कहने पर चल रहा हूं। इसके बाद तो तू मेरा पीछा छोड़ देगा?”

“तू मेरा गुलाम है।”

“तूने कहा था कि इस काम के बाद मेरा पीछा छोड़ देगा ।”

मैंने कहा और तूने संच मान लिया।” मोमो जिन्न कहकर हंस पड़ा।

सपन चड्ढा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी ।

तूने तो कहा था कि...।”

“अभी काम किधर पूरा हुआ है। काम पूरा कर, तभी तो छोडूंगा।” मोमो जिन्न ने कहा।

तेरा कोई भरोसा नहीं ।”

अब की बार तूने ठीक बात कही।”

सपन चड्ढा खुद को, मोमो जिन्न के हाथों बुरी तरह फंसा महसूस कर रहा था। ।

“तू किस्मत वाला है कि जथूरा ने ये काम मुझे करने को दिया। लोमा को दिया होता तो अब तक तू गंजा हो चुका होता। जो बात बाद में करता है और सिर पर चपत पहले मारता है। वो दूसरे को पागल कर देता है।”

 
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