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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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ये तुम्हारा नहीं मेरा काम है।” मेरी वजह से तुम...।” “मोना चौधरी से मेरी बहुत पुरानी पहचान है। तुम इस बात को नहीं समझोगे लक्ष्मण दास ।”

लक्ष्मण दास देवराज चौहान को देखने लगा। मोना चौधरी का क्या करोगे?

” अभी कह नहीं सकता।

” “अभी तुम मेरे पास, यहीं पर रहो।” लक्ष्मण दास बोला–“सपन का मैनेजर मोना चौधरी के बारे में कोई नई खबर दे सकता है। तुम्हारे काम की हो सकती है।”

“मेरा तुम्हारे पास रहना ठीक नहीं। मैं कहीं होटल में रहूंगा और बता दूंगा कि किस होटल में हूं।”

“जैसी तुम्हारी मर्जी।” लक्ष्मण दास के चेहरे पर चिंता थी। देवराज चौहान बंगले से चला गया।

लक्ष्मण दास जब उसे छोड़कर वापस कमरे में आया तो मोमो जिन्न को चार फीट का, कुर्सी पर बैठे देखा।

“तुम तो कमाल के एक्टर हो। कितनी अच्छी तरह से तुमने देवा को बेवकूफ बनाया ।” ।

“देवराज चौहान को गलत बात कहना मुझे अच्छा नहीं लगा।” लक्ष्मण दास ने नाराजगी से कहा।

“अपने प्यारे मोमो जिन्न के लिए तुम्हें सब कुछ करना पड़ेगा लक्ष्मण दास ।” मोमो जिन्न ने बेढंगे-से दांत फाड़े।

सब कुछ नहीं। सिर्फ यही काम।

” । सब कुछ।” मोमो जिन्न हंसा ।।

तुमने सिर्फ इसी काम के लिए कहा था।”

अब तुम मेरे गुलाम हो। वो ही करोगे जो मैं कहूंगा, वरना अभी तुम्हारा दिमाग घुमा दूंगा तो तुम पागलों की तरह हरकतें करने लगोगे। अपने कपड़े उतारकर, नंगे होकर सड़कों पर दौड़ते फिरोगे।”

नहीं, ऐसा मत करना।” लक्ष्मण दास घबरा उठा।

तुम्हें मेरी बातें मानती रहनी होंगी।

” कब तक?

” जब तक तुम जिंदा हो ।”

“पहले तो तुमने कहा था कि एक ही काम...।”

नए गुलाम को धीरे-धीरे फांसना पड़ता है। एक ही बार में सब कुछ कह दूंगा तो तुम जीते जी ही मर जाओगे।”

| लक्ष्मण दास ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“अब मैं तुम्हें बताऊंगा कि मिन्नो, कब कहां मिलेगी और तुम ये खबर देवा को दोगे।”

तुम दोनों में खून-खराबा कराना चाहते हो ।

” तुम्हें एतराज है?" मोमो जिन्न ने उसे घूरा।

म...मुझे क्यों एतराज होगा।” लक्ष्मण दास घबराकर बोला।

देवराज चौहान करोलबाग स्थित होटल में ठहरा और लक्ष्मण दास को होटल के बारे में फोन पर बताया। इस दौरान जगमोहन का फोन भी आया था, परंतु उसने जगमोहन को नहीं बताया कि वो किस मामले में है। क्योंकि देवराज चौहान जानता था कि मोना चौधरी के बारे में सुनकर जगमोहन चिंता करेगा।

अब देवराज चौहान को तलाश थी मोना चौधरी की। परंतु मोना चौधरी का पता-ठिकाना वो नहीं जानता था। लेकिन पारसनाथ के रेस्टोरेंट के बारे में उसे पता था।

देवराज चौहान ने टैक्सी ली और पारसनाथ के रेस्टोरेंट जा पहुंचा। शाम के 3.30 हो रहे थे और रेस्टोरेंट में लंच चल रहा था। देवराज चौहान ने लंच का ऑर्डर दिया।

बीस मिनट बाद उसे लंच सर्व कर दिया गया।

इसी के साथ ही रेस्टोरेंट ने अब लंच टाइम समाप्त करने की घोषणा कर दी थी। शाम के चार बजने जा रहे थे। खाने के दौरान देवराज चौहान की निगाह हर तरफ घूम रही थी कि पारसनाथ दिख जाए, परंतु पारसनाथ कहीं भी नजर न आया। देवराज चौहान ने लंच समाप्त किया।

 
वेटर ‘बिल' के लिए पास आया। देवराज चौहान ने हजार का नोट ‘बिल' के साथ रखते हुए पूछा।

पारसनाथ कहां है?”

“मालिक?" वेटर ने फौरन कहा—“मुझे खबर नहीं कि वो कहां

देवराज चौहान के होंठों पर मुस्कान आ टहरी।

उसे कहो, देवराज चौहान मिलना चाहता है।”

“मैं देखता हूं। पता नहीं वो यहां हैं भी कि नहीं।” कहकर वेटर चला गया।

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगा ली। रेस्टोरेंट में इस वक्त एक-दो लोग ही थे।

| आधी सिगरेट ही खत्म हुई थी कि उसे पारसनाथ अपनी तरफ आता दिखा।

देवराज चौहान के होंठों पर मुस्कान उभरी । वो उठा और पास आ चुके पारसनाथ से हाथ मिलाया।

“बैठो-बैठो।” पारसनाथ ने कहा-“खैर तो है? तुम मेरे रेस्टोरेंट में मुझसे मिलने आए हो।”

दोनों बैठे।

पारसनाथ ने इशारे से वेटर को पास बुलाया और कॉफी लाने को कहा।

तुम्हारे यहां का खाना अच्छा है।” देवराज चौहान बोला।।

“सिर्फ यही कहने के लिए तो तुम मुझसे मिलना नहीं चाहते होगे?" पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा। |

देवराज चौहान ने कश लिया और पानी के गिलास में सिगरेट डाल दी।

पारसनाथ की सतर्क निगाह देवराज चौहान के चेहरे पर थीं। मोना चौधरी कहां है?” देवराज चौहान का स्वर शांत था।

पारसनाथ को अपने शरीर में तनाव-सा आता महसूस हुआ।

यहीं है, दिल्ली में। दो दिन पहले वो मिलने आई थी मेरे से।” पारसनाथ ने संभले स्वर में कहा।

मैं उससे मिलना चाहता हूं।

” क्यों?” ।

शायद वो मेरी तलाश कर रही है।”

*वजह ।” ।

तीन करोड़ में उसने मुझे मारने का काम हाथ में लिया है। मुझे पता लगा तो, मैंने उसकी तलाश शुरू कर दी।”

पारसनाथ की आंखें सिकुड़ीं।। “कब पता लगा?”

दो-ढाई घंटे पहले।

पारसनाथ अब सतर्क नजर आने लगा था।

तुम्हें गलती लगी है देवराज चौहान, ऐसा कुछ भी नहीं...।”

सपन चड्ढा नाम के आदमी ने मोना चौधरी से, मेरी मौत का सौदा किया है।”

विश्वास नहीं होता।”

“मैं कह रहा हूं, इसलिए तुम्हें विश्वास कर लेना चाहिए। देवराज चौहान ने कहा।

पारसनाथ देवराज चौहान को देखता अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा।

तभी वेटर कॉफी के प्याले रख गया।

कॉफी लो।”

देवराज चौहान ने प्याला अपनी तरफ सरकाया। उठाया। चूंट भरी। नजरें पारसनाथ पर थीं।

“मैं मोना चौधरी से बात करना चाहूंगा ।” पारसनाथ बोला।

यहीं पर मेरे सामने?” ।

हां।” कहते हुए पारसनाथ ने जेब से मोबाइल फोन निकाला और नम्बर मिलाने लगा। चेहरे पर गम्भीरता थी। “उसे बताओ कि मैं यहां हूं, तुम्हारे पास ।” ।

मैं बेवकूफ नहीं हूं।” पारसनाथ फोन कान पर लगाता कह उठा।

क्या मतलब?”

“मैं कभी नहीं चाहूंगा कि तुम और मोना चौधरी सामने पड़ो। मुझे तो अब भी यकीन नहीं आ रहा...।” कहते-कहते पारसनाथ ठिठका। तभी उसके कानों में मोना चौधरी की आवाज पड़ी थी—“कहो पारसनाथ?”

 
“तुम्हारी खैरियत जानने के लिए फोन किया।” देवराज चौहान को देखते पारसनाथ शांत स्वर में बोला।

‘हैरानी है, पहले तो कभी भी तुमने खैरियत जानने के लिए फोन नहीं किया।”

“यूं ही अब कर...।”

“सितारा कैसी है?” उधर से मोना चौधरी ने पूछा। (सितारा के बारे में विस्तार से जानने के लिए अनिल मोहन के देवराज चौहान और मोना चौधरी एक साथ वाले पूर्व प्रकाशित उपन्यास 'देवदासी’, ‘इच्छाधारी’, ‘नागराज की हत्या’, ‘विषमानव अवश्य पढ़ें)।

“वो ठीक है, शॉपिंग के लिए गई हुई है। तुमने कोई नया काम हाथ में लिया क्या?”

फौरन मोना चौधरी की तरफ से आवाज नहीं आई।

हां। लेकिन तुमने क्यों पूछा?”

मैं जानना चाहता हूं कि वो काम क्या है?" पारसनाथ का गम्भीर स्वर सामान्य था।

देवराज चौहान की निगाह पारसनाथ पर थी।

“तो तुम्हें मालूम हो गया कि मैंने क्या काम हाथ में लिया है?" मोना चौधरी की आवाज कानों में पड़ी।

“तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं।”

देवराज चौहान को खत्म करने का मौका हाथ में आया है।” मोना चौधरी की आवाज में सख्ती आ गई थी।

पारसनाथ ने गहरी सांस ली।

तीन करोड़ में।” ।

“तुम्हें कैसे पता?” उधर से मोना चौधरी की आवाज में उलझन आ गई थी।

मैं तुम्हें बाद में फोन करता हूं।

” लेकिन तुम्हें कैसे...?” परंतु पारसनाथ ने फोन बंद किया और गम्भीर स्वर में देवराज चौहान से बोला।

तुम सही थे।” । ।

“मोना चौधरी को तुम्हें बता देना चाहिए था कि मैं यहां हूं, ताकि वो काम निबटा लेती।”

“प्लीज देवराज चौहान ।” पारसनाथ बोला—“मैं नहीं जानता कि क्या बात है, परंतु मोना चौधरी, तुम्हारे नाम से ही उखड़ जाती है। ये शायद पूर्वजन्म का कोई असर हो सकता है। तुम जरा संयम से काम लो। मैं मोना चौधरी से बात...।”

“मैं तुम्हारे पास इसलिए नहीं आया कि तुम मोना चौधरी से बात करो। मैं मौना चौधरी से मिलने आया हूं।”

“और तुम सोचते हो कि मैं तुम्हें उसका पता दे दूंगा।

” दे देना चाहिए। मोना चौधरी को भी मेरी तलाश है।

” तुम दोनों का एक-दूसरे के सामने पड़ना ठीक नहीं ।”

“मुझे मारने के लिए मोना चौधरी मेरी तलाश कर रही है।” देवराज चौहान बोला।

पारसनाथ ने अपनी खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा।।

तुम ये बात भूल जाओ। मैं मोना चौधरी से बात करूंगा, उसे समझाऊंगा कि...।”

“तो मुझे खुद ही मोना चौधरी का ठिकाना ढूंढना होगा।” देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ।

पारसनाथ उसे देखता रहा।

देवराज चौहान वहां से हटा और बाहर की तरफ बढ़ता चला गया।

पारसनाथ वहीं बैठा उसे देखता रहा, जब तक वो बाहर निकलकर नजरों से ओझल न हो गया। उसकी आंखों में बेचैनी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उसने फोन निकाला और महाजन का नम्बर मिलाने लगा।

 
कहो पारसनाथ।” अगले ही पल महाजन की आवाज कानों में पड़ी।

तुम मेरे पास आओ।

” क्यों—क्या हुआ?”

नई मुसीबत शुरू होने जा रही है। मोना चौधरी और देवराज चौहान आमने-सामने पड़ने जा रहे हैं।”

ये कैसे हो सकता है?” ।

हो रहा है ये। मोना चौधरी ने तीन करोड़ में, देवराज चौहान को मारने का काम हाथ में लिया है।”

सत्यानाश! मैं अभी आता हूं।” ।

50 मिनट में महाजन पारसनाथ के रेस्टोरेंट के ऊपरी हिस्से में, वहां था जहां पारसनाथ ने इस जगह को घर का रूप दे रखा था और सितारा के साथ रहता था।

“क्या कहा था तुमने फोन पर?” महाजन ने अजीब-से स्वर में कहा।

“मोना चौधरी ने देवराज चौहान को मारने का काम हाथ में लिया है। पारसनाथ बोला।

तुमसे किसने कहा?

” “देवराज चौहान ने।”

“देवराज चौहान ने?” महाजन अचकचा उठा-उसका तुम्हें फोन आया क्या?”

वो खुद आया था मेरे पास ।

” रेस्टोरेंट में?

” पारसनाथ ने सहमति से सिर हिलाया।

क्यों?”

“वो मेरे से मना चौधरी का पता जानना चाहता था। मोना चौधरी से मिलना चाहता है वो।”

क्यों?”

ताकि मोना चौधरी उसे मार सके। या फिर वो मोना चौधरी को खत्म कर दे।” पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा।

“क्या पता ये बात गलत हो?” ।

सही है। मैंने मोना चौधरी से बात की है।”

“तुमने...तुमने उसे बताया कि देवराज चौहान तुम्हारे पास...।”

नहीं बताया। परंतु ये बात ज्यादा देर तक मोना चौधरी से छिपाई नहीं जा सकती। वो महसूस कर लेगी कि...।”

किसने सौंपा ये काम बेबी को?” ।

सपन चड्ढा नाम का आदमी है कोई।”

“ये तेरे को देवराज चौहान ने बताया?"

हां।” ।

लेकिन देवराज चौहान को कैसे पता चला कि सपन चड्ढा ने देवराज चौहान को मारने का काम, मोना चौधरी को सौंपा है?”

मैंने नहीं पूछा। देवराज चौहान ने बताया भी नहीं।”

महाजन उठा और एक तरफ रखी बोतल उठाकर गिलास तैयार किया। चूंट भरा।

“भाभी कहां है?”

शॉपिंग के लिए गई है।” पारसनाथ के चेहरे पर गम्भीरता नाच रही थी।

बहुत गलत होने जा रहा है पारसनाथ ।” महाजन बोला।

“बहुत ही गलत ।”

देवराज चौहान और बेबी के टकराने का मतलब है, एक बार फिर पूर्वजन्म के सफर के लिए चल देना। जो कि बहुत ही खतरनाक होता है। हमें बेबी को इस काम के लिए पीछे हटने के लिए मजबूर करना होगा। वरना बीता वक्त इस बात का गवाह है कि जब-जब देवराज चौहान और बेबी आमने-सामने पड़े, पूर्वजन्म में प्रवेश करना पड़ा।”

यही चिंता तो मुझे सता रही है।” पारसनाथ व्याकुल था। हम बेबी को समझाएंगे।

” मानेगी वो?

” मनवा के रहेंगे।” ।

नहीं।” पारसनाथ ने इंकार में सिर हिलाया-“देवराज चौहान के मामले में मोना चौधरी हमारी एक बात भी नहीं सुनेगी। ये पहले भी हो चुका है। देवराज चौहान से टकराने की सोचकर, मोना चौधरी पागल-सी हो जाती है।”

“हां, लेकिन ऐसा क्यों होता है?” महाजन ने घूट भरकर पारसनाथ को देखा।

पूर्वजन्मों का असर ।” पारसनाथ ने गहरी सांस ली। महाजन कुछ चुप रहकर कह उठा।

“देवराज चौहान और बेबी पहले जन्म में मिले । उनकी शादी होने वाली थी, परंतु मिन्नो नगरी की मालकिन बन गई, जबकि देवराज चौहान नगरी का साधारण इंसान रहा और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता रहा। इस तरह देवराज चौहान और बेबी की पहले जन्म में ठन गई। देवराज चौहान की शादी, बेबी की बहन बेला से हो गई। फिर उस जन्म का अंत ऐसा हुआ कि झगड़े में दोनों एक-दूसरे को मारकर, खुद भी मर गए।”

पारसनाथ की नजरें महाजन पर थीं।

 
“दूसरे जन्म में देवराज चौहान और बेबी मिल गए। उनकी शादी हो गई। पंजाब के लुधियाना में दोनों ने जीवन बिताया। प्यार-भरा जीवन, ऐसा कि एक को चोट लगे और दूसरे को दर्द हो और तीसरा जन्म अब चल रहा है। दोनों एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं। एक-दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते। बेबी तो मौका ढूंढ़ती है कि कब देवराज चौहान के सामने पड़ने का मौका मिले। उसका नाम सुनकर ही बेबी का दिमाग खराब हो जाता है।” | (पाठको! देवराज चौहान और मोना चौधरी के पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से जानने के लिए पढ़े राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित देवराज चौहान और मोना चौधरी एक साथ वाले पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘हमला', जालिम’, ‘मास्टर’, ‘सरगना’, ‘गुड्डी' और 'मंत्र')

“अब हमें देवराज चौहान और मोना चौधरी को आमने-सामने नहीं पड़ने देना चाहिए पारसनाथ ।”

पारसनाथ कुछ न बोला। महाजन ने व्याकुलता से पहलू बदलकर पूंट भरा फिर बोला। “क्या सोच रहे हो?”

“मोना चौधरी ने इरादा कर लिया है देवराज चौहान को मारने का तो हमारे कहने पर वो पीछे नहीं हटेगी।”

उसे पीछे हटाना होगा। ये जरूरी है वरना...।” तभी उनके कानों में किसी के आने की आवाज उभरी।

सितारा आ गई होगी।” पारसनाथ बोला। उसी पल मोना चौधरी ने कमरे में प्रवेश किया। पारसनाथ और महाजन चौंके।

बेबी तुम?” महाजन कह उठा। मोना चौधरी ने दोनों को देखा फिर एक कुर्सी पर बैठती कह उठी।

कहो पारसनाथ, क्या बात है?

” बात?" पारसनाथ ने गम्भीर नजरों से मोना चौधरी को देखा।

तेरे को कैसे पता चला कि मैंने देवराज चौहान को मारने का काम हाथ में लिया है?”

मैंने तुम्हें ऐसा तो नहीं कहा था।” ।

परंतु मुझे फोन करने से पहले ही, तुम जान चुके थे कि असल बात क्या है।” मोना चौधरी का स्वर शांत था।

“हां, मालूम हो चुका था।”

ये बात किसने बताई तुम्हें?

” देवराज चौहान ने ।

” मोना चौधरी बुरी तरह चौंकी। पल भर के लिए सन्नाटा आ ठहरा वहां। फिर मौना चौधरी का चेहरा क्रोध से धधक उठा।

“शांति बेबी, शांति...।” महाजन हाथ उठाकर बोला।

“वो तुमसे कहां मिला?” मोना चौधरी के होंठों से गुर्राहट निकली।

मेरे पास आया था।”

“तो जब तुमने बात की मुझसे, तब वो तुम्हारे पास था?” मोना चौधरी के दांत भिंचे थे।

“और तुमने मुझे नहीं बताया?

" “नहीं ।”

क्यों?” मोना चौधरी की आवाज तेज हो गई।

क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम और देवराज चौहान आमने-सामने पड़ो।”

“पारसनाथ, ये तुमने गलत...।” ।

दिमाग ठंडा रखो बेबी—हमें भी...

” “तुम चुप रहो महाजन—मैं...।”

क्यों चुप रहूं? मैं तुम्हारे पास बात करने आने ही वाला था।”

क्या बात...?

” यही कि देवराज चौहान वाला काम हाथ में मत लो, ये ठीक नहीं।”

क्या खराबी है इस काम में?” मोना चौधरी ने कठोर स्वर में कहा।

“ये तुम भी जानती हो ।” महाजन गम्भीर हो गया।

मोना चौधरी ।” पारसनाथ बोला-“तुम्हारा और देवराज चौहान का जब-जब झगड़ा हुआ, तब-तब हम पूर्वजन्म की दुनिया में जा पहुंचे और वहां जो हादसे हमारे साथ पेश आते हैं, वो तो...”

तो तुम दोनों इस झगड़े से अलग रहो।”

“नहीं रह सकते। क्योंकि पूर्वजन्मों में भी हम तुम्हारे साथी थे, दोस्त थे और अब भी हैं। हम...।”

“ये मेरा और देवराज चौहान का मामला है।” मोना चौधरी ने धधकते स्वर में कहा।

 
“नहीं, ये हम सब से जुड़ा मामला है।”

बेबी।” महाजन गम्भीर स्वर में बोला-“देवराज चौहान का नाम सुनकर तुम्हारा दिमाग क्यों खराब हो जाता है?”

“मैं नहीं जानती। बस तब मेरा मन करता है कि देवराज चौहान को मार दें। वो मेरे हाथ से बचेगा नहीं।”

“ठंडे दिमाग से काम लो बेबी। देवराज चौहान कभी भी तुम्हारे रास्ते में नहीं आया। तुम ही उसके रास्ते में...।”

पारसनाथ।” मोना चौधरी कह उठी-“देवराज चौहान ने तुमसे क्या बात की?”

वो तुम्हारा पता जानना चाहता था कि इस मामले का निबटारा कर ले ।” पारसनाथ कह उठा।

और तुमने उसे मेरा पता नहीं दिया।”

“मैं कभी नहीं दूंगा।”

उसे कैसे पता चला कि मैंने ये काम हाथ में लिया है?” मोना चौधरी बोली।

“मालूम नहीं।”

मोना चौधरी ने फोन निकाला और सपन चड्ढा का नम्बर मिलाया।

बात हो गई।

मैं मोना चौधरी–तुम...।” । “और तुम...तुमने मार दिया देवराज चौहान को?”

“मैंने तुमसे सप्ताह का समय लिया है। ये काम इतनी जल्दी नहीं होते।”

तब तक वो कहीं मेरे को न मार दे।” सपन चड्ढा की आवाज कानों में पड़ी।

“अपने को छिपाकर रखो। ये बताओ कि तुमने किससे इस बात का जिक्र किया कि मैं देवराज चौहान को मारूंगी?"

“किसी से भी नहीं ।”

“तो देवराज चौहान को कैसे पता चल गया कि मैं उसकी तलाश में हूं?” मोना चौधरी ने सख्त स्वर में कहा।

“हैरानी है। उसे कैसे पता चल गया?” सपन चड्ढा की आवाज कानों में पड़ी।

मोना चौधरी ने उखड़े अंदाज में फोन बंद कर दिया।

“ये काम छोड़ दो बेबी। तुम्हारा और देवराज चौहान का आमने-सामने पड़ने का अंजाम खतरनाक है।”

“मैं इस बार उसे खत्म कर देंगी।” मोना चौधरी ने दांत किटकिटाए–“वो नहीं बचने वाला मेरे हाथों से। इस मौके को मैं हाथ से नहीं जाने देंगी।”

“बात को समझो बेबी, तुम्हारी जिद की वजह से हमें पूर्वजन्म की दुनिया में न प्रवेश करना पड़ जाए!

डर लगता है पूर्वजन्म में जाने से?" वहां हर बार ऐसे हादसे सामने आते हैं कि...।”

तुम दोनों खुद को, मुझसे दूर रखो।” मोना चौधरी ने सपाट स्वर में कहा-“ये मेरा मामला है। मैं देवराज चौहान को खत्म करके रहूंगी। जाने क्यों, जब भी उसका नाम मेरे सामने आता है, तूफान-सा उठ खड़ा होता है, मेरी जिंदगी में ।”

“मोना चौधरी। तुम्हें इस काम से पीछे हट जाना...।”

कभी नहीं।” मोना चौधरी गुर्रा उठी।। महाजन और पारसनाथ ने मोना चौधरी को बहुत समझाया। परंतु वो अपने इरादे पर टिकी रही। पक्की रहीं। आखिरकार वो उखड़े मन से वहां से चली गई। महाजन और पारसनाथ की नजरें मिलीं।।

मैं पहले ही जानता था कि मोना चौधरी नहीं मानेगी।” पारसनाथ ने कहा।

जैसे भी हो, बेबी को इस रास्ते पर जाने से रोकना होगा।” महाजन बेचैन था।

“मुझे नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा।”

ऐसा करना जरूरी है पारसनाथ।” महाजन ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा–“हम देवराज चौहान को समझाने की चेष्टा कर सकते हैं।”

पारसनाथ अजीब-से ढंग से मुस्करा पड़ा।

“क्या हुआ?”

मोना चौधरी अपनी होकर हमारी बात नहीं मान रही तो देवराज चौहान क्यों हमारी बात सुनेगा?"

लेकिन हमें कोशिश अवश्य करनी चाहिए।” महाजन बोला-“देवराज चौहान अपना कोई पता छोड़ गया है?"

नहीं ।”

“ओह, तुम्हें उसका फोन नम्बर जरूर ले लेना चाहिए था। जाने वो दिल्ली में कहां है। वो किस जगह पर हो सकता है या किसी होटल में भी। हम दोनों उसे ढूंढते हैं। तुम डिसूजा को भी इसी काम पर लगा दो।” महाजन ने कहा और सामने रखा गिलास उठाकर एक ही सांस में खाली करके उठता कह उठा–“देवराज चौहान की कोई खबर मिले तो बताना, वैसे अक्सर वो होटल वगैरह में ठहरने के लिए सुरेंद्र पाल नाम का इस्तेमाल करता है।”

“मैं अभी डिसूजा को इसी काम पर लगा देता हूं। परंतु आशा नहीं कि देवराज चौहान मिल जाए।”

। “कोशिश करो। मैं भी कोशिश करता हूं।” कहने के साथ ही महाजन बाहर निकलता चला गया।

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जगमोहन को आधे घंटे में ही होश आ गया था।

वहां धूप का धुआं फैला था। उस धुएं में पोतेबाबा की आकृति को मौजूद होने का एहसास न हुआ।

जगमोहन उठ बैठा। सिर पर हाथ फेरा। ‘सामने वाले से निबटने के दांव-पेंच भी जानता है साला। जगमोहन बड़बड़ाया।

जगमोहन ने कमरों का—किचन का चक्कर लगाया। परंतु पोतेबाबा की मौजूदगी का कहीं भी एहसास न हुआ। वापस सोफे पर आ बैठा।

पोतेबाबा के बारे में सोचा तो यहीं महसूस हुआ कि वो कोई शातिर है। आसानी से पकड़ में नहीं आने वाला। उसके पीछे पड़ा है कि उसे, उसके इरादे से हटा दे। जथूरा को अपना मालिक कहता है।

जथूरा? | पोतेबाबा का कहना है कि उसका जथूरा पर एहसान है, इसलिए वो उसे कुछ नहीं कहता। | जगमोहन ने सिर को झटका दिया, ये सोचकर कि वो किन खयालों में उलझा रहा है। क्योंकि वो न तो पोतेबाबा को जानता था और न ही जथूरा को । पोतेबाबा का कहना है कि पूर्वजन्म से आया है। इस वक्त जगमोहन को पूर्वजन्म की कोई बात याद नहीं आ रही थी। जगमोहन उठ खड़ा हुआ। वो ये सब नहीं सोचना चाहता था।

इस मौके पर देवराज चौहान की कमी महसूस कर रहा था जगमोहन । जो कि दिल्ली में था। परंतु ये सब बताकर वो देवराज चौहान को डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था। यहीं सोचता था कि देवराज चौहान कभी भी लौट सकता था।

यही वो पल थे कि जगमोहन के मस्तिष्क में बिजली कौंधी।

वो दोनों हाथों से सिर थामे सोफे पर बैठा। आंखें खुद-ब-खुद ही बंद होती चली गईं। | फिर उसके मस्तिष्क में एक कमरे का दृश्य उभरा। कमरे में बहुत कम रोशनी थी। दरवाजे, खिड़कियां बंद थे। उसकी आंखों के सामने कुछ चेहरे उभरे। एक युवक का, औरत का, युवती का और पचपन-साठ बरस के आदमी का चेहरा। कमरे की हालत देखकर जाने क्यों डर-सा लग रहा था। फर्श पर, दीवारों पर, सिंदूर ही सिंदूर बिखरा था।

हर तरफ लाली थी। कमरे के बीचोबीच ईंट लगाकर हवनकुंड बना रखा था, जिसमें रखी चंदन की लकड़ी सुलग रही थी, उसका धुआं कमरे में भरा था। बूढ़ा-बूढ़ी और युवती बैठे थे, जबकि कच्छा पहने युवक के हाथ में चाकू था। उसके गले में अजीब-सी मालाएं थीं, माथे पर चंदन का और सिंदूरी रंग का अव्यवस्थित तिलक लगा हुआ था।

“अब मेरी सिद्धि पूर्ण होने जा रही है। सिर्फ नरबलि की जरूरत है।” वो युवक दबे स्वर में गुर्रा उठा और चाकू हाथ में घुमाकर उन तीनों को देखा–“बोल कौन देगा अपनी बलि?"

बूढ़ा-बूढ़ी और युवती के चेहरे पर भय के भाव उभरे।

ये बुढ़िया अपनी बलि देगी। बहुत उम्र भोग ली है इसने ।” कहकर वो बुढ़िया की तरफ झपटा।।

बुढ़िया डर से चीखकर बोली। ये क्या कह रहा है सतनाम? मैं तेरी मां हूं।” ।

चुप कर बुढ़िया। मेरी मां तो काली है। मेरी सिद्धि पूरी होने वाली है। मां काली को जीतने की सिद्धि पूरी होते ही, काली मां की शक्तियां मेरे में आ जाएंगी। रात सपने में आकर काली मां ने यही कहा था।” सतनाम नाम के युवक ने कहते हुए अपनी मां की बांह पकड़ी और खींचा। ईंटों के हवनकुंड के पास ले आया।

वो बूढ़ी औरत चीखी।

“तू पागल हो गया है।” बूढ़े आदमी ने गुस्से से कहा-“क्या तू अब अपनी मां की जान लेगा?”

ये बलि है, नरबलि ।” युवक ठहाका लगाकर हंसा।

कमीने।” वो आदमी उठता हुआ बोला—“अभी तेरे को बताता हूं मैं तुझे...”

क्रोध में वो युवक पर झपटा। तभी युवक ने चाकू उसके पेट में घुसेड़ दिया। वो आदमी चीखा। उधर बैठी युवती भी भय से चीख उठी। “भैया-ये क्या कर रहे हो?"

चुप कर। काली मां प्रसन्न हो जाएगी। दो-दो बलि मिल रही है काली मां को।” उसने दांत पीसकर कहा और हाथ में थामा

खून से रंगा चाकू उस बूढ़ी औरत के गले पर चला दिया। | बूढ़ी औरत तड़पकर नीचे जा गिरी।

आदमी पहले ही चाकू लगने से, नीचे गिरा पड़ा था। ये वहशी खेल देखते ही युवती चीखी और तेजी से दरवाजे की तरफ दौड़ी।

परंतु युवक ने झपटकर उसे पकड़ा और उसके मुंह पर हाथ रख दिया।

 
युवती तड़पी। उसकी आंखें जैसे फटकर बाहर को आ रही थीं।

“तू कहां जाती है? तीसरी बलि मैं तेरी दूंगा। काली मां की शक्तियों को मैं सिद्ध कर लूंगा। फिर...”

युवती किसी तरह अपने होंठों से उसका हाथ हटाकर बोली। छोड़ दो मुझे।” वो रो पड़ी—“मैं तेरी बहन हूँ मैं...

” तेरा ही तो भला कर रहा हूँ मैं ।

” म...मेरा भला?" वो कांपी।

हां। तेरा रिश्ता दो बार टूट चुका है। मैं मां काली की शक्तियों को सिद्ध कर लूंगा तो फिर सबको अपने इशारों पर नचाऊंगा। बहुत बड़े घर में तेरी शादी करूंगा। तू रानी बनकर राज करेगी।

“तुम तो मुझे मार रहे...?"

“पगली, मार नहीं रहा। बलि दे रहा हूं। मेरी सिद्धि पूरी होते ही, मम्मी-पापा और तू फिर से जिंदा हो जाओगे। बस, कुछ देर की तो बात है, उसके बाद तो सुख ही सुख है।” युवक ने कहा

और फुर्ती से युवती के गले पर चाकू चला दिया। | जगमोहन के मस्तिष्क में एक घर दिखाई दिया। बाहरी गेट । गेट के भीतर एक अखबार पड़ा था रबड़ लगा, जिस पर 2 तारीख छपी थी। गेट के पास नाम की पट्टी लगी थी, उस पर भंडारी निवास' लिखा था।

तभी जगमोहन के मस्तिष्क में कौंधती बिजली शांत पड़ती चली गई।

फिर जैसे सब कुछ सामान्य होता चला गया।

उसे लगा जैसे मस्तिष्क में छोटा-सा तूफान उठा था, जो कि थम गया।

जगमोहन ने सिर से दोनों हाथ हटा लिए। आंखें खोल लीं। हर तरफ निगाह मारी, सब ठीक लगा उसे। परंतु कुछ भी ठीक नहीं था।

आने वाले वक्त की भयानक तस्वीर उसका मस्तिष्क देख चुका था। एक बेटा सिद्धि के पागलपन में अपने मां-बाप और बहन की जान लेने जा रहा था। वो जैसे खुद को काली मां की शक्तियों का सप समझ रहा था। उसे लग रहा था कि उसने भगवान को पा लिया है, सिर्फ नरबलि की जरूरत है।

वो अखबार दो तारीख का था। रबड़ लगा अखबार था तो इसका मतलब सुबह का वक्त था वो। गेट के पास नाम की प्लेट लगी थी जिस पर भंडारी निवास लिखा था।

आज एक तारीख थी। दो तारीख आने में रात भर का वक्त था और दिन के कुछ घंटे। उसे कुछ करना होगा।

वो इस तरह पागलपन के शिकार उस युवक के हाथों बे-गुनाहों को नहीं मरने देगा।

उस युवक का नाम सतनाम था।

अगले ही पल जगमोहन चौंका। भंडारी निवास मुम्बई में कहां पर पड़ता है, इस बात का तो उसके मस्तिष्क में एहसास नहीं हो सका था। उस मकान का पता तो उसे मालूम नहीं था। | ओह, इस बार उसके मस्तिष्क को हादसे के ठिकाने का एहसास क्यों नहीं हुआ?

ऐसी स्थिति में वो कैसे रोक पाएगा इस हादसे को?

पोतेबाबा ये ही तो चाहता था कि हादसों को रोकने का क्रम वो एक बार न करे तो उसके द्वारा शुरू हुआ ये सिलसिला फिर कमजोर पड़ता चला जाएगा।

उस घर का पता कैसे लगाए?

“जग्गू ।”

जगमोहन फौरन चिंहुककर खड़ा हो गया। ये पोतेबाबा की आवाज थी। आसपास देखा।

| कुछ दूरी पर धूप के धुएं में उसे पोतेबाबा की कंधों और छाती की आकृति दिखाई दी।

 


“तू फिर आ गया?” जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहा।

“अब क्या करेगा तू?” पोतेबाबा की आवाज उसे सुनाई दी।

“अब...क्या मतलब?”

तेरे को ये तो पता चल गया कि जथूरा द्वारा रचा गया हादसा कौन-सा होने जा रहा है।”

“हां, पता चल गया।”

परंतु ये हादसा कहां होगा ये नहीं पता तेरे को। अब उस हादसे को कैसे रोकेगा?”

जगमोहन के होंठ सिकुड़े। “तेरे को कैसे पता कि मुझे हादसे वाला घर नहीं पता?” पोतेबाबा हौले-से हंस पड़ा।

क्योंकि जथूरा की तरफ से हादसा तो तैयार करके छोड़ दिया गया, लेकिन हादसे का ठिकाना नहीं छोड़ा अभी। अभी तो तेरे तक हादसे की खबर पहुंचाने वाली शक्ति को भी नहीं पता चल सका कि ये सब कहां होगा।” ।

इस वक्त हादसा कहां है?"

“इस दुनिया में पहुंच चुका है, परंतु उसके साथ पता-ठिकाना न होने की वजह से वो आकाश में मंडरा रहा है।”

“तू कहना चाहता है कि जथूरा ने जानबूझकर, हादसे के साथ पता नहीं छोड़ा कि मुझे मालूम न हो सके?”

ठीक समझा तू।

” “फिर तो हादसा बेकार गया। वो काम कैसे करेगा, बिना पते

वक्त आने पर उस हादसे पर, पते-ठिकाने की छाया डाल दी जाएगी।” पोतेबाबा की आवाज कानों में पड़ी।

तब मेरे को पता चल जाएगा।”

अवश्य पता चल जाएगा, परंतु तब तेरे पास वक्त कम होगा, उस हादसे को रोकने का ।”

जगमोहन के होंठ भिंच गए।

तू हादसे वाली जगह तक पहुंच भी नहीं सकेगा शायद, तब तक सब कुछ घट जाएगा।”

आखिर तुम्हें ये सब करके मिलता क्या है?

ये जथूरा का कर्म है। यहीं सब करने के लिए तो उसने ताकतें हासिल की हैं। जथूरा हादसों का देवता है।”

ये गलत है।”

“तुम ये कहते हो जग्गू। लेकिन जहां इतने लोग रहेंगे, वहां हादसे तो होंगे ही”

“सामान्य हादसे होंगे।

जथूरा तो सोच-समझकर हादसों को तैयार करके भेजता है।

ऐसा करना बंद कर दो।”

जगमोहन ने सख्त स्वर में कहा-“ये सब करना इंसानों पर जुल्म करना है।”

“तुम्हें कब से इंसानों की चिंता होने लगी?” पोतेबाबा की आवाज में व्यंग आ गया था।

इस वक्त पोतेबाबा के चेहरे की आकृति धूप के धुएं में स्पष्ट नजर आने लगी थी।

“मुझे क्यों नहीं चिंता होगी, मैं भी इंसान हूं और उन्हीं के बीच रहता हूं।”

तो तुम रोक लो हादसों को।” जगमोहन के होंठ भिंच गए।

तुम या वो शक्ति, जो तुम्हें पूर्वाभास करा रही है, जथूरा का मुकाबला नहीं कर सकते। जथूरा के पास बहुत चालाकियां हैं, बहुत कुछ है जथूरा के पास कि तुम सोच भी नहीं सकते।” पोतेबाबा के होंठ हिलते दिखे जगमोहन को ।। | धुआं वहां से हटता जा रहा था तो पोतेबाबा की आकृति भी जैसे हवा में गुम होती जा रही थी।

जगमोहन की गुस्से से भरी निगाह उसकी गुम होती आकृति पर थी।

मैं हादसे वाली जगह पर, वक्त रहते पहुंच जाऊंगा।” जगमोहन ने कड़वे स्वर में कहा।

वो कैसे जग्गू?”

ये हादसा ऐसा नहीं है कि पांच मिनट में कराया जा सके।” जगमोहन बोला—“जथूरा का तैयार किया हादसा, पहले उस सतनाम नाम के युवक का मन बदलेगा। इसमें काफी वक्त लगेगा। फिर वो काली मां की सिद्धि पाने के लिए हवन की तैयारी करेगा। तरह-तरह का सामान लाएगा। सुबह के वक्त ये हादसा होगा तो जाहिर है कि आज दिन में ही वो सामान लाएगा। तैयारी करेगा। ये तभी होगा, जब हादसा मुनासिब वक्त के रहते, उस तक पहुंच जाए।”

पोतेबाबा के हंसने की आवाज आई।

 
अब उसकी आकृति नजर नहीं आ रही थी। नासमझ है तू।” पोतेबाबा की आवाज सुनाई दी।

मैंने गलत क्या कहा?”

“तूने ये नहीं सोचा कि उस युवक का मन पहले ही बदला जा चुका हो। उसने जरूरत का सारा सामान पहले ही घर पर ला रखा हो और अपने इरादे पूरे करने के लिए वो मौके की तलाश में हो। यानी कि हादसा उसके मन पर सवार होगा तो वो तैयारी शुरू कर देगा, काली मां की ताकतों की सिद्धि पाने के लिए। अपने परिवार वालों को कहेगा कि वो घर के सुख के लिए हवन कर रहा है। इसलिए उसके साथ बैठे। हादसा दो घंटों में सब कुछ खत्म कर देगा वहां ।”

“दो घंटे।” जगमोहन शब्दों को चबाकर बोला—“मुम्बई में कहीं भी पहुंचने के लिए दो घंटे बहुत हैं।”

“कम हैं। मुम्बई शहर बहुत लम्बा है। सफर करते रहो, खत्म नहीं होता।” ।

“तब रात या सुबह का वक्त होगा, जब मुझे हादसे की जगह के बारे में पता चलेगा तब ट्रेफिक कम होता है सड़कों पर। मैं पहुंच जाऊंगा।”

“भूल में है जग्गू। इस बार तू कुछ नहीं कर सकेगा।” पोतेबाबा के हंसने की आवाज आई।

तभी होंठ भींचे जगमोहन उधर झपटा, जिधर पोतेबाबा के होने का अंदाजा था।

परंतु जगमोहन लड़खड़ाकर रह गया। पोतेबाबा हाथ नहीं आया। मुझे ढूंढ़ रहा है जग्गू?” जगमोहन पलटा और कुछ दूरी पर पोतेबाबा की आधी-अधूरी आकृति को देखा।

मेरे से तू मुकाबला नहीं कर पाएगा जग्गू।”

“क्योंकि तू डरपोक है।” जगमोहन गुर्राया—

“डरकर भाग जाता...।” ।

“नहीं भागता–आ।” ।

जगमोहन ने दो पल उसकी आकृति को घूरा फिर सावधानी से आगे बढ़ने लगा।

पोतेबाबा की आकृति अपनी जगह पर ही रही।

आ जग्गू। डरता क्यों है?” आकृति के होंठ हिले । जगमोहन एकाएक वेग के साथ उसकी तरफ दौड़ा। जगमोहन का इरादा उससे लिपटकर, उसे जकड़ लेने का था। परंतु पोतेबाबा को उसने कम आंका था।

जगमोहन का शरीर आगे खड़े पोतेबाबा के हाथ से टकराया और लड़खड़ाकर थम गया। अगले ही पल उसके सिर पर हाथ का जोरदार प्रहार हुआ तो जगमोहन लुढ़ककर नीचे जा गिरा। सिर झनझना उठा था। तभी जगमोहन ने दूर होती कदमों की आहटें सुनीं।

वो समझ गया कि पोतेबाबा जा रहा है।

जगमोहन ने सिर को झटका दिया और उठ बैठा। हाथ से सिर को दबाया, जहां हाथ पड़ा था पोतेबाबा का।

बहुत बड़ा कमीना है ये पोते बाबा।' जगमोहन बड़बड़ा उठा। अगले ही पल उसकी सोच होने वाले हादसे की तरफ चली गई।

जगमोहन सोहनलाल के यहां पहुंचा। | फ्लैट की कॉलबेल बजाई तो कुछ पलों बाद दरवाजा खुला। शाम के छः बज रहे थे और सोहनलाल ने नाइट सूट पहना हुआ था। भीतर से टी.वी. चलने की आवाज आ रही थी।

“आ।” कहता हुआ सोहनलाल पीछे हटा तो जगमोहन भीतर प्रवेश कर गया।

सोहनलाल ने दरवाजा बंद किया। “आज इधर का रास्ता कैसे भूल गया?” सोहनलाल बोला।

“यूं ही।” जगमोहन आगे बढ़कर सोफे पर जा बैठा।

सोहनलाल ने टी.वी. बंद करते हुए कहा। “देवराज चौहान कैसा है?”

ठीक है, दिल्ली में है। आजकल में आ जाएगा।”

क्या लेगा–ठंडा-गर्म या...?”

“कॉफी।”

सोहनलाल ने सिर हिलाया और किचन की तरफ बढ़ गया।

जगमोहन ने पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बंद कर ली। पांच मिनट में ही सोहनलाल कॉफी बना लाया।।

 
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