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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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ले ।” सोहनलाल ने कॉफी का प्याला टेबल पर रखा और अपना लेकर सामने ही बैठ गया—“क्या बात है?"

बात?" जगमोहन ने आंखें खोलकर उसे देखा।

“या तो तू थका हुआ है, या किसी उलझन में है। तेरा चेहरा बता रहा है ये...।”

जगमोहन ने कॉफी का प्याला उठाकर घूट भरा। सोहनलाल ने भी सिप ली।

मैं एक-दो दिन से अजीब-से हालातों में फंसा पड़ा हूं।” जगमोहन बोला।

मुझे बता क्या अजीब है?”

तेरे को यकीन नहीं आएगा सुनकर ।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।

सुना तो सही।” सोहनलाल के होंठ सिकुड़े। मैं पूर्वजन्म के मामले में फंस चुका हूं।” सोहनलाल के हाथ में थमा कॉफी का प्याला जोरों से हिला।

पूर्वजन्म?” सोहनलाल हड़बड़ाया–

“ये तू क्या कह रहा है?”

मेरे सामने जो हालात हैं, उसी के हिसाब से कह रहा हूं। तुझे जथूरा नाम याद है पूर्वजन्म का?”

जगमोहन को देखते सोहनलाल ने गम्भीरता से इंकार में सिर हिलाया।

पोतेबाबा?” ।

“ये भी नहीं। लेकिन हुआ क्या?” सोहनलाल ने व्याकुल भाव में पूछा।

जगमोहन सारी बातें बताता चला गया कि कैसे हादसों का पूर्वाभास उसे होने लगा है और अदृश्य होता कोई पोतेबाबा उसके पास आ रहा है। सारी बातें, सब कुछ बताया।

सोहनलाल ने पूरी बात सुनी। ठगा-सा उसे देखता रहा।

जगमोहन ने सतनाम वाले हादसे के बारे में भी बताया, जो होने वाला है।

सोहनलाल ने गोली वाली सिगरेट सुलगा ली। “ये तो बहुत खतरनाक बातें बता रहे हो तुम।” सोहनलाल अजीब-से लहजे में कह उठा।

“मैंने पहले ही कहा था कि सुनकर तुम्हें यकीन नहीं आएगा ।”

यकीन तो आया, परंतु ये सब अजीब-सा है। बहुत ही अजीब।”

विश्वास करने के काबिल नहीं?” ‘

“हां, ये बातें मुझे कोई और कहता तो मैं विश्वास नहीं करता।” सोहनलाल ने कश लिया।

“मैंने जो कहा है सच कहा है।” जगमोहन गम्भीर था।

जानता हूं।” सोहनलाल ने सिर हिलाया—“पोते बाबा ने जथूरा के बारे में कुछ नहीं बताया?” ।

जो बताया, वो तुमसे कह दिया है।

” एक बात मेरी समझ में नहीं आई।” सोहनलाल बोला।

“क्या?”

“हादसे तो मुम्बई में कदम-कदम पर होते हैं, हर सेकंड कुछ-न-कुछ होता है, परंतु तुम्हें चुनिंदा हादसों का ही पूर्वाभास क्यों हो रहा है? बाकी हादसों का पूर्वाभास तुम्हें क्यों नहीं, हो रहा?”

“इसका जवाब मेरे पास नहीं है।”

पोतेबाबा से नहीं पूछा?" ।

नहीं, फिर वो मुझे बताएगा ही क्यों?" जगमोहन ने सोच-भरे स्वर में कहा“वो नहीं चाहता कि मैं जथूरा के कामों में खलल डालें। वो मुझे इस रास्ते से हटाने की चेष्टा कर रहा है।”

“और तुम हटना नहीं चाहते।”

“तू ही बता, क्या तेरे को पता हो कि कहीं कोई एक्सीडेंट में मरने वाला है तो तू उसे बचाएगा नहीं?”

| जरूर बचाऊंगा।”

वो ही मैं कर रहा हूं।”

“पोतेबाबा के मुताबिक, तेरी भागदौड़ पूर्वजन्म के सफर की वजह बन सकती है।”

जगमोहन ने होंठ भींच लिए।

पूर्वजन्म की यात्रा खतरनाक है। हम पहले भी कई बार ये दहशत भरा सफर कर चुके हैं और अब नहीं करना चाहते ।”

जगमोहन चुप रहा।

“क्या तुम पूर्वजन्म का सफर करना पसंद करोगे जगमोहन?” सोहनलाल ने पूछा।

“नहीं। वो खतरनाक होता है।”

“ये तो हमारी बात हुई कि खतरनाक होता है, परंतु पोतेबाबा क्यों नहीं चाहता कि हम पूर्वजन्म का सफर करें। वो हमारे इस सफर को शुरू होने से पहले ही रोक देना चाहता है। तुम्हें इन कामों से हटाने पर लगा है?”

जगमोहन चुप रहा। “इस बात की संभावना है कि हमारा सफर पोतेबाबा या जथूरा के लिए तकलीफदेह हो ।”

“ये ही बात है। पोतेबाबा कुछ हद तक स्वीकार कर चुका है। कि मैं पूर्वजन्म वाले हादसों के पीछे भागना छोड़ दें तो मेरा पूर्वजन्म का सफर रुक सकता है और ऐसा होना मेरे और जथूरा दोनों के लिए बेहतर होगा।”

“तुम्हारे लिए तो पता नहीं, परंतु जथूरा के हक में ये अवश्य बेहतर होगा। तभी तो पोतेबाबा तुम्हें रोकने की कोशिश में है।”

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।

 
“तुम्हें इस बारे में देवराज चौहान से बात करनी चाहिए।” सोहनलाल ने कहा।

“वो दिल्ली में किसी काम में है। मेरी बात सुनकर परेशान हो जाएगा। मैं उसे डिस्टर्ब नहीं करना चाहता।”

“तुम इस वक्त खतरनाक हालातों में घिरे हुए हो।”

जानता हूं।

” तुम्हें देवराज चौहान से जरूर बात करनी चाहिए।”

“वो एक-दो दिन में आ जाएगा। तब करूंगा।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।।

सोहनलाल खामोश रहा। सोचों में रहा।

“पोतेबाबा के शरीर में इतनी ताकत है कि उस पर काबू नहीं पाया जा सकता। मैंने दो बार कोशिश की और दोनों बार असफल रहा।"

हम दोनों मिलकर...।

” नहीं, वो हम दो के काबू में भी नहीं आने वाला ।

” “रुस्तम राव और बांकेलाल राठौर को बुला लेते हैं।” सोहनलाल ने कहा।

“शायद बात बने। लेकिन पोतेबाबा अदृश्य है। उसने अदृश्य होने की कोई दवा खा रखी है। वो हमें देख सकता है और हम उसे नहीं देख सकते। वो जान सकता है कि हम क्या कोशिश करने जा रहे हैं।”

“लेकिन हम कोशिश करेंगे।” सोहनलाल तेज स्वर में बोला–अगर हमने पोतेबाबा को बंदी बना लिया तो, उससे बहुत कुछ जाना जा सकता है, जो हम नहीं जानते। हम पूरी तरह अंधेरे में हैं कि क्या होने वाला है।”

पहले पोतेबाबा को हाथ तो आने दो ।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।

सोहनलाल ने फोन उठाया और नम्बर मिलाने लगा।

किसे?” जगमोहन ने पूछा।

रुस्तम राव को और...

” । अभी रुको ।” जगमोहन ने हाथ उठाकर कहा।

सोहनलाल ने फोन बंद कर दिया। क्यों?” सोहनलाल ने उसे देखा।

ये काम कल सुबह के बाद करेंगे। पहले काली मां के बेवकूफ भक्त को देखना है।”

“सतनाम?”

हां ।” परंतु हम नहीं जानते कि वो कहां रहता है और...।” पता चल जाएगा। मुझे उस जगह के बारे में पूर्वाभास अवश्य होगा।”

सोहनलाल गम्भीर दिखा। बोला।

मैं भी देखना चाहता हूं कि तुम्हारे पूर्वाभास का अंजाम कैसा होता है। सच में वो ही होगा, जो तुम महसूस कर चुके हो ।”

हां, वो ही होगा।” जगमोहन मुस्कराया—“मैं भुगत चुका हूं।”

“तो पोतेबाबा कहता है कि कोई शक्ति तुम्हें पूर्वाभास करा रही

हां और वो शक्ति जथूरा की दुश्मन है।”

“वो तुम्हारे सामने क्यों नहीं आती?”

“मैं नहीं जानता।” कहते हुए जगमोहन ने दीवार पर लगी घड़ी में वक्त देखा।

शाम के सात बज रहे थे।

 
अगले बारह घंटों तक, सतनाम अपने मां-बाप और बहन को मार देगा।” जगमोहन ने कहा—“अखबार छ: और सात के बीच तक बांट दिया जाता है। मैंने उस मकान के गेट के भीतर रबड़ लगा अखबार पड़ा देखा था।

“हम कुछ कर सकें, ये इस बात पर निर्भर है कि तुम्हें उस घर के बारे में पूर्वाभास हो जाए।”

“जब हादसे का पूर्वाभास हुआ है तो जगह का भी पूर्वाभास होगा।” जगमोहन ने दृढ़ स्वर में कहा-“पोतेबाबा बोलता है कि मुझे दो घंटे का वक्त मिलेगा और दो घंटों में मैं वहां तक नहीं पहुंच सकता ।” ।

“वो तुम्हारा मनोबल तोड़ना चाहता होगा। तभी ऐसी बातें उसने तुमसे कीं ।”

। “ये हो सकता है।” जगमोहन ने सिर हिलाया-“तुम क्या मेरे साथ चलोगे?” । ।

“हां, पक्का चलूंगा। मैं पूर्वाभास को सच होते, अपनी आंखों से देखना चाहता हूं।”

“ठीक है। मैं यहीं रहूंगा रात में।” जगमोहन बोला—“यहां से हम साथ ही...।”

“ऐसा तो नहीं कि पूर्वाभास तुम्हें सिर्फ अपने बंगले पर ही आए यहां...।”

पहली बार पूर्वाभास मुझे रमजान भाई के यहां हुआ था।

इसलिए ऐसा कुछ नहीं है। यहां भी सब ठीक रहेगा।” जगमोहन ने कहा और आंखें बंद कर लीं। उसके बाद काफी देर तक कमरे में खामोशी रहीं।

“मैं सोच रहा हूं कि पोतेबाबा को हमने बंदी बना लिया तो बहुत अच्छा होगा।” सोहनलाल कह उठा।

“इस बात की कोशिश अवश्य करेंगे। परंतु सफल होने में शक है। पोतेबाबा ताकतवर है।”

इतना ताकतवर कि चार लोगों की पकड़ से बच निकले।

” “कह नहीं सकता।”

रात के दस बज रहे थे। देवराज चौहान होटल के कमरे में था कि उसका फोन बजने लगा।

"हैलो ।” देवराज चौहान ने कॉलिंग स्विच दबाकर फोन कान से लगाया।

मैं लक्ष्मण दास, देवराज चौहान ।” लक्ष्मण दास की आवाज कानों में पड़ी।

कहो ।

” मोना चौधरी का कुछ पता चला?

” नहीं ।

” “वो तुम तक जल्दी ही पहुंचेगी। अभी सपन चड्ढा के मैनेजर से बात हुई। वो कह रहा था कि कल शायद वो मोना चौधरी के बारे में कुछ बताए। मैं उससे इस बारे में ज्यादा नहीं पूछ पाया।”

कोई खबर मिले तो बताना।” कहकर देवराज चौहान ने फोन बंद किया।

तभी दरवाजे पर थपथपाहट पड़ी। देवराज चौहान उठा और दरवाजे के पास आ पहुंचा।

कौन?”

पल-भर की खामोशी के बाद महाजन की आवाज कानों में पड़ी।

नीलू महाजन ।”

 


देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ीं। मोना चौधरी का खास आदमी और यहां?

देवराज चौहान ने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ली और सावधानी से जरा-सा दरवाजा खोला।

महाजन को अकेले खड़ा पाया। दोनों की नजरें मिलीं।

“अकेले हो?” देवराज चौहान ने पूछा।

=

हां ।” महाजन मुस्करा पड़ा।

“कहो।

” वहीं खड़े देवराज चौहान ने कहा।

“भीतर आने को नहीं कहोगे?”

“मैं जानबूझ कर खतरे को बगल में नहीं बिठाता। मोना चौधरी ने तीन करोड़ में मेरे को मारने का काम हाथ में...।”

“पारसनाथ से पता चली ये बात। मैं तुमसे बात करने आया हूं। तुम्हें मारने नहीं आया।” महाजन बोला।

कोई भरोसा नहीं। तुम्हारे पास कोई हथियार है तो निकाल दो।”

महाजन ने जेब से रिवॉल्वर निकाली ।

इसे कमरे के भीतर फेंक दो।” महाजन ने ऐसा ही किया।

“भीतर आओ।” देवराज चौहान ने थोड़ा-सा और दरवाजा खोला। महाजन भीतर प्रवेश कर आया।

महाजन पर निगाह रखे देवराज चौहान ने दरवाजा बंद किया और बोला।

हाथ ऊपर करो। मैं तुम्हारी तलाशी लूंगा।”

महाजन ने दोनों हाथ ऊपर किए। देवराज चौहान ने सतर्कता से उसकी तलाशी ली। कोई हथियार नहीं मिला।

“ठीक है।” देवराज चौहान ने कहते हुए नीचे पड़ी उसकी रिवॉल्वर को ठोकर मारकर दूर किया और अपनी रिवॉल्वर जेब में रख ली। |

महाजन ने हाथ नीचे किए और बोला।

मैं तो सोच रहा था कि तुम नींद लेने के लिए बेड पर चल | गए हो ।”

“मुझ तक कैसे पहुंचे?"

दोपहर से हीं तुम्हें ढूंढ़ रहा था, जब तुम पारसनाथ से मिलकर गए थे तो पारसनाथ ने सारे हालात मुझे बताए। घंटा-भर पहले पारसनाथ के खास आदमी डिसूजा ने बताया कि तुम इस होटल में हो।” महाजन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“तुम्हें ये खबर मोना चौधरी को देनी चाहिए थी।” देवराज चौहान मुस्कराकर बोला।

“मजे मत लो।” महाजन ने गहरी सांस ली।

क्यों—मैंने क्या गलत कह दिया। तीन करोड़ में मोना चौधरी ने मुझे मारने का ठेका...”

“गलत कर रही है बेबी।”

“तो ये बात तुम्हें मोना चौधरी को समझाने की कोशिश करनी चाहिए।”

“समझाया। मैंने और पारसनाथ ने, दोनों ने समझाया, परंतु तुम्हें लेकर वो गुस्से में है। जाने क्यों तुम्हारे नाम पर वो उछलती है।” कहते हुए महाजन ने देवराज चौहान को देखा–“वो पीछे हटने को तैयार नहीं।” ।

मुझसे क्या चाहते हो?” देवराज चौहान ने कहते हुए सिगरेट सुलगाई।।

मैं चाहता हूं तुम ही समझदारी दिखा दो।”

 
देवराज चौहान की निगाह महाजन पर जा टिकी ।

“तुम बेबी को चुनौती के तौर पर मत लो। उसे ढूंढना छोड़ दो। मुम्बई चले जाओ।”

“उससे क्या होगा?”

मुझे और पारसनाथ को वक्त मिल जाएगा कि हम बेबी को शांत कर सकें।”

। “ऐसी कोई वजह नहीं कि मैं तुम्हारी बात मानू ।” देवराज चौहान ने कहा।

“वजह बहुत खतरनाक है, तभी मैं तुम्हारे पास आया देवराज चौहान ।” महाजन ने गम्भीर स्वर में कहा_“जब-जब भी तुम और बेबी आमने-सामने पड़े हो, हमें पूर्वजन्म की दुनिया में प्रवेश करना पड़ा और मैं पूर्वजन्म का सफर अब नहीं करना चाहता, वहां कंपा देने वाले अंजाने खतरे भरे होते हैं, जो कि मेरी समझ से बाहर होते हैं। वो खतरनाक दुनिया है। तुम कुछ दिन के लिए बेबी के सामने मत आओ। तब तक मैं बेबी को समझा लूंगा कि...।”

“तुमने कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारी बात मानूंगा।”

तुम समझदार हो, मेरी बात को समझ...”

क्या मोना चौधरी समझदार नहीं है?” देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।

महाजन देवराज चौहान को देखने लगा। देवराज चौहान ने कश लिया।

मैं इस आशा के साथ तुम्हारे पास आया था कि तुम मेरी बात को मान जाओगे।”

“तीन करोड़ में मोना चौधरी मेरी हत्या करने वाली है। ये बात जानकर मैं छिप नहीं सकता।” देवराज चौहान बोला।

ये जिद है तुम्हारी।।

और मोना चौधरी–उसके बारे में तुम क्या कहोगे?”

वो गुस्से में है, मैं उसे समझा लूंगा।”

तो यहां पर तुम वक्त बर्बाद कर रहे हो, जाकर उसे समझाओ। तुम्हें मेरे पास नहीं आना चाहिए था।”

“समझो मुझे देवराज चौहान, तुम्हारा और बेबी का टकराव, हमेशा पूर्वजन्म की यात्रा का बहाना साबित हुआ है।” महाजन ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा-

“क्या तुम्हें पूर्वजन्म की यात्रा करके खुशी होती है?” ।

डर भी नहीं लगता।” महाजन कसमसा उठा।

देवराज चौहान उठा और टहलने लगा। महाजन की तरफ से वो पूरी तरह सतर्क था।

तुम भी बेबी की तरह बेवकूफ हो।” देवराज चौहान मुस्कराया।

“तुम्हें मेरी बात मानकर पीछे हट जाना चाहिए।”

ये सलाह मोना चौधरी को दो ।”

“तुम मेरी बात की गम्भीरता नहीं समझ रहे तभी...।”

“मैं तो इतना जानता हूं कि तुम्हें मोना चौधरी को समझाना चाहिए। मुझे नहीं। शुरुआत उसने की है। उसे चाहिए था कि वो पार्टी को इंकार कर देती कि मुझे मारने का काम हाथ में नहीं लेगी।”

तुम्हारा जिक्र आते ही बेबी का गुस्सा जाने क्यों सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। किसी की सुनती नहीं वो।”

देवराज चौहान मुस्कराया।

तभी महाजन उठा और नीचे पड़ी अपनी रिवॉल्वर की तरफ बढ़ गया।

देवराज चौहान ने अपनी रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली। | महाजन रिवॉल्वर उठा के पलटा तो देवराज चौहान के हाथ में रिवॉल्वर देखकर कह उठा।

निश्चिंत रहो। मैं तुम्हें इस तरह मारने की सोच भी नहीं सकता।”

देवराज चौहान उसे देखता रहा।

महाजन ने रिवॉल्वर जेब में रखी और दरवाजे की तरफ बढ़ गया। दरवाजा खोला। देवराज चौहान को देखा।

मान जाओ।” महाजन कह उठा।

मोना चौधरी को समझाओ। ये तुम्हारे लिए आसान रास्ता है।”

महाजन बाहर निकल गया। देवराज चौहान ने आगे बढ़कर दरवाजा बंद कर दिया।

 
जगमोहन गहरी नींद में था। एकाएक उसकी नींद खुल गई। उसने आंखें खोलकर हर तरफ देखा। कमरे में नाइट ब्लब जल रहा था। मध्यम-सी रोशनी फैली थी। उसने दीवार पर टंगी घड़ी में वक्त देखा, साढ़े तीन बज रहे थे। वो समझ नहीं पाया कि उसकी नींद क्यों खुली। क्या कोई आहट या शोर हुआ था? । पास में सोए सोहनलाल को देखा। सब ठीक पाकर जगमोहन ने आंखें बंद कर लीं। ठीक इसी पल उसके मस्तिष्क में ‘झमाका सा हुआ। बिजली की तीव्र चमक कौंधी। फिर बंद आंखों के पीछे मस्तिष्क में ‘लोअर परेल' का बोर्ड चमका। पास ही में लाल बत्ती थी। इस वक्त सड़क पर इक्का-दुक्का ही ट्रेफिक था। जगमोहन को लगा जैसे कोई उसे अपने साथ ले जा रहा हो। वो सड़क पर कुछ आगे गया तो पास की इमारत से एक गली सीधी जाती दिखी। जिसका ज्यादातर हिस्सा अंधेरे में डूबा था। उसे लगा कि कोई उसे खींचता हुआ गली के भीतर ले गया। गली से बाहर निकला तो पास ही उसने ‘डॉ. मोसेस रोड' का बोर्ड लगा देखा।

वो सड़क पार कर गया। सामने मकानों की कतार बनी नजर आ रही थी। वो कुछ मकान आगे बढ़ा कि एकाएक ठिठक गया। सामने उसी मकान का गेट था जहां सतनाम ने सुबह होते ही अपने मां-बाप और बहन को काली मां के नाम पर मार देना था। वो ही मकान। जगमोहन ने स्पष्ट पहचान लिया था। एकाएक जगमोहन की आंखें खुल गईं। वो उठ बैठा। उसकी सांसें अनियंत्रित-सी थीं। “सोहनलाल ।” जगमोहन ने सोहनलाल को जोरों से हिलाया। सोहनलाल ने तुरंत आंखें खोलीं। जगमोहन को देखा।

क्या बात है?” सोहनलाल नींद में था।

हमें चलना है अभी–फौरन ।” जगमोहन बेड से उतरता हुआ कह उठा।

कहां?”

लोअर परेल, डॉ. मोसेस रोड पर वो घर है, जहां सतनाम अपने मां-बाप और बहन को मारने वाला है।”

ओह, तो तो तुम्हारे दिमाग में कुछ हुआ?” सोहनलाल पूरी तरह नींद से बाहर निकल आया। ।

“हां, मुझे उस घर का रास्ता दिखाया गया है। लोअर परेल हम कब तक पहुंच सकते हैं?” जगमोहन ने पूछा।

एक घंटे में।” फिर तो हमारे पास वक्त है। फौरन चलने की तैयारी करो।”

लाल बत्ती के पास लोअर परेल' का वो ही बोर्ड देखा जगमोहन

ठीक है, यहां से थोड़ा आगे चलो।” जगमोहन बोला–“बाईं तरफ गली है। कार वहां ले लेना।”

सोहनलाल ने ऐसा ही किया। कार गली में प्रवेश कर गई।

“अब हमें गली से बाहर निकलना है।” जगमोहन बोला।

रात के इस वक्त हर तरफ सुनसानी छाई हुई थी। कभी-कभार ही कोई वाहन सड़क से निकल जाता था।

सोहनलाल कार को गली से बाहर ले आया।

बस, यहीं रोक दो।” जगमोहन सड़क पार सामने मकानों की कतार देखता कह उठा–“पास ही वो मकान है।” ।

दोनों कार से बाहर निकले और सड़क पार करने लगे।

तुम्हें मकान पता है कौन-सा है?” सोहनलाल ने पूछा।

हां, मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे साथ चलकर मुझे वो मकान दिखाया हो ।”

कितनी अजीब बात है।” सोहनलाल ने गहरी सांस लेकर कहा।

सड़क पार करने के बाद वे मकानों के सामने से आगे बढ़ने लगे।

जगमोहन एक कदम आगे था। वो कुछ उत्साह-आवेश में था।

जल्दी ही जगमोहन एक मकान के आगे ठिठका और उसके होंठों से निकला।

ये ही है वो मकान ।

” सोच लो ।

” “ये ही है, पक्का।” जगमोहन ने दृढ़ स्वर में कहते हुए सोहनलाल को देखा–“भीतर वो पाखंडी, पागल-सा होकर, अपनी धूनी रमाए बैठा, बलि देने की तैयारी कर रहा है।”

सोहनलाल के चेहरे पर अजीब-से भाव थे। वक्त क्या हुआ है?” *4.45।” सोहनलाल ने घड़ी पर निगाह मारकर कहा।

वक्त कम है हमारे पास ।” जगमोहन बेचैनी से कह उठा–

“हमें भीतर जाना है।”

 
सोहनलाल की निगाह सड़क के दोनों तरफ घूमी। परंतु वहां कोई चौकीदार, कोई व्यक्ति न दिखा।

वो मकान अंधेरे में डूबा था, जैसे घर वाले गहरी नींद में हों।

चल ।” सोहनलाल ने कहा। दोनों तेजी से आगे बढ़े और गेट फलांग कर भीतर कूद गए।

हर तरफ शांति थी।

दोनों ने उसी पल घर के भीतर प्रवेश करने वाले दरवाजे चैक किए।

सब बंद थे।

कोई दरवाजा खोल सोहनलाल । हमें भीतर जाना है।” जगमोहन ने धीमे स्वर में कहा।

तेरे को पक्का यकीन है कि यही वो घर है, जहां...।

” हां हां, तु बार-बार क्यों पूछता है?”

यहां शांति हैं। कोई आवाज नहीं आ रही। इसलिए मुझे लगता है कि हम गलत घर में...” ।

तू दरवाजा खोल बेवकूफ ।” सोहनलाल के पास इस वक्त कोई औजार नहीं था। ताला खोलने का। उसने आसपास देखा, तभी उसे कपड़े सूखने डालने वाली एल्यूमीनियम की तार लगीं दिखाई दी।

सोहनलाल ने पांच मिनट लगाकर तीन इंच का तार का टुकड़ा तोड़ा और फिर पास आकर दरवाजे के ‘की होल' में डालकर, खास अंदाज से झटका दिया और साथ-ही-साथ हैंडिल दबाया।

दरवाजा खुलता चला गया। दोनों दबे पांव भीतर प्रवेश कर गए।

“धुनाई न हो जाए।” सोहनलाल फुसफुसाया–“छोटे चोरों की तरह दुम दबा के भागना न पड़ जाए।”

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा और आगे बढ़ गया। उनके कदमों की आवाजें न के बराबर उठ रही थीं।

कुछ पलों में ही वो ड्राइंग रूम में खड़े थे। वहां अंधेरा था। परंतु सामने लॉबी में कम रोशनी का एक बल्ब जल रहा था। जगमोहन उस तरफ बढ़ गया। उलझन में फंसा सोहनलाल उसके पीछे था।

लॉबी में पहुंचते ही वे ठिठके। बेहद मध्यम-सी आवाजें उनके कानों में पड़ीं। दोनों की नजरें मिलीं। सोहनलाल ने एक तरफ इशारा किया। वे उस तरफ बढ़े। एक बंद दरवाजे के पास पहुंचकर ठिठके। उनकी सांसों में हवन सामग्री की स्मैल पड़ी । सोहनलाल की आंखें सिकुड़ गईं। उसने जगमोहन का हाथ दबाया। जगमोहन ने दरवाजे पर कान लगाया।

“अब मेरी सिद्धि पूर्ण होने जा रही है। सिर्फ नरबलि की जरूरत है।” सतनाम की धीमी-गुती आवाज जगमोहन ने सुनी–“कौन देगा अपनी बलि?” ।

दो पलों बाद पुनः उसकी आवाज सुनाई दी। ये बुढ़िया अपनी बलि देगी। बहुत उम्र भोग ली है इसने ।”

ये क्या कह रहा है सतनाम। मैं तेरी मां हूं।” औरत का तेज स्वर जगमोहन ने सुना।

वक्त कम् था।

जगमोहन समझ गया कि सतनाम मौत का तांडव शुरू करने जा रहा है।

जगमोहन ने दरवाजे को धक्का दिया तो वो खुलता चला गया। जगमोहन ने तेजी से भीतर प्रवेश किया।

परंतु भीतर का रहस्यमय माहौल देखते ही पल-भर के लिए ठिठका। कमरे में मध्यम-सा प्रकाश था। हर तरफ लाल-लाल सिंदूर बिखरा नजर आ रहा था, जैसे सिंदूर की होली खेली गई हो। दीवारों पर भी सिंदूर के छींटे थे। पूरे कमरे में धूप सामग्री का धुआं और स्मैल फैली थी। सतनाम लम्बा-सा चाकू थामे खड़ा था। नीचे ईंटों के हवनकुंड में, चंदन की लकड़ी पड़ी सुलग रही थी। एक तरफ पचास-साठ की उम्र के बीच के आदमी-औरत बैठे थे और पास ही 24 बस की युवती बैठी थी। | इस तरह दरवाजा खुलता पाकर, किसी को भीतर आते पाकर वे सब चौंके। नजरें घूम। | सतनाम ने लाल-लाल आंखों से जगमोहन और पीछे खड़े सोहनलाल को देखा।

 
कौन है तू?" सतनाम गुर्राया—“तु भीतर कैसे आ गया?” ।

“मुझे मां काली ने भेजा है।” जगमोहन ने उसके हाथ में थमें छुरे को देखा।

क्या-मां काली ने भेजा है तुझे?” सतनाम बुरी तरह चौंका।

“हां, मां काली का कहना है कि वो सतनाम की भक्ति से बहुत प्रसन्न है और उसे जाकर कह दें कि उसे सिद्धि दे दी गई हैं। बिना दिए ही उसकी बलि स्वीकार कर ली गई है।” जगमोहन पूर्ववतः स्वर में बोला।

“सच?” सतनाम खुश हो उठा–“काली मां की शक्तियों की सिद्धि मुझे मिल गई है।”

“अब तुम छुरा हवनकुंड में रख दो ।” जगमोहन पुनः बोला। सतनाम ने शंकित निगाहों से जगमोहन को देखा।

“तुम मां काली पर शक कर रहे हो।”

“नहीं मैं तो पूछ....”

छुरा हवनकुंड में रख ।”

*मां काली कहां है?”

बड़े मंदिर में, छुरा रख और मेरे साथ चल, मां काली आशीर्वाद देने के लिए तुझे बुला रही हैं।”

सतनाम ने फौरन छुरा रख दिया हवनकुंड में।।

चलो, मां काली के पास।”

बूढ़ा-बूढ़ी और युवती हैरानी से ये सब देख-सुन रहे थे।

“आ” ।

सतनाम् जगमोहन और सोहनलाल के साथ कमरे से बाहर निकला।

लॉबी में आते ही जगमोहन ने जोरदार घूसा सतनाम के पेट में मारा। वो कराहकर दोहरा हो गया तो जगमोहन ने उसके सिर के बाल पकड़े और जोरों का चूंसा उसके गालों पर लगाया। वो चीख उठा।

“मेरे लाल को क्यों मार रहे...।” सतनाम की मां ने तड़पकर आगे आना चाहा। उसकी बहन भी आगे आने को हुई।

परंतु सोहनलाल ने उन्हें रोक दिया। “आगे मत बढ़ना।” जबकि सोहनलाल भी हैरान-परेशान था। उधर जगमोहन सतनाम को पीटे जा रहा था।

“उसे मत मारो।” सतनाम का पिता कह उठा–“आखिर उसने क्या किया है?”

“वो आप तीनों की बलि देने वाला था। मार देता आप तीनों को।” सोहनलाल बोला।

क्या कहते हो वो हमारा बेटा है। हमें क्यों मारता?"

“चुप रहो। वो बलि के नाम पर तुम तीनों को मारने जा रहा था। मेरे दोस्त को इस बात का सपना आया और हम दौड़े चले आए। आप तीनों ही किस्मत वाले हैं, जो आप बच गए।” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा।

तीनों की समझ में कुछ नहीं आया। परंतु वो कुछ नहीं बोले ।।

“मुझे तो हैरानी है कि आप तीनों उसके इस काम में शामिल क्यों हो गए?”

सतनाम् ।” बूढ़ा बोला–“सतनाम तो घर की शांति के लिए हवन कर रहा था। वो...।”

“चुप रहो बेवकूफ ।” सोहनलाल ने गुस्से से कहा।

उधर जगमोहन सतनाम की ठुकाई करता गुस्से से कहे जा रहा था।

“बता, कौन-सी काली मां ने तेरे को कहा कि मुझे नरबलि या पशुबलि चाहिए। साले-कमीने, तुम जैसे पागल लोग ही उलटे काम करके भगवानों को बदनाम करते हैं। दुनिया भर का कोई भी भगवान किसी की जान लेकर खुश नहीं होता। और तू काली मां की शक्तियों की सिद्धि पा लेना चाहता है अपने मां-बाप और बहन की हत्या करके। ऐसे शक्तियां मिलने लगतीं तो दुनिया में कोई कमजोर न रहता और तुम जैसे घटिया लोग, एक दिन मां काली की भी बलि दे देते। ये तो अच्छा है कि भगवानों ने ताकतों को अपने हाथों में रखा है, अगर ये ताकतें इस जमीन पर आ जाएं तो एक दिन में ही तुझ जैसे इंसान पूरी दुनिया को बर्बाद करके रख दें।”

सोहनलाल ने आगे बढ़कर जगमोहन को रोका।

 
जगमोहन का चेहरा तप रहा था। पागल सा हो रहा था वो क्रोध में। हांफ रहा था वो।

“बस कर, वो मर जाएगा।” सोहनलाल ने जगमोहन को पीछे किया।

सतनाम बुरे हाल फर्श पर पड़ा कराह रहा था।

बेटा।” उसकी मां तड़पकर उसके पास पहुंची और उसे संभालने लगी।

“आपका बेटा पागल है।” जगमोहन गहरी सांसें लेता कह उटा–“ये बीमारी है, भगवान की शक्तियों को पा लेने की। कई बेवकूफ लोगों को ये बीमारी हो जाती है, इसका इलाज कराओ। वरना ये किसी दिन खुद को मार लेगा या तुम सबको मार देगा।” ।

“सतनाम मेरे बेटे—उठ।” उसकी मां की आंखों से आंसू बह रहे थे।

जगमोहन ने सतनाम के पिता से कहा।

अगर हम न आते तो ये अब तक तुम तीनों की हत्या कर चुका होता ।”

“तुम्हें कैसे पता कि सतनाम ऐसा करता ।”

जगमोहन ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला फिर होंठ बंद कर लिए।

“तू जो करना चाहता था, वो हो गया?” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में पूछा।

जगमोहन ने हां में सिर हिलाया। फिर चल यहां से ।” । जगमोहन ने सतनाम को देखा।

उसकी मां ने, अपने बेटे का सिर अपनी गोद में रख लिया था। उसे पुकार रही थी। तगड़ी ठुकाई हुई थी सतनाम की। होंठ-गाल फट गए थे। खून बह चुका था। पीड़ा से उसका शरीर भरा था। अब वो होश में था। काली मां की शक्तियां प्राप्त करने का बे-सिर-पैर का भूत उसके दिमाग से उतर चुका था।

“आपने भैया को बहुत ज्यादा मारा है।” वो युवती भीगे स्वर में कह उठी।

“इसे होश में लाने के लिए, ऐसा करना जरूरी था।” जगमोहन ने कहा और बाहर की तरफ बढ़ गया।

सोहनलाल उसके साथ चल पड़ा। बाहर दिन का उजाला फैल चुका था।

बंद गेट के भीतर की तरफ रबड़ लगा आज का अखबार पड़ा था।

जगमोहन की निगाह उस अखबार पर पड़ी तो अजीब-से अंदाज में कह उठा।

“सोहनलाल, इसी अखबार ने मुझे बताया था, ये सब आज सुबह-सुबह होगा।”

जगमोहन कार ड्राइव कर रहा था। सोहनलाल बगल में बैठा था।

मेरा तो अभी भी दिमाग खराब हुआ पड़ा है।” सोहनलाल बोला।

क्या मतलब?” जगमोहन बोला।

तुम्हारे पूर्वाभास की बात कर रहा हूं। तुम्हारा पूर्वाभास तुम्हें हादसे के बारे में ही नहीं बताता, बल्कि जगह और वक्त तक का एहसास करा देता है। ये सब कितना आश्चर्यजनक है।” सोहनलाल ने गहरी सांस ली।

“सच में।” जगमोहन मुस्कराया।

“मैंने तुम्हारी बात सुनी तो अविश्वास नहीं किया परंतु सच मानने का भी मन नहीं कर रहा था। लेकिन अब ये सब देखा तो मेरे पास कहने को कुछ नहीं है। तुम सच हो और सही हो ।”

मैं परेशान हूं कि ये पूर्वाभास मुझे क्यों हो रहा है?”

“सच में परेशान होना चाहिए।” सोहनलाल की आवाज में गम्भीरता आ गई–“तुम्हें पोतेबाबा की इस बात को हल्के से नहीं लेना चाहिए कि अगर इसी प्रकार तुम जथूरा के हादसों को बेकार करते रहे तो, ये बस पूर्वजन्म के सफर की शुरुआत हो सकती है।”

“खबर होने के पश्चात मैं किसी को इस तरह मरने नहीं दे सकता। चुप बैठा रहूं, इस बात के लिए मेरा मन नहीं मानता।”

 
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