S
StoryPublisher
Guest
तभी पोतेबाबा की आवाज कानों में गूंजी। “अभी भी वक्त है। मन को समझा ले, वरना बहुत पछताएगा।” जगमोहन के होंठ भिंच गए।
जबकि सोहनलाल तो जैसे उछल ही पड़ा। उसने कार के पीछे वाली सीट पर नजरें घुमाईं।
परंतु वहां कोई न दिखा।
“ये पोतेबाबा है?” सोहनलाल ने अचकचाकर जगमोहन को देखा।
हां। ये ही पोते बाबा है। उसकी आकृति को देखना चाहता है तो सिगरेट सुलगा। धुएं में तू पोतेबाबा की आकृति देखेगा।”
सोहनलाल उसी पल सिगरेट निकालकर सुलगाने लगा।
तेरे क्या हाल हैं गुलचंद?” सोहनलाल पल भर के लिए हड़बड़ाया। गुलचंद सोहनलाल के पूर्वजन्म का नाम था।
तू मेरा नाम कैसे जानता है पूर्वजन्म का?” सोहनलाल के होंठों से निकला।
मैं तो तुझे बहुत अच्छी तरह से जानता हूं।”
“कैसे?” सोहनलाल ने धुआं उगला और गर्दन पीछे घुमा ली। कार में धुआं भरने लगा था। जगमोहन का ध्यान कार चलाने पर था।
“मैं तेरे पूर्वजन्म से ही तो आया हूं, पहचाना नहीं मुझे, पोतेबाबा हूँ मैं।” ।
नहीं पहचाना ।” । तभी सोहनलाल को धुएं में पोतेबाबा की आकृति दिखाई देने लगी। वो आकृति पीछे वाली सीट पर बैठी हुई थी। लम्बी दाढ़ी। पीछे को जाते सिर के बाल । गले में मालाएं। एक कान में कुंडल फंसा लटक रहा था।
“पोतेबाबा मुझे नजर आ रहा है जगमोहन ।” सोहनलाल कह उठा।
“धुएं में उसकी आकृति ।” जगमोहन बोला।
“वो ही, वो ही।” फिर सोहनलाल पोतेबाबा से बोला–“मैंने तुझे पहले कभी नहीं देखा। तेरा नाम भी नहीं सुना।” *
“तो इस वक्त याद नहीं तेरे को पूर्वजन्म की।” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे सोहनलाल को।
“तू देख इसे।” सोहनलाल ने जगमोहन से कहा।
कई बार देख चुका हूं।” जगमोहन कार चलाते बोला। पीछे न देखा।
सोहनलाल की निगाह पोतेबाबा की आकृति पर टिकी थी। वो कुछ हैरान सा था। *
“क्यों जग्गू।” पोतेबाबा की आवाज उभरी–“तू मानता नहीं मेरी बात। जथूरा के कामों को खराब क्यों करता है?”
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।
“मेरी बात को समझ जग्गू। पीछे हट जा । तू भी खुश, जथूरा भी खुश। वरना बुरा होगा। तेरे कदम पूर्वजन्म की यात्रा की ओर बढ़ रहे हैं और वहां पर जथूरा की ताकत देखकर तू कांप उठेगा। वहां जथूरा तुझे बख्शेगा भी नहीं। जथूरा अभी भी इसी चेष्टा में है कि तू मान जाए। वो झगड़ा नहीं करना चाहता।”
“मैं भी झगड़ा नहीं चाहता।” जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।
“तू उसके रास्ते में मत आ। कसम ले ले।”
“जथूरा को चाहिए कि वो इस दुनिया में हादसे की कोशिश बंद कर दे। मेरा रास्ता खुद-ब-खुद ही बदल जाएगा।” ।
“हादसों का देवता, हादसे कराने से कैसे पीछे हट सकता है?” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे।
“तो मैं भी अपने कर्म से पीछे कैसे हट सकता हूं?”
तो तू जथूरा से झगड़ा करके ही रहेगा।”
“मैं जथूरा को नहीं जानता। उसे कभी देखा नहीं, तो मैं उससे झगड़ा क्यों करूंगा।”
सोहनलाल की निगाह एकटक धुएं में दिखाई दे रही, पोतेबाबा की आकृति पर टिकी थी। उसने आकृति को अपनी तरफ देखते पाया तो सतर्क हुआ। तभी पोतेबाबा के होंठ हिले।
गुलचंद । जग्गू तेरी बात अवश्य मानेगा।”
हुक्म कर।”
इसे समझा कि ये जथूरा के कामों के बीच दखल मत दे। उसके हादसों को खराब न करे ।”
जबकि सोहनलाल तो जैसे उछल ही पड़ा। उसने कार के पीछे वाली सीट पर नजरें घुमाईं।
परंतु वहां कोई न दिखा।
“ये पोतेबाबा है?” सोहनलाल ने अचकचाकर जगमोहन को देखा।
हां। ये ही पोते बाबा है। उसकी आकृति को देखना चाहता है तो सिगरेट सुलगा। धुएं में तू पोतेबाबा की आकृति देखेगा।”
सोहनलाल उसी पल सिगरेट निकालकर सुलगाने लगा।
तेरे क्या हाल हैं गुलचंद?” सोहनलाल पल भर के लिए हड़बड़ाया। गुलचंद सोहनलाल के पूर्वजन्म का नाम था।
तू मेरा नाम कैसे जानता है पूर्वजन्म का?” सोहनलाल के होंठों से निकला।
मैं तो तुझे बहुत अच्छी तरह से जानता हूं।”
“कैसे?” सोहनलाल ने धुआं उगला और गर्दन पीछे घुमा ली। कार में धुआं भरने लगा था। जगमोहन का ध्यान कार चलाने पर था।
“मैं तेरे पूर्वजन्म से ही तो आया हूं, पहचाना नहीं मुझे, पोतेबाबा हूँ मैं।” ।
नहीं पहचाना ।” । तभी सोहनलाल को धुएं में पोतेबाबा की आकृति दिखाई देने लगी। वो आकृति पीछे वाली सीट पर बैठी हुई थी। लम्बी दाढ़ी। पीछे को जाते सिर के बाल । गले में मालाएं। एक कान में कुंडल फंसा लटक रहा था।
“पोतेबाबा मुझे नजर आ रहा है जगमोहन ।” सोहनलाल कह उठा।
“धुएं में उसकी आकृति ।” जगमोहन बोला।
“वो ही, वो ही।” फिर सोहनलाल पोतेबाबा से बोला–“मैंने तुझे पहले कभी नहीं देखा। तेरा नाम भी नहीं सुना।” *
“तो इस वक्त याद नहीं तेरे को पूर्वजन्म की।” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे सोहनलाल को।
“तू देख इसे।” सोहनलाल ने जगमोहन से कहा।
कई बार देख चुका हूं।” जगमोहन कार चलाते बोला। पीछे न देखा।
सोहनलाल की निगाह पोतेबाबा की आकृति पर टिकी थी। वो कुछ हैरान सा था। *
“क्यों जग्गू।” पोतेबाबा की आवाज उभरी–“तू मानता नहीं मेरी बात। जथूरा के कामों को खराब क्यों करता है?”
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।
“मेरी बात को समझ जग्गू। पीछे हट जा । तू भी खुश, जथूरा भी खुश। वरना बुरा होगा। तेरे कदम पूर्वजन्म की यात्रा की ओर बढ़ रहे हैं और वहां पर जथूरा की ताकत देखकर तू कांप उठेगा। वहां जथूरा तुझे बख्शेगा भी नहीं। जथूरा अभी भी इसी चेष्टा में है कि तू मान जाए। वो झगड़ा नहीं करना चाहता।”
“मैं भी झगड़ा नहीं चाहता।” जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।
“तू उसके रास्ते में मत आ। कसम ले ले।”
“जथूरा को चाहिए कि वो इस दुनिया में हादसे की कोशिश बंद कर दे। मेरा रास्ता खुद-ब-खुद ही बदल जाएगा।” ।
“हादसों का देवता, हादसे कराने से कैसे पीछे हट सकता है?” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे।
“तो मैं भी अपने कर्म से पीछे कैसे हट सकता हूं?”
तो तू जथूरा से झगड़ा करके ही रहेगा।”
“मैं जथूरा को नहीं जानता। उसे कभी देखा नहीं, तो मैं उससे झगड़ा क्यों करूंगा।”
सोहनलाल की निगाह एकटक धुएं में दिखाई दे रही, पोतेबाबा की आकृति पर टिकी थी। उसने आकृति को अपनी तरफ देखते पाया तो सतर्क हुआ। तभी पोतेबाबा के होंठ हिले।
गुलचंद । जग्गू तेरी बात अवश्य मानेगा।”
हुक्म कर।”
इसे समझा कि ये जथूरा के कामों के बीच दखल मत दे। उसके हादसों को खराब न करे ।”