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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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तभी पोतेबाबा की आवाज कानों में गूंजी। “अभी भी वक्त है। मन को समझा ले, वरना बहुत पछताएगा।” जगमोहन के होंठ भिंच गए।

जबकि सोहनलाल तो जैसे उछल ही पड़ा। उसने कार के पीछे वाली सीट पर नजरें घुमाईं।

परंतु वहां कोई न दिखा।

“ये पोतेबाबा है?” सोहनलाल ने अचकचाकर जगमोहन को देखा।

हां। ये ही पोते बाबा है। उसकी आकृति को देखना चाहता है तो सिगरेट सुलगा। धुएं में तू पोतेबाबा की आकृति देखेगा।”

सोहनलाल उसी पल सिगरेट निकालकर सुलगाने लगा।

तेरे क्या हाल हैं गुलचंद?” सोहनलाल पल भर के लिए हड़बड़ाया। गुलचंद सोहनलाल के पूर्वजन्म का नाम था।

तू मेरा नाम कैसे जानता है पूर्वजन्म का?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

मैं तो तुझे बहुत अच्छी तरह से जानता हूं।”

“कैसे?” सोहनलाल ने धुआं उगला और गर्दन पीछे घुमा ली। कार में धुआं भरने लगा था। जगमोहन का ध्यान कार चलाने पर था।

“मैं तेरे पूर्वजन्म से ही तो आया हूं, पहचाना नहीं मुझे, पोतेबाबा हूँ मैं।” ।

नहीं पहचाना ।” । तभी सोहनलाल को धुएं में पोतेबाबा की आकृति दिखाई देने लगी। वो आकृति पीछे वाली सीट पर बैठी हुई थी। लम्बी दाढ़ी। पीछे को जाते सिर के बाल । गले में मालाएं। एक कान में कुंडल फंसा लटक रहा था।

“पोतेबाबा मुझे नजर आ रहा है जगमोहन ।” सोहनलाल कह उठा।

“धुएं में उसकी आकृति ।” जगमोहन बोला।

“वो ही, वो ही।” फिर सोहनलाल पोतेबाबा से बोला–“मैंने तुझे पहले कभी नहीं देखा। तेरा नाम भी नहीं सुना।” *

“तो इस वक्त याद नहीं तेरे को पूर्वजन्म की।” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे सोहनलाल को।

“तू देख इसे।” सोहनलाल ने जगमोहन से कहा।

कई बार देख चुका हूं।” जगमोहन कार चलाते बोला। पीछे न देखा।

सोहनलाल की निगाह पोतेबाबा की आकृति पर टिकी थी। वो कुछ हैरान सा था। *

“क्यों जग्गू।” पोतेबाबा की आवाज उभरी–“तू मानता नहीं मेरी बात। जथूरा के कामों को खराब क्यों करता है?”

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।

“मेरी बात को समझ जग्गू। पीछे हट जा । तू भी खुश, जथूरा भी खुश। वरना बुरा होगा। तेरे कदम पूर्वजन्म की यात्रा की ओर बढ़ रहे हैं और वहां पर जथूरा की ताकत देखकर तू कांप उठेगा। वहां जथूरा तुझे बख्शेगा भी नहीं। जथूरा अभी भी इसी चेष्टा में है कि तू मान जाए। वो झगड़ा नहीं करना चाहता।”

“मैं भी झगड़ा नहीं चाहता।” जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।

“तू उसके रास्ते में मत आ। कसम ले ले।”

“जथूरा को चाहिए कि वो इस दुनिया में हादसे की कोशिश बंद कर दे। मेरा रास्ता खुद-ब-खुद ही बदल जाएगा।” ।

“हादसों का देवता, हादसे कराने से कैसे पीछे हट सकता है?” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे।

“तो मैं भी अपने कर्म से पीछे कैसे हट सकता हूं?”

तो तू जथूरा से झगड़ा करके ही रहेगा।”

“मैं जथूरा को नहीं जानता। उसे कभी देखा नहीं, तो मैं उससे झगड़ा क्यों करूंगा।”

सोहनलाल की निगाह एकटक धुएं में दिखाई दे रही, पोतेबाबा की आकृति पर टिकी थी। उसने आकृति को अपनी तरफ देखते पाया तो सतर्क हुआ। तभी पोतेबाबा के होंठ हिले।

गुलचंद । जग्गू तेरी बात अवश्य मानेगा।”

हुक्म कर।”

इसे समझा कि ये जथूरा के कामों के बीच दखल मत दे। उसके हादसों को खराब न करे ।”

 
“ये ऐसा कुछ नहीं कर रहा।” सोहनलाल ने सामान्य स्वर में कहा।

“तू मुझसे मजाक मत कर।”

सच कह रहा हूँ मैं।”

“जथुरा की दुश्मन शक्ति, पहले ही इसे जथुरा के द्वारा किए जाने वाले हादसों की झलक दिखला देती है और ये उन हादसों को रोक देता है।”

बुरी बात है ये तो।”

समझा इसे ।” ।

“समझाऊंगा।” सोहनलाल के चेहरे पर संजीदगी के भाव दिखे–“इसे मैं ऐसा नहीं करने दूंगा।”

सच कह रहा है।”

“हां ।” सोहनलाल ने सिर हिलाया—“तू मुझे दोपहर तक का वक्त दे।” ।

तब तक तू क्या कर देगा?”

इसे समझा दूंगा। तू इसके बंगले पर ही आना। मैं वहीं मिलेगा। तब तू खुद ही जगमोहन से बात करके देख लेना।” ।

मुझे विश्वास नहीं आ रहा।” पोतेबाबा के स्वर में संदेह के भाव थे।

“किस बात का?”

कि तेरे जैसा मक्कार सच बात कह रहा है।”

“मक्कार, तूने ये कैसे सोच लिया कि मैं मक्कार हूं।” सोहनलाल की आंखें सिकुड़ीं। ।

“पूर्वजन्म में तू यही सब तो करता था। तुझे याद नहीं मेरी, वरना ये बात तू न पूछता।”

हममें क्या रिश्ता था पूर्वजन्म में?" सोहनलाल ने पूछा।

“हम दोस्त थे। एक साथ कहीं छिपकर नशा किया करते थे। तूने ही मुझे नशे की आदत लगवाई थी। उसके बाद तू देवा के रंग में रंगता चला गया और मैं जथूरा की सेवा में चला गया था।” पोतेबाबा की आवाज कानों में पड़ी।

तो हम दोस्त थे।” सोहनलाल ने सिर हिलाया।

तो तेरे को उसी दोस्ती का वास्ता।”

सोहनलाल गम्भीर था-"दोपहर बाद आना और जगमोहन को बदले हुए देख लेना। मैं इसे ठोक-पीटकर समझा दूंगा। देखता हूँ कैसे नहीं मानता मेरी बात। मैं इसे हर बार सीधा कर देता हूं।”

“तू जरूर धोखा देगा गुलचंद। तेरी कमीनगी मैं कई बार भुगत चुका.... ।”

“वो पूर्वजन्म की बातें थीं।”

तेरे लिए।” पोतेबाबा के होंठ हिले–“मेरे लिए तो वो ही जन्म है। सब कुछ वो ही है।”

“तू तो बूढ़ा हो गया दिखता है।” सोहनलाल मुस्कराया।

उम्र भी तो बहुत हो गई। लेकिन अभी मेरी उम्र खत्म नहीं होने वाली। बहुत जीना है मैंने।”

तभी जगमोहन ने सड़क के किनारे कार रोक दी फिर गर्दन घुमाकर पोतेबाबा से बोला।।

“एक बात तो बता ।”

पूछ जग्गू-

जथूरा के दो-चार हादसे तो होते न होंगे, फिर मुझे सिर्फ दो-चार हादसों के बारे में ही क्यों पता चलता है।”

 
पोतेबाबा ने फौरन कुछ नहीं कहा। कुछ खामोशी के बाद बोला।

“तू ठीक कहता है, तुम्हारे हिसाब से 24 घंटों में जथूरा के सेवक हजारों हादसे तैयार करके इस दुनिया में भेजते हैं और वे सब सफल रहते हैं। लेकिन तेरे को चंद खास हादसों का ही पता चलता है।”

“ऐसा क्यों?” ।

“क्योंकि।” पोतेबाबा गम्भीर स्वर में कह उठा–“जो शक्ति तुझे हादसों का एहसास करा रही है, वो जानती है कि कौन-कौन से हादसे पूर्वजन्म में प्रवेश करने के लिए, चाबी की तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं। सीधी तरह यूं कह ले कि कुछ चुनिंदा हादसों को होने से तू रोकेगा तो तेरा पूर्वजन्म में जाने का रास्ता खुल जाएगा।”

“समझा।” ।

“वो शक्ति चाहती है कि तू पूर्वजन्म में प्रवेश करे और जथूरा से झगड़ा करे। इसी वजह से ये सब हो रहा है। जथूरा ने मुझे भेजा है तुझे समझाने के लिए। अगर एक बार भी तू हादसे को रोकने की कोशिश नहीं करता तो जथूरा की दुश्मन शक्ति का घेरा बेकार होता चला जाएगा। फिर तू पूर्वजन्म में प्रवेश नहीं कर सकेगा। इसी कारण तेरे से कहा था कि तू सिर्फ एक बार पीछे हट जा। उसके बाद सब ठीक हो जाएगा। जथूरा की दुश्मन शक्ति तेरा बुरा कर रही है जग्गू।”

अच्छा—वो कैसे?”

“तू जथूरा के सामने, धूल भी नहीं और वो तेरे को जथूरा से टक्कर लेने के लिए उकसा रही है। जथूरा तेरे को मार देगा जग्गू।”

“ये बात है तो जथूरा को क्यों चिंता हो रही है, मेरे पूर्वजन्म में आ जाने की। वो तो मेरे से ताकतवर है।” ।

“जथूरा को तेरी चिंता है।”

मेरी चिंता?” ।

हां, तेरा एहसान है उस पर। इसलिए वो नहीं चाहता कि तू उसके रास्ते में आए और मर जाए।”

“फिर तो जथूरा मेरा भला चाहता है।” जगमोहन व्यंग भरे स्वर में कह उठा।

“दिल से वो तुम्हारा भला चाहता है। तभी तो वो चाहता है कि तू रास्ता बदल ले और तेरा उसका टकराव न हो।” । ।

“धन्यवाद देना जथूरा को मेरी तरफ से कि वो मेरा खैरखाह है।” जगमोहन तीखे स्वर में बोला। उसी पल सोहनलाल कह उठा।

बातें मत कर पोतेबाबा। तू दोपहर को आना। तब तक मैं जगमोहन को समझा चुका होऊंगा।”

“ठीक है, दोपहर को आऊंगा।”

कार से निकल ।” जगमोहन बोला-“अब तेरी यहां जरूरत नहीं ।”

“जग्गू तू बेइज्जती करने वाले अंदाज में मेरे से बात करता है।” पोतेबाबा की आवाज उभरी और पिछला दरवाजा खुलता दिखा।

सच मान। अभी मैं बहुत इज्जत से तेरे से बात कर रहा हूं।”

पोतेबाबा की आवाज नहीं आई और दरवाजा बंद होता दिखा।

जगमोहन ने पुनः कार आगे बढ़ा दी। सोहनलाल ने कश लेकर पीछे वाली सीट की तरफ धुआं फेंका। परंतु पोतेबाबा की आकृति नहीं दिखी। वो कार से उतर चुका था।

“वो अदृश्य था। कितनी अजीब बात है।” सोहनलाल बोला—“उसका अदृश्य होना खतरनाक है। वो कुछ भी कर सकता

जगमोहन चुप रहा।

सब कुछ देखने-सुनने के बाद भी मुझे तेरे हालातों पर यकीन नहीं आ रहा।” सोहनलाल ने गहरी सांस ली।

मेरे हालात अब तेरे बनने जा रहे हैं।” जगमोहन मुस्करा पड़ा।

वो कैसे?”

“तूने पोतेबाबा को दोपहर को बुलाया है कि...।”

उस पर काबू जो पाना है।” सोहनलाल गम्भीर हो गया।

ओह, ये बात तो मैं भूल ही गया था।”

रुस्तम राव और बांके से बात करता हूं।” सोहनलाल ने कहा और फोन निकालकर नम्बर मिलाने लगा।

सोहनलाल ने फोन कान से लगा लिया। दूसरी तरफ बेल जा रही थी।

“हैलो ।” सोहनलाल के कानों में बांकेलाल राठौर की आवाज पड़ी—“कोनों बोल्ले है?”

सोहनलाल ।” सोहनलाल के होठों पर मुस्कान उभरी।

तम । नशाखोर ।”

हां-मैं ही।”

“थारी सिगरेटों में नशों वाली गोली का का हाल हौवे?”

बढिया है। रुस्तम कहां है?"

छोरो इधर-उधर हौवे। बोत शैतान हो गयो वो ईब। थारा चाल-चलन कैसो हौवे?”

वैसा ही है।”

“म्हारो देवराज चौहानो ठीको हौवे का?”

हां ।”

“सब ठीको हौवो, कोई मरो ना।”

“नहीं ।” ।

फिरो फोनो बंद कर दयो। का जरूरत हौवे बातों करके पैसों खराब करने की ।”

जगमोहन मेरे साथ है।” ।

म्हारा आशीर्वाद उसो के सिर पर मारियो ।” ।

हमें तुम्हारी और रुस्तम राव की जरूरत है।”

*म्हारो से ब्याह करने का प्रोग्राम हौवे का?"

तुम रुस्तम राव को लेकर देवराज चौहान के बंगले पर आ जाओ।”

 
मण्डप वहीं पे सजा के रखियों का?" बांकेलाल राठौर की आवाज में गम्भीरता आ गई–“बात का हौवे?”

तुम रुस्तम राव को लेकर पहुंचो सब जान जाओगे।”

“इसो का मतलब खैर न हौवे ।”

“अभी कुछ पता नहीं ।”

“लो। छोरा आ गयो। बातें मारो ले, उसी के साथ।”

दो पल बीते कि सोहनलाल के कानों में रुस्तम राव की आवाज पड़ी।

क्यों बाप, कैसा चल रईला है?”

मैं ठीक हूं रुस्तम । तुम बांके के साथ देवराज चौहान के बंगले पर आ जाओ।”

गड़बड़ होईला क्या?”

शायद ।”

देवराज चौहान और जगमोहन भी उधर होईला बाप?”

“जगमोहन होगा, देवराज चौहान मुम्बई से बाहर है। तुम बांके के साथ आ रहे हो न?” ।

“अपुन पक्का पौंचेला बाप। नाश्ता भी उधर ही करेला ।”

हम इकट्ठे ही नाश्ता करेंगे। साथ में लेते आना ।”

बांके को...।” । ।

“हां और नाश्ता भी।” सोहनलाल ने कहा और फोन बंद कर दिया–“वो कुछ देर में बंगले पर पहुंच जाएंगे।”

जगमोहन ने सिर हिलाया।

मेरे खयाल में हम पोतेबाबा को बंदी बना लेंगे। देखते हैं।” जगमोहन बरबस ही मुस्करा पड़ा।

शाम के 3.30 बजे थे। जगमोहन और सोहनलाल कुछ देर पहले ही नींद से उठे थे। नहा-धोकर उन्होंने कपड़े बदले। जगमोहन सोहनलाल को धूप देता कह उठा। इसे जला दो। हाल में, बेडरूम में, किचन में। ताकि इसके धुएं में पोतेबाबा की आकृति से उसकी मौजूदगी का स्पष्ट एहसास पा सकें। धूप को इस तरह रखना कि इसका धुआं हर तरफ जाए।”

सोहनलाल धूप जलाने में व्यस्त हो गया। दस मिनट बाद इस काम से फारिग हुआ।

अब हर जगह धूप की स्मैल फैली हुई थी। धुआं वहां भरने लगा था। जगमोहन कॉफी बना लाया था। दोनों कॉफी के प्याले थामे सोफों पर आ बैठे थे। सोहनलाल बोला।।

देवराज चौहान का कोई फोन नहीं आया?”

“नहीं।” जगमोहन कॉफी का प्याला रखता कह उठा“उससे बात करता हूं।”

जगमोहन ने फोन निकालकर देवराज चौहान का नम्बर मिलाया।

“यहां के हालात उसे बताओगे?” सोहनलाल ने पूछा।

नहीं। मैं उसे व्यर्थ में चिंता में नहीं डालना चाहता।” नम्बर लग गया। देवराज चौहान की आवाज कानों में पड़ी।

हैलो ।”

“तुम दिल्ली में ही हो?” जगमोहन ने पूछा।

हां। एक-दो दिन तक वापस जा जाऊंगा। वहां सब ठीक है?” उधर से देवराज चौहान ने पूछा।

सब ठीक है। लेकिन तुम दिल्ली में किस काम को कर रहे हो?”

“आकर बताऊंगा।”

मेरी जरूरत हो तो आ जाता हूं।”

नहीं। तुम्हारी ज़रूरत नहीं है।” बात करके जगमोहन ने फोन बंद किया।

“एक-दो दिन तक आने को कह रहा है।” जगमोहन ने सोहनलाल से कहा।

“पोतेबाबा नहीं आया अभी तक।” सोहनलाल बोला–“मैंने उसे दोपहर में आने को कहा था।”

“मैं तो दोपहर में ही आ गया था।” पोतेबाबा की आवाज उन्हें सुनाई दी।

जगमोहन और सोहनलाल की निगाहें आवाज की तरफ घूमीं।

चंद कदमों की दूरी पर, सोफे पर बैठे पोतेबाबा की धुएं में आकृति का आभास हुआ।

 
तो तुम यहां हो।” सोहनलाल मुस्कराया। आकृति का सिर हिला। धुआं जब वहां ज्यादा होता तो आकृति स्पष्ट नजर आती। कम होता तो आकृति टूटी-फूटी सी दिखाई देती।

“जग्गू को समझा लिया गुलचंद?" पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिलते दिखे।

हां-बात की। तेरी खातिर की।”

मेरी खातिर?”

पूर्वजन्म में हम दोस्त हुआ करते थे। हम एक साथ नशा किया करते थे। दोस्ती का कुछ तो खयाल रखना है कि नहीं?

तेरे शब्दों में चालाकी की महक है।” ।

ऐसा कुछ नहीं है।” ।

जग्गू माना कि जथूरा के कामों को रोकने की चेष्टा नहीं करेगा?” पोतेबाबा की आकृति के उसे होंठ हिलते दिखे।

माना, लेकिन ये भी कुछ कहता है।”

क्या?”

पूछ लो।” सोहनलाल ने जगमोहन की तरफ इशारा किया। जगमोहन पोतेबाबा की आकृति की तरफ देखते कह उठा।

मैं जथूरा से मिलना चाहता हूं।”

“ये सम्भव नहीं ।”

तो ये भी सम्भव नहीं कि मैं तुम्हारी बात मान जाऊं।” जगमोहन ने कहा।

क्यों? क्यों मिलना चाहते हो तुम जथूरा से?”

“ये सब बातें ही करनी हैं उससे। मुझे तुझ पर विश्वास नहीं। क्योंकि मैं तुझे जानता नहीं। पूर्वजन्म का मुझे कुछ भी याद नहीं। क्या पता जथूरा नाम की आड़ में मुझसे कोई खेल खेल रहा हो।”

“मैं खेल क्यों खेलूंगा?” ।

तो जथूरा से मेरी बात करा ।”

यकीन मान जग्गू, ये सम्भव ही नहीं है।” पोतेबाबा समझाने वाले स्वर में बोला।

क्यों?”

जथूरा इस वक्त, इस दुनिया में प्रवेश नहीं कर सकता। जब ग्रहों की खास चाल आती हैं तो वो इस दुनिया में प्रवेश करता है। ये उसके बस में भी नहीं है कि, जब चाहा, तब वो इस दुनिया में आ जाए।”

जगमोहन सतर्क हुआ। परंतु नजरें आकृति पर ही रहीं।

सोहनलाल ने उसी पल इस तरह आंखें बंद कर लीं, जैसे आराम करने का इरादा हो।।

पोतेबाबा की पीट की तरफ से बांकेलाल राठौर और रुस्तम राव दबे पांव पोतेबाबा की आकृति की तरफ बढ़ रहे थे। उन दोनों के हाथों में नायलोन का खुला जाल थमा था। दोनों ने एक-एक तरफ के, दो-दो सिरे थाम रखे थे। वे दोनों मात्र सात-आठ कदम दूर थे अब।

“तो तुम मुझे उसके पास ले जाओ।” जगमोहन बोला—“ताकि मैं...।”

“असम्भव ।” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिले।

क्या मतलब?”

तुम्हारा इस वक्त पूर्वजन्म की जमीन पर पहुंच जाना बहुत गलत होगा। तुम्हें वहां जाने से रोकने के लिए ही तो मैं भागदौड़ कर रहा हूं, वरना तुम जिस रास्ते पर बढ़ रहे हो, वो पूर्वजन्म के प्रवेश द्वार तक ही जाता है।”

“मतलब कि तुम मेरी बात पूरी नहीं कर सकते?”

सम्भव ही नहीं है। कतई नहीं।” पोतेबाबा की आवाज में स्पष्ट इंकार था।

सोहनलाल ने आंखें खोलीं ।

बांकेलाल राठौर और रुस्तक राव अब मात्र ढाई-तीन कदमों की दूरी पर थे।

सम्भव होता तो मैं अवश्य मानता।”

किसी तरह कोई रास्ता बना लो। सम्भव करने का कोई रास्ता निकाल लो।”

इस बारे में दोबारा मत कहो। नहीं हो सकता ये।”

तो जगमोहन फिर तुम्हारी बात नहीं मानेगा। जथूरा के कामों को खराब करता रहेगा।”

“ऐसा है तो भुगतेगा ये बच नहीं पाएगा जथूरा के कहर से...।” यही वो पल थे कि जिन्होंने वहां का माहौल पूरी तरह बदल दिया।

 
रुस्तम राव और बांकेलाल राठौर ने चादर की तरह फैलाकर थाम रखा वो जाल, पीछे से आकर पोतेबाबा की सोफे पर बैठी आकृति के ऊपर डाला और उसके किनारे पूरी ताकत के साथ सोफे के साथ जकड़ दिए।

सोहनलाल जल्दी उठा और पहले से ही एक तरफ रखी नायलोन की मोटी डोरी उठा लाया और सोफे के गिर्द जाल में रस्सी फंसाते हुए डोरी को कसता चला गया। * पोतेबाबा की आकृति छटपटाई।।

परंतु वो आजाद नहीं हो सका । पोतेबाबा ने खास कोशिश भी न की आजाद होने की।

सोफे पर मौजूद जाल ऊपर तक उठा हुआ था, जिसकी वजह से, वहां किसी के बैठे होने का आभास होता था। सोहनलाल डोरी बांधकर फारिग हुआ।

पोतेबाबा जाल के बीच सोफे पर बंध चुका था।

तुम अदृश्यो हो के, म्हारे को डरावे हो।” बांकेलाल राठौर अपनी मूंछों पर हाथ फेरता कह उठा–अंम थारे को ‘वड' दयो।”

जाल में फंसी पोतेबाबा की आकृति के होंठ मुस्कराते दिखे।

तुम भंवर सिंह।” पोतेबाबा की आवाज उभरी।।

*आं हम। मालूम पड़ो तम पीछे के जन्म वालो हो ।”

पोतेबाबा का सिर हिला और रुस्तम राव को देखा।

“तुम त्रिवेणी हो। वही त्रिवेणी, जिसका ब्याह पेशीराम की बेटी के साथ हुआ था।” (ये सब बातें विस्तार से जानने के लिए पढ़े अनिल मोहन के पूर्व प्रकाशित उपन्यास–‘जीत का ताज’, ‘ताज के दावेदार' व 'कौन लेगा ताज’ ।)

“हां बाप आपुन वो ही होएला ।” रुस्तम राव गम्भीर स्वर में बोला—“तुम कौन होईला?”

पोतेबाबा।” ।

“आपुन ने नेई पेईचाना तेरे को बाप ।” ।

“मैं गुलचंद का दोस्त हुआ करता था, फिर जथूरा की सेवा में चला गया।”

“ओ ‘बड’ दवायें जथूरा को ।” बांकेलाल राठौर अपनी मूंछों पर हाथ फेरता कह उठा।

“आपुन जथूरा को भी नेई जानेला बाप ।”

“पूर्वजन्म की बातें इस वक्त तुम लोग भूले हुए हो।” पोतेबाबा के होंठ हिले।

तम म्हारे को दिखो क्यों ना?” बांकेलाल राठौर ने पूछा।

“मैंने सोने के कलश वाली दवा खा रखी है। उस दवा को जो भी खाता है, वो अदृश्य हो जाता है।”

म्हारे को दे।”

वो दवा इस तरह किसी को नहीं दी जा सकती। वैसे भी दवा इस वक्त मेरे पास नहीं है।”

फिर ठीको कैसे हौवे?”

चांदी के कलश वाली दवा खाकर ।”

“यो सोनो-चांदो के कलश क्या हौवे?”

हमारी दुनिया में एक गुप्त जगह पर एक साथ सोने और चांदी के कलश रखे हुए हैं। वहां पर हर कोई नहीं पहुंच सकता। कुछ खास लोगों की पहुंच ही उन कलशों तक है। उन्हीं कलशों के बीच वो दवा रखी जाती है। उस दवा को कलशों के नाम से पहचाना | जाता है।” पोतेबाबा का स्वर बेहद शांत था।

“थारो का हौवे ईब पोतेबाबा। थारों को तो इस तरहो, गायबो की मुद्रा में ही बांध के रखो अंम और सुबह-शामो डण्डा बजायो थारे पर। तम म्हारे जगमोहन को परेशान करो हो।”

मैं तो जग्गू का भला करना चाहता...।”

 
आपुन सब जानेला बाप ।” रुस्तम राव बोला–“बोल असली मामला क्या होईला?”

असल बात वो ही है, जो मैं तुम लोगों को बता चुका हूं।” ।

इसो को ‘वडना' ही पड़ो हो । यो शराफत से न मानो हो ।”

पोतेबाबा की आकृति ने सोहनलाल से कहा।

गुलचंद। मुझे पहले ही शक था कि तू मेरे से अवश्य कोई धोखेबाजी करेगा।”

“अपना भला चाहता है तो तू सारी बात हमें सच-सच बता दे। हम तेरे को आजाद कर देंगे।”

“आजाद?” पोतेबाबा की आकृति के होंठ मुस्कराते दिखे–“मैं कैद ही कहां हुआ जो तू मुझे आजाद करेगा। तूने अभी पोतेबाबा की ताकतों को पहचाना ही कहां है। मैं जथूरा का खास सेवक यूं ही तो नहीं बन गया।”

“थारी अकड़ अभी तक अकड़ी रही हो।” बांकेलाल राठौर ने पुनः मूछों पर हाथ फेरा–“अंम थारी अकड़ के ‘वड' दयो ।”

पोतेबाबा ने बांकेलाल को देखा और मुस्करा पड़ा फिर उसके होंठों से न समझ में आने वाले मंत्र निकले।

चंद सेकंडों तक और अगले ही पल उस पर पड़ा वो जाल उछलकर दूर जा गिरा।।

पोतेबाबा खड़ा हो गया।

बांकेलाल राठौर हड़बड़ाकर बोला।

छोरे ये क्या हो गये हो। यो तो जालो को तिनके की तरह बिखेरो हो।”

बाप, ये गड़बड़ वाला चक्कर होईला।” सबकी निगाह धुएं की वजह से नजर आ रही, पोतेबाबा की आकृति पर थी।

“जग्गू।” पोतेबाबा ने गम्भीर स्वर में कहा-“अब ये तो स्पष्ट हो गया कि तुम मेरी बात नहीं मानोगे ।”

“नहीं मानूंगा।” ।

तो इसका अंजाम पूर्वजन्म की तुम्हारी यात्रा पर खत्म होगा और वहां जथूरा के सेवक तेरे को मार देंगे। ये बात तो तू जानता ही है कि वहां हथियारों से लड़ाई नहीं लड़ी जाती। वहां शक्तियों का बोलबाला है।”

“मैं तेरी बातों से डरने वाला नहीं ।”

“मैं तेरे को आगाह कर रहा हूं, डरा नहीं रहा। मैं जानता हूं तू डरने वालों में से नहीं है।”

जगमोहन की एकटक निगाह पोतेबाबा की आकृति पर थी।

अभी भी वक्त है संभल जा ।”

बाप ।” रुस्तम राव बांकेलाल राठौर से बोला–“धमकी दै रिएला है।”

“थारी यो हिम्मत, ‘वड’ वांगे पोतो बाबे को।” कहने के साथ ही बांकेलाल राठौर पोतेबाबा की आकृति की तरफ झपटा।

नहीं।” जगमोहन ने रोकना चाहा।।

परंतु तब तक बांकेलाल राठौर पोतेबाबा की आकृति के पास पहुंच चुका था।

तभी सबने पोतेबाबा की रेखाओं जैसी बांह को आगे बढ़ते देखा। फिर देखा पोतेबाबा ने उसकी बांह को पकड़ा और एक तरफ झटक दिया। बांकेलाल लड़खड़ाकर तीन-चार कदम दूर जा गिरा।।

“मार दयो म्हारे को।” बांकेलाल राठौर संभालता कह उठा–“यो पोतेबाबा तो बोत पॉवरफुल हौवे ।” |

रुस्तम राव की नीली आंखों में क्रोध के भाव उभरे। वो सावधानी से पोतेबाबा की तरफ बढ़ने लगा।

पोतेबाबा की धुएं की आकृति में होंठ मुस्कराहट में फैलते दिखे। तभी जगमोहन आगे बढ़ा और रुस्तम राव की बांह थाम ली।

रहने दो। उसकी तरफ मत जाओ।” जगमोहन बोला।

 
“आपुन देखेगा कि इसमें कितना दम होईला ।” रुस्तम राव गुर्रा उठा।।

“मैं देख रहा हूं, इसमें दम है। इसके शरीर की ताकत को मैं देख चुका हूं।”

आपुन भी चैक करेला बाप ।”

नहीं, तुम...।” तभी सबकी निगाह बांकेलाल राठौर पर ठहर गई। बांकेलाल राठौर के हाथ में रिवॉल्वर दबी नजर आ रही थी।

थारे में बोत ताकतो हौवे, पर म्हारी रिवॉल्वरों थाड़ी खोपड़ी खोल दयो पोतोबाबा।”

पोतेबाबा के होंठ मुस्कराहट के रूप में फैले रहे।

गोली मत चलाना।” जगमोहन के होंठों से निकला।

क्यों, यो थारा बाप लगों के?” बांकेलाल राठौर ने कड़वे स्वर में कहा।

मेरी तरफ से बम का गोला मारो। मुझे क्या?" जगमोहन सकपकाकर कह उठा।

तभी बांकेलाल राठौर ने ट्रेगर दबाया। एक बार, दो बार, तीन बार। परंतु ट्रेगर दबा ही नहीं। गोली चली ही नहीं।

यो रिवॉल्वर तो औरत की तरहो धोखा देवे, औरत भी मौके पर आकर दगो दे जावें ।” उसने पुनः रिवॉल्वर का ट्रेगर दबाना चाहा।

परंतु कोई फायर नहीं हुआ।

छोरे ।” बांकेलाल राठौर ने भिंचे स्वर में कहा“जरो तम ट्राई करो। खोपड़ी में फायर करो हो।”

जगमोहन ने उसी पल रुस्तम राव की बांह छोड़ दी।

रुस्तम राव ने रिवॉल्वर निकाली और पोतेबाबा की आकृति की तरफ करके ट्रेगर दबा दिया।

एक बार, दो बार, तीन बार । परंतु ट्रैगर नहीं दबा।

“थारो भी नेई दबो हो। म्हारो भी नेई दबो हो।” बांकेलाल राठौर ने अपने हाथ में दबी रिवॉल्वर का ट्रेगर पुनः दबाना चाहा।

कोई फायदा नहीं हुआ। फिर पोतेबाबा की आवाज उसके कानों में पड़ी।

कोई और कोशिश हो तो वो भी कर सकते हो।”

“अब नहीं तो फिर सही, लेकिन कभी तो तुम हमारे चंगुल में फंसोगे।” जगमोहन ने कठोर स्वर में कहा।

“तुम लोग कभी भी मुझे नहीं फांस सकते। साधारण इंसान हो तुम सब। मुझ पर किसी हथियार का असर नहीं होगा। मैं खुद को सुरक्षित करके ही, इस दुनिया में आया हूं। यहां कोई भी मेरा मुकाबला नहीं कर सकता।”

अम थारे को ‘वड' दवांगे।” बांकेलाल राठौर गुर्रा उठा।

जग्गू इससे तेरे को समझ आ जानी चाहिए कि जथूरा की ताकत क्या है। उसके एक सेवक का तुम लोग कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे तो, उसका क्या बिगाड़ोगे। वो तुम्हें चींटी की तरह मसल देगा।” पोतेबाबा ने हंसकर कहा।

“अंम थारे बाप को भी ‘वड’ दवांगे।”

पोतेबाबा ने जगमोहन से कहा।

सोच लेना जग्गू। अच्छा ये ही है कि तुम जथूरा के कामों को खराब मत करो। उसके रास्ते से हट जाओ।” कहने के साथ ही पोतेबाबा की आकृति पलटती दिखाई दी और दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

अगले ही पल वो आकृति आंखों के सामने से गायब हो गई।

वहां पर धुआं नहीं था, जिसमें फंसकर, पोतेबाबा की आकृति झलकती। खामोशी सी आ ठहरी वहां।।

“छोरे।” बांकेलाल राठौर ने गहरी सांस लेकर अपनी रिवॉल्वर जेब में रखते कहा-“तमंचे को रख लयो भीतर। गोली चलो तो म्हारी छाती के भीतरो जा धंसो। ठंडो-ठंडो रख लयो भीतरो।”

रुस्तम राव ने रिवाल्वर जेब में रख ली ।।

बोत बुरो हौयो। पोतो बाबा हाथों में आकर भी निकल गयो ।”

रुस्तम राव गम्भीर था। जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं। हम पोतेबाबा पर काबू नहीं पा सकते।”

 
सोहनलाल बोल पड़ा। सच में नहीं पा सकते ।”वो ताकतें रखता है, जबकि हम उसे अभी तक हल्के ले रहे थे।”

और वो हमें रोकने की चेष्टा कर रहा है।” जगमोहन बोला—“हम पर अपनी ताकतें इस्तेमाल नहीं कर रहा।”

क्यों?”

इसकी वजह वो ही जानता होगा कि अपनी शक्तियां वो हम पर इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा। वो हम सब के पूर्वजन्म के नाम जानता है। इसलिए उसकी कही हर बात को सच मानना होगा। उस पर गोली चलाने लगो तो वो रिवॉल्वरों के ट्रेगर जाम कर देता है। उसे जाल फेंककर कैद करो तो अपनी ताकतों से वो जाल को बेकार कर देता है। उसे पकड़ने की चेष्टा करो तो सामने वाले को इस तरह छटक देता है, जैसे वो खिलौना हो।” जगमोहन का स्वर गम्भीर था।”

तो वो तुम पर अपनी ताकत क्यों नहीं आजमा रहा?”

पता नहीं, क्यों?”

वो चाहे तो तुम्हें आसानी से खत्म कर सकता है।” सोहनलाल ने कहा-“परंतु ऐसा नहीं कर रहा वो।”

जगमोहन सिर हिलाकर रह गया। ।

“आपुन उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते बाप ।” रुस्तम राव बोला–“वो पौंचा हुआ है।” ।

“छोरे म्हारी तो बेईज्जती हो गयो । म्हारे को पकड़ोकर इस तरहों उछाल दयो कि अम खिलौना हौवो।” बांकेलाल राठौर अपनी मूछों पर हाथ फेरता कह उठा–“वो बात ही पॉवरफुल हौवे। पर अंम उसी को ‘वड' दयो ।” ।

| रुस्तम राव ने जगमोहन से बोला।

तुम्हें जथूरा द्वारा किए जाने वाले हादसों का पूर्वाभास कौन कराईला बाप?”

“मैं नहीं जानता।” जगमोहन बोला—“पोतेबाबा कहता है कि वो जथूरा की कोई दुश्मन शक्ति है।” ।

*और तुम्हें उस दुश्मन शक्ति का नेई पता होईला?”

नहीं ।”

रगड़ा है बाप। आपुन चारों का इकट्ठा हो जाना साबित करेला बाप कि पूर्वजन्म का सफर पक्का होईला ।”

ये जरूरी नहीं।” सोहनलाल बोला।।

“जरूरी होईला बाप। तभी तो आपुन लोग मिलेला ।”

छोरे थारी बात फिट हौवे म्हारो दिमागो में।” बांकेलाल राठौर ने गम्भीर स्वर में कहा।

देवराज चौहान को दिल्ली से बुलाईला बाप ।” ।

“नहीं, मैं उसे परेशान नहीं करना चाहता।” जगमोहन ने इंकार में सिर हिलाया।

“परेशानी की बात नेई, ये जरूरी होईला ।”

 
छोरा ठीको ही कहो हो। देवराज चौहानों को बुला लयो। मामलों बोत गड़बड़ो हौवो।”

जगमोहन ने सोहनलाल को देखा।

मेरे ख्याल में तो देवराज चौहान को अब तक बुला लेना चाहिए था।” सोहनलाल कह उठा।

“ठीक है, तुम सबकी यहीं मर्जी है तो मैं देवराज चौहान को फोन पर सारे हालात बता देता हूं। उसके बाद...।”

जगमोहन अपनी बात पूरी न कर सका।

उसी पल उसके मस्तिष्क में बिजली कौंधी। दोनों हाथों से उसने सिर थाम लिया। आंखें बंद होती चली गईं फिर उसके मस्तिष्क में कुतुबमीनार चमका। उसके बाद राजीव चौक (कनॉट प्लेस) का मैट्रो स्टेशन दिखा। राजीव चौक के नाम की पट्टी लगी हुई थी। मोना चौधरी आती दिखी, जो कि सैंट्रल पार्क के रास्ते की तरफ से आ रही थी। उसने पीली टी-शर्ट और घुटनों को ढांपती पैंसिल पैंट पहनी हुई थी। चैकिंग प्वाइंट से पार करके आगे बढ़ी फिर उसने विंडो से यात्रा का टोकन लिया और स्टेशन के भीतरी हिस्से में पहुंच गई। सामने बड़ी-सी घड़ी पर 11.30 का वक्त हो रहा था। सामने ही द्वारका जाने वाली ट्रेन आई। लोग चढ़ रहे थे। एनाउंसर की रुक-रुककर आवाजें आ रही थीं। परंतु मोना चौधरी की निगाह हर तरफ घूम रही थी फिर वो ठीक सामने जाती सीढ़ियों की तरफ बढ़ी। तभी जगमोहन ने अपने को देखा। बीस कदम पीछे वो सावधानी से मोना चौधरी के पीछे जा रहा था। उसका एक हाथ जेब में था। सीढ़ियां चढ़ती मोना चौधरी हर तरफ देख रही थी, परंतु पीछे आते जगमोहन को न देख सकी थी। सीढ़ियां चढ़कर स्टेशन के बीच बने छोटे-से पुल पर पहुंची मोना चौधरी और दाईं तरफ इंद्रप्रस्थ की तरफ जाने वाली मैट्रो की दिशा में बढ़ीं। ठीक इसी पल जगमोहन की बगल से कोई तेजी से निकला और आगे बढ़ता चला गया। वो उसके और मोना चौधरी के बीच में आ गया था। फिर जगमोहन ने बीच में आ जाने वाले व्यक्ति को रिवॉल्वर निकालते देखा। दो पल में हुआ ये सब। जगमोहन समझ गया कि वो ही व्यक्ति मोना चौधरी पर गोली चलाने जा रहा है। जगमोहन ने फुर्ती से रिवॉल्वर निकाली कि गोली चलाने वाले व्यक्ति पर फायर कर सके कि तभी मोना चौधरी के आगे, सोहनलाल इस तरफ आता दिखाई दिया। वो हाथ के इशारे से जगमोहन को मना कर रहा था कि गोली मत चलाए। वो चीखकर भी कुछ कह रहा था।

और जगमोहन के मस्तिष्क में उठी बिजली शांत पड़ती चली गई। वो दोनों हाथों से सिर को थामे वैसे ही खड़ा रहा। बांकेलाल रुस्तम राव के पास आ गया। सबकी निगाह जगमोहन पर थी।

छोरे । यो का हो गयो म्हारे जगमोहन को?”

इसी तरह इसे पूर्वाभास होईला बाप ।”

थारो को कैसो पतो?”

सुबह जगमोहन बताईला कि पूर्वाभास के टाइम, ये सब होईला।”

ईब इसो को का पूर्वाभासो हो गयो हो?

” ये बताईला बाप।” । जगमोहन ने सिर से हाथ हटाए और गहरी सांस लेकर आंखें खोल दीं। चेहरे पर पसीना चमक रहा था। वो आगे बढ़ा और सोफे पर जा बैठा। उसके चेहरे पर अजीब से भाव नजर आ रहे थे।

“का हो गयो थारे को?” बांकेलाल राठौर पास बैठता कह उठा–“बुरो सपणे देखो हो का?”

कुतुबमीनार। राजीव चौक का मैट्रो स्टेशन ।

” दिल्ली।” सोहनलाल के होंठों से निकला।

“हां।” जगमोहन ने गम्भीरता से सिर हिलाया—“समय 11.30 । वहां मोना चौधरी दिखी। कोई मोना चौधरी को गोली मारने जा रहा है। गोली मारने वाला उसके पीछे था। मेरे पास से ही वो निकला था—तुम-तुम भी वहां थे सोहनलाल ।”

हां तुम भी वहीं थे। तुम...।”

यो तो ऐसो सबो कुछ बतायो जैसो फिल्म में देखो हो ।” बांकेलाल राठौर कह उठा।।

“हां। वो फिल्म ही थी, जो मेरे मस्तिष्क में देखी।” जगमोहन व्याकुल-धीमे स्वर में कह उठा।

तारीख कौन-सी है?” सोहनलाल ने पूछा।।

तब मुझे वहां लगी घड़ी दिखी थी। 11.30 हुए थे उस घड़ी में। स्टेशन में बहुत लोग थे। वो दिन का वक्त था। इस वक्त शाम हो रही है, इसका मतलब वो कल का दिन है। आने वाला कल का दिन ।” जगमोहन बोला।

ओह ।”

“वो...वो मोना चौधरी को मारने जा रहा था। हमें...हमें दिल्ली जाना होगा।” जगमोहन कह उठा।

“आज रात की फ्लाइट से चलते हैं। मैं टिकटें बुक करा लेता हूं।”

सोहनलाल बोला—“तुम मोना चौधरी को मरने से बचाना चाहते

। “हां, क्योंकि मोना चौधरी को मारना, जथुरा की कोशिश है।

 
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